रेगिस्तानी हरियाली और बस्ती।
मुहा.-शान दिखाना-ठसक दिखाना।
मुहा.-शान जाना-मान भंग होना। शान घटना-इज्जत में कमी होना। शान मारी जाना-मान कम हो जाना। शान में बट्टा लगना-मान में कमी हो जाना। किसी की शान में (कहना)-किसी (प्रतिष्ठित व्यक्ति) के संबंध में या उसके प्रति (कुछ कहना)।
अहित या अनिष्ट-कामना-सूचक शब्द या कथन, कोसना।
फटकार, धिक्कार, भर्त्सना।
किसी से रुष्ट होकर शपथपूर्वक ऎसी बात कहना जिसका परिणाम अनिष्टकारी हो।
उ.- दुर्बासा शापन को आए तिनकी कछु न चलाई-सारा. ७७२।
जिस पर शाप का प्रभाव शेष न रहा हो, जिसने शाप का परिणाम भोग लिया हो।
विभिन्न भावों, वस्तुओं, रंगों आदि का मेल या मिलावट।
उ.- फिरि चितवन उर शाली री-८४६।
एक प्रत्य जो 'संपन्न' या 'वाला' -जैसा अर्थ देता है।
उ.-तौ कत कठिन कठोर होत मन मोहिं बहुत दुख शालै-३४९१।
सात द्वीपों में एक जो ऊख रस के समुद्र से घिरा कहा गया है।
उ.- सातो द्वीप¨¨¨¨¨¨ जंबू प्लक्ष क्रौंच, शाक, शाल्मलि कुश पुष्कर भरपूर-सारा. ३४।
उ.-सौति शाल उर में अति शाल्यो-२६७३।
जिसमे श्लेष हो, शलेषयुक्त।
बहता या प्रवाहित होता है।
उ.- कहा करौं अति सूवै नयना, उमँगि चलत पग पानी।
जो क्रम से हो, व्यवस्थित।
क्रम के अनुसार और व्यवस्थित होने की दशा या भाव।
पिरोयी हुई कड़ियों का समूह।
उ.- (क) पाउँ चारि सिर सृंग गुंग मुख तब कैंसैं गुन गैहौ-१−३३१। (ख) सर्प इक आइ बहुरि तुम्हरैं निकट, ताहि सौं नाव मम सृंग बाँधौ-८−१६।
सींग का बना एक तरह का बाजा।
उ.- सृंग-बेनु-नाद करत, मुरली मधु अधर धरत-६१९।
गहने-कपड़ों से अपने आपको सजाना।
साहित्य के नौ रसों में एक जो ‘रसराज’ कहा जाता है।
देव-मूर्ति का श्रृंगार करनेवाला।
सींग का बना हुआ एक प्रकार का बाजा।
उ.- मुरली बेंत बिषान देखियो सृंगी बेर सबेरो। लै जिनि जाइ चुराइ राधिका कछुक खिलौना मेरो-२९६५।
एक प्राचीन ऋषि जिनके शाप से परीक्षित को तक्षक नाग ने काटा था।
उ.- रिषि समाधि महँ त्यौंही रहयौ। सृंगी रिषि सौं लरिकन कहयौ। ¨¨¨। नृपति दोष कहियै किहिं जाइ। दियौ साप तिहिं तच्छक खाइ-१−२९०।
उ.- (क) सिंह कौ भच्छ सृगाल न पावै-९−७९। (ख) आइ सृगाल सिंह बलि चाहत, यह मरजाद जात प्रभु तेरी-९−९३। फिरत सृगाल सज्यौ सव काटत चलत सो सिर लै भागी-९−१५८।
उ.- पालत सृजत सँहारत सैंतत अंड अनेक अवधि पल आधे-९−५८।
सृष्टि या रचना करने की क्रिया, उत्पादन।
उ.- (क) सूर परस्पर करत कुलाहल गर सृक (पाठा.- सृग) पहिरावैनी-९−११। (ख) की सृक सीपज की बग-पंगति की मयूर की पीड पखी री-१६२७।
ओठों का छोर, मुँह का कोना।
उ.- गर-सृग पहिरावैनी-९−११।
छोड़ने या निकालने की क्रिया।
सृजनहार, सृजनहारा, सृजनहारो
रचने, बनाने या उत्पन्न करनेवाला।
रचना, बनाना, सृष्टि करना।
उ.- श्वासा तासु भए श्रुति चार।
वेग से साँस खींचना और निकालना।
सफेद, धवल, निर्मल, उज्ज्वल।
उ.- श्वेत छत्र मनो प्राची दिशि उदय कियो निशि राका-२५६६।
सफेद कौआ अर्थात् (जो बात असंभव हो)।
उ.- अप्सरा पारजातक धनुष अश्व गज श्वेत ए पाँच सुरपतिहिं दीन्हें-८-८।
जैनियों के दो प्रधान संप्रदायों में एक।
ष-देवनागरी वर्णमाला का इकतीसवाँ वर्ण जो मूर्द्धा से उच्चरित होने के कारण 'मूर्द्धन्य' कहलाता है। प्राचीन काव्य-भाषा में इसका उंच्चारण कभी 'ख' और कभी 'श' के समान होता है।
शुक्राचार्य के पुत्र का नाम जो प्रहलाद का शिक्षा-गुरु था।
उ.- षंडामर्क जो पूछन लाग्यो तब यह उत्तर दीन-सारा. ११२।
कुंडलिनी के ऊपर पड़नेवाले छह चक्र।
माघ कृष्ण एकादशी जब तिल खाने और दान करने का माहात्म्य है।
भारतीय आर्यों के छह दर्शन या शास्त्रः यथा-सांख्य, मीमांसा, न्याय, वैशेषिक, योग और वेदांत।
उ.- षट्दश सहस कन्या असुर बंदि में नींद अरु भूख अहनिशि बिसारी-१० उ.-३१।
उ.- सूरदास पूरो दै षट्दश कहत फिरत हो सोई-३०२२।
छह प्रकार के स्वाद या रस-मधुर लवण, तिक्त, कटु, कषाय और अम्ल।
उ.- बहु ब्यंजन बहु भाँति रसोई, षटरस के परकार-३९४।
उ.- षटरस ब्यंजन छाँड़ि रसोई साग बिदुर घर खाए-१-२४४।
संगीत के छह राग-भैरव, मलार, श्रीराग, हिंडोल, मालकोस और दीपक।
एक राजर्षि जिन्होंने इंद्र की सहायता की थी और जो केवल दो घड़ी की साधना से मुक्त हो गये थे।
उ.- (क) नृप षट्वांग पूर्व इक भयौ, सु तौ द्वै घरी मैं तरि गयौ-१-३४२। (ख) ज्यौं षट्वांग तरथौ गुन गाइ। नृप षट्वांग भयौ भुव माहिं।¨¨¨¨ इंद्रपुरी षट्वांग सिधाए-१-२४३।
संगीत के सात स्वरों में चौथा।
छह प्रकार के स्वाद या रस-नमकीन, तीता, कड़ुवा, कसैला और खट्टा।
काम, क्रोध आदि छह दोष जो प्राणी के शत्रु हैं।
बालक के जन्म का छठा दिन या उस दिन का उत्सव।
वे राग जिसमें केवल छह स्वर, स रे ग म प और ध लगते है, निषाद वर्जित है।
स्त्री का पूर्ण श्रृंगार जिसके सोलह अंग हैं।
सोलह संस्कार-गर्भाधान, पुंसवन, सीमंतोन्नयन, , नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, यज्ञोपवीत, केशांत, समावर्तन और विवाह।
सोलह से संबंधित, सोलहवीं।
पूजा के सोलह अंग-आवाहन, आसन, अर्ध्यपाद्य, आचमन, मधुपर्क, स्नान, वस्त्राभरण, यज्ञोपवीत, गंध (चंदन), पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, तांबूल, परिक्रमा और बंदना।
उ.- षोड़स जुक्ति, जुवति चित षोड़स, षोड़स बरस निहारे-१-६०।
देवनागरी वर्णमाला का बत्तीसवाँ व्यंजन जिसका उच्चारण-स्थान दंत है।
एक अव्यय जो शब्द के आदि में जुड़कर शोभा, समानता, निरंतरता, औचित्य आदि सूचित करता है।
दो पहाड़ों के बीच का तंग रास्ता, दर्रा।
(सं. सम + कृत, प्रा. संकट)
वह जिसकी उत्पत्ति भिन्न वर्णों या जातियों के स्त्री-पुरूष से हुई हो, दोगला।
साहित्य में दो या अधिक अलंकारों की साथ-साथ प्रयुक्त होने की स्थिति-विशेष।
दो या अधिक के योग से बना हुआ।
जो भिन्न वर्णों या जातियों के स्त्री-पुरूष से उत्पन्न हो, दोगला।
उ.- (क) सनक संकर ध्यान धारत-१-३०८। (ख) संकर पारबती उपदेसत-२-३।
मिश्रित होने का भाव या धर्म, मिलावट।
उ.- श्री रघुबीर मोसौं जन जाकै, ताहि कहा सँकराई-९-१४६।
उ.- (क) अजहुँ नाहिं संक धरत बानर मति-भंगा-९-९७। (ख) होइ सनमुख भिरौं, संक नहिं मन धरौं-९-१२९।
उ.- इक अभरत लेहिं उतारि, देत न संक करै-१०-२४।
(सं. सम + कृत, प्रा. संकट)
उ.- (क) काके हित श्रीपति ह्याँ ऐहैं, संकट रच्छा करिहैं-१-२९। (ख) सूर तुम्हारी आसा निबहै, संकट मैं तुम साथै-१-११२। (ग) संकट परैं जो सरन पुकारौं, तौ छत्री न कहाऊँ-९-१३२।
(सं. सम + कृत, प्रा. संकट)
जल या थल के दो बड़े भागों को जोड़नेवाला पतला भाग।
(सं. सम + कृत, प्रा. संकट)
शास्त्रों का ज्ञाता या वेत्ता।
वह जो शास्त्रों का ज्ञाता हो।
आधुनिक विश्वविद्यालयों की एक उपाधि।
महल या किले नीचे बसी हुई आबादी या बस्ती।
मंत्र-विशेष पढ़कर दान देना या धर्म-कार्य करने का निश्चय करना।
इकट्ठा या एकत्र किया हुआ।
पक्का विचार, दृढ़ निश्चय।
उ.- (क) करि संकल्प अन्न-जल त्याग्यौ-१-३४१। (ख) गए कटि नीर लौं नित्य संकल्प करि करत स्नान इक भाव देख्यो-२५५४।
दान, पुण्य आदि के पूर्व मंत्रोच्चारण द्वारा अपना विचार व्यक्त करना।
उ.- जब नृप भुव संकल्प कियो है, लागे देह पसारन-सारा. ३३९।
श्रीकृष्ण के भाई बलराम जिनका आयुध हल था।
उ.- (क) कालिनाग के फन पर निरतत संकर्षन को बीर-५७५। (ख) सूर प्रभु आकरषि ताते संकर्षण है नाम-३४८२।
एक वैष्णव संप्रदाय जिसके प्रवर्तक निंबार्क थे।
ग्रंथों या पत्र-पत्रिकाओं से प्रसंग या प्रबंध-विशेष चुनने की क्रिया।
वह ग्रंथ जो इस प्रकार चुनकर तैयार किया गया हो।
पक्का विचार, दृढ़ निश्चय।
दान, पुण्य आदि के पूर्व मंत्रोच्चारण से अपना विचार व्यक्त करना।
वह मंत्र जिससे ऎसा विचार व्यक्त किया जाय।
पक्का विचार या दृढ़ निश्चय करना।
उ.- तब संडामर्का संकाइ, कह्यौ असुर-पति सौं यौं जा-७-२।
वह मंत्र जिसके द्वरा ऎसा विचार व्यक्त किया जाय।
पक्का विचार या दृढ़ निश्चय करना।
मंत्र पढ़कर दान, पुण्य आदि का निश्चय व्यक्त करना।
उ.- नापौ देह हमारी द्विजवर सो संकल्पित कीन्हों-सारा. ३४१।
उ.- (क)पहुँचे जाइ महर-मंदिर मैं, मनहिं न संका कीनी-१०-४। (ख) जब दधि-सुत हरि हाथ लियौ। खगपति-अरि डर, असुरनि संका, बासर-पति आनंद कियौ-१०-१४३। (ग) जनि संका जिय करौ लाल मेरे, काहे कौ भरमावहु-१०-१७९। (घ) भजी निसंक आइ तुम मोकौं गुरुजन की संका नहिं मानी-पृ. ३४३ (२०)।
कीर्ति का भली भाँति वर्णन करना।
देवता आदि की उचित रीति से की गयी वंदना, भजन आदि।
सिमटा, मुँदा या सिकुड़ा हुआ।
उ.- (क) जनु रविगत संकुचित कमल-जुग निसि अलि उड़न न पावँ-१०-६५। (ख) कुमुद्ध-बृंद संकुचित भए-१०-२०२।
अच्छे विचार न ग्रहण करनेवाला।
स्थान जहाँ प्रेमी-प्रेमिका मिलना निश्चित करें।
घटना आदि का सूचक संक्षिप्त उल्लेख।
वह नायिका जो संकेतस्थल के नष्ट होने से दुखी हो।
उ.-सूरदास जौ बिधि न सँकोचै, तौ बैकुंठ न जाउँ-९-१६५।
क्रुद्ध या अप्रसन्न होना।
करधनी, नूपुर आदि की झनकार।
करधनी या नूपुर के घुँघरू।
फल के रस को ठंढे या गरम पानी में डालकर बनाया गया पेय।
जिसके संबंध में संकेत किया जाय।
उ.- मेरो अलकलड़ैतो मोहन ह्वैहै करत सँकोच-२७०७
उ.- जारौं लंक, छेदि दस मस्तक सुर-संकोच निवारौं-९-१३२।
बहुत सी बात को थोड़े में कहना।
उ.- कंप्यौ गिरि अरु सेष संक्यौ, उदधि चल्यौ अकुलाइ-१०-१६६।
एक अवस्था से दूसरो में पहुँचना।
एक के हाथ से दूसरे हाथ या अन्य के अधिकार में पहुँचना।
जो अंतरित या हस्तांतरित हुआ हो।
सूर्य का एक राशि से दूसरी में प्रवेश।
एक राशि से दूसरी में सूर्य के प्रवेश का समय।
वह दिन जब सूर्य एक राशि से दूसरी में प्रवेश करता है। हिन्दुओं में यह दिन एक पर्व माना जाता है।
जो (रोग) छूत या संसर्ग से फैले।
अंतरित या हस्तांतरित करने की क्रिया या भाव।
जो संक्षेप में कहा या लिखा जाय।
विस्तार से कही या लिखी गयी बात का सार।
संक्षिप्त रूप या सार प्रस्तुत करने की क्रिया।
संक्षिप्त या सार रूप में।
उ.- वर्णन कियो प्रथम संक्षेपन अबहूँ वर्ण न पाये-सारा. ५३१।
उ.- संख कुलाहल सुनियन लागे-९-१२५।
उ.- केतिक संख जुगै जुग बीते मानव असुर अहार-९-३२।
शंखासुर जो देवताओं को जीतकर वेद चुरा ले गया था जिनके उद्धार के लिए भगवान को मत्स्यावतार धारण करना पड़ा था।
उ.- चतुरमुख कह्यौ, संख असुर स्रुति तौ गयौ-८-१६।
सागर-मंथन से निकले चौदह रत्नों में एक जो विष्णु को मिला था।
उ.- संख कौस्तुभ मनि लई पुनि आपु हरि-८-८।
कंस का अनुचर एक दैत्य जिसे श्रीकृष्ण ने मारा था।
उ.- संखचूड़, मुष्टिक, प्रलंब अरु तृनावर्त संहारे-१-२७।
शंख धारण करनेवाले विष्णु या उनके अवतार राम और कृष्ण।
उ.- संख-चक्र-धर, गदा-पद्म-धर-५७२।
एक दैत्य जो देवताओं को हराकर, वेदों को चुरा ले गया था जिनके उद्धार के लिए विष्णु ने मत्स्यावतार धारण किया था।
उ.- (क) बहुरि संखासुरहिं मारि वेदाऽनि दिए-८-१६। (ख) चारि बेद लै गयौ सँखासुर, जल मैं रह्यौ लुकाई। मीन रूप धरिकै जब मारथौ-१०-२२१।
उ.- (क) बिपति परी तब सब सँग छाड़ै, कोउ न आवै नेरे-१-७९। (ख) साधु-संग मोकौं प्रभु दीजै-७-२।
मुहा.- संग लगना-साथ रहना। संग लगे फिरना-साथ-साथ रहना, पीछे पीछे फिरना, पीछे लगे रहना। सदा रहति सँग लागी-सदा साथ रहती है। उ.-घर की नारि बहुत हित जासौं रहती सदा सँग लागी- १-७९। संग लगाना-साथ-साथ रखना।
सांसारिक विषयों के प्रति अनुराग या आसक्ति।
संगीत में वाद्य बजाकर किया जानेवाला किसी कलाकार का साथ।
संगत होने की क्रिया या भाव।
मिलने की क्रिया, मेल, मिलाप।
उ.- (क) ज्यौं जन-संगति होति नाव मैं, रहति न परसैं पार-१-८४। (ख) सूरदास साधुनि की संगति बड़े भाग्य जो पाऊँ-१-३४०। (ग) साधु-संग प्रभु, मोकौं दीजै, तिहिं संगति निज भक्ति करीजै-७-२।
पूर्वापर प्रसंग की दृष्टि से ठीक बैठना या मेल खाना, प्रसंगानुकूलता।
बिखरी हुई शक्तियों, लोगों आदि को एकत्रित करने या मिलाने की व्यवस्था।
वह संस्था जो ऎसी व्यवस्था करे।
जो किसी वर्ग या जाति का होने के कारण उनके साथ रखा जा सके।
पूर्वापर प्रसंग की दृष्टि से ठीक बैठने या मेल खानेवाला (विचार या कार्य), प्रसंगानुकूल।
दो नदियों के मिलने का स्थान।
उ.- (क) सूरदास मानो चली सुरसरी श्रीगोपाल सागर सुखसंगा-१९०५। (ख) तात मात निज नारि ल हरि जी सब संगा-१० उ.-१०५।
उ.- सूरदास प्रभु ग्वाल-सँगाती जानी जाति जनावति-१९७६।
साथ रहनेवाली, सखी, सहेली।
उ.- (क) नाथ अनाथनि ही के संगी-। (ख) संगी गए संग सब तजकै-१६४७।
उ.- आए भाई स्याम के संगी-२९९७।
वह कार्य जिसमें नाचना, गाना और बजाना, तीनों हों; ताल, स्वर, लय आदि के नियमानुसार पद्य का उच्चारण, गाना।
उ.- उघट्यौ सफल संगीत रीति-भव अंगनि अंग बनायौ-१-२०५।
वह बरछी जो बंदूक के सिरे पर लगी रहती है।
संग्रह या एकत्र किया हुआ, संकलित।
दबाने, कमने या पेरने का यंत्र।
दूसरे की ओर से खेती करनेवाला।
उ.- (क) धनि त्रिय तुमको जो सुखदानी संगम जागत रैनि बिहानी-१९६७। (ख) सधन निकुंज सुरति-संगम मिलि मोहन कंठ लगायो-सारा. ७१८।
दो या अधिक ग्रह, नक्षत्र या अन्य वस्तुओं के मिलने का भाव या स्थान।
उ.-बुध-रोहिनी-अष्टमी संगम बसुदेव निकट बुलायौ-१०-४।
सेना की रक्षा के लिए बनायी गयी खाई, धुस या दीवार।
वह विकारी शब्द जो व्यक्ति, वस्तु या भाव का बोधक हो।
उ.- कहा काँच संग्रह के कीने, हरि जो अमोल मनी-८९४।
वह ग्रंथ जिसमें विषय या रीति-विशेष की रचनाएँ संगृहीत हों।
स्थान जहाँ विशेष प्रकार की वस्तुएँ एकत्र की जाये।
स्थान जहाँ विशेष प्रकार की वस्तुओं का संग्रह हो।
उ.- करत फिरत संग्राम सुगम अति कुसुम माल करवार-२९०५।
वह संघटन जिसे नियमानुसार एक व्यक्ति के रूप में शासन का अधिकार हो।
प्रतिनिधियों द्वारा प्रजातंत्रीय शासन।
ऐसे राज्यों का समूह जो कछ बातों में स्वतंत्र हों और कुछ में केंद्रिय शासन के अधीन हों।
बौद्धों की संघटित संस्था।
झुंड बनाकर रहने-विचरनेवाले (पशु)।
बिखरी हुई शक्तियों को एकत्र करना।
वह संस्था जो बिखरी हुई शक्तियों को एकत्र करने के लिए बने।
विशेष कार्य से बना संघ या समूह।
(उदासीन) गायभैसों को दूध दुहने के लिए परचाना या फुसलाना।
दो दलों का विरोध जिसमें एक, दूसरे को दबाने का प्रयत्न करे।
वह प्रयत्न या प्रयास जो विषम परिस्थिति से अपने को निकालकर आगे बढ़ने के लिए किया जाय।
उ.- तुमरे कुल कौं बेर न लागै होत भस्म संघात-९-७७।
साथ रहनेवाला, साथी, सहचर।
उ.- (क) सदा सँघाती आपनो (रॆ) जिय कौ जीवन-प्रान-१-३२५। (ख) सदा सँघाती श्री जदुराइ-७-२। (ग) बिछुरे री मेरे बाल-सँघाती-२८८२।
उ.- जानति हौं तुम मानति नाहीं तुमहूँ श्याम-संघाती-२९८१।
इकट्ठा या संग्रह करती है।
उ.- ज्यौं मधुमाखी सँचति निरंतर, बन की ओट लई-१-५०।
एकत्र या संग्रह करने की क्रिया।
इकट्ठा या संग्रह करनेवाला।
बौद्ध श्रमणों का मठ, बिहार।
संघारि डारौं - मार डालूँ।
उ.- सूर प्रभु सहित संघारि डारौं-५९०।
पशु के दो पैर बाँधना जिससे वह दूर या तेज न जा सके।
मंत्रोच्चारण का विषय जो छह वेदांगों में एक है।
उ.- कुटिल कच भुव तिलक रेखा शीश शिखी शिखंड।
जिसमें या जिसका संचार हुआ हो।
इकट्ठा, एकत्र या संग्रह करती है, उपस्थित या प्रस्तुत करती है।
उ.- रसना द्विज दलि दुखित होत बहु, तउ रिसि कहा करै। छमि सब छोभ जु छाँड़ि, छवौ रस लै समीप सँचरै-१-११७।
बाज, शिकरा, श्येन (पक्षी)।
फैलने विशेषतः भीतर फैलने, या विस्तृत होने की क्रिया, प्रवेश।
उ.- (क) अर्जुन तब सरपिंजर कियौ, पंवन सँचार रहन नहिं दियो-ना. ४३०९। (ख) ता दिनतैं उर-भौन भयो सखि सिव-रिपु को संचार-२८८८।
ग्रह का एक राशि से दूसरी में जाना।
संगीत में पहला या स्थाई पद या उसका कुछ अंश पुनः भिन्न से कहने की क्रिया या भाव।
उ.- बन बरुही चातक रटै द्रुम द्युति सघन संचारी-२२९६।
सहित्य में वे भाव जो रस के उपयोगी होकर, मुख्य भाव की पुष्टि करते और स्थायी भाव की तरह स्थिर न रहकर, अत्यन्त चंचलता पूर्वक सब रसों में संचरित होते रहते हैं। इनको 'व्यभिचारी भाव' भी कहते हैं। इनकी संख्या ३३ है-अपस्मार (मूर्च्छा), अमर्ष (क्रोध या असहनशीलता), अलसता या आलस्य, अवहित्था (मनोभाव का दुराव-छिपाव), असूया या अनसूया (ईर्ष्या), आवेग, उग्रता, उन्माद, औत्सुक्य या उत्सुकता, गर्व, ग्लानि, चपलता, चिंता, जड़ता, दीनता या दैन्य, धृति, निद्रा, निर्वेद (निराशा-जन्य खिन्नता या विरक्ति), मति, मद, मरण, मोह, लज्जा या ब्रीड़ा, वितर्क, विबोध (जागना, जागरण), विषाद, व्याधि, शंका, श्रम, संत्रास (अहित-आशंकाजनित चिंता या भय), स्मृति, स्वप्न और हर्ष।
उ.-ईंधन दौरि दौरि संचारयो-१० उ.-५२।
चलाने या गति देनेवाला, परिचालक।
अपने निरीक्षण-निर्देशन में कार्य-विशेष चलाने या करानेवाला।
चलाने की क्रिया, परिचालन।
जीवन, प्राण या शक्ति-दायिनी।
एक कल्पित औषधि सेवन से मृतक भी जी उठता माना गया है।
उ.- (क) दौना-गिरि पर आहि सँजीवन बैद सुषेन बताई-९-१४९। (ख) श्री रघुनाथ सँजीवनि कारन मोकौं इहाँ पठायौ-९-१५५।
वह प्रबंध या व्यवस्था जिससे कार्य होता रहे।
देख-रेख, नियंत्रण, निर्देशन।
जिसका संचालन किया गया हो या किया जा रहा हो।
उ.- याहू सौंज संचि नहिं राखी, अपनी धरनि धरी-१-१३०।
एकत्र या संग्रह किया हुआ।
एकत्र या संग्रह करने का भाव।
उ.- सतगुरु कह्यौ, कहौं तोसौं हौं, राम-नाम-धन सँचिबौ।
उ.- सुमति सुरूप सँचै स्रद्धा-विधि-२-१२।
उ.- (क) देखत आनि सँच्यौ उर अंतर दै पलकनि कौ तारौ री-१०-१३५। (ख) सुख संच्यो स्रवन दुआर-३२४३।
उ.- (क) गनिका किए कौन ब्रत संजम सुक-हित नाम पढ़ावै-१-१२२। (ख) नौमी नेम भली बिधि करै। दसमी कौं संजम बिस्तरै-९-५।
धृतराष्ट्र का एक मंत्री जिसने दिव्य दृष्टि-संपन्न होने के कारण हस्तिनापुर में बैठे-बैठे उनको कुरुक्षेत्र के महाभारत-युद्ध का यथार्थ विवरण सुनाया था।
घोड़ा जो आधा लाल और आधा हरा या सफेद हो।
उ.- (क) ललित कन-संजुत कपोलनि लसत कज्जल अंक-२५३। (ख) कटि किंकिनि चंद्रमनि-संजुत-६२५।
उ.- चौक चंदन लीपि कै धरि आरती सँजोइ-१२-२६।
एकत्र या संग्रह करनेवाला।
सजाने या सुसज्जित करनेवाला।
एकत्र या संग्रह करनेवाला।
उ.- (क) रवि-ससि राहु संजोग बिना ज्यों लीजतु है मन मानि-२-३८। (ख) तड़ित-घन संजोग मानौ-६२७।
उ.- उहाँ जाइ कुरुपति बल-जोग, दियो छाँड़ि तन कौं संजोग-१-२८४।
इत्तिफाक, अकस्मात घटित होना।
उ.- नीकैं पहुँचे आइ तुम, भलौ बन्यौ संजोग-४३७।
विधि-संयोग- विधाता की देन या व्यवस्था (से)।
उ.- (क) बिधि-संयोग टारत नाहिं टरैं-९-७७। (ख) तीनि पुत्र भए बिधि-संजोग-९-१७४।
जो (स्त्री) पति या प्रेमी के साथ हो।
जो प्रिया या प्रेमिका के साथ हो।
सजाना, सज्जित या अलंकृत करना।
इकट्ठा, एकत्र या संग्रह करना।
उ.- पांच बरस की भई जब आइ, संडाम-र्कहिं लियौ बुलाइ।¨¨¨¨। संडामर्क रहे पचि हारि, राजनीति कहि बारंबार। ¨¨¨¨। तब संडामर्का संकाइ, कह्यौ असुर-पति सौं यों जाइ-७-२।
मोटा-ताजा, हट्टा-कट्टा (व्यंग्य)।
[हिं. संडा + मुसंडा (अनु.)]
कुएँ-जैसा बना गहरा पाखाना, शौचकूप।
संन्यासी, महात्मा, त्यागी।
उ.- (क) उद्वव संत सराह्यो-सारा. ५५८। (ख) सूर स्याम करान यह पठवत ह्वै आबैगे संत-२९२१।
उ. - सादर संत देखि मन मानौ प्रेखें प्राण हरै-२८०८।
उ.- भक्त सात्विकी सेवै संत, लखै तिन्हैं मूरति भगवंत-३-१३।
उ.- शोभित केश बिचित्र भाँति द्युति शिखि शिखंड हरनी- पृ. ३१६ (५४)
द्रुपदराज की कन्या जो बाद में पुरूष हो गयी थी।
उ.- शिखंडी शीश मुख मुरली बजावत।
द्रुपदराज का वह पुत्र जो पहले कन्या-रूप में जन्मा था। महाभारत के युद्ध में भीष्म की मृत्यु का यही कारण बना था और अंत में अशवत्थामा द्वारा मारा गया था।
उ.- फूली फिरति रोहिणी मैया नख-शिख करि सिंगार।
राधा की सखी एक गोपी का नाम।
उ.- कज्जल लै आई संझावली-२३१२।
उ.- (क) माता सैटिया द्वैक लगाए-३९१। (ख) सैटिया लै मारन जब लागी-८६१।
उ.- सुनि अरे संठ दसकंठ-९-१२९।
मोटा-ताजा, हट्टा-कट्टा (व्यंग्य)।
[हिं. संडा + मुसंडा (अनु.)]
वह विकारी शब्द जो किसी वस्तु, व्यक्ति या भाव का बोधक हो।
उ.- पृथिवी अप तेज वायु नभ संज्ञा शब्द परस अरू गंध-सारा. ८।
सूर्य की पत्नी जो विश्वकर्मा की पुत्री और यम-यमुना की माता थी।
संझा को जलन या जलाया जानेवाला दीपक।
(प्रा. संझा + हिं. बत्ती)
संझा को गाया जाने वाला गीत।
(प्रा. संझा + हिं. बत्ती)
उ.- (क) संतत निकट रहत हौ। (ख) संतत सुभ चाहत-१-७७।
अच्छी तरह तैरने या तैरकर पार होने की क्रिया।
एक प्रसिद्ध फल जो मीठा होता है।
(पुर्त. संगतरा या फ़ा. संगतरः)
उ.- सुत-संतान-स्वजन-बनिता-रति घन समान उनई-१-५०।
उ.- (क) आनँद-मगन राम-गुन गावै, दुख-संताप की काटि तनी-१-२९। (ख) प्रगट पाप संताप सूर अब कापर हठै गहौं ३-२। (ग) बिछुरनकौ संताप हमारौ तुम दरसन दै काट्यौ-९-८७।
कामदेव का एक वाण जो विरही को संतप्त करता है।
उ.- घातक, कुटिल, चबाई, कपटी महा कुटिल संतापी-१-१४०।
उ.- (क) अरू पुनि लोभ सदा संतापै। (ख) हरि-माया सब जग संतापै-३-१३। (ग) सुख-दुख तनिकौ तिहिं न सँतापै-३-१३।
तौल या भार बराबर होना या करना।
दो पक्षों का बल बराबर होना या करना।
हर स्थिति में प्रसन्न रहना और अधिक की कामना न करना।
उ.- सील-संतोष सखा दोउ मेरे तिन्हैं बिगोवति भारी-१-१७३।
उ.- (क) बहुतै काल भोग मैं किए, पै संतोष न आयो हिए-९-२। (ख) बहुत काल या भाँति बितायौ, पै रिषि-मन संतोष न आयौ-९-८।
संतोष देकर, संतुष्ट करके।
उ.- तिन्हैं संतोषि कह्यौ, देहु माँगै हमैं, बिष्नु की भक्ति सब चित्त धारौ-४-११।
उ.- धनुर्भंजन जज्ञ हेत बोले इनहिं और डर नहीं सबन कहि संतोख्यौ-२५०३।
अहित की आशंका से उत्पन्न चिंता या भय जिसको 'त्रास' भी कहते हैं और जो एक संचारी भाव है।
एक बार में पढ़ा या पढ़ाया हुआ पाठ या अंश।
उ.- मनौ सुरग्रह ते सुर-रिपु कन्या सौतै आवति ढुरि संदहि।
वह आकर ग्रंथ जिसमें अनेक प्रकार की विशिष्ट बातें लिखी हों।
संबंधित प्रसंग या वर्णित विषय।
चंदन का (बना हुआ), चंदन से संबंधित।
चंदन जैसे हल्के पीले रंग का।
एक तरह का हल्का पीला रंग।
एक काव्य दोष जो अर्थ के अस्पष्ट होने या तत्संबंधी संदेह बने रहने पर माना जाता है।
उद्दीप्त करने की क्रिया, उद्दीपन।
श्रीकृष्ण के गुरु जिनको श्रीकृष्ण ने गुरु-दक्षिणा में मृतक पुत्र ला दिये थे।
उ.- संदीपन सुत तुम प्रभु दीने विद्या-पाठ करयो-१-१३३।
कामदेव के पाँच वाणों में एक।
लकड़ी, टीन या लोहे का बना पिटारा, पेटी, बकस।
उ.- (क) संदूकनि भरि घरे ते न खोलै री-१५४९। (ख) कज्जल कुलुफ मेलि मंदिर में पलक संदूक पर अटके- पृ. ३२९ (८८)।
लकड़ी, टीन या लोहे की छोटी पेटी
जंतु जिसका आखेट किया गया हो।
वह जिसके फँसने या वश में होने से अपना विशेष लाभ हो।
मुहा.- शिकार आना-ऎसे असामी का आना जिससे लाभ हो। शिकार करना-किसी असामी से खूब लाभ उठाना। सिकार खेलना-किसी असामी को खूब लूटना। किसी का शिकार होना-(१) किसी के द्वारा फाँसा जाना। (२) किसी पर मुग्ध या मोहित होना।
विद्या का ग्रहण या अभ्यास।
उद्देश्यविशेष से कही या कहलायी गयी बात।
एक प्रकार की बँगला मिठाई।
संदेश पहुँचानेवाला, दूत, बसीठ।
किसी के द्वारा कहा या कहलाया गया समाचार या संदेश।
उ.- (क) तब दारुक संदेस सुनायौ-१-१८४। (ख) हाथ मुद्रिका प्रभु दई संदेस सुनायौ-९-७२।
संदेश पहुँचानेवाला, दूत, बसीठ।
किसी के द्वारा कहलाया गया समाचार।
उ.- (क) कहियौ नन्द सँदेसौ इतनौ जब हम वै इक थान-९-८३। (ख) कही सँदेसौ पति कौ-९-८४। (ग) सँदेसौ देवकी सौं कहियौ-ना. ३७९३।
उ.- (क) रघुपति, मन संदेह न कीजै-९-१४८। (ख) सूरदास प्रभु अंतर्यामी भक्त संदेह हरयौ-२५५२।
उ.- तेरे सब संदेहैं देहौं-३-१३।
उ.- जरासंध की संथी जोरथौ हुतौ, भीम ता संध को चीर डारथो-१० उ.-५१।
धनुष पर वाण चढ़ाकर निशाना लगाने की क्रिया, लक्ष-वेध।
उ.- (क) सुमिरत ही अहि डस्यौ पारधी कर छूटयौ संधान-१-९७। (ख) दिति दुर्बल अति अदिति हृष्टचित, देखि सूर संधान-९-२०। (ग) तबै सूर संधान सफल हौ रिपु कौ सीस उतारौं-९-१३७। (घ) भाल-तिलक भ्रुव चाप आप लै सोइ संधान संधानत-पृ. ३३६ (६१)।
खोजने-ढूँढ़ने का व्यापार।
निशाना लगाता या लक्ष्य साधता है।
उ.- भाल तिलक भ्रुव चाप आप लै सोइ संधान संधानत- पृ. ३३६ (६१)।
निशाना लगाती या लक्ष्य साधती है।
उ.- सूर सुंदरी आपु ही कहा तू शर संधानति-२२५१।
धनुष पर वाण चढ़ाकर निशाना लगाना या लक्ष्य पर तीर छोड़ना।
प्रयोग करने के लिए किसी अस्त्र को ठीक करना।
धनुष पर तीर चढ़ाकर निशाना लगाया या लक्ष्य पर तीर छोड़े।
उ.- (क) मनु मदन धनु-सर सँधाने देखि घन-कोदंड-१-३०७। (ख) काम-बाण पाँचौं संधाने-१० उ.-१०५।
उ.- अंब आदि दै सबै सँधाने। सब च़ाखे गोबर्धन राने-३९६।
उ.- तुमकौं भावत पुरी सँधानौ-१०-२११।
उ.- जैसे खरी कपूर दोउ यक समय यह भई ऎसी संधि-२९१२।
दो चीजों के मिलने का जोड़।
दो राजाओं या राज्यों के बीच होनेवाला मैत्री-संबंध।
शरीर में दो हडिडयों के मिलने का जोड़ या गाँठ।
व्याकरण में दो अक्षरों के मेल से होनेवाला विकार।
नाटक में प्रयोजन-विशेष के साधक कथांशों का अन्य से होनेवाला संबंध जो पाँच प्रकार का होता है- मुख, प्रतिमुख, गर्भ, विमर्श या अवमर्श और निर्वहण।
एक काल, युग या अवस्था के अंत और दूसरे के आरंभ के बीच का समय।
उ.- वैस-संधि सुख तजी सूर हरि गए मधुपुरी माँहीं-३२४४।
(दो चीजों के बीच की) खाली जगह, अवकाश।
उ.- धरनि आकास भयौ परिपूरन नैंकु नहीं कहुँ संधि बचायौ-५९१।
संधि के निकट का खाली स्थान।
उ.-मनहुँ बिबर ते उरग रिंग्यो तकि गिरि के संधि थली-२०७१।
व्याकरण में किसी पद की संधि तोड़कर शब्द अलग करना।
उ.- (क) संध्या समय निकट नहि आयो, ताके ढूँढ़न कौं उठि धायौ-५-३। (ख) संध्या समय होन आयौ-७-६।
भारतीय आर्यों की एक उपासना जो प्रातः, मध्याह्न और सायंकाल को होती है।
भारतीय आर्यों के चार आक्षमों में अंतिम जिसमें सब कार्य निष्काम भाव से किये जाते हैं।
क्षेत्र अथवा सीमा-विशेष में ही रहकर कार्य करने का व्रत या निंश्चय।
संन्यस-आश्रम में रहने और उसके नियमों का पालन करनेवाला।
उ.- (क) तैसैं धन-दारा सुख-संपति बिछुरत लगै न बार-१-८४। (ख) सूरदास मोहन दरसन बिनु सुख-संपति सपना-२५४७।
कोई बहुमूल्य लाभ या प्राप्ति, परम निधि।
उ.- (क) सत संजम-तीरथ-ब्रत कीन्हैं, तब यह संपति पाई-१०-१६। (ख) जे पद-कमल संभु की संपति-५६८।
लक्ष्मी जिसकी उत्पत्ति समुद्र से मानी गयी है।
उ.- कहौ तौ लंकु उखारि डारि देउँ जहाँ पिता संपति को-९-८४।
उ.- देखि ब्रज की संपदा कौं फूलै सूरजदास-१०-२६।
उ.- ऎसी विधि हरि पूजै सदा। हरि-हित लावै सब संपदा-९-५।
वह स्थान जहाँ एक रेखा दूसरी रेखा से मिले या उसको काटे।
एक गिद्ध जो गरुड़ का ज्येष्ठ पुत्र और जटायु का बड़ा भाई था। सीता की खोज में गये हुए बानर-दल को संपाती ने ही उनका पता बताया था।
उ.- आए तीर समुद्र के, कछ सोधि न पायौ। सूर सँपाती तहँ मिल्यौ, यह बचन सुनायौ-९-७२।
काम पूरा या संपन्न करनेवाला।
किसी पत्र-पत्रिका या पुस्तक के क्रम, पाठ आदि को व्यवस्थित करनेवाला।
पत्र-पत्रिका या पुस्तक का क्रम, पाठ आदि व्यवस्थित करना।
जिसका क्रम, पाठ आदि व्यवस्थित क्या गया हो।
खूब दबाना, मलना या निचोड़ना।
कटोरे या दोने के आकार की कोई वस्तु।
उ.- जलज संपुट सुभग छबि भरि लेत उर जनु धरनि-१०-१०९।
उ.- सूरदास संपदा-आपदा जिनि कोऊ पतिआइ-१-२६५।
उ.- सत्य-सील-सपन् सुमूरति-१-६९।
मुहा.- शिगूफा खिलाना- विनोद या झगड़ा कराने के लिए कोई नयी बात छेड़ देना। शिगूफा खिलना - विनोद या झगड़े के लिए कोई नयी बात छिड़ना। शिगूफा छोड़ना- (१) विचित्र बात कहना। (२) विनोद या झगड़े के लिए कोई बात कह देना।
वह समाधि जिसमें विशयों के बोध से सर्वथा निवृत्त न होने के कारण आत्मा को अपने स्वरूप का पूरा-पूरा ज्ञान नहीं होता।
(दान आदि) देने की क्रिया या भाव।
शिष्य को मंत्र या दीक्षा देना।
(व्याकरण में) वह कारक जिसमें कोई शब्द 'देना' क्रिया का लक्ष्य होता है।
कोई विशेष धर्म-संबंधी मत।
किसी सिद्धांत या मत के अनुयायियों का वर्ग या समूह।
उ.- अष्टम मास सँपूरन होइ-३-१३।
उ.- भयो पूरब फल सँपूरन लह्यौ सुत दैतारी-२६२७।
उ.- एक भोजन करि सँरूपन गई वैसेहि त्यागि- पृ. ३३९ (८४)।
वह राग जिसमें सातों स्वर लगते हों।
पूरा या सम्पूर्ण होने का भाव।
संसर्गक या संबंध में आया हुआ, संबद्ध।
साँप पालने और उसका तमाशा दिखानेवाला मदारी।
भली भाँति पालन-पोषण करने की क्रिया या भाव।
(व्याकरण में) एक कारक जिससे एक शब्द के साथ दूसरे का लगाव या संबंध सूचित होता है।
अशियोक्ति' अलंकार का एक भेद।
सिलसिले या प्रसंग का, विषयक।
उ.- (क) द्वापर सहस एक की भई। कलियुग सत संबत रहि गई-१-२३०। (ख) सत संबत मानुष की आइ। आधी तो सोवत ही जाइ-७-८।
आया या पहुँचा हुआ, उपस्थित।
साथ-साथ बँधना, जुड़ना या मिलना।
एक दैत्य जो कामदेव का शत्रु था।
वह साधन जिसके भरोसे पर कोई काम किया जाय।
उ.- कपिलदेव बहुरौ यौं कहथौ। हमैं-तुम्हैं संबाद जु भयौ-३-१३।
(व्याकरण में) वह कारक जिससे शब्द का किसी को पुकारना या बुलाना सूचित हो।
पालन-पोषण की व्यवस्था या साधन।
सँभरना, सँभरनो, सँभलना, सँभलनो
बोझ आदि का थामा या रोका जा सकना।
सँभरना, सँभरनो, सँभलना, सँभलनो
सहारे या आधार पर ठहर सकना।
सँभरना, सँभरनो, सँभलना, सँभलनो
सँभरना, सँभरनो, सँभलना, सँभलनो
गिरने, चोट खाने या हानि होने से बचना।
सँभरना, सँभरनो, सँभलना, सँभलनो
बुरी दशा या स्थिति से बचे रहना।
सँभरना, सँभरनो, सँभलना, सँभलनो
सँभरना, सँभरनो, सँभलना, सँभलनो
संभव होता या हो सकता है, सधता है।
उ.- धर्म-स्थापन-हेतु पुनि धारथो नर अवतार। ताको पुत्र-कलत्र सों नहिं संभवत पियार-१० उ.-४७।
होश-हवास, ध्यान, (तन-बदन की) सुध।
उ.- (क) ब्याकुल भई गोपालहिं बिछुरे गयो गुन ज्ञान सँभार-३२१५। (ख) भोजन-भूषन की सुधि नाहीं, तनु की नहीं सँभार- पृ. ३३९ (८३)। (ग) मैमत भए जीव-जल-थल के तनु की सुधि न सँभार-पृ. ३४७ (५२)।
उ.-सूरदास प्रभु अपने ब्रज की काहे न करत सँभार-२८२०।
सार-सँभार- पालन-पोषण, देखभाल।
वश में रखने का भाव, रोक, निरोध।
सावधानी के साथ, सचेत होकर।
उ.- प्रबल सत्रु आहै यह मार। यातैं संतौ, चलौ सँभार-१-२२९।
इकट्ठा या एकत्र करना, संचय।
उ.- मारूत सोर करत चातक पिक अरू नग शिखर सुहाई-२८२१।
एक रत्न जो अनारदाने की तरह लाल और सफेद होता है।
उ.- श्रीफल सकुचि रहे दुरि कानन शिखर हियो बिहरान।
दही और चीनी से बना हुआ एक प्रसिद्ध पेय।
एक गदा जो विश्वामित्र ने श्रीरामचंद्र को दी थी।
शिखा-सूत्र - चोटी और जनेऊ।
उ.- कर्म सुख-हित करत होत दुःख नित, तऊ नर मूढ़ नाहीं सँभारत-८-१६।
रक्षा करता या बचाता है, देखरेख रखता है।
उ.- क्यौं न सँभारत ताहि-१-३२५।
रोक या पकड़ में रखती है, सँभालती है
उ.- अंचल नहीं सँभारति-२५६२।
उ.- तातैं कहत सँभारहि रे नर, काई कौं इतरात-२-२२।
उ.- (क) चतुरानन बल सँभारि मेघनाद आयो-९-९६। (ख) पूरब प्रीति सँभारि हमारे तुमको कहन पठायौ-३०६३।
नष्ट होने, खोने या बिगड़ने से बचाओ।
उ.- पाछैं भई सु भई सूर जन अजहुँ समुझि सँभारि-२-३१।
सकै सँभारि-बचा सकता या रक्षा कर सकता है।
उ.- घालति छुरी प्रेम की बानी, सूरदास को सकै सँभारि-११६४।
उ.- कह्यौ असुर, सुरपति सँभारि। लै करि बज्र मोहिं परडारि-६-५।
रोककर, काबू या नियंत्रण में रखकर।
मुहा.-सकी सँभारि-सम्हाल सकी। उ,- कठिन वचन सुनि स्त्रवन जानकी, सकी न वचन सँभारि-९-८९। मुख सँभारि-वाणी पर नियंत्रण रखकर। उ.- ये सब ढीठ गरब गोरस कैं, मुख सँभारि बोलतिं नहिं बात-१०-३०८।
उ.- और सँभारि मनोरथ धरै-१० उ.-१०५।
होश-हवास, चेत, तन-बदन की सुध।
उ.- (क) काम-अंध कछु रहि न सँभारि। दुर्बासा रिषि कौं पग मारि-६-७। (ख) अंग अभरन उलटि साजे, रही कछु न सँभारि- पृ. ३३० (९३)।
मुहा.- सुधि सँभारी-चेतना या ध्यान ठीक रखा। उ.-जमुना जू थकित भई, नहीं सुधि सँभारी-६४९।
उ.- बँधू, करियौ राज सँभारे-९-५४।
उ.- (क) जे पद-पदुम तात-रिस त्रासत मन-क्रम-बच प्रहलाद सँभारे-१-९४। (ख) तब तैं गोविंद क्यौं न सँभारे-१-३३४।
रक्षा, देखभाल या रखवाली करे।
उ.- (क) ऎसे बल बिन कौन सँभारै-१०५८। (ख) बिबस भई तनु न सँभारै री-११८४।
रोके, वश या काबू में रखे, सावधान रहे।
उ.- बिरही कहाँ लौ आपु सँभारै-३१८९।
उ.- राग-द्वेष बिधि अबिधि असुचि सुचि जिहिं प्रभु जहाँ सँभारौ। कियौ न कबहुँ बिलंब कृपा निधि, सादर सोच निवारौ-१-१५७।
स्मरण या याद करके एकत्र करो।
उ.- द्विरद कौ दंत उपटाय तुम लेत हौ, उहै बल आजु काहे न सँभारौ-२६०२। रोक, पकड़ या काबू में रखो।
मुहा.- बात करि मुख सँभारौ-वाणी पर नियंत्रण रख कर बात करो। उ.- बारन हौं करौं बारन सहित फटकिबौं, बावरे, बात कहि मुख सँभारौ-२६९०।
आक्रमण के लिए ग्रहण किया।
उ.- दुरबासा कौं चक्र सँभारौ-१-७२।
सचेत या सावधान होकर-अपनी रक्षा का प्रबंध करो।
उ.- जग्य माहिं तुम पसु जे मारे। ते सब ठाढ़े सस्त्रनि धारे। जोहत हैं वे पंथ तिहारौ। अब तुम अपनी आप सँभारौ-४-१२।
(प्रहार करने को) लिया, उठाया, थामा।
उ.- जब जब भीर परी संतनि कौं चक्र सुदरसन तहा सँभारयौं-१-१४।
उ.- अंध-अचेत-मूढ़मति बौरे! सो प्रभु क्यौं न सँभारयौ-१-३३६।
मुहा.- बैर सँभारयौ-पिछले बैर का स्मरण करके बदला लेने को प्रवृत्त हुआ। उ.- गरजि गरजि घन बरसन लागे, मानो सुरपति निज बैर सँभारयौ-२८३२।
उ.- काल तहीं तिहीं पकरि सँभारयौ। सखा प्रानपति तउ न सँभारयौ-४-१२।
भार ऊपर लिया, भार उठाये रहा।
उ.- धरनि सीस धरि सेस गरब धरथौ, इहिं भर अधिक सँभारयौ-५६७।
होश-हवास, चेत, तन-बदन की सुध।
भार ऊपर ले सकना या रखे रहना।
रोक, पकड़ या काबू में रखना।
हटने, गिरने या खिसकने से रोकना, थामना।
रोग, व्यधि आदि की रोक-थाम करना।
मरने के पहले सहसा चेतना-सी आ जाना।
मुहा.-सँभाला लेना- मरने के पहले रोगी का सचेत होना या सँभल जाना।
ध्यान या कल्पना के योग्य।
सम्मान का ध्यान रखनेवाला, स्वाभिमानी।
अनुमान या कल्पना के योग्य।
उ.- नैन सैन संभाषन कीन्हौ, प्यारी की उर तपनि मिटाई-७०१।
उ.- (क) संभु की सपथ, सुनि कुकपि, कायर, कृपन, स्वास, आकास बनचर उड़ाउँ-९-१२९। (ख) जे पद कमल संभु की संपति-५६८।
उ.- मनहुँ सोभित अभ्र-अंतर संभु-भुषन वेष-६३५।
मिले हुए प्राणियों, पदार्थों आदि का वियोग या अलगाव।
वस्तु आदि का सुख-पूर्वक उपयोग या व्यवहार।
भोग-विलास की सामग्री या साधन।
उ.- जदपि कनकमय रची द्वारका सखी सकल संभोग-१० उ.-१०२।
व्यवहार या उपयोग के उपयुक्त।
भ्रम में पड़ने की घबराहट या व्याकुलता।
उ.- सूर सुनत संभ्रम उठि दौरत, प्रेम-मगन, तन दसा बिसारे-१-२४०।
भ्रम में पड़ने की घबराहट या व्याकुलता होना।
भ्रम में पड़ने से घबराहट या व्याकुलता हुई।
उ.- जगत पितामह संभ्रम्यौ, गयौ लोक फिरि आइ-४९२।
भ्रम में पड़ने से घबराया हुआ या व्याकुल।
उ.-यह प्रसिद्ध सबहीं को संमत बड़ौ बड़ाई पावै-१-१९२।
पकड़ या दबाव में रखा हुआ।
उ.- चीरि फारि करिहौं भगौहौं शिखिनि शिखी लवलेस।
उ.- कुटिल कच भू तिलक रेखा सीस शिखी शिखंड।
सीमा या मर्यादा के भीतर रहनेवाला।
निग्रह, चित्तवृत्ति-निरोध का कार्य।
बुरी या हानिकारक बातों से बचने का भाव या कार्य।
सीमा या औचित्य के भीतर होना या रहना।
योग में ध्यान, घारणा और समाधि का साधन।
चित्त-वृत्ति-निरोध, निग्रह।
संयम या निग्रह के द्वारा रोका हुआ।
मनोभावों को वश मे रखनेवाला, आत्मनिग्रही।
बुरी या हानि कारक बातों से बचनेवाला।
साथ रहकर या मिलकर काम करनेवाला।
उ.- मनो मर्कत कनक संयुत खच्यो काम सँवारि-१५६४।
उ.- जहाँ आदि निजलोक महानिधि रमा सहस संयूत-सारा. १४।
जो प्रिया या प्रेमिका के साथ हो।
उ.-अधर सुधा-रस सुकृत पान दै, कान्ह भए अति भोगी।¨¨¨¨ तासों रहत सँयोगी- सारा. ५६७।
व्याकरण में दो शब्दों, उपवाक्यों या वाक्यों के बीच में आकर उन्हें जोड़नेवाला शब्द।
समिति का वह सदस्य जिसे बैठक बुलाने और उसकी अध्यक्षता करने का अधिकार दिया जाय।
जोड़ने या मिलाने की क्रिया।
जो जोड़ा या मिलाया जाने को हो।
मिलाप, संभोग, समागम (श्रृंगार)।
उ.- (क) तदपि मनहिं बसत बंसीवट ललिता के संयोग-१० उ.-१०२।
दो या कई बातों का सहसा एक साथ हो जाना, इत्तफाक।
उ.- सबै संयोग जुरे है सजनी हठि करि घोष उजारयो-२८३२।
मुहा.- संयोग से- बिना पूर्वनीश्चय या किसी योजना के, अकस्मात।
उ.- आंवत जात डगर नहिं पावत गोबर्द्धन पूजा संयोग-९१९।
श्रृंगार रस का वह विभाग जिसमें प्रेमियों के मिलन या संयोग आदि का वर्णन हो।
देखरेख या रक्षा करनेवाला।
पालन-पोषन करने और आश्रय में रखनेवाला।
हानि, विपत्ति आदि से रक्षा करना।
आश्रय या देखरेख में रखकर पालन-पोषण या संवर्द्धन करना।
सँभालकर रखा या बचाया हुआ।
देखरेख या संरक्षा में लिया हुआ।
नाटक का वह संवाद जिसमें क्षोभ या आवेग न होकर धीरता हो।
नाटक का वह संवाद जिसमें धीरता हो।
उ.- सत संवत आयु कुल होई-१० उ.-१०३।
चालू वर्ष-गणना का कोई वर्ष।
महाराज विक्रमादित्य के समय से प्रचलित वर्ष-गणना का कोई वर्ष।
उ.- सरस संवत्सर लीला गावै जुगल तरन चित लावै- सारा. ११०७।
वह व्यंजना जिसमें वाच्यार्थ के उपरांत व्यंग्यार्थ-बोध का क्रम लक्षित हो।
जो अन्त में जुड़ा या लगा हो।
आप ही कुछ बोलना या बड़बड़ाना जो पूर्व राग की दस दशाओं के अंतर्गत एक दशा है।
कन्या का वर या पति चुनना।
विचार, इच्छा या चित्तवृत्ति को रोकना या दबाना।
अनुकूल या मेल में होनेवाला।
मुहा.-शाम फूलना-संध्या की लालिमा फैलना।
घोड़ा जिसके कान काले या श्याम रंग के हों।
मुहा.- शामत का घेरा या मारा-जिसकी दुर्दशा होने को हो। शामत सवार होना या सिर पर खेलना-दुर्दशा का समय आना।
नियम के पालन में कड़ाई की कमी।
वाक्य में शब्द-संगठन या अर्थ-संबंध की कमी।
तर्क या प्रमाण में कुछ कमी।
उ.- करत सिंगार परस्पर दोऊ अति आलस शिथिलाने-१७२१।
कन्या का वर या पति चुनना।
प्रलय काल के सात मेघों में एक।
इंद्र का अनुचर एक मेघ जिससे बहुत जल बरसता है।
संगीत में वह स्वर जो वादी के साथ मिलकर उसकी मधुरता बढ़ाता हो।
सजाने या सेवारने की क्रिया या भाव।
उ.- जैसे कोऊ गेह सँवार-१० उ.-१२९।
शब्दोच्चारण का वह प्रयत्न जिसमें कंठ सिकुड़ता है।
रचाते, सजाते या अलंकृत करते है।
उ.- गोबर्धन पर बेनु बजावत, फूलन भेष सँवारत-सारा. ४७२।
उ.- कहुँ कर लैकै सस्त्र सँवारत-सारा. ६६६।
उ.- जसुमति राधा कुँवरि सँवारति-७०४।
(काम) बनाने या सँभालने वाले।
उ.-कृपानिधान दानि दामोदर सदा सँवारन काज-१-१०९।
क्रमबद्ध या व्यवस्थित करना।
(अस्त्र-शस्त्र) तेज करके।
उ.- राख्यौ सुफल सँवारि सान दै कैसे निफल करौं वा बानहिं-९-९५।
उ.- (क) भवन सँवारि नारि रस लोभ्यौ-१-२१६। (ख) गाइ बच्छ सँवारि लाए-१०-१६।
उ.- (क) कंठ कठुला नील मनि अंभोजमाल सँवारि-१०-१६९। (ख) सीस सचिक्कन केस हो बिच सीमत सँवारि-२०६५।
उ.- यह सुनताहिं मन हर्ष बढ़ायो कियो पकवान सँवारि-९९२।
उ.-पतित उधारन बिरद जानिकै बिगरी लेहु सँवारी-१-११८।
(व्यंजन आदि) सावधानी से बनाकर।
उ.- तुरत करौ सब भोग सँवारी-१००७।
मुहा.- दई सँवारी-बिधाता की गड़ी हुई (व्यंग्य)। उ.- जुबती हैं सब दई सँवारी घर बनहूँ में रहति भरी-१६१७।
बना दिये, सुधार दिये, ठीक कर दिये।
उ.- (क) सबके काज सँवारे-१-२५। (ख) जिन हमरे सब काज सँवारे-१-२८६।
पकाये, पका कर तैयार किये।
उ.- अरु खुरमा सरस सँवारे-१०-१८३।
उ.- मुडली पटिया पारि सँवारै-३०२६।
उ.- ललिता रुचिकरि धाय आपने सुमन सुगंधनि सेज सँवारे-१९३०।
उ.- (क) हाड़नि कौ तुम बज्र सँवारौ-६-५। (ख) तब ब्रह्मा यह बचन उचारौ। मय माया-मय कोट सँवारौ-७-७।
मुहा.- परलोक सँवारौ-ऎसी वेद-विधि से क्रिया-कर्म करो जिससे उनकी गति सुधर जाय। उ.- राजा कौ परलोक सँवारौ-९-५०।
उ.-झूठ-साँच करि माया जोरी रचि-पचि भवन सँवारयौ-१-३३६।
उ.-सुरस निमोननि स्वाद सँवारयौ-२३२१।
उ.-सूरदास प्रभु की यह लीला ब्रज कौ काज सँवारयौ-४३३।
विशेष चेतना या अनभूति होना, सुख-दुख आदि का अनुभव करना।
किसी का कष्ट देखकर मन में होने वाला दुख, सहानुभूति।
स्वसंवेद्य जो स्वयं ही अनुभव किया जा सके, दूसरे को बताया न जा सके।
जिसके मन में संदेह या अविश्वास बना रहे या शेष हो।
जो प्रायः संशय या संदेह करता हो, शक्की।
प्रस्ताव आदि में घटाने-बढ़ाने का सुझाव।
मुसलमानों का वह संप्रदाय जो हजरत अली को पैगंबर का उत्तराधिकारी मानता है।
कार्य-कारण आदि का मिलान या विचार करना, 'विश्लेषण' का विपरीतार्थक।
उ,- (क) करुना करी छाँड़ि पग दीन्हौ, जानि सुरनि मन संस-१०-६४। (ख) सूरस्याम के मुख यह सुनि तब मन मन कीन्हौ संस-११२७।
उ.- (क) हरि बिन अपनौ को संसार-१-८४। (ख) यह संसार विषय-विष-सागर, रहत सदा सब घेरे-१-८५।
प्रजा के प्रतिनिधियों की राजसभा।
उ.- (क) यह वर दै हरि कियौ उपाइ। नारद मन संसय उपजाइ-१-२२६। (ख) तेरे हृदै न संसय राखौं-२-३७।
संसार की माया में फँसा हुआ।
उ.- (क) हरि हौं महा अधम संसारी-१-२७३। (ख) भजन-रहित बूड़त संसारी-१-२१९।
साहित्य में दो या अधिक अलंकारों का इस प्रकार आना कि सब स्वतंत्र हों, एक दूसरे के आश्रित नहीं।
पत्र-पत्रिका या पुस्तक की एक बार की छपाई, आवृत्ति।
जिसकी सिफारिश या प्रशंसा की गयी हो।
ठहरने की क्रिया या भाव, स्थिति।
व्यवस्था, रूढ़ि, मर्यादा।
कोई संघटित समाज, मंडल या वर्ग।
जीवन के क्षत्र- विशेष से संबंध रखन्वाला परंपरागत विधान या नियम।
ठहरने की क्रिया या भाव, ठहराव, स्थिति।
जिसका उपनयन या समावर्त्तन संस्कार हुआ हो
भारतीय आर्यों की प्राचीन साहित्यिक भाषा, देववाणी।
सुधार, संस्कार, परिष्कार।
व्यक्ति, जाति अथवा राष्ट्र आदि के जीवन-व्यापार की वे बातें जिनसे उसके आचार-विचार, कला-कौशल, बौद्धिक विकास, सभ्यता आदि का परिचय मिल सके।
शिक्षा, उपदेश, संगत, वातावरण आदि का मन पर पड़ा हुआ-प्रभाव।
पूर्व जन्म का प्रभाव जो अनश्वर आत्मा के साथ लगे रहने से नये जन्म में भी स्वभाव का अंग बन जाता है।
परंपरा से चला आने वाला कृत्य जिसका विधान अवसर-विशेष के लिए हो।
हिदुओं में शुद्ध और उन्नत करनेवाले वे कृत्य जिनकी संख्या किसी ने बारह और किसी ने सोलह बतायी है गर्भाधान, पुंसवन, सीमंतोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, उपनयन, मुंजन या केशांत, यज्ञोपवीत या समावर्त्तन और विवाह।
शुद्ध या परिष्कृत करनेवाला।
जो अच्छे गुणों या संस्कारों से युक्त हो।
शुद्ध किया हुआ, जिसका संस्कार हुआ हो।
सार्वजनिक स्थान जहाँ सर्वसाधारण एकत्र हो सके।
साहित्य, कला, विज्ञान आदि की उन्नति के लिए स्थापित संस्था, मंडल या वर्ग।
भवन आदि स्थापित करनेवाला।
नयी बात चलानेवाला, प्रवर्तक।
संस्था आदि स्थापित करनेवाला।
उ.- देह शिथिल भई उठ्यो न जाई।
जिसका पालन कड़ाई के साथ न हो।
परस्पर जुड़ा हुआ या संबद्ध।
भली भाँति सुमिरना या नाम लेना।
किसी व्यक्ति के स्वभाव आदि पर प्रकाश डालनेवाली स्मरणीय घटनाएँ या उनका उल्लेख।
भली भाँति स्मरण करने योग्य।
नाम जपने या सुमिरने योग्य।
भवन आदि उठाना या निर्मित करना।
स्थित या प्रतिष्ठित करना।
संस्था या मंडल आदि स्थापित करना।
भवन आदि उठाया हुआ या निर्मित।
स्थित किया हुआ, प्रतिष्ठित।
(संस्था मंडल आदि) स्थापित।
जिसके संस्मरण उल्लेखनिय हों।
जिसका स्मरण मात्र रह गया हो, अतीत।
याद दिलाने या स्मरण करानेवाला।
खूब जुड़ा या सटा हुआ, संबद्ध।
(केश का) एक साथ बाँधना या गूँथना।
नाश, संहार या ध्वंस करना।
उ.- नातरु कुटुँब कसल संहरि कै कौन काज अब जीजै-१-२६९।
उ.- जब नृप ओर दृष्टि तिहिं करी। चक्र सुदरसन सो सहरी-९-५।
उ.- (क) ताकी सक्ति पाइ हम करैं। प्रतिपालैं बहुरौ संहरैं-४-३। (ख) ऎसे असुर किते संहरैं-७-२।
उ.-मंत्री कहै, अखेट सो करै। बिषय-भोग जीवन संहरै-४-१२।
उमंग से रोओं का खड़ा होना, पुलक।
बटोरना, समेटना, इकटठा करना।
छोड़ा हुआ वाण अपनी ओर लौटाना।
उ.- अब सबकौ संहार होत है-५९५।
(युद्ध आदि में) मार डालना।
(अस्त्र आदि को) व्यर्थ करना।
उ.-परसुराम सौं यौं कही, माँ कौं बेगि सँहार-९-१४।
संसार के समस्त प्राणियों के नाश का समय, प्रलयकाल।
उ.- (क) पालत, सृजत, सँहारत, सैंतत अंठ अनेक अवधि पल आधे-९-५२। (ख) जग सिरजत पालत संहारत पुनि क्यौं बहुरि करथो-१० उ.-१३१।
उ.-(क) असुर-सँहारन भक्तनि-तारन पावन-पतित कहावत बाने-३८०। (ख) अधा बका संहारन ऎई-२५८१।
उ.-(क) असुर-कुलहिं संहारि धरनि कौ भार उतारौं-४३१। (ख) अधा-बका संहारि-५८९। (ग) योधा सुभट संहारि-२६२५।
नाश या ध्वंस कर देनेवाला।
उ.- सुन्यौ कंस पूतना सँहारी, सॉच भयौ ताके जिय भारी-१०-५८।
उ.-(क) ये बालक तैं बृथा सँहारे-१-१८९। (ख) सुनि पुकार निसिचर बहु आए, कूदि सबन संहारे-सारा. २८४।
उ.-सहस कवच इक असुर सँहारेउ-सारा. ६८।
उ.- जीव नाना संहारै-४-१२।
उ.- दसकंधंर कौं बेगि संहारो-सारा. २५९।
उ.-बेगि संहारौं सकल घोष-सिसु-१०-४९।
उ.-चोंच फारि बका संहारौ-४२७।
निवारण या परिहार के योग्य।
उ.-सकटा तृत इनहिं संहारथो-२५८१।
जड़ा या लगा हुसा, संबद्ध।
विधि या नियम की संहिता के रूप में प्रस्तुत किया हुआ।
वह ग्रंथ जिसका पाठ प्राचीन काल से गृहीत चला आता हो।
उ.-तातैं हरि करि ब्यासऽवतार। करी संहिता बेद बिचार-१-२३०।
सिर की रक्षा के लिए पहनी जानेवाली लोहे की टोपी।
उ.- टूटत धुजा पताक छत्र रथ चाप चक्र शिरत्राण।
सिर का शीशफूल नामक आभूषण।
(अस्त्र आदि) रोका हुआ, निवारित।
उ.- (क) सकट कौ रूप धरि असुर लीन्हौ-१०-६२। (ख) सहस सकट भरि कम चलाए-५८३।
उ.- सब गोपिनि मिलि सकटा साजे-४०२।
शकटासुर जिसे श्रीकृष्ण ने मारा था।
उ.- नैकु फटक्यो लात, सबद भयौ आघात, गिरयौ भहरात, सकटा सँहारयौ-१०-६२।
कंस का अनुचर एक दैत्य जिसे श्रीकृष्ण ने मारा था।
उ.- प्रथम पूतना मारि का सकटासुर पेख्यौ-४८९।
उ.- मुहाँचुही सेनापति कीन्हीं, सकटैं गर्व बढ़ायौ-१०-६१।
संगीत में षड़ज स्वर का सूचक अक्षर।
पिंगल में 'सगण' का सूचक अक्षर या उसका संक्षिप्त रूप।
एक उपसर्ग जो शब्दारंभ में जुड़कर 'सह' (जैसे सजीव, सपरिवार), 'स्व' या 'एक ही' (जैसे सगोत्र), 'सु' (जैसे सपूत) आदि अर्थ सूचित करता है।
एक कारक-चिह्न जो करण और अपादान में लगता है, से, द्वारा।
उ.- चिकुर सइबर निकरि अरुझति सकति नहिं निरुवारि-२०२८।
करण या अपादान कारक का चिह्न, से, द्वारा।
उ.- देखि साहस सकुच मानत राखि सकत न ईस-१-१०६।
सकत दिखाइ- (दूसरे को) दिखा सकता है।
उ.- चाँपी पूँछ लुकावत अपनी, जुवतिनि कौं नहिं सकत दिखाइ-५५५।
उ.- (क) बुद्धि रचतिं तरि सकति न सोधा, प्रेम बिबस ब्रजनारि-६३६। (ख) चिकुर सइबर निकरि अरूझति सकति नहिं निरूवारि-२०२८।
वह 'क्रिया' शब्द जिसका कार्य 'कर्म' पर समाप्त हो।
उ.-(क) बाँधै सिंधु सकल सैना मिलि-९-११०। (ख) मीड़त हाथ सकल गोकुल जन-२५३६।
उ.-सकल तजि, भजि मन चरन मुरारि-२-३१।
निर्गुण ब्रह्म और सगुण प्रकृति।
उपहार-रूप में देने योग्य।
कुछ करने में समर्थ या योग्य होना।
सकपकाना, सकपकानो, सकबकाना, सकबकानो
सकपकाना, सकपकानो, सकबकाना, सकबकानो
सकपकाना, सकपकानो, सकबकाना, सकबकानो
सकपकाना, सकपकानो, सकबकाना, सकबकानो
ऐसी चेष्टा करना जिससे प्रेम, लज्जा, शंका आदि भाव सम्मिलित रूप से व्यंजित हों।
वह 'क्रिया' शब्द, वाक्य में जिसका 'कर्म' भी वर्तमान हो।
उ.-बिनसि जात तेज-तप सकलौ-६-५।
उ.-सकसकात तन भीजि पसीना-७४८।
बहुत डर से होने वाली कँपकँपी।
उ.-आए हौ सुरति किए ठाठ करख लिये सकसकी धकधकी हिए-२००९।
सकसना, सकसनो, सकसाना, सकसानो
सकसना, सकसनो, सकसाना, सकसानो
सकसना, सकसनो, सकसाना, सकसानो
उ.-प्रबल बल जानि मन में सकाए-२६०८।
उ.-देखि सैन ब्रज लोग सकात-१०६७।
डर या भय से संकोच करना या हिचकना।
उ.-थरथराइ चानूर सकांन्यो-२६०६।
जिसे किसी बात की कामना या इच्छा हो।
जिसकी कामना या इच्छा पूरी हो गयी हो।
जो किसी स्वार्थ या फल की इच्छा से काम करे।
जिस (स्त्री) में काम-वासना हो।
जिसमें कामना या इच्छा हो।
जिसमें काम-वासना हो, विषयी।
फल के लोभ से कार्य करनेवाला।
उ.-भक्त सकामी दूजो होइ, क्रम-क्रम करिकै उधरै सोइ-३-१३।
उ.-बहुरि यह मग जाहु-आवहु राति साँझ सकार-११७१।
स्वीकृति या सहमति-सूचक (कथन या उत्तर)।
उ.-मुक्ता मनौ चुगत जुग खंजन ¨¨¨¨¨। मानौ सूर सकात सरासन उड़िबे कौं अकुलात-३६६।
(भय से) संकोच करता या हिचकता है।
उ.-इहै बड़ौ दुख गाँव-बास को चीन्हे कोउ न सकात-१०८७।
उ.-बोलत है बतियाँ तुतरौहीं चलि चरननि न सकात-१०-२९४।
उ.-अति ही कोमल अजान सुनत नृपति जिय सकान तनु बिनु जनु भयौ प्रान मल्लनि पै आए-२६००।
डर या भय से संकोच करना या हिचकना।
उ.-(क) बालक बृच्छ धेनु सबै मन अतिहिं सकान-४३१। (ख) गये अकुलाइ धाइ मो देखत नेकहुँ नहीं सकाने- पृ. ३२२ (१५)।
उ.-मानौ मन्मथ फंद त्रास ते फिरत कुरंग सकानै-२०५३।
युद्ध में योद्धाओं द्वारा सर की रक्षा के लिए पहना जानेवाला लोहे का टोप, कूँड़।
सिर पर धरने योग्य, सादर मान्य।
उ.-पुनि खेलिहौ सकारे-१०-२२६।
उ.-तदपि सूर तरि सकीं न सोभा-६२८।
उ.-कहि न सकी, रिस ही रिस भरि गई, अति ही ढीठ कन्हाई-३७७।
(फूल का) मुँदना या बंद होना।
बंद या संकुचित हो जाता है।
उ.-कुमुद निसि सकुचाइ-१०-३५२।
संकुचित या लज्जित हो जाता है।
गए सकुचाइ-संकुचित या लज्जित-से हो गये।
उ.-यह बानी सुनतहिं करुनामय तुरत गए सकुचाइ-५५६।
उ.-यातैं जिय अकुलात नाथ की होइ प्रतिज्ञा झूठी-९-८७।
उ.-मंत्री ज्ञान न औसर पावै कहत बात सकुचातौ-१-४०।
उ.-(क) मोसौं बात सकुच तजि कहिए-१-३३६। (ख) ताहू सकुच सरन आए की होत जु निपट निकाज-१-१८१। (ग) तातैं मोहिं सकुच अति लागै-३-१३। (घ) सकुच छाँड़ि मैं तोहिं कहत-६७१। (ङ) सबेके सकुच गँवाए-७९४।
सिमटता-सिकुड़ता या संकुचित होता है।
उ.-जब दधि-रिपु हरि हाथ लियौ।¨¨¨। बिदुखि सिंधु सकुचत, सिव सोचत-१०-१४३।
(फूल) मुँदता या संपुटित होता है।
उ.-तरनि किरनहिं परसि मानौ कुमुद सकुचत भोर-३५८।
उ.-सकुचत फिरत जो बदन छिपाए, भोजन कहा मँगइए-१-२३९।
उ.-यह उपमा कापै कहि आवै, कछुक कहौं सकुचति हौं जिय पर-१०-९३।
उ.-जदपि मोहिं बहुतै समुझावत सकुचन लीजतु भानि-२७४७।
(फूल का) मुँदना या बंद होना।
उ.-भागी जिय अपमान जानि जनु सकुचनि ओट लई-२७९१।
उ........ सुफलकसुत मन हीं मन सकुच्यो करौं कहा अब काजा-१० उ.-२७।
गांधारी का भाई जो कौरवों का मामा था और जिसके कपट से पांडवों की जुए में हार हुई थी।
उ.-भीषम द्रोन करन अस्थामा सकुनि सहित काहू न सरी-१-२४९।
(काम करने में) समर्थ हुए।
रहि न सके-(अपने को) रोकने में समर्थ न हुए।
उ.-रहि न सके नरसिंह रूप धरि, गहि कर असुर पछारयौ-१-१०९।
उ.-बैठि गईं तरुनी सकुचानी-७९९।
उ.-(क) कछु चाहौं सकुचि मन मैं रहौं, आपने कर्म लखि त्रासु आवै-१-११०। (ख) सकुचि गनत अपराध-समुद्रहिं बूँद तुल्य भगवान-१-८।
सकुचि गयौ- संकुचित हो गया।
उ.-सकुचि गयौ मुख डर तैं-३५४।
सकुचि जात - संकुचित हो जाता है।
उ.- ब्रज-बनिता सब चोर कहतिं तोहिं लाजनि सकुचि जात मुख मेरौ-३९९।
उ.-जहाँ गया तहँ भलौ न भावत सब कोऊ सकुचानो-१-१०२।
उ.-कुमुदिनि सकुची-१०-२३३।
संकोच करनेवाला, लजानेवाला, संकोची।
उ.-ब्रज की ढीठी गुवारि, हाट की बेचनहारि, सकुचैं न देत गारि झगरत हूँ-१०-२९५।
उ.-गुरु-पितु-गृह बिनु बोलेहु जैए। है यह नीति नाहिं सकुचैए-४-५।
प्रेमी-प्रेमिका-मिलन का निर्दिष्ट स्थान।
सिकुड़ना, सिमटना, मुँदना, संकुचित होना।
उ.-बिदरि चले घन प्रलय जानिकै, दिगपति दिग दंतीनि सकेलत-१०-६३।
उ.-पर सकल सकेलि घर के-१० उ.-५२।
उ.-जो बनिता सुत-जूथ सकेले हय-गय बिभव घनेरौ-१-२६६।
उ.-(क) खाइ न सकै-९-३९। (ख) ऎसी को सकै करि बिनु मुरारी-८-१७।
मिट्टी की चौड़ी कटोरी की तरह का एक पात्र।
उ.-तैसें बदन सकोरत है-१३१२।
उ.-बदन सकोरि भौंह मोरत है-८५६।
संकुचित करती या सिकोड़ती है।
उ.-कबहुँ भ्रू निरखि रिस करि सकोरै- पृ. ३१६ (५८)।
उ.-(क) सूरदास प्रभु अंग सकोरथो ब्याकुल देख्यो ब्याल-५५६। (ख) बार-बार तुम भौंह सकोरथो-११५०।
शक्कर में पगा हुआ मैदे का बना एक पकवान।
उ.-सक्करपारे सद पागे-१०१८३।
उ.-नाथ, सकौ तौ मोहिं उधारौ-१-१३१।
गुस्सा, कोप या क्रोध करना।
उ.-ताकी सक्ति पाइ हम करैं, प्रतिपालैं बहुरौ संहरैं-४-३।
(कुछ करने में) समर्थ हुआ।
उ.-(क) वातैं दूनी देह धरी, असुर न सक्थौ सम्हारि-४३१। (ख) सरिता-जल चल न सक्थौ-६२३।
उ.- डारि दियो ताहि शिला पर बालक ज्यों खेल्यो-२५७७।
न हिलने-डोलनेवाला व्यक्ति (व्यंग्य)।
भूमि या खेत में पड़ा हुआ एक-एक दाना बीनने का काम।
उ.- शिला नाम ग्वालिनि अचानक आइ गहे कन्हाई-२४१९।
इंद्रकुंड' नामक स्थान जो व्रज में है।
जिसमें क्रिया या क्रियाशीलता भी हो।
जिसमें कुछ करके दिखाया जाय।
सक्रिय' या क्रियाशील होने का भाव।
जो कुछ करने में समर्थ हो।
उ.-ये बसिष्ठ कुल-पूज्य हमारे पालागन कहि सखनि सिखावत-९-१६७।
उ.-धूम बढ़थौ लोचन खस्यौ सखा न सूझथौ संग-१-३२५।
उ.-सखा बिप्र दारिद्र हरथो-१-२६।
साहित्य में 'नायक' का सहचर जो सुख-दुख में उसके साथ रहता है और जिससे वह मन की सब बात कहता है। ये 'सखा' चार प्रकार के होते हैं-पीठमर्द, विट, चेट और विदूषक।
उ.-मधुकर, तुम हौ स्याम सखाई-३३४४।
[सं. स +हिं. खार (क्षार)]
[सं. स +हिं. खार (क्षार)]
मुहा.- सखुन देना-वचन देना। सखुन डालना-(१) कुछ चाहना या याचना करना। (२) कोई बात या प्रश्न पूछना।
वह शब्द या वाक्यांश जो कुछ लोगों की जबान पर ऎसा चढ़ जाता है कि बात करते समय बार-बार कहा जाता है, तकियाकलाम।
कड़ा या कठोर बर्ताव या व्यवहार करनेवाला।
भक्ति का वह रूप जिसम इष्टदेव को सखा मानकर सेवा-उपासना कौ जाय।
उ.-बंदन दासपनौ से करै, भक्तनि सख्य-भाव अनुसरै-९-५।
उ.-आछौ दिन सुनि महरि जसोदा सखिनि बोलि सुध गान करथौ-१०-८८।
उ.-ऎपन की सी पूतरी सब सखियनि कियौ सिंगार-१०-४०।
उ.-हरषी सखी सहेलरी (हो) अनँद भयौ सिभ-जोग-१०-४०।
साहित्य मॆं नायिका की सहचरी जिससे वह हृदय की भी बात कहती हो। इसके चार कार्य हैं-मंडन, शिक्षा, उपालंभ और परिहास।
वैष्णव भक्ति का एक प्रकार जिसमें भक्त स्वयं को इष्ट या आराध्यदेव की पत्नी या सखी मानकर उसकी सेवा-उपासना करता है।
वैष्णव भक्तों का वह संप्रदाय जिसमें सखीभाव की सेवा, उपासना या आराधना की जाती हो।
छंदशास्त्र में वह गण जिसमें प्रथम दो वर्ण लघु और अंतिम दीर्घ (llऽ) हो।
शगुन विचारने की क्रिया या भाव।
साग मिलाकर बनायी गयी दाल।
अयोध्या के एक सूर्यवंशी राजा जिनके साठ हजार पुत्रों को कपिल मुनि ने भस्म कर दिया था। राजा भगीरथ और श्री रामचन्द्र उन्हीं के वंशज थे।
उ.-नातो मानि सगर सागर सौं कुस-साथरी परयौ-९-१२२।
उ.-(क) उरहन लै आवति हैं सगरी-१०-३१९। (ख) सूर स्याम जहँ तहाँ खिझावत जो मनभावत, दूरि करौं लंगर सगरी-१०४५। (ग) हौं जानति हौं फौज मटन की लूटि लई सगरी-२१०६।
(क) दूध, दही, माखन लै डारि देत सगरौ-१०-३३६। (ख) अनबोहनी तनक नहिं दैहौं, ऎसेहिं छीनि लेहु बरु सगरौ- पृ. २३५ (३१)।
बहुत सगापन या आत्मीयता दिखाने की क्रिया या भाव।
एक माता से उत्पन्न, सहोदर।
सगे होने का भाव, सगापन, आत्मीयता।
[हिं. सगा + आई (प्रत्य.)]
पारिवारिक या आत्मीयता का संबंध, नाता, रिश्ता।
[हिं. सगा + आई (प्रत्य.)]
उ.-(क) त्रियनि कहथौ, जग झूठ सगाई-८९६। (ख) सूर स्याम वह गई सगाई वा मुरली के संग-२७२९। (ग) दिवस चारि करि प्रीति सगाई रस लै अनत गए-२९९३। (घ) सूर जहाँ लगि स्याम गात हैं तिनसे कत कीजिए सगाई-३०५३। (ङ) सूरदास प्रभु रँगे प्रेम रँग जारौं जोग सगाई-३१०९। (च) उनसौं हमसौं कौन सगाई-३२०८।
एक या समान वर्ग का होने का भाव या उसकी अवस्था।
[हिं. सगा + आई (प्रत्य.)]
[हिं. सगा + आई (प्रत्य.)]
उ.-तासौं तेरी भई सगाई-१० उ.-३२।
विधवा या परित्यक्त के साथ पुरुष का वह संबंध जो कुछ जातियों में विवाह के समानं ही माना जाता है।
[हिं. सगा + आई (प्रत्य.)]
सगा या आत्मीय होने का भाव।
सगा या आत्मीय होने का भाव।
[हिं. सगा + आरत (प्रत्य.)]
निकट संबंधवाली, आत्मीयता का परिचय देनेवाली।
उ.-वह मूरति, वह सुख दिखरावै सोई सूर सगी-२७९०।
ब्रह्म का वह रूप सत, रज और तम गुणों से युक्त होने के कारण साकार माना जाता है।
वह भक्ति-संप्रदाय जिसमें ब्रह्म को 'सगुण' मानकर उसके अवतारों की पूजा-उपासना होती है। सूरदास, तुलसीदास आदि भक्त इसी वर्ग के थे।
उ.-सोइ सगुन ह्वै नंद की दाँवरी बँधावै-१-४।
उ.-(क) इतनौ कहत नैन उर फरके सगुन जनायौ अंग-९-८३। (ख) निकसत सगुन भले नहिं पाए-३७०।
सगुण होने का भाव, सगुणता।
[सं. सगुण + अई (प्रत्य.)]
उ.-सूर सगुनई जात मधुपुरी निर्गुन नाम भए-३०९०।
सगुण होने का भाव, सगुणता।
सगुण होने का भाव, सगुणता।
[सं. सगुण + आई (प्रत्य.)]
उ.-बिछरत तनु नाम ज्यों हठि तिहिं छिन गई नहीं सगुनाई-२७८४।
[हिं. सगुन + आना (प्रत्य.)]
सगुन या शकुन देखना या निकालना।
[हिं. सगुन + आना (प्रत्य.)]
[हिं. सगुन + आना (प्रत्य.)]
उ.-भौंरा इक चहुँ दिसि ते उड़ि-उड़ि करन लागि कछु गावै। उत्तम भाषा ऊँचे चढ़ि चढ़ि अंग अंग सगुनावै-२९४६।
शकुन विचारने और बतलानेवाला।
[हिं. सगुन + इया (प्रत्य.)]
भावी शुभाशुभ या शकुन विचारने की क्रिया।
[हिं. सगुन + औती (प्रत्य.)]
उ.-बैठी जननि करति सगुनौती। लछिमन राम मिलैं अब मोकौं दोउ अमोलक मोती-९-१६४।
[हिं. सगुन + औती (प्रत्य.)]
जिसने गुरु से दीक्षा ली हो।
भवन, मंदिर आदि की नींव का पहला पत्थर रखा जाना।
शिला या अन्नकण बीन कर जीवन-निर्वाह करनेवाला।
उ.-(क) कुँवरि ग्रसित श्रीखंड अहिभ्रम चरण शिलीमूख लाम। (ख) कुंचित अलक शिलीमुख मानो लै मकरंद उड़ाने।
हाथ की कारीगरी, दस्तकारी।
जिसने गुरु से कार्य-विशेष की सम्यक शिक्षा पायी हो।
निकट या घनिष्ठ संबंध या आत्मीयता रखनेवाले।
उ.-जानति नहीं, कहूँ नहिं देखे, मिलि गई मनहुँ सगे-१३१८।
नाते-रिश्तेदार, भाई-बंधु।
प्रेम या आत्मीयता का संबंध रखनेवाला।
उ.-तौ लगि यह संसार सगौ है जौ लगि लेहि न नाम-१-७६।
उ.-(क) सघन बृन्दाबन अगम अति जाइ कहुँ न भुलाइ-६१०। (ख) चरतिं धेनु अपनैं अपनैं रँग, अतिहिं सघन बन चारौ-६११।
(क) सघन गुंजत बैठि उन पर भौंरहूँ बिरमाहिं-१-३३८। (ख) गत पतंग राका ससि बिय सँग, घटा सघन सोभात-२१८५। (ग) निसि अँधरीं, बीजु चमकै सघन बरषै मेह-१०-५।
जैसा हो वैसा (कहा या लिखा हुआ)।
सेवा करने की क्रिया या भाव।
वास्तव में, यथार्थ रूप में।
अवश्य, निश्चय, निस्संदेह।
(किसी बात का) फैलना या संचरित होना।
(किसी वस्तु या प्रथा का) प्रचलित या व्यवहृत होना।
संसार के चर-अचर या स्थावर-जंगम, सभी पदार्थ और प्राणी।
प्रविष्ट हुए, संचार किया।
उ.-(क) जा दिन तैं सचरे गोपिनि मैं, ताही दिन तैं करत लँगरैया-७३५। (ख) कुटिल अलक भ्रुव चारु नैन मिलि सचरे स्रवन समीप सुमिति-२२२३।
जो अचल न हो, चलता हुआ, गतिशील, जंगम।
उ.-कहौ तौ सचिव-सबंधु सकल अरि एकहिं एक पछारौं-९-१०८।
उ.-सची नृपति सौं यह कहि भाषी। नृप सुनिकै बिरदै मैं राखी-६-७।
उ.-जो कछु सकल लोक की सोभा लै द्वारका सची री-१० उ.-८६।
उ.-(क) सहज भजै नँदलाल कौं सो सब सचु पावै-२-९। (ख) जौ लै मीन दूध मैं डारै बिनु जल नहिं सचु पावै-२-१०। (ग) कब वह मुख बहुरौ देखौंगी कब वैसो सचु पैहौं-२५१०। (घ) कानन भवन रैनि अरु बासर कहूँ न सचु लहिए-२८९२।
उ.-हौं अनाथ बैठथौ द्रुम डरिया पारधि साधे बान। ताकैं डर मैं भाज्यौ चाहत, ऊपर ढुवथौ सचान-१-९७।
(किसी बात को) फैलाना या संचरित करना।
(किसी वस्तु या प्रथा को) प्रचलित या व्यवहत करना।
[हिं. सच + आवट (प्रत्य.)]
एकत्र या संग्रह करके, बचाकर।
उ.-हम शर घात ब्रजनाथ सुधानिधि राखे बहुत जतन करि सचि सचि-२९०२।
उ.-सीस सचिक्कन केस हो बिच सीमंत सँवारि-२०६५।
चुप या मौन करना या कराना।
उ.-ऎरावत अमृत कै प्याए, भयौ सचेत इंद्र तब धाए-६-५।
जिसमें ज्ञान या चेतना हो।
जमा करता है, संग्रह या संचय करता है।
उ.-जाकी जहाँ प्रतीति सूर सो सर्वस तहाँ सचै री-२२७०।
उ.-सूरदास प्रभु सब बिधि नागर पीवत हौं रस परम सचैन-२०८७।
[हिं. सच्च + ऎयत (प्रत्य.)]
अच्छ चाल-चलनवाला, सदाचारी।
[हिं. सच्च+ आई (प्रत्य.)]
सत्य होने का भाव, सच्चाई, सत्यता।
सच्चाहोने का भाव, सत्यता।
[हिं. सच्चा + हट (प्रत्य.)]
(सत्-चित से युक्त) ब्रह्म।
(सत्, चित् और आनंद से युक्त) ब्रह्म।
उ.- कुब-लिया मल्ल मुष्टिक चानूर सों होई तुम सजग कहि सबनि ऐंठ्यौ-२५६३।
सजग रहने या होन की क्रिया या भाव।
स्वजन, घनिष्ठ संबंध वाले प्रिय व्यक्ति।
उ.- (क) धरी इक सजन कुटुँब मिलिबैठे रूदन बिलाप कराहीं-१-३१९। (ख) सजन-कुटुँब परिजन बढ़े सुत-दारा-धन-धाम-१-३२५। (ग) सजन प्रीतम नाम लै लै दै परस्पर गारि-१०-२६।
सज्जित या अलंकृत होना, श्रूंगार होना, सजाया जाना।
भला लगना, शोभा देना, शोभित होना।
उ.- (क) अब लौं कानि करी मैं सजनी बहुतै मूँड़ चढ़ायौ- पृ. ३२२ (१३)। (ख) मदन गोपाल देखत ही सजनी सब दुख सोक बिसारे-२५६९।
जिसमें पानी हो, जल से पूर्ण या युक्त।
उ.- सजल देह, कागद तैं कोमल किहिं बिधि रखै प्रान-१-३०४।
आँसू भरे या अश्रुपूर्ण (नयन)।
उ.- त्रास तैं अति चपल गोलक सजल सोभित छोर-३५८।
चार सहोदरों में तीसरा जो दूसरे से छोटा परन्तु अन्तिम से बड़ा हो।
उ.- शिव शिवता इनहीं सों लही।
एकत्र या संचित था या किया।
उ.- (क) सोधि-सकल गुन काछि दिखायौ अंतर हो जो सच्यौ-१-१७४। (ख) यह मुख अबलौं कहाँ सच्यौ-पृ. ३५० (६७)। (ग) हरि-मुख-कमल सच्यो रस सजनी अति आनंद पियूष पिये-२०३५।
उ.- टेंटी टेंट सछोलि कियो पुनि-।
सजवाने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
[हिं. सजना + वाई (प्रत्य.)]
उ.- मेरी बलि औरहिं लै सौंपत, इनकी करौं सजाई-९१६।
कारागार में बंद रखने का दंड।
उ.- बहुत धरे जल-माँझ सजाइ-५८२।
सजाने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
जो एक ही स्थान पर जन्मे, पले और रहते हों।
एक ही जाति या वर्ग के (लोग या पदार्थ)।
एक ही आकार-प्रकार या आकृति-प्रकृति के (लोग या पदार्थ)।
यथाक्रम या यथास्थान रखना।
सँवारना, श्रृंगार करना, अलंकृत करना।
सजाकर या सँवारकर तैयार किया या रखा।
उ.- सदं माखन घृत दही सजायौ-१०१९०।
सज्जित या सज हुए होने का भाव या धर्म।
संजीवनी नामक बटी जो मरे हुए को भी जिलानेवाली कही जाती है।
(सं. संजीवन, हिं. संजीवनी)
उ.- सूरदास मनु जरी सजीवनि श्री रघुनाथ पठाई-९-८०।
वह व्यक्ति या पदार्थ जो संजीवनी के समान प्राण या जीवनदाता हो।
(सं. संजीवन, हिं. संजीवनी)
उ.- कोउ कोउ उबरयौ साधु-संग जिन स्याम-सजीवनि पायौ-२-३२।
सजीवनमूर, सजीवनमूरी, सजीवनमूल, सजीवनमूली, सजीवनिमूर, सजीवनिमूरी, सजीवनिमूल, सजीवनिमूली
संजीवनी नामक बूटी जो मृतकों को भी जिलानेवाली मानी जाती है।
सजीवनमूर, सजीवनमूरी, सजीवनमूल, सजीवनमूली, सजीवनिमूर, सजीवनिमूरी, सजीवनिमूल, सजीवनिमूली
अत्यंत प्रिय व्यक्ति या वस्तु।
वह (कल्पित) मंत्र जो मृतक को भी जिला लेनेवाला माना जाता है।
वह मंत्र जिससे कोई कार्य सुगमता से हो जाय।
उ.- (क) माधुरि अति सरस सजूरी। (ख) घेवर मालपुआ मोतिलाड़ू सधर सजूरी सरस सँवारी-१०-२२७।
(अस्त्र-शस्त्र से सज्जित होकर) प्रस्तुत हुई।
उ.- जानि कठिन कलिकाल कुटिल नृप संग सजी अघ-सैनी-९-११।
उ.- मुरली अधर सजी बलबीर-६५८।
सजधज से रहनेवाला, छैल-छबीला।
जो बहुत तेज या फुर्तीला हो।
सजाने या अलंकृत करने की क्रिया।
उ.- स्फटिक सिंहासन मध्य राजत हाटक सहित सजावनो-२२८०।
तैयार या सुसज्जित करने की क्रिया।
उ.- बल समेत तन कुसल सूर प्रभु हरि आये आरती सजावहु-१० उ.-२३।
अस्त्रशस्त्र से सज्जित या प्रस्तुत होकर।
उ.- ब्रज पर सजि पावस दल आयौ-२८१९।
उ.- घन तन दिव्य कवच सजि-९-१५८।
उ.- अंग सुभग सजि ह्वै मधु मूरति-१०-४९।
उ.- अगम सिंघु जतननि सजि नौका हठि क्रम भार भरत-१-५५।
(सप्रेम या सरूचि) रखी या डाली जाय।
उ.- नाहिंन मीन जीवत जल बाहर गो घृत मैं सजियो-३१४७।
करौं सजैया- अपराध का दंड दूँ।
उ.- आवन तौ घर देहु स्याम को जैसी करौं सजैया-८६२।
उ.- स्याम घटा गज असन बाजि रथ चित बगपाँति सजोयल-२८१९।
उ.- भीषम सर-सज्या पर परयौ-१-१७६।
सजाने की क्रिया, भाव, सजावट।
कार्य-विशेष से संबंधित साधन या उपकरण।
उन साधनों या उपकरणों को व्यवस्थित करना।
उ.- आपुन पौढ़ि अधर सज्जा पर कर-पल्लव पलुटावति-६५५।
वह चादर जिस पर 'शिव' या 'जय शिव' लिखा हो।
शिव पर चढ़ायी गयी वस्तु जिसके ग्रहण का निषेध है।
त्याज्य या अग्राह्य वस्तु, वस्तु जो ग्रहण न की जाय।
फाल्गुन बदी चतुर्दशी जब शिव जी के पूजन, वत आदि का माहात्म्य है।
उ.- ता दिन ते उर-भौन भयो सखि शिवरिपु को संचार-२८८८।
शिव की पिंडी जिसकी पूजा की जाती है।
पतली छड़ी या कोड़े से 'सटसट' शब्द करते हुए मारना।
धीरे से चंपत होकर, चुप-चाप खिसककर।
गयौ सटकि-चुपचाप या धीरे से खिसक गया।
उ.- असुर यह घात तकि गयौ रन ते सटकि-१० उ.-३५
मुहा.-सटक्का मारना-दौड़ या झपट कर चले जाना।
दो चीजों का इस प्रकार एक में मिलना या लगना कि दोनों पार्श्व या तल एक दूसरे से लग जायँ।
धीरे से या चुपचाप चल देना।
हुक्का पीने की लचीली नली ना नैचा।
सटकने या चुपचाप चंपत होने की क्रिया।
धीरे से खिसक जाना या चंपत हो जाना।
अन्न की बालों से अनाज निकालने के लिए उन्हें कूटना-पीटना।
छड़ी या कोड़े से 'सट' शब्द करते हुए मारना।
सट-सट' करते हुए हुक्का पीना।
सटकने, झटकने या फटकारने की क्रिया या भाव।
पशुओं को हाँकने की क्रिया।
उ.- सारथी पाय रूख दये सटकार हय द्वारकापुरी जब निकट आई-१० उ.-१५६।
इधर-उधर की या व्यर्थ की बातें या काम।
सटपटाने की क्रिया, घबराबट, चकपकाहट।
छोटा-मोटा, तुच्छ या व्यर्थ का (काम)।
घोड़े या शेर की गरदन के बाल, अयाल, केसर।
दो चीजों को इतने समीप करना कि उनका तल या पार्श्व परस्पर मिल जाय।
गुप्त रूप से कुचक्र या षङयंत्र रचकर किसी को अपनी ओर मिलाने की क्रिया।
उ.- उनहूँ जाइ सौंह दै बूझौ, मै करि पठयौ सटिया-१-१९२।
जिसमें (मूल के साथ) टीका-व्याख्या भी हो।
खरीद-बिक्री का वह प्रकार जो केवल तेजी-मंदी के विचार से अतिरिक्त लाभ के लिए होता है।
मुहा.-सट्टा-बट्टा लड़ाना-कार्य-सिद्धि के लिए अनुचित चाल चलना।
मुहा.-सट्टी मचाना-हाट-बाजार जैसा शोर करना। सट्टी लगाना-बहुत सी चीजें इधर-उधर बिखरा या फैला देना।
उ.- (क) इते मान यह सूर महासठ हरि-नग बदलि विषय-बिष आनत-१-११४। (ख) रे सठ, बिन गोविंद सुख नाहीं-१-३२३।
पानी मिले पदार्थ में खमीर उठना या आना।
बुरी, गिरी हुई या हीन दशा में रहना।
वह संख्या जो साठ से सात अधिक हो।
किसी पदार्थ में विकार और दुर्गंध आने तक डाल रखना।
पानी मिले पदार्थ में खमीर उठाना।
बुरी या हीन दशा में डाल रखना।
किसी चीज के सड़ने पर उसमें से आनेवाली दुर्गंध।
[हिं. साठ + इयान (प्रत्य.)]
[हिं. साठ + इयान (प्रत्य.)]
बूढ़ा हो जाने से विवेक का कम हो जाना, बूढ़ा होकर बुद्धि खो-बैठना।
[हिं. साठ + इयान (प्रत्य.)]
सड़ने (विकार और दुर्गंध आने) की क्रिया या भाव।
किसी पदार्थ में विकार और दुर्गंध आने लगना।
[हिं. सड़ना + इयल (प्रत्य.)]
[हिं. सड़ना + इयल (प्रत्य.)]
[हिं. सड़ना + इयल (प्रत्य.)]
उ.- (क) भीषम पर-तिज्ञा सत भाषी-५६९। (ख) आध पैड़ बसुधा दै राजा, नातरु चलि सत हारी-८-१४।
सत्यतापूर्ण धर्म या आचरण।
उ.- (क) सतजुग सत त्रेता तप कीजै द्वापर पूजा चारि-२-२। (ख) सत-संजम तीरथ-ब्रत कीन्हैं-१०-१६।
मुहा.-सत पर चढ़ना- पति के मृत शरीर के साथ पत्नी का सती होना। सत पर रहना (से न हटना) -पतिव्रता रहना। सत न टरई-सदा पातिव्रत-धर्म का आचरण करेगी, सती रहेगी, उसका पातिव्रत धर्म दृढ़ और अटल रहेगा। उ.- श्री रघुनाथ प्रताप पतिब्रत सीता सत न टरई-९-७८।
उ.- माता, भक्ति चारि परकार। सत रज तम गुन सुदधा सार-३-१३।
प्रकृति के तीन गुणों में एक जो सबसे उत्तम है और जिसके लक्षण ज्ञान, शांति, शुद्धता आदि है।
(क) सत-सत अघ प्रति रोमनि-१-१९२। (ख) धन्य सूर एकौ पल इहिं सुख का सत कल्प जिएँ-१०-९९।
सात' का संक्षिप्त रूप जो यौगिक शब्दों के आरंभ में प्रयुक्त होता है।
सात, जो संख्या में सात हो।
(जन्मकुंडली के) सातवें घर या स्थान में।
उ.- ऊँच नीच जुवती बहु करिहै सतएँ राहु परे हैं-१०-८६।
सच्चा और उत्तम गुरु या दीक्षक।
उ.- (क) सतगुरु कौ उपदेस हृदय धरि जिनि भ्रम सकल निवारयौ-१-३३६। (ख) सब्दहिं सब्द भयौ उजियारौ, सतगुरु भेद बतायौ-४-१३। (ग) सतगुरु-कृपा-प्रसाद कछुक तातैं कहि आवै-४९२। (घ) माथे नहीं महावत सतगुरु अंकुस ध्यान कर टूटो-३४०१।
उ.- जेहि रस शिव सनकादि मगन भए शंभु रहत दिन साधा। सो रस दिये सूर प्रभु तोको शिवा न लहति अराधा।
राजा उशोनर का पुत्र एक राजा जो ययाति का दौहित्र था और जो अपनी दान-शीलता के लिए बहुत प्रसिद्ध है।
चार युगों में पहला जिसे 'कृत युग' भी कहते है। पुण्य और सत्यता की अधिकता के कारण यह युग सर्व-श्रेष्ठ माना जाता है।
उ.- (क) सतजुग लाख बरस की आइ-१-२३०। (ख) सतजुग सत त्रेता तप कीजै द्वापर पूजा चारि-२-२।
उ.- नैन चकोर सतत दरसन ससिकर अरचन अभिराम-२-१२।
उ.- कनकबेलि सतदल सर मंडित हृद तर लता लवंग-३३२७।
वह मिश्रण जिसमें सात तरह के अनाज हों।
उ.- जूठनि की कछु संक नै मानी बिदा किए सत भाई-१-१३।
सच्चाई के साथ, सत्यतापूर्वक।
सत्यभामा जो श्रीकृष्ण की एक पटरानी थी।
सतभामा करि सोक पिता को जदुपति पास सिधाई-१० उ.-२७।
उ.- हँसत कहत किधौं सतभाव-१२४०।
उ.- रिषिनि कहयौ, तुव सतम जज्ञ आरंभ लखि इंद्र कौ राज-हित कँप्यौ हीयौं-४-११।
सातवें महीने जन्मनेवाला (शिशु)।
वह रसम जो शिशु के गर्भ में आने पर सातवें महीने की जाती है।
चार युगों मे पहला जो 'कृतयुग' भी कहलाता है। पुण्य और सत्य की अधिकता के कारण यह युग अन्य तीनों युगों से श्रेष्ठ समझा जाता है।
जिसमें सात रंग हों, सात रंगवाला।
उ.- (क) हमसौं सतर होत सूरज प्रभु कमल देहु अब जाइ-५३७। (ख) कहा हमारौ मन यह राखै अरु हमहीं पर सतर गई-१२६७। (ग) सतर होति काहे को माई- पृ. ३२३ (२७)।
वह संख्या जो दस से सात अधिक हो।
सत्तरह की संख्या जो अष्टांग योग और नवधा भख्ति की सूचक मानी जाती है। अथवा पासे के खेल का वह दाँव जिसमें दो छक्के और एक पंजा साथ-साथ पड़ते हैं।
उ.- राखि सतरह सुनि अठारह चोर पाँचों मारि-१-३०९।
उ.- लाज नहीं तुम आवई बोलत जब सतराइ-११३३।
उ.- कोउ कहै होई करम दुखदाता। सो तौ मैं न कीन्ह सतराई।
उ.- (क) काहे को सतरात, बात मैं साँची भाषत-१०१८। (ख) आदि-बुन्यादि सबै हम जानति काहे को सतरात-११२४। (ग) सुनहु सखी सतरात इते पर हम पर भौहैं तानत-पृ. ३२८ (७७)।
कोप या क्रोध करती हो (हूँ)।
उ.- (क) धन तुम लिए फिरति हौ, दान देत सतराति-१०३६। (ख) नित ही, नित बूझति ये मोसों मैं इन पर सतराति-१६१३। (ग) बहियाँ गहत सतराति कौन पर-२०४७।
उ.- जाइ करौ ह्वँ बोध सबनि को मोपर कत सतरानी-१८८३।
उ.- तुमहिं उलटि हम पर सतराने-११३६।
भली-भाँति तुष्ट या तृप्त करना।
शतुद्र नदी जो पंजाब की पाँच प्रसिद्ध नदियों में एक है।
हार जिसमें सात लड़ें हों।
भली संगत, साधु-सज्जनों का नाथ।
उ.-सुनि सतसंग होत जिय आलस, बिषयिनि सँग बिसरामी-१-१४८।
भली संगत, साधु-सज्जनों का नाथ, सत्संग।
उ.- अजहूँ मूढ़ करौ सतसंगति, संतनि मैं कछु पैहै-१-८६।
एक ही तरह की सात सौ चीजों का समूह।
वह ग्रंथ जिसमें सात सौ छंदों (विशेषतया दोहों) का संग्रह हो।
उ.- निसा निमेष कपाट लगे बिनु ससि मूषत सत-सार-२८८८।
सत्तर से सात अधिक की संख्या।
(सं. सप्तसप्तति, पा. सत्तसत्तति, प्रा. सत्तहत्तरि)
जिसने सत्य (हार-कर) छोड़ दिया हो।
उ.- (क) राज-धर्म सुनि इहै सूर जिहिं प्रजा न जाहिं सताए-३३-६३। (ख) सूरदास प्रभु तुम्हरे मिलन बिना मदन की ताप सताए-३३८३।
राजा जनक के पुरोहित जो गौतम ऋषि के पुत्र थे।
तंग करना, कष्ट या दुख देना।
(सं. संतापन, प्रा. संतावन)
उ.-(क) दुरबासा अँबरीष सतायौ-९-३८। (ख) कह्यौ सुरनि, तुम रिषिहिं सतायौ, तातैं कर रहि गयौ उचायौ-९-३। (ग) इन नैननि मोहिं बहुत सतायौ- पृ. ३२२ (१३)।
कष्ट देता या पीड़ित करता है, दुख देता है।
उ.- ऊधौ, इतने मोहिं सतावत-३०-७६।
उ.- प्रभु तुव माया मोहि सतावति-१-२२६।
तंग करना, दुख या संताप देना।
उ.-नाहिनैं नाथ जिय सोच धन-धरनि को, मरन सें अधिक यह दुख सतावै-१० उ.-५०।
उ.- पवनपुत्र बोल्यौ सतिभाइ-९-१५५।
उ.-की तू कहति बात हँसि मोसों की बूझति सतिभाऊ-१२६०।
उ.- (क) पूछे समाचार सतिभाएँ-१-२८४। (ख) सुख सजनी सतिभायें सँवारी-१० उ.-३९।
पति के अतिरिक्त किसी अन्य पुरुष का पतिभाव से ध्यान न करनेवाली, पतिव्रता, साध्वी।
उ.- सूरदास स्वामी सौं बिमुख ह्वै सती कैसैं भोग-१-३२१।
पति के शव के साथ अथवा उसके मरने पर किसी भी अन्य प्रकार से प्राण त्याग देनेवाली (स्त्री)।
दक्ष प्रजापति की कन्या जो शिवजी को ब्याही थी।
उ.- (क) सती दच्छ की पुत्री भई। दच्छ सो महादेव कौं दई-४-५।
उ.-जती सती तापस आराधैं-१-२६३।
वह चबूतरा या वेदी जो किसी पतिव्रता के सती होने के स्थान पर, उसकी स्मृति में, बनाया जाता है।
सती हीने का भाव, पातिव्रत।
बाज की वह झपट जिसमें वह शिकार के ठीक ऊपर से एक बारगी उस पर टूट पड़ता है।
प्रकृति के तीन गुणों में सर्वोत्तम जो सत्कार्यों की ओर प्रवृत्त करता है।
जो सत्वगुण से युक्त हो, सात्विक।
शारंगपाणि, शारंगपाणी, शारंगपानि, शारंगपानी
शारंग' नामक धनुष हाथ में लेनेवाले, विष्णु या उनके प्रमुख अवतार राम और कुष्ण।
उ.- सुत के हेत मर्म नहिं पायो प्रगटे शारँगपानी-३४३५।
उ.- शारद का बरनै मति भोरी-२४४३।
एक ऋतु जो माघ-फाल्गुन में होती है।
उ.- परम दीन जनु शिशिर हेम हत अंबुज गत बिनु पात।
शिशिर के अंत या पश्चात् की ऋतु, बसंत।
उ.- शंख चक्र भुज चारि बिराजत अति प्रताप शिशु भेषा हो।
उ.- अति शिशुता में ताहि सँहारयो -९८६।
किसी पदार्थ का मूल तत्व, सार भाग।
अच्छा कार्य या सत्कर्म करनेवाला।
उ.- सूरदास सत्कार किएँ तैं ना कछु घटै तुम्हारौ-१-२१५।
धन आदि भेंट देकर किया जानेवाला आदर-सम्मान।
जिस (मृतक) का क्रिया-कर्म करना हो।
वह दार्शनिक सिद्धांत जिसके अनुसार इस जगत की उत्पत्ति किसी मूल सत्ता से मानी जाती है।
जिसका आदर-सत्कार किया गया हो।
किसी पदार्थ का सार भाग या तत्व।
उ.- धर्म-सत्त मेरे पितु माता-१-१७३।
(सं. सप्तति, प्रा. सत्तरह)
पासे के खेल का वह दाँव जिसमें दो छक्के और एक पंजा साथ-साथ पड़ते हैं। या अष्टांग योग और नवधा भक्ति का योग-सूचक अंक।
उ.-राखि सत्तरह (सतरह) सुनि अठारह चोर पाँचों मारि-१-३०९।
विद्यमान होने का भाव या उसकी अवस्था, अस्तित्व।
मुहा.- सत्ता चलाना या जताना- शक्ति या अधिकार दिखाना या सिद्ध करना।
ताश का वह पत्ता जिसमें सात बूटियाँ हों।
(सं. सप्तविंशति, प्रा. सत्ताईसा)
जिसके हाथ में शक्ति, सामर्थ्य या अधिकार हो, अधिकारी।
(सं. सप्तनवति, प्रा. सत्तनवइ)
(सं. सप्तपंचाशत, प्रा. सत्तावन्ना)
वह दर्शन जिसमें पारमार्थिक सत्ता का विवेचन हो।
(सं. सप्ताशीति, प्रा. सत्तासी)
भुने हुए जौ, चने, लावा आदि का चूर्ण।
(सं. सक्तुक्त, प्रा. सत्तुअ)
मुहा.- सत्तू बाँधकर पीछे पड़ना- (१) पूरी तैयारी के साथ किसी काम को करने में लगना। (२) सब काम-धंधा छोड़ कर किसी के विरुद्ध प्रयत्न करना।
उत्तम आचार-व्यवहार, सदाचार।
श्रेष्ठ और सदाचारी व्यक्ति।
(कन्या के योग्य) उत्तम वर।
दान आदि ग्रहण करने के योग्य उत्तम, सदाचारी और धर्मनिष्ठ व्यक्ति।
सदाचारी और सज्जन व्यक्ति।
वादा निश्चित करने के लिए अग्रिम दिया जानेवाला धन, अग्रिम।
जिसके ठीक या यथार्थ होने में किसी प्रकार का संदेह न हो।
उ.- ज्यों कोउ दुख-सुख सपनैं जोइ, सत्य मनिलै ताकौं सोइ-३-१३।
जैसा हो या होना चाहिए वैसा।
उ.-कौन सत्य कछु मर्म न पावत -१०-उ.-५।
ठीक बात, यथार्थ य वास्तविक तत्व।
उ.- सत्य-सील सपन्न सुमूरति सुर-नर-मुनि भक्तनि भावै-१-६९।
पारमार्थिक सत्ता जो सदा ज्यों की त्यों रहे।
ऊपर के सात लोकों में सबसे ऊपरी।
चार युगों में प्रथम जिसमें पुण्य और सदाचार की अधिकता रहना माना जाता है।
उत्तम, सत्य और सद् बातों की कामना रखनेवाला या प्रेमी।
सत्य या यथार्थ होने का भाव।
विष्णु का एक नाम या रूप जिसकी कथा प्रायः पूर्णिमा को कही-सुनी जाती है।
जिसने सदा सत्य बोलने की प्रतिज्ञा या निश्चय किया हो।
एक राजा जिसने ʽप्रलयʼ देखने की कामना या अभिलाषा की थी।
उ.- सत्यब्रत कहयौ, परलै दिखायौ-८-१६।
चार युगों में पहला जिसे 'कृतयुग' भी कहते हैं और जो पुण्य, धर्म तथा सदाचार के कारण अन्य तीनों युगों से श्रेष्ठ समझा जाता है।
ऊपर के सात लोकों में सबसे ऊपरी जहाँ ब्रह्मा का निवास कहा गया है।
उ.- सत्यलोक जनलोक, तप लोक और महर निज लोक- सारा. २२।
सत्य-धर्म का पालन करनेवाली।
ʽमत्स्यगंधाʼ नामक धीवर-कन्या जिसके गर्भ से कुमारी अवस्था में ही पराशर ऋृषि के संयोग से कृष्णद्वैपायन या व्यास की उत्पत्ति हुई थी।
उ.-सत्यवती मच्छोदरि नारी।¨¨¨¨। तहाँ परासर रिषि चलि आए। बिबस होइ तिहिं कैं मद छाए। रिषी कहयौ ताहि, दान-रति देहि।¨¨¨¨। सत्यवती सराप-भय मानि, रिषि कौ बचन कियौ परमान।¨¨¨¨। व्यासदेव ताके सुत भए-१-२२९।
वचन या धर्म पर दृढ़ रहनेवाला।
प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहनेवाला।
शाल्व देश के राजा द्युमत्सेन का पुत्र जो अल्पायु था; परन्तु जीसकी पत्नी ने अपने पातिव्रत्य के बल से जिसे मृत्योपरांत पुनः जिला लिया था।
सत्य बोलने का प्रण, नियम या निश्चय।
एक सूर्यवंशी राजा जिसके तप से प्रसन्न होकर परब्रह्म ने उसे दर्शन दिया था।
उ.- सत्यव्रत राजा रविवंसी पहिलैं भए मनु बंस। कीनौ तप बहु भाँति परम रुचि प्रगट भए हरि-अंस- सारा. ९१।
शिशु का भाव, धर्म या कार्य।
शिशु का भाव, धर्म या कार्य।
उ.- जसुमति भाग सुहागिनी हरि को सुत जानै। मुख मुख जोरि बतावई शिशुताई ठानै।
चेदि देश का राजा जो रूक्मिणी से विवाह करना चाहता था और जिसे श्रीकृष्ण ने पांडवों के राजसूय यज्ञ में मारा था।
उ.- देस देस के नृपति जुरे सब भीष्म नृपति के धाम। रूक्म कह्यो, शिशुपाल को देहौं नहीं कृष्ण सों काम - सारा. ६२८।
उ.- आपुन को उपचार करौ कछु तब औरन शिष देहु-३०१३।
चोटी, शिखा जो मुंडन के समय सिर पर रक्खी जाती है।
उ.- कटि पट पीत पिछौरी बाँधे कागपच्छ शिख शीश।
किसी न्यायपूर्ण बात के लिए शांतिपूर्वक आग्रह करना।
किसी न्यायपूर्ण बात के लिए शांतिपूर्वक आग्रह करनेवाला।
मटियामेट, ध्वंस, सर्वनाश।
वह स्थान जहाँ दीनों को भोजन दिया जाता हो, छेत्र, सदा-वर्त।
वह काल या समय जिसमें एक कार्य निरंतर समान गति से चलता रहे।
उ.- सत्रह सौ भोजन तहँ आए-३९६।
उ.- (क) कोउ कहै सत्रु होइ दुखदाई। सो तौ मैं न कीन्ह सत्राई-१-२९०। (ख) मम सत्राई हिरदैं आन, करिहै वह तेरौ अपमान।¨¨¨¨। सिव कहयौ मेरैं नहिं सत्राई-४-५। (ग) उनकैं मन नाहीं सत्राई-९-५।
एक यादव जिसने सुर्य की तपस्या करके स्यमंतक मणि प्राप्त की थी और उसके खो जाने पर श्रीकृष्ण को चोरी लगाई थी। जब श्रीकृष्ण ने जांबवान से युद्ध करके उसकी मणि ला दी तब उसने अपनी पुत्री सत्यभामा का विवाह श्रीकृष्ण के साथ कर दिया था।
उ.- (क) सुर-अरु असुर कस्यप के पुत्र। भ्रात बिमात आपु मैं सत्रुं-३-९। (ख) सैल-सिला-द्रुम बरषि ब्योम चढ़ि सत्रु-समूह सँहारौं-९-१०८। (ग) छठऎं सुक्र तुला के सनि जुत सत्रु रहन नहिं पैहैं-१०-८६।
श्रीराम के सबसे छोटे भाई।
उ.- नाहीं भरत-सत्रुगन सुंदर जिनसौं चित्त लगायौ-९-१४६।
उ.-पृथु कहथौ, नाथ, मेरैं न कछु सत्रुता अरु न कछकामना, भक्ति दीजै-४-११।
श्रीराम के सबसे छोटे भाई।
उ.- लछिमन भरत सत्रुहन सुन्दर राजिव-लोचन राम-९-२०।
प्रकृति के तीन गुणों में एक जिसके फलस्वरूप अच्छे कर्मों की ओर ही प्रवृत्ति रहती है।
वह गुण या प्रकृति जो अच्छे कर्मों की ही प्रवृत्त करे।
जो अच्छे कर्मों की ओर ही प्रवृत्त रहे, उत्तम प्रकृतिवाला।
उ.-सत्वर सूर सहाय करै को रही छिनक की बात-३१६५।
साधु-सज्जनों के साथ उठना-बैठना, भली संगत।
वह समाज जिसमें धर्मोपदेश आदि होते हों।
धर्म-कर्म के आयोजक समाजों में भाग लेनेवाला।
स्वस्तिक चिह्न ( ) जो मंगल-सूचक और सिद्धिदायक माना जाने के कारण विशेष अवसरों पर कलश, दीवार आदि पर बनाया जाता है।
(सं. स्वस्तिक, प्रा. सत्थिअ)
उ.- (क) द्वार सथिया देति स्यामा सात सींक बनाइ-१०-२६। (ख) कौरनि सथिया चीततिं नवनिधि-९०-३२।
देवताओं आदि के पद-तल का चिह्न-विशेष।
(सं. स्वस्तिक, प्रा. सत्थिअ)
भारतीय ढंग का अस्त्र-चिकित्सक।
(सं. स्वस्तिक, प्रा. सत्थिअ)
उ.- करहु कृपा अपने जन पर सद-१८२।
उ.- (क) सद दधि-माखन द्यौं आनि-१०-१८३। (ख) माखन-रोटी सद दही जेंवत रुचि उपजाय-४३१।
वह वस्तु जो किसी के सिर पर से उतार कर रास्ते या चौराहे पर रखी जाय, उतारा, उतारन।
वह वस्तु जो किसी की कल्याण या मंगल-कामना से, उसके सर पर से उतारकर किसी को दी जाय, निछावर।
उ.- सूरदास प्रभु अपने सदका घरहिं जान हम दीजै-१०५३।
मुहा.-सदके जाऊँ बलि जाऊँ,निछावर होऊँ।
मरने के बादु उत्तम लोक में जाना।
उ.- आज्ञा होइ करौं अब सोइ। जातैं मेरी सदगति होइ-१-३४१।
उ.- (क) बरनौं कहा सदन की सोभा बैकुंठहुँ तैं राजै री-१०-१३९। (ख) गहथौ स्याम-कर कर अपने सों लिए सदन को आई-२५८७।
उ.- सुनि स्त्रवन दसबदन, सदन-अभिमान, कै नैन की सैन अंगद बुलायौ-९-१२९।।
वह स्थान जहाँ किसी विषय पर विचार करने या नियय, विधान आदि बनाने के लिए सदस्यों या प्रतिनिधियों की बैठक हो।
ऎसी बैठक में भाग लेनेवालों का समूह।
एक कसाई का नाम जो प्रसिद्ध हरि-भक्त था।
एक कसाई का नाम जो प्रसिद्ध हरि-भक्त था।
छेद से रस-रसकर चूना या टपकना।
सदस्य या सभ्यों के बैठन का स्थान, सभा, समाज।
उ.- (क) सुमिरन कथा सदा सुखदायक- १-८३। (ख) यह संसार बिषय-बिष-सागर रहत सदा सब घेरे-१-८५।
उ.- (क) बिलसत मदन सदाई-६२६। (ख) प्रभु-पतिव्रत तुम करौ सदाई-८९६।
शिष्ट या सज्जनोचित व्यवहार।
सदाचारी' होने का भाव, शिष्टता।
जो (वृक्ष) सदा फूलता-फलता हो।
वह स्थान जहाँ दीन अनाथों को नित्य भोजन बटता हो।
सदा हरा-भरा रहनेवाला (वृक्ष)।
वह स्थान जहाँ दीनहीनों को नित्य भोजन बटता हो।
वह दान जो नित्य दिया जाय।
जिसके भाव उच्च और उदार हों, सज्जन, शिष्ट, उदार।
सदाशय' होने का भाव, सज्जनता, उदारता।
उ.- पाइ सुधि मोहिनी की, सदासिव चले जाइ भगवान सों कहि सुनाई-८-१०।
सदासुहागिन, सदासुहागिनि, सदासुहागिनी
जो (स्त्री) कभी पतिहीन या विधवा न हो।
सदासुहागिन, सदासुहागिनि, सदासुहागिनी
अच्छी तरह या अच्छे काम में उपयोग करना।
उ.- तड़ित बसन धनस्याम सदृस तन-६९।
बिना शरीर का त्याग किये, सशरीर।
(मानव) देह या शरीर धारण करके, प्रत्यक्ष या मूर्तिमान होकर।
उ.- मानौं चारि हंस सरवर तैं बैठे आइ सदेहियाँ-१--१९।
जिसने अपराध किया हो, दोषी।
मरने के बाद अच्छे लोक की प्राप्ति।
वह धर्मोपदेशक या मंत्रदाता जो शिष्य को भव-बंधन से मुक्त कराने में समर्थ हो।
उत्तम शिक्षा से युक्त ग्रंथ।
वह धर्म-ग्रंथ जिसके मनन और आचरण से भव-बंधन से मुक्त होने की प्रेरणा और सिद्धि मिले।
(भगवान बुद्ध का) बौद्ध धर्म।
प्रेम, हित और शुभचिंतना का भाव।
(किसी कार्य के करने में) सच्चा और निष्कपट भाव।
प्रेम, हित या मंगल का भाव।
उ.- माखन रोटी सद्य जम्यौ दधि-१०-२१२।
उ.- साधु-सील सद्रूप पुरुष को अपजस बहु उच्चरतौ-१-२०३।
सद्रूप' होने का भाव, सुंदरता।
जिसने उत्तम व्रत या निश्चय किया हो।
उत्तम व्रत या निश्चय करनेवाला।
गौं पर चढ़ना, प्रयोजन-सिद्धि के उपयुक्त या अनुकूल होना।
निशाना या लक्ष्य ठीक होना।
समान गुण या विशेषता वाला।
जिसका पति जीवित हो, सुहाग या सौभाग्यवती (स्त्री)।
साधने का कार्य दूसरे से कराना।
पशु-पक्षियों को कार्य-विशेष के लिए शिक्षित करना या सिखलाना।
[हिं. साधु + उक्कड़ (प्रत्य.)]
साधु' होने का भाव, साधुता।
उ.- राधा, मौनव्रत किन सधायो-१२६८।
सधाने या साधने की क्रिया या भाव।
उ.- पवन सधावन भवन छोड़ावन नवल रसाल गोपाल पठायो-२९९९।
खूब सिखा-सिखाया, अच्छी तरह सधा हुआ।
उ.- कबहुँक सधे अस्व चढ़ि आपुन नाना भाँति नचावत-सारा. १९०।
(कार्य) पूरा या संपादित हुआ।
सध्यौ नहिं धर्म सुचि सील तप ब्रत कछू कहा मुख लै तुम्हैं बिनै करिए-१-११०।
ब्रह्मा का चार मानसपुत्रों में एक जो कपिल मुनि के पूर्व सांख्य मत के प्रवर्तक थे।
उ.- ब्रह्मा ब्रह्मरूप उर धारि। मन सौं प्रगट किए सुत चारि। सनक सनंदन सनतकुमार। बहुरि सनातन नाम ये चार-३-६।
एक पौधा जिसके रेशों से रस्सी और टाट बनते हैं।
उ.- सन और सूत चीर-पाटंबर लै लंगूर बँधाए-९-९८।
से' विभक्ति का पुराना रूप।
उ.- (क) बरबस सरम करत हठ हम सन-१६८७। (ख) जो कछु भयो तो कहिहौं तुम सन-२७९२। (ग) यह रजायसु होत मो सन कहत बदरी जान-१० उ.-१०४।
वेग से चलने या निकलने का शब्द।
इशारे या संकेत से बुलाना।
किसी काम-के लिए इशारा करना।
पागल या झक्की हो जाना, पगलाना।
किसी को सनकने में प्रवृत्त करना, किसी को पागल कर देना या बनाना।
श्रीकृष्ण के भाई बलराम का एक नाम।
उ.- जिननी मधि सनमुख संकर्षन खैंचत कान्ह खस्यौ सिर-चीर-१०-१६१।
ब्रह्मा के चार मानसपुत्रों में एक।
उ.- ब्रह्मा ब्रह्मरूप चित धारि। मन सौं प्रगट किए सुत चारि। सनक सनंदन सनतकुमार। बहुरि सनातन नाम ये चार-३-६।
मुहा.- जी सन होना-घबरा जाना।
पागलों की सी धुन, झक या प्रवृत्ति।
मुहा.- सनक चढ़ना (सवार होना) -पागल-जैसी धुन या झक होना या चढ़ना।
ब्रह्मा के चार मानसपुत्रों में एक।
उ.- ब्रह्मा ब्रह्मरूप चित धारि। मन सौं प्रगट किए सुत चारि। सनक सनंदन सनतकुमार। बहुरि सनातन नाम ये चार-३-६।
पागलों की सनक-जैसा आचरण करना।
शंकित होना, आभास या संकेत पाकर चौकन्ना होना।
वेग से किसी ओर जाना या फेंका जाना।
किसी को सनकने को प्रवृत्त करना।
किसी को आभास या संकेत करके सचेत या चौकन्ना करना।
उ.- तीर चलावत शिष्य सिखावत धर निशान देखरावत।
दीक्षा या मंत्र लेनेवाला।
शिष्य होने का भाव या धर्म।
ब्रह्मा के सात मानसपुत्रों में एक।
लेई जैसा गीला होकर मिलना।
लेई जैसा गीली वरतु लगना, उससे मिलना या ओतप्रोत होना।
उ.- पुनि सनमान रिषिन सब कीन्हौ-१-३४१।
(क) धरि न सकत पग पछमनौ सर सनमुख उर लाग-१-३२५। (ख) सनमुख होइ सूर के स्वामी भक्तनि कृपा-निधान-९-१३४।
सनसन' शब्द करते हुए बहना या चलना।
सनसन करते हुए चलन या बहने का शब्द, उसकी क्रिया या भाव।
शरीर के संवेदन सूत्रों का एक प्रकार का स्पंदन जिसमें कोई अंगकुछ देर को जड़-सा होकर 'सनसन' करता जान पड़ता है, झनझनाहट झुनझुनी।
अत्यंत भय या आश्चर्यपूर्ण स्तब्धता, उत्तेजना या क्षोभ।
करणकारकीय चिह्न, से, साथ।
बहुत प्राचीन समय से चला आता हुआ व्यवहार, क्रम या परंपरा।
ब्रह्मा के चर मानसपूत्रों में एक।
उ.- ब्रह्मा ब्रह्म रूप उर धारि। मन सौं प्रगट किए सुत चारि। सनक सनंदन सनत कुमार। बहुरि सनातन नाम ये चार-३-६
अत्यंत प्राचीन, अनादि काल का।
बहुत समय से चला आनेवाला, परंपरागत।
सदा रहनेवाला, नित्य, शाश्वत।
उ.- (क) आदि सनातन हरि अविनासी। सदा निरंतर घट-घट वासी-१०-३। (ख) सूरदास प्रभु ब्रह्मा सनातन सुत हित करि दोउ लीन्हौ री-१०-९८।
वर्तमान हिंदू धर्म जो परंपरागत है और जिसमें पुराण, बहुदेवोपासना, मूर्तिपूजन, तीर्थ-व्रत आदि माननीय है।
प्राचीन या परंपरागत धर्म में विश्वास रखनेवाला।
वर्तमान हिंदू धर्म का अनुयायी।
जिसका कोई रक्षक या स्वामी हो।
उ.- सूरदास प्रभु कंस-निकंदन देवकि करनि सनाथ-२५३४।
अभीष्ट-प्राप्ति से जिसका अस्तित्व सार्थक या सफल हो गया हो।
उ.- भए सखि नैन सनाथ हमारे-२५६९।
जिसका कोई रक्षक या स्वामी हो।
उ.- निदरि मारयौ असुर पूतना आदि ते धरनि पावन करी भई सनाथा-२६१८।
उ.- तीरथ कोटि सनान करैं फल जैसो दरसन पावत-२-१७।
उ.- मनु जुग जलज सुमेर सृंग तें जाइ मिले सम ससिहिं सनाल-३४५३।
उ.- (क) बहुत सनाह समर सर बेधे-१-२७८। (ख) मारै मार करत भट दादुर पहिरे बहु बरन सनाह-२८२६।
सौर जगत का सातवाँ ग्रह जो फलित ज्योतिष में अशुभ और कष्टदायक माना जाता है; परन्तु कुछ ग्रहों से मिलकर अत्यंत सुख और लाभदायक भी हो जाता है।
उ.- (क) छठएँ सुक्र तुला के सनि जुत सत्रु रहन नहिं पैहैं-१०-८६। (ख) मानौं गुरु सनि कुज आगैं करि ससिहिं मिलन तम के गन आए-१०-१०४।
से' विभक्ति का एक प्राचीन विकृति रूप।
सना या मीला हुआ, मिश्रित।
सौर जगत का सातवाँ ग्रह जो फलित ज्योतिष में प्रायः कष्टदायक, परतु विशेष स्थिति में सुखदायक भी माना जाता है।
उ.- कर्म-भवन के ईस सनीचर स्याम बरन तन ह्वैहैं-१०-८६।
शनि की दशा जिसमें दुख, व्याधि आदि की अधिकता रहती है।
मुहा.-मीन की सनीचरी मीन राशि पर शनि की स्थिति की वह दशा जिसके फलस्वरूप राजा, प्रजा, सबका सर्वनाश होना माना जाता है।
उ.- ता दिन सूर सहर सब चक्रित सबर सनेह तज़्यौ पितुमात-९-३८।
उ.- (क) सुनि सनेह कुरंग कौ स्रवननि राच्यौ राग-१-३२५।
उ.- करि हरि सौं सनेह मन साँचौ-१-८३।
प्रेम या आत्मीयता के संबंध।
उ.- (क) बिछुरत हंस बिरह के सूलनि, झूठे सबै सनेह-८०१। (ख) बिछुरति सहति बिरह के सूलनि, झूठे सबै सनेह-८९७।
उ.- सूधी प्रीति न जसुदा जानै स्याम सनेही ग्वैयाँ-३७१।
प्रेम और आत्मीयता का संबंध भी।
उ.- सबनि सनेहौ छाँड़िदयौ-१-२९८।
उ.- मेरी भक्ति चतुर्विधि करै। सनै सनै त सब निस्तरै।¨¨¨¨सनै सनै बिधिलोकहिं जाइ-३-१३।
संज्ञा-शून्य, जड़, निष्चेष्ट।
मुहा.- सन्न मारना एकबारगी चुप हो जाना।
किसी प्रकार का शब्द न होने की अवस्था, नीरवता।
[हिं. सुन्न+आटा (प्रत्य.)]
[हिं. सुन्न+आटा (प्रत्य.)]
अत्यंत भय या आश्चर्य से निश्चेष्टता या स्तब्धता।
[हिं. सुन्न+आटा (प्रत्य.)]
मुहा.-सन्नटा छाना (संन्नाटे में आना)-(सबका) स्तब्ध रह जाना।
[हिं. सुन्न+आटा (प्रत्य.)]
मुहा.- सन्नाटा खींचना (मारना)-उपस्थित जनों का बिलकुल चुप हो जाना। सन्नाटा छाना-(सबका) शांत या मौन हो जाना।
किसी तरह की चहल-पहल न होना, उदासी।
[हिं. सुन्न+आटा (प्रत्य.)]
मुहा-सन्नाटा बीतना-उदासी में समय कटना।
जहाँ किसी प्रकार का शब्द न हो, नीरव।
जोर से हवा के चलने का शब्द।
तेज चलती हवा को चीर कर गति से बढ़ने का शब्द।
मुहा.-सन्नाटे के साथ या से-बड़ी तेजी से।
उ.- पीत पट डारि कंचुकी मोचित करनि कवच सन्नाह ए छुटत तन ते-१७००।
वह स्थान जहाँ धन एकत्र किया जाय।
स्थापित करने या रखने की क्रिया या भाव।
किसी के अन्तर्गत आया, मिलाया या समाया हुआ।
साथ बैठने या स्थित होने का भाव।
जमाकर या सजाकर रखने का भाव।
स्थापित या प्रतिष्ठित करना।
वर्षा की छोटी-छोटी बूँदें, फुहार।
उ.- करि सन्मान कहयौ या भाइ-१-२८४।
उ.- आये जान नृपति सन्माने कीन्हीं अति मनुहार- सारा. २३१।
(क) सहि सन्मुख तउ सीत-उष्न कौं सोई सुफल करै-१११७। (ख) स्याम त्रिया सन्मुख नहिं जोवत-१९९६।
जिसे पार करना कठिन हो, बीहड़।
एक पति की दूसरी पत्नी, सौत।
उ.- (क) इती न करौं, सपथ तौ हरि की, छत्रिय गतिहिं न पाऊँ-१-२७०। (ख) सूर सपथ मोहिं इनहिं दिननि मैं लैं जु आइहौं कृपानिधानहिं-९-९५। (ग) संभु कीं सपथ, सुनि कुकपि कायर कृपन स्वास आकास बनचर उड़ाऊँ-९-१२८।
जल्दी-जल्दी, तुरंत, शीघ्र (चलकर)।
स्वप्न में देख हुई, स्वप्न-काल की।
उ.- जो मैं कहत रह्यौ भयौ सोई सपनंतर की प्रगट बताई-९३२।
निद्रावस्था में मानसिक दृष्टि से दिखायी देनेवाला दृश्य।
उ.- (क) जग-प्रभुत्व प्रभु देख्यौ जोइ। सपन-तुल्य छनभंगुर होइ-७-२। (ख) दरसन कियौ आइ हरि जी को कहत सपन की साँची-१०उ.-११२।
मुहा.- सपना हो जाना (होना) - इतना दुर्लभ हो जाना कि देखने को भी न मिले। सपना देखना- सी अलभ्य पदार्थ को पाने की आशा करना (व्यंग्य )।
सपना देखने की स्थिति या अवस्था।
उ.- (क) ज्यौं कोउ दुख-सुख सपनैं जोइ। सत्य मानि लै ताकौं सोइ-३-१३। (ख) सूर स्याम सपनैं नहिं दरसत, मुनिजन ध्यान लगावत-४६८।
उ.- जीवन-जन्म अल्प सपनौ सौं समुझि देखि मन माहीं-१-३१९।
काम का पूरा होना या निबटना।
(सं. संपादन, प्रा. संपाडन)
(सं. संपादन, प्रा. संपाडन)
मुहा.- सपर जाना - मर जाना।
(सं. संपादन, प्रा. संपाडन)
काम पूरा करना या निबटाना।
काम को पा कर पाना या कर सकना।
अनुचरों और ठाट-बाट के साथ।
मुहा.- पारि सपाट - तोड़-फोड़कर बराबर करके। उ.- बड़ौ माट घर धरयौ जुगनि कौ, टूक-टूक कियौ सबनि परकि। पारि सपाट चले, तब पाए-१०-३१८।
जिसकी सतह पर उभार या खुरदुरापन न हो, चिकना।
जो क्षितिज की ओर दूर तक सीधा चला गया हो।
चलने, दौड़ने या उड़ने का वेग, झोंका।
सैर-सपाटा- मन-बहलाव के लिए किसी रमणीक स्थान में घूमना-फिरना।
जिसमें एक पूरे अंश के साथ चौथाई और मिला हो, सवाया।
जो एक ही कुल के हों और एक ही पितरों को पिंडदान करते हों।
मृतकों के श्राद्ध की एक क्रिया जिसके द्वारा वह अन्य पितरों मे मिलाया या सम्मिलित किया जाता है।
पूरा होना, पूर्णता तक पहुँचना।
योग्य और कर्तव्यनिष्ठ (पुत्र)।
(सं. सुपुत्र, प्रा. सपुत्त, सउत्त)
उ.- (क) लरिका छरकि मही सौं देखै, उपज्यौ पूत सपूत महरि कैं-१०-३१८। (ख) पूत सपूत भयौ कुल मेरैं अब मै जानी बात-१०-३२९।
गुणवान और आज्ञाकारी पुत्र।
योग्य और कर्तव्यनिष्ठ पुत्र उत्पन्न करनेवाली माता।
उ.-लछिमन जनि हौं भई सपूती राम-काज जौ आवै-९-१५२।
योग्य और कर्तव्यनिष्ठ (पुत्र)।
उ.-कहा बहुत जो भए सपूतौ एकै बंसा-४३१।
उषःकाल का उज्ज्वल प्रकाश।
उ.-(क) हरिजू की आरती बनी।¨¨¨¨ मही सराव, सप्त सागर घृत बाती सैल घनी-२-२८। (ख) जो कुल माहिं भक्त मम होइ। सप्त पुरुष लौं उधरै सोइ-७-२।
सात ऋृषियों का समूह या मंडल।
उ.-ध्रुव समान आए री जु सप्तऋृषि बहुरि तौ हेर ह्वैहै-२२४६।
संगीत में सात स्वरों का समूह।
(क) प्रथमनाद बल घेरि निकट लै मुरली सप्तक सुर बंधान सौं-१५३९। (ख) कबहुँक नृत्य करत कौतूहल सप्तक भेद दिखावत-२३५४।
अग्नि जिसकी सात जिह्वाएँ मानी गयी हैं।
पृथ्वी के सात बड़े विभाग जिनके नाम ये हैं-जंबू, कुश, प्लक्ष, शाल्मलि, क्रौंच, शाक और पुष्कर।
शरीर के सात द्रव्य-रक्त, पित्त, मांस वसा, मज्जा, अस्थि और शुक्र।
विवाह की एक रीति जिसमें वर-वधू अग्नि की सात परिक्रमाएँ करके विवाह पक्का करते हैं, भाँवर, भँवरी।
(किसी बात को) अग्नि की साक्षी देकर पक्का करना।
पृथ्वी के नीच सात लोक - अतल, वितल, सुतल, रसातल, तलातल, महातल और पाताल।
सात पवित्र नगर या पुरी-अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार (माया), काशी, कांची, अवंतिका (उज्जयिनी) और द्वारका।
उ.-सप्तम दिन तोहिं तच्छक खाइ-१-२९०।
सात शक्तियाँ जिनका पूजन शुभ कार्यों के पूर्व होता है - ब्रह्मा या ब्राह्माणी, महेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इंद्राणी और चामुंडा।
चांद्र मास के किसी पक्ष की सातवीं तिथि या दिन।
व्याकरण में अधिकरण कारक की विभक्ति।
सात ऋृषियों का समूह या मंडल जिनके नाम कहीं ये बताये गये हैं- गौतम, भरद्वाज, विश्वामित्र, यमदग्नि, वसिष्ठ, कस्यप और अत्रि; तथा कहीं ये-मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलह, क्रेतु, पुलस्त्य और वसिष्ठ।
सात तारों का समूह जो ध्रुवतारे के चारो ओर घूमता जान पड़ता है।
सात सौ पद्यों या छंदों का समूह।
संगीत के सात स्वर-स, ऋृ, ग, म, प, ध और नि।
सोमवार से रविवार तक के सात दिन।
ʽश्रीमद्-भागवतʼ जैसे किसी धर्मग्रंथ का पाठ जो सात दिन में पढ़ या सुन लिया जाय।
श्रीफल मधुर चिरौंजी आनी। सफरी चिउरा अरुन खुबानी -१०-२११।
जिसका कुछ फल या परिणाम निकले, जिसका करना या होना व्यर्थ न जाय, सार्थक।
उ.-ता छिन हृदय-कमल प्रफुलित ह्वै जनम सफल करि लेखौं-९-३५।
सफल होने का भाव, कार्य-सिद्धि।
कूड़ा-करकट हटाने की क्रिया।
अर्थ या अभिप्राय प्रकट होने का गुण।
मन में मैल या दुर्भाव न रहना।
छल, कपट या दुराव का न होना।
दोष या आरोप का हटना, निर्दोषिता।
मुहा.- सफाई देना- (किसी को) निर्दोष प्रमाणित करना। सफाई होना- (किसी का) निर्दोष सिद्ध होना।
लेन देन का हिसाब साफ होना।
मुहा.- रंग सफेद पड़ जाना (होना) -भय आदि से चेहरे का रंग फीका पड़ जाना या मुख का कांति हीन हो जाना। स्याह-सफेद-भला-बुरा।
मुहा.-सफेदी आना-बाल सफेद होना, बुढापा आना। सफेदी छाना-बहुत भय के कारण मुख का कांतिहीन हो जाना।
दीवार आदि पर चूने की पुताई।
उ.-कहौ तौ सचिव-सबंधु सकल अरि एकहिं क पछारौं-९-१०८।
उ.-हेरी देत चले सब बालक-६११।
उ.-सबद करयो आघात, अघासुर टेरि पुकारयौ-४३१।
वर्ण या अक्षरों से बनी सार्थक ध्वनि।
(संसार में) सब कुछ देखनेवाला।
उ.-ता दिन सुर सहर सब चक्रित सबर-स्नेह तज्यौ पितु-मात-९-३८।
मुहा.- किसी का सबर पड़ना- अत्याचार करने वाले को, सब तरह के अत्याचार सबर या सहन-शीलता के साथ सहनेवाले का या इसकी ʽहायʼ का कुफल भोगना पड़ना।
शबर नामक अनार्य जाति की एक स्त्री भक्त जिसके जूठे बेर श्रीराम ने सराह-सराह कर खाये थे।
उ.-सबरी आस्रम रघुबर आये। अरघासन दै प्रभु बैठाए-९-६७।
उ.-बिगरै सबरै हमरे सिर ऊपर बल कौ बीर रखवारौ-९८७।
(क) सूर प्रभु की सबल माया, देति मोहिं भुलाइ-१-४५। (ख) माया सबल धाम-धन-बनिता बाँध्थौ हौ इहिं साज-१-१०८।
जिसके साथ फौज या सेना का बल हो।
उ.-सुभट अनेक सबल दल साजे, परे सिंधु के पार-९-८३।
सबार, सबारे, सबारैं, सबारौ
उ.-(क) घर के कहत सबारे काढ़ौ भूत होइ धरि खैहै-१-८६। (ख) चलौ न बेगि, सबारे जैए ऊजि आपनैं धाम-१०-२००। उ.- अबलौं कहा सोए मनमोहन और बार तुम उठत सबार-४०३।
सबार, सबारे, सबारैं, सबारौ
उपयुक्त या निश्चित समय से पूर्व।
उ.- अबलौं कहा सोए मनमोहन और बार तुम उठत सबार-४०३।
सबार, सबारे, सबारैं, सबारौ
उ.-जेवन करन चली जब भीतर छींक परी तौ आज सबारे-५९५।
सबार, सबारे, सबारैं, सबारौ
साँझ सबारैं-सबेरे-शाम, हर समय दिन भर।
उ.-(क) उरहन कै कै साँझ सबारैं, तुमहिं बँधायौ स्याम-३५५। (ख) अब को निकरै साँझ सबारौ-७६२।
उ.-बोलि उठे बलराम, स्याम कत उठे सबारयौ-४३१।
(क) सूर महरि सबिता सौं बिनवति, भली स्याम की जोटी-७०२। (ख) बार-बार सबिता सौं माँगति, हम पावैं पति स्याम सुजान-७८५।
उ.-कूदि परयौ चढ़ि कदम तैं खबरि न करौ सबेर-५८९।
उ.-ऊधौ जाहु सबेरे ह्माँ तै बैगि गहर जनि लावहु-३३४०।
उ.-जो कोऊ तेरौ हितकारी सो कहै काढ़ि सबेरौ- १-३१९।
उ.-मुरली जेंत बिषान देखिए श्रृंगी बेर-सबेरौ-२९६५।
उ.-(क) सुख मैं आइ सबै मिलि बैठत रहत तहूँ दिसि घेरे-१-७९। (ख) ता दिन तेरे तन तरुवर के सबै पात झरि जैहैं-१-८६।
सारा, समस्त (परिमाणवाचक)।
उ.-जिती हुती जग मैं अवमाई सो मैं सबै करी- १-१३०।
कच्चा और ताजा (फूल, फल आदि)।
मुहा.-सब्ज बाग दिखाना- (किसी स्वार्थ से) बड़ी बड़ी आशाएँ दिखाना।
उ.- (क) ताकी सरन रहयौ क्यौं भावैं सब्द न सुनिऐ कान-१-१३४। (ख) यहै सब्द सुनियत गोकुल मैं-६२२।
वर्णों या अक्षरों से बनी सार्थक ध्वनि।
संत-महात्माओं के वचन या पद।
शिक्षा या उपदेश-प्रधान उक्ति।
मुहा.- (किसी का) सब्र पड़ना - अत्याचारी को, अत्याचार सहन करनेवाले के धैर्य या उसकी ʽआहʼ का कुफल भोगना पड़ना। सब्र कर बैठना (लेना) - हानि, अनिष्ट या अत्याचार को सह लना। सब्र समेटना- ऐसा अन्याय या निर्दयता का कार्य करना कि दूसरे की ʽआहʼ का कुफल भोगना पड़े।
विषय-परिचायक शब्द या उपवाक्य जो लेख या प्रबंध के आरंभ में लिखा जाय।
मुहा.- शील तोड़ना - बेमुरौव्वती दिखाना। आँखों में शील न होना - लज्जा, संकोच का भाव न होना, बेमुरौव्वत होना।
अच्छे आचरण या चरित्रवाला।
उ.-डासन काँस कामरी ओढ़न बैठन गोप-सभा ही-२२८५।
वह संस्था या समूह जो विषय-विशेष पर विचार करने के लिए बनायी गयी हो।
उ.-(क) सभा मँझार दुष्ट दुस्सासन द्रौपदि आनि धरी-१-१६। (ख) द्रुपद-सुताहिं दुष्ट दुरजोधन सभा माँहिं पकरावै-१-१२२।
उ.-चिरजीवौ मेरौ लाड़िलौ, मैं भई सभागी-१०-६८।
छोटों को पुकारने का एक शुभ संबोधन।
उ.-कहाँ चली उठि भोरही सोवै न सभागी-१५४१।
वह स्थान जहाँ सभा या समिति की बैठक हो।
उ.-(क) अहो बसुदेव जाहु लै गोकुल तुम हौ परम सभागे-१०-४। (ख) रसिक रासिका को सुख लूट्यौ स्याम सभागे-२२७५।
जो सभा या समाज में सम्मिलित होकर चतुराई से बात कर सके।
सभा-समाज में बैठकर रुचिकर बातें करने की चतुरता या योग्यता।
वह स्थान जहाँ सभा-समाज की बैठक हो।
देव-मंदिरों में वह स्थान जहाँ बैठकर भक्तजन कीर्तन आदि करते हों।
उ.-पोच-पिसुन लस दसन सभासद प्रभु अनंग मंत्री बिन भीति-२२२३।
उ.-अखुटित रहत सभीत ससंकित, सुकृत सब्द नहिं पावैं-१-४८।
वे बातें जो किसी व्यक्ति, जाति या राष्ट्र के सुजन, शिष्ट, शिक्षित और उन्नत होने की सूचक हों।
उ.-(क) अम्रित ता सम नाहीं-१-२४१। (ख) आपु बिषमत तजि दोउ सम भै बानक ललित त्रिभंग-३३२८।
जिसमें कहीं उतार-चढ़ाव या हेर-फेर न हो।
जिसका तल ऊबर-खाबड़ न होकर बराबर या चौरस हो।
उ.-धनुष सों टारि पर्वत किए एक दिसि, पृथ्वी सम करि प्रजा सब बसाई-४-११।
जिस (संख्या) को दो से भाग करने पर शेष कुछ न बचे।
उ.-(क) जौ पै राम-भक्ति नहिं जानी, कह सुमेर सम दान किए-१-८९। (ख) रंक सुदामा कियौ इंद्र सम-१-९५। (ग) देखियत ह्वै रज्वा सम डारयौ-५७४। (घ)नहिं तिहुँ भुवन कोउ सम तुम्हारे-१० उ.-३१।
संगीत में वह स्थान जहाँ लय के विचार से गति की समाप्ति होती है और गायक या वादक का सर अपने आप हिल जाता है।
अंतः करण तथा इंद्रियों का संयम।
उ.-गो कहयौ, हरि बैकुंठ सिधारे, सम-दम उनहीं संग पधारे-१-१२९०।
जो (दो या कई) एक ही समय में हुए हों।
बिखरी चीजें यथाक्रम रखना-या सजाना।
उ.-(क) भोग-समग्री भरे भँडार-९-८। (ख) छाक-सामग्री सबै जोरि कै वाकैं कर दै तुरत पठाई-४५७।
(सं. सम्बुद्ध, प्रा. समुज्झ, समुंझ)
समझदार होने का भाव, बुदिधमानी।
पढ़ या सुनकर हृदयंगम करना।
विचार करके ध्यान में लाना।
किसी परिचित या ज्ञात विषय में अधिक अनुमान करना।
दूसरे को समझने को प्रवृत्त करना।
समझने या समझाने की क्रिया या भाव।
आपस में ही होनेवाला निबटारा।
जिसकी तह या तल बराबर हो, सपाट, चौरस।
सम या समान होने का भाव, बराबरी, समानता।
उ.-कोटि स्वर्ग सम सुखउ न मानत हरि समीप समता नहिं पावत-३२४२।
उ.-अचिहिं करी उन अंपतई हरि सों समताइ-पृ. ३२३ (२०)।
उ.-तो समतुल कन्या किन उपजी जो कुल सत्रु न मारथौ-९-१३४।
महत्व की दृष्टि से समान रखना।
दोनों पलड़ों या पक्षों को समान रखना।
समर्पित करते ही, सौंपते ही।
उ.-(क) तनया जा मातनि कौं समदत नैन नीर भरि आए-९-२७। (ख) समदत भई अनाहत बानी कंस कान झनकारा-१०-४।
आनंद या उमंगमें भरक रभेंटना, प्रेमपूर्वक या सप्रेम मिलना।
सबको बराबर या समान समझने या माननेवाला।
उ.-समदरसी है नाम तुम्हारौ-१-२२०।
उ.-यह कहिकै समदे सकल जन नयन रहे जल छाई-१० उ.-१२३।
समदर्शी की दृष्टि या भावना।
उ.-जो समदृष्टि आदि निर्गुन पद तौ कत चित्त चोराए-३२०१।
उ.-ताल पखावज चले बजावत समधी सोभा कौं- १-१५१।
उ.-इहिं भाँति चतुर सुजान समधिनि सकति रति सबसौं करै- १० उ.- २४।
जो किसी के अन्तर्गत या सम्मिलित हो।
छंद जिसके चारो चरण बराबर या समान हों।
जिसकी बुद्धि सुख-दुख, लाभ-हानि आदि की स्थिति में समान रहे।
उ.-(क) बहुरि संध्या समय होन आयौ-७-६। (ख) प्रात समय रवि-किरनि कोंवरी-१०-७३।
उ.-(क) तीनौ पन ऎसे हीं खोए, समय गये पर जाग्यौ-१-७३। (ख) त्रिय-नगन समय पति राखी-५६९।
मुहा.-समय पाइ - सुअवसर या उचित अवसर देखकर। उ.- समय पाइ ब्रज बात चलाई-३४१८। तनेहोंमाद।
अच्छे-बूरे दिन, सुख-दुख के दिन।
उ.-बुधि-बिबेक बिचित्र पौरिया समय न कबहूँ पावैं-१-४०।
उ.-और मित्र ऎसे समया महँ कत पहिचान करैं-१० उ.-७४।
उ.-तिन अँकनि कोउ फिरि नहिं बाँचत गत स्वास्थ समयौ-१-२९८।
उ.-(क) लगन नहिं देत कहूँ समर-आँच ताती-१-२३। (ख) बहुत सनाह समर सर बेधे-१-२७८।
कोई काम करने की शक्ति या योग्यता रखनेवाला।
उ.-(क) अब यह बिथा दूरि करिबे कौं और न समरथ कोई-१-११८। (ख) सूर स्याम गुरु ऎसौ समरथ, छिन मै लै उधरै-६-६।
उ.-(क) सिंह कौ भच्छ सृगाल न पावै, हौं समरथ की नारी-९-७९। (ख) कै यह ठौर लियौ कहुँ आइ रहयौ कोऊ समरथ नर-१० उ.-७०।
समर्पण करना, भैंट में देना।
भेंट में दिये, अर्पित किये।
उ.-जिन तन-मन-धन मोहिं प्रान समरपे सील-सुभाव बढ़ाई-९-७।
जो युद्ध में मारा गया हो, जिसे वीरगति मिली हो।
युद्ध-भूमि में घायल होकर गिरने की स्थिति।
युद्ध, क्षेत्र में घायल होकर गिरने की अवस्था।
उ.-पौढ़े कहा समर-सेज्या सुत-१-२९।
लड़ाई का मैदान, युद्ध-क्षेत्र।
समर-भूमि में युद्ध की इच्छा से उपस्थित वीर योद्धा।
उ.-समरारी को कुयस, कुयस की प्रगट एक ही काल-२०९७।
कोई काल करने की शक्ति मा योग्यता रखनवाला।
उ.-ब्रह्म पूरन अकल कला तें रहित ए हरता-करता समर्थ और नाहीं-२५५६।
समर्थ होने का भाव या धर्म।
किसी विचार या मत से सहमत होकर उसका पोषण करना।
किसी को आदरपूर्वक या भेंट-स्वरूप कुछ देना।
श्रद्धा या भक्तिपूर्वक कुछ अर्पित करना।
अपना अधिकार, दायित्व आदि दूसरे को सौपना।
विवाद, युद्ध आधि से बचने के लिए अपने को विपक्षी या किसी अधिकारी के हाथ में सौप देना।
दान देते या अर्पित करते है।
उ.-एकनि कौं गौ-दान समर्पत-१०-२५।
उ.-तंदुल घिरत समर्पि स्याम कौं संत परोसौ करतौ-१-२९७।
उ.-तनु आत्मा समर्पित तुम कहँ पाछे उपजि परी यह बात-१० उ.-११।
उ.-सबै समपों सूर स्याम कौ, यह साँचौ मत मेरौ-१-२६६।
सदा बना रहनेवाला या नित्य संबंध।
छंद जिसके चारो चरण समान वर्ण या मात्रावाले हों।
जो समास द्वारा मिलाया गया हो, समासयुक्त।
छंद आदि का वह चरणार्द्ध जो नया और स्वतंत्र छंद बनाने के लिए कवियों को दिया जाता है।
दिये हुए चरणार्द्ध के आधार पर स्वतंत्र छंद बनाना।
मुहा.- समा बँधना- (संगीत, काव्य-पाठ आदि का) इतनी उत्तमता से संपन्न होना कि उपस्थित जनसमूह तन्मय हो जाय।
उ.- (क) सनै सनै बिधि-लोकहिं जाइ, ब्रह्या सँग हरि पदहिं समाइ-३-१३। (ख) ताहि सुनौ जो प्रीति कै सो हरि पदहिं समाइ-१८६१।
उ.- जाइ समाइ सूर वा निधि मैं बहुरि न उलटि जगत में नाचै-२-११।
उ.- मंदिर में गए समाइ, स्यामल तनु लखि न जाइ-१०-२७५।
कहा-समाइ-कैसे समा सकता या सहा जा सकता है ?
उ.-पलक वोट निमि पर अनखाती यह दुख कहा समाइ-३४४४।
जमा याइकटठा किया हुआ, एकत्र, संचित।
सबका समूह, ʽव्यक्तिʼ का विपरीतार्थक।
उ.- सूरदास सोई समष्टि करि व्यष्टिभाव मन लाव-२-३८।
उ.- (क) सूरदास सिसुता-सुख जलनिधि कहँ लौं कहौं, नहिं कोउ समसरि-१०-१२०। (ख) अपनी समसरि और गोप जे तिनको साथ पठाये-५८३।
उ.- दुहन देहु कछु दिन अरू मोकौं तब करिहौ मो समसरि आई-६६८।
जो (दो या कई) एक ही समय में हुए हों।
सकै न समाइ-भरा नहीं जा सकता है।
उ.-सूर-दास प्रभु सिमुता कौ सुख सकै न हृदय समाइ- १०-१७८।
गयो समाइ-लीन हो गया, पच गया, मिल गया।
उ.-वह्वल देखि जननि व्याकुल भइ अंग विष गयौ समाइ-७५८।
उ.- ह्याँ के वासी अवलोकत हौं आनँद उर न समाउँ-९-१६५।
उ.- अंग सुभग सजि, ह्वै मधु मूरति नैननि माँह समाऊँ-१०४९।
उ.- पुनि सबको रचि अंड आपु मैं आपु समाए-२-३६।
उ.- अति बिसाल चंचल अनियारे हि-हाथनि न समाए-६७५।
वह सिद्धांत जो समाज में सब प्रकार की समानता स्थापित करनेवाला हो।
ʽसमाजवादʼ के स्द्धांत में विश्वास रखनेवाला।
नर्तकी के साथ तबला, सारंगी आदि बजानेवाला बर्ग।
उ.-(क) अमर मुनि फूले सुख न समात मुदित मति-१०-६। (ख) अति अनुराग संग कमला तन पुलकित अंग न समात हियौ-१०-१४३।
उ.-ठाढ़ो थक्यो उतर नहिं आवै लोचन जल न समात-२४५७।
उ.-(क) संपति घर न समाति-१०-३६। (ख) विद्यमान बिरह-सूल उर में जु समाति-२५४३।
उ.-यह ब्यापार वहाँ जु समातो हुती बड़ी नगरी-३१०४।
एक असुर जो प्रहलाद का पौत्र और निशुंभ का भाई था; यह दुर्गा द्वारा मारा गया था।
कृष्णद्वैपायन के पुत्र जिनका राजा परीक्षित को दिया हुआ मोक्ष-धर्म का उपदेश आज ‘श्रीमद्भागवत’ के रूप में उपलब्ध है।
वह नली या नलनी जो तोते को पकड़ने के लिए इस प्रकार बनायी जाती है कि उसके बैठते ही घूम जाती है और तोता उलटकर नीचे आ जाता है एवं उड़ने की शक्ति भुला देने के कारण पकड़ लिया जाता है।
धन्यवाद के रूप में दिया जानेवाला धन।
कामदेव जिसका वाहन तोता माना गया है।
कहीं से आया हुआ (अतिथि आदि)
उपस्थित या प्रस्तुत (प्रसंग आदि)।
उ.- ना हरि-भक्ति न साधु-समागम रह्यो बीच ही लटकैं-१-२९२। (ख) सूरदास प्रभु संत-समागम आनँद अभय निसान बजावै-१-२३३। (ग) धरनि तृन तनु रोम पुलकित पिय समागम जानि-२८२८।
उ.- प्रथम समागम आनँद-आगम दूलह वर-दुलहिनी दुलारी-१०३-३९।
उ.- (क) पूछे समाचार सति भाएँ-१-२८४। (ख) काहू समा चार कछु पूछे-४-५। (ख) श्री रघुनाथ और लछिमन के समाचार सब पाये-९-९०।
एक ही कार-बार, आचार-विचार या समस्या के लोगों का वर्ग या समुदाय।
उ.-कछु डर नाहिंन जिय मैं डरपत अति आनंद समाज-सारा- ४२।
उ.-नहिं पावत जो रस योगीजन तब तब करत समाधा-१२३६।
किसी का संदेह, आशंका आदि दूर करने को दिया जानेवाला उत्तर जिससे उसे संतोष हो जाय।
उ.-(क) समाधान सुरगन को करिकै-सारा. २९४। (ख) समाधान सबहिनि को कीन्हो- सारा. ३०१। (ग) तुम हरि समाधान को पठए हमसों कहन सँदेस- ३२३२।
नाटक की मुखसंधि के बारह अंगों में एक जिसमें बीज को ऎसे रूप में पुनः प्रस्तुत किया जाय कि नायक या नायिका का अभिमत पूर्णरूप से स्पष्ट हो जाय।
संदेश, आशंका आदि दूर करके संतुष्ट करना।
ईश्वर के ध्यान में मग्न होना।
उ.- (क) रिषि की कपट-समाधि बिचारि, दियौ भुजंग मृतक गर डारि-१-२९०। (ख) सुचिरुचि सहज समाधि साधि सठ, दीनबंधु करुनामय उर धरि-१-३१२। (ग) सिव समाधि जिहिं अंत न पावैं-१०-३। (घ) जिहिं सुख कौं समाधि सिव साधी-१०-१२८।
योग का चरम फल जो उसके आठ-अंगों में अंतिम है। इसके चर भेद है-संप्रज्ञात, सवितर्क, सविचार और सानंद। इस अवस्था में मनुष्य के चित्त की सब वृत्तियाँ नष्ट हो जाती है, बाह्म जगत से किसी प्रकार का संबंध नहीं रह जाता और अनेक प्रकार की शक्तियों के साथ अंत में कैवल्य की प्राप्ति होती है।
सो अष्टांग जोग कौं करै।¨¨¨¨। क्रम क्रम सौं पुनि करै समाधि। सूर स्याम भजि मिटै उपाधि-२-२१।
प्राणी की वह अवस्था जिसमें उसकी चेतना नष्ट हो जाती है और वह कोई शारीरिक क्रिया नहीं कर पाता।
मृत व्यक्ति की अस्थियाँ या शव गाड़ना।
वह स्थान जहाँ शव या अस्थियाँ गाड़ी जायँ।
रूप, गुण, आकार आदि में एक जैसा, बराबर, तुल्य।
उ.- (क) तुमहिं समान और नहिं दूजै-१-१११। (ख) सुनि थके देव बिमान, सुर-बधु चित्र समान-६२३। (ग) कोमल कमल समान देखियत ये जसुमति के बारे-२५६९।
मुहा.-एक समान-बिलकुल मिलते-जुलते।
समान वर्ण-एक ही स्थान से उच्चरित होनेवाले वर्ण जैसे, त, थ, द, ध।
वे रेखाएँ जो आदि से अंत तक समान अंतर पर ही रहें।
उ.- तिहूँ भूवन भरि नाद समानौ- पृ. ३४७ (५३)।
उ.- (क) गैयन भीतर आइ समान्यौ-२३७३। (ख) सूर उहै निज रूप स्याम कौ है मन माँझ समान्यो-३१२७।
कार्य पूरा या समाप्त करना।
विचार, विवाद आदि से बचने के लिए समाप्ति का आदेश देना या प्रस्ताव करना।
व्याकरण में वह क्रिया जिससे किसी कार्य की समाप्ति सूचित हो।
जो खत्म या पूरा हो गया हो।
किसी चलते हुए कार्य का खत्म या पूरा होना।
सीमा, अवधि आदि का अंत होना।
(अस्तित्व आदि) न रह जाना।
समा जाय, भर जाय, लीन हो जाय।
उ.- जाइ समाय सूर वा निधि मैं बहुरि जगत नहिं नाचै-१-८१।
उ.- तब तनु तजि मुख माहिं समायौ-१-२२६।
किसी वस्तु, अंग आदि के भीतर पहुँचकर भर जाना या लीन हो जाना।
कहीं से आकर उपस्थित होना, पहुँचना।
व्याकरण में किसी शब्द या पद का अर्थ या संबंध स्पष्ट करने के लिए प्रयुक्त किया जानेवाला समानार्थी शब्द या पद।
वह शब्द जिसका अर्थ दूसरे के समान अर्थात् वही हो, पर्याय।
(किसी शब्द या पद के) समान अर्थ रखनेवाला, पर्यायवाची।
समा गयी, भर गयी, लीन हो गयी।
उ.- (क) सूर अगिनि सब बदन समानी-६१५। (ख) कहा करौं, सुन्दर मूरति इन नयननि माँझ समानी-११९८। (ग) बुधी बिबेक बल बचन चातुरी मनहुँ उलटि उन माँझ समानी- पृ. ३३२ (२९)। (घ) नव से नदी चलत मर्यादा सूधी सिंधु समानी-२०४४।
समा गये, भर गये, लीन हो गये।
उ.- (क) कबहुँ अघासुर बदन समाने-४९७। (ख) कोउ बन में रहे दुरि, कोऊ गगन समाने-१२९६। (ग) नैना नैननि माँझ समाने- पृ. ३२७ (६४)। (घ) सो मति मूढ़ कहत अबलनि सों, नहिं सो हृदय समाने-३२१३।
उ.- मन-बच-कर्म पल वोट न भावत, छिन युग बरस समाने-पृ. ३२७ (६४)।
उ.- मन-कृत दोष अथाह तरंगिनि तरि नहिं सक्यौ, समायौ-१-६७।
अच्छी तरह शुरू या आरंभ होना।
धूम-धाम, तड़क-भड़क से होनेवाला कोई उत्सव या आयोजन।
समान अर्थवाला शब्द, पर्याय।
समान अर्थवाला पर्यायवाची।
उ.- गोप-सखा सब बन निहारत उर आनँद न समावत-४७९।
उ.- अधर अरून छबि कोटि बज्र दुति ससि गन रूप समावनो-२२८०।
वह संस्कार या आयोजन जो शिक्षार्थी के शिक्षा समाप्त कर लेने पर, स्नातक होकर उसके लौटने के समय प्राचीन गुरूकुलों में किया जाता था या आधुनिक विश्वविद्यालयो में होता है।
जो समाया हुआ, सम्मिलित या अन्तर्गत हो।
जिसका समावर्तन संस्कार हो चुका हो।
एक वस्तु का दूसरी के अंतर्गत होना।
जो किसी में समाया हुआ या किसी के अंतर्गत हो।
भर जाय, लीन हो जाय, समा जाय।
उ.- (क) आधे मैं जल-वायु समावै।¨¨¨¨। प्रान-वायु पुनि आइ समावै-३-१३। (ख) सूरदास सो प्रेम हरि-हियै न समावै री-६२९।
भली-भाँति देख-भाल कर गुण-दोषों का पता लगाना।
उक्त प्रकार तो ज्ञात गुण-दोषों विवेचना करना।
भली भाँति देख-भालकर गुण-दोषों का पता लगाना।
उक्त प्रकार से ज्ञात गुण-दोषों की विवेचना करना।
वह रचना जिसमें उक्त विवेचना की गयी हो।
समालोचना करनेवाला, समालोचक।
हाथी की कनपटी से बहनेवाला मद।
उ.- वाम कर गहि शुंडि डारिहौं अमरपुर हाँक दै तुरत गज को बँकारे-२५९०।
उ.- भुजा भुज धरत मनो द्विरद शुंडिन लरत उर उरनि भिरे दोउ जुरे मन ते-१७००।
व्याकरण में दो या अधिक शब्दों का संयोग। इसके चार मुख्य भेद हैं- अव्ययी भाव, तत्पुरूष, समानाधिकरण तत्पुरूष या कर्मधारय और द्वंद्व।
समास चिन्ह जो पदों के सामासिक होने का सूचक होता है।
बहुत सी चीजों को इकट्ठा करना।
व्याकरण में द्वंद्व समासका एक भेद।
ʽसमाधिʼ नामक एक अर्थालंकार का दूसरा नाम।
उ.- अतिहिं मगन महा मधुर रस रसन मध्य समाहिं-१-३३८।
समा जाता है, लीन हो जाता है।
उ.- (क) जैसै नदी, समुद्र समाही- पृ. ३१९ (८४)। (ख) ज्यों पानी में होत बुदबुदा पुनि ता माहिं समाही-१० उ.१३१।
हवन-कुंड म जलान की लकड़ी।
एक क्षमाशील ऋषि जिनके गले में परीक्षित ने मरा हुआ साँप डाल दिया था और जिनके पुत्र ने उनको सातवें दिन तक्षक नाग द्वारा डसे जाने का शाप दिया था।
उ.- इक दिन राइ अखेटक गयौ।¨¨¨। रिषि समीक कैं आस्त्रम आयौ।¨¨। दियौ भुजंग मृतक गर डारि-१-२९०।
(दो या अधिक वस्तुओं, राशियों आदि को) समान करने की क्रिया या भाव।
गणित में ज्ञात राशि से अज्ञात का पता लगाने की क्रिया।
यह सिद्ध करना कि अमुक-अमुक राशियाँ या मान समान हैं।
देखना-भालना, जाँच-पड़ताल।
देखने-भालने या जाँच-पड़ताल करने की क्रिया।
ठीक, उचित या न्यायसंगत होने का भाव।
प्रीति या मित्रता-भाव से।
उ.- जिनि पतियाहु मधुर सुनि बातैं लागे करन समीति-३०५४।
उ.- छहौं रस लै समीप सँचरै-१-११७।
उ.- कोटि स्वर्ग सम सुखउ न मानत हरि समीप समता नहिं पावत-३१४२।
उ.- सुभग कर आनन समीपै मुरलिया इहिं भाइ-६२७।
उ.- रघुपति रिस पावक प्रचंड अति सीता-स्वास समीर-९-१५८।
कुछ चीजों का एक में मिलना।
व्याकरण में वह अव्यय जो दो शब्दों, पदों या वाक्यों को परस्पर जोड़ता हो।
ढेर या राशि-रूप में इकट्ठा किया हुआ।
समझाने क्रिया, भाव या उसका प्रभाव।
उ.- छिन छिन सुरति करत जसुमति की परत न मन समुझायो-१० उ.-७८।
समझाने समझाने की क्रिया या भाव।
समझाते-बुझाते हो, प्रबोधते हो।
उ.- मधुकर, हमहीं क्यौं समुझावत-२९८९।
उ.- जैहैं बिगरि दाँत ये आछे तातैं कहि समुझावति-१०-२२२।
उ.- सूर दुष्ट समुझावही त्यौं त्यौं जिय खरई-२८६१।
उ.- ऊधौ, हमैं कहा समुझावहु-३२०६।
उ.- बचन-रचन समुझावै-१-१८६।
समझाता या प्रबोधता है, समझाती या प्रबोधती है।
उ.- (क) सूरदास आपुहिं समझावै लोग बुरौ जिनि मानौ-१-६३। (ख) ऐसौ पुरूषारथ सुनि जसुमति खीझति फिरि समुझावै-४८२।
उ.- (क) रे मन, समुझि सोचि-बिचारि - १-३०९। (ख) बौरे मन, समुझि-समुझि कछु चेत -१-३२२।
समझ लो या लेंगे, जान लेंगे या लो।
उ.- इतने महि सब तात समुझिबी चतुर सिरोमनि नाह-२८६८।
समुझी न परी- समझ में नहीं आई, जान नहीं पाया।
उ.- कौन भाँति हरि कृपा तुम्हारी, सो स्वामी समुझी न परी-१-११५।
उ.- सूरदास समुझे की यह गति, मन ही मन मुसुकायौ-४-१३१।
उ.-कामी होइ काम आतुर तेहि कैसे कै समुझैए-२२७५।
समझाऊँ-बुझाऊँगी, प्रबोधूँगी।
उ.- किहिं बिधि करि कान्हहिं समुझैहौं-१०-१८९।
उ.- मैं अज्ञान कछू नहिं समझ्यौ परि दुख-पुंज सह्यो-१-४६।
उ.- गुन अवगुन की समुझ न संका परि आई यह टेव-१-१५०।
समझता, बूझता या ध्यान में लाता है।
उ.- (क) मगन भयौ माया रस लंपट समुझत नाहिं हटी-१-९८। (ख) जुग जुग जनम, मरन अरू बिछरन, सब समुझत मत-भेव-१-१००।
कोई बात विचार करके ध्यान में लाना।
किसी बात का स्वरूप आदि देखकर तद्विषयक अनुमान या कल्पना करना।
अच्छी तरह बताकर या समझा-बुझाकर।
उ.- मन तोसौं किती कही समुझाइ-१-३१७।
उ.- मानैं नहीं, कितौ समुझाईं-३९१।
उ.-मन मैं सोच न करि तू माता, यह कहिकै समुझाई-९-८०
उ.- सूर चेल बन तें गृह को प्रभु बिहँसत मिलि समुदायो-२३१६।
उ.- आए तीर समुद्र के-९-७२।
किसी विषय के ज्ञान, गुण आदि का बहुत बड़ा आगार।
पृथ्वी जिसकी मेखला समुद्र है।
अगस्त्य मुनि जिन्होंने सारा समुद्र चुल्लुओं से पी डाला था।
उ.- (क) कहि राधा किन हार चुरायो।¨¨¨¨। सुषमा शीला अवधा नंदा वृन्दा यमुना सारि-१५८०। (ख) वै निशि बसे महल शीला के -१९३२। (ग) शीला नाम ग्वालिनी तेहि गहे कृष्न धपि धाई हो-२४४९।
मुह. - शीश धनै- शोक या पछतावे से सिर पीटना। शीश धुनै- शोक या पछतावे से सिर पीटता है। उ.-शीश धुनै दोऊ कर मीड़ै अंतर साँच परयो-१० उ.-६८। शीश नीचे नवाना-लाज या संकोच से सिर झुकाना। शीश निच्यो क्यों नावत-लाज या संकोच से सिर क्यों झुकाता है ? उ.-सूर शीश निच्यो क्यों नावत, अब काहे नहिं बोलत-३१२१।शीश पड़ना-भाग या हिस्से में आना, स्वयं परिणाम भुगतना। शीश परयो-भाग में आया, परिणाम भुगतना पड़ा। उ.-जानि-बूझि मैं यह कृत कीन्हों सो मेरे ही शीश परयो-१६६८।
वह स्थान या महल जहाँ सब ओर शीशे जड़े हों।
एक क्षत्रिय वंश जो मौर्यो के पश्चात मगध साम्राज्य का स्वामी बना।
उ.- (क) त्रिदसपति समुद के मथन के बचन जो सो सकल ताहि कहि कैं सुनाए-८-८। (ख) हम लंकेस-दूत प्रतिहारी समुद तीर कौं जात अन्हाए-९-१२०।
उ.- सुख-संपति दारा-सुत झूठ सबै समुदाइ-१-३१७।
मोती आदि रत्न जो समुद्र से उत्पन्न माने जाते हैं।
ग्रंथादि का प्रकरण या परिच्छेद।
उ.- अधम-समूह उधारन कारन तुम जिय जक पकरी-१-१३०।
उ.- सैल-सिला-द्रम बरषि व्योम चढ़ि सत्रु-समूह सँहारौं-९-१०८।
ज्ञान जो स्मरणशक्ति से प्राप्त हो।
बिना कटा-पिटा, पूरा, सारा।
उ.- (क) सोचति चली कुँवरि घर हीं तैं। खरिक गई समुहाइ-६७९। (ख) सुन्दरि गयी गृह समुहाइ-३९६।
मुकाबला या सामना करती है, सामने आकर अड़ती है।
उ.- माधौ, नैंकु हटकौ गाइ। ¨¨¨¨। ढीठ, निठुर, न डरति काहूँ, त्रिगुन ह्वै समुहाइ-१-५६।
सामने आकर अड़ना, सामना करना।
(किसी के) सामने या सम्मुख आ गये।
उ.- सुनि मृदु बचन देखि उन्नत कर हरषि सबै समुहाने-५०३।
उ.- सूर राधा सहित गोपी चलीं ब्रज समुहाहिं-१३०६।
उ.- (क) सुरत समै के चिह्न राधिका राजत रंग भरे-२११४। (ख) तब तेहि समै आनि ऐरापति ब्रजपति सों कर जोरे-१११८।
जल में समाने या निमज्जित होने की क्रिया या भाव।
उ.- कैसै बसन उतारि धरैं हम कैसैं जलहिं समैबौ-७७९।
उ.- फूँकि फूँकि जननी पय प्यावति, सुख पावति जो उर न समैया-१०-२२९।
उ.- जिन पै ते लै आए ऊधौ, तिनहिं के पेट समैहै-३१०५।
उ.- तजि अकास पिय भौन समैहौं-१२०७।
उ.- अब वहि देस नंदनंदन कहँ कोउ न समो जनावत-२८३५।
रही समोई - समा गयी, लीन हो गयी।
उ.- कहा कहौं कछु कहत न आवै तन मन रही समोई-३१०३।
समझा-बुझाकर शांत करना या उचित मार्ग पर लाना।
उ.- ठानी कथा प्रबोधि तबहिं फिरि गोप समोधे-३४४३।
(पकवान) जिसमें मोयन मिला हो, जो (पकवान) मोयन मिलाने से बहुत मुलायम हो गया हो।
उ.- तातौ जल आनि समोयौ अन्हवाइ दियौ, मुख धोयौ-१०-१८३।
मिल गया, लीन या विलीन हो गया।
उ.- जज्ञ समय सिसुपाल सुजोधा अनायास लै जोति समोयौ-१-५४।
मुहा. गरद समोयौ- धूल में मिल गया, नष्ट हो गया। उ.- सौ भैया दुरजोधन राजा, पल मैं गरद समोयौ-१-४३।
मुहा.- समौ गए तें - उपयुक्त समय या अवसर बीत जाने पर। उ.- (क) सुनि सुंदरि यह समौ गए तें पुनि न सूल सहि जैहै-२०३३। (ख) अब काहे जल मोचत सोचत समौ गए तें सूल नई-२५३७। समौ पहिचान- उपयुक्त समय या अवसर देखकर। उ.- करिये बिनती कमलनयन सों सूर समौ पहिचान-२५२२।
साहित्य में किसी भूली बात का याद आना जो एक संचारी भाव है।
प्रियतम संबंधी बातों का याद आना जो पूर्वराग की दस अवस्थाओं में एक है।
उ.- समृत-बेद-मारग हरि-पुर कौं तातौं लियौ भुलाई-१-१८७।
बिखरी हुई चीजों को इकट्ठा करना।
उ.- (क) अस्व समेत बभ्रु-बाहन लै सुफल जज्ञ-हित आए-१-२९। (ख) बल समेत नृप कंस बोलाए-२५६८। (ग) गज समेत तोहि डारौं मारी-२५८९।
मिलने या मिलाने की क्रिया।
सम्मुहँ, सम्मुहें, सम्मुहों, सम्मुहौं
जिसकी राय मिलती हो, सहमत।
उ.- सोचि-विचार सकल स्रुति सम्मति, हरि तैं और न आगर-१-९१।
प्रस्ताव या विचार के पक्ष में दी जानेवाली अनुमति।
जिसका सम्मान किया गया हो।
जिसका सब सम्मान करें, प्रतिष्ठित।
एक ऋषि जो दैत्यों के गुरू थे।
वृहस्पतिवार और शनिवार के बीच का दिन।
मोहित या मुग्ध करने की क्रिया।
एक प्राचीन-अस्त्र जिससे शत्रु-पक्ष को मोहित कर लिया जाता था।
उ.- तन की सुधि-सम्हार कछु नाहीं-७९९।
दीन्ही बात सम्हार - बात सुधार या बना दी।
उ.- हीरा जनम दियौ प्रभु हमकौं, दीन्ही बात सम्हार-१-१९६।
(हिं. सम्हारना, सम्हालना)
उ.- पछिले कर्म सम्हारत नाहीं, करत नहीं कछु आगैं-१-६१।
ठीक या व्यवस्थित रखती है।
(हिं. सम्हारना, सम्हालना)
उ.- आनँद उर अंचल न सम्हारति सीस सुमन बरसावति-१०-२३।
बुरी दशा में जाने से बचाती या रक्षा करती है।
(हिं. सम्हारना, सम्हालना)
उ.- पद-रिपु पट अँटक्यौ न सम्हारति उलट न पलट खरी-६५९।
ʽसम्हालनेʼ की क्रिया या भाव।
सम्हारन लागे- समेटने, बटोरने या इकट्ठा करने लगे।
उ.- मरती बेर सम्हारन लागे जो कछु गाड़ि धरी-१-७१।
किसी पुरानी या भूली हुई बात का स्मरण हो आना जो एक संचारी भाव माना गया है।
प्रियतम के संबंध में पुरानी बातों का रह-रहकर याद आना जो पूर्वराग की दस अवस्थाओं म एक है।
वे हिंदू धर्मशास्त्र जिनकी रचना वेदों का स्मरण-चिंतन करके की गयी थी।
सम्हरना, सम्हरनो, सम्हलना, सम्हालनो
किसी बोझ आदि का रोका या कर्तव्य आदि का निर्वाह किया जा सकना।
सम्हरना, सम्हरनो, सम्हलना, सम्हालनो
आधार या सहारे पर रुका या टिका रहना।
सम्हरना, सम्हरनो, सम्हलना, सम्हालनो
सम्हरना, सम्हरनो, सम्हलना, सम्हालनो
सम्हरना, सम्हरनो, सम्हलना, सम्हालनो
रोग से छूटकर स्वस्थता प्राप्त करना।
सम्हरना, सम्हरनो, सम्हलना, सम्हालनो
कामदेव के पाँच बाणों में एक।
वह ज्ञान जो स्मरणशक्ति से प्राप्त होता रहता है।
बुरी दशा में जाने से बचाना।
पालन-पोषण या देखरेख करना।
ठीक या व्यवस्थित रखना, अस्तव्यस्त न होने देना।
(हिं. सम्हारना, सम्हालना)
उ.- अपनौ बिरद सम्हारहुगे तौ यामैं सब निबरी-१-१३०।
(हिं. सम्हारना, सम्हालना)
मुहा.- सुरति सम्हारि होश में आओ, सचेत या सावधान हो जाओ। उ.- भली भई अबकैं हरि बाँचे अब तौ सुरति सम्हारि-१०-७९।
(हिं. सम्हारना, सम्हालना)
उ.- बातैं दूनी देह धरी, असुर न सक्यौ सम्हारि-४३१।
(हिं. सम्हारना, सम्हालना)
उ.- ज्यौं बालक अपराध सत जननी लेति सम्हारि-४९२।
(हिं. सम्हारना, सम्हालना)
मुहा.- लैहैं सम्हारि - रक्षा कर सकेगा। उ.- सूर कौन सम्हारि लैहै चढ़यौ इंद्र प्रचारि-९५०। नाहिंन परत सम्हारि- धैर्य नहीं रह जाता, धीरज छटने लगता है। उ.- सूर प्रभु ब्रत देखि इनको नाहिंन परत सम्हारि-७७७।
(हिं. सम्हारना, सम्हालना)
उ.- अंबर हरत द्रुपद-तनया की दुष्ट-सभा मधि लाज सम्हारी-४९२।
(हिं. सम्हारना, सम्हालना)
नहिं सके सम्हारी- मनोवेग की रोक नहीं सके, अधीर या द्रवित हो गये।
उ.- थर थर अंग कँपति सुकुमारी। देखि स्याम नहिं सके सम्हारी-७९९।
सचेत या सावधान हुए, ध्यान दिया।
(हिं. सम्हारना, सम्हालना)
उ.- देवबानी भई जीत भई राम की ताउ पै मूढ़ नाहीं सम्हारे-१० उ.-३३।
रक्षा करता है, बचाता या सुधारता है।
(हिं. सम्हारना, सम्हालना)
उ.- हरि तोहिं बारंबार सम्हारै-२०३८।
सम्हालकर, सचेत या सावधान होकर।
(हिं. सम्हारना, सम्हालना)
उ.- तब झुकि बोली ग्वालि बात किन कहौ सम्हारै-२९९०।
सम्हारो, सम्हारौ, सम्हालो, सम्हालौ
(हिं. सम्हारना, सम्हालना)
उ.- लोटत पीत पराग कीच में नीच न अंग सम्हारो-२९९०।
सम्हारथो, सम्हारथौ, सम्हाल्यो, सम्हाल्यौ
बचाया, रोका, रक्षा की, सँभाला।
(हिं. सम्हारना, सम्हालना)
सम्हारथो, सम्हारथौ, सम्हाल्यो, सम्हाल्यौ
नहिं जात सम्हारयौ - बचा नहीं सका, रोक या सँभाल नहीं सका।
उ.- निरतत पद पटकत फन-फन-प्रति, बमत रूधिर, नहिं जात सम्हारयौ-५६४।
उ.- (क) देखि सयन-गति त्रिभुवन कंपै, ईस बिरंचि मावै-१०-६५। (ख) छीरसमुद्र सयन संतत-३९२।
उ.- (क) ब्याकुल रिस तन देखि कै सब गयौ सयान-२२६९। (ख) देखौं सकल सयान तिहारो लीने छोरि फटके-३१०७।
उ.- (क) तब लगि सबै सयान रहै-६४६। (ख) अब यह कौन सयान बहुरि ब्रज जा कारन उठि आए हो-२९८६।
उ.- नाहिनैं कछु सयान ज्ञान में इह नीके हम जानैं-३२११।
उ.- एतो बालक अजान देखो, उनके सयान कहा-२६०४।
उ.- तेरे तनक मान मोहन के सबै सयानप भूले-२-७५।
उ.- (क) बाँधन गए, बँधायौ आपुन, कौन सयानप कीन्हौ-८-१५। (ख) सूरदास बिरही क्यौं जीवै कौन सयानप एहू-३३८२।
पूर्ण या परिपक्व अवस्था की, वयस्क।
उ.- भली बुद्धि तेरैं जिय उपजी बड़ी बैस अब भई सयानी-३६८।
उ.- (क) औरनि सों दुराव जो करती तौ हम कहतीं भली सयानी-१२६२। (ख) तुम इह करति सबै वह जानति, हम सब तैं वह बड़ी सयानी-१२८४। (ग) जिनि सोचहु सुखमान सयानी-२८५३।
उ.- लोग सब कहत सयानी बातैं-२७१३।
पूर्ण या परिपक्व अवस्था के, वयस्क।
उ.- (क) द्वै बालक बैठारि सयाने, खेल रच्यौ ब्रज-खोरी-६०४। (ख) गोप-बालक कछु सयाने, नंद के सुत बाल-६१०। (ग) सूर स्याम अब होहु सयाने बैरिनि के मुख खेहु-१००४। (घ) रूठेहिं आदर देत सयाने, इहै सूरज सगाइए-१६८८।
उ.- (क) जा जस कारन देत सयाने तन-मन-धन सब साजु-२८५१। (ख) सूर सपथ दै ऊधौ पूछो इहिं ब्रज कौन सयानै-३२१९।
उ.- और काहि बिधि करौं तुमहिं तै कौन सयानौ-४९२।
चतुरतापूर्ण, बुद्धिमानी का।
उ.- कीजै कछु उपकार परायो यहै सयानो काज-२८५१।
उ.- चूक परी मोको सबही अँग कहा करौं गई भूलि सयान्यो-१४६०।
उ.- मानहु मकर सुधा-सर क्रीड़त-६४५।
उ.- (क) सूरदास सर लग्यौ सचानहिं-१-९७। (ख) धर्म कहैं सर-सयन गंग-सुत तेतिक नाहिं सँतोष-१-२१५।
उ.- (क) ब्रज-जुवती ब्रजजन ब्रजवासी कहत स्याम सर कौन करै-९८९। (ख) कहाँ स्याम की तुम अर्धागिनि, मैं तुम सर की नाहीं-२९३७।
मुहा.- (किसी का) सूर पूजना- (किसी की) बराबरी का सकना, (किसी के) समान हो सकना।
मुहा.- सर (तक) पहुँचाना- ठिकाने, हद या चरम सीमा तक पहुँचाना।
मुहा.- सर करना- (१) वश में करना, दबाना। (२) खेल में हराना या पराजित करना।
ऐसा अवसर जो कार्य-विशेष के उपयुक्त न हो।
उ.- सेवा यहै नाम सर-अवसर जो काहुहिं कहि आयो-१-१९३।
मुहा.- सर-अवसर न जानना (देखना या समझना)-यह न सोचना कि अमुक कार्य के लिए कोई अवसर उपयुक्त या अनुकूल है या नहीं। सर-अवसर नहिं जान्यो- यह न समझा कि अमुक कार्य के लिए उपयुक्त या अनुकूल अवसर है या नहीं। उ.- नृप सिसुपाल महापद पायौ, सर-अवसर नहिं जान्यो।
उ.- साँटी दीन्हीं सर-सर-३७३।
(काम) हो सकता या चल सकता है, पूरा पड़ सकता है।
उ.- आगैं बृच्छ फरै जो बिष-फर, बृच्छ बिना किन सरई-१०-४।
उ.- पुष्य नक्षत्र नौमि जु परम दिन लगन शुद्ध शुक्रवार- सारा. १६०।
जिसमें किसी प्रकार की मिलावट न हो, खालिस।
ʽसरपतʼ की तरह की एक वनस्पति जिसकी छड़ें गाँठदार होती हैं।
ʽसरकनेʼ की क्रिया या भाव, चलना, खिसकना।
उ.- बारंबार सरक मदिरा की अपरस रटत उधारे-२९९०।
शासन या नियंत्रण न मननेवाला।
सरकि रही- एक ओर को खिसक या हट रही है।
उ.- सूरदास मदन दहत पिय प्यारी सुनि ज्यों क्यों कहयो, त्यों त्यों बरू उतकों सरकि रही-२२३६।
वह कागज जिस पर किराये, लेनदेन आदि की शर्तें लिखी हों।
उ.- मोकौं पंथ बतायौ सोई नरक की सरग लहौं-१-१५१।
(सं. स्वर्ग + हिं. त्रिया)
(सं. स्वर्ग + हिं. त्रिया)
संगीत में सात स्वरों का समूह या उनके चढ़ाव-उतार का क्रम।
उ.- प्रफुलित सरज सरोवर सुंदर-२८५३।
बनी (हैं), रची गयी (हैं)।
उ.- बिरह सहन को हम सरजी है।
जिलाने या जीवन-शक्ति देनेवाला।
प्रसन्न या प्रफुल्ल करनेवाला।
नायक या प्रधान का पद, कार्य का भाव।
उ.- (क) इहिं कलिकाल-ब्याल-मुख ग्रासित सूर सरन उबरै-१-११७। (ख) सरन आए की प्रभु लाज धरिए-१-१८०। (ग) पटपटात टूटत अँग जान्यौ सरन-सरन सु पुकारयौ-५५६।
उ.- इहिं बिधि भ्रमत सकल निसि दिन गत कछु न काज सरत-१-५५।
(हिं. बरतना + अनु. सरतना)
मुहा.- सरता बरता करना - किसी तरह आपस में ही बाँट-बँटाई करके काम चला लेना।
उ.- ब्रज प्राची राका तिथि जसुमति, सरद सरस रितु नंद-१३३१।
ʽसरवाʼ फल के, हलका हरापन लिए हुए, पीले रंग का।
हल्का हरापन लिये पीला रंग।
उ.- तुम अपने चित सोचत जा को असुरन के सरदार-२३-७७।
सरनगत भऐं- शरण में जानेपर।
उ.- सूरदास गोपाल सरनगत भऐं न कौ गति पावत-१-१८१।
काम चलना, उद्देश्य सिद्ध होना, पूरा पड़ना।
किसी के काम या उपयोग में आना।
किया जाना, निबटना, संपादित होना।
निभना, पटना, परस्पर सद्भाव या प्रेम-भाव रहना।
उ.- (क) सूर कुटिल राखौ सरनाई-१-२०१। (ख) इतनी कृपा करी नहिं काहू, जिनि राखे सरनाई-५५७।
आश्रय या रक्षा में लेनेवाले, शरण में रखनेवाले।
उ.- नमस्कार करि बिनय सुनाई, राखि राखि असरन-सरनाई-६-५।
वृहस्पतिवार और शनिवार के बीच का दिन या वार।
एक ऋषि जो महर्षि भुगु के पुत्र और दैत्यों के गुरू थे। उनकी पुत्री देवयानी राजा ययाति को ब्याही थी। उन्होंने देवगुरू वृहस्पति-पुत्र कच को संजीवनी विद्या सिखायी थी।
अमावास्या के बाद प्रतिपदा से पूर्णिमा तक का पक्ष जिसमें प्रतिदिन चंद्रकला के बढ़ते रहने से रात उजेली होती है।
वह परकीया नायिका जो शुक्ल पक्ष या चाँदनी रात में प्रियतम से मिलने संकेतस्थल पर जाती है।
उ.- माली मिल्यो माल शुचि लैकै-२६४३।
उ.- (क) सरनागत की ताप निवारी-१-१२८। (ख) अर्जुन कहयौ, जानि सरनागत, कृपा करौ ज्यौं पूर्व करी-१-२६८।
उ.- (क) ब्रज-जुवती सब देखि थकित भई सुन्दरता की सरनी-१०-१२३।
उ.- बलि सुरपति कौं बहु दुख दयौ, तब सुरपति हरि-सरनैं गयौ-८-७।
पंचों में प्रधान, पंचायत का सभापति।
सरपंजर, सरपँजरा, सरपिंजरो, सरपिंजरौ
उ.- अर्जुन तब सर-पिंजर कियौ। पवन सँचार रहन नहिं दियौ-ना. ४३०९।
घोड़े की तेज चाल की तरह दोड़ते हुए।
एक तरह की घास जिससे छप्पर आदि छाये जाते हैं।
उ.- सूधी कहै सबन समुझावत हे साँचे सरबंगी-२९९७।
उ.- (क) ताकी सरबरि करै सो झूठौ, जाहि गोपाल बड़ौ करै-१-०३४। (ख) जब लगि जिय घटअंतर मेरैं कौ सरबरि करि पावै-१-२७५। (ग) खगपति सौं सरबरि करी तू-५८९।
उ.- दिननि हमहूँ तुम सरबरी, तुव छवि अधिकाई-पृ. ३१७ (६१)
सारी संपत्ति और जमा-पूँजी, सब कुछ।
उ.- (क) सिव कौ धन संतनि कौ सरबस, महिमा बेद-पुरान बखानत-१-११४। (ख) सरबस लै हरि धरयौ सबनि कौ-६५४।
पशु (हाथी, शेर, ऊँट, बानर आदि)।
उ.- (क) सूर सुहरि अब मिलहु कृपा करि बरबस सरम करत हठ हम सन-१६८७। (ख) रिसन उठी भहराइ झटकि भुज छवत कहा पिय सरम नहीं-२१४२।
देवताओं की एक कुतिया जिसका उल्लेख ऋग्वेद में है।
उ.- (क) तुम सरबज्ञ सबै बिधि समरथ असरन-सरन मुरारि-१-१११। (ख) सूर स्याम सरबज्ञ कृपानिधि-१-१२१।
उ.- (क) सेवक करै स्वामि सों सरबर इनि बातनि पति जाइ-९८५। (ख) मूरख, उन तुम सरबर करै-१० उ.-३२।
व्यर्थ की या बहुत बढ़-चढ़कर की जानेवाली बात।
उ.- कृष्न-पद-मकरंद पावन और नहिं सरबरन-१-३०८।
(किसी की) बराबरी या समता करना।
उ.- (क) नासिका सुक नयन खंजन कहत कवि सरमाइ-१२९४। (ख) उरज परसत स्याम सुन्दर नागरी सरमाइ-१८४९।
उ.- यह सुनि अमर गए सरमाई-१०६५।
उ.- तुम तौ अति ही करत बड़ाई, मन मेरो सरमात-१४२४।
उ.- बेसरि नाउँ लेत सरमानी तब राधा झहरानी-१५३४।
उ.- हम तौ आज बहुत सरमाने मुरली टेरि बजायो-१७००।
दानवराज वृषपर्वा की पुत्री जो दानव-गुरू शुक्राचार्य की पुत्री देवायानी की प्रसन्नता के लिए उसकी दासी बनकर राजा ययाति के यहाँ गयी थी और राजा से जिसके तीन पुत्र उत्पन्न हुए थे।
उ.- कहयौ, सरमिष्ठा, सुत कहँ पाए ? उनि कहयौ, रिषि किरपा तैं जाए-९-१७४।
(सं. सदृश, प्रा. सरिस+वर)
सरयू नदी के उस पार का प्रदेश।
उ.- सूर स्याम राधा की महिमा रहै जानि सरमैहौ-१४९८।
उत्तर भारत की एक प्रसिद्ध नदी जिसका नाम ऋग्वेद में हैं और जिसके किनारे पर प्राचीन अयोध्या नगरी बसी थी।
उ.- घटा घनधोर घहरात अररात दररात सररात ब्रज लोग डरपे-९४६।
वेग से हवा। बहने या उसमें किसी चीज के वेग से चलने का शब्द होना।
किसी चीज, काम या बात के सब भाग या अंग।
अंधक मुनि का पुत्र जो माता-पिता को बहँगी में बिठाकर तीर्थ-यात्रा कराने के कारण अपनी मातृ-पितृ-भक्ति के लिए प्रसिद्ध है।
उ.- (क) सरवर नीर भरै, भरि उमड़ै-१-२६५। (ख) मानौं चारि हंस सरवर तैं बैठे आइ सदेहियाँ-९-१९।
(सं. सदृश, प्रा. सरिस+वर)
उ.- सूरदास हयाँ की सरवरि नहिं कप्लबृच्छ सुरधेनु-४९१।
उ.- (क) ह्वै गयौ सरस समीर दुहूँ दिसि-९५७। (ख) सरस बसन तन पोंछि स्याम को-१०-२२६।
उ.- (क) संबत सरस बिभावन-१०-८६। (ख) ब्रजप्राची राकातिथि जसुमति सरद सरस रितु नंद-१३३१। (ग) स्यामा निसि में सरस बनी री-१५९९।
जिसमें भाव जगाने की शक्ति हो, भावपूर्ण।
फलों के सरसों बराबर छोटे दाने या अंकुर जो पहले दिखायी देते हैं।
बढ़ना, वृद्धि या उन्नति को प्राप्त होना।
उ.- .... नारि आतुरी गई वन तीर तनु शुद्धि हेती-२०५६।
वह कृत्य जो अशुभ व्यक्ति को शुद्ध करने के लिए किया जाता है।
एक शाक्य राजा जो गौतम बुद्ध के पिता थे।
कोमल भाव की उमंग में भरना।
जमीन पर (सर्प-जैसी) रेंगने की ध्वनि।
हवा के चलने से उत्पन्न ध्वनि।
उ.- साँटी दीन्हीं सर-सर-३७३।
वायु का सर-सर ध्वनि करते हुए बहना।
(सर्प जैसे) कीड़े का तेजी से चलना।
जल्दी-जल्दी कोई काम होना।
(साँप आदि के) रेंगने की ध्वनि।
तेजी से हवा के चलने का शब्द।
शरीर पर रेंगने-जैसा अनुभव, सुर-सुराहट।
जो (दृष्टि) जमी हुई या एकाग्र न हो, जो जल्दी की हो।
मोटे तौर पर, स्थूल रूप से।
रस से पूर्ण या युक्त करना।
वह जो ताल से उत्पन्न होता हो।
जिसके नेत्र कमल (के समान सुन्दर) हों।
उ.- जा जल सुद्ध निरखि सनमुख ह्वै, सुंदरि सरसजिनैनी-९-११।
(कमन से उत्पन्न) ब्रह्मा।
एक धान्य या पौधा जिसके छोटे-छोटे बीजों से तेल निकलता है और पत्तों का साग बनता है।
उ.- (क) सरसौं मेथी सोवा पालक-३९६। (ख) सोवा अरू सरसों सरसाई-२३२१।
एक प्राचीन नदी जिसकी क्षीण धारा कुरूक्षेत्र में अब भी है।
उ.- आजु सरस्वति-तट रहौ सोइ-१-२८९।
विद्या की देवी, भारती, शारदा।
उ.- मनहुँ सरस्वति संग उभय दुज कल मराल अरू नील कठीर-१०-१६१।
सरस्वती का एक उत्सव जो कहीं वसंत-पंचमी को और कहीं-कहीं आश्विन में होता है।
एक हथियार जिससे मछली का शिकार किया जाता है।
(सं. शर या शल्य+हिं. हाथ)
मुहा.- सराय का कुत्ता- मतलबी यार-दोस्त। सराय की भठियारी (भठियारिन) - लड़ाका और निर्लज्ज स्त्री।
उ.- पुरूष भँवर दिन चार आपने अपनो चाउ सरायौ-१६५८।
शराब पीने का प्याला, मद्यपात्र।
आरती के ऊपर का दीपक जिसमें घी भरा जाता है।
उ.- हरि जू की आरती बनी।¨¨¨। मही सराव सप्त सागर घृत बाती सैल घनी-२-२८।
उ.- जज्ञ-सराध न कोऊ करै-१-२३०।
उ.- (क) जय अरू बिजय कर्म कह कीन्हौं, ब्रह्म सराप दिवायौ-१०४। (ख) सत्यवती सराप-भय मान, रिषि कौ बचन कियौ परमान-१-२२९।
उ.- मति माता करि कोप सरापै, नहिं दानव ठग मति कौ-९-८४।
बट्टा काटकर रूपये भुना देनेवाले दूकानदार।
उ.- (क) मनौ सरास धरे कर स्मर भौंह चढ़ै सर बरषै री-१०-१३७। (ख) मानौ सूर सकात सरासन, उड़ीबै कौं अकुलात-३९६।
बड़ाई या प्रशंसा करता है।
उ.- ग्वालनि कर तैं कौर छुड़ावत मुख लै मेलि सराहत गात-४६६।
उ.- उन विपदनि कुंचित जो करते कछुअन जीव सराहती-३२४७।
उ.- बारंबार सराहि सूर प्रभु साग बिदुर घर खाहीं-१-२४१।
उ.- सराहौं तेरो नंद हियौ-२६९८।
उ.- (क) और न सरि करिबे कौं दूजौ महा मोह मम देस। १-१४१ (ख) कौन करै इनकी सरिआन-४३५। (ग) राम-नाम-सरि तऊ न पूजै जौ तनु गारौ जाइ हिवार-२-३।
उ.- (क) सुनहु स्याम तुमहूँ सरि नाहीं-५३७। (ख) एक प्रबीन अरु सखा हमारे, जानी तुम सरि कौन-२९२५।
संगीत के सात स्वर या उनके चढ़ाव- उतार का क्रम।
उ.- सरिगमा पधनिसा संसप्त सुरनि गाइ- पृ. ३५२ (८३)।
उ.- बानवृष्टि स्त्रोनित करि सरिता, ब्याहत लगी न बार-।
उ.- (क) जैसैं सरिता मिलै सिंधु कौं, बहुरि प्रवाह न आवै-२-१०। (ख) अपनी गति तजत पवन सरिता नहिं ढरै- ६५२। (ग) स्याम सुन्दर सिंधु सनमुख सरित उमँगि बही-ना. २३८१।
सरितपति, सरितराज, सरितापति
(हिं. सरित, सरिता+राजा, पति)
उ.- याकौ कहा परेखौ निरखौ, मधु छीलर, सरितापति खारौ-९-३६।
तरतीब या क्रम से लगाना या रखना।
काम होगा, पूरा पड़ेगा, निर्वाह होगा।
उ.- (क) आरज पंथ चले कहा सरिहे स्यामहिं संग फिरौ री-१६७२। (ख) लाज गए कछु काज नं सरिहै, बिछुरत नंद के तात- २५३१।
(काम) पूरा हुआ, (उद्देश्य) सिद्ध हुआ।
उ.-भैया-बंधु कुटुम्ब घनेरे तिनतैं कछु न सरी- १-७१। (ख) सूरदास तैं कछु सरी नहिं, परी काल फँसरी-१-७१। (ग) सूर प्रभु के संग बिलसत सकल कारज सरी-१०-३०२।
किसी काम में साथ देनेवाला।
उ.- (क) देख्यौ भरत तरुन अति सुंदर। थूल सरीर रहित सब दुंदर-५-३। (ख) जद्यपि बिद्यमान सब निरखत दुःख सरीर भरयौ-१-१००।
व्यक्ति, पदार्थ आदि की आकृति।
उ.- सो सरूप हिरदै महँ आन। रहियौ करत सदा मम ध्यान-१-२८६।
वह जिसने कोई देव-रूप धारण किया हो।
उ.- हँसत गोपाल नंद के आगैं, नंद सरूप न जान्यौ-१०-२६३।
(काम) पूरा होता है, (उद्देश्य) सिद्ध होता है।
उ.- (क) कियै नर की स्तुती कौन कारज सरै, करै सो अपनौ जनम हारै-४-११। (ख) बहुत उपाइ करै बिरहिनि, कछु न चाव सरै-२७८३।
(प्रण आदि) पूरा होता या करता है।
उ.- चक्र धरे बैकुँठ तैं धाए, वाकी पैज सरै-१-८२।
(काम) पूरा, सिद्ध या संपन्न होगा।
उ.-राज काज तुमतैं सरैगो, काया अपनी पोषु-३०२६।
पारस्परिक व्यवहार का संबंध।
उ.-(क) बंदौ चरन सरोज तिहारे-१-९४। (ख) बाहु-पानि सरोज-पल्लव-१-३०७।
उ.-काम कमान समान भौंह दोउ चंचल नैन सरोजै-पृ. ३४५ (४१)।
बीन या सारंगी की तरह का एक प्रसिद्ध बाजा।
उ.-(क) चकई री, चलि चरन-सरोवर जहाँ न प्रेम-वियोग-१-३३७। (ख) मानसरोवर छाँड़ि हंस तट-कागा-सरोवर न्हावै-३-१३।
उ.-श्रीपति केलि-सरोवरी सैसव जल भरिपूरि-२०६५।
(काम, उद्देश्य या लाभ) सिद्ध या पूरा हुआ या होगा।
उ.-(क) सकल सुरनि कौ कारज सरौ, अंतर्धान रूप यह करौ-७-२। (ख) नैंकु धीरज धरौ, जियहिं कोउ जिनि डरौ, कहा इहिं सरौ, लोचन मुँदाए-५९६।
सुपारी काटने का प्रमुख औजार।
(सं. सार=लोहा + पत्र, प्रा. सारवत्त)
(काव्य या ग्रंथ) जो अध्यायों में विभक्त हो।
उ.-बिनु बानी ए उमँगि सजल होइँ सुमिरि सुमिरि वा सर्गुन जसहिं-३०१७।
(कोई चीज) चलाना, छोड़ना या फेंकना।
मुहा.-सर्द होना- (१) ठंडा होना। (२) मर जाना। (३) मंद या धीमा होना। (४) उत्साहहीन या उदासीन हो जाना।
पत्र-पत्रिका का (वार्षिक) चंदा।
मोह-ममता आदि से रहित, निर्मम।
साँप की चाल जैसा टोढ़ा-तिरछा।
जो साँप-सा कुंडली मारे हो।
उ.-सर्प इक आइहै तुम्हरै निकट, ताहि सौं नाव मम सृंग बाँधौ-८-१६।
वह यज्ञ जो जनमेजय ने सपों के संहार के लिए किया था।
उ.-(क) बच्छ बालक, लै गयौ धरि, तुरत कीन्हें सर्ब-४८५। (ख) सूर भक्त बत्सलता बरनौं सर्ब कथा कौ सार-१-२६७।
उ.-सूर-चन्द्र नक्षत्र-पावक सर्ब तासु प्रकास-२-२७।
उ.-सदा सर्बदा राज राम कौ-९-१७।
उ.-सर्बोपरि आनंद अखंडित-१-८७।
(काम या उद्देश्य) बना या सिद्ध हुआ।
उ.-बेर सूर की निठुर भए प्रभु मेरौ कछु न सरयौ-१-१३३।
(आयु) पूरी या समाप्त हो गयी।
उ.-सुनहुँ कंस, तव आइ सरयौ-१०-५९।
वह ग्रहण जा जिसमें चंद्र या सूर्य का सारा बिंब ढक जाता है, खग्रास ग्रहण।
उ.-तुम सर्वज्ञ सबै बिधि पूरन-१-१०३।
ՙसर्वज्ञ՚ होने का गुण या भाव (जो ईश्वर का एक गुण माना जाता है)।
जिसे सब (शास्त्रादि) मानते हों।
जिसका सिर, दाढ़ी, मूँछ-सब मुड़े हों।
देव-पूजन के वस्त्रों पर बनाया जानेवाला एक तरह का मांगलिक चिह्न।
हठयोग में बैठने का एक आसन या मुद्रा।
तेज हवा चलने का सर्र-सर्र शब्द।
तेज भागने का सर्र-सर्र शब्द।
मुहा.- सर्राटा भरना- (तेजी से) सर्र-सर्र शब्द करते हुए जाना।
उ.-सर्वरी सर्व बिहानी तोहिं मनावति-२०४८।
सब तरह की इच्छाएँ रखनेवाला।
सब तरह की इच्छाएँ पूरी रखनेवाला।
सब इच्छाएँ पूरी रखनेवाला।
जो सब दिशाओं में प्रवृत्त हो।
सब जगह मिलने या होनेवाला, व्यापक।
जो सब दिशाओं में प्रवृत्त हो।
सब जगह मिलने या होनेवाली।
अच्छी-बुरी, सभी चीजों का भोग करनेवाला।
सब तरह से कल्याण या मंगल करनेवाला।
उ.-(क) उगत अरुन बिगत सर्वरी, ससांक किरन-हीन-१०-२०५। (ख) सर्वरी सर्व तोहिं मनावति राधारानी-२२४८।
संज्ञा शब्द के स्थान पर प्रयुक्त होनेवाला शब्द (व्याकरण)।
सबको प्रिय लगने या होने का भाव, लोकप्रियता।
सर्वशत्तिमान, सर्वशक्तिमान्
जो सब कुछ करने में समर्थ हो।
सर्वशत्तिमान, सर्वशक्तिमान्
एक आदरसूचक विशेषण जिसका प्रयोग साथ-साथ प्रयुक्त कई नामों में से प्रत्येक के साथ ՙश्री՚ का प्रयोग न करके, सामूहिक ՙश्री՚ सूचक रूप में, केवल प्रथम नाम के साथ प्रयुक्त होता है।
सारी जमा-पूँजी, सर्वस्व।।
उ.-जाकी जहाँ प्रतीति सूर सो सर्वस तहाँ सँचै री-२२७०।
विष्णु का तीसरा अवतार जो वाराह का था।
उ.- आई छींक नाक ते प्रगटे सूकर अति लघु रूप- सारा. ४०।
एक तीर्थ जो नैमिषारण्य कें निकट है और जहाँ भगवान ने वाराह अवतार लेकर हिरण्यकेशी को मारा था; आजकल यह स्थान ‘सोरो’ नाम से प्रसिद्ध है।
वह स्थिति जिसमें, किसी प्रसेग में, सभी संबंधितजन सहमत हों।
उ.-सूरदास प्रभु सर्वसु लै गए हँसत हँसत रथ हाँक्यौ-२५४६।
सब कुछ निगल जाने, ले लेने या हजम कर जानेवाला।
(किसी वस्तु आदि के) सब अंग या अंश।
सब अंगों से युक्त, संपूर्ण।
आत्मा-रूप में सारे विश्व में व्याप्त चेतन सत्ता, ब्रह्म।
एक दार्शनिक सिद्धांत जिस में सभी वस्तुओं की सत्ता यथार्थ मानी जाती है, असत्य नहीं।
उक्त सिद्धांत का माननेवाला।
मूहा.- सलतनत बैठना- प्रबंध ठीक होना।
छेद में किसी चीज का डाला जाना।
वह सिद्धांत जिसमें सबकी सभी प्रकार की उन्नति का समर्थन हो।
सोने-चाँदी का बहुत पतला या महीन तार, बादला।
एक तरह का ढीला पाजामा जिसे प्रायः स्त्रियाँ पहनती हैं।
हल्की खुजली या सरसराहट होना।
बहुत शीघ्रता से काम करना।
उ.-सौति साल सलाइ बैठी डुलति इत उत नाहिं-२०२१।
काठ या धातु की महीन सींक जैसी छड़।
सुरमो लगाने की सींक जैसे छड़।
मुहा.- सलाई फेरना- (१) आँख में सलाई से सुरमा आदि लगाना। (२) किसी को अंधा करने के लिए गरम सलाई आँखों में लगाना।
सालने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
उ.- पलकनि सूल सलाक सही है, निसि-वासर दोउ रहत अरे रीपृ.- ३२७ (६०)।
सलाई जैसी चीज से कुरेदकर चिह्न बनाना।
उ.- सहि न सकति अति बिरह त्रास तनु आगि सलाकनि जारी-३२४६।
सहि न सकति अलि, गुरु ज्ञान सलाका।
मुहा.- दूर से सलाम करना- बुरी वस्तु या बुरे आदमी से बचकर या दूर रहना। सलाम है - दूर ही रहना चाहते हैं, बाज आये। सलाम करके चलना - अप्रसन्न होकर विदा लेना। सलाम फेरना-किसी से इतना अप्रसन्न होना कि प्रणाम भी स्वीकार न करना।
हानि या आपत्ति से बचा हुआ या रक्षित।
एक तरह का बहुत मोटा कपड़ा।
सैनिकों आदि की शस्त्रों से प्रणाम करने की रीति या प्रणाली।
उक्त रीति से किसी माननीय व्यक्ति का अभिवादन।
मुहा.- सलामी उतारना (देना)- उक्त प्रकार से किसी माननीय व्यक्ति का अभिवादन करना। सलामी लेना - उक्त अभिवादन को स्वीकार करना।
जो स्थान कुछ-कुछ ढालू हो।
मुहा.- सलाह ठहराना - (सबका) निश्चय करना।
उ.- (क) सलिल सौं सब रंग तजि कै एक रंग मिलाइ-१-७०। (ख) जनु सीतल सौ तप्त सलिल दै सुखित समोइ करे-९-१७१।
उ.- (क) इत सुन्दरी बिचित्र उतहिं घनस्याम सलोना-११३२। (ख) खेलै फागं नैन सलोन री रँग राँची ग्वालिनि-२-४०५।
जयपुर के महाराजाओं की एक उपाधि।
उ.- (क) मान करौ तुम और सवाई-१८८८। (ख) प्रीतम सो जो रहै एकरस निसि बढ़ि प्रेम सवाई-३३१०।
कुछ खाने पीने से जीभ को होनेवाला अनुभव, खाने-पीने का सुखद अनुभव।
उ.- (क) ज्यौं गूँगौ गुरू खाइ अधिक रस, सुख-सवाद न बतावै-२-१०। (ख) सो रस है मोहूँ कौ दुरलभ, तातैं लेंत सवाद-१०-६४।
किसी बात में होनेवाली रूचि या उससे मिलनेवाला आनंद।
उ.- दाल भात घृत कढ़ी सलोनी-सारा. १८७।
बहुत चंचल या हिलता-डोलता।
उ.- लोचन जलज मधुप अलकावलि कुंडल मीन सलोल-पृ. ३४४ (३५)।
उ.- फिरत सृगाल सज्यौ सव कटात चलत सो सीस लै भागि-९-१५८।
मुहा.- सव साजना- चिता बनाकर उस पर जलाने के लिए शव रखना।
मुहा.- कीने सवति बजाइ - खुल्लमुखुल्ला या सबको जताकर किसी की सौत करना। उ.- सूरदास प्रभु हम पर ताको कीने सवति बजाइ-२३२९।
उ.- सूरदास प्रभु जब जब देखत नट सवाँग सो काछे -पृ. ३३१ (६)।
वह जो (घोड़े, गाड़ा या वाहन पर) चढ़ा हो।
(घोड़े, गाड़ी या वाहन आदि पर) चढ़ा हुआ।
उ.- सुरपुर तैं आयौ रथ सजिकै, रघुपति भए सवार-९-१५८।
मुहा.- पाँचवा सबार बनना - योग्यता या पात्रता ने होने पर भी बड़ों के साथ अपनी गिनती कराने का प्रयत्न करना।
उ.- सूरदास प्रभु सों हठ कीन्हो उठि चल क्यों न सवार-२२११।
उ.- सहज सिथिल पल्लव ते हरि जू लीन्हों छोरि सवारि-पृ. ३४८ (५)।
बहस, तर्क-वितर्क, वाद-विवाद।
दो प्रकार की समाधियों में एक जो किसी आलंबन की सहायता से होती है।
उ.- जनु जल सोखि लयो सो सविता-२०६२।
उ.- (क) सुरपति-पूजा करौ सवारी-१००७। (ख) तुम सुन्दरी काकी बधू घर जाहु सवारी-पृ. ३१७ (६३)।
किसी चीज पर (विशेषतः) चलने के लिए चढ़ने की क्रिया।
वह चीज या वाहन जिस पर सवार हुआ जाय।
बड़े आदमी, देव-मूर्ति आदि के साथ चलनेवाला जलूस।
उ.- (क) जेहि हठ तजै प्रान प्यारी सो जतन सवारे करिए-२२७५। (ख) ह्वै यह जीति विधाता इनकी करहु सहाय सवारे-२५६९।
उ.- यहै देत लवनी नित मोकौ, छिन छिन साँझ-सवारे-१०-१८९।
उ.- (क) साँझ-सवारै आवन लागी-७१०। (ख) निकट बैठारि सब बात तेई कही गए जे भाषि नारद सवारैं-२४६६।
उ.- इह उपदेस आपुनो ऊधौ, राखौ ढाँप सवारो-३२०५।
निश्चित समय या उपयुक्त अवसर से पूर्व का समय।
वह पहाड़ा जिसमें संख्याओं का सवाया रहता है।
एक प्रसिद्ध छंद जिसके प्रत्येक चरण में सात भगण और एक गुरु होता है। इसे ՙमालिनी՚, ՙमदिरा՚ और ՙदिवां՚ भी कहते हैं।
अर्जुन जो दाहने और बायें, दोनों हाथों से तीर चला सकते थे।
शंका या संदेह करना, शंकित होना।
उ.- बिडरत बिझुकि जानि रथ ते मृग जनु ससंकि ससि लंगर सारे-१३३३।
उ.- अखुटित रहत सभीत ससंकित सुकृत सब्द नहिं पावै-१-४८।
चंद्रमा का काला धब्बा या कलंक।
उ.- माँग उरग नब तरनि तरौना तिलक भाल ससि की ससकाई-१८८७।
शून्य होने का भाव या धर्म।
उ.- वादत बड़े शूर की नाईं अबहिं लेत हौं प्राण तुम्हारो-२५९०।
उ.- उगत अरुन बिगत सर्वरी, ससांक किरनहीन-१०-२०५।
उ.- (क) रवि-ससि किये प्रदच्छिनकारी-३-३४। (ख) बारिज ससि बैर जानि जिय-१०-१६४।
उ.- हरि-कर राजति माखन-रोटी। मनु बारिज ससि बैर जानि जिय गह्यौ सुधा ससुधौटी-१०-१६४।
पति या पत्नी के पिता का घर।
थोड़े मूल्य का, जो महँगा न हो।
मुहा.-सस्ता समय- वह समय जब सब चीजें थोड़े ही मूल्य पर मिल जाती हों। सस्ता छूटना- (१) साधारण से भी कम दाम पर बिक जाना। (२) सहज में ही या बहुत थोड़ी हानि सहकर किसी काम या भंझट से छुटकारा पा जाना।
जो बहुत थोड़े परिश्रम, व्यय या कार्य से प्राप्त हो जाय।
साधारण से भी कम मूल्य की।
जो बहुत थोड़े श्रम या व्यय से प्राप्त हो जाय।
वह समय जब सब चीजें सस्ते दाम पर मिल जायँ।
जो थोड़े ही श्रम से सिद्धि प्राप्त करा दे।
उ.- जहाँ तहाँ तैं सब आवैंगे सुनि-सुनि सस्तौ नाम-१-१९१।
हथियार जिन्हें हाथ में पकड़े रहकर ही वार किया जाय।
उ.- (क) जुद्ध न करौं सस्त्र नहिं पकरैं, एक ओर सेना सिगरी-१-२६८। (ख) जेतक सस्त्र सो किए प्रहार-६-५।
उ.- ते सब ठाढ़ सस्त्रनि धारे-४-१२।
किसी के साथ जाने की क्रिया या भाव।
पति के शव के साथ स्त्री के सती होने की क्रिया।
उ.- ज्यौं सहगमन सुन्दरी के सँग बहु बाजन हैं बाजत-९-१३०।
कई लोगों के साथ मिलकर गाना।
वह गान जो इस प्रकार गाया जाय।
उ.- मनु बराह भूधर सह पुहमी धरी दसन की कोटी-१०-१६४।
वह स्त्री जो पति के शव के साथ सती हो जाय।
उ.- (क) गंधारी सहगामिनि कियौ-१-२८४। (ख) सब नारिति सहगामिनि कियौ-९-९।
अनुकरण करनेवाला, अनुयायी।
साथ-साथ उत्पन्न होनेवाला।
उ.- (क) नाभि-हृद रोमावली अलि चले सहज सुभाव-१-३०७।
उ.- मनौ नव घन दामिनी, तजि रही सहज सुबेस-६३३।
उ.- बहुरौ ध्यान सहज ही होइ-३-१३।
सरल और आडंबररहित रूप में।
उ.- सहज भजै नँदलाल कौं सो सब सचु पावै-२-९।
उ.- हम माँगत हैं सहज सों तुम अति रिस कीन्हों-२५७६।
वह ध्यान जो सुगम रूप में किया जाय और जिसके लिए आसन, मुद्रा आदि की आवश्कता न हो।
गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय का एक वर्ग।
जीव-जंतु या प्राणी की स्वाभाविक ज्ञान-शक्ति।
वह समाधि जो सुगम रूप में लगायी जाय और जिसके लिए आसन, मुद्रा आदि की आवश्यकता न हो।
उ.- सुति रुचि सहज समाधि साधि सठ, दीनबंधु करुनामय उर धरि-१-३१२।
साथ-साथ उत्पन्न होनेवाला, सहोदर।
उ.- (क) सुपनेहुसंयोग सहति नहिं सहचरि सौति भई-२७९१। (ख) गावहिं सब सहचरी कुँवरि तामस करि हेरयौ-१० उ.-८।
सहचारिणी, सहचारिनि, सहचारिनी
सहचारिणी, सहचारिनि, सहचारिनी
उ.- (क) कौर-कौर कारन कुबुद्धि जड़ किते सहत अपमान-१-१०३। (ख) सूर सो मृग ज्यौं बान सहत कित-१-३२०।
आराम करके थकावट दूर करना।
उ.- सलिल तैं सब निकसि आवहु बृथा सहतिं तुषार-७८६।
भोगती, झेलती या बरदाश्त करती है।
उ.- (क) कत हौ सीत सहति ब्रज संदरि-७८७। (ख) सहति बिरह के सूलनि-८९७। (ग) बात मेरी सुनति नाहिंन, कतहिं निंदा सहति-११८९।
अनेक देवताओं के लिए एक ही में दिया जानेवाला दान।
उ.- (क) लेहु मातु सहदानि मुद्रिका दई प्रीति करि नाथ-९-८३। (ख) चरन चापि महि प्रगट करी पिय सेष सीस सहदानी-२०७६।
राजा पांडु के पाँच पुत्रों में सबसे छोटा पुत्र जो माद्री के गर्भ से अश्विनीकुमारों के औरस से जन्मा था।
जरासंध का पुत्र जो महाभरत के युद्ध में अभिमन्यु द्वारा मारा गया था।
विष्णु या उनके प्रमुख अवतारों, राम और कृष्ण के हाथ में रहनेवाला धनुष।
विष्णु या उनके प्रमुख अवतार राम और कृष्ण जो 'शार्ङ्ग' नामक धनुष धारण करते कहे गये हैं।
विष्णु या उनके प्रमुख अवतार राम और कृष्ण जिनके हाथ में 'शार्ङ्ग' नामक धनुष रहना माना जाता है।
उ.- सौति शाल उर में अति शाल्यो-२६७३।
उ.- सूरदास सिर देत शूरमा सोइ जानै व्यावहार-२९०५।
मथुरा का राजा जो वसुदेव का पिता और श्रीकृष्ण का पितामह था।
मथुरा और उसका निकटवर्ति प्रदेश जहाँ राजा सूरसेन का राज्य था।
रावण की बहन जिसके नाक-कान लक्ष्मण ने काटे थे।
किसी के साथ एकमत या सहमत होने की क्रिया या भाव।
बरदाश्त या सहन करनेवाला, सहिष्णु।
सहनशील होने का भाव, सहिष्णुता।
साथ मिलकर काम करने का व्यापार या भाव।
साथ मिलकर काम करनेवाला व्यक्ति।
वह जो एक ही कार्यालय या विभाग में काम करता हो।
साथ लगे रहने की क्रिया या भाव।
उ.- (क) सहस सकट भरि कमल चलाए-५८३। (ख) सोरह सहस घोषकुमारि-७९५।
उ.- (क) ता दिन सूर सहर सब चक्रित सबर-सनेह तज्यौ पितु मात-९-३८। (ख) आनँद मगन नर गोकुल सहर के-१०-३०। (ग) जीवन हैं ये स्याम, सहर के-६०७।
धीरे-धीरे हाथ फेरना, धीरे-धीरे मलना।
र्निजल व्रत के दिन बहुत तड़के किया जानेवाला भोजन।
उ.- मन सहसक केसरि लै दीनो-८४३३।
सहसजिभ्या, सहसजीभ, सहसजीभी
वह स्तोत्र जिसमें किसी देवता के हजार नाम हों।
महाप्रभु वल्लभाचार्य का ՙपुरुषोत्तम सहस्त्रनाम नामक՚ ग्रंथ।
उ.- सहसनाम तहँ तिन्हैं सुनायौ-१-२२६।
उ.- हरि जू की आरती बनी।¨¨¨¨¨ डाँड़ी सहसफनी-२-२६।
राजा कृतवीर्य का पुत्र ՙहैहय՚ जिसे कार्तवीयार्जून भी कहते हैं। इसने रावण को युद्ध में परास्त किया था और पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए परशुराम ने इसे मार डाला था।
उ.- सहसबाहु रविबंसी भयौ। ¨¨¨¨¨। सहसबाहु तब ताकौ गह्यौ-९-१३।
सहसाक्ष, सहसाक्षि, सहसाखि, सहसाखी
उ.- (क) चारि बदन मैं कहं कहौं, सहसानन नहिं जान-४९२। (ख) सहसानन जहि गावै हो-१५५७।
उ.- सेष सकुचि सहसौ फल पेलत-१०-६३।
शरीर के भीतरी आठ कमलों या चक्रों में एक जिसे ՙशून्य चक्र՚ भी कहते हैं। यह सहस्त्र दलवाला और मस्तिष्क के ऊपरी भाग में स्थित कहा गया है।
उ.- (क) सतजुग लाख बरस की आइ, त्रेता दस सहस्त्र कहि गाइ-१-२३०। (ख) साठ सहस्त्र सगर के पुत्र-९-९।
देवताओं को स्नान कराने का पात्र जिसमें हजार छेद होते हैं।
वह स्तोत्र जिसमें किसी देवता के हजार नाम हों।
महाप्रभु वल्लभाचार्य का ՙपुरुषोत्तम सहस्त्रनाम नामक՚ ग्रंथ।
सूर्यवंशी राजा कृतवीर्य का पुत्र जो ՙहैहय՚ और ՙसहस्त्रार्जुन՚ नामों से भी प्रसिद्ध है। इसने एक बार रावण को पराजित किया था। मुनि जमदग्नि की कामधेनु हरने और उनकी हत्या करने के अपराध में उनके पुत्र परशुराम ने उसे मार डाला था।
सहन करके या की, सहन करने को प्रवृत्त किया।
सहन करने को प्रवत्त या विवश करना।
एक रंग जो पीलापन लिये हुए लाल हो।
उ.- (क) तुम लछिमन निज पुरहिं सिधारो। बिछुरन भेंट देहु लघु बंधू जियत न जैहै शूल (सूल) तुम्हारौ-९-३६। (ख) मन तोसों कोटिक बार कही। समुझ न चरन गहत गोविंद केउर अघ शूल (सूल) सही-१-३४४। (ग) अब काहे सोचत जल मोचत समौ गए ते शूल नई-२५३७। (घ) को जानै तन छूटि जाइगो शूल रहै जिय साधो-२५५८।
हाथ में शूल धारण करनेवाले, महादेव।
देवी का वह रूप जब महिषासुर का वध करने के लिए उनकी हजार भुजाएँ हो गयी थीं।
उ.- (क) सूर स्याम ¨¨¨¨¨ गिरि लै भए सहाई-१-१२२। (ख) जहाँ तहाँ सो होत सहाई-३९१। (ग) जहँ तहै तुमहिं सहाइ सदा हौ-६०७। (घ) राजसूर्य यज्ञ को कियो अरंभ मै जानिं कै नाथ तुमको सहाई-१० उ.-५१।
उ.- (क) हरिजू ताकी करी सहाइ-७-२। (ख) ना जानौं धौं कौन पुन्य तैं को करि लेत सहाइ-१०-८१। (ग) तिनके चरन सरोज सूर अब किए गुरु कृपा सहाइ-२५५५।
किसी के दुख से दुखी या द्रवित होना।
एक तरह का गहरा लाल रंग जो कुसुम के फूलों से बनता है।
(क) कह न सहाय करी भक्तनि की-१-२५। (ख) कौन सहाय करै घर अपने मेटै बिधि अपना-२५४७। (ग) इनकी करहु सहाय सवारे-१५६९। (घ) सत्वर सूर सहाय करै को-३१६५।
उ.- तेरौ पुन्य सहाय भयौ है-१०-३३५।
उ.- सूरदास हम दृढ़ करि बंकरे अब ये चरन सहायक-१-१७७।
जो (छोटी नदी) बड़ी नदी में मिलती हो।
अधीन काम करनेवाला, सहकारी।
कार्य-विशेष के लिए दिया जानेवाला धन।
उ.- तुमहिं बिना प्रभु कौन सहायौ-३९१।
बर्दाश्त या सहन करना, सहना।
अपने ऊपर भार लेना या सँभालना
मुहा.-सहारा पाना-सहायता पाना। सहारा देना-(१) सहायता करना। (२) टेक देना। (३) आसरा देना। (४) आश्रय देना। (५) रोकना। सहारा ढूँढ़ना-आसरा ताकना।
उ.- कठिन बचन सुनि स्रवन जानकी, सकी न बचन सहारि (सँभारि)-९-१९।
उ.- सो उबरथौ भयौ धर्म सहारे-५९५।
उ.- सूर पतित कौ और ठौर नहिं है हरि-नाम सहारौ-१-३३९।
(सं. सह+हिं. लगाव या लगता)
(सं. सह+हिं. लगाव या लगता)
उ.- तब अति ध्यान कियौ श्रीपति को, केसव भये सहाहीं-सारा. ३९।
उ.- सहि सन्मुख तउ सीत-उष्न कौं, सोई सुफल करै-१-११७।
सहि जैहै-झेली या सहन की जायगी।
उ.- सुनि सुन्दरि यह समौ गए तें पुनि न सूल सहि जैहै-२०३३।
लई सहि कै-झेल ली, सहन कर ली।
उ.- हमसों कही, लई हम सहि कै जिय गुन लेहु सयाने-३००६।
सहि सकत- झेली जा सकती है, सहन की जा सकती है।
उ.- सहि न सकति अति बिरह त्रास तनु आगि सलाकनि जारी-३२४६।
उ.- सहि न सकी, रिस ही रिस भरि गई बहुतै ढीठ कन्हाई-३७७।
उ.- (क) सखा-भीर लै पैठत घर मैं आपु खाइ तौ सहिऎ-१०-३२२। (ख)कैसे रिस मन सहिए जू-२०१५।
[सं. स(अस्) + हिं. क (प्रत्य.)]
[सं. स(अस्) + हिं. क (प्रत्य.)]
[सं. स(अस्) + हिं. क (प्रत्य.)]
एक वृक्ष जिसकी फलियों की तरकारी बनती है।
उ.- (क) लक्ष्मी सहित होति नित क्रीड़ा-१-३३७। (ख) बेगि बढ़ै बल सहित बिरध लट-१०-१३८। (ग) सूर राधा सहित गोपी चलीं ब्रज समुहाहिं-१३०६। (घ) गिरिवर सहितै ब्रजै बहाई-१०४१।
उ.- (क) कछु इक अंगनि की सहिदानी मेरी दृष्टि परी-९-६३। (ख) लेहु मातु सहिदानि मुद्रिका दई कृपा करि नाथ-९-८३।
सहन करने की क्रिया, सहना।
उ.- मन मानै सोऊ कहि डारौ पालागैं हम सुनि सहिबे को-२००४।
उ.- (क) जम की त्रास न सहियै-१-६२। (ख) इतौ द्वंद जिय सहिए-२-१८।
एक वृक्ष जिसकी फलियों की तरकारी बनती है।
उ.- फूले फूले सहींजन छौंके-२३२१।
उ.- करवत चिन्ह कहै हरि हमकौं ते अब होत सही-२५०१।
मुहा.-सही पड़ना-ठीक उतरना, सच होना, प्रमाणित होना। सही परी-ठीक या सत्य हुआ। उ.- (क) निगमनि सही परी-१०-६९। (ख) तीनिलोक अरु भुवन चतुरदस बेद पुरानन सही परी-२६५६। सही भरना- (१) मान लेना। (२) सत्यता की साक्षी देना।
उ.- रही ठगी, चेटक सो लाग्यौ परि गयी प्रीति सही-१०-२८१।
मुहा.-सही करना-मान लेना। करैं सही-मान लें, अंगीकार कर लें। उ.- अब जोई पद देहि कृपा करि सोइ हम करैं सही-३३७०।
भोगी, बरदाश्त या सहन की, झेली।
उ.- (क) उर अघ-सूल सही-१-३२४। (ख) सही दूध-दही की हानि-१०-२७६। (ग) पलकनि सूल-सलाक सही है-पृ. ३२७ (६०)। सही बिपति तनु गाढ़ी-२५३५।
उ.- कहा करौं दिनप्रति की बातैं, नाहिंन परतिं सही-१०-२९१।
परतिं सही-सहन की जाती है।
उ.- (क) नाहिंन सही परति मौंपै अब दारुन त्रास निसाचर केरी-९-९३। (ख) दित प्रति कैसैं सही परति है दूध-दही की हानि-१०-२८०।
उ.- निपट निलज बैल (?) बिलखि सहूँ-१०-२९५।
दूसरे का सुख-दुख समझनेवाला।
प्रेमी-प्रेमिका-मिलन का पूर्व निश्चित एकान्त स्थल।
किसी हेतु या उद्देश्य से।
समझा-बुझाकर सुपुर्द करना।
उ.- हरषी सखी-सहेल री (हो) आनँद भयौ सुभ जोग-१०-४०।
[सं. सह+ हिं. एली(प्रत्य.)]
उ.- (क) बिनु रघुनाथ और नहिं कोऊ, मातु, पिता न सहेली-९-९३। (ख) कबहुँ रहसत मचत लै सँग एक-एक सहेलि-२२७८। (ग) एकै मत सब भईं सहेली-३१४४।
उ.- बासर निसि कहुँ होत न न्यारे बिछरन हृदय सहैंगे-२५००।
उ.- (क) लोभ लिए दुर्बचन सहै-१-५३। (ख) घर आसा सब दुख सहै-१-३२५। (ग) त्रिभुवन नाथ नाह जो पावै सहै सो क्यों बनवास-९-८३।
उ.- (क) स्याम कहत नहिं भुजा पिरानी ग्वालनी कियो सहैया-१०७१। (ख) जब-जब गाढ़ परति है हमकौ, तहँ करि लेत सहैया-२३७४।
एक ही माता के गर्भ से जन्म लेनेवाला, सगा।
सहोदरा, सहोदरी, सहोवरि, सहोवरी
सहोदरा, सहोदरी, सहोवरि, सहोवरी
एक ही माता के गर्भ से जन्म लेनेवाली।
उ.- (क) कहाँ लगि सहौं रिस-१०-२९५। (ख) ब्रज बसि काके बोल सहौं-२७७४। (ग) समुझि आपनी करनी गुसाईं काहे न सूल सहौं-११-२।
उ.- तुम हर्ता तुम कर्ता एकै तुम हौ अखिल भुवन के साईं-२५५८।
उ.- तुम जिनि सहौ स्याम सुन्दर बर, जेती में जु सही-१-२५८।
बम्बई प्रान्त का ՙसहथाद्रि՚ पर्वत।
बम्बई प्रान्त का एक पर्वत।
उ.- किहिं जुग इतौ सह्यौ-१-४९।
उ.- इहिं भरु अधिक सह्यौ अपनैं सिर अमित अंडमय बेष-५७०।
सह्यौ न जाइ-सहा या सहन किया नहीं जाता।
उ.- ताकौ बिषम बिषाद अहो मुनि मोपै सह्यौ न जाइ-९-७।
उ.- जागिहै मेरौ साँइयाँ-५७७।
पैर का एक गहना जो चाँदी का बनता है।
पैर में पहनने का चाँदी का एक गहना।
कष्ट या दुख का समय या अवस्था।
छह भारतीय दर्शनों में एक जिसके कर्त्ता महर्षि कपिल थै। इसमें सृष्टि की उत्पत्ति के क्रम की चर्चा है तथा जड़ प्रकृति और चेतन पुरूष को जगत का मूल माना गया है।
विषय-विशेष की संख्याएँ एकत्र करके निष्कर्ष निकालना।
इस उद्देश्य से एकत्र की गयी संख्याएँ।
उ.- ताहि आवत निरखि स्याम निज साँग को काटि करि साल्व की सुधि भुलाई-१० उ. ५६।
उ.- मैं अपमान रूद्र कौ कियौ। तब मम जज्ञ सांग नहिं भयौ-४-५।
उ.- (क) नाचत फिरत साँकरी खोरि-१०-३२७। (ख) रोकि रहत गहि गली साँकरी-१०-३२८। (ग) तब घिरे साँकरी खोरि-२४४७।
छोटा, छोटे श्रेत्रफल या आकार का।
उ.- सोभा-सिंधु समाइ कहाँ लौं हृदय साँकरे ऎन-२७६५।
उ.- हरि तुम साँकरे के साथी-१-११२।
संकट के समय या स्थिति में।
उ.- तुम बिनु साँकरैं को काकौ-१-११३।
मिले हुए या संकर होने का भाव।
अंगों और उपांगों सहित, सम्पूर्ण।
ठीक, सत्य, सिद्ध, यथार्थ।
उ.- पतित पावन बिरद साँच (तौ) कौन भाँति करिहौ-११२४।
मुहा.- साँच -झूठ करि - झूठे-सच्चे व्यापार से, उचित-अनुचित सभी कुछ करके। उ.- साँच-झूठ करि माया जोरी-१-३०२।
वह उपकरण जिसमें कोई गीली या गाढ़ी चीज डालकर आकार-विशेष की बनायी जाय।
मुहा.- साँचा (सांचे में) ढला - रूप-आकार में सुन्दर और सुडौल होना। साँचा (साँचे में) ढालना-बहुत सुन्दर और सुडौल बनाना।
पुस्तक की बेड़े बल की छपाई।
उ.- (क) साँची बिरूदावलि-१-१२२। (ख) मन-क्रम-बचन कहति हौं साँची, मैं मन तुमहिं लगायो-१२२३। (ग) कहि कुसलातैं, साँची बातैं-३४४१। (घ) दरसन कियौ आइ हरि जी को कहत सपन की साँची-१० उ.-११२।
उ.- यह है बिन कलंक की साँची, हम कलंक में सानी-१६०३।
उ.- दीनानाथ हमारे ठाकुर साँचे प्रीति-निबाहक-१-१९।
उ.- हौं जानौं साँचे मिले माधौ भूलो यह अभिमान-२७८८।
उपकरण-विशेष में, जिससे विभिन्न आकारों और रूपों की वस्तुएँ बनायी जाती हैं।
मुहा.- साँचे भरि काढ़ी - साँचे में ढालकर सुन्दर और सुडौल बनायी है। उ.- अँगिया बनी कुचनि सौं माढ़ी। सूरदास प्रभु रीझि थकित भए मनहुँ काम साँचे भरि काढ़ी-१०-३००। एक ही साँचे के ढले या भरे हुए- एक ही रूप-रंग, आकार या स्वभाव के। भरे दोउ एक ही साँचे- दोनों एक ही रूप, आकार या स्वभाव के हैं। उ.- मानो भरे दोउ एकहिं साँचे-३०५१।
उ.- लावहिं साँचेन को खोर-११-३।
उ.- साँचैहिं सुत भयौ नँदनायक कैं-१०-२३।
उ.- (क) प्रभु, तेरौ बचन-भरोसौ साँचौ-१-३२। (ख) सूर स्याम कौ सौदा साँचौ-१-३१०।
किसी आयोजित बड़ी कृति का छोटा नमूना।
बेल-बूटे छापने का ठप्पा या छापा।
उ.- मेरी कही साँचि तुम जानौ, कीजै आगत-स्वागत-१४८२।
उ.- सूरदास प्रभु साँचिले उपमा कवि गाए-१९७५।
उ.- भक्ति बिन बैल बिराने ह्यैहौ। पाँउ चारि शिर श्रृंग (सृंग) गुंग मुख तब कैसे गुन गैहौ-१-३३१।
उ.- (क) देखियत नहिं भवन माँझ, जैसोइ तन तैसि साँझि-१०-२७६। (ख) साँझ-सवारे आवन लागी-७१०।
देव-मंदिरों या भक्तों के यहाँ भूमि या मिट्टी के चबूतरे अथवा दीवारों पर रंगीन चूर्ण या फूल-पत्तियों से, सावन के महीने में बनाये गये विविध लीलाओं के चित्र या विशेष आकृतियाँ आदि।
शरीर पर बना हुआ छड़ी या कोड़े की मार का चिह्न।
उ.- नैननि साँटि करी मिलि नैननि।
डुग्गी या डौंड़ी पीटनेवाला।
उ.- (क) साँटी लिये दौरि भुज पकरयौ-१०-२५३। (ख) मारन कौं साँटी कर तौरै-३४४। (ग) साँटी दीन्हीं सर-सर-३४४।
राजा की सवारी के साथ साँटा लेकर चलनेवाले सिपाही।
पैर में पहनने का ՙसाँकड़ा՚ नामक गहना।
साँठ-गाँठ- गुप्त सम्बन्ध या मेल।
बैल जो केवल गर्भाधान करने के लिए पाला जाता है।
बैल जो मृतक की स्मृति में दागकर छोड़ दिया जाता है।
मुहा.- साँड़ की तरह (सा) घूमना - आजाद और बेफिक्र धूमना। साँड़ की तरह डकराना- बहुत जोर से या डरावना शब्द करके चिल्लाना।
जिसके दुष्ट विचारों का अन्त हो गया हो।
साहित्य के नौ रसों में एक।
भीष्म पितामह के पिता का नाम।
उ.- तौ लाजौं गंगा-जननी कौं सांतनु-सुत न कहाऊँ-१-२६९।
उ.- बहुरि पुरान अठारह किये। पै तउ सांति न आई हिये-१-२३०।
मार-काट या विघ्ना-बाधा का प्रभाव।
अमंगल आदि दूर करनेवाले धार्मिक कृत्य।
लकड़ी जो पशु को भागने से रोकने के लिए गले में बाँधी जाती है।
एक प्रसिद्ध मुनि जिन्होंने श्रीकृष्ण और बलराम को धनुर्वेद की शिक्षा दी थी।
ऊँटनी जो बहुत तेज चलने के लिए प्रसिद्ध है।
उ.- हँसि हँसि नाग-फाँस सर साँधत बंधन बंधु समेत बँधायौ-९-१४१।
निशान साधना, लक्ष्य या संधान करना।
एक में मिलाना, मिश्रित या सम्मिलित करना।
टूटी रस्सी में जोड़ लगाना।
टूटी रस्सी आदि को जोड़ने से पड़ी हुई गाँठ।
मुहा.- साँधा मारना - टूटी रस्सी को गाँठ लगाकर जोड़ना।
निशाना साधकर, लक्ष्य या संधान करके।
उ.- (क) सप्त ताल सर साँधि बालि हति-९-७०। (ख) भृकुटी सर धनु साँधि बचनबर-१८८७।
लक्ष्य या संधान किये हुए।
उ.- राम धनुष अरू सायक साँधे, सिय-हित मृग पाछैं उठि धाए-९-५८।
मुहा.- कलेजे पर साँप लोटना- (किसी की उन्नति या सफलता देखकर) ईर्ष्या आदि के कारण बहुत दुख होना। साँप सूँघ जाना- (१) साँप के काटने से निर्जीव हो जाना। (२) सर्वथा गतिहीन और मौन हो जाना (व्यंग्य)। साँप की तरह केंचुल छोड़ना या झाड़ना- पुराना और भद्दा रूप-रंग छोड़कर नया और सुन्दर रूप धारण करना (व्यंग्य)। साँप के मुँह में - बड़े जोखिम या संकट में। साँप-छँछूदर की दशा -बहुत असमंजस और दुबिधा की दशा या स्थिति।
बहुत दुष्ट और निर्दयी व्यक्ति।
साँपि, साँपिन, साँपिनि, साँपिनी
उ.- पूँछ राखी चाँपि, रिसनि काँपि काली काँपि, देखि सब साँपि-अवसान भूले-५५२।
साँपि, साँपिन, साँपिनि, साँपिनी
साँपि, साँपिन, साँपिनि, साँपिनी
घोड़े के शरीर की एक भौंरी जो अशुभ समझी जाती है।
गहरा भूरा या काला रंग जो साँप के रंग जैसा होता है।
केवल अपने संप्रदाय का ही हित चाहने की संकुचित भावना या दृष्टि।
श्रीकृष्ण का पुत्र जो जांबवंती के गर्भ से जन्मा था। अत्यन्त रूपवान होने का इसे बहुत गर्व था। इसका विवाह दुर्योधन की पुत्री लक्ष्मणा से हुआ था।
उ.- स्याम सुनि सांब गयौ हस्तिनापुर तुरत लक्ष्मणा जहाँ स्वयंवर रचायो-१० उ.४६।
राजपूताने की एक झील जिसके खारे पानी से नमक बनता है।
उक्त झील के पानी से बना हुआ नमक।
उ.- कंस ताल करताल बजावत श्रृंग (सृंग) मधुर मुँहचंग।
एक प्राचीन नगर जहाँ रामायणकाल में निषादराज गुह की राजधानी थी।
नौ रसों में एक जो रसराज, कहा जाता है और जिसका स्थायी भाव रति, आलंबन विभाव नायक-नायिका, उद्दीपन सखा-सखी, वन-बाग, चंद्र, हाव-भाव आदि हैं। यह रस दो प्रकार का होता है- संयोग और वियोग।
स्त्रियों की सजावट; श्रृंगार १६ हैं - उबटन, स्नान, वस्त्र धारण, सँवारना, काजल लगाना, माँग भरना, महावर लगाना, तिलक लगाना, चिबुक और कपोल पर तिल बनाना, मेंहदी रचाना, सुगंधित लेप लगाना, आभूषण पहनना, पुष्पमाल धारण करना, पान खाना और मिस्सी लगाना।
भक्ति का वह रूप जिसमें भक्त अपने को पत्नी और इष्टदेव को पति मानता है।
वह जिससे किसी की शोभा बढ़े।
उ.- यशुमति कोख सराहि बलैया लेन लगीं ब्रजनार। ऐसो सुत तेरे गृह प्रगटयो या ब्रज को श्रृंगार।
उ.- मोहन मोहिनी अंग श्रृंगारत- पृ. ३८८ (८०)।
व्रज का एक स्थान जहाँ श्रीकृष्ण द्वारा राधिका का श्रृंगार किया जाना प्रसिद्ध है।
उ.- जहाँ जमुना बहै सुभग साँवरी-३४३०।
उ.- मानो गज-मुक्ता मरकत पर सोभित सुभग साँवरे गात-१०-१५९।
उ.- मेरे साँवरे जब मुरली अधर धरो-६२३।
उ.- सूर सरबस हरथौ साँवरैं-१०-३०७।
उ.- साँवरौ मनमोहन माई-६१६।
विष्णु या उनके अवतार राम और कृष्ण।
उ.- छाड़ि सुखधाम अरु गरुड़ तजि साँवरौ, पवन के गवन तैं अधिक धायौ-१-५।
उ.- उज्जल साँवल बपु सोभित अंग-१६१३।
सावला' होने का भाव, श्यामता।
वह संधि या दरार जिसमें से होकर हवा पानी आ-जा सके।
मुहा.-(किसी पदार्थ या वस्तु का) साँस लेना-(किसी पदार्थ या वस्तु में) संधि या दरार पड़ जाना।
किसी अवकाश में भरी हुई हवा।
दम छुटने-जैसी बहुत यातना या पीड़ा।
वह घर हवा-रोशनी न आती हो।
बहुत अधिक कष्ट या यातना पहुँचाना।
साँवला होने का भाव, अवस्था या गुण, श्यामलता।
नाक या मुँह से हवा खींचने और निकालने की क्रिया, दम।
मुहा.-साँस उखड़ना-मरते समय बहुत कष्ट से साँस ले पाना। साँस ऊपर-नीचे होना- (१) साँस रुकना, दम घुटना। (२) बहुत घबरा जाना। साँस खींचना- दम साधना। साँस चढ़ना-परिश्रम आदि से साँस का बहुत जल्दी-जल्दी चलना। साँस चढ़ाना-दम साधना। साँस टूटना- मरते समय बहुत कष्ट से साँस ले पाना। साँस तक न लेना-बिलकुल चुप-चाप या मौन होना। साँस फूलना-(१) दमे का रोग होना। (२) जल्दी-जल्दी साँस चलना। गहरी, ठंढी या लंबी साँस भरना या लेना- (१) बहुत अधिक दुख के कारण लंबी साँस लेकर और रोककर धीरे-धीरे छोड़ना। (२) बहुत संतोष का अनुभव करना। साँस रहते- जीते जी, जीवित रहते हुए। साँस रुकना-साँस के लेने-निकालने में किसी कारण से बाधा होना। उलटी साँस लेना- (१) मरते समय बहुत कष्ट से साँस ले पाना। (२) बहुत अधिक दुख आदि के कारण लम्बी साँस लेकर और रोककर धीरे-धीरे निकलना या छोड़ना।
मुहा.-साँस लेना-कोई काम करते करते थककर विश्राम लेने के लिए ठहरना या रुकना।
संसर्ग के कारण उत्पन्न होनेवाला।
मुहा.-साँसा चढ़ना-बहुत चिंता होना।
उ.- जनक-सुता हेत हत्यौ लंकपति, बाँध्यौ साइय-(सायर)-पाँज-१-२५५।
उ.- साई बजाना-जिससे साई पायी हो, उसके यहाँ जाकर गाना-बजाना।
जलसाई-जलशायी, जल में शयन करनेवाले विष्णु।
उ.- अच्युत रहै सदा जलसाई-१०-३।
उ.- मोसौं कहना मोल को लीनौ, आपु कहावत साऊ-३८१।
साँभर झील या उसका निकटवर्ती प्रदेश।
उ.- साक पत्र लै सबै अघाए-१-१२२।
मुहा.-साक चलना-प्रभाव माना जाना, धाक बँधना। चलति साक- (सर्वत्र) प्रभाव या धाक है। उ.- करजकर पर कमल वारत चलति जहँ-तहँ साक-१४१३।
मुहा.-साँसा पड़ना-संदेह होना।
संगीत में षड़ज-सूचक शब्द।
उ.- तुम साकट वै भगत भागवत राग-द्वेष तैं न्यारे-१-२४२।
जिसने गुरु-दीक्षा न ली हो।
उ.- धावत अध अवनी आतुर तजि साकर सगुन सु छूटो-३४०१।
कल्पना या (योजना) जिसे क्रियात्मक रूप दिया जाय।
ईश्वर का अवतारी या मूर्तिमान रूप।
ईश्वर की मूर्ति, रूप या अवतार की उपासना।
भगवान रामचन्द्र का लोक या धाम।
प्रेमी-प्रेमिका का मिलन या क्रीड़ास्थल।
वह बाजार जहाँ वेश्यालय हों, चकला।
जो देवताओं का श्रृंगार करे।
(सं. श्रृंगार + हिं. इया)
(सं. श्रृंगार + हिं. इया)
उ.- कहुँ गजराज बाजि श्रृंगारे, तापर चढ़े जु आप-सारा ६७७।
मुहा.-साका चलना-रोब या धाक बँधना, प्रभाव माना जाना। साका चलाना या बाँधना-रोब या धाक जमाना, प्रभाव डालना। साकौ कीन्हौ-रोब या धाक जमाकर कीर्ति या ख्याति प्राप्त की है। उ.- ऎसौ और कौन त्रिभुवन मैं तुम सरि साकौ कीन्हौ-१०-३५।
ऎसा असामान्य कार्य जिससे कर्ता की कीर्ति या ख्याति बढ़े।
मूर्त, मूर्तिमान, साक्षात्।
मुलाकात, भेंट, देखा-देखी, मिलन।
वह जिसने किसी घटना को स्वयं देखा हो।
किसी बात को कहकर प्रमाणित करने की क्रिया, गवाही।
उ.- महा मधुर प्रिय बानी बोलत, साखामृग तुम किहिं के तात-९-६९।
उ.- (क) ऊँच-नीच ब्योरौ न रहाई। ताकी साखी मैं सुनि भाइ-१-२३०। (ख) सकल देव-मुनि साखी-१०-४। (ग) ग्वाल सबै हैं साखी-७७४। (घ) भए चंद्र सूरज तहाँ साखी-२४५९।
उ.- (क) चिंता तजै परीच्छित राजा सुनि सिख-साखि हमार-१-२२२। (ख) अब लौं हमारी जग में चलती नई पुरानी साखी-२७३९।
मुहा.-साखी पुकारना-गवाही देना। पुकारत साखि-गवाही देता है। उ.- सूरदास स्वामी के आगे निगम पुकारत साखि-३३७३।
ज्ञान-संबंधी दोहे, पद या कविता।
गवाही या साक्षी (देते) हैं।
उ.- जाति-पाँति-कुल कानि न मानत वेद-पुराननि साखै-१-१५।
विवाह के अवसर पर वर-वधू का वंश-परिचय देने की क्रिया।
कुछ पेड़ पौधो की पत्तियाँ जो तरकारी की तरह खायी जाती है।
उ.- (क) साग चना सँग सब चौराई-२३२१। (ख) भक्त के बस भक्त-वत्सल बिदुर सातों साग खायो-१० उ.-१८।
लेनदेन आदि में खरेपन की मान्यता।
उ.- सुर तरुवर की साख लेखिनी लिखत सारदा हारै-१-१८३।
उ.- (क) फल की आसा चित्त धरि, जो बृच्छ बढ़ावै। महामूढ़ सो मूल तजि साखा जल नावै-२-९। (ख) साखा पत्र भए जल मेलत-१०-१७३।
मुहा.-साग-पात समझना-बहुत तुच्छ समझना।
उ.-देखौ माई, सुंदरता कौ सागर-६२८।
उ.-कलानिधान सकल गुन-सागर-१-७।
दशनामी साधुओं की उपाधि या सांप्रदायिक नाम।
सामने, सम्मुख, प्रत्यक्ष रूप में।
उ.-(क) जीवनि-आस प्रबल स्त्रुति लेखी। साच्छात सो तुममैं देखी-१-२८४। (ख) ब्रह्मादिक खोजत नित जिनकौं। साच्छात् देख्यौ तुम तिनकौं-८००।
सजावट का काम, बात या तैयारी।
उ.-सूर अब डर न करि जुद्ध को साज करि-९-१४२।
वैभव, शोभा आदि की सूचक बातें।
उ.- या बिधि राजा करथौ बिचारि राज-साज सबहीं कौं डारि-१-३४१।
सजावट सामान, उपकरण या साग्री।
उ.-कर कंकन कंचन थार मंगल-साज लिए-१०-२४।
उ.-और पतित आवत न आँखि-तर देखत अपनौ साज-१-९६।
मुहा.-साज छेड़ना-बाजा बजाना शुरू करना।
बनाने या मरम्मत करनेवाला।
उ.-(क) नैन दोउ आँजति नासा बेसरि साजति-२०८०। (ख) उलटि अंग आभूषन साजति-२५७२।
अवसर के अनुकुल रूप म प्रस्तुत करके।
उ.-दिन दस लौं जल-कुंभ साजि दीप-दान करवायौ-९-५०।
उ.-सूरदास गोपी क्यौं जीवैं बिछुरे हरि जी साजन-१० उ.-९९।
उ.-(क) सूरदास प्रभु मिली राधिका अंग अंग करि साजन-६२२। (ख) दूलह फिरत ब्याह के साजन-३१८३।
आवश्यकतानुसार तैयारी करना।
उ.-फौज मदन लग्यो साजन-२८१७।
(तैयारी या साधना के) उपकरण या साधन।
उ.-कैसे हैं निबहत अबलन पै कठिन योग के साजु- ८०८।
उ.-चितवति हुती झरोखैं ठाढ़ी किये मिलन कों साजु-८०८।
ऎश्वर्य-सूचक बातें और साधन।
उ.-जा जस कारन देत सयाने तन-मन-धन सब साजु-२८५१।
मुक्ति का वह रूप जिसमें जीवत्मा जाकर परमात्मा में लीन हो जाय।
उ.-सब गोपिन मिलि सकटा साजे-४१२।
उ.-सकल सभा जिय जानिकै साजे हथियारा-१० उ.-८।
उ.- सूरदास प्रभु महा भक्ति तैं जाति अजातिहिं साजे-१-३६।
एक ऋषि जो शमीक के पुत्र थे और जिनके शाप से तक्षक ने राजा परीक्षित को डसा था।
दक्षिण भारत का एक प्रसिद्ध मठ जिसके अधीश्वर ‘शंकराचार्य’ कहलाते हैं।
(साँटे मार-मार-कर) हाथियों को लड़ानेवाला।
उ.- साठ सहस्र सागर के पुत्र-९-९।
जिसकी पूँजी नष्ट हो गयी हो, निर्धन।
उ.- सूर साजौं सबै, देहुँ डाँड़ी अबै, एक तैं एक रन करि बताऊँ-९-१२९।
सजाया या क्रमानुसार तैयार किया हुआ।
उ.- (क) सीरा साजौ लेहु ब्रजपती-३९६। (ख) सद माखन साजौ दधि मीठौ-४५६।
सजाया या क्रमानुसार प्रस्तुत किया हुआ।
उ.- देखो माई, रूप सरोवर साज्यो-पृ. ३४४ (३४)।
उ.- साझे भाग नहीं काहू को, हरि की कृपा निनारी-२९००।
उ.- बहुरिन जीवन-मरन सों साझो करी मधुप की प्रीति-२८८४।
उ.- साट सकुच नहिं मानहीं बहु बारनि मारि-१२६७।
बिलकुल निकम्मी या तुच्छ वस्तु।
दो चीजों को जोड़ना, मिलाना।
किसी को गुप्त रीति से अपनी ओर मिला लेना।
उ.- (क) साठि पुत्र अरु द्वादस कन्या-१-४३। (ख) साठि सहस की कथा सुनाए-९-९।
चौड़े किनारे की, स्त्रियों के पहनने की धोती।
शनि ग्रह की साढ़े सात दिन, मास या वर्ष की दशा जिसका फल बहुत बुरा होता है।
फसल जो असाढ़ मास में बोई जाती है, असाढ़ी।
दूध के ऊपर जमने या पड़नेवाली मलाई।
उ.- (क) सब हेरि धरी है साढ़ी, लई ऊपर ऊपर काढ़ी-१०-१८३। (ख) नीरस करि छाँड़ी सुफलक-सुत जैसैं दूध बिन साढ़ी-२५३५।
उ.- सातौं द्वीप राज ध्रुव कियौ-४-९।
मुहा.-सातौं भूल जाना-पाँच इंद्रियों के साथ-साथ मन और बुद्धि का भी काम न करना, होश-हवास चला जाना।
एक प्रत्यय जो शब्दांत में जुड़कर 'मिला हुआ' या 'रूप में आया हुआ' अर्थ देता है।
एक यादव जिसने श्रीकृष्ण और अर्जुन से अस्त्र विद्या सीखी थी।
चौड़े किनारे की जनानी धोती।
शनि ग्रह की वह दशा जो साढ़े सात दिन, मास या वर्ष की होती हे और जिसका फल बहुत बुरा होता है।
मुहा.-साढ़ेसाती आना या चढ़ना-दुर्दशा या। विपत्ति के दुर्दिन आना या होना।
जो पाँच और दो योग के बराबर हो।
उ.- तद्यपि भवन भाव नहिं ब्रज बिनु खोजौ दीपै सात-३३५१।
मुहा.-सात-पाँच या पाँच और सात- (१) चालाकी, चतुरता। उ.-सूरदास प्रभु के वै बचन सुनहु मधुर मधुर अब मोहिं भूली री पाँच और सात- पृ. ३१५ (४८)। (२) मक्कारी, धूर्तता। सात-पाँच करना- (१) बहाना करना या बनाना। (२) झगड़ा या उपद्रव करना। (३) चतुराई दिखाना। (४) मक्कारी या धूर्तता करना। सात परदे में रखना- (१) बहुत छिपाकर रखना। (२) बहुत सँभालकर रखना। सात समुद्र पार- बहुत दूर। सात राजाओं की साक्षी देना-किसी बात की सत्यता को दृढ़ता-पूर्वक कहना। सात राजा साखि-सत्यता की दृढ़ता-पूर्वक पूष्टि करके। उ.- मनसि बचन अरु कर्मना कछ कहति नाहिंन राखि। सूर प्रभु यह बोल हिरदय सात राजा साखि।
एक प्रत्यय जो 'मिला हुआ' या 'रूप में आया हुआ' अर्थ देता है।
विवाह की भाँवर नामक रीति जिसमें वर-वधू अग्नि की सात परिक्रमाएँ करते हैं।
जो क्रम में सात के स्थान पर हो।
उ.- सातवैं दिवस दिखराइहौं प्रलय तोहिं-८-१६।
उ.- पियौ पय मोद करि घूँट साता-४४०।
नाटक की एक वृत्ति जिसका व्यवहार वीर, रौद्र, अद्भुत और शांत रसों में होता है। इसमें नायक के वाक्यों से उसकी, दानशीलता आदि गुण प्रकट होते हैं।
सत्वगुण से सम्बन्ध रखनेवाला, सतोगुणी।
जिसमें सत्वगुण कौ प्रचानता हो।
सतोगुण से उत्पन्न आठ अंग-विकार-स्तंभ, स्वेद, रोमांच, स्वरभंग, कंप, वैवर्ण्य, अश्रु और प्रलय।
वह भक्त जिसकी वृत्ति में सत्वगुण की प्रधानता हो।
भक्त जिसकी वृत्ति में सात्विकता की प्रधानता हो।
उ.- भक्त सात्विकी सेवै संत, लखै तिन्हैं मूरति भगवंत ¨¨¨¨¨ भक्त सात्विकी चाहत मुक्ति-३-१३।
मुहा.-साथ छूटना-अलग होना। साथ देना-सहायता या सहयोग देना। साथ लेना- अपने संग ले चलना या रखना। साथ सोना- समागम करना। साथ रहकर या सोकर मुँह छिपाना- बहुत घनिष्ठता होने पर भी संकोच या दुराव करना। साथ का (को)-सहायक खाद्य पदार्थ। साथ का खेला-बचपन का साथी। साथ की खली-बचपन की सहचरी।
एक सम्बन्ध सूचक अव्यय, सहित।
उ.- (क) रहत विषय के साथ-१-११२। (ख) सेना साथ बहुत भाँतिनि की-१-१४१। (ग) अपनी समसरि और गोप जे तिनको साथ पठाए-५८३।
मुहा.-साथ ही-सिवा, अतिरिक्त। साथ-साथ या साथ ही साथ-एक ही सिलसिले में। एक साथ- एक क्रम या सिलसिले में।
उ.- नखन साथ तब उदर बिदारयौ-७-२।
उ.- (क) कुस-साथरी बैठि इक आसन-९-१२१। (ख) नातौ मान सगर सागर सौं कुस-साथरी परयौ-९१२२।
उ.- तुम अलि कमलनयन के साथी-३३२०।
उ.- हरि तुम साँकरे के साथी-१-११२।
(साथी या सहायक) रूप में (हों या रहते हों)।
उ.- सूर तुम्हारी आसा निबहै संकट मैं तुम साथै-१-११२।
साधारण और संक्षिप्त बनावट का।
जिसके ऊपर बेल-बूटे-जैसा सजावट का काम न हो।
जो छल-कपट न जानता हो, सीधा।
वह पूरी जिसमें पीठी, दाल आदि न भरी हो।
बड़ी-बड़ी बातें गढ़ने या हाँकनेवाला।
मुहा.- शेखी झड़ना, दूर होना या निकलना- घमंड चर हो जाना। शेखी बघारना, मारना या हाँकना - डींग मारना, गर्वभरी बातें करना।
भूत-प्रेत आदि को साधने या वश में करनेवाला।
जो दूसरे के स्वार्थ-साधन में सहायक हो।
वह जिससे कोई कार्य सिद्ध हो, जरिया, साधन।
वह हेतु या लक्षण जिसके आधार पर कोई बात सिद्ध करने का प्रयत्न किया जाय।
अभ्यास में संलग्न रहती है, साधना करती हैं।
उ.- गौरीपति पूजतिं, तप साधतिं, करत रहतिं नित नेम-७८२।
काम को सिद्ध करने की क्रिया, विधान।
उ.- दुर्मति अति अभिमान ज्ञान बिन सब साधन तैं टरतौं-१-२०३।
निर्देश, आदेश आदि के अनुसार कार्य का रूप देना।
कर्तव्य या दायित्य का निर्वाह।
वह उपचार या कार्य जिससे दोष या क्षति का परिहार हो।
सामान या उपकरण जिससे कोई वस्तु तैयार की जाय।
समान या सदृश होने का भाव, समानता।
(सं. श्रद्धा=उत्कट कामना)
उ.- (क) हरि देखन की साध भरी-९०२। (ख) बार-बार ललचात साध करि, सकुचति पुनि-पुनि बाला-२०७४। (ग) जोइ जोई मन की साध कहौं मैं करिहौं सोई-२६२५। (घ) कल्पतरु देखिबे की भई साध मोहिं-१० उ.-३१।
मुहा.-(किसी बात की) साध न रहने देना - सब प्रकार से इच्छा पूरी कर लेना या कर देना। साध राधना-इच्छा पूरी करना या होना।
गर्भ के सातवें महीने होनेवाला उत्सव।
(सं. श्रद्धा=उत्कट कामना)
उ.- हौं असाध, तुम साध हौ-१८१४।
उ.- महाराज, तुम तौ हौ साध-९-३।
उ.- पचि पचि रहे सिद्ध-साधक मुनि तऊ न घटै बढ़ै-१-२६३।
कार्य पूरा करने की शक्ति या सामर्थ्य।
औषध के लिए धातु-शोधन-कार्य।
उ.- (क) साधन मंत्र-जंत्र उद्यम बल ये सब डारो धोई-१-२६२। (ख) जप, तप ब्रत संजम साधन तैं द्रवित होत पाषान-७६५।
तपस्या-द्वारा मंत्र सिद्ध करना।
उ.- कहि आचार भक्ति बिधि भाषी हंस-धर्म प्रगटायो। कही बिभूति सिद्ध साधनता आस्रम चार कहायो-सारा. ८४४।
जो साधा या सिद्ध किया जा सके।
कार्य सिद्ध करने की क्रिया या भाव।
कार्य सिद्ध या पूरा करना।
निशाना लगाना, लक्ष्य या संधान करना।
बनावटी को असल की तरह कर दिखाना।
कार्य-साधन से सम्बन्ध रखनेवाला।
जमीन या दीवार की सीध नापने का औजार।
जो हो सके या साधा जा सके।
समान धर्म या गुणों से युक्त होने की अवस्था या भाव, 'वैधर्म्य' का विपर्याय।
उ.- (क) मनहुँ तड़ित घन इंदु तरनि, ह्वै बाल करत रस साधा-७०५। (ख) कहाँ मिली नँदनंदन को जिन पुरयौ मन की साधा-११३५। (ग) मैं जानी यह बात हृदय की रही नहीं कछ साधा-१४३७। (घ) कहति कंत (मोहिं) झूलन की साधा-२२७७।
जिसमें कोई विशेषता न हो, सामान्य।
साधारण' होने का भाव या धर्म।
विशिष्ठ तत्वों के आधार पर ऎसा सामान्य नियम या सिद्धांत स्थिर करना जो उन सब पर समान रूप से प्रयुक्त हो।
सज्जन गुण-धर्म के आधार पर अनेक तत्वों में समानता स्थिर करना।
सिद्ध या सम्पन्न करके, साधकर।
उ.- जब तैं रसना राम कह्यौ। मानौ धर्म साधि सब बैठयौ , पढ़िबै मैं धौं कहा रहयौ-२-८।
उ.- सुचि रुचि सहज समाधि साधि सठ, दीनबंधु करुनामय उर धरि-१-३१२।
जो अधिकारपूर्वक कहा या किया जाय।
सिद्ध या सम्पन्न की, लगायी।
उ.- जिहिं सुख कौं समाधि सिव साधी-१०-२२।
उ.- (क) साधु-निंदक स्वाद-लंपट कपटी गुरु-द्रोही-१-१२४। (ख) एक अधार साधु-संगति कौ-१-१३०।
मुहा.-साधु-साधु कहना- अच्छा काम करने पर किसी की बहुत प्रशंसा करना।
साधु' होने का भाव या धर्म।
साधु का या साधु-जैसा आचरण।
उत्तम कार्य करने पर 'साधु-साधु' कहकर उसकी प्रशंसा करना।
उ.- राघव आवत हैं अवध आज। रिपु जीते, साधे देव-काज-९-१६६।
ठाने, पक्का किये, ठहराये।
उ.- सुफलत-सुत मिलि ढँग ठान्यो है, साधे बिष मन घात-३३५१।
उ.- हौं अनाथ बैठ्यौ द्रुम-डरिया पारधि साधे बान-१-९७।
उ.- पति कैं हेत नेम तप साधैं-७९९।
उ.- मुक्ति हेत जोगी स्रम साधै-१-१०४।
उ.- जसुमति जोरि जोरि रजु बाँधै। अंगुर द्वै द्वै जोंवरि साधै-३९१।
उ.- (क) नैन मरत दरसन की साधो-१८०९। (ख) मिटै न दरस की साधो-२५०८। (ग) को जानै तन छूट जायगो, सूल रहै जिय साधो-२७५८।
उ.- बहुरि नृप आपनौ कर्म साधौ-८-१६।
(सिद्ध या संपन्न) करने योग्य।
जो सिद्ध या संपन्न हो सके।
(बात) जो सिद्ध या प्रमाणित करना हो।
मुहा.- शेर होना - उद्दंड हो जाना।
(रोग) जो ठीक किया जा सके।
ज्योतिष के सत्ताइस योगों में इक्कीसवाँ जो बहुत शुभ माना जाता है।
वह पदार्थ जिसका अनुमान किया जाय।
प्रश्न या समस्या रूप में सामने आनेवाली बात जिसे ठीक सिद्ध करना हो।
सिद्ध, संपन्न या पूर्ण किया।
उ.- लै चरनोदक निज ब्रत साध्यौ-९-५।
उ.- (क) सकल जोग ब्रत साध्यौ-१२-१२८। (ख) मन-क्रम-बच हरि सों धरि पतिब्रत प्रेम योग तप साध्यौ-३०१४।
उ.- लागत तो जानो नहिं बिषम बाण साध्यौ-२८०६।
शुद्ध चरित्र या आचरणवाली, सच्चरित्रा।
वह पत्थर जिस पर घिसकर अस्त्रादि की धार तेज की जाती है।
मुहा.-सान देना या धरना-धार तेज करना। सान धराना-धार तेज कराना। सान धराए-(हथियार) तेज किये हुए। लै लै ते हथियार आपने सान धराए त्यौं-१-१५१।
किसी चूर्ण को तरल पदार्थ मिलाकर गीला करना, गूँधना।
एक के दोष, अपराध आदि के लिए उसके साथ दूसरे को अकारण ही दोषी या अपराधी बनाने का प्रयत्न करना।
मिलाकर, लपेटकर, मिश्रित करके।
उ.- (क) यह सुनि धावत धरनि चरन की प्रतिमा खगी पंथ में पाई। नैन नीर रघुनाथ सानि सो सिव ज्यों गात चढ़ाई-९-६४। (ख) सानि-सानि दधि-भात लियौ कर सुहृद सखनि कर देत-४१६। (ग) रंग कापै होत न्यारो हरद-चूनो स नि-८९५। (घ) जोग पाती हाथ दीनी बिष लगायौ सानि-३३५५।
उ.- दूध औटथौ आनि अधिक मिसरी सानि-४४०।
भूसा या चारा जो पानी से सानकर पशुओं को खिलाया जाता है।
अनुचित रीति से एक में मिलाए हुए कई खाद्य पदार्थ (व्यंग्य)।
बराबरी का, समानता करनेवाला।
उ.- सद दधि-माखन द्यौं आनी। तापर मधुमिसरी सानी-१०-१८३।
लपेट या लथेड़ दी, भिगो दी।
उ.- मेरे सिर की नई बहनियाँ, लै गोरस मैं सानी-१०-३३८।
भरी या लिपटी हुई, सनी हुई।
उ.- यह है बिन कलंक की साँची, हम कलंक में सानी-१६३०।
उ.- भूषन मय मनि साने-१३५४।
उ.- जैसे हरि तैसे तुम सेवक कपट चतुरई साने हो-३०१५।
उ.- तब महरि बाँह गहि आनै। लै तेल उबटनो सानै-१०-१८३।
मुक्ति का वह प्रकार जिसमें आत्मा, परमात्मा समीप पहुँचती मानी जाती है।
समीप होने का भाव या धर्म।
उ.- ऊख माहिं ज्यों रस है सान्यौ-३-१३।
किसी के अनिष्ट की कामना से कहा हुआ वाक्य।
उ.- (क) दैहौं साप, महा दुख भरै-१-२२९। (ख) धन्य धन्य रिषि साप हमारे-३८५।
शाप देने की क्रिया या भाव, शाप देने (को)।
उ.- (क) कौरव-काज चले रिषि सापन-१-१३। (ख) अतिथि रिषीस्वर सापन आए-१-२८२।
अनिष्ट की कामना से कोई बात कहना, शाप देना।
उ.- जिय अति डरयौ, मोहिं मति सापै, ब्याकुल बचन कहंत-९-८३।
जो किसी तत्व, विचार आदि से संबंधित होने के कारण उसकी अपेक्षा रखता हो।
किसी की अपेक्षा करनेवाला।
जो निर्णय या आदेश की अपेक्षा में रूका हो।
वह सिद्धांत जिसमें दो बातें एक दूसरे की अपेक्षक मानी जाती हैं।
प्रति सप्ताह छपने या प्रकाशित होनेवाला।
जिसमें गड़बड़ी या झगड़ा-बखेड़ा न हो।
मुहा. साफ-साफ सुनाना- खरी बातें कहना।
जिसके सुनने-समझने में कठिनाई न हो।
जिसमें कुछ सार- तत्व न रह गया हो।
मुहा.- साफ करना- (१) मार डालना। (२) चौपट कर देना। (३) खा-पी जाना।
लेन-देन का निपटना या चुकता होना।
उ.- बढ़ौ तुम्हार बरामद हूँ कौ लिखि किन्हो है साफ-१-१४३।
बिना किसी दाग, द्वेष या कलंक के।
इस तरह कि किसी को पता न लगे या कोई बाधक न बन सके।
पशु-पक्षियों को किसी उद्देश्य से उपवास कराना।
मुहा. साफा देना - भूखा रखना।
वस्त्रादि को साबुन लगाकर साफ करना।
वहं कपड़ा जो गाँजा पीनेवाले चिलम के नीचे रखते हैं।
बची हुई वस्तु, भाग या संख्या।
सहस्त्र फनों का सर्पराज जिसके फनों पर पृथ्वी टिकी है, अनंत।
लक्ष्मण जो ‘शेष’ का अवतार कहे जाते हैं।
बलराम जो ‘शेष’ का अवतार कहे जाते हैं।
एक प्रकार का सिद्ध मंत्र जो शिव कृत माना जाता है।
उ.- साबर मंत्र लिख्यौ स्रुतिद्वार।
उ.- साबिक जमा हुती जो जोरी मिनजालिक तल ल्यायौ-१-१४३।
साबिक-दस्तूर - जैसा पहले था वैसे ही।
सरोकार, संबंध, ब्यवहार, संपर्क।
मुहा. साबिका पड़ना - (१) काम पड़ना। (२) संबंध होना। (३) लेन-देन होना।
उ.- द्वै लोचन साबित नहिं तेऊ -१४२८।
शरीर, वस्त्रादि साफ करने का एक प्रसिद्ध पदार्थ।
सागू के तने के गूदे से तैयार किये गये दाने जो शीध्र पच जाने के लिए प्रसिद्ध हैं।
विरोध या विषमता का अभाव, एकरसता।
बड़ा और शक्तिशाली जमींदार या सरदार।
राजनीति के चार अंगों में एक जिसमें शत्रु से मीठी-मीठी बातें करके उसे अपनी ओर मिला लिया जाता है।
मधुर वचन बोलने की रीति-नीति।
सामवेद का गायक या ज्ञाता।
धर-गृहस्थी के काम की वस्तु।
मुहा. शामत सवार होना - विपत्ति का समय आना।
समक्ष या सम्मुख होने की क्रिया या भाव।
किसी पदार्थ का आगे का भाग।
वर्तमान समय या स्थिति के विचार से युक्त दृष्टिकोण या अवस्था।
मुकाबला, विरूद्ध या विपक्ष में होना।
मुहा. सामना करना समक्ष या सम्मुख रहकर जवाब देना या धृष्टता करना।
(सं. सम्मिख, पु. हिं. सामुहें)
मुहा.-सामने आना- आगे या सम्मुख आना। सामने का-(१) जो सम्मुख या समक्ष हो। (२) जो अपनी उपस्थिति में घटित हुआ हो। (३) जो अपनी उपस्थिति में जन्मा या पला हो। सामने करना-सम्मुख या समक्ष उपस्थित करना। सामने की बात-बात जो अपने सामने घटित हुई हो। सामने पड़ना-दिखायी दे जाना। सामने होना- (स्त्री का) परदा न करके सम्मुख या समक्ष आना।
(सं. सम्मिख, पु. हिं. सामुहें)
(सं. सम्मिख, पु. हिं. सामुहें)
(सं. सम्मिख, पु. हिं. सामुहें)
(सं. सम्मिख, पु. हिं. सामुहें)
उ.-भीर भई दसरथ के आँगन सामबेद धुनि छाई-९-१७।
समय की दृष्टि से ठीक, उचित या उपयक्त, समयानुसार।
भारतीय आर्यों के चार वेदों में तीसरा जिसकी ऋचाऎ गायत्री छंद में हैं।
साम, दाम, दंड, भेद, राजनीति के इन चार अंगों का ज्ञाता, राजनीतिज्ञ।
मुहा.-सामान बाधना-चलने की तैयारी करना।
लगभग सबसे संबंध रखनेवाला।
सारे वर्ग में समान रूप से पाया जानेवाला गुण या धर्म।
मामूली या सामान्य होने का भाव या स्थिति।
लगभग सर्वत्र सामान्य रूप से पाये जाने का भाव या स्थिति।
वह सहज बुद्धि जो सामान्यतया सभी में होती है और जिससे वे साधारण कार्य अंतःप्रेरणा से ही किया करते हैं।
साधारण कर्तव्य या दायित्व-संबंधी आज्ञा या विधि।
नायिका जो धन लेकर पर पुरुष से संबंध रखती है।
ऊनी या रेशमी चादर, दुशाला।
सालने या पीड़ा पहुँचाने वाला।
उ.-जो रिपु तुम पहिले हति हाँडे बहुरि भए मम शालक-३१६५।
उ.-¨¨¨¨¨¨ अनंत शक्ति प्रभु असुर शालक- १० उ.- ३५।
गंडकी नदी से प्राप्त पत्थर की बटिया जिस पर चक्र का चिह्न बना रहता है; यह विष्णु की मूर्ति मानी जाती है।
उ.-सूर नंद के हृदय सालत सदा-२४६६।
उ.-अब वै शलति हैं उर महियाँ-२५४२।
सौभ रज्य का राजा जो शिशुपाल का मित्र था और जो उसकी मृत्यु कै पश्चात् द्वारका का घेरा डालने पर श्रीकृष्ण द्वारा मारा गया था।
उ.- (क) शालव दंतबक्र बनारसी को नृपति चढ़े दल साजि मानो रविहिं छाए-१० उ.- २१। (ख) कीन्हों युद्ध आप शालव सों उन बहु माया कीनी-सारा. ७९२।
उ.- बातें करत शेष निसि आई ऊषा गए असनान-सारा.।
शेष जिसके सहस्त्र फनों पर पृथ्वी टिकी मानी जाती है।
विष्णु जो शेषनाग पर शयन करनेवाले माने जाते हैं।
(भोजन) जिसमें आमिष (मांस, मछली आदि) का अंश हो।
मुक्ति का एक प्रकार जिसमें जीव का परमाराध्य के समीप पहुँच जाना माना जाता है।
उ.-सालोक्य सामीप्य नासारोपिता भुज चारि-२९२४।
जो समुद्र से उत्पन्न हुआ हो।
वह विद्या जिसमें मनुष्य की हथेली या शारीरिक लक्षण देखकर जीवन की घटनाऎं तथा शुभाशुभ फल आदि बताये जाते हैं।
इस विद्या का ज्ञाता व्यक्ति।
सामुहाँ, सामुहीं, सामुहें, समुहैं
उ.- (क) रथ तैं उतरि चक्र कर लीन्हौ, सुभट सामुहैं आए-१-२७४। (ख) जाके अस्त्र तिनहिं तेहि मारयौ, चले सामुहीं खौरी-२५८६। (ग) मैं जब चली सामुहैं पकरन तब के गुन कहा कहिऎ-१०-३२२।
एक पाश्चात्य सामाजिक सिद्धांत जिसके अनुसार समाज में सभी को समान होना चाहिए, किसी को न बहुत अमीर होना चाहिए न बहुत गरीब; समाजवाद, समष्टिवाद।
उक्त सिद्धान्त का समर्थक, समाज या समष्टिवादी।
वह सिद्धांत जिसके अनुसार साम्राज्य बनाये रखा और बढ़ाया जाय।
संध्या-संबंधी, संध्याकालीन।
उ.- (क) त्यागति प्रान निरखि सायक-धनु-१-२९। (ख) राम धनुष अरु सायक साँधे-९-५८।
(कामदेव के पाँच वाणों के कारण) पाँच की संख्या।
सूर्य की वह गति जब उसके भूमध्य रेखा पर पहुँचने पर (२० मार्च और २३ सितम्बर को) दिन और रात दोनों बराबर होते हैं।
मुहा.- साया मिलना-शरण या संरक्षंण पाना।
मुहा.- साया से बचना या भागना-बहुत दूर या बचकर रहना।
मुहा.- साया आना या पड़ना भूत, प्रेत आदि से प्रभावान्वित होना।
मुहा.- साया पड़ना-किसी की कुसंगत का असर होना। साया डालना- (१) कृपा करना। (२) प्रभाव डालना।
मुक्ति का एक प्रकार जिसमें जीवात्मा परमात्मा में लीन हो जाता है।
मकान या कमरे के सामने का छाजन या ओसारा।
उ.- (क) कागद धरनि, करै द्रुम लेखनि, जल-सायर मसि घोरै-१-१२५। (ख) सकल बिषय-बिकार तजि तू उतरि सायर-सेत-१-३११।
उ.- सात दिवस मूसल जलधारा सायर समुद्र भरे-९६८।
उ.- (क) प्रथम ही उपमान सारँग सों करावत हेत-लहरी.। (ख) स्रवन सुयस सारंग नाद-विधि-२-१२।
उ.- (क) बयन बर सारँग सम-लहरी। (ख) निकस सारँग तें सु 'सारँग' हरत तन की ताप-लहरी.। (ग) सूरदास सदा प्रहर्षन सुरुच सारँग बैन- लहरी.।
उ.- हेरो सारँग मदन-तिया के अंत बिचारी बाम-लहरी.।
उ.- (क) जलसुत दुखी, दुखी है मधुकर द्वै पंछी दुख पावत। सूरदास सारँग केहि कारन सारँग-कुलहिं लजावत। (ख) उदै 'सारँग' जान सारँग गयौ अपने देस-लहरी. ५५।
उ.- सारँग ऊपर सारँग राजत 'सारँग' शब्द सुनावै-सारा. ९४४।
(क) ति पी-पी डर डार दीनी, प्रान बारी रंक। रटन सारँग तें निकासी साग समर मिलाइ। डार दीनी सुमुख तिनकैं-लहरी.।
उ.- निकस 'सारँग' कें सारँग, हरत तन की ताप-लहरी.।
उ.- (क) लब उलटौ दो जाऊँ तिहारी, ताकौ सारँग-नैन-लहरी.। (ख) उलटौ रस सारँग हित सजनी, कबहूँ तीर न जैहौं-लहरी.। (ग) सारँग सम कर नीक-लहरी.।
उ.- मानहुँ उमँगि चल्यौ चाहत है सारँग सुधे भरे।
उ.- खुल्यौ चाहत सरनि सारँग, देत 'सारँग' दान-लहरी.।
भोंरा या लट्टू नामक खिलौना।
उ.- नचत हैं सारंग सुंदर करत सब्द अनेक-लहरी.।
उ.- (क) गहि सारँग, रन रावन जीत्यौ-१-२४। (ख) घन तन दिव्य कवच सजि करि अरु कर धारयौ सारँग-९-१५८। (ग) एकहू बान आयौ न हरि के निकट, तब गहयौ धनुष सारंगधारी।
उ.- सारँग-सुता देखि 'सारँग' कौं तेरौ अटल सुहाग-सारा. ९४६।
उ.- धिग 'सारंग', सारँगमय सजनी- लहरी.।
उ.- ज्यौं सारँग, सारँग के कारन, 'सारँग' सहत, न डोलै-लहरी।
उ.- जनु पिनाक की आस लागि ससि सारँग सरन बचै।
असत् पथ-भ्रष्ट करनेवाला (दुष्ट) देवता।
मुहा. - शैतान का बच्चा - बहुत दुष्ट या नीच आदमी। शैतान की आँत - लंबी चीज।
उ.- (क) दीन्हों डारि शैल तें भू पर घुनि जल भीतर डारयो। (ख) मुष्टिक अरूचाणूर शैल सम सुनियत हैं अति भारे-२५६९।
उ.- सारँग चरन पीठ पर 'सारँग', कनक खंभ अहि मनहुँ चढ़ोरी-लहरी.।
उ.- सारंग देख सुनै मृगनैनी, सारंग-सुख दरसावै-सारा. ९४४।
उ.- 'सारँग' हेरत उर सारँग तें, सारंग-सुत ढिंग आवै-लहरी.।
धिग सारँग, 'सारँग' मै सजनी, सारंग अंग समाई-लहरी.।
उ.- 'सारँग' बस भय, भय बस सारँग, 'सारँग' बिसमै मानै-लहरी.।
ज्यों सारँग 'सारँग' के कारन सारँग सहत, न डोले- लहरी.।
उ.- (क) बाचर नीतन तें सारँग अति, बार-बार झर लावै-लहरी। (ख) 'सारँग' ऊपर 'सारँग' राजत, सारँग सब्द सुनावै-सारा. ९४४।
उ.- (क) धिग सारँग, सारँग मैं सजनी, 'सारँग' अंग न समाई-लहरी.। (ख) सारँग देख सुनै मृगनैनी, 'सारँग' सुख दरसावै-सारा. ९४४।
उ.- सारँग दसन बसन पुनि 'सारँग' बसन पीतपट डारी।
उ.- सारँग नैन बैन बर 'सारँग' सारँग बदन कहै छबि को री-लहरीं।
सारंग' नामक धनुष धारण करनेवाले विष्णु या उनके अवतार।
उ.- (क) श्रीनाथ सारंगधर कृपा करि दीन पर-१-१२०। (ख) जब लौं सारँग-धर-कर नाहीं सारँग-बान बिराजत-९-१३०। (ग) सरन साधु श्रीपति सारँग-धर-९८२।
उ.- सारँग-पति ता पति ता बाहन कीरत रट अनुराग-सारा. ९४६।
(हिं. सारंग= समुद्र+पत्नि)
उ.- स्रवन बचन तें पावन पतिनी-सारँग कहत पुकार-लहरी.।
सारँगपाणि, सारँगपानि, सारँगपानी
सारंग' नामक धनुष धारण करनेवाले विष्णु या उनके अवतार।
उ.- (क) तेली के बृष लौं नित भरमत भजत न सारँगपानि-१-१०२। (ख) सोइ दसदथ कुल-चंद्र अमित बल आए सारँग-पानी-९-११५। (ग) कुंभकरन समुझाइ रहे पचि, दै सीता सारँगपानी-९-१६०।
कमल का पिता, जल या समुद्र।
उ.- सारंग-पितु-सुत-धर-सुत-बाहन आजु न नैंक पुकारै-लहरी.।
एक प्रसिद्धबाजा जिसमें लगे हुए तार कमानी से बजाये जाते हैं।
उ.- सुर सरनाई सरस सारंगी उपजत तान तरंग-सारा।
पदार्थ का मूल या मुख्य भाग, सत्त, तत्व।
सार कौ सार-सर्वोत्तम तत्व।
उ.- (क) सूर भक्त-बत्सलता बरनौ सर्व कथा कौ सार-१-२६७। (ख) सार कौ सार संकल-सुख कौ सुख हनूमान-सिव जानि गह्यौ-२-८।
किसी पदार्थ का अरक या रस।
भौरे का शत्रु, चंपा पुष्प।
उ.- आदि को सारंग-बैरी पट प्रथम दिखराइ-सहरी.।
उ.- सारँग-माल लसत सारँग सी-लहरी.।
दीपक का शत्रु वस्त्र या घूँघट।
(हिं. सारंग=दीपक, भौंरा+रिपु)
उ.- परौ सारँग-रिपु न मानत करत अद्भुत खेद-लहरी.।
दीपक का शत्रु वस्त्र या साड़ी रा अंचल।
(हिं. सारंग=दीपक, भौंरा+रिपु)
उ.- आनन-अमल पोंछ सारँग-रिपु तैं-लहरी.।
भ्रमर का शत्रु, चंपा का फूल।
(हिं. सारंग=दीपक, भौंरा+रिपु)
उ.- सुधा गेह में करि की सोभा, सारँग-रिपु सीस बनैहै-लहरी.।
मृग या हिरन जैसी नेत्रवाली, मृगनयनी।
उ.- (क) बिछुर गयौ सारँग-सुत सिगरौ-लहरी.। (ख) सारँग-सुत नीकन तें बिछुरत-लहरी.। (ग) सारँग-सुत नीकन में सोहत-लहरी.। (घ) सारँग-सुत रेख सँभारी- लहरी.।
आह्लाद की पुत्री, आह्लादिनी या आनंद देनेवाली शक्ति।
(हिं. सारंग= आह्लाद, सूर्य+सुता=पुत्री)
उ.- सारँग-सुता देख सारँग को, तेरौ अटल सुहाग-सारा.।
(हिं. सारंग=आह्लाद, सूर्य+सुता=पुत्री)
उ.- ब्रह्म-सुता-सुत-पद-रज परसत, सारँग-सुता दिखावै-सारा. ९६१।
उ.- सारँग-माल लसत सारँग-सी सारंगीनि जो फूली-लहरी.।
उ.- हम तीनों हैं जग-करतार, माँगि लेहु हमसौं बर सार-४-३।
उ.- तलफत छाँड़ि गए मधुबन को बहुरि न कीन्ही सार-२७१७।
उ.- जहँ जहँ दुसह कष्ट भक्तनि कौं तहँ तहँ सार करै-१-४५।
मन में खटकने या कष्ट देनेवाली बात।
उ.- सखी री स्याम सबै इक सार-२६८७।
तत्व-भाग स्वीकार या ग्रहण करने का भाव, अवस्था या प्रवृत्ति।
तत्व-भाग ग्रहण करने का भाव, अवस्था या प्रवृत्ति।
पारे आदि रसों का संस्कार।
रावण का एक मंत्री जो राम की सेना में उनका भेद लेन गया था।
छोटे-छोटे खानों में अंक आदि की सूची।
उ.- बरबस ही लै जान कहत हैं, पैज आपनी सारत -पृ. ३२७ (६८)।
सार या तत्व का भाव या धर्म।
उ.- पारथ के सारथि हरि आप भए हैं-१-२३।
सारथी का कार्य, पद या भाव।
गोवर्द्धन पर्वत की एक नदी जिसमें श्रीकृष्ण द्वारा सब तीर्थों का आवाहन किया जाना प्रसिद्ध है।
उ.- सूरदास प्रभु शैलधरन बिनु कहा सबै अब तोते-२८३३।
उ.- (क) अरजुन के हरि हुते सारथी-१-२६४। (ख) सारथी पाय रूख दये सटकार हय-१० उ.-५६।
सारथी का कार्य, पद या भाव।
उ.- (क) सेस, सारद रिषय नारद संत चिंतन सरन-१-३०८। (ख) गौरि गनेस्वर बोनऊँ (हो) देवी सारद तोहिं -१०-४०।
उ.- सुर-तरूवर की साख लेखिनी लिखत सारदा हारैं-१-१८३।
रावण का मंत्री जो गुप्त दूत बनकर राम की सेना का भेदे लेने गया था।
उ.- सुक-सारन द्वै दूत पठाए-९-१२०।
प्रतिज्ञा पूरी करना, प्रण पालना।
सँभालना, देखरेख या रक्षा करना।
(अस्त्र-शस्त्र) चलाना, प्रहार करना।
उ.- (क) सारस रस अचवन को मानो तृषित मधुप जुग जोर। (ख) सारस हूँ तैं नैन बिसाला-२४८२।
उ.- निरखति बैठि नितंबिनि पिय सँग सार-सुता की ओर।
बनारस से उत्तर-पश्चिम पर स्थित एक प्रसिद्ध स्थान जो हिंदुओं, बौद्धों और जैनियों का तीर्थ है। यही प्राचीन मृगदाव है जहाँ से गौतम बुद्ध ने अपना उपदेश आरम्भ किया था।
उ.- ललिता बिसाखा ब्रजबधू झुलावैं सुरुचि सार सारको सारनो-२२८०।
उ.- मृग मृगनी द्रुम बन सारस खग काहू नहीं बतायौ री-१८०८।
दिल्ली के उत्तर-पश्चिम का वह प्रदेश जो सरस्वती नदी के तट पर है।
इस देश का प्राचीन निवासी।
सार के सारा- सर्वश्रेष्ठ या मूल तत्व।
उ.- तुम संसार-सार के सारा-२४५९।
चौपड़ या जूआ खेलने का पासा।
उ.- ढारि पासा साधु-संगति फेरि रसना सारि। दाँव अबकैं परथौ पूरो कुमति पिछली हारि-१-३०९।
उ.- चौपरि जगत मड़े जुग बीते। गुन पाँसे, क्रम अंक, चारि गति सारि, न कबहूँ जीते-१-६।
उ.- पगनि जेहरि लाल लहँगा अंग पँचरँग सारि-पृ. ३४४ (२९)।
(तिलक आदि) लगाकर या बनाकर।
उ.- इंद्र की पूजा मिटाई, तिलक गिरि को सारि-९४१।
उ.- सारि जेवनार अँचवन कै भए सुद्ध दियौ तमोर नँद हर्ष आगे-२४९३।
(व्रत आदि का) निर्वाह या पालन (करो)।
उ.- भूख लगी भोजन करिहैं हम नेम सारि तुम लेहु-२५५३।
उ.- बन उपबन फल फूल सुभग सर सुक सारिका हंस पारावत।
उ.- तुम सारिखे बसीठ पठाए कहिए कहा बुद्धि उन केरी-३०१२।
खाने या स्तंभ-रूप में दिये गये अंक आदि।
स्त्रियों की बढ़िया धोती, साड़ी।
उ.- (क) तब अंबर और मँगाइ सारी सुरंग चुनी-१०-२४। (ख) यह तौ लाल ढिगनि की औरै है काहू की सारी-६९३।
उ.- बलि हो बृन्दाबन की भूमिहिं सो तो भाग की सारी-३४१२।
उ.- मनहुँ छिड़ाइ लिये नँदनंदन वा ससि को सत सारु-१३३२।
समान रूप होने का भाव, एकरूपता।
पाँच प्रकार की मुक्तियों में एक जिसमें भक्त उपास्य का ही रूप प्राप्त कर लेता है।
उ.- (क) भीमादिक रोए पुनि सारे-१-२८८। (ख) यौं कहि पुनि बैकुंठ सिधारे। बिधि हरि महादेव सुर सारे-४-५।
उ.- जन्मत ही गोकुल सुख दीन्हो नंद दुलार बहुत सारे री-२५३३।
उ.- जज्ञ मैं करत तब मेघ बरसत मही, बीज अंकुर तबै जमत सारौ-४-११।
सारंग' नामक धनुष धारण करनेवाले विष्णु या उनके अवतार।
उ.- फूली है जसोदा रानी, सुत जायौ सार्ङ्गपानी -१०-३४।
समूह में जाकर व्यापार करनेवालों का नायक।
समूह के साथ दूर स्थानों में जाकर व्यापार करनेवाला।
सत्यवादी हरिश्चन्द्र की रानी।
बाल्यावस्था या शिशु-अवस्था-संबंधी।
प्रियजन के अभाव या पीड़ा आदि से उत्पन्न दुख; (नौ रसों के नौ स्थायी भावों में एक है शोक जो करूण रस का मूल है; इसे मृत्यु का पुत्र कहा गया है)।
उ.- मदन गोपाल देखियत हैं सब अब दुख शोक बिसारी-२५६६।
उ.- अदिति सुतन को कारज सारयो-११-२।
सब लोगों से संबंध रखनेवाला।
सब देशों में होनेवाला या सब देशों से संबंधित।
सब भूतों या तत्वों से संबंधित या उनमे होनेवाला।
सारी पृथ्वी से संबंधित या उसमें होनेवाला।
सारी पृथ्वी से संबंधित या उसमें होनेवाला।
सारी पृथ्वी के समस्त देशों को एक समान समझने के उदार दृष्टिकोणवाला।
उ.- सुरति-साल-ज्वाला उर अंतर ज्यौं पावकहिं पियौ-९-४६।
चुभने, खटकने या पीड़ा पहुँचानेवाले।
उ.- (क) बैरिनि कौ उर साल-१०-१३८। (ख) मन-मन बिहँसत गोपाल, भक्त-पाल, दुष्ट-साल-१०-२७६।
[हिं. सालना+क (प्रत्य.) ]
उ.- (क) सुर पालक असुरनि उर सालक त्रिभुवन जाहि डराई-३६३। (ख) सूर स्याम चले गाइ चरावन कंस उरहिं के सालक-४३६। (ग) तुही अनंत सक्ति प्रभु असुर सालक-१० उ.-३५।
एक लकड़ी आदि में छेद करके दूसरी का सिरा उसमें डालना।
इस संबंध की सूचक एक गाली।
नेता, अगुआ, प्रधान, नायक।
गंडक नदी (जिसमें शालग्राम की शिलाएँ पायी जाती हैं )।
छेद करते, चुभते या दुख पहुँचाते हैं।
उ.- आपुस ही में कहत हँसत हैं प्रभु हृदय यह सालत-२५७४।
उ.- (क) सालन सकल कपूर सुबासत, स्वाद लेत सुंदर हरि ग्रासत-३९६। (ख) बेसन सालन अधिकौ नागर-२३२१।
विष्णु की, एक प्रकार के गोल पत्थर की, मूर्ति।
उ.- सालिग्राम मेलि मुख भीतर बैठि रहे अरगाई-१०-२६३।
एक तरह का लाल कपड़ा जो विवाह जैसे मांगलिक कार्यों में उपयोग में आता है।
पाँच प्रकार की मुक्तियों में एक जिसमें भक्त भगवान के साथ उनके लोक में वास करता है।
उ.- (क) सालोक्य सामीप्य नासारोपिता भुज चारि-२९२४। (ख) हम सालोक्य स्वरूप सरो जो रहत समीप सहाई-३२९०।
उ.- सातों दीप ¨¨¨¨¨। जबू प्लच्छ, क्रौच, साक, साल्मलि कुस पुष्कर भरपूर-सारा. ३४।
उ.- ताहि-आवत निरखि स्याम निज साँग को काटि करि साल्व की सुधि भुलाई-१० उ.-५६
एक सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय का समय।
सावन में गाया जानेवाला एक गीत।
सावन में वर-पक्ष की ओर से कन्या के लिए भेजे जानेवाले वस्त्र, मिठाई आदि उपहार।
उ.- रंगमहल में जहँ नँदरानी खेलति सावनी तीज सुहाई-२२९०।
सावन मास की पूर्णमा जो 'रक्षाबंधन' का दिन है।
उ.- सावर-मंत्र लिख्यौ स्त्रुति-द्वार।
उ.- (क) अजहूँ सावधान किन होहि। माया बिषम भुजंगिनि कौ बिष उतरयौ नाहिंन तोहिं-२-३२। (ख) सावधान करिकै गई-१६७८।
जिसमें या जिसकी अवधि निश्चित की गयी हो।
श्रावण मास जब खूब पानी बरसता है।
उ.- नैना सावन-भादों जीते-२७६५।
इस मास में गाया जानेवाला एक प्रकार का गीत।
वह भूस्वामी जो किसी बड़े राजा को कर देता हो।
उ.- लात के लगत सिर तें गयो मुकुट गिर केस धरि लै चले हरषि सावंत-।
उ.- सिंह-सावक ज्यौं तजै गृह इंद्र आदि डरात-१-१०६।
साष्टांग प्रणाम -भूमि पर लेटकर, मस्तक, हाथ, पैर, हृदय, आँख, जाँघ, वचन और मन से प्रणाम करना।
मुहा.- (किसी को) साष्टांग प्रणाम कहना या करना-(किसी से) बहुत दूर या बचकर रहना।
उ.- जिय परी ग्रंथि कौन छोर, निकट ननँद न सास-पृ. ३४८ (५७)।
वह वृद्धा जिससे पति या पत्नी की माता-जैसा संबंध माना जाय।
उ.- नाहीं ब्रज-वास, सास, ऎसी बिधि मेरौ-१०-२७६।
पद्धति, प्रणाली, परिपाटी।
वाक्य-रचना की विशिष्ट रीति।
उपनयन के समय होनेवाला एक संस्कार।
मद्र देश के राजा अश्वपति की पुत्री जो सत्यवान को ब्याही थी और जिसने अपने मृत पति के प्राण वरदाल-रूप में यमराज को प्रसन्न करके प्राप्त किये थे।
वह व्रत जो स्त्रियाँ, पतियों की दीर्घायु-कामना से ज्येष्ठ कृष्ण १४ को करती हैं।
बहुत अधिक शारीरिक कष्ट, साँसत।
उ.- (क) बहुत सासना दई प्रहलादहिं ताहि निसंक कियौ-१-३८। (ख) हिरनाकुस प्रहलाद भक्त कौं बहुत सासना जारयौ-१-१०९।
(सं. साधनिक, प्रा. साहनिय)
(सं. साधनिक, प्रा. साहनिय)
(सं. साधनिक, प्रा. साहनिय)
(सं. साधनिक, प्रा. साहनिय)
उ.- (क) तुम साहब मैं ढाढ़ी तुम्हरौ प्रभु मेरे ब्रजराज-१०-३६। (ख) पोषन-भरन बिसंभर साहब-१-३५। (ग) साहब सों जो करै धुताई-१०४१।
एक सम्मानसूचक शब्द, महाशय।
बहुत अधिक शारीरिक कष्ट देना।
उ.- (क) सासु-ननद घर घर लिए डोलतिं, याकौं रोग बिचारौ री-१०-१३५। (ख) सासु रिसाय, लरै मेरी ननदी-२३९७।
मन की वह दृढ़ता जो कोई बड़ा काम करने को प्रवृत्त करती है, हिम्मत, हियाब।
उ.- जरत ज्वाला गिरत गिरि तैं स्व कर काटत सीस। देखि साहस सकुच मानत राखि सकत न ईस-११०६।
सहस्त्र का, सहस्त्र-संबंधी।
सहस्त्र का, सहस्त्र सम्बन्धी।
सहित' या साथ होने या रहने का भाव।
किसी भाषा के उन गद्य-पद्य ग्रंथों आदि का समूह जिनमें स्थायी, उच्च और गूढ़ विषयों का व्यवस्थित विवेचन हो, वाङ्मय।
वे कृतियाँ जिनके गुण और प्रभाव के कारण समाज में आदर हो।
किसी विषय या वस्तु से सम्बन्धित कृतियाँ।
किसी कवि या लेखक की समस्त रचनाएँ।
गद्य-पद्य के गुण-दोष, भेद-उपभेद आदि सम्बन्धी ग्रंथों का समूह।
वह जो ग्रंथादि लिखकर साहित्य की रचना करता हो।
साहित्य की सेवा या रचना करनेवाला।
उ.-(क) ये भए चोर तै साहु-१-४०। (ख) ए हैं साह कै चोर-३५९। (ग) बीस बिरियाँ चोर की तौ कबहुँ मिलिहैं साहु-१२८०।
उ.-मुख मागौ पैहौ सूरज प्रभु साहुहि आनि दिखावहु-३३४०।
दीवार की सीध नापने का एक यंत्र जिसकी डोरी में एक लट्टू-सा बँधा रहता है।
वह बाजार जहाँ महाजनी कारबार होता हो।
ऎश्वर्य और अधिकार का सुख-भोग।
उ.- (क) नहात-खात सुख करता साहिषी, कैसैं करि अनखाऊँ-९-१७। (ख) जनम साहिबी करत गयौ-१-६४।
एक जगली जंतु जिसके शरीर पर लंबे-लंबे काँटे होते हैं।
वह स्थान जहाँ साहूकार रहते हों।
पानी की एक लता जिसके छोटे-छोटे तिकोने फल, जिन पर दो सींग से रहते हैं, खाये जाते हैं।
सींचने का काम, भाव, पारिश्रमिक या कर।
प्रयाग के पश्चिमोत्तर स्थित श्रृंगवेरपुर जहाँ निषादराज गुह की राजधानी थी।
सींग या लोहे का बना एक बाजा, तुरही, नरसिंहा, रणसिंगा।
उ.-(क) ऎपन की सी पूतरी सब सखियनि कियौ सिंगार-१०-४०। (ख) सूर स्याम कहैं चीर देत हौं मो आगे सिंगार करौ-७९०।
उ.-तुम्हरैं भजन सबहिं सिंगार-१-४१।
श्रृंगार की सामग्री रखने की पेटी या संदूकची।
वेश्याओं के रहने का स्थान, चकला।
देव-मूर्ति का श्रृंगार करनेवाला पुजारी।
देवमूर्ति का श्रृंगार करनेवाला।
उ.-पहिरि पटम्बर जकरि अडंबर यह तन मूढ़ सिंगारयौ-१-३३६।
मुहा.-सिंगी पूरना-सिंगी बाजा बजाना।
सींग की नली जिससे शरीर का दूषित रक्त चूसकर निकाला जाता है।
पशुओं के सीगों पर चढ़ाया जानेवाला धातु का आवरण।
स्त्रियों की श्रृंगार-प्रसाधन की पिटारी।
जिसमें ध्वनि या झनकार हो।
ईंगुर का लाल चूर्ण जिससे सौभग्यवती हिंदू स्त्रियाँ अपनी माँग भरती हैं।
मुहा.-सिंदूर चढ़ना-कुमारी का विवाह होना। सिंदूर देना या लगाना-कन्या की माँग में सिंदूर लगाकर उसे पत्नी बनाना।
विवाह के अवसर पर वर का कन्या की माँग में सिंदूर भरना।
विवाह की एक रीति जिसमें वर, कन्या की माँग में सिंदूर भरता है।
सिंदूर के पीले मिले लाल रंग का।
सिंध देश का, सिंध देश-संबंधी।
उ.- (क) बांधै सिंधु सकल सैना मिलि आपुन आयसु दीजै-९-११०। (ख) सोभा-सिंधु समाइ कहाँ लौं हृदय साँकरे ऐन-२६६५।
उ.- करनी करुना-सिंधु की मुख कहत न आवै-१-४।
सिंदूर रखने की डिबिया जो सौभाग्य की सामाग्री में होती है।
पश्चिमी भारत का एक प्रदेश जो अब पाकिस्तान में है।
पंजाब की एक प्रसिद्ध नदी।
सावन की दोनोंतीजों को वर-पक्ष का कन्या के लिए भेजा गया पकवान, वस्त्र आदि।
ग्वालियर के मराठावंश की एक प्रसिद्ध उपाधि।
(समुद्र से उत्पन्न) लक्ष्मी।
सीप जिसमें से मोती निकलता है।
(समुद्र का पुत्र) चंद्रमा।
उ.- अगम सुपंथ दूरि दच्छिन दिसि तहँ सुनियत सखि सिंधु-लवन-१० उ.-९१।
जलंधर राक्षस जिसे शिवजी ने मारा था।
उ.- (क) जो पद-पदुम सदा सिव के धन, सिंधु-सुता उर तौं नहिं टारै-१-९४। (ख) चकृत होइ नीर में बहुरि बुड़की दई, सहित सिंधु-सुता तहाँ दरस पाए-२५७०।
सीप जिसमें से मोती निकलता है।
सीप का पुत्र अर्थात् मोती।
उ.- सिंधु-सुता-सुत ता रिपु गमनी सुन मेरी तू बात-लहरी।
उ.- नृप-गज कौ अब डर कहा प्रगटयौ सिंह कन्हाइ-५८९।
बारह राशियों में पाँचवीं।
उ.- चौथैं सिंह रासि के दिनकर जीति सकल महिं लैहैं-१०-८६।
वीरता या श्रेष्ठतावाचक शब्द।
किले, महल आदि का बड़ा फाटक जहाँ प्रायः सिंह की मूर्ति बनी रहती है।
उ.- सिंह द्वार आरती उतारहि जसुमति आनँदकंद की।
युद्ध में वीरों की ललकार।
सिंह-सा गरजने या ललकारनेवाला।
किले, महल आदि का बड़ा फाटक जहाँ प्रायः सिंह की मूर्ति बनी रहती है।
उ.- भीर जानि सिंह-पौर त्रियन की जसुमति भवन दुराई-१०२८।
दुर्गा जिसका वाहन सिंह है।
भारत के दक्षिण का एक द्वीप जिसे प्राचीन ՙलंका՚ माना जाता है।
दुर्गा जिसका वाहन सिंह है।
उ.- सिंह-सावक ज्यौं तजै गृह इंद्र आदि डरात-१-१०६।
सिंह राशि में स्थित (ग्रह)।
वह समय जब वृहस्पति सिंह राशि में हो।
सिंह की तरह पीछे देखते हुए आगे बढ़ना।
पिछली बातों का संक्षेप में कथन।
पद्य-रचना की एक रीति जिसमें पिछले चरणांत के शब्द लेकर अगला चरण चलता है।
अपराधी को दंड देने का एक प्राचीन यंत्र।
दरवाजे की कुंडी या साँकल।
गले में पहनने का एक गहना।
उ.- सूर सिकत हठि नाव चलावत ए सरिता हैं सूखी-३०२९।
उ.- ब्रज-परगन-सिकदार महर, तू ताकी करत नन्हाई-१०−३२९।
राजा या देवता के बैठने का विशेष आसन या चौकी।
उ.- (क) आसा के सिंहासन बैठयौ, दंभ-छत्र सिर तान्यौ-१-१४१। (ख) स्फटिक-सिंहासन मध्य राजत हाटक सहित सजावनों-२२८०।
भौंहों की बीच का तिलक-विशेष।
एक राक्षसी जो दक्षिणी समुद्र में रहती थी और आकाशचारियों की छाया देखकर ही उनको खींचकर खाती थी। लंका जाते समय हनुमान ने इसको मारा था। राहु इसका पुत्र कहा जाता है।
सिंहिका राक्षसी का पुत्र राहु।
उ.- ललितलट छिटकति मुख पर देति सोभा दून। मनु मयंकहिं अंक लीन्हौ सिंहिका कै सून-१०-१८४।
उ.- स्वान संग सिंहनी रति अजुगुत बेद बिरुद्ध असुर करै आई।
उ.- पहिरि मेघला चीर चिरातन पुनि पुनि फेरि सिआए-३१२५।
सिरके या नीबू के रस में पकाया हुआ शरबत या दवा।
दबाने, कसने आदि का यंत्र।
धारदार हथियारों पर सान चढ़ाने की क्रिया।
गुट्ठल धार पर सान धरने या धातु को चमकानेवाला।
उ.- आपु खाइ सो सब हम मानैं, औरनि देत सिकहरैं तोरि-१०−३२७।
उ.- सदा सिकार करत मृग-मन कौ-१−६४।
फैली हुई वस्तु के सिमटने की क्रिया।
सिमटने से पड़ा हुआ चिन्ह, शिकन।
सिकुड़न, सिकुरना, सिकुरनो
फैली हुई वस्तु का सिमटना।
सिकुड़न, सिकुरना, सिकुरनो
सिकुड़न, सिकुरना, सिकुरनो
तनाव के कारण छोटा या तंग होना।
सिकोड़ना, सिकोरना, सिकोरनो
फैली हुई वस्तु को समेटना या संकुचित करना।
सिकोड़ना, सिकोरना, सिकोरनो
सिकोड़ना, सिकोरना, सिकोरनो
तंग, छोटा या संकीर्ण करना।
मूँज, बेंत आदि से बनायी गयी डलिया।
टकसाल में ढला हुआ निर्दिष्ट मूल्य का धातु खंड।
मुहा. - सिक्का जमना या बैठना - (१) प्रभुत्व या अधिकार स्थापित होना। (२) रोब जमना, आतंक छाना। सिक्का जमाना या बैठाना- (१) प्रभुत्व या अथिकार स्थापित करना। (२) रोब जमाना, प्रभाव डालना।
राजा द्रुपद का नपुंसक पुत्र जिसे सामने करके अर्जुन ने भीष्म को मारा था।
उ.- पारथ भीषम सौं मति पाइ। कियौ सारथी सिखंडी आइ। भीषम ताहि देखि मुख फेरयौ-१−२७६।
उ.- (क) चिंता तजौ परीच्छित राजा सुन सिख-सांखि हमार-२−२। (ख) सुनु सिख कंत दंत तृन धरिकै स्यौं परिवार सिधारौ-९−११५। (ग) किती दई सिख-मंत्र साँवरे तउ हठ लहरि न जागी-२२७५।(घ) सुन री सखी समुझि सिख मेरी-२८५१।
उ.- रोम-रोम नख-सिख लौं मेरैं महा अघनि बपु पाग्यौ -१−१३।
गुरु नानक आदि दस गुरुओं का अनुयायी।
उ.- इक हरि चतुर हुते पहिले ही, अब बहुतै उन गुरु सिखई-३३०४।
उ.- तोहिं किन रूठब सिखई प्यारी-२२०१।
उ.- (क) जा दिन ते मधुबन हम आए, शोध न तुम ही लीनो हो-२९३२। (ख) सूर हमहिं पहुँचाइ मधुपुरी बहुरो शोध न लीनो-२९६५। (ग) जेइ जेइ पथिक हुते ब्रजपुर के बहुरि न शोध करे-२९८२।
गुरु नानक के पंथ का अनुयायी, सिख।
उ.- (क) कुटिल भ्रू पर तिलक-रेखा सीस सिखिनि सिखंड-१−३०७। (ख) सिखी सिखंड सीस, मुख मुरली-४७६।
उ.- श्रीमुख की सिखई ग्रंथो कत, तें सब भईं कहानी-३४६९।
उ.- सिखाई कहत स्याम की बतियाँ, तुमकौं नाहिंन दोषु-३०२६
सिखा-पढ़ा दिये (जाने पर)।
उ.-एक बेर श्रीपति के सिखये, उन आयो सब गुन गान-२३४०।
उ.-जसुमति माइ कहा सुत सिखयौ-७७१।
उ.- चढ़ि गिरि-सिखर सब्द इक उचरयौ गगन उठयौ आधात-९−७४।
बताती हैं, अभ्यास कराती हैं।
उ.- जसुमति-सुत कौं चलन सिखावतिं अँगुरी गहि-गहि दोउ जनियाँ-१०−१३२।
उ.- जसुमति कान्हहिं यहै सिखावति। सुनहु स्याम अब बड़े भए तुम, कहि अस्तन-पान छुड़ावति-१०−२२२।
उ.- मैं दुहिहौं मोहिं दुहन सिखावहु-४०१।
उ.- काल्हि तुम्हैं गो-दुहन सिखावैं, दुहीं सकल अब गाइ-४००।
उ.- छिन न रहै नँदलाल इहाँ बिनु जो कोउ कोटि सिखावै-३४१०।
उ.- मूरख कौं कोउ कहा सिखावै-३९१।
उ.- चंद्र-चूड़ सिखि-चंद सरोरुह जमुना-प्रिय गंगा-धारी-१०−१७१।
उ.- अंतहु सिखवन सुनहु हमारी कहियत बात बिचारी-३३१३।
सिखाने की क्रिया, भाव या उद्देश्य (से)।
उ.- (क) आईं सिखवन भवन पराएँ स्यानि ग्वालि बौरैया-३७१। (ख) जाहि ज्ञान सिखवन तुम आए-३३१३।
उ.-धेनु दुहत हरि देखत ग्वालनि। आपुन बैठि गए तिनकैं सँग, सिखवहु मोहिं कहत गोपालनि-४००।
मुहा. सिखाना-पढ़ाना- (१) चालाकी सिखाना, चालबाजी बताना। (२) खूब कान भरना।
धमकाना, दंड या ताड़ना देना।
उ.- बाबा मोकौं दुहन सिखायौ-६६७।
उ.- (क) ये बशिष्ठ कुल-इष्ट हमारे, पालागन कहि सखनि सिखावत-९−१६७। (ख) निज प्रतिबिंब सिखावत ज्यौं सिसु-१०−२६७। (ग) कोउ हेरी देत परस्पर स्याम सिखावत-४३१। (घ) बेनु पानि गहि मोकों सिखावत मोहन गावन गौरी-२८७३।
दही मिला हुआ चीनी का गाढ़ा शरबत।
उ.- बासौंधी सिखरनि अति सोंधी-२३२१।
किसी बात की जानकारी कराना।
उ.- आपुन सिखै औरनि सिखरावै-१०७०।
किसी बात की जानकारी कराना।
उ.- फिरि-फिरि बात सोइ सिखवत, हम दुख पावत जातैं-२०२४। (ख) निरगुन ज्योति कहाँ उन पाई, सिखवत बारंबार-३२१५।
सिखाती है, अभ्यास कराती है।
उ.- सिखवति चलनि जसोदा मैया-१०−११५।
सिखाते-सिखाते, समझाते-समझाते।
उ.- सरस्याम को सिखवतिं हारी, मारेहु लाज न आवति-८६५।
उ.- आपुन सिखै औरनि सिखरावै-१०७०।
उ.- यह अक्रूर दसा जो सुमिरै, सीखै, सुनै अरु गावै-३४९४।
उ.-हरि कौ सिखै, सिखावत हमको अब ऊधो पग धारे-३०५५।
सिखा-पढ़ाकर, समझा-बुझाकर।
उ.- इक हम जरैं सिझावन आए, मानो सिखै पठाए-३२१०।
उ.- (क) सिगरी रैनि नींद भरि सोवत जैसैं पसू अचेत-१−१२५। (ख) जाके बदन-सरोज निरखत आस सिगरी भरी-१०−३०२। (ग) सूर तहाँ नग अंग परसि रस लूटति निधि-सिगरी।
उ.- उरहन कौं ठाढ़ी रहैं सिगरी-३९१।
उ.- सिगरे ग्वाल घिरावत मोसौं मेरे पाँइ गिराइँ-५१०।
उ.- नीके राखि लियो ब्रज सिगरो-९९७।
उ.- सिगरोइ दूध पियौ मेरे मोहन, बलहिं न दैहौं बाँटी-१०−२५९।
उ.- हरि तिनसौ कहयौ आइ, भली सिच्छा तुम दीनीं-३−११।
(सं. सिद्ध, प्रा. सिज्झ+हिं. आना)
(सं. सिद्ध, प्रा. सिज्झ+हिं. आना)
मिलने योग्य या प्राप्य करना।
(सं. सिद्ध, प्रा. सिज्झ+हिं. आना)
बहला-फुसलाकर (धन) वसूल करना।
(सं. सिद्ध, प्रा. सिज्झ+हिं. आना)
शरीर को तपाना, तपस्या करना।
(सं. सिद्ध, प्रा. सिज्झ+हिं. आना)
भयभीत या संकुचित होकर स्तब्ध रह जाना।
दुबिधा या असमंजस में पड़ जाना।
बढ़-बढ़कर बोलना, डींग हाँकना।
मुहा. सिट्टी (पिट्टी) गुम होना या भूलना-बहुत घबरा जाना, होश-हवास ठीक न रहना।
विवाह के अवसर पर गायी जानेवाली गालियाँ।
मुहा. सिड़ सवार होना-धून, झक या सनक चढ़ना।
उ.- (क) असित अरुन सित आलस लोचन उभय पलक परि आवै-१०−६५। (ख) अरुन असित सित बपु उनहार।
उ.- अगिनि-पुंज सितबान धनुष धरि तोहिं असुर-कुल सहित जरावन-९−१३१।
उ.- राख्यो रूप चराइ निरंतर सो हरि शोधु लह्यो-३१४०।
एक प्रसिद्ध बाजा जिसके तार उँगली से बजाये जाते हैं।
मुहा.- सितारा चमकना या बुलंद होना-भाग्योदय होना। सितारा मिलना - परस्पर प्रेम होना।
चाँदी-सोने का पत्तरों की छोटी-छोटी गोल बिंदियाँ, चमकी।
उ.- सो सितपूच्छ सम बीतत कबहुँ न देत दिखाई-३४८६।
श्वेतवाराह जिसने पृथ्वी का उद्धार किया था।
श्वेत वस्त्र धारण करनेवाले।
जैनों का श्वेतांबर संप्रदाय।
जो अच्छी तरह बँधा, कसा और जकड़ा न हो, ढीला।
उ.- (क) सुभ स्रवननि तरल तरौन, बेनी सिथिल गुही-१०−२४। (ख) सिथिल धनुष रति-पति गहि डारयौ−१०−२३३।
धीमा, जो कड़ा न हो, कोमल।
उ.- सहज सिथिल पल्लव तैं हरि जू लीन्हे छोरि सवारि पृ. ३४८ (५)।
उ.- सिथिल रूप मन में लस वाको-२६०६।
जिसका साधन हो चुका हो , संपन्न संपादित।
एक उपाधि जो 'स्टार आव इंडिया' का अनुवाद है।
प्रयत्न में सफल, कृतकार्य।
जिसका तप, योग या आध्यात्मिक साधना पूरी हो चुकी हो।
जो योग की विभूतियाँ प्राप्त कर चुका हो।
जिसे अलौकिक सिद्धि हुई हो।
जिस (कथन) के अनुसार ही कोई बात घटी हो।
जो तर्क या प्रमाण से ठीक या निश्चित हो, प्रमाणित।
जिसका फैसला या निबटारा हो चुका हो।
उ.- देखौ आइ जसोदा सुत-कृत, सिद्ध पाक इहिं आइ जुठायो-१०−२४८।
वह बात या मत जो विद्या, कला आदि के संबंध में विद्वानों द्वारा स्थापित किया जाय।
ऋषि-मुनियों के मान्य उपदेश।
उ.- सकल निगम सिद्धांत जन्मकर स्याम उन सहज सुनायौ-३४९०।
पूर्ण या विरोधी पक्ष के खंडन के पश्चात् स्थिर किया गया मत।
शास्त्र-विशेष संबंधी ग्रंथ।
शास्त्रीय तत्वों का ज्ञाता।
अपने सिद्धांत पर दृढ़ रहनेवाला।
स्थान जहाँ योग या तांत्रिक साधन में शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त हो।
एक ब्राह्मण जो कंस की आज्ञा से श्रीकृष्ण को मारने गया था और श्रीकृष्ण ने जिसकी जीभ मरोड़ दी थी।
उ.- सिद्ध (थीधर) बाँभन करम कसाई। कह्यौ कंस सौं बचन सुनाई-१०−५७।
जिसका हाथ किसी काम में खूब सधा हुआ या साफ हो।
वह (कल्पित) अंजन जिसे आँखों में लगा लेने से जमीन के भीतर गड़ी चीजें भी दिखायी देने लगती हैं।
सोच विचार कर निश्चित किया हुआ मत, उसूल, नियम।
मुख्य उद्देश्य, अभिप्राय या लक्ष्य।
वह जिसने योग या तप में अलौकिक शक्ति या सिद्धि प्राप्त की हो।
वह जो पूर्ण योगी या ज्ञानी हो।
बहुत पहुँचा हुआ संत या महात्मा।
जिसकी कामना पूरी हो गयी हो।
वह (कल्पित) मंत्र सिद्ध गोली जिसे मुँह में रखने से व्यक्ति अदृश्य हो जाता है।
सिद्ध होने की स्थिति या अवस्था।
उ.- (क) ग्रहबल, लग्न, नक्षत्र, शोधि कीनी बेद धुनी। (ख) सब शोधि रहे, न शोध पायो-१० उ. २४।
उ.- सिध जेवन सिरात, बैठे नंद, ल्यावहु बोलि कान्ह तत्कालहिं-१०−२३६।
उ.- मेरे साँवरे जब मुरली अधर धरी, सुनि सिध-समाधि टरी-६२३।
उ.- (क) नंद-घरनि कछु काज सिधाई-१०−५०। (ख) सतभामा करि सोक पिता को जदुपति पास सिधाई-१० उ.−२७।
उ.- सूरदास हरि के गुन गावत हरषवंत निज पुरी सिधाए-३८६।
जाना, गमन या प्रस्थान करना।
उ.- स्याम आनंद सहित पुर सिधाए -१० उ.−२१।
उ.- (क) सूर के प्रभु की सरन आयौ जो नर करि जगत-भोग बैकुंठ सिधायौ-४−१०। (ख) यह सुनि ह्वाँ तैं भरत सिधायौ-५−३।
बिना पका हआ अन्न, सीधा जिसमें कच्चा अनाज रहता है।
जिसकी कामना पूर्ण हो गयी ही।
काम का पूरा होना, पूर्णता।
उ.- राजा कहयौ सप्त दिन माहिं सिद्धि होति कछु दीसति नाहिं -१−१४१।
योग, तप आदि से प्राप्त अलौकिक शक्ति या संपन्नता।
योग-साधन के अलौकिक फल जो आठ सिद्धियों के रूप में माने गये हैं- अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व।
उ.- अष्टसिद्धि नवनिधि सुर-संपति-१०−२०४।
जाना, गमन या प्रस्थान करना।
उ.- (क) सूरज-प्रभु नँद-भवन सिधारे-१०−१०। (ख) सदा रहत वर्षा रितु हम पर जब तें स्याम सिधारे-२७६३।
उ.- तुम लछिमन निज पुरहिं सिधारौ-९−३६। (ख) सुनु सिख कंत दंत तृन धरिकै, स्यौं परिवार सिधारौ-९−११५। (ग) श्रीकंत सिधारौ मधुसूदन पै, सुनियत हैं, वै मीत तुम्हारे-१० उ.−६०।
उ.−काल-अवधि पूरन भई जा दिन तनहूँ त्यागि सिधारयौ−१−३३६।
उ.- निष्कामी बैकुंठ सिधावै-३−१३।
योग-साधना के अलौकिक फलस्वरूप प्राप्त आठ शक्तियाँ या सिद्धियाँ।
उ.- (क) अष्ट महासिधि द्वारैं ठाढ़ी-१−४०। (ख) सूर स्याम सहाइ हैं तो आठहूँ सिधि लेहि-१−३१४। (ग) तेरौ दुःख दूरि करिबे कौं रिधि-सिधि फिरि-फिरि जाहीं-१−३२३।
मालवा की एक नदी जिसके किनारे उज्जैन बसा है।
कुरान' के तीस भागों में कोई एक।
उ.- तौ का कहिए सूर सेयाम सिन−३३९४।
एक यादव जो सात्यकि का पिता था।
क्षत्रियों की एक प्राचीन शाखा।
पीर या देवता को चढ़ाकर प्रसाद-रूप में बाँटी जानेवाली मिठाई।
निशाने या लक्ष्य पर किया गया वार।
कार्य-साधन का डौल या उपाय।
मुहा. सिप्पा जमना (भिड़ना, लड़ना) - (१) कार्य-साधन की युक्ति होना। (२) डौल या उपाय की सफल होना। सिप्पा जमाना (भिड़ाना, लड़ाना) - कार्य-साधन का उपाय करना।
डौल प्रारम्भिक उपाय, सूत्रपात, भूमिका।
मुहा. सिप्पा जमना (भिड़ना, लड़ना) कार्य-साधन की भूमिका तैयार होना सिप्पा जमाना- (भिड़ाना, लड़ाना) - कार्य-साधन की भूमिका तैयार करना।
सीप' नामक जंतु का आवरण या संपुट।
मालवा की एक नदी जिसके किनारे उज्जैन बसा है।
किसी के पक्ष में कुछ अनुकूल अनुरोध, अनुशंसा।
जिसमें सिफारिश की गयी हो।
सिफारशी टट्टू- जो (योग्यता से नहीं) केवल सिफारिश के बल पर उन्नति करता हो।
सिमटने-सिकुड़ने की क्रिया, भाव या स्थिति।
(कार्य) पूरा होना, निपटना।
उ.- परिवा सिमिट सकल ब्रजवासी चले जमुन-जल न्हान-२४४६।
उ.- (क) इतनी सुनत सिमिटि सब आए प्रेम-सहित धारे अँसपात-९−३८। (ख) मानौ जल-जीव सिमिटि जाल मैं समान्यौ-९−९६।
उ.- यह सुनि जहाँ तहाँ तैं सिमिटैं आइ होइ इक ठौर-१−१४६।
उ.-लरिका और पढ़त शाला में तिनहिं करत उपदेस-सारा. १११।
धान जो हेमंत में होता है, जड़हन धान।
पीड़ा पहुँचाकर, कष्ट देकर।
रही शालि-पीड़ा या कष्ट दे रही है।
शक जाति का एक राजा जिसने शक संवत् चलाया था।
उ.- कछुक विलाय वदन की शोभा अरूण कोटि गति पावै-२५४९।
शोभित होता या सुंदर लगता है।
उ.- गत पतंग राका शशि विय सँग घटा सघन शोभात-२१८५।
उ.- मुकुलित कसुम नयन निद्रा तजि रूप-सुधा सियराई-२८११।
जुड़ाना, ठंढा या शीतल होना।
उ.- बिषयासक्त रहत निसिबासर सुख सियरौ, दुख तातौ-१−३०२।
उ.- बढ़ी परस्पर प्रीति रीति तब भूषन सिया दिखाए-९−७०।
(काम) पूरा करना या निबटाना।
उ.- हा सीता, सीता, कहि सियपति उमड़ि नयन जल भरि-भरि ढारत-९−६२।
शरीर की सबसे ऊपरी भाग, खोपड़ी, कपाल।
शरीर में गर्दन के ऊपर का भाग।
उ.- (क) मीन इंद्री तनहिं काटत मोट अघ सिर भार-१−९९। (ख) दंभ-छत्र सिर तान्यौ-१−१४१।
मुहा.- सिर आँखों पर बैठाना या लेना- बहुत स्वागत सत्कार के साथ ग्रहण करना। सिर-आँखों पर होना-लहर्ष स्वीकार करना, शिरोधार्य होना। सिर उठाना- (१) दुख, कष्ट, रोग आदि से छुटकारा पाना। (२) विरोध या शत्रुता के लिए खड़ा होना। (३) उधम या उपद्रव करना। (४) घमंड करना। (५) लज्जित न होना। (६) ससम्मान खड़ा होना या जीवन व्यतीत करना। सिर उठाने की फुरसत न होना- कार्य की अधिकता के कारण बहुत व्यस्त होना। सिर उठाकर चलना- अकड़कर चलना, घमंड दिखाना। सिर उतरवाना- मरवा डालना। सिर उतारना- मार डालना। (किसी का) सिर ऊँचा करना- सम्मान बढ़ाना, सम्मान का पात्र बनाना। (अपना) सिर ऊँचा करना- (प्रतिष्ठित लोगों में) प्रतिष्ठा के साथ रहना। सिर (के) ऊपर- बहुत ही निकट। उ.- (क) अजहूँ चेति भजन करि हरि कौ, काल फिरत सिर ऊपर भारौ-१−८०। (ख) सिर ऊपर बैठे रखवारे-१०१०। सिर औंधाकर पड़ना (औंधाना) - बहुत चिंता या दुख से सिर झुकाना, सिर झुकाकर बहुत चिंता या दुख सूचित करना। सिर करना- (१) (स्त्रियों का) केश सँवारना। (२) बहुत लाड़-प्यार करना। (कोई वस्तु) सिर करना- इच्छा के विरूद्ध देना, गले मढ़ना। सिर काटना- मार डालना। सिर काढ़ना- प्रसिद्ध होना। सिर का बोझ टलना - झंझट या मुसीबत दूर होना, बला टलना। सिर का बोझ टालना- जी लगाकर न करना, बेगार टालना। सिर के बल बलना या जाना- (१) (किसी के प्रति) बहुत विनीत भाव या आदर प्रदर्शित करते हुए जाना या चलना। (२) प्रसन्नतापूर्वक कष्ट सहन करते हुए जाना या चलना। सिर खाली करना- (१) बहुत बकवाद करना। (२) सोच विचार करके हैरान होना। सिर खाना -बहुत बकवाद करके तंग या परेशान करना। सिर खपाना - (१) बहुत सोच-विचार करके हैरान होना। (२) किसी कार्य में बहुत व्यस्त या व्यग्र होना। सिर खुजलाना- (१) मार खाने की इच्छा होना। (२) शरारत सूझना। सिर चकराना- (१) सिर में चक्कर आना। (२) घबराहट या चिंता से विभ्रम होना। सिर चढ़ा- बहुत मुँह लगा हुआ, ढीठ, धृष्ट। सिर चढ़ाना - (१) माथे से लगाकर सम्मान या पूज्य भाव दिखाना। (२) किसी को मुँह लगाकर धृष्ट कर देना। (३) किसी देवी -देवता के सामने या महत् उद्देश्य से सिर कटा देना। (४) आदर पूर्वक मान्य या शिरोधार्य करना। सिर घूमना- (१) सिर में चक्कर आना। (२) घबराहट या चिंता से विभ्रम होना। सिर चढ़कर बोलना- (१) भूत-प्रेत का प्रभाव पड़ना। (२) अपना पाप या अपराध छिपाने में असमर्थ होकर स्वयं प्रकट कर देना। सिर चढ़कर मरना - किसी के ऊपर क्रुद्ध होकर या प्रतिकार स्वरूप अपनी जान दे देना। सिर जोड़कर बैठना- मिलजुल कर रहना। सिर जोड़ना - (१) एकत्र होकर पंचायत करना। (२) कुचक्र या षड़यन्त्र रचना। सिर झाड़ना - बाल सभालना, कंघी करना। सिर झुकाना - (१) नमस्कार करना। (२) लज्जित होना। (३) चुपचाप मान लेना। सिर टकराते फिरना - जहाँ जाना वहाँ असफल होना। (किसी के) सिर डालना- कार्य-विशेष का भार (दूसरे को) सौंपना। सिर टूटना-लड़ाई - झगड़ा होना। सिर टेकना- (१) नमस्कार करना। (२) विनय दिखाना। सिर टेकि - माथा नवाकर। उ.- असुर सिर टेकि तब कह्यौ निज नृपति सों, नहिं तिहुँ भुवन कोउ सम तुम्हारे-१० उ.-३१। सिर ढोरना - (१) प्रसन्न होकर सिर हिलाना। (२) सहर्ष स्वीकार करना। सिर तोड़ना- (१) खूब मार-पीट करना। (२) वश में करना। सिर देना - प्राण निछावर करना। सिर देत- प्राण निछावर करता है।
उ.- सूहदास सिर देत सूरमा सोइ जानै ब्यवहार-२९०५। (किसी के) सिर दोष देना- (दूसरे को) दोषी या अपराधी बताना। सिर दोष लगावन कौं - दोषी या अपराधी बताने के लिए- उ.- तुम तौं दोष लगावन कौं सिर, बैठे देखत नेरैं। सिर धरना- सादर स्वीकार करना, शिरोधार्य करना। (किसी के) सिर धरना (दूसरे पर) दोष या अपराध लगाना। सिर धारयौ सादर स्वीकार किया, शिरोधार्य किया। उ. मात-पिता-पति-बंधु-सुजनजन तिनहूँ की कहिबो सिर धारयौ-३०३५। सिर धुनना- अपनी भूल समझकर शोक और पछतावा करना। सिर धुनत-अपनी भूल के लिए शोक और पछतावा करता है।
उ.- बार-बार सिर धुनत जातु मग, कैहौं कहा बदन दिखराई-९७७। सिर धुनतिं- अपनी भूल के लिए शोक और पछतावा करती हैं। उ.- कर मीड़ति सिर धुनतिं नारि सब यह कहि-कहि पछिताहीं-१८००। सिर धुनति-अपनी भूल के लिए शोक करती और पछताती है। उ.- बार-बार सिर धुनति बिसूरति बिरह-ग्राह जनु भखियाँ-२७६६। सिर धुनि- सिर पीट-पीट कर, बहुत शोक और पश्चाताप करके। उ.- (क) कहत सूर भगवंत-भजन बिनु सिर धुनि-धुनि पछितायौ-१−३३५। (ख) रोहिनी चितै रही जसुमति तन सिर धुनि-धुनि पछितानी-३९५। (ग) नारद गिरा सम्हारी पुनि-पुनि सिर धुनि आयु सरैं-२४६२। सिर नंगा करना- (१) (पुरूष का) सिर से टोपी या पगड़ी उतारना। (२) (स्त्री का) सिर से धोती या पल्ला उतारना।
(३) इज्जत लेना, अपमानित करना। सिर नवाना- (१) सिर झुकाना, नमस्कार करना। (२) दीन या विनम्र बनना। सिर नीचा करना- (१) लज्जित या अपमानित करना। (२) पराजित करना। सिर नीचा होना- (१) लज्जित या अपमानित होना। (२) पराजित होना। सिर पचाना- (१) बहुत परिश्रम करना। (२) बहुत सोच विचार करके हैरान होना। सिर पटकना- (१) बहुत परिश्रम करना। (२) बहुत पछताना। सिर पर- (१) सिर। (२) बहुत पास या सामने। सिर पर आ पड़ना- (१) अपने ऊपर आना या बीतना। (२) अपने जिम्मे पड़ना, अपने गले मढ़ा जाना। सिर पर आ जाना- (१) बहुत समीप आ जाना। (२) थोड़े ही दिन शष रह जाना। सिर पर उठा लेना- बहुत उधम मचाना या हो-हल्ला करना। सिर पर पाँव (पैर) रखकर भागना-बहुत तेजी से भागना।
(किसी के) सिर पर पाँव रखना- (किसी के साथ) बहुत उद्दंडता का व्यवहार करना। सिर पर पृथ्वी या आसमान उठाना- बहुत शोर-गुल करना और उधम मचाना। सिर पर पड़ना- (१) जिम्मे पड़ना, गले मढ़ा जाना। (२) अपने ऊपर बीतना या घटित होना। सिर पर खून चढ़ना या सवार होना- (१) किसी की जान लेने को उतारू होना। (२) किसी की हत्या करके आपे में न रह जाना। सिर पर खेलना- अपने प्राण संकट में डालना। (किसी के) सिर पर खेलना- दूसरे के सामने या उसकी उपस्थिति में ही) उद्दंडता दिखाना या दुष्कर्म करना। सिर पर रखना- (१) आदर-सत्कार करना। (२) सादर स्वीकार करना। सिर राखै- सादर स्वीकार करता है।
उ.- अपने जन को प्रसाद सारी सिर राखै-२६१९। (किसी के) सिर पर छप्पर रखना- बहुत बोझ या दबाव डालना। सिर पर मिट्टी डालना- बहुत शोक करना। सिर पर लेना-अपने ऊपर जिम्मेदारी लेना। सिर पर शैतान चढ़ना- बहुत ज्यादा गुस्सा लेना। सिर पर शेतान चढ़ना-बहुत ज्यादा गुस्सा आना। सिर पर जूँ न रेंगना- जरा भी होश या ध्यान न आना। सिर रहना-मान या प्रतिष्ठा बनी रहना। किसी के सिर पर डालना- (दूसरे के) जिम्मे देना या सौंपना। सिर पर बीतना- अपने ऊपर पड़ना, भुगतना। सिर पर होना- (१) बहुत ही निकट होना (२) थोड़ा ही समय शेष रह जाना। (किसी का) किसी के सिर पर होना- संरक्षक होना। सिर पर हाथ धरना या रखना- (१) सहायक या संरक्षक होना। (२) शपथ खाना। (दर्द या पीड़ा से) सिर फटचना या फटा जाना - सिर में बहुत दर्द या पीड़ा होना। सिर फिरना- (१) सिर चकराना। (२) होश-हवास ठीक न रहना, बुद्धि नष्ट हो जाना।
(३) पागल हो जाना सिर फोड़ना- (१) लड़ाई झगड़ा करना। (२) शव की कपाल-क्रिया करना। सिर फेरना- अस्वीकार या अवज्ञा करना। सिर बाँधना - (१) (पटेबाजी या लड़ाई में) सिर पर आक्रमण करना। (२) (स्त्री का) केश सँवारना या चोटी करना। सिर बेचना-सेना में नौकरी करना। सिर भारी होना- स्वस्थ न होना। सिर मारना- (१) समझाते-समझाते हैरान हो जाना। (२) बहुत सोचते-विचारते परेशान हो जाना। (३) चिल्लाकर पुकारना। (४) बहुत प्रयत्न या परिश्रम करना। सिर मुड़ाना- संन्यास लेना। सिर मुड़ाते ही ओले पड़ना- आरम्भ में ही संकट आ जाना। सिर मढ़ना- (किसी की) इच्छा के विरूद्ध कोई दायित्व सौंपना।
सिर (में) लकड़ी ठोंकना- कपाल-क्रिया करना। सिर ठोंकी लकरी - कपाल-क्रिया की। उ.- लै देही घर-बाहर जारी, सिर ठोंकी लकरी-१−७१ सिर रँगना- सिर फोड़कर लहू-लोहान करना। सिर रहना- दिन-रात परिश्रम करना। (किसी के) सिर रहना या होना- (किसी के) पीछे पड़जाना। सिर सफेद होना- वृद्धावस्था से बाल सफेद हो जाना। सिर पर सेहरा होना- किसी कार्य का श्रेय मिलना। सिर (पर) सहना- (अपने ऊपर) झेलना। अपने सिर सहयौ- (भार आदि) उठाया या झेला। उ.- इहिं भरू अधिक सहयौ अपनै सिर अमित अंडमय बेष-५७०। सिर सहलाना- (१) खुशामद करना। (२) बहुत दुलार-प्यार करना। सिर सूँघना- छोटों का दुलार करने या उनके प्रति प्रेम प्रदर्शित करने के लिए उनका सिर सूँघना। सिर से पैर तक- (१) एड़ी से चोटी तर। (२) आरम्भ से अंत तक।
मरे हुए संबंधी के शोक में प्रतिदिन परिवार और जाति की स्त्रियों के एकत्र होकर रोने-पीटने की रीति।
उ.- सूरदास प्रभु तुम्हरे भजन बिनु जैसे सूकर-स्वान सियार-१−१४।
उ.- चहुँ दिसि सूर सोर करि धावैं ज्यों केहरिंहि सियाल।
सिर से पैर तक आग लगना-बहुत क्रोध आना। सिर (के बल या) से चलना- बहुत सम्मान करना। सिर से कफन बाँधना - मरने के लिए तैयार होना। सिर से बला टालना- जी लगाकर काम न करना, बेगार टालना। सिर से बोझ उतरना- (१) झंझट दूर होना। (२) निश्चित होना। सिर से बोझ उतारना- (१) झंझट दूर करना। (२) किसी तरह काम निबटाकर निश्चिंत होना। सिर तक पानी होना या आ जाना- (१) बहुत ऋण चढ़ जाना। (२) सहन की पराकाष्ठा हो जाना। सिर से खेल जाना- प्राण दे देना। सिर से सिरवाहा (पगड़ी) है -सरदार या स्वामी के साथ सेना या सेवक अवश्य रहेंगे। सिर पर सींग होना - कोई विशेषता होना। सिर का पसीना पैर तक आना- बहत परिश्रम पड़ जाना। सिर होना- (१) पीछा न छोड़ना। (२) बार-बार आग्रह करके तंग करना। (३) झगड़ा कर बैठना। (किसी बात के) सिर होना- (१) उसी की धुन में लगे रहना। (२) समझ या ताड़े लेना। (३) जिम्मे होना, ऊपर पड़ना। सिर हिलाना- (१) स्वीकृति -अस्वीकृति जताना। (२) प्रसन्नता सूचित करना।
जिसका ऊपरी भाग या सिर कटा हुआ हो।
घूर में पकाकर खट्टा किया हुआ किसी फल का रस।
(हिं. सिर+ फ़ा. ता + पा=पैर)
(हिं. सिर+ फ़ा. ता + पा=पैर)
युद्ध में सिर की रक्षा के लिए पहना जानेवाला टोप, कूँड।
उ.−(क) जग सिरदार सूर के स्वामी देखि-देखि सुख पावै-८७६। (ख) गाउँ दसक सिरदार कन्हाई-१००२।
सरदार का पद, भाव या कार्य।
जिसे सिर पर धारण किया जाय।
पत्र पर लिखा जानेवाला पता।
पत्र के आदि में लिखा जानेवाला संबोधन आदि।
सिरजनहार, सिरजनहारा, सिरजनहारो
सृष्टि की रचना करनेवाला ईश्वर।
तैयार या उत्पन्न किया हुआ।
उ.−बिरह सहन को हम सिरजी हैं पाहन हृदय हमार-३२१५।
सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति या वस्तु,. शिरोमणि।
उ.−(क) पाछैं भयौ न आगैं ह्वैहै सब पतितनि सिरताज-१−९६। (ख) सूरस्याम तहाँ स्याम सबनि कौ दिखियत है सिरताज-९२०।
उ.−अपने सुत कौ बदन दिखावहु बड़ महर सिरताज−१०−३६।
हाथी के मस्तक का एक अर्द्ध चंद्राकार गहना।
उ.−जग सिरजत पालत संहारत पुनि क्यों बहुरि करयौ−१० उ.−१३१।
सिरजनहार, सिरजनहारा, सिरजनहारो
माथे पर पहनने का स्त्रियों का एक आभूषण।
प्रधान या श्रेष्ठ व्यक्ति, शिरोमणि।
उ.−गोप-सिरमौर नृप ओर कर जोरि कै, पुहुप के काज प्रभु पत्र दीन्हौ-५८४।
उ.−(क) तिनमैं अजामील गनिकादिक, उनमें मैं सिरमौर−१−१४५। (ख) दस सुत मनु के उपजो और। भयौ इच्छवाकु सबनि सिरमौर-९−२।
सोने के स्थान पर सिर की ओर का भाग या सिरा।
लंबाई में किसी ओर का छं र या अंत का भाग।
उ.−तुम ही हौ ब्रज के जीवन-धन देखत नैन सिराइ−१०−७९।
उ.−ऎसै ही जौ जनम सिराइ, बिन हरि-भजन नरक महँ जाइ−७−२।
उ.−अब रघुनाथ मिलाऊँ तुमको सुन्दरि सोग सिराइ (निवारि)−९−८३।
उ.−सिया-राम-लछिमन निरखत सूरदास के नैन सिराए- ९−१६८।
(हिं. सिर+सं. नेत्री=धज्जी या डोरी)
क्षत्रियों का एक प्रसिद्ध वर्ग।
(हिं. सिर+सं. नेत्री=धज्जी या डोरी)
वह पूरी पोशाक जो राज दरबार से किसी को सम्मान-रूप में दी जाती है, खिलअत।
उ.−(क) नंद कौ सिरपाव दीन्हो, कोप सब पहिराइ−५८६। (ख) कहि खवास को सैन दै सिर−पाँव मँगायौ−२४७६।
पगड़ी के ऊपर का छोटा कपड़ा।
पगड़ी पर बाँधने का एक आभूषण।
सिर पर पहना जानेवाला, स्त्रियों का एक आभूषण।
ठंढा होता है, गरम नहीं रह जाता है।
उ.−(क) भात सिरात तात दुख पावत, बेगि चलौ मेरे लाल-१०−२२३। (ख) सिद्ध जेंवन सिरात, नंद बैठे, ल्यावहु बोलि कान्ह तत्कालहिं-१०−२३६।
उ.−(क) सब कोउ कहत गुलाम स्याम कौ, सुनत सिरात हिए-१−१७१। (ख) सुरदास प्रभु की ऎसी अधीनता देखत मेरे नैन सिरात-२०६८।
बीतते या व्यतीत होते हैं।
उ.−गोपी-ग्वालबाल सँग खेलत सब दिन हँसत सिरात-३४९३।
बीतती या व्यतीत होती हैं।
उ.-जाति सिराती राति बातनि मैं, सुनौ भरत चित लाइ-९−१५५।
उ.-अधिक पिराति सिराति न कबहूँ अनेक जतन करि हारी-३०३९।
मंद, धीमा या निष्क्रिय हो गया है।
उ.- धनुष बान सिरान कैंधौं गरुड़ बाहन खोर-१−२५३।
उ.- बैन सुनौ, बिहरत बन देखौं, इहिं सुख हृदय सिरान दै-८०४।
मंद या धीमा होना, निराश या हतोत्साह होना।
उ.-(क) सात दिवस जल बर्षि सिराने हारि माती मुख फेरो-९५९। (ख) बज्रायुध जल बरषि सिराने परयो चरन तब प्रभु करि जाने-१०७०।
उ.-भक्ति कब करिहौ जनम सिरानौ-१−३२९।
उ.- (क) जनम सिरानौ ऎसैं ऎसैं। कै घर-घर भरमत जदुपति बिनु कै सोवत कै बैसैं-१−२९३। (ख) ब्रजहिं बसत सब जनम सिरानौ, ऎसी करी न आहति-५२९।
सिरानौई लाग्यौ-बीता ही जाता या जा रहा है।
उ.-जनम सिरानौई सो लाग्यौ-१−७३।
निराश या हतोत्साह हो गया।
उ.-सात दिवस जल बरसि सिरान्यो आवत चल्यो ब्रजहिं अत्रावत-९७८।
उ.-अब कुबिजा पाइ हियो सिरायो-३४४२।
उ.-रिषि मग जोवत बर्ष बितायौ। पै भोजन तौहूँ न सिरायौ-९−५।
ՙसिराने՚ की क्रिया या भाव।
उ.- है कहयौ सिरावन सीरा-१०−१८३।
सिरोही की बनी बढ़िया तलवार।
पत्थर की बटिया जिस पर बट्टे से कुछ पीसा जाता है।
कटे हुए खेत में गिरे हुए अनाज के दाने बीनकर निर्वाह करने की वृत्ति।
सिर से पैर तक के वस्त्र (अंगा, पगड़ी, पाजामा, पटुका और दुपट्टा) जो राज-दरबार से किसी को सम्मान रूप में दिये जाते हैं।
उ.- (क) चतुर-सिरोमनि नंद-सुत-१−४४। (ख) हैं पतित-सिरोमनि-१−१९२। (ग) सूरदास प्रभु रसिक-सिरोमनि-१०−२९८। (घ) इतने महिं सब तात समुझिबी चतुर-सिरोमनि नाह-२८६८।
एक तरह की चिड़िया जिसकी चोंच और पैर लाल तथा शरीर काला होता है।
उ.- एक दुहनी दूध जामन को सिरावन जाहिं-पृ. ३३९ (८४)।
क्लेश या संताप दूर करनेवाला।
उ.- कोटि बेर जल औटि सिरावै-२७४७।
हथियार रखने का स्थान, शस्त्रागार।
(स्थान) जहाँ काई से पैर फिसले।
खेत में गिरा हुआ अनाज बीन कर निर्वाह करनवाला।
उ.-(क) सिला तरी जल माँहिं सेत बँधि-१−३४। (ख) सैल-सिला-द्रुम बरषि ब्योम चढ़ि सत्रु-समूह सँहारौं-९−१०६। (ग) आपुहिं गिरयौ सिला पर आई-३९१।
उ.- बदन पसारि सिला जब दीन्ही, तीनौं लोक दिखाए-१०−२६२।
खेत में कटी हुई फसल उठा ले जाने पर गिरा हुआ अनाज।
फटकने-पछोरने के लिए रखा गया अनाज का ढेर।
खेत में गिरे हुए अनाज बीनकर निर्वाह करने की वृत्ति।
सुई से सीने का काम, ढंग या मजदूरी।
क्रम, बँधा हुआ तार या क्रम।
सिलसिले या क्रम से क्रमबद्ध।
उ.- बिस्वकर्मा सुतिहार स्त्रुति धरि सुलभ सिलप दिखावनो-२१८०।
विवाह की एक रीति जिसमें वर-वधू सिल पर कुछ पीसते हैं।
लपझप काम करनेवाला, क्रम या व्यवस्था का ध्यान न रखनेवाला।
उ.- कुंडल छवि रवि किरन हूँ तें द्युति मुकुट इंद्रधनु ते शोभावत-८६९।
गुल-गपाड़ा, हल्ला, कोलाहल।
उ.- (क) सूर नारि नर देखन धाए घर घर शोर अकूत-२४९२। (ख) नगर शोर अकनत सुनत अति रूचि उपजावत-२५६०। (ग) हलधर संग छाक भरि काँवरि करत कुलाहल सोर- सारा. ४७१।
उ.- महरि पुत्र कहि शोर लगायो तरू ज्यों धरनि लुटाइ- २५३३।
उ.- आय द्वारका शोर कियो उन हरि हस्तिनपुर जाने।
उ.- कुंचित अलक सिलीमुख मानो लै मकरंद निदाने-१३३४।
एक पर्वत जो रामचंद्र को विश्वामित्र के साथ जाते समय गंगा तट पर मिलाथा।
शिलाओं का एक लसदार पसेव जो बड़ी पुष्टई माना जाता है।
सीने का काम दूसरे से कराना, सिलवाना।
पत्थर काटने गढ़नेवाला कारीगर।
सिलाहर, सिलाहरा, सिलाहार, सिलाहारा
कटे हुए खेत में बिखरे हुए अनाज के दाने बीनकर जीवन निर्वाह करनेवाला।
सिलाहर, सिलाहरा, सिलाहार, सिलाहारा
फसल कट जाने पर खेत में बिखरा हुआ अनाज।
खलियान में भूसे का ढेर जिसमें अनाज के छ दाने रह जाते हैं।
मुहा.- सिल्ला चुनना या बीनना-खेत या भूसे में बिखरे हुए अनाज के दाने बीनना।
धार तेज करने का छोटा पत्थर।
फटकने-पछोरने के लिए लगाया गया अनाज का ढेर।
उ.- (क) ब्रह्म-सिव-सेस-सुक सनक ध्यायौ-१−११९। (ख) सिव न, अवध सुन्दरी, बधो जिन-१६८७।
गुंधी हुई मैदा के बटकर बनाए गए सूत के से लच्छे जो सुखाकर दूध में पकाकर या धी में भूनकर और चाशनी में पागकर खाए जाते हैं।
मुहा.- सिवईं तोड़ना, पूरना या बटना- गुँधी हुई मदा के सूत कातना या बनाना।
उ.- सन्मुख रहत टरत नहिं कबहूँ, सदा करत सिवकाई- पृ. ३३६ (५६)।
उ.- सिव सिवता इन्हीं तैं लई-३−१३।
फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी जो शिवजी के विवाह की तिथि होने से एक पर्व के रूप में मान्य है और शैव इस दिन व्रत करते हैं।
उ.- ता दिन तें उर-भौन भयो सखि सिव-रिपु को संचार-२८८८।
शिवजी की पिंडी जिसकी पूजा होती है।
पानी में होनेवाली एक तरह की लम्बी और लच्छेदार घास।
उ.- (क) पग न इत-उत धरन पावत उरझि मोह-सिवार−१−९९ (ख) बिरह-सरोवर बूड़ई अंधकार-सिवार-१५३८।
सेना के ठरहने का स्थान, पड़ाव।
वह स्थान जहाँ लोग उद्देश्य विशेष से ठहरें या रहें।
उ.- भृगु मरीचि-अंगिरा बसिष्ठ। अत्रि पुलह पुलस्त अति सिष्ठ−३−८।
उ.- रिषि सिष्यहिं भेज्यौ समुझाइ। नृप सौं कहि तू ऐसी जाइ-१−२९०।
बहुत भय लगता है, धकधकी होती है, जी धड़कता है।
उ.- तबहीं तें इकटक चितवत और सिसकत डर तें-१८६९।
भीतर ही भीतर या बहुत धीरे-धीरे रोने में निकलती हुई साँस छोड़ना।
लंबी साँस रोक-रोककर छोड़ते हुए रोना।
मरने के निकट होने से उलटी साँस या हिचकियाँ लेना।
(पाने या प्राप्त करने के लिए) रोना या तरसना।
मुहा.- सिसकती-भिनकती - मैली-कुचैली और रोनी सूरत।
मुँह से सीटी का सा हल्का शब्द निकालना।
(अत्यन्त पीड़ा या आनन्द से) मुँह से साँस खींचना या शीत्कार करना।
माघ और फाल्गुन मास की ऋतु।
उ.- (क) यह कहिकै सिसु-भेष धरयौ-१०−८। (ख) उपजि परयौ सिसु-कर्म-पुन्य फल-१०−१३८। (ग) कोउ आयौ सिसु-रूप रच्यौ री-६०६।
उ.- (क) सूरदास सिसुता-सुख जलनिधि कहँ लौं कहौं, नाहिं कोउ समसरि-१०−१२०। (ख) सूरदास प्रभु सिसुता कौ सुख सकै न हृदय समाइ-१०−१७८। (ग) अति सिसुता मैं ताहि संहारयौ परयौ सिला पर आइ-९८६।
बालकों का सा आचरण, लड़कपना।
उ.- अखिल ब्रहांड-खंड की महिमा सिसुता माहिं दुरावत-१०−१०२।
उ.- मुख-मुख जोरि बत्यावई सिसुताई ठानै-१०−७२।
चेदि देश का एक प्रसिद्ध राजा जिसे श्रीकृष्ण ने मारा था।
उ.- दंत बक्र सिसुपाल जे भए। बासुदेव ह्वै सो पुनि हए-१०−२।
गुहलौत राजपूतों की एक शाखा जिसकी प्राचीन राजधानी चित्तौड़ थी और आधुनिक उदयपुर है।
रचकर तयार करने की क्रिया या भाव।
कामदेव के पाँच बाणों में एक।
मुदित, मोहित या मुग्ध होता है।
उ.- (क) मनौ मधुर मराल छौना बोलि बैन सिहात-१०−१८४। (ख) हरि प्यारी के मुख तन चितवत मनही मनहु सिहात-१५२१। (ग) परस्पर दोउ करत क्रीड़ा मनहिं मनहिं सिहात-पृ. ३५१ (७६)। (घ) श्रीमुख स्याम कहत यह बानी ऊधौ सुनत सिहात-२९२५।
उ.- द्वारिका की देखि छबि सुर-असुर सकल सिहात।
उ.- सूर प्रभु को निरखि गोपी मनहिं मनहिं सिहाति।
किसी अच्छी वस्तु देखकर इसलिए दुखी होना कि वह या वैसी वस्तु हमारे पास नहीं हैं, स्पर्द्धा करना।
मुग्ध, मोहित या मुदित होता।
पाने की अभिलाषा करना, ललचना।
उ.- (क) सूर स्याम मुख निरखि जसोदा मनहीं मन जु सिहानी-१०−२०८। (ख) अति पुलकित गदगद मुख बानी मन-मन महरि सिहानी-१०−२५३। (ग) भोर भए ब्रजधाम चले दोउ मन-मन नारि सिहानी-२०८१। (घ) बीरा खात देखि दोउ बीरा दोउ जननी मुख देखि सीहानी-२३७९।
उ.-पियहिं के गुन गुनत उर में दरस देखि सिहाहिं-पृ. ३३२ (१२)।
ՙथूहर՚ या सेंहुँड़ का पौधा।
मूँज या सरपत, नारियल आदि के बीच की पतली तीली; ऎसी बहुत सी तीलियों से झाड़, बनाते हैं।
किसी घास या तृण का महीन डंठल या उसका तिनका।
उ.-रोचन भरि लै देत सीक सौ स्रवन निकट अति हीं आतुर की-१०−१८०।
मुहा.- सात सींक बवाइ-शिशु के जन्म के छठे दिन की एक रीति जिसमें सात सींके रखी जाती हैं। उ.-द्वार सथिया देति स्यामा सात सींक बनाइ-१०−२६।
नाक का एक गहना, लौंग, कील।
पेड़ पौधों की बहुत पतली टहनी, डाँड़ी।
डोरी या धातु की तीलियों का, कुछ रखने के लिए बना छींका।
उ.- कब सीकैं चढ़ि माखन खायौ-१०−२९३।
उ.- सींके छोरि¨¨¨¨¨ माखन-दधि सब खायौ-१०−३२८।
मुहा.-सींकिया पहलवान-बहुत दुबला-पतला आदमी जिसे अपने बल का घमंड हो।
खुर वाले कुछ पशुओं के सिर के दोनों ओर निंकले हुए वे कड़े, और नुकीले अवयव जिनसे वे रक्षा या आक्रमण करते हैं, विषाण।
उ.-(क) माधौ, नैंकु हटकौ गाइ।¨¨¨¨¨। नील खुर अरु अरुन लोचन, सेत सींग सुहाइ-१−५६। (ख) खुर ताँबै, रूपैं पीठि, सोनैं सींग मढ़ीं-१०−२४।
मुहा.-(किसी के) सिर पर सींग होना- (किसी में) दूसरों से बढ़कर कोई बात या विशेषता होना (व्यंग्य)। सींग कटाकर बछड़ों में मिलना-किसी सयाने का बच्चों में मिलना या उनके साथ खेलना (व्यंग्य)। सींग जमना-लड़ने की इच्छा होना। सींग दिखाना या देना - कोई वस्तु न देना और चिढ़ाना, अँगूठा दिखाना। सींग निकलना-(१) चौपाये का जवान होना। (२) किसी किशोर-किशोरी का इतराने लगना। कहीं सींग समाना- कहीं गुजारा या निर्वाह होना, कहीं आश्रय या शरण मिलना। सींग पर मारना-बहुत तुच्छ या नगण्य समझना, कुछ परवाह न करना।
सींग का बना बाजा जो मूँह से फूँककर बजाया जाता है, सिंगी।
एक तरह की फली जिसकी तरकारी बनती है।
सींग देखकर पश की जाँच-पड़ताल या पहचान करना।
एक तरह की फली जिसकी तरकारी बनती है, मोगरे की फली।
उ.-सेमि सींगरी छमकि झोरईं-२३२१।
हिरन के सींग का बना बाजा जो मुँह से (फूँककर) बजाया जाता है।
उ.- हृदय सींगी टेर मुरली नैन खप्पर हाथ-३१२६।
वह पोला सींग जिससे शरीर का दूषित रक्त खींचा जाता है।
मुहा.- सींगी तोड़ना या लगाना-सींगी से दूषित रक्त खींचना।
(खेतों या पेजडों में) पानी देता है।
उ.- अति अनुराग सुधाकर सींचत दाड़िम बीज समान।
(खेतों या पेड़ों में) पानी देना।
पानी छिड़ककर तर करना या भिगोना।
(पानी आदि) डालिए या छिड़किए।
उ.- सूर सुजल सींचिये कृपानिधि निज जन चरन-तटी-९−९८।
(पानी आदि) डाला या छिड़का।
उ.-भूभृत सीस नमित जो गर्व-गत पावक सींच्यौ नीर-९−२६।
उ.- (क) सकल सुख कीं सींव कोटि मनोज-सोभा हरनि-१०−१०९। (ख) मध्य नायक गोपाल बिराजत सुंदरता की सींवा हो-२४००।
मुहा.- अपनी सी-(१) अपनी शक्ति भर। उ.- अपनी सी मैं बहुत करी री। (२) अपनी इच्छा के अनुसार।
उ.- स्रम स्वेद सीकर गुंड मंडित रूप अंबुज कोर।
अनाज की बाल के ऊपर निकले हुए बाल जैसे कड़े सूत।
सिखाने की क्रिया या भाव, शिक्षा
(सं. शिक्षा, प्रा. सिक्खा)
(सं. शिक्षा, प्रा. सिक्खा)
उ.- अहो नँदरानि, सीख कौन पै लही री-३४८।
(सं. शिक्षा, प्रा. सिक्खा)
उ.- याकी सीख सुनै ब्रज को रे।
(सं. शिक्षा, प्रा. सिक्खा)
अभ्यास करते (हैं), सीख रहे (हैं)।
उ.-मुरली अधर धरन सीखत हैं-५०७।
सीखने या सिखाने की क्रिया या भाव।
उ.- तात दुहन सीखन कहयौ मोहिं धौरी गैया-४०९।
हित के लए बतायी गयी बात, उपदेश, शिक्षा।
सीखनहार, सीखनहारा, सीखनहारो
सीखने की इच्छा रखनेवाली, सीखने को तत्पर।
उ.- तुमही कहौ इहाँ इतननि महिं सीखनहारी को है-३२३०।
जानकारी या ज्ञान प्राप्त करना।
(सं. शिक्षण, प्रा. सिक्खण)
काम करने का ढंग आदि जानना-समझना।
(सं. शिक्षण, प्रा. सिक्खण)
कला, विद्या आदि की शिक्षा पाना।
(सं. शिक्षण, प्रा. सिक्खण)
उ.- तू मोही को मारन सीखी, दाउहिं कबहुँ न खीझै-१०−२१५।
उ.- अबहिं नैंकु खेलन सीखे हैं-७७४।
उ.- सूरदास प्रभु झगरौ सीख्यौ-७३४।
आग या गरमी से पकने की क्रिया या भाव।
(सं. सिद्ध, प्रा. सिज्झि, हिं. सींझ)
सीजना, सीजनो सीझना, सीझनो
आँच या गरमी से पकना, गलना या चुरना।
(सं. सिद्ध, प्रा. सिज्झिं, हिं. सीझना)
मुहा.- शौक करना - भोग करना, आनंद लेना। शौक चर्राना या पैदा होना - बहुत चाह या लालसा होना (व्यंग)। शौक पूरा करना या मिटाना - चाह पूरी करना। शौक फरमाना- भोग करना, आनंद लेना। शौक से- सहर्ष, आनंद से।
सीजना, सीजनो सीझना, सीझनो
आँच या गरमी का ताव खाकर नरम पड़ना।
(सं. सिद्ध, प्रा. सिज्झिं, हिं. सीझना)
सीजना, सीजनो सीझना, सीझनो
(सं. सिद्ध, प्रा. सिज्झिं, हिं. सीझना)
सीजना, सीजनो सीझना, सीझनो
सूखे हुए चमड़े का किसी घोल में भीगकर मुलायम होना।
(सं. सिद्ध, प्रा. सिज्झिं, हिं. सीझना)
सीजना, सीजनो सीझना, सीझनो
(सं. सिद्ध, प्रा. सिज्झिं, हिं. सीझना)
सीजना, सीजनो सीझना, सीझनो
(सं. सिद्ध, प्रा. सिज्झिं, हिं. सीझना)
बढ़-बढ़कर बातें करना, डींद हाँकना, शेखी मारना।
ओठों को गोलाई में सिकोड़ कर आघात के साथ वायु निकलने से होनेवाला महीन, पर तेज शब्द।
मुहा.- सीटी देना- सीटी देकर कोई संकेत करना।
इसी प्रकार का तेज शब्द जो किसी यंत्र या बाजे से निकलंता हो।
मुहा.- सीटी देना- सीटी देकर समय आदि सूचित करना या सावधान करना।
वह बाजा जिससे वैसा शब्द निकले।
मुहा.- सीढ़ी चढ़ना- क्रमशः उन्नति करना।
उ.- (क) सहि सन्मुख तउ सीत-उष्न कौं सोई सुफल करै-१−११७। (ख) सीत-बात-कफ कठ बिरोधै रसना टूटै बात-१−३१३। (ग) सीत-भीत नहिं करति छहौं रितु-७८२। (घ) कत हौ सीत सहति ब्रज सुंदरि-७८७। (ङ) सीत तैं तन कँपत थर-थर-७८९।
उ.- सकुचत सीत-भीत जलरूह ज्यौं-३५७।
जाड़े के दिन, जाड़े की ऋतु।
विवाह आदि मांगलिक अवसरों पर गायी गयी गाली।
(सं. अशिष्ट, प्रा. असिट्ठ+ना)
विवाह आदि के अवसर पर गायी जानेवाली गाली।
किसी वस्तु का, रस या साररहित अंश।
निस्सार या तत्वहीन वस्तु।
उ.- (क) जनु सीतल सौं तप्त सलिल दै सुखित समोइ करे-९−१७१। (ख) अब मोकौं सीतल जल आनौ-३९६। (ग) सीतल सलिल सुगंध पवन-५८९।
उ.- (क) तऊ सुझाव न सीतल छाँड़ै-१−११७। (ख) चक्र सुदरसन सीतल भयौ-९−५।
उ.- सीतल भयौ मातु कौ हियौ.-४−९।
उ.- सेव चरन सरोज सीतल-१−३०७।
एक तरह की बढ़िया चिकनी चटाई।
इस रोग की अधिष्ठात्री देवी।
भूमि जोतते समय हल की फाल से पड़ जाने वालो रेखा, कूँड़।
मिथिला के राजा जनक की पुत्री जो श्री रामचन्द्र को ब्याही थी।
उ.-श्रीरघुनाथ-प्रताप पतिब्रत सीता-सत-नहिं टरई-९−७८।
उ.- चिंतत चित्त सूर सीतापति मोह-मेरु-दुख टरत न टारत-९−६२।
सीतारमण, सीतारवन, सीतारौन
उ.-ऎसैं बसिए ब्रज की बीथिनि। ग्वारनि के पनवारे चुनि-चुनि उदर भरीजै सीथिन-४९०।
ठीक सामने की स्थिति या भाव, सीधापन।
मुहा.- सीध बाँधना-निशाना साधना।
जिसमें फेर, घुमाव या टेढ़ापन न हो।
मुहा.- सीधा करना-(तीर, बन्दूक आदि का) निशाना साधना। सीधा आना- भिड़ जाना।
जो कुटिल या कपटी न हो, भोला।
जिसमें ज्यादा तड़क-भड़क न हो।
मुहा.-(किसी को) सीधा करना- (१) दंड देकर ठीक करना। (२) अपने अनुकूल करना। सीधा दिन-शुभ दिन या मुहूर्त।
सीधा-साधा-सुगम और प्रत्यक्ष।
जो सरलता से समझ में आ सके।
बिना पका हुआ वह अन्न जो दान दिया जाय।
मुहा.- सीधी राह-सुमार्ग, अच्छा आचरण। सीधी सीधी सुनाना - (१) साफ-साफ या खरी बात करना। (२) भला-बुरा कहना। सीधी तरह-नरमी या सज्जनता से।
कपड़े, चमड़े आदि के टुकड़ों को सुई में तागा पिरोकर जोड़ना, टाँका मारना।
सीना-पिरोना-सिलाई-कढ़ाई का काम।
शंख, घोंघे आदि की तरह कड़े आवरण में रहनेवाला एक जल-जंतु, सीपी।
(सं. शुक्ति, प्रा. सुत्ति)
उ.- उपजि परयौ सिसु कर्म-पुन्य फल समुद्र-सीप ज्यों लाल-१०−१३८।
सीप नामक जल-जंतु का सफेद, कड़ा और चमकीला आवरण जिससे बटन आदि बनते हैं।
(सं. शुक्ति, प्रा. सुत्ति)
ताल के सीप का संपुट जो चम्मच आदि के काम आता है।
(सं. शुक्ति, प्रा. सुत्ति)
वह लम्बोतरा पात्र जिसमें देव-पूजा या तर्पण आदि के लिए जल रखा जाता है।
(सं. शुक्ति, प्रा. सुत्ति)
उ.- (क) दमकति दूध दँतुलियाँ, मनु सीपज घर कियौ बारिज पर-१०−९३। (ख) सीपज-माल स्याम-उर सोहै-१०−१३९। (ग) की सृक सीपज की बगा-पंगति, की मयूर की पीड़ पखी री-१६२७।
उ.- परसत आनन मनु रबि कुंडल, अंबुज स्रवत सीप-सुत जोटी-१०−१८७।
उ.- दमकति द्वै द्वै दँतुलियौ बिहँसत, मानौ सीपिज (सीपज) घरु क्रियो बारिज पर-१०−९३।
ՙसीप՚ नामक जल-जन्तु का आदरण या संपुट।
अत्यन्त पीड़ा या आनंद के समय मुँह से निकलनेवाली शीत्कार।
स्त्रियों के सिर की माँग।
उ.- सीस सचिक्कन केस हो बिच सीमंत सँवारि-२०६५।
स्त्रियों की माँग निकालने कौ क्रिया।
सिंदूर जिससे सौभाग्यवती स्त्रियाँ अपनी माँग भरती हैं।
हिन्दुओं के दस संस्कारों में तीसरा जिसमें गर्भस्थिति के चौथे, छठे या आठवें महीने में गर्भवती की माँग निकाली जाती है।
शौकीन होने का भाव या काम, रँगीलापन, छैलापन।
शुद्धता के लिए किये गये दैनिक कर्म।
शूरसेन का राज्य जिसका विस्तार आधुनिक व्रजमंडल के लगभग था।
शौरसेन प्रदेश की प्राचीन प्राकृत भाषा।
एक प्राचीन अपभ्रंश भाषा जो मध्यप्रदेश में प्रचलित थी।
साझे में जमिन जोतने-बीने की रीति।
वह जमीन जो साझे में जोती-बोयी जाय।
वह जमीन जो जमींदार स्वयं जोतता-बोता हो।
मुहा.- सीर में रहना-मिल-जुलकर रहना।
मुहा.-सीर खुलवाना-फसद खुलवाना।
उ.- सोइ करौ जो मिटै हृदय को दाहु परै उर सीरक।
मुहा.- सीम काँड़ना या चरना-दूसरे के श्रेत्र में अधिकार जताना।
वह स्थान जहाँ सीमा का अंत होता हो।
किसी प्रदेश या स्थान के विस्तार का अंतिम स्थान, हद।
मुहा.- सीमा बंद करना-ऎसा प्रबन्ध करना कि देश की सीमा पर से बाहरी आदमियों का और माल का आना-जाना न हो सके।
(नियम या मर्यादा की) वह हद जहाँ तक कोई बात या काम करना उचित हो।
मुहा.-सीमा से बाहर जाना- औचित्य या मर्यादा का उल्लंघन करके कोई काम करना।
हद (की रेखा) से घिरा या घेरा हुआ।
हद या सीमा को लाँघना या पार करना।
नियम, मार्यदा का औचित्य से बाहर काम करना
उ.-तोरि धनुष, मुख मोरि नृपति कौ, सीय स्वयंबर कीनौ-९−११५।
पका कर गाढ़ा किया हुआ शक्कर का घोल या किसी प्रकार का रस, चाशनी।
गेह़ूँ के आटे की गुड़ की बनी लपसी, हलुआ, मोहनभोग।
उ.- (क) सीरा साजौ लेहु ब्रजपती-३९६।
फसल कटने पर खेत में पड़े रह जानेवाले अनाज के दाने, सिल्ला।
खेत में इस प्रकार पड़े रह जोनेवाले दाने बीनकर निर्वाह करने की वृत्ति।
उ.- सुखमा सीला अवधा नंदा बृन्दा जमुना सारि-१५८०।
उ.- निरखि सखि, सुंतरता की सीव-१३४४।
उ.-प्रभु तुम्हरे इक रोम-रोम प्रति कोटिक ब्रह्मा सीव-४९२।
सिलाई का जोड़ या उसके टाँके।
उ.-सीरी पौन अगिनि सी दाहति।
ठंढा या शांत करनेवाली, सुखद।
उ.- कछु सीरी कछ ताती बानी कान्हहिं देति दोहाई-२२७५।
उ.- नख-सिख लौं तनु जरत निसा-दिन निकसि करत किन सीरे-३१९८।
ठंढा या शांत करनेवाले, सुखद।
उ.- समाचार ताते अरु सीरे पाछे जाइ लहै-२७१३।
उ.- (क) कहा कूबरी सील-रूप गुन बस भए स्याम त्रिभंगी-१−२१। (ख) सत्य-सील-संपन्न समूरति-१−६९। (ग) सील संतोष सखा दोउ मेरे-१−१७३।
उ.- सुन्दर त्रयगुन रस की सीवाँ सूर राधिका स्याम-पृ. ३४४ (३१)।
उ.- स्वकर काटत सीस-१−१०६।
मुहा.- सीस उतारना- मार डालना। सीस उतारौं-सिर काट कर मार डालूँ। उ.- तबै सूर संधान सफल हौं, रिपु कौ सीस उतारौं-९−१३७। सीस डुलाना-सिर हिलाकर आश्चर्य आदि प्रकट करना। सीस डोलाए-आश्चर्य आदि प्रकाट किया। उ.- जम सुनि सीस डोलाए-१−१२५। सिर ढोरना-अत्यंत मुग्ध या चकित होकर सिर हिलाना। सीस ढोरैं-अत्यंत मुग्ध या चकित होकर सिर हिलाती हैं। उ.-सुनत मुरली की घोरै, सुर बधू सीस ढोरैं-२२८७। चरन पर सीस धरना-अत्यंत विनय, नम्रता या दीनता दिखाना। चरन सीस श्ररि-अत्यंत विनय, नम्रता या दीनता दिखकर। उ.-सूर स्याम कें चरन सीस धरि, अस्तुति करि निजधाम सिधारे-३८५। सीस धुनना-सिर पीटना, सिरपीट कर पछताना या दुखी होना। सीस धुनै सिर पीट कर पछताता या दुखी होता है। उ.- नगन न होति चकित भयौ राजा, सीस धुनै, कर मारै-१−२५७। नमित सीस-विनय, नम्रता या दीनता से झुका हुआ सिर (या व्यक्ति)। उ.-भूभृत सीस नमित जो गर्बगत पावक सींच्यौ नीर−९−२६। सीस फोड़ना या फोरना-कपाल क्रिया करना। सीस फोरि-कपाल-क्रिया करके। उ.- तेई लै खोपरी, बाँस दै सीस फोरि बिखरैहैं-१−८६। चरन तर सीस लुटना या लोटना-अत्यंत विनय, नम्रता या दीनता से चरण पर सिर झुकना। लुटत सीस चरन तर-अत्यंत विनय, नम्रता या दीनता से चरणों पर सीस झुकता है। उ.- लुटत सक्र को सीस चरनतर युग गुन गत समए-९८४।
वह टोपी जो शिकारी जानवरों के नेत्र, मुँह आदि बन्द रखने के लिए चढ़ायी जाती और शिकार के समय खोली जाती है।
सिर पर पहृनने का फूल के आकार का एक गहना।
वह मकान जिसमें सब ओर शीशें जड़े हों।
बहुत पीड़ा या आनंद के समय की गयी शीत्कार।
जाड़े के कष्ट के कारण निकली हुई ध्वनि।
एक जंतु जिसके कान काले होते हैं।
किसी को सूँघने को प्रवृत्त करना।
(सूँड़ ही जिसका अस्त्र है वह) हाथी।
एक असुर जो निसुंद का पुत्र और उपंसुद का भाई था। तिलोत्तमा अप्सरा के लिए सुंद और उपसुंद परस्पर लड़ मरे थे।
उ.- असुर द्वै हुते बलवत भारी। सुंदउपसुंद स्वेच्छा बिहारी-८−११।
उ.- (क) सुंदर स्याम-१−९४। (ख) परम सुंदर नैन-१−३०७।
उ.-रीझे स्याम देखि वा छबि पर रिस मुख सुंदरई-१९७९।
रामायण का पाँचवाँ कांड जिसका नाम लंका के ՙसुंदर՚ पर्वत के नाम पर है।
वह घोड़ा जिसका सारा शरीर सफेद और एक कान काला हो।
उ.- (क) भरि सोवै सुख-नींद मैं तँह सु जाइ जगावै-१−४४। (ख) ज्यौ मृगा कस्तूरि भूलै सुतौ ताके पास-१−७०। (ग) पटपटात टूटत अँग जान्यो, सरन-सरन सु पुकारयौ-५५५।
तृतीया, पंचमी और षष्ठी विभक्तियों का चिह्न।
ՙसुंदर՚ होने का भाव या अवस्था, सौदर्य।
उ.- (क) देखौ माई सुंदरता कौ सागर-६२८। (ख) मध्य नायक गोपाल बिराजत सुंदरता की सींवा हो-२४००।
उ.- (क) कहाँ लौं बरनौं सुंदरताई-१०−१०८। (ख) स्याम भुजनि की सुंदरताई-६४१। (ग) सूरदास कहि कहा बखानै यह निसि यह अँग सुंदरताई-पृ. ३४२−११।
उ.- (क) जा जल-सुद्ध निरखि सन्मुख ह्वै, सुंदरि सरसिज-नैनी-९−११। (ख) ज्यौं सहगमन सुंदरी कै सँग बहु बाजन हैं बाजत-९−१३२। (ग) इत सुंदरी बिचित्र उतहिं घनस्याम सलोना-११३२।
एक दैत्य जिसे दुर्गा ने मारा था।
ՙसुंदर या श्रेष्ठ՚ का वाचक एक उपसर्ग।
(आस-पास या साथ रहनेवाली) सहचरी।
तलवार चलाने के बत्तीस ढंगों में एक।
धागा पिरो कर कपड़ा सीने का बहुत छोटा उपकरण, सूची।
सूई की तरह का तार या काँटा।
मुहा.- सुई का फावड़ा या भाला बनाना- जरा सी बात को बहुत बड़ा कर देना, बात का बतंगड़ कर देना। आँख की सुई (या सुइयाँ) निकलना-किसी कठिन काम को समाप्तप्राय देखकर और शेषांश पूरा करके सारा श्रेय प्राप्त करने का प्रयत्न करना।
पौधे का छोटा, पतला अंकुर।
जिसकी गरदन या कंठ सुंदर हो।
उ.-चारौ बेद पढ़त मुख आगर अति सुकंठ सुर गावन-८−११।
उ.- (क) गनिका किए कौन ब्रत संजम सुक-हित नाम पढ़ावै-१−१२२। (ख) ज्यौं सुक सेमर आस लगि-१−३२६। (ग) नासिका सुक नयन खंजन-१२९४।
उ.- ब्रह्म-सिव-सेस-सुक-सनक ध्यायौ-११९।
एक राक्षस जो रावण का दूत था।
उ.- सुक-सारन द्वै दूत पठाए-१−१२०।
उ.-सुकदेव हरि-चरननि सिर नाइ, राजा सों बोल्यौ या भाइ-३−१।
जिस स्त्री की नाक तोते की चोंच जैसी सुंदर हो।
राजा शर्याति की पुत्री जो च्यवन ऋषि को ब्याही थी।
उ.- या छविं की पटतर दीबे कौं सुकवि कहा टकटोहै-१०−१५८।
सहज में या अनायास किया जानेवाला (कार्य), सुगम।
उ.- अंसु सलिल बूड़त सब गोकुल सूर सुकंर गहि लीजै-३४५४।
ՙसुकर՚ या सहज में होने का भाव, सुगमता, सुभीता।
काम करनेवाले को धन्यवाद रूप में दिया जानेवाला धन।
भला या शुभ कार्य करनेवाला।
उ.- आपुन भए सुकर्मा भारि।
चकित होना, अचंभे में होना।
जिसकी डाल या शाखा सुंदर हो।
कौवा जिसने सगुन सूचित करके सत्कार्य किया हो।
उ.- इतनी कहत सुकाग उहाँ तैं हरी डार उड़ि बैठयौ-९−१६४।
(धूप या गरमी से) गीलापन दूर करना।
गीलापन दूर करने के लिए धूप आदि में डालना।
अन्न की उपज के विचार से सस्ती का समय।
वह स्त्री जो केवल अपने पति से ही प्रेम करती हो।
वह स्त्री जो केवल अपने पति से ही प्रेम करती हो।
जिसके ՙअंग՚ बहुत कोमल हों।
उ.- उन दिननि सुकुआर हते हरि।
उ.-भयौ सुरुचि तैं उत्तम क्वार, अरु सुनीति कैं ध्रुव सुकुमार-४−९।
उ.-रोवैं वृषभ तुरग अरु नाग। स्याल (स्यार) दिवस, निसि बोलैं काग-१-२८६।
अंजुलि में फूल लेकर श्रद्धा से चढ़ाना।
श्रद्धा-भाव-सूचक कार्य, कृति या आयोजन।
कोमल अक्षरों या शब्दों से युक्त काव्य।
कोमल अंगों-वाली (स्त्री)।
उ.- (क) सत्यवती मच्छोदरि नारी। गंगा तट ठाढ़ी सुकुमारी-१−२२९। (ख) प्रातहीं उठि चलीं सब मिलि जमुन-तट सुकुमारि-७७७।
उत्तम कुल या वंश में जन्मा व्यक्ति।
एक प्रसिद्ध राक्षस जो माल्यवान, सुमाली और मली का पिता था।
उ.- माखन सहित देहि मेरी मैया सुपक सुकेमल रोटी-१०−१६३।
सौर गृह का एक प्रसिद्ध गृह जो दैत्यों का गुरु माना गया है।
उ.- (क) छठऎं सुक्र तुला के सनि जुत सत्रु रहन नहिं पैहैं-१०−८६। (ख) मानहुँ गुरु-सनि-सुक्र एक ह्वै लाल-भाल पर सोहै री-१०−१३९। (ग) सुक्र उदय होन लाग्यौ-२०४६।
उत्तम और शुभ कार्य करनेवाला।
उ.- (क) जिहिं सर सुभग मुक्ति-मुक्ताफल सुकृत-अमृत रस पीजै-−१−३३७। (ख) इक मन अरु ज्ञानेंद्री पाँच¨¨¨¨¨। ज्यौं मग चलत चोर धन हरैं। त्यौं ये सुकृत-धनहिं परिहरैं-५−४। (ग) बदत बिरंचि बिसेष सुकृत ब्रज बासिन के-४८७।
मुहा.- सुकृत मनाना-अपने पुण्यों का मन ही मन स्मरण करना जिससे संकट से रक्षा हो।
उ.-सुनहु सूर नृप पास जाति हैं बीच सुकृति अति दरस दियो-२६३३।
उ.-सुकृती सुचि सेवकजन काहि न जिय भावै-१-१२४।
उ.- (क) परम भाग्य सुक्रित के फल तैं सुंदर देह धरी-१−७१। (ख) तस्कर ज्यौं सुक्रित-धन लेहिं-५−४।
बहुत छोटा, थोड़ा या पतला।
वह अनुकूल और प्रिय अनुभूति जिसकी सबको अभिलाषा रहती है, आराम।
मुहा.- सुख मानना- (१) हरी-भरी अवस्था में रहना। (२) संतुष्ट या प्रसन्न रहना। सुख में सुख-सौभाग्य के दिनों से। उ.- सुख में आइ सबै मिलि बैठत रहत चहूँ दिसि घेरे-१−७९। सुख भोगना या लूटना-खूब मौज करना। सुख की नींद सोना-सब तरह से निश्चिंत रहना।
उ.- चढ़ि सुख-आसन नृपति सिधायौ-५, ४।
जो सुख से या सहज ही किया जा सके।
उ.- दुहूँ लोक सुखकरन हरन-दुख बेद-पुरा-ननी साखि-१−९०।
उ.- अंग-अंग सुभग सकल सुखदनियाँ-१०−१०६।
उ.- (क) सब के ईस परम करुनामय सबहीं कौं सुखदाइ-९−१३४। (ख) सूरस्याम ब्रज-लोग कौं जहँ तहँ सुखदाइ-५८९।
सुखदाइन, सुखदाइनि, सुखदाइनी
उ.- (क) कर जोरे बिनती करौं दुरबल-सुखदाइ-१−२३८। (ख) दारा सुत-देह-गेह-संपति सुखदाइ-१−३३०।
(सं.सुखदातृ, हिं. सुखदाता)
उ.- (क) ऎसे प्रभु सुखदानी-१−११२। (ख) धनि त्रिय तुमको जो सुखदानी संगम जागत रैनि बिहानी-१९६७।
उ.- (क) सुमिरन कथा सदा सुखदायक-१−८३। (ख) सकल लोक नायक सुखदायक-१०−४। (ग) सूर स्याम संतनि सुखदायक-६०७।
उ.- (क) सूर स्याम सेवक-सुखकारी-१−३०। (ख) माता हेत जनहिं सुखकारी।¨¨¨¨¨¨। ऎसे हरि जनक सुखकारी-३९१।
उ.- बसीबट तट रास रच्थौ है सब गोपिनि सुखकारी-पृ. ३५१ (७०)।
सुख-सुविधा से जीवन बिताने की चेष्टा करने या इच्छा रखनेवाला।
उ.- इहिं वृन्दावन इहिं जमुना-तट ये सुरभी अति सुखद चरावत-४४९।
उ.- तैसी हंस-सुता पवित्र तट तैसोई कल्पबृच्छ सुखदायो।
सुख या आनंद देनेवाली, सुखदायिनी।
वह जो बहुत सुख देनेवाला या सुखदायी हो।
उ.- (क) छाँड़ि सुख-धाम अरु गरुन तजि साँवरौ पवन के गवन तैं अधिक धायौ-१−५। (ख) सुनियत है तुम बहुपतितनि कौं दीन्हौ है सुखधाम-१−१७९।
उ.- जद्दपि सुख-निधान द्वारावति तौउ मन कहुँ न रहाहीं-१० उ.−१०३।
उ.- (क) सो बारिज सुख-रास-१−३३९। (ख) मीत हमारे परम मनोहर कमलनयन सुखरासी-३३१४।
उ.- (क) सोभित सिथिल बसन मनमोहन सुखवत स्रम के पागे-६८६। (ख) मुख के पवन परस्पर सुखवत गहे पानि पिय जारो-२२७५।
किसी चीज के सूखने पर हो जानेवाली छीज या कमी।
उ.- मनसा नाथ मनोरथ पूरन सुख-निधान जाकी मौज घनी-१−३९।
ऐसी पालकी जिसका ऊपरी भाग शिवालय के शिखर-सा हो।
उ.- तजि सुख-पाल रहयौ गहि पाइ-५−४।
उ.- (क) कहि राधा किन हार चुरायो। ¨¨¨¨। सुखमा सीला अवधा नंदा बृन्दा जमुना सारि-१५८०। (ख) गुखमा पहल द्वार ही ठाढ़ी-२०८१।
हर अवस्था या स्थिति में सुखी रहनेवाला।
बड़ों के प्रति आदर या पूज्य भाव।
श्रद्धा करने के योग्य, श्रद्धा-पात्र।
उ.- दूरि तीर्थन श्रम करि जाहिं।
उ.- आज कहा उद्यम करि आए। कहै वृथा भ्रमि त्रमि श्रम (स्त्रम) पाए-४-१२।
भोग विलास में ही जीवन का सुख समझनेवाला, विलासी।
सुख से ही रहने का अभ्यस्त।
उ.- सूरदास स्वामी सुख-सागर-१०−१०२।
वह शैया जो बहुत सुखदायिनी हो।
उ.- कमल-नैन पोढ़े सुख-सेज्या-२−२६८।
भावी सुख या सिद्धि संबंधी कोई सुखद योजना या कल्पना।
जिसका अंत या परिणाम सुखकर हो।
रोग, चिंता आदि से दुर्बल हो गयी।
उ.- तज्यौ मूल साखा से पत्रनि सोच सुखानी देहु-२३४३।
उ.- तनु तप तेज सुखान्यौ-३१२७।
उ.- मुयौ असुर सुर भये सुखारी-७−२।
जिस (काव्य, नाटक या कथा) के अंत में सुखपूर्ण घटना, जैसे संयोग, अभीष्ट सिद्धि, आदि हो।
किसी गीली चीज को धूप या हवा में अथवा आग के पास इस प्रकार रखना कि उसकी नमी या आर्द्रता दूर हो जाय।
नमी या आर्द्रता दूर करना।
नमी या आर्द्रता न रह जाना।
रोग, चिंता आदि से दुर्बल हो जाना।
सुख में ही रमा रहनेवाला, विलासी।
आसन जिस पर बैठने में सुख मिले।
उ.- जनु सीतल सौं तप्त सुलिल दै सुखित समोइ करे-९−१७१।
एक बानर जो वरुण का पुत्र, बाली का ससुर और सुग्रीव का राजवैद्य था।
उ.- (क) दौनागिरि पर आहि संजीवन बैद सुखेन (सुषेन) बताई-९−१४९। (ख) सुग्रीव बिभीषन जामवंत। आनंद सुखेन (सुषेन) केदार संत-९−१६६।
(चिंता आदि से) दुर्बल हो जायगा।
उ.- तुम बिनु मोकों देखि सुखैहै-२६४९।
अच्छी महक या गंध, सुवास, सौरभ।
जहाँ या जिसमें जाना या पहुँचना सरल हो।
जो सहज में जाना, किया या पाया जा सके।
उ.-भक्त जमुने सुगम, अगम औरै-१−२२२।
उ.-जब जब दीननि कठिन परी। जानत हौं करुनामय जन कौं तब तब सुगम करी-१−१६।
जिसमें सरलता से प्रवेश हो सके।
उ.-आपु जबहिं द्वारे ह्वै निकसत देखत सबै सुगात-१२२२।
उ.-गावहिं मंगल सुगान, नीके सुर नीकी तान-१०−९६।
बिगड़ी, अप्रसन्न या रुष्ट हुई।
उ.-सूर स्याम के संग न जैहौं जा कारन तू मोहिं सुगानी-१२५५।
जिसे अच्छे गुरु से मंत्र, दीक्षा या शिक्षा मिले।
बानरराज बालि का भाई जो उसके बाद राजा और जिसने श्रीराम को रावण के जीतने में सहायता दी थी।
उ.- पहुँचे आइ निकट रघुबर कैं सुग्रिव आयौ धाई-९−१०२।
वह वस्तु जिसकी गंध सुन्दर हो।
उ.- (क) याकैं अंग सुगन्ध लगावहु-५−३। (ख) चंदन अगर सुगंध और घृत बिधि करि चिंता बनायौ-९−५०।
उ.- सीतल सलिल सुगन्ध पवन सुख-तरु बंसीबट-५८९।
बुद्ध धर्मानुयायी, बौद्ध।
जो सुडौल या सुंदर रूप में बनाया गया या निर्मित हो।
(हाथ के काम में) निपुण, कुशल।
उ.- सब्द सग मृदंग मिलवत सुदर नंदकुमार-पृ. ३४६ (४५)।
श्याम होने का गुण या भाव।
उ.-सूर प्रभु श्याम की श्यामता मेध की यहै जिय सोच कछु नहिं सोहाई- १६२६।
श्रीकृष्ण की प्रिया राधा।
उ.-(क) इंद्रा बिंदा राधिका श्यामा कामा नारि-११०२। (ख) कहि राधा किन हार चुरायो ¨¨¨¨¨¨। श्यामा कामा चतुरा नवला प्रमुदा सुमदा नारि-१५८०।
उ.- अंग दिखाइ गई हंसि प्यारी, सुरति-चिन्हनि की सुधराई-२१८४।
अच्छी या शुभ घड़ी, साइत या समय।
उ.-सांख्यायन से बहुत महामुनि सेवत चरन सुचार-सारा. ५७।
उ.-दिन दस लौं जलकुंभ साजि सुचि दीप-दान करवायौ-९−५०।
उ.- बृन्दा बिपिन बिसद जमुना-तट सुचि ज्यौनार बनाई-४१६।
पुण्य कार्य या पवित्र आचरण करनेवाला।
जो (किसी काम से) निवृत्त हो गया हो।
उ.- अबहिं निवछरो समय सुचित ह्वै हम तो निधरक कीजै-१−१९१।
उ.- तब पहिचानि चानि प्रभु को भृगु परम सुचित मन कीन्हौं-२९७१।
जिसका चित्त दुविधा में न होकर, स्थिर हो।
बहुत छोटा, पतला या थोड़ा।
शुद्ध या पवित्र आचरणवाला, सदाचारी।
उ.- जमुना, तोहिं बहयौ क्यौं भावै।¨¨¨¨। तेरौ नीर सुची जो अब लौं खार पनार कहावै-५६१।
उ.- बुद्धि सोचति त्रिया ठाढ़ी नेक नहीं सुचेत-२१८७।
उ.- सब सखि-सखा सुछंद-१०−२०३।
उ.- जानु सुजघन करभ-कर आकृति−१−६९।
उ.- (क) सुजन-बेष रचना अति जनमनि आयौ पर धन हरतौ-१−२०३। (ख) बिप्र सुजन चारन - बंदीजन सकल नंद-गृह आये-१०−८७।
उ.- हरषित सुजन सखा त्रिय बालक कृष्ण मिलन जिय भाए-।
उ.- सूर सुजल सीचियै कृपानिधि निज जन चरन-तटी−१−९८।
उ.-(क) जाकौ सुजस सुनत अरु गावत जैहैं पाप-बृन्द भजि भरहरि-१-३१२। (ख) निगम जाकौ सुजस गावत-१-३३५।
उ.-निगम जाकौ सुजस गावत सुनत संत सुजान-१−२३५।
(सं. सु+जांगर = प्रकाशित होना)
(सं. सु+जांगर=प्रकाशित होना)
उत्तम कुल में उत्पन्न, कुलीन।
उ.-यह पाती लै जाहु मधुपुरी जहाँ बसैं स्याम सुजाती-२९८१।
उ.-(क) दीनानाथ कृपाल परम सुजान जादौराइ-३−३। (ख) सुक करयौ, सुनि यह नृपति सुजान-५−४।
जिसका या जिस पर शासन किया जाय।
जिसे दंड दिया जाय, दंडित।
प्राचीन ऋषि-मुनियों के बनाये वे ग्रंथ जिनमें उचित कृत्यों का निर्देश और अनुचित का निषेध किया गया है।
विषय-विशेष का विशिष्ट और अगाध ज्ञान।
उ.-कुमकुम आड़ श्रवत श्रमजल मिलि मधु पीवत छबि छींट चली री।
श्रम को जीत लेनेवाला, कभी न थकनेवाला।
शारीरिक परिश्रम करके जीविका अर्जन करनेवाला।
उ.-कुंडल मकर कपोलनि झलकत श्रमसीकर के दाग।
उ.-चारों भ्रांतनि श्रमितं जानिकै जननी तब पौढ़ाए-सारा. १९३।
उ.-जग्य समय सिसुपाल सुजोधा अनायास लै जोति समोयौ-१−४४।
उ.-जो कछु हरि सौं सुन्यौ सुज्ञान, कहयौ मयत्रेय ताहि बखान-४−३।
उ.-पुत्र सुज्ञानवान मोहिं दीजै-४−३।
मुहा.- कछु न सुझाइ-(१) कुछ दिखायी नहीं देता है। (२) कुछ समझ में नहीं आता, कोई उपाय नहीं सूझता। उ.-तब तैं अब गाढ़ी परी मोकौं कछु न सुझाइ-५८९।
दिखाता, देखने को प्रवृत्त करना।
दूसरे की समझ या ध्यान में लाना।
किसी नयी या विशेष बात, पक्ष या अंग की ओर ध्यान दिलाना।
इस प्रकार ध्यान दिलाने के लिए कही गयी बात।
उ.-चपल नैन नासा बिच सोभा अधर सुरंग सुठार-१६८४।
उ.-(क) बहुत प्रकार किये सब व्यंजन अनेक बरन मिष्ठान। अति उज्ज्वल कोमल सुठि सुंदर देखि महरि मन मान-१०−८९।
उ.-(क) केहरि नख उर पर रुरै सुठि सोभाकारी-१०−१३४। (ख) स्रवन सुनत सुठि मीठे बोल-६३०। (ग) सुठि सुठान ठोड़ी अति सुन्दर सुन्दरता को सार-२०६२।
नाक या मुँह से 'सुड़' - 'सुड़' शब्द करके ऊपर खींचना।
सुंदर बनावट या आकारवाला, जिसके सब अंग ठीक हों।
उ.-(क) (पालनौ अति सुन्दर) ¨¨¨¨¨ आनि धरयौ नंद-द्वार अतिहीं सुंदर सुढार-१०−४१। (ख) डाँडी खचि पचि-पचि मर्कत मय पाँति सुढार-२२८९।
उ.-(क) कर ऊपर लै राखि रहे हरि, देन न मुक्ता परम सुढार-१०−१७३। (ख) कनक बरन सुढार सुन्दरि सकुचि बदन दुराइ-६७६।
(विणा आदि) तंत्र (=तार)-वाद्य बजाने में निपुण या प्रवीण।
उ.-धनसुत-दारा काम न आवैं-१−८०।
नाट्यशाला का प्रधान जो नाटक के अभिनय का सारा प्रबंध करता है।
(किसी कार्य या योजना का) संचालक या प्रबंधक।
ऊपर से नीचे की ओर हाथ फिरना।
उ.-देखत सुतप्त जल तरसैं-१०−१८३।
वह यज्ञ जो पुत्र की कामना से किया जाय।
जो सरलता से तैर कर पार की या किया जा सके।
तोप जो ऊँट पर रखकर चलायी जाय।
सात पाताल लोकों में से एक।
उ.-(क) अतल बितल अरु सुतल, तलातल और महातल जान-सारा. ३१। (ख) सुतल लोक में थिर करि थाप्यो-सारा. ३४३।
सूत या सन की बटची हुई पतली डोरी।
उ.-(क) कनक-रतन-मनि पालनौ गढ़यौ काम सुतहार-१०−४२। (ख) मोतिनि झालरि नाना भाँति खिलौना रचे बिस्वकर्मा सुतहार-१०−८४।
कारीगर, शिल्पकार, शिल्पी।
उ.-द्रुपद-सुताहिं दुष्ट दुरजोधन सभा माहिं पकरावै-१−१२२।
उ.-चकृत होइ नीर में बहुरि बुड़की दई सहित सुता-सिंधु तहँ दरस पाए-२५७०।
सूतने' को प्रवृत्त करना, 'सूतने' का काम दूसरे से कराना।
कारीगर, शिल्पकार, शिल्पी।
सुतीक्षण, सुतीक्ष्ण, सुतीखन, सुतीछन
अगस्त्य मुनि के भाई जो वनवासकाल में श्री रामचन्द्र से मिले थे।
उ.-दरसन दियौ सुतीछन गौतम पंचवटी पग धारे-सारा. २५६।
सुतीक्षण, सुतीक्ष्ण, सुतीखन, सुतीछन
सुतीक्षण, सुतीक्ष्ण, सुतीखन, सुतीछन
स्त्रियों के पहनने की सूथन।
कारीगरी, शिल्प-कौशल या कला।
उ.-(क) मोतिनि झालरि नाना भाँति खिलौना रचे बिस्वकर्मा सुतिहार (सुतहार)-१०−८४। (ख) बिस्वकर्मा सुतिहार स्त्रुतिधार सुलभ सिलप दिखावनो-२२८०।
उ.-श्रवण कीर्तन सुमिरन करै।
नौ प्रकार की भक्तियों में एक।
उ.- श्रवण कीर्तन स्मरण पद-रत अर्चन वंदन दास- सारा. ११६।
राजा मेघध्वज के एक पुत्र का नाम।
उ.- ता संगति नव सुत तिन जाए। श्रवणादिक मिलि हरि-गुन गाए।
सत्ताइस नक्षत्रों में बाइसवाँ।
उ.-राति दिवस रस श्रवत सुधा में कामधेनु दरसाई।
उ.-सौइ रहौ सुथरी सेजरिया-१०−२४६।
एक महात्मा जो गुरु नानक के शिष्य थे।
उ.-हंस मानो मानसर अरुन सुथल निरखि आनंद करि हरषि गाजै-२६१४।
उ.-अति पूरन पूरे पुन्य रोपी सुथिर थुनी-१०−२४।
जो देखने में सुंदरी हो, प्रियदर्शनी।
एक निर्धन ब्राह्मण जो श्रीकृष्ण का सहपाठी था और जिसे उन्होंने इंद्र-जैसा वैभव प्रदान किया था।
उ.-(क) रंक सुदामा कियौ इंद्र-सम-१−९५। (ख) चारि पदारथ दिए सुदामा तंदुल भेंट धरयौ-१−१३३।
उ.-(क) सुबल, श्रीदामा, सुदाम; वै भए इक ओर-१०−२४४। (ख) बछरा चारन चले गुपाल। सुबल सुदामा अरु श्रीदामा संग लिए सब ग्वाल-४१०।
कंस का एक माली जो श्रीकृष्ण को मथुरा में मिला था।
उ.-धनुषसाला चल नंदलाला।¨¨¨¨¨। पुनि सुदामा कहयौ, गेह मम अति निकट कृपा करि तहाँ हरि चरन धारे-ना. ३६६५।
अपने आराध्य की भली-भाँति पूजा-उपासना करनेवाला।
उ.-बिप्र बुलाइ नाम लै बुझ्यौ, रासि सोधि इक सुदिन धरयौ-१०-८८।
उ.-नृप सुदक्षिण जरयौ जरी बाराणसी-१०−३४५।
राजा दिलीप की पत्नी का नाम।
श्रीकृष्ण की एक पत्नी का नाम।
उ.-(क) जब जब भीर परी संतनि कौं चक्र सुदरसन तहाँ सँभारयौ-१−१४। (ख) चक्र सुदरसन रच्छा करै-९−५।
एक प्रकार का चूर्ण जिसका प्रयोग बिषम ज्वर में होता है।
जो देखने में सुंदर हो, प्रिय दर्शन।
(सुदर्शनचक्रधारी) विष्णु।
रुक्मिणी के गर्भ से उत्पन्न श्रीकृष्ण के एक पुत्र का नाम।
उ.-(क) कटि तट पीत बसन सुदेस-६३३। (ख) अति सुदेस मृदु चिकुर हरत मन-१०-१०८। (ग) घन तन स्याम सुदेस पीत पट-२५६६।
खूब उजाला, अंत्यत प्रकाश।
उ.-(क) कृपानिधान, सुदृष्टि हेरियै, जिहिं पतितनि अपनायौ-१−२०५। (ख) वहौ बिरद की लाज दीनपति करि सुदृष्टि देखौ-३४०१।
उ.-जा जल सुद्ध निरखि सन्मुख ह्वै सुंदर सरसिज नैनी-९−११।
उ.-मुख मृदु बचन जानि मति जानहु, सुद्ध पंथ पग धरतौ-१−२०३।
खालिस, जिसमें मिलावट न हो।
उ.-माता भक्ति चारि परकार। सत रज तम गुन सुद्धा सार-३−१३।
जिसमें 'शुद्धा' भक्ति हो।
उ.-सुद्धा भक्त मोहि कौं चाहै। भक्तिहुँ कौं सो नहिं अवगाहै-३१३।
उ.-देह-गेह की सुद्धि बिसारी-११६१।
उ.-गोपी हुतीं प्रेमरस माती तिन ताकौं कछु सुद्धि न पायौ-२३१६।
शुद्ध' होने या करने का कार्य या भाव।
वैवस्वत मनु का पुत्र जो शिव जी के शाप से स्त्री हो गया था और बुध की आराधना से शापमुक्त हुआ था।
उ.-हरि ता पुत्री कौं सुत करयौ। नाम सुद्युम्न ताहि रिषि धरयौ-९−२।
उ.-(क) गति सुधंग सों भाव दिखावत-पृ. ३४६ (४४)। (ख) गति सुधंग नृत्यत ब्रजनारी-पृ. ३४६ (४३)। (ग) कबहुँ चलत सुधंग गति सौं-पृ. ३५२ (८०)।
मुहा.- सुध दिलाना-स्मरण कराना। सुध न रहना-भूल जाना। सुध बिसरना, बिसराना, बिसारना, भुलाना या भूलना- (किसी को) भूल जाना।
मुहा.- सुध बिसरना- होश में न रहना, अचेत होना। सुध बिसराना-बेहोश या अचेत करना। सुध न रहना-बेहोश या अचेक हो जाना। सुध सँभालना-होश में आना।
मुहा.- सुध लेना- पता या हाल-चाल जानना। सुध रखना-खोज-खबर, पता या चौकसी रखना। सुध लीन्हीं-खोज-खबर की, पता लगाया। उ.-प्रद्युमन को बिलंब भयो तब सत्राजित सुध लीन्ही।
ठीक या शुद्ध किया जाना या होना।
होश-हवास, चेत, ज्ञान, चेतना।
मुहा.- सुध-बुध खोना (जाती रहना, ठिकाने न होना या मारी जाना) -होश-हवास जाते रहना, बुद्धि ठिकाने न रह जाना।
उ.-अबकौ जन्म, आगिलौ तेरौ, दोऊ जन्म सुधर्तौ-१−२९७।
बिगड़ी या सदोष वस्तु ठीक होना।
(हिं. शोधन या हिं. सु+ढरना)
बिगड़ी आदतों वाले का ठीक या भला होना।
(हिं. शोधन या हिं. सु+ढरना)
सुधरने, सुधारने या सुधरवाने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
(क) मनु उभै अंभोज-भाजन लेत सुधा भराइ-६२७। (ख) अधर-सुधा उपदंस सीक सुचि बिधु पूरन सुखवास सचारे-२२७१।
(लग्न, कुंडली आदि) ठीक या निश्चिंत कराना।
उ.-नीकौ सुभ दिन सुधाइ झूलौ हो झुलैया-१०−४१।
नौ प्रकार की भक्तियों में एक।
राजा मेजध्वज का एक पुत्र।
भादों के शुक्ल पक्ष की द्वादशी जिस दिन वामनावतार होना माना जाता है।
उ.- भादौं श्रवन द्वादसी शूभ दिम धरो बिप्र हरि-रूप-सारा. ३३१।
जो सुना जा सके, सुनने योग्य।
काव्य जो केवल सुना जा सके और अभिनय योग्य न हो।
उ.-मुक्ता-माल नंदनदंन उर अर्ध सुधाघर कान्ति।
जिसके अधरों में अमृत जैसा स्वाद हो।
पुण्य कर्म करनेवाला, धर्मपरायण।
पुण्य कर्तव्य, उत्तम धर्म।
अपने धर्म पर दृढ़ रहनेवाला।
उ.-(क) बात कहन कों यों आवत है बड़े सुधर्मा धर्महिंपाल-१११२। (ख) फँसिहारिनि, बटपारिनि हम भईं, आपुन भए सुधर्मा भारी-११६०।
दोष-त्रुटि दूर करना, ठीक या शोधन कराना।
सुध दिलाना, याद या स्मरण कराना।
सुध आना, याद या स्मरण होना।
ठीक करने या शोधने का काम दूसरे से कराना।
(लग्न, कुंडली आदि) ठीक या निश्चित कराना।
उ.-मनहुँ सुधानिधि बर्षत धन पर अमृत धार चहुँ ओर।
सुधरने या सुधारने की क्रिया या भाव, संस्कार, संशोधन।
बिगड़ी हुई बात बनाना या ठीक करना।
अधिक अच्छा और उपयोगी बनाना।
त्रुटि या दोषों को दूर करनेवाला, संशोधक।
धार्मिक या सामाजिक उन्नति या सुधार के लिए प्रयत्न या आंदोलन करनेवाला।
त्रुटि, दोष आदि दूर करना।
अधिक अच्छा या उपयोगी बनाना।
जो सुधार करने के पक्ष में हो।
भोला-भाला, सरल प्रकृति का, निष्कपट।
लीजै सुधारि- (बिगड़ी दशा या स्थिति को) ठीककर या बना लीजिए।
भोला-भाला, सरल प्रकृति का।
उ.-फाटक दै कै हाटक माँगत भोरो निपट सुधारी-३३४०।
(बिगड़ी दशा या स्थिति को) ठीक किया या बनाया।
उ.-ब्रह्मा महादेव तैं को बड़ तिनकी सेवा कछु न सुधारी-१−३४।
उ.-(क) गरभ-बास अति त्रास अधोमुख तहाँ न मेरी सुधि बिसरी-१−११६। (ख) कोटिक कला काछि दिखराई जल-थल सुधि नहिं काल-१−१५३। (ग) तब जमलार्जुन की सुधि आई-३९१। (घ) जबहीं आवति सुधि सखिनि की रहत अति सरमाइ-१६१५।
उ.-(क) प्रेम-बिबस कछु सुधि न अपनियाँ-१०−१०६। (ख) मुरछि परी तन-सुधि गई-५८९। (ग) मैमत भए जीव जल-थल के तनु की सुधि न सँभार- पृ. ३४७ (५२)। (घ) मन सुधि गई सँभारति नाहिंन-२५४५।
मुहा.- सुधि बिसराई-होश में नहीं रही। उ.-जसुमति तब अकुलाइ परी धर तनु की सुधि बिसराई-६०४। सुधि भुलाई-होश-हवास भुला दिए, बहुत विकल कर दिया। उ.-स्याम तब सांग को काचि करि साल्व की सुधि भुलाई-१० उ.-५६।
उ.-(क) पाइ सुधि मोहिनी की सदासिव चले-८−१०। (ख) ल्यावहु जाइ जनक-तनया-सुधि रघुपति कौं सुख देहु-९−७४।
उ.-स्रवन सुतत सुधि-बुधि सब बिसरी-७४२।
उ.-सुधी निपट देखियत तुमकौं तातैं करियत साथ-६७४।
उ.-(क) बैननि हू सुध्यौ भूली-१४७४। (ख) कबहुँक स्याम करत इहाँ को मन कैधौं चित्त सुध्यौ बिसराई-३११८।
सुनाइए, सुमने को प्रवृत कीजिए।
उ.-बिना नाद संगीत सुधानिधि मूढ़हिं कहा सुनइयै-३३१७।
बहुत धीरे-धीरे की गयी बात, फुसफुसाहट, कानाफूसी।
वह भेद जो इधर-उधर की बातें सुनने से ज्ञात हो।
उ.-(क) निगंम जाको सुजस गावत सुनत संत सुजान-१−२३५। (ख) जाकौ सुजस सुनत अरु गावत-१−३१२।
उ.-(क) घूम रहीं जित-जित दधि मथनी, सुनत मेध-धुनि लाजै-१०−१३९। (ख) सुनत-सुनत सुधि-बुधि सब बिसरी-७४२।
ՙसुनने՚ की क्रिया या भाव।
कहन सुनन --जो केवल कहने-सुनने के लिए हो, वस्तुतः न हो।
उ.-सतजुग लाख बरस की आइ।¨¨¨¨¨। कलिजुग सत संबत रहि गई। सोऊ कहन-सुनन कौं रही-१−२३०।
कही हुई बात या शब्द का ज्ञान कानों से प्राप्त करना, श्रवण करना।
किसी के कथन पर ध्यान देना।
भली-बुरी बातें श्रवण करना।
आरोप, अभियोग आदि का विचार के लिए सुना जाना।
उ.-(क) हमारी जन्मभूमि यह गाउँ। सुनहु सखा सुग्रीव बिभीषन अवनि अजोध्या नाउँ-९−१६५। (ख) सुनहु सखी सतरात इते पर हम पर भौंहैं तानत-पृ. ३२८ (७७)।
जो (कथन आदि) श्रवण किया गया हो।
मुहा.-सुना-अनसुना कर देना (करना)-कोई बात सुनकर भी उस पर ध्यान न देना या टाल जाना। कहा-सुना-पारस्परिक वार्तालाप में प्रसंगवश जो कुछ उचित- अनुचित कह-सुन दिया गया हो।
श्रद्धापूर्वक किया जानेवाला कार्य।
वह कृत्य जो पितरों के लिए किया जाय।
उ.- कतहूँ श्राद्ध करत पितरन को तर्पण करि बहु भाँति- सारा. ६७३।
आश्विन कृष्ण पक्ष जिसमें पितरों की तृप्ति-हेतु पिंडदान, तर्पण आदि करके ब्राह्मण को भोजन कराया जाता है, पितृपक्ष।
उ.-ग्वालनि हरि की बात सुनाई-५८५।
आरोप, अभियोग आदि का विचार या निर्णय करने के लिए सुना जाना।
उ.-ताहि या बिधि बचन कहि सुनाए−१−२७१।
सुन्दर शब्द या ध्वनिवाला।
किसी को सुनने को प्रवृत्त करना।
उ.-(क) सूरदास सो बरनि सुनायौ-१−२२७। (ख) नृपति बचन यह सबनि सुनायौ-१०−६१।
सोने-चाँदी के गहने बनानेवाला कारीगर।
उ.-बिसकर्मा सुतहार रच्यौ काम ह्वै सुनार-१०४१।
उ.-सुनारिनि ह्वै जाउँ निरखि नैननि सुख देऊँ-पृ. ३४९ (६१)।
सुनाता है, श्रवण कराता है।
उ.-(क) क्यों न सुनावत निज दुख मोहिं-१−२९०। (ख) सूर-स्याम के कृत्य जसोमति, ग्वाल-बाल कहि प्रगट सुनावत-४८०।
उ.- सूर सो दिन कबहुँ तौ ह्वैहै मुरली सब्द सुनावन-२७५२।
दूरस्थ प्रदेश से किसी संबंधी की मृत्यु का आया हुआ समाचार।
ऎसा समाचार आने पर किया जाने वाला शोक, स्नान आदि।
उ.-यह लींला जो सुनै सुनावै-४−१२।
उ.-नरकौ भज्यौ नाम सुनि मेरौ-१−९६।
सुनि न जात-सुना नहीं जाता, सुनना सहन नहीं होता।
उ.-सुनि न जात घर-घर को घेरा काहू मुख न समाऊँ-१२२२।
उ.-(क) सुनियत हैं, तुम बहु पतितनि कौ दीन्हौ है सुखधाम-१−१८९। (ख) जाकी चरन-रेनु की महि मैं सुनियत बहुत बड़ाई-९−४०। (ग) मुष्टिक अरु चानूर सैल सम सुनियत हैं अति भारे-२५६०। (घ) श्रीकंत सिधारौ मधुसूदन पै, सुनियत है वै भीत तुम्हारे-१० उ.-६०।
सुनियन लागे-सुनने लगे, सुनायी देने लगा।
उ.-संख कुलाहल सुनियन लागे-९−१२५।
उ.-कबहिं कमल-मुख सुनिहौं उन बोलनि-१०७२।
भली-भाँति या दृढ़ता से निश्चित किया हुआ।
उ.-श्री भागवत सुनी नाहिं स्रवननि-१−६५।
राजा उत्तानपाद की पत्नी जौ ध्रुव की माता थी।
उ.-उत्तानपाद पृथ्वीपति भयौ।¨¨¨¨¨। नाम सुनीति बड़ी तिहिं दार।¨¨¨¨¨। अरु सुनीति कैं ध्रुव सुकुमार-४−९।
उ.-सुनु सिख कंत, दंत तृन धरि कै स्यौं परिवार सिधारौ-९−११४।
उ.-यह लीला जौ सुनै-सुनावै-४−१२।
सुनायेंगे, श्रवण करायँगे।
उ.-खेलत तैं तब आइ भूख कहि मोहिं सुनैहैं-५८९।
उ.-थक्यौ बीच बिहाल बिहवल सुनौ करुनामूल-१−९९।
निर्जीव, जड़वत्, स्पंदनहीन।
उ.-महा कठोर सुन्न हिरदै कौ-१−१८६।
उ.-(क) सूर पतित जब सुन्यौ बिरद यह तब धीरज मन आयौ−९−१९५। (ख) नाहीं सूर सुन्यौ दुख कबहूँ प्रभु करुनामय कंत-९−९२।
उ.-(क) दसमुख छेदि सुपक नव फल ज्यौं संकर-उर दससीस चढ़ावन-९−१३१। (ख) सुपक बिंब सुक-खंडित मंडित अधर-सुधा-मधु लाल लई री-२११५।
खूब पकाया हुआ (व्यंजन या खाद्य-पदार्थ)।
उ.-माखन सहित देहि मेरी मैया सुपक सुकोमल रोटी-१०−१६३।
(सं. सु+हिं. पत=प्रतिष्ठा)
उ.-वह जूठो ससि जानि बदन बिधु रच्यौ बिंरंचि इहै री। सौंप्यौ सुपत बिचारि स्याम हित सु तूँ रही लटि लै री-२२७०।
उ.-मै कह्यौ निसि सुपन तौसौं, प्रगट भयौ सु आइ-५८०।
उ.-(क) लोभ-मोह तैं चेत्यौ नाहीं, सुपनैं ज्यौं डहकानौं-१−३२९। (ख) जैसे सुपनैं सोइ देखियत तैसे यह संसार-२−३१। (ग) सोवत महा मनो सुपने सखि अवधि निधन निधि पाई-२७८४।
उ.-राम सुपरस मय कौतुक निरखि सखी सुख लूटैं-९−३२।
जिसके पर या पंख सुंदर हों।
उ.-कुंचित केस मयूर चंद्रिका मंडल सुमन सुपाग-१२१४।
योग्य और उपयुक्त व्यक्ति।
एक वृक्ष जिसके फल के छोटे-छोटे टुकड़े पान में डालकर खाये जाते हैं।
उ.-लौंग नारियर दाख सुपारी कहा लादे हम आवै-११०८।
उ.-धन्य सुपुत्र पिता पन राख्यौ-९−१५१।
विष्णु-पत्नी कमला, लक्ष्मी।
उ.- तजि बैकुंठ गरूड़ तजि श्री तजि निकट दास के आयो-१-१०।
अग्नि की सात जिह्वाओं में एक।
अत्यंत प्रसन्न या कृपालु।
विशेष प्रभा या प्रकाशयुक्त।
जिसकी क्रिया या चेष्टा रुकी हुई हो, निष्क्रिय, अकर्मण्य।
उ.-औरौ सकल सुकृत श्रीपति-हित प्रतिफल-रहित सुप्रीति-२−१२।
उ.-बाल-केलि गावति मल्हावति सुप्रेम भर-१०−१५१।
उ.- धर बिधंसि नर करत किरषि हल बारि बीज बिथरै। सहि सन्मुख तउ सीत उष्न कौं सोई सुफल करै-१−११७
उ.-अंब सुफल छाँड़ि, कहा सेमर कौं धाऊँ-१−१६६।
सुंदर फल या फाल वाला (अस्त्र)।
उ.-(क) सबनि कौं अँग परसि कीन्हों सुफल ब्रत-व्यवहार-७९६। (ख) नैन सुफल भए सबके-१८१९।
एक यादबजो अक्रूर का पिता था।
अक्रूर जो सुफलक नामक यादव का पुत्र था और जो कंस की आज्ञा से श्रीकृष्ण, बलराम आदि को मथुरा ले गया था।
उ.-सुफलकसुत मिलि ढंग ठान्यौ है, साधे बिषमन घात-३३५१।
सुंदर या बहुत फल उपजानेवाली।
उ.-रुचिर-चिबुक द्विज-अधर, नासिका अति सुंदर राजति सुबरनियाँ-१०−१०६।
उ.-(क) सुबल हलधर अरु श्रीदामा करत नाना रंग-१०−२१३। (ख) सुबल श्रीदामा सुदामा वै भए इक ओर-१०−२४४।
उ.-सुभट अनेक सुबल दल साजे परे सिंधु के पार-९−८३।
जो अपने वंश या अधिकार में हो।
उ.-(क) सुबस बसौं इहिं गाउँ-१−१८५। (ख) नैन सुबस नाहीं अलि मेरे-३४४२। (ग) तुमरे सुबस सदा अलि खेलैं-सारा. ५७६।
जिसके अच्छे बंधु या मित्र हों।
उ.-(क) हरिजू कह्यौ, सुनौ दुरजोधन सत्य सुबचन हमारे-१−२४२। (ख) सूर सुबचन मनोहर कहि कहि अनुज सूल बिसरायौ-३७४।
सुंदर या श्रेष्ठ आचरण या संस्कारवाली बधू।
उ.-धन्य सुपुत्र पिताप्रन राख्यौ, धनि सुबधू कुल-लाज-९−१५१।
उ.-सुबरन थार रहे हाथनि लसि-१०−३२।
उ.-सुबरन लंक-कलस- आभूषण-९−३०।
ईश्वर या ब्रह्म का निवास स्थान, ब्रह्मलोक।
उ.-सालन सकल कपूर सुबासत-३९६।
महकाना, सुबासित या सुगंधित करना।
महकना, सुगंध देना या फैलना।
श्रीकृष्ण के एक पुत्र का नाम।
उ.-मारिच और सुबाहु महासुर बिधन करत जिन जाम-सारा. १७९।
मजबूत या बलशाली बाहुओंवाला।
दक्षिण भारत का क प्राचीन प्रदेश।
उ.-मनौ नव घन दामिनी तजि रही सहज सुबेस-६३३।
उ.-बहुरि हिमाचल कैं सुभ घरी। पारवती ह्वै सो अवतरी-४−७।
उ.-(क) द्वादस स्कंध परम सुभ प्रेम-भक्ति की खानि-१०−१। (ख) आछौ दिन सुनि महरि जसोदा सखिनि बोलि सुभ गान करयौ-१०−८८।
उ.-संतत सुभ चाहत प्रिय जन जानि-१−७७।
उ.-(क) उराग-इंद्र उनमान सुभग भुज-१−६९। (ख) मेरौं सुभग साँवरौ ललना-१०−५४। (ग) इंद्र बदन नव जलद सुभग तनु दोउ खग नैन कह्यौ-२५६४।
उ.-सोभित सुभग नंद जू की रानी-१०−७८।
आश्विन कृष्ण पक्ष जब पितरों को पिंडदान, तर्पण आदि करके ब्राह्मण को भोजन कराया जाता और दक्षिण दी जाती है।
उ.- अजहूँ श्रावग ऐसो करै, ताही को मारग अनुसरै।
असाढ़ और भादों के बीच का महीना।
श्रावण मास की पूर्णिमा जिस दिन ‘रक्षाबंधन’ या ‘सलूनों’ का त्योहार होता है।
श्रीकृष्ण की बहन जिसका विवाह अर्जुन से हुआ था।
उ.-ज्यौं गयंद अन्हाइ सरिता बहुरि बहै सुभाइ-१−४५।
(स्त्री) जो पति को प्रिय हो।
उ.-(क) रथ तैं उत्तरि चक्र कर लीन्हौ सुभट सामहैं आए-१−२७४। (ख) सुभट अनेक सबल दल साजे परे सिंधु के पार-९−८३। (ग) ऎसौ सुभट नहीं महिमंडल देख्यौ बालि समान-९−१३४।
उ.-संकट परैं तुरत उठि धावत, परम सुभट निज पन कौं-१−९।
उ.-लख्यौ बलराम यह सुभटवंत है कोऊ हल मुसल सस्त्र अपनो संभारयौ-१० उ.-४५।
श्रीकृष्ण के एक पुत्र का नाम।
स्त्री की सधवा होने की दशा, सुहाग।
उ.-तिनके कपिलदेव सुत भए। परम सुभाग्य मानि तिन लए-३−१३।
सुभान अल्ला-ईश्वर धन्य है।
देखने में सुन्दर या भला जान पड़ना।
सुंदर या उत्तम प्रकाश से युक्त।
उ.-प्रभु कौ देखौं एक सुभाय-१−८।
उ.-जिन तन-धन मोहिं प्रान, समरपे सील-सुभाव बढ़ाई-९−७।
उ.-(क) यहै सुभाव सूर के प्रभु कौ भक्त-बछल प्रन पारत-१−१२। (ख) तऊ सुभाव न सीतल छाँड़ै-१−११७। (ग) नील जलद पर उडुगन निरखत तजि सुभाव मनु तड़ित छपाए-१०−१०४।
उ.-(क) सूर जो द्वै रंग त्यागै यहै भक्त सुभाइ-१−७०। (ख) संपति बिपति, बिपति तैं संपति, देह कौ यहै सुभाइ-१२६५। (ग) बिकसति लता सुभाइ आपने छाया सधन भई-२७७३।
उ.-कंटक सों कंटक लै काढ़यौ अपने हाथ सुभाइ-३२२७।
उ.-चारिहूँ जुग करी कृपा परकार जेहि, सूरहू पर करौ तेहि सुभाई-८−९।
उ.-कछुक जनाऊँ अपुनपौ अब लौं रह्यौं सुभाउ-४३२।
उ.-मुख प्रसन्न सीतल सुभाउ निस देखत नैंन सिराइ।
उ.-इन माहिं गुन हैं सुभाए-८−८।
सहज गुण, स्वाभाव, प्रकृति।
उ.-मुरली कौन सुकृत फल पाए।¨¨¨। अंतर सून्य सदा देखियत है, निज कुल बंस सुभाए-६६१।
उ.-नाभि-हद रोमावली अलि चले सहज सुभाव-१−३०७।
उ.-जिहिं गीत सुभाषित गावत कहति परस्पर गासक-३२२१।
सुंदर और प्रिय बोलनेवाला, मिष्टभाषी, प्रियंवद।
ऎसा समय जब अन्न खूब सस्ता हो, सुकाल।
उ.-है जलधार हार मुकुता मनो बगपंगति कुमुदमाल सुभी-१४४८।
राजा सगर की पत्नी का नाम।
उ.-(क) नहिं कर लकुटि सुमति-सत्संगति जिहिं अधार अनुसरई-१−४८। (ख) कहु री सुमति कहा तोहिं पलटी, प्रान-जिवन कैसैं बन जात-९−३८।
अच्छी बुद्धिवाला, बुद्धिमान।
उ.-(क) अर्जुन भीम जुधिष्टिर सहदेव सुमति नकुल बलभारे-१−२५७। (ख) सुनियत हुते तैसेई देखे सुन्दर सुमति सु भोरे-२९७१।
उ.-स्यामा कामा चतुरा नवला प्रमदा सुमदा नारि-१५८०।
सुंदर भुजाओंवाला, सुबाहु।
उ.-सूर मिटै अज्ञान-मुरछा ज्ञान सुभेषज खाऎं-२−३२।
सरल और सीधे स्वभाव का, निष्कपट।
उ.-सुनियत हुते तैंसे देखे सुंदर सुमति सुभोरे-२९७१।
वह दक्षिणा जो विवाह में सप्तपदी के बाद पुरोहित को दी जाती है।
राजा दशरथ का एक मंत्री जो उनका सारथी भी था।
उ.-कृष्न सुमंत्र जियावनमूरी जिन मरत जिवायौ-२-३२।
(व्यक्ति) जिसे अच्छा परामर्श मिला हो।
(कार्य-व्यापार) जिसके संबंध में उचित परामर्श मिला हो।
ՙसरसी՚ छंद का दूसरा नाम (होली के ՙकबीर՚ प्रायः इसी छंद में होते हैं)।
उ.-बंधुक सुमन अरुन पद पंकज-१०−१०४।
कामदेव जिसका धनुष फलों का माना गया है।
उ.- (क) श्री नृसिंह बपु धरयो असुर हति-१-१७। (ख) श्रीकंत सिधारो मधुसूदन पै सुनियत हैं वै मीत तुम्हारे-१० उ.- ६०।
उ.- तनु श्रीखंड मेघ उज्जवल अति, देखि महाबल भाँति।
उ.-सुमना बहुला चंपा जुहिला ज्ञाना माना भाउ-१५८०।
जिसमें सुंदर मणियाँ जड़ी हों।
जिस (पौधे) में खब फूल लगे हों।
ध्यान, चिंतन या स्मरण करना।
जाप करने की माला जिसमें सत्ताईस दाने होते हैं।
साफ, चिकना और समतल मार्ग।
नैतिक दृष्टि से अच्छा मार्ग, सुपथ,सन्मार्ग।
उ.-सूर सुमारग फेरि चलैगौ। बेद बचन उर धारौ-१−१९२।
उ.-कंठ सुमाल हार मुक्ता के हीरा रत्न अपार-३३२१।
एक राक्षस जो रावण, कुम्भकर्ण आदि का नाना था।
श्रीकृष्ण के एक पुत्र का नाम।
राजा दशरथ की पत्नी जो लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न की माता थी।
स्मरण करता है या करते (ही)।
उ.-(क) सुमिरत ही तत्काल कृपानिधि बसन प्रवाह बढ़ायौ-१−१०९। (ख) मनसा करि सुमिरत हे जब जब मिलते तब तब हीं-१−२८३। (ग) मन बच कर्म और नहिं जानत सुमिरत और सुमिरावत-२−१७।
उ.-माया मोइ ताहि नहिं गह्यौ। सुन्यौ ज्ञान सो सुमिरन रह्यौ-१−२२६।
नौ प्रकार की भक्तियों में एक जिलमें परमाराध्य का निरंतर ध्यान या जाप किया जाता है।
उ.-(क) सो श्रीपति जुग जुग सुमरिन-बस-१−१७। (ख) किते दिन हरि सुमिरन बिनु खोये-१−५२। (ग) नर-देही दीनी सुमिरन कौं-१−११६। (घ) सुमिरन ध्यान कथा हरि जू की-१−३२४।
जाप करने की माला जो सत्ताईस दानों की होती है।
(नाम) जपने को प्रवृत्त करना।
(नाम) जपता या जपने की प्रेरणा देता है।
उ.-मन बच कर्म और नहिं जानत, सुमिरत औ सुमिरावत-२−१७।
उ.-कीजै कृपा सुमिरि अपनौ प्रन-१−१६४।
उ.-सुमिरि सनेह कुरंग कौ-१−३२५।
नाम जपने की माला जिसमें सत्ताईस दाने होते हैं।
उ.-(क) जहाँ जहाँ सुमिरे हरि जिहिं बिधि, तहँ तैसे उठि धाए-१−७। (ख) राज-रवनि सुमिरे पति-कारन असुर बंदि तैं दियै छुड़ाई-१−२४।
उ.-(क) सूरदास प्रभु हित कै सुमिरौ तौ आनँद करिकै नाँचौ-१−८३। (ख) हरि हरि हरि सुमिरो सब कोइ-१−२२६।
उ.-(क) राम न सुमिरयौ एक घरी-१−७१। (ख) मनसा करि सुमिरयौ गज बपुरैं ग्राह प्रथम गति पावै-१−१२२।
जो सहज में मिल सके या मिला हो।
जिसका ठीक-ठीक मेल बैठ जाय, उपयुक्त।
मेल-जोल या स्नेह-भाव बनाये रखनेवाला।
उ.-राहु केतु मानो सुमीड़ विधु-३४८२।
अच्छी तरह मीड़ना, मसलना या मसोसना।
उ.-ऎसौ भक्त सुमुक्त कहावै। सो बहुरयौ भव-जल नहिं आवै-३−१३।
उ.-पुलकित सुमुखी भई स्याम-रस-१०−१२०।
सुंदर रूपवाली मूर्ति या स्वरूप।
उ.-सत्य-सील-संपन्न सुमूरति सुर-नर-मुनि भक्तनि भावै-१−६९।
किसी पुरानी बात का याद आना जो एक-एक संचारी भाव है।
सुम्रत, सुम्रित, सुम्रिति
वे धर्मशास्त्र जो वेद का चिंतन मनन करके रचे गये थे।
उ.-(क) स्रुती सुम्रिति देख्यौ सब जाइ-२−५। (ख) स्रुती-सुम्रिति मुनिजन सब भाषत-२−३१।
उ.-समरारी को सुयस कुयस की प्रगट एक हीं काल-२०९७।
उ.-(क) तब अंबर और मँगाइ सारी सुरंग चुनी।¨¨¨¨¨। उर अंचल उड़त न जानि सारी सुरँग सुही-१०−२४। (ख) कुलही लसति सिर स्याम सुँदर कैं बहु बिधि सुरँग बनाई-१०−१०८। (ग) बूँद परत रँग ह्वैहै फीकौ, सुरँग चूनरी भीजै-७३१। (घ) बसन सुरंग-२५६१।
उ.-(क) अलका-वलि मुक्तावलि गूँथी डोर सुरंग बिराजै। (ख) सब पुर देखि धनुषपुर देख्यौ, देखे महल सुरंग-सारा-२१०।
उ.-सेमर-फूल सुरँग अति निरखत मुदित होत खग-भूप-१−१०२।
उ.-गौर अंग सुरंग लोचन-२५८२।
प्रियतम से संबंधित बातों का याद आना जो पूर्व राग की दस दशाओं में एक है।
वे धर्मशास्त्र जो वेदों का चिंतन-मनन करके रचे गए थे।
उ.-(क) बेद, पुरान सुमृति संतनि कौं यह अधार-१−२०४। (ख) बेद, पुरान, सुमृति सबै-१−३२५। (ग) स्रुती, समृति, सब पुरान कहत मुनि बिचारी-३९४।
एक पर्वत जो सोने का माना गया है।
उ.-(क) पावक जथा दहत सबहीं दल तूल-सुमेरु समान-१−२६९। (ख) जौ पै राम-भक्ति नहिं जानी कह सुमेरु सम दान दिऎं-१−८९। (ग) सूरदास प्रभु दुरत दुराऎं डुँगरनि ओट सुमेर-४५८। (घ) मनु जुग जलज सुमर सृंग तें जाई मिले सम ससिहिं सनाल-३४५३।
जप-माला के बीच का बड़ा दाना जहाँ से जाप आरम्भ होता है।
वह रेखा जो उत्तरी ध्रुव से २३।। अक्षांश पर स्थित है।
जमीन या पहाड़ के नीचे खोदकर या बारूद से उड़ाकर बनाया गया मार्ग।
किले या दीवार को बारूद से उड़ाने के लिए बनाया गया मार्ग।
समुद्री चट्टानों को उड़ाने का एक यंत्र।
उ.-सुर-नर-मुनि भक्तनि भावै-१−६९।
उ.-(क) अति सुकंठ-सुर गावन-८−१३। (ख) गदगद सुर-१−७२। (ग) नीकै सुर नीकी तान-१०−९६। (घ) सप्तक सुर बंधान सों-१५३९।
मुहा.- किसी के सुर में सुर मिलाना-हाँ में हाँ मिलाना, चापलूसी करना। सुर भरना-गाने- बजाने में सहारा देने के लिए सुर अलापना या बाजे से सुर निकालना।
नाक या माथे पर का वह तिलक जो भाले या बरछी के आकार का होता है।
किसी सरल पदार्थ को धीरे-धीरे ՙसुड़सुड़՚ करते हुए नाक या मुँह से पीना।
हवा के साथ धीरे धीरे ऊपर की ओर खींचना।
स्वर बदलकर बोलने की क्रिया या भाव जिससे लोग धोखा खा जायँ।
उ.-पीत बसन दामिनि मनु घन पर, तापर सुर-कोदंड-५६६।
लक्ष्मी का निवास-स्थान, बैकुंठ।
लक्ष्मी का निवास-स्थान, बैकुंठ।
माघ शुक्ल पंचमीया वसंत पंचमी जब सरस्वती पूजन होता है।
उ.- जाके सखा श्यामसुंदर से श्रीपति सकल सुखन के दाता।
उ.- बारबार श्रीपति कहैं धीवर नहिं मानै-९-४२।
उत्तम रीति से कौ गयी रखवाली या रक्षा।
अच्छी तरह की गयी रखवाली या रक्षा।
जिसकी रक्षा अच्छी तरह की गयी हो।
जो इस रूप में स्थित हो कि कोई हानि न पहुँच सके।
मुहा.- सुरखाब का पर लगना-अनोखापन या विशेषता होना (व्यंग्य)
ईंटों का महीन चून या चूर्ण।
जिसके मुँह पर स्वास्थ्य की लाली या कांति हो।
सफलता से जिसके मुँह पर लाली आ जाय।
देवतओं का या इंद्र का हाथी, ऎरावत।
उ.-क्यों सुरझाऊँ री नंदलाल सों अरुझि रहयौ मंन मेरौ-१४७०।
उ.-बंध अबंध अमित निसि-बासर को सुरझावति आन-२८११।
रति-क्रीड़ा, काम-केलि, संभोग।
उ.-(क) सुरत ही सब रैन बीती कोक पूरन रंग। (ख) सुरत समै के चिन्ह राधिका राजत रंग भरे-२११४।
देवताओं के गुरु, वृहस्पति।
उ.-गान नारद करै, बार गुरु कहै, बेद ब्रह्मा पढ़ै पौरि टेरै-९−१८९।
जिसमें उत्तम और प्रचुर पराग हो।
मुहा.- सुरत बिसारना-सुध न रहना, विस्मृत होना। सुरत सँभालना-होश या सुध सँभालना।
सुरतरंगिणी, सुरतंगिनि, सुरतरंगिनी
सुरतरंगिणी, सुरतंगिनि, सुरतरंगिनी
उ.-जौ गिरिपति मसि घोरि उदधि मैं लै सुरतरु बिधि हाथ-१−१११।
श्रेष्ठ देवतरु, कल्पवृक्ष
उ.-सूरतरुवर की साख लेखिनी लिखत सारदा हारैं-१−१८३।
सुर या देवता होनें का भाव, देवत्व।
शरीर के आठ कमलों या चक्रों में अंतिम जिसका स्थान मस्तिष्क में सहस्त्रार के ऊपर माना गया है।
वह नायिका जो रति-क्रीड़ा की बात अपनी सखियों से छिपाती हो।
संभोग-काल में होनेवाली आभूषणों की ध्वनि।
उ.-हरि हैसि भामिनी उर लाइ। सुरतिवंत (पाठा.सुरति-अंत) गोपाल रीझे जानि अति सुखदाइ-६९०।
वह मध्या नायिका जिसकी रति-क्रिया विचित्र हो।
उ.-कस्यप रिषि सुर-तात, सु लगन गनावन रे-१०−२८।
उ.-(क) सुरति-अंत गोपाल रीझे जानि अति सुखदाइ-६९०। (ख) अंग दिखाइ गई हँसि प्यारी सुरति चिन्हनि की सुघराई-२१६८।
उ.-सूरदास संगति करि तिनकी जे हरि सुरति करावति-२−१७।
मुहा.-सुरति बिसारना-चेत न रहना। सुरति बिसारे-होश-हवास खोये हुए। उ.-उड़त ध्वजा तन सुरति बिसारे अंचल नहीं सँभारति-२५६१। सुरति सँभालना-सचेत होना। सुरति सँभारी-होश में आयी, सचेत हुई। उ.-पुनि रानी जब सुरति सँभारी। रुदन करन लागी अति भारी-६−५।
उ.-(क) सूर स्याम की मिलनि सुरति करि मनु निरधन धन पाइ बिमोह्यौ-२४७८। (ख) नाना कुसुम लै लै अपने कर दिए मोहिं वह सुरति न जाई-२८८५। (ग) कबहुँ सुरति करत माइन की कीघौं रहे बिसराई-३४४४। (घ) छिन छिन सुरति करत जदुपति की परत न मन समुझायौ-१० उ.-७८।
उ.-ब्रज करि अवाँ जोग ईंधन सम, सुरति आगि सुलगाए-३१९१।
उ.-जमुना तोहिं बहयौ क्यौं भावै। तोमै कृष्न हेलुवा खेलै, सो सुरत्यौ नाहिं आवै-५६१।
उ.-आदि ब्रह्म-जननी सुरदेवी नाम देवकी बाला-१०-४।
योगमाया जिसने यशोदा के गर्भ से अवतार लिया था और कंस के पटकने पर जो छूटकर आकाश में चली गयी थी।
उ.-गगन गई बोली सुरदेवी, कंस मृत्यु नियराई-१०-४।
मुहा.- सुरधाम सिधारना-मर जाना।
उ.-सूरदास हयाँ की सरवरि नहिं कल्पबृच्छ सुर-धैनु-४९१।
उ.-बहुरौ ब्रह्मा सुरनि समेत। नरहरि जू कैं जाइ निकेत-७−२।
उ.-सारेगम पध-निसा संसप्त सुरनि गाई-पृ. ३५२−८३।
उ.-(क) सुरपति कौं सँताप जब भयौ। सो सुरपुर भय तैं नहिं गयौ-६−७। (ख) सुरपति पूजा करौ सवारी-१००७। सूर सुनत सुरपती उदासी-१०६।
श्रीकृष्ण का एक ग्वाल सखा जिसे ‘सुदामा’ भी कहा जाता है।
उ.- खेलत स्याम ग्वालनिसंग। सुबल हलधर अरू श्रीदामा करत नाना रंग-१०-२१३।
उ.- धनि जसुमति जिन श्रीधर जाए-३८४।
कंस का अनुचर एक निर्दयी ब्राह्मण जो श्रीकृष्ण को मारने आया था और जिसकी जीभ मरोड़कर श्रीकृष्ण ने उसे अबोला कर दिया था।
उ.- श्रीधर बाँभन करम कसाई, कह्यो कंस सौं बचन सुनाई। प्रभु, मैं तुम्हरो आज्ञाकारी, नंद-सुवन की आवौं मारी।¨¨¨¨जबही बाँभन हरि ढिग चाँपि लै जीभ मरोरी-१०-७७।
लक्ष्मी का निवास-स्थान, बैकुंठ।
उ.- आइ निकट श्रीनाथ निहारे, परी तिलक पर दीठि। सीतल भई चक्र की ज्वाला, हरि हँसि दीन्ही पीठ-१-२७४।
लक्ष्मी का निवास-स्थान, बैकुंठ।
उ.- श्रीनिकेत समेत सब सुख रूप प्रगट निधान।
उ.-(क) सुरपति कौं सँताप जब भयौ। सो सुरपुर भय तैं नहिं गयौ-६−७। (ख) सुरपुर तैं आयौ रथ सजि कै रघुपति भए सवार-९−१५८।
मुहा.-सुरपुर पठाना-मार डालना। सुरपुर पठाये-मार डाले। उ.-दुष्ट ये मारि सुरपुर पठाए-२६१८। सुरपुर सिधारना-मर जाना, गत हो जाना।
प्रेम, भय, आनंद आदि से स्वर में होनेवाला कंप या परिवर्तन जो सात्विक भावों के अंतर्गत है।
उ.-राधे सो रस बरनि न जाई। जा रस कौं सुरभानु (पाठा. स्वरभानु) सीस दियौ, सु तैं पियौ अकुलाइ-ना. ३३९१।
उ.-कोउ टेरत कोउ हाँकि सुरभिगन जोरि चलावत-४३१।
हठयोग की वह क्रिया जिसमें साधक जीभ उलटकर ताल के मूलवाले छेद में लगाता और सहस्त्रार से निकलनेवाला अमृत पीता है।
उ.-(क) लग्यौ फिरत सुरभी ज्यौं सुत सँग-१−९। (ख) सूर स्वाय सुरभी दुही संतनि हितकारी-४०९। (ग) इहिं बृदावन इहिं जमुनातट ये सुरभी अति सुखद चरावत-४४९।
गो-लोक जो श्रीकृष्ण का निवास-स्थान और सब लोकों से ऊपर माना गया है।
एक बाजा जिसके एक तख्ते में लगे तार मिजराब से बजाये जाते हैं।
सुरमें-जैसे हल्के नीले रंग का, सफेदी लिये नीले या काले रंग का।
हल्का नीला या सफेदी लिये काला रंग।
आँख में सुरमा लगाने की सलाई।
एक प्रसिद्ध खनिज जो प्रायः नीले रंग का होता है और जिसका महीन चूर्ण आँखों में लगाया जाता है।
उ.-तेरे ही काजैं गोपाल, सुनहुँ लाड़िले लाल, राखे हैं भाजन भरि सुरस छहूँ-१०−२९५।
उ.-अंग अंग भूषन सुरस ससि पूरन-कला जनु भ्राजई।
सुरसरि, सुरसरित, सुरसरिता, सुरसरी
उ.-(क) जे पद-पदुम-परस जल-पावन सुरसरि-दरस कटत अघ भारे-१−९४। (ख) बसत सुरसरी तीर मंदमति कूप खनावै-२−९। (ग) साठ सहस्त्र सगर के पुत्र, कीने सुरसरि तुरत पवित्र-९−९। (घ) सूरदास मनो चली सुरसरी श्रीगोपाल सागर सुख संगा-१९०५।
गंगा के पुत्र, भीष्म पितामह।
उ.-सुरसुरी-सुवन रनभूमि आए-१−२७१।
उ.-भक्तबछल बपु धरि नरकेहरि दनुज दहयौ, उर दरि सुरसाँई-१−६।
एक नागमाता जो समुद्र में रहती थी और जिसने विकराल राक्षसी रूप धरकर हनुमान को समुद्र पार करते समय रोका था।
उ.-तहँ इक अद्भुत देखि निसिचरी सुरसा-मुख-बिस्तार-९−७४।
देव-सेना के नायक, कार्तिकेय।
उ.- शीश सचिक्कन केश ही बिच श्रीमंत सँवारि-२०६५।
स्त्री के सिर के बीच की माँग।
उ.- सरस सुमना जात शीश कर सों करति श्रीमंत अलक पुनि पुनि संवारै-२१५६।
(सौभाग्यवती) स्त्री के लिए आदरसूचक शब्द।
किसी पुरूष के लिए आदरसूचक शब्द, श्रीयुत।
उ.- जय जय जय श्रीमान महावपु जय जय जय जगत अधार।
गले का एक आभूषण, कंठश्री।
उ.- चिबुक तर कंठ श्रीमाल मोतीन छवि।
जिसमें ՙसुर-सुर՚ शब्द हो।
सोलह चित्ती कौड़ियाँ जिनसे जुआ खेला जाता है।
सोलह चित्ती कौड़ियों से खेला जानेवाला जुआ।
उ.-चरनोदक कौं छाँड़ि सुधा रस सुरा-पान अँचयौ-१−६४।
उ.-गावत मलारी सुराग रागिनी गिरिधरन लाल छबि सोहनो-२२८०।
उ.-कही, हरि-बिमुखऽरु बेस्या जहाँ; सुरापान बधि-कनि गृह तहाँ-१−२९०।
सुरा का सागर जो सात समुद्रों में तीसरा माना गया है।
गाय-विशेष जिसकी पूँछ से चँवर बनता है।
देश जहाँ का शासन उत्तम हो और प्रजा सुखी हो।
देश जहाँ उसके ही निवासियों का शासन हो।
वह राज्य जहाँ उत्तम शासन होने से प्रजा सुखी हो।
वह राज्य जिस पर उसके ही वासियों का शासन हो।
कश्यप की पत्नी अदिति जो देवताओं की माता थी।
जिस राष्ट्र का शासन अच्छा हो।
उ.-जै गिरि कमठ सुरासुर सर्पहिं धरत न मन मैं नैकु डरे-१०−१४१।
जल रखने का एक विशेष प्रकार का पात्र जो प्रायः मिट्टी या किसी धातु का बना होता है।
सुराही की तरह गोल और लंबोतरी बनावट का।
मीठे या मधुर स्वरवाला, सुस्वर, सुकंठ।
(सं. सु+फ़ा. रुख़=प्रवृत्ति)
(सं. सु+फ़ा. रुख़=प्रवृत्ति)
जिसके मुंह पर तेज या लाली हो।
सुंदर रुचि या मनोवृत्तिवाला।
राजा उत्तानपान की दो पत्नियों में एक जो ՙउत्तम՚ की माता और ध्रुव की विमाता थी।
उ.-उत्तानपाद पृथ्वीपति भयौ.....। सुरुचि दूसरी ताकी नार। भयौ सुरुचि तैं उत्तम क्वार-४−९।
जिसकी रुचि उत्तम या परिष्कृत हो।
संगीत के सातों स्वरों के कुछ खंड।
उ.-(क) अधिक सुरूप कौन सीता तैं, जनम बियोग भरै-१−३५। (ख) अति सुरूप बिष अस्तन लाए, राजा कंस पठाई-१०−५२।
उ.-(क) गुन बिनु गुनी सुरूप रूप बिनु नाम बिना श्री स्याम हरी-१−११५। (ख) सुमति सुरूप सँचै स्रद्धा-बिधि उर-अंबुज अनुराग-२−१२।
हाथ-पाँव की वे रेखाएँ जिनका रहना शुभ माना जाता है।
उ.-सेस-सुरेस-दिनेस सारा. ६८४।
मुहा.-सुर्खाब का पर लगना-श्रेष्ठतासूचक विशेषता होना।
सौभ देश का राजा जो शिशुपाल का मित्र था और उसके मारे जाने पर द्वारका को घेरने के कारण श्रीकृष्ण द्वारा मारा गया था।
उ.- सुभट शाल्व करि क्रोध हरिपुरी आयो-१० उ.- ५६।
राज्य का प्रबंधक या व्यवस्थापक।
वश या अधिकार में रखने की क्रिया या भाव।
उ.- सूरजदास दास की महिमा श्रीपति श्रीमुख गाई-९-७।
श्रेष्ठ व्यक्तियों के लिए एक आदरसूचक विशेषण।
उ.- काके होंहिं जो नहिं गोकुल के सूरज प्रभु श्रीरंग-३३२७।
श्रीरमण, श्रीरमन, श्रीरवन
लक्ष्मीपति, विष्णु या उनके अवतार।
स्वरों या श्वासों से शुभ-अशुभ फल जानने की विद्या।
जिसके मुख पर तेज या कांति हो।
सुगमता से प्राप्त हो सकनावाला।
(सं. सुलभ, ՙदुर्लभ՚ के अनु. पर)
उ.-(क) मोकौं भयौ सो अतिही सुर्लभ-१−२७७। (ख) हमकौं भयौ सो अति ही सुर्ल्लभ-१० उ.-१२७।
जिसकी कमर या कटि सुंदर हो।
क्षत्रियों की एक शाखा जिसने बहुत समय तक गुजरात पर राज्य किया था।
सुलगने या जलने की क्रिया या भाव।
सुलगने या जलने की क्रिया या भाव।
(लकड़ी कोयले आदि का) जलना या दहकना।
बहुत दुखी या संतप्त होना।
जलाया या प्रज्ज्वलित किया।
उ.-ब्रज करि अवाँ जोग ईंधन सम सुरति आगि सुलगाए-३१९१।
जलाना, दहकाना, प्रज्ज्वलित करना।
उ.- सुलगि सुलगि जरति ही आनि फूँकि दई-३१५७।
अच्छे लक्षणोंवाला, सुंदर।
उ.-परम सुसील सुलच्छन जोरी बिधि की रची न होई-९−४५।
अच्छे लक्षणों वाला सुंदर।
उ.-सुलछ लोचन चारु नासा परम रुचिर बनाइ।
लाज या मर्यादा का ध्यान रखनेवाला।
उ.-सुंदर सुलज सुबंस देखियत यातैं स्याम पठायौ-२९६३।
सुलझने की क्रिया या भाव, सुलझाव।
उलझन या जटिलता दूर होना या हटना।
उलझन या जटिलता दूर करना या हटाना।
सुलझने की क्रिया या भाव, सुलझाना।
उ.-और हैं आज काल के राजा, मैं तिनमें सुलतान-१−१४५।
सुगमता से मिलने या प्राप्त होने योग्य।
उ.-सदा सुभाव सुलभ सुमिरन-बस भक्तनि अभै दियो-१−१८१।
सुगमता से प्राप्त होने का भाव।
लड़ाई समाप्त होने पर या करने के लिए होनेवाली संधि।
उ.-अगिनि सुलाकत (पाठा. सुलागत) मोरयौ न अंग-मन बिकट बनावत बेहु-२३४३।
(सोने-चाँदी को) तपाकर परखना।
उ.-अगिनि सुलाकत (पाठा. सुलागत) मोरयौ न अंग-मन बिकट बनावत बेहु-२३४३।
उ.-सूर स्याम नागर अरु नागरि ललना सुलप मंडली राजति-पृ. ३५१ (७२)
उ.-चलि सुलप गजहंस मोहति कोक-कला प्रबीना-पृ. ३५१ (७३)।
वह तंबाकू जो चिलम में बिना तवा रखै सुलगाकर पिया जाता है।
लज्जा या मर्यादा (का ध्यान)।
उ.-सखी सुलाज समुझि परस्पर सन्मुख सबै सही-२५४२।
सोने के लिए प्रवृत्त करना।
सुगमता से प्राप्त होने योग्य।
सुंदर रूप से अंकित चिह्न या छाप।
उ.-निरखि सुंदर हृदय पर भृगु-पाग परम सुलेख-६३५।
वासुकी नाग की पुत्री जो मेघनाद की पत्नी थी।
उ.-सुंदर सुलज सुबंस देखियत यातैं स्याम पठायौ-२९६३।
उ.- तौ हम कछु न बसाइ पार्थ, जौ श्रीपति तोहिं जितावैं-१-२७५।
उ.- श्रीफल सकुचि रहे दुरि कानन-१८९७।
उ.- श्रीफल मधुर चिरौंजी आनी-१०-२११।
अमृत, चन्द्र आदि वे चौदह रत्न जो समुद्र-मंथन से लक्ष्मी के साथ निकले थे।
श्रीकृष्ण का,सत्यभामा के गर्भ से जन्मा, एक पुत्र।
यहुदियों का एक बादशाह जो पैगंबर भी माना जाता है।
पश्चिमी पंजाब का एक पर्वत।
उ.-अब बिधु-बदन बिलोकि सुलोचन-२५६७।
मयदानव की पुत्री जो त्रिजटा और विभीषण की माता थी।
सुन्दर और मीठे वचन बोलनेवाली।
उ.-सूरदास नलिनी कौ सुवटा कहि कौनैं पकरयौ-२−२६१।
एक जड़ी जो रोग-जनित विवर्णता दूर करके शरीर को सुंदर वर्ण का बना देती है।
जिसके पंख या पर सोने के हों।
जिसके रोम या रोएँ सुनहरे हों।
उ.-(क) अहि-पति-सुता-सुवन सनमुख ह्वै बचन कह्यौ इक हीनौ-१−२९। (ख) नंद-सुवन-छबि चंद-बदनियाँ-१०−१०६। (ग) सुवन तन चितै नंद डरत भारी-६८४। (घ) सूर प्रभु नंद-सुवन दोऊहंस बाल उपाम-२५६५।
जो अपने वंश या अधिकार में हो।
(क) बसन कुबेर अग्नि यम मारुत सुवस कियो छन माँयँ-सारा.। (ख) सूने किये भुवन भूपति के सुवस किए सुरलोक-१० उ.-२।
जो सहज ही वहन किया या उठाया जा सके।
उ.-(क) रसमय जानि सुवा सेमर कौं चोंच घालि पछितायौ-१−५८। (ख) कत तू सुवा होत सेमर कौ-१-५९। (ग) मन सुवा तन पींजरा-१−३११।
श्रीकृष्ण की एक पत्नी का नाम।
सुला दें, सोने को प्रवृत्त कर चुकें।
उ.-सोवै तब जब वाहि सुवावैं-५−३।
उ.-मेरे लाल को आउ निंदरिया, काहे न आनि सुवावै-१०−४३।
उ.-ल्याउ कुँवर कौ बेगि जगाइ। दूध प्याइ कै बहुरि सुवाइ-६−५।
उ.-तुम सोवौ मैं तुम्हैं सुवाऊँ-१०−२३०।
(मुँह से निकलनेवाली) अच्छी और शुभ बात।
(तीर या वाण) जिसके पंख सुंदर हों।
अच्छाखाने का आदि, स्वाद का अभ्यस्त।
उ.-सूरदास तिल तेल सुवादी, स्वाद कहा जानै घृत ही री-१४९९।
अच्छी तरह विचार करनेवाला।
रुक्मिणी के गर्भ से उत्पन्न श्रीकृष्ण के एक पुत्र का नाम।
सुगमता और सुकरता की स्थिति।
अच्छी बात कहने या बतानेवाला।
विष्णु के वक्षस्थल पर बना भुगु का चरण-चिह्न।
लक्ष्मी के स्वामी विष्णु।
राजा जनक के भाई कुशध्वज की पुत्री जो शत्रुध्न को ब्याही थी।
उ.- तहाँ बसत श्रुतदेव महामुनि सुनि दरसन को धायो-सारा. १९९।
जिसने अच्छी शिक्षा पायी हो।
जिसकी व्यवस्था या प्रबंध उत्तम रूप से किया गया हो।
व्रत का पालन दृढ़ता से करनेवाला।
जिसकी वृत्ति या जीविका उत्तम हो।
लंका का त्रिकूट पर्वत जहाँ श्रीराम सेना सहित ठहरे थे।
सुवेशता, सुवेषता, सुवेसता
सुवेशित, सुवेषित, सुवेसित
श्रीकृष्ण की एक पत्नी का नाम।
जो देखने में बड़ा प्रिय लगे, प्रियदर्शन।
एक आदरसूचक शब्द जो कुमारी, सधवा और विधवा, सभी स्त्रियों के नाम के पहले लगाया जा सकता है।
आयुर्वेद के एक प्रसिद्ध आचार्य जिनका ՙसुश्रुत संहिता नामक՚ ग्रंथ बहुत मान्य है।
वह नाड़ी जो नाभि से आरंभ होकर मेरुदंड से होती हुई ब्रह्मरंध्र तक जानेवाली मानी गयी है। इसी के अन्तर्गत वह ब्रह्मनारी कही जाती है जिससे चलकर कुंडलिनी ब्रह्मरंध्र तक पहुँचती है।
उ.-(क) इंगला पिंगला सुषमना नारी-३४०८। (ख) इड़ा पिंगला सुषमन नारी-३४४२।
धूप या आग के पास रखकर आर्द्रता दूर करना।
वह बाजा जो वायु के दबाव से बजने लगता हो।
जो सोने या निद्रा का इच्छक या उसके लिए आतुर हो।
योग-साधन में चित्त की उस वृत्ति या अनुभूति की अवस्था जब जीव ब्रह्म की प्राप्ति तो नित्यप्रति करता है, परंतु उसे इस बात का ज्ञान नहीं होता।
जो सोने या निद्रा का इच्छुक और उसके लिए आतुरो हो।
वह नाडी जो नाभि से आरंभ होकर मेरूदंड में से होती हई ब्रह्मरंध्रतक जानेवाली मानी गयी है। इसीके अंतर्गत वह ब्रह्मनाड़ी भी कही जाती है जिससे चलकर कुंडलिनी ब्रह्मरंध्र तक पहुँचती है। योग के अनुसार शरीर की तीन प्रधान नाड़ियों- इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना - में सुषुम्न्ना मध्य में है। यह त्रिगुणमयी और चंद्र, सूर्य और अग्नि-स्वरूपिणी है। वैद्यक के अनुसार सुषुम्ना शरीर की चौदह प्रधान नाड़ियों में है जिससे अन्य सब नाड़ियाँ लिपटी हुई हैं।
श्रीकृष्ण के एक पुत्र का नाम।
एक बानर का नाम जो वरुण का पुत्र, बाली का ससुर और सुग्रीव का वैद्य था। इसने राम-रावण युद्ध में श्रीराम की विशेष सहायता की थी।
उ.- (क) दौनगिरि पर आहि सँजीवनि बैद सुषेन बताई-९−१४। (ख) सुग्रीव विभीषन जामवंत, अँगद सुषेन केदार संत−९−१६६।
योग-साधना में चित की वह अवस्था जब वह ब्रह्म का साक्षात्कार तो करता है, परंतु उसकी उसे अनुभूति नहीं होती।
(सं. दुष्ट का अनु. या सं. सुष्ठु)
(सं. दुष्ट का अनु. या सं. सुष्ठु)
उ.- आयसु पाइ सुष्ट रथ कर गहि अनुपम तुरंग साजि धृत जोह्यौ-२४७८।
सुष्मन, सुष्मना, सुष्मंनि, सुष्मनी
बहुत उचित या युक्तियुक्त।
उ.- जीवनि-आस प्रबल श्रुति लेखी-१-२२४। (ख) जाके श्वाँस उसाँस लेत में प्रगट भए श्रुति चार-२६२९।
कानों को कठौर और कर्कश लगनेवाला (वर्ण या शब्द)।
वेद-विहित मार्ग, सन्मार्ग।
अच्छी संगति या साथ, सत्संग।
सिसकी भरकर या धीरे-धीरे रोना।
सिसक-सिसक कर या सिसकी भरकर रोने की क्रिया या भाव।
उ.-सुसकनि की बारी हौं बलि-बलि, हठ न करहु तुम नंद-दुलारे-१०−१६०।
सिसकी भरकर या धीरे-धीरे रोना।
सिसक-सिसक कर या सिसकी भर कर रोने लगा या रोया
उ.-जानि परयो तहँ कोउ नहीं जिय ही जिय सुसक्यो-२४७०।
अच्छी तरह सजा या सजाया हुआ।
थकावट दूर करना, विश्राम करना।
सुस्त होने का भाव, शिथिलता।
वे दिन जिनमें अकाल का कष्ट न हो, सुकाल।
बहुत अधिक शोभा या सुंदरता।
अच्छी समझवाला, समझदार, सुबुद्धि।
पति या पत्नी का पिता, श्वसुर।
पति या पत्नी के पिता का घर।
पति या पत्नी की माता, सास।
जो सहज में उठाया या सहन किया जा सके।
उ.-बहुत काल लौं जल में बिचरे तब हरि भये सुसांत-सारा. ९८।
उत्तम या श्रेष्ठ इच्छा या कामना।
श्रेष्ठ या उत्तम उपाय, युक्ति या साधन।
जो सहज में किया जा सके, जिसका साधन सुगम हो, सुखसाध्य।
उ.-परम सुसील सुलच्छन जोरी बिधि की रची न होई-९−४५।
उ.-नाम सुसीला ताकी नार-१०३−५९।
उ.-अति उदार पर-हित डोलत हैं बोलत बचन सुसीले-३०५५।
उ.-सुसुकत सुनि जसुमति अतुराई, कहा महर भ्रम पायौ-२४७३।
जिसका चित्त प्रसन्न, सुखी और उत्साहपूर्ण हो।
जिसका चित्त प्रसन्न, सुखी और उत्साहपूर्ण हो।
उ.-(क) खसि खसि परत कान्ह कनियाँ तैं सुसुकि-सुसुकि मन खीजैं-१०−१९०। (ख) मूँदि मुख छिन सुसिक रोवत छिनक मौन रहत-३५९।
एक बानर जो सुग्रीव का वैद्य था।
जो (चिंता, लज्जा आदि के कारण) प्रसन्न या उत्साही न हो, उदास।
जिसमें वेग, गति आदि की तीव्रता न हो।
जिसके काम में तत्परता न हो।
जिसके स्तन सुडौल और सुन्दर हों।
थकावट दूर करने के लिए आराम या विश्राम करना।
सुस्त होने का भाव, शिथिलता।
वह धार्मिक कृत्य जो अशुभ बातों का नाश करके शुभ की स्थापना के लिए किया जाता है।
उत्तम शब्द या ध्वनि से युक्त।
जिसका स्वर या कंठ ध्वनि मदूर हो, सुरीला, सुकंठ।
सुरीलापन, स्वर की मधूरता।
वंशी के पाँच गुणों में एक।
उ.-छूटे चिहुर बदन कुभिलानो सुहथ सँवारि बनाइये-१६८८।
उ.-राग राज्ञी सँचि मिलाई गावै सुघर मलार। सुहवी सारँग टोड़ी भैरवी केदार-२२७९।
उ.-(क) छहौं रस जौ धरौं आगैं तउ न गंध सुहाइ-१−५६। (ख) बड़ी बेर भई अजहुँ न आए, गृह बन कछु न सुहाइ-५७८। (ग) हम रुचि करी सूर के प्रभु सों दूजो मन न सुहाइ-३२१०।
विवाह के बाद की वह रात जिसमें वर-वधू का पहले-पहल मिलन और समागम होता है।
एक प्रकार का क्षार जो सोना गलाने, छींट छापने तथा कुछ औषधों को बनाने के काम आता है।
सुहागिन, सुहागिनि, सुहागिनी, सुहागिल
वह स्त्री जिसका पति जीवित हो, सधवा या सौभाग्यवाती स्त्री।
उ.-(क) जसुमति भाग सुहागिनी, जायौ हरि सौ पूत-१०−४०। (ख) जसुमति भाग सुहागिनी हरि कौं सुत जानै-१०−७२। (ग) चारि चारि दिन सबै सुहागिनि री ह्वै चुकीं मैं स्वरूप अपनी-१६६२।
भला या अच्छा लगता है, रुचता है।
उ.-(क) अब न सुहात बिषय-रस- छीलर वा समुद्र की आस-१−३३७ (ख) गोकुल बाजत सुनी बधाई, लोगनि हिएँ सुहात-१०−१२। (ग) सखी-सखा-सुख नहिं त्रिभुवन मैं, नहिं बैकुंठ सुहात-२९१०। (घ) भयौ उदास, सुहात न कछुवै-सारा. ४३६।
जो सहा जा सके, जो सहन करने के योग्य हो, सह्य।
उ.-जे जरि मरै प्रगट पावक परि ते त्रिय अधिक सुहाती-२४९९।
उ.-(क) सूरदास प्रभु कहा चलत है कोटिक बात सुहाती-२९८१। (ख) समय पाइ ब्रज बात चलाई सुख ही माँझ सुहाती-३४१८।
जो भला या अच्छा लगे, जो प्रिय या रुचिकर हो।
उ.-मैं-मेरी कबहूँ नहिं कीजै, कीजै पंच सुहातौ-१−३०२।
शोभा देता है, सुंदर लगता है।
उ.-नील खुर अरु अरुन लोचन सेत सींग सुहाइ-१−५६।
उ.-कुच बिष बाँटि लगाइ कपट करि बाल- घातिनी परम सुहाई-१०−५०।
सुहानेवाली, शोभित होनेवाली, सुंदर।
उ.-(क) यमुना पुलिन मल्लिका मनोहर सरद सुहाई यामिनी। (ख) निमिष-निमिष मों बिसरत नाहीं सरद सुहाई राती-२९८१।
उ.- काकैं द्वार जाइ होउँ ठाढो, देखत काहि सुहाऊँ-१−१२८।
उ.-बाल-दसा के चिकुर सुहाए-१०−१०४।
उ.-साप दग्ध ह्वै सुत कुबेर के आनि भए तरु जुगल सुहाए-३८६।
स्त्री के सधवा रहने की अवस्था, अहिवात, सौभाग्य।
उ.-धनि-धनि महरि की कोख भाग सुहाग भरी-१०−२४।
मुहा.-सुहाग भरना-स्त्री को सौभाग्यवती बनाने के लिए उसकी माँग भरना। सुहाग मनाना-पतिसुख के सदा बने रहने की कामना करना। सुहाग माँगना-(देवी देवता या शुभचिंतक गुरुजन से) सौभाग्य अखंड रहने का आशीर्वाद माँगना।
माँगलित गीत जो विवाह के समय कन्या-पक्ष की स्त्रियाँ गाती हैं।
मुहा.-सुहाग गाना-मांगलिक गीत गाना।
उ.-हरि अनुराग सुहाग भरि अमी के गागर रे-३१५०।
भला या अच्छा लगना, रुचिकर लगना, रुचिकर या प्रिय होना।
देखने में भला और सुंदर लगनेवाला, प्रिय दर्शन।
जो देखने-सुनने में भला जान पड़े, सुहावना, सुंदर।
उ.-बोलि बोलि सुत-स्वजन मित्र-जन लीन्यौ सुजस सुहायौ-२−३०।
हथेली के आकार से भी छोटी-छोटी सादी पूरियाँ जो देवी-देवता की पूजा अथवा अन्य वैसे ही उत्सवों के लिए बनायी जाती हैं।
उ.-कान कुँवर को कनछेदन है हाथ सुहारी (सोहारी) भेली गुर की-१०−१७९।
उ.-(क) घेबर, फेनी और सुहारी-१०-२११। (ख) सेव सुहारी घेवर घी के-२३२१।
एक प्रकार का बहुत खस्ता और नमकीन पकवान जो मैदे का बनता है।
उ.-पुनि पुनि कहत स्याम श्रीमुख सौं, तुम मेरे मन अतिहिं सुहावत-४४९।
उ.-झूठैं लोग लगावत मोकौं, माटी मोहिं न सुहावै-१०−२५३।
सुंदर या मधुर मुस्कानवाला।
सुंदर या मधुर मुस्कानवाला, चारुहासी।
भले या सुंदर लगते हैं, शोभित होते हैं।
उ.-गोबर्धन परबत के ऊपर बोलत मोर सुहाहीं-सारा. ८६२।
अच्छा या भला लगनेवाला, सुंदर।
देखने में अच्छा या भला मालूम होना।
अच्छा या भला लगनेवाला, मनोहर।
प्रिय या रुचिकर लगनेवाला।
सुहावने का भाव, सुंदरता, मनोहरता।
उ.-द्वै खंभ कंचन के मनोहर रत्न जटित सुहावनो-२२८०।
उ.-(क) उर अंचल उड़त न जानि, सारी सुरँग सुही-१०−२४। (ख) पहिरे चीर सुही सुरंग सारी चुहुचुहु चूनरी बहु रंगनो-२२८०।
सुहृत, सुहृत्, सुहृद, सुहृद्
अच्छे और शुद्ध हृदयवाला व्यक्ति।
सुहृत, सुहृत्, सुहृद, सुहृद्
उ.- (क) सूर सो सुहृद मानि-१७७। (ख) सानि-सानि दधि-भात लियौ कर सुहृद सखनि कर देस-४१६।
सुहृत, सुहृत्, सुहृद, सुहृद्
अच्छे, शुद्ध और दयार्द्र हृदयवाला।
उ.-पंछी एक सुहृद जानत हौ, करयौ निसाचर भंग-९−८३।
सुहृत, सुहृत्, सुहृद, सुहृद्
सहृदय, उदार, जो निष्ठुर न हो।
उ.-बिहँसि बृषभानु-तनया कहति, हम निष्ठुर तुम सुहृद बात वह जिनि चलावो-२०७३।
उदार या विशद दृष्टिकोणवाला, उन्नतमना।
किसी चीज से या किसी प्राणी की नाक से निकलने वाला ՙसूँ՚ शब्द।
(सूँघकर) महक या वास का अनुभव करती या पता लगाती हैं।
उ.-जहाँ तहाँ गोदोहन कीनो सूँघतिं सोई ठावें-३४२१।
नाक से (सूँघकर) किसी महक या वास का पता लगाना या अनुभव करना।
मुहा.-सिर सूँघना-एक रीति जिसके द्वारा गुरुजन मंगलकामना के भाव से छोटों का सिर या मस्तक सूँघते हैं। जमीन सूँघना-(१) ऊँघना। (२) जमीन पर मुँह के बल पटक दिया जाना।
बहुत ही कम भोजन करना (व्यंग्य)।
केवल जमीन सूँघकर उसके नीचे पानी या खजाना बता सकनेवाला व्यक्ति।
सूँघ-सूँघकर शिकार तक पहुँचा सकनेवाला पथ।
नाक से महक या वास लेकर, सूँघकर।
उ.-ज्यौं सौरभ मृग-नाभि बसत है, द्रुम-तृन सूँघि फिरयौ-२−२६।
एक कल्पित तारा जिसके उदय पर चमड़े में सुगंध आना और अनेक जीवों का मर जाना माना जाता है।
उत्तम रीति या विधि से हवन करनेवाला होता।
ब्रजभाषा में करण और अपादान कारक का चिह्न जिसका प्रयोग बोलचाल में अधिक होता है, से। (ՙसूरसागर՚ में इसका प्रयोग नहीं है ; ՙसारावली՚ में ही है।)
उ.- (क) दुर्जोधन सूँ कहथौ दूत ह्वै-सारा. ७७३। (ख) नव निकुंज में मिलौ स्याम सूँ-सारा. ९२२।
सौर-जगत का ՙशुक्र՚ नामक ग्रह जो दैत्यों का गुरु कहा गया है।
उ.-(क) भजन-बिनु जैसैं सूकर-स्वान सियार-१−४१। (ख) उदर भरथौ कूकर-सूकर लौं-१−६५। (ग) बहुतक जन्म पुरीष-परायन सूकर-स्वान भयौ-१−७८।
एटा जिले का ՙसोरों՚ नामक स्थान जहाँ वाराह-अवतार की मूर्ति और मंदिर है।
हाथी की नाक जो बहुत लंबी होती है, शुंड।
ऊपर से नीचे की ओर हाथ फेरना।
डोरे आदि पर माँझ . कलफ करना।
(सं. सम्मुख, पु. हिं. सौंहें)
एक प्रसिद्ध पशु जो आकार, वास-स्थान और स्वभाव के विचार से दो प्रकार का होता है-पालतू और जंगली।
हर साल बच्चा जनने की क्रिया।
वह स्त्री जो हर साल बच्चा जनती हो।
लोहे का वह पतला तार-जैसा उपकरण जिसके महीन छेद में तागा पिरोकर कपड़ा आदि सिया जाता ह़ै।
मुहा.-आख की सूई निकालना-किसी विकट काम को समाप्तप्राय देखकर सेषांश को पूरा करके सारे कार्य-संपादन का श्रेय प्राप्त करने का प्रयत्न करना। सुई का फावड़ा या भाला बना देना-जरा सी बात को बहुत बढ़ा देना, बात का बतंगड़ करना।
किसी विशेष अंग, दिशा आदि का सूचक उपकरण।
पौधे का पतला अँखुआ या अंकुर।
सुई से काढ़कर कपड़े पर बेल-बूटे बनाने का शिल्प।
मुहा.-सूखकर काँटा होना-बहुत दुबला या कृश होना।
सूख रही है, दुर्बल या कृश हो रही है।
उ.-सूखति सूर धान अंकुर सी बिनु बरषा ज्यों मूल तुई-१४३३।
नमी, तरी, गीलापन या आर्द्रता न रहना।
जल का बिलकुल न रहना या बहुत कम हो जाना।
कांति-तेजहीन, खिन्न या उदास होना।
चार आने का सिक्का, चवन्नी।
(सं. सपादक= चतुर्थांश सहित)
वेद- मंत्रों या ऋचाओं का संग्रह या संकलन
भली भाँति कहा हुआ या कथित।
वेदमंत्रों या ऋृचाओं का अर्थ करनेवाला, मंत्रद्रष्टा।
बहुत छोटा, थोड़ा या महीन।
बारीक या सूक्ष्म बात सोचने-समझने का गुण।
बारीक या सूक्ष्म बात सोचने-समझनेवाला।
वह दृष्टि जौ बहुत ही सूक्ष्म बातें देख-समझ ले।
वह जो सूक्ष्म से सूक्ष्म बातें देखने-समझन की दृष्टि रखता हो।
जिसका शरीर बहुत ही छोटा या दुबला-पतला हो।
पाँच प्राण, पाँच ज्ञानेंद्रिय, पाँच सूक्ष्म तथा मन और बुद्धि-इन सत्रह तत्वों के समूह से निर्मित वह कल्पित शरीर जिसे ՙलिंग शरीर՚ भी कहते हैं। हिंदुओं का विश्वास है कि सूक्ष्म या लिंग शरीर, प्राणी की मृत्यु और स्थूल शरीर के नाश के उपरांत भी उस समय तक बना रहना है जब तक मुक्ति नहीं होती। स्वर्ग और नरक के भोग भी इसी शरीर को भोगने पड़ते हैं।
रोग, चिंता आदि से दुबला या कृश होना।
जिसकी नमी, तरी या आर्द्रता उड़ या जल गयी हो।
जिसका जल उड़ गया या बहुत कम रह गया हो।
जो कांति या तेजहीन, खिन्न या उदास हो गया हो।
मुहा.-सूखा जवाब देना- साफ-साफ इनकार कर देना। सूखा टरकाना या टालना-याचक या आकांक्षी की कोई भी या कुछ भी इच्छा पूरी न करके लौटाना।
पानी न बरसने की दशा या स्थिति, अनावृष्टि।
नदी का किनारा जो जल से ऊपर हो।
एक तरह की खाँसी जो बच्चों के प्राण तक ले लेती है।
एक रोग जिसमें खाना खाने पर भी दुबलापन बना रहता है।
मुहा.-सूखा लगना-ऎसा रोग होना कि शरीर बराबर सूखता ही जाय।
जिसमें रस या आर्द्रता न रह गयी हो।
उ.-सूखे पात और तृन खाइ-५−३।
उदार, खिन्न, तेज या कांतिहीन।
उ.-सूखे बदन स्रवन नैनन तें जलधारा उर बाढ़ी−२५३५।
उ.-(क) सरवर नीर भरै भरि उमड़ै, सूखै, खेह उड़ाइ-१−२६५। (ख) जिनके क्रोध पुहुमि नभ पलटैं, सूखै सकल सिंधु कर पानी-९−११६।
नमी, तरी या आर्द्रताहीन हो गया।
उ.-देखौ करनी कमल कीं, कीन्हौं रवि सौं हेत। प्रान तज्यौ प्रन न तज्यौ सूख्यौ सरहिं समेत-१−३२५।
बोध या ज्ञान करानेवाला (लक्षण या तत्व)।
बताता या जताता है, प्रकट या सूचित करता है।
उ.-(क) नमित मुख इमि अधर सूचत सकुच मैं कछु रोष-३५०। (ख) ताहू मैं अति चारु बिलोकनि गूढ़ भाव सूचत सखि सैन-१३१३।
बोध या ज्ञान कराने की क्रिया।
बोध या ज्ञान कराने की क्रिया।
जताने, बताने या परिचय कराने के लिए कही गयी बात।
वह पत्र या विज्ञापन जिस पर किसी विषय का परिचय कराने की बात लिखी हो, परिचायक विज्ञप्ति।
बताया या जताया हुआ, जिसकी सूचना दी गयी हो, ज्ञापित।
कपड़ा आदि सीने-काढ़ने की सुई।
सेना का एक प्रकार का व्यूह।
पिंगल की एक रीति जिसमें नियत वर्णों या मात्राओं से बन सकनेवाले छंदों की संख्या जानी जाती है।
मच्छर जैसे जंतु जिनके डंक सुई की तरह के होते हैं।
सिलाई की कला जो चौंसठ कलाओं में एक है।
प्राप्त वस्तुओं की सूची, तालिका या नामावली।
जो सुईँ से भेदा जाने योग्य हो।
सुई का काम जो चौंसठ कलाओं में एक है।
उ.-सूच्छम चरन चलावत बल करि-१०−१२०।
उ.-(क) सूर आगम कियौ नभ तैं जमुन सूच्छम धार-६२४। (ख) राजति रोम-राजी रेख। नील घन मनु धूम धारा रही सूच्छम सेष-६३५।
वह अर्थ जो शब्दों की व्यंजना शक्ति से निकलता हो।
बहुत छोटा, पतला या थोड़ा।
सूजने की क्रिया, भाव या अवस्था, शोथ।
रोग, चोट आदि से शरीर के किसी अंग का (इस प्रकार) फूलना (कि उसमें पीड़ा भी हो), शोथ होना।
गेहुँ का कुछ मोटा और दरदरा आटा।
होने या आनेवाली बातों का पहले ही ध्यान में आ जाने का भाव या गुण।
अनूठी उपज या कल्पना, उदभावना।
उ.-(क) उपजत दोष नैन नहिं सूझत-१−११४। (ख) गरजत क्रोध-लोभ कौ नारौ, सूझत कहुँ न उतारौ-१−२०९। (ग) सूझत नहीं बीसहूँ लोचन-९−१३४। (घ) रवी कौ रथ सूझत नहिं धरनि-गगन छायो-९−१३९।
उ.-जौलौं सत सरूप नहिं सूझत-२−२५।
समझ या बुद्धि की बातें ध्यान में आना और समझ-बूझकर उनका उपयोग करना, दूरदर्शिता और बुद्धिमता।
उ.-और अनत न सूझिए-१० उ.-२४।
उ.-जिह्वा स्वाद मीन ज्यौं उरझयौ सूझी नहीं फँदाई-१−१४७।
उ.-(क) कान न सुनैं, आँखि नहिं सूझै-३−१३। (ख) अंधधुध मग कहूँ न सूझै-१०५०। (ग) इत हीं तें जाति उत, उत हीं तें फिरै, इत निकटह्वै जाति नहिं नैंक सूझै-११८८। (घ) सूर नंदनंदन को देखति और न कोई सूझै-३१५१।
उ.-(क) और सरन सूझै नहिं कोइ-१८०९। (ख) जिनके एक अनन्य ब्रत सूझै क्यौं दूजो उर आनै-३१३६।
उ.-(क) धूम बढ़यौ, लोचन खस्यौ, सखा न सूझ्यौ संग-१−३२५। (ख) तव मारग सूझ्यौ नैननि कछु जिय अपने तिय गई लजाई-८८८।
रुई, रेशम आदि का वह पतला बटा हुआ तागा जिससे कपड़ा बुना जाता है।
रुई का बटा हुआ तार जिससे कपड़ा आदि सिया जाता है, तागा, धागा, डोरा।
मुहा.-सूत-सूत-जरा-जरा, तनिक-तनिक। सूत बराबर-बहुत महीन। सूत सों तोरयो-महीन सूत की तरह बड़ी सरलता से या अनायास तोड़ दिया। उ.-गृह गुरु लाज सूत सों तोरयो, डरी नहीं व्यवहार-पृ. ३३९ (८३)।
कई सूतों को बटकर बनायी गयी डोरी।
उ.-(क) सन अरु सूत चीर-पाटंबर लै लंगूर बँधाए-९−९८। (क) ग्रंथित सूत धारत तेहिं ग्रीवा जहाँ धरते बनमाल-३३३३।
किसी चीज से निकलनेवाला महीन या पतला तार।
बच्चों के गले में पहनाने का गंडा।
पत्थर, लकड़ी आदि पर निशान डालने की डोरी।
मुहा.-सूत धरना या बाँधना-(कोयले, गेरू आदि के रंग में रँगे हुए सूत से पत्थर लकड़ी आदि पर निशान लगाना।
एक वर्ण-संकर जाति जिसका काम रथ हाँकना था।
उ.-बाजी मनोरथ, गर्ब मत्त-गज, असत कुमति रथ-सूत-१−१४१।
बंदी, भाट या चारण जिनका काम राजाओं का यश-गान करना था।
उ.-(क) मागध-बंदी-सूत लुटाए, गो-गयंद-हय-चीर-९−१८। (ख) मागध-बंदी-सूत अति करत कुलाहल बार-१०−२७। (ग) आनंदित बिप्र सूत-मागध जाचकगन-१०−३०।
पुराणवक्त या पौराणिक जिनमें सबसे प्रसिद्ध हैं लोमहर्षण जो वेदव्यास के शिष्य थे और जिन्होंने नैमिषारण्य में ऋृषियों के सब पुराण सुनाये थे।
उ.-सूत सौनकनि सौं पुनि कहयौ-१−२२७।
थोड़े अक्षरों या शब्दों में कहा गया ऎसा पद या वाक्य जो बहुत अर्थ प्रकाशित करता हो।
संतान के जन्म पर माना जानेवाला अशौच।
किसी निकट संबंधी की मृत्यु पर परिवार में माना जानेवाला अशौच।
स्त्री जिसने हाल ही में बच्चा जाना या प्रसव किया हो।
संतान-जन्म होने से जिसे अशौच हो।
संबंधी की मृत्यु पर जिसे सूतक लगा हो।
कर्ण (जिसका पालन-पोषण अधिरथ सारथी ने किया था)।
उ.-अगरु चँदन कौ पालनौ (रँगि) ईंगुर ढार-सुढार। लै आयौ गढ़ि डोलना (हो) बिसकर्मा सूतधार (पाठा.-सूतहार) -१०−४०।
कर्ण (जिसका पोषण और पालन अधिरथ सारथी ने किया था)।
सीधा करना, सीध में निशान लगाना।
ऊपर से नीचे की ओर हाथ फेरना।
डोरे आदि पर माँझ या कलफ चढ़ाना।
कर्ण (जिसका पालन अधिरथ सारथी ने किया था)।
स्त्री जिसने बच्चा जना हो।
उ.-अगरु चँदन कौ पालनौ (रँगि) ईगुर ढार-सुढार। लै आयौ गढ़ि डोलना (हो) बिसकर्मा सूतहार-१०−४०।
स्त्री जिसने हाल ही में बच्चा जाना हो, जच्चा।
वह स्थान जहाँ बच्चा जना जाय या जना गया हो।
उ.-स्वान सूते पहरुवा संब, नींद उपजी गेह-१०−५।
किसी वस्तु से निकलने वाले महीन तंतु से।
उ.-किहिं गयंद बाँध्यौ सुन मधुकर पद्यनाल के काचे सूते-३३०५।
ऎसा पद या वाक्य जिसमें अक्षर या शब्द तो बहुत थोड़े हों, परन्तु जो बहुत अर्थ प्रकाशित करता हो, सारगर्भित संक्षिप्त पद।
कथा, व्याख्यान आदि सुननेवाला।
वह सांकेतिक पद या वाक्य जिसमें विशिष्ट कार्य, प्रयोग आदि का संक्षिप्त विधान निहित हो।
कार्य आदि की रूपरेखा के अंगों में कोई।
नाट्यशाला का प्रधान और व्यवस्थापक नट।
एक प्राचीन वर्ण-संकर जाति।
उ.-(क) सूथन जंघन बाँधि नाराबँद तिरनी पर छवि भारी-पृ. ३४५ (५२७)। (ख) नाराबंदन सूथ जंघन-१८२०।
मुहा.-सूद दर सूद-ब्याज पर ब्याज। सूद पर देना या लगाना-सूद लेकर रुपया उधार देना।
उ.-नमो समस्ते बारम्बार। मदन-सूदन गोविंद मुरार।
वध या विनाश करने की क्रिया।
शूरू, प्रारम्भ, नींव पड़ना।
सूत्र-रूप में लाया, प्रस्तुत किया या बनाया हुआ।
जिसमें सूत्र हों, सूत्र-युक्त।
(वह पूँजी या धन) जो ब्याज पर दिया या लिया गया हो।
उ.-तब बिचारि करि राजा देख्यौ। सूद्र नृपति कलिजुग करि लेख्यौ-१−२९०।
सरल स्वभाव या व्यवहार का, निष्कपट।
जिसमें टेढ़ापन या वक्रता न हो।
सरल या भोले स्वभाव की, निष्कपट।
उ.-(क) सूधी निपट देखियत तुमकौं तातैं करियत साथ-६७४। (ख) छंद-कपट कछु जानत नाहीं, सूधी हैं सब ब्रज की बाल-१३१५।
जो या जिसमें टेढ़ापन न हो।
उ.-(क) टेढ़ी जेहरि सूधी कीन्हीं-२६४३। (ख) स्वान पूछ को कोटिक लागे सूधी काहु न करी-३०१०।
उ.-नव से नदी चलत मर्यादा सूधी सिंधु समानी-२०४४।
मुहा.-सूधी सुनना या सहना-किसी की खरी-खरी बातें सुनकर सहन करना। सूधी-सूधी सुनाना-खूब खरी-खरी बातें कहना।
जिसमें व्यंग्य या वक्रता न हो।
उ.-पूछे तैं तुम बदन दुरावत सूधे बोल न बोलत-१०−२१९।
उ.-सुचि करि सकल बान सूधे करि कटि-तट कस्यौ निषंग-९−१५८।
बिना ठहरे या रुके, बिना विलंब किये।
उ.-(क) लै बसुदेव धँसे दह सूधे-१०−४। (ख) दधि बेंचहु घर सूधे आवहु काहे झेर लगावति-११७४।
उ.-(क) सूधे दान काहे न लेत (ख) हौं बड़ हौं बड़ बहुत कहावत सूधे (सूधैं) कहत न बात-२−२२।
मुहा.-सूधे-सूधे-कोरा, साफ-साफ।
उ.-(क) हौं बड़, हौं बड़ बहुत कहावत सूधैं कहत न बात-२−१२। (ख) चलत न क्यौं तुम सूधैं राह-५−४।
उ.-रीझि तेहि रूप दियो, अंग सूधो कियो-२५८४।
जिसमें व्यंग्य वक्रता या अस्पष्टता न हो।
उ.-त्यों त्रिदोष उपजे जक लागत बोलति बचन न सूधो-३०१३।
उ.-भली महर सूधौ सूत जायौ चोली-हार बतावत-३४१।
उ.-तैं तौ नाम स्याम मेरे कौं सूधौ करि है पायौ-१०−३१५।
उ.-सूधौ कहौ तब कैसे जीहैं निज चलिहौं उठि प्रात-२५०२।
उ.-मनु मयंकहिं अंक लीन्हौ सिंहिका कैं सून-१०−१८४।
खिला हुआ या विकसित (पुष्प)।
उ.-निरखत सून भवन जड़ ह्वै रहे, खिन लोटत धर बपु न सँभारत-९−६२।
मुहा.-सूना या सूना-सुना लगना-सूनसान या निर्जन जान पड़ना।
पकी हुई दाल या उसका पानी।
अनाज फटकने का एक पात्र या ՙछाज՚ जो प्रायः सरई या सींक बनता है।
उ.-तीनि लोक जाके उदर-भवन सो सूप कैं कोन परयौ है-१०−१२८।
रसोई बनाने की विद्या, कला या क्रिया।
खाली या निर्जन (घर, स्थान आदि) में।
उ.-(क) सूनैं सदन मथनियाँ कैं ढिग, बैठि रहे अरगाइ-१०−२६५। (ख) पैठे सखनि सहित घर सूनैं-१०−२००।
उ.-(क) तुम बिनु सूनो वाको गेहरा-२००१। (ख) बिद्यमान अपने इन नैननि सूनो देखति गेहु-२७३३। (ग) स्याम बिन सब ब्रजहिं सूनो-३४२६।
उ.-सूर स्याम हौ बहुत लोभाने बन देख्यौ धौं सूनौ-११२१।
जिसके अन्दर कुछ न हो, खाली।
उ.-अन्तर सून्य सदा देखियत है निज कुल बंस सुभाए-६६१।
उ.- सूपनखा ये समाचार सब लंका जाइ सुनाए-९−५७।
सूफी धर्म या वर्ग संबंधी।
एकेश्वरवादी और उदार दृष्टिकोण वाले मुसलमानों का एक धार्मिक संप्रदाय .
किसी देश का भू-भाग, प्रान्त, प्रदेश।
उ.-ससि अरु सूर उदै भए मानों दोऊ एकहीं बार-२५७२।
मदार, आक या अर्क का वृक्ष।
महाकवि सूरदास के नाम का संक्षिप्त रूप; महाकवि सूरदास के नाम की छाप जो उनके पदों में मिलती है।
उ.-लीला सुभग सूर के प्रभु की ब्रज में गाइ जियौ-४८६।
उ.- (क) यह सुनि नृपति हरष मन कीन्हौ तुरतहिं बीरा दीन्हौ। बारंबार सूर कहि ताकौं, आपु प्रसंसा कीन्हौ-१०−६१। (ख) कायरबकै लोभ तें भागै, लरै सो सूर बखानै-३३३७।
सूर सामंत या सावंत-वीर और बहादुर।
प्रांत या प्रदेश का शासक।
सूबेदार का ओहदा, पद या काम।
सूबेदार होने की अवस्था या स्थिति।
उ.-कृपन सूम, नहिं खाइ खवावै, खाइ मारिकै औरै-१−१८६।
ՙसूरसागर՚ के कुछ पदों में मिलनेवाली एक छाप जिसे अधिकांश आलोचक महाकवि सूरदास की ही छाप मानते हैं।
उ.-सूरजदास स्याम सेए तैं दुस्तर पार तरै-१−८२।
एक पौधा जिसके पीले फूल सूर्योदय होने पर खिलते और सूर्यास्त पर मुर्झा जाते हैं।
एक शीशा जो सूर्य के सामने रखा जाने पर ताप या अग्नि उत्पन्न करता है।
एक प्रकार का राजचिह्न या छत्र।
उ.-सूरजबंसी सो कहवाए। रामचंद्र ताही कुल आए-९−२।
एक छाप जो ՙसूरसागर՚ के कुछ पदों में मिलती है और जिसे अधिकांश आलोचक महाकवि सूरदास की ही ՙछाप՚ मानते हैं।
उ.-संतत दीन, महा अपराधी काहैं सूरज कूर बिसारौ-१-१७२।
बरछे की तरह का एक प्राचीन अस्त्र।
वायु-कोप से पेट में होनेवाली प्रबल पीड़ा।
एक तरह का बिल्लौर या स्फटिक, जिसमें से, सूर्य के सामने रखे जाने पर आग निकलती है।
उ.- (क) सूरज कोटि प्रकास अंग में कटि मेखला बिराजै-सारा. ३३४। (ख) आए ब्रह्म सभा में बामन सूरज तेज बिराजै-सारा. ३३६।
मुहा.- सूरज पर थूका मुँह पर आता है-साधु-सज्जन और लोकोपकारी व्यक्ति पर कलंक या लांछन लगाने से उसका तो कुछ बिगड़ता नहीं, अंततः स्वयं ही लांछित होना पड़ता है। सूरज को दीपक दिखाना-(१) जो स्वयं गुणवान है, उसे कुछ बताने का निरर्थक प्रयत्न करना। (२) जो स्वयं विख्यात हो उसका परिचय देने का निरर्थक प्रयत्न करना। सूरज पर धूल फेंकना-साधु, निर्दोष और लोकोपकारी व्यक्ति पर कलंक या लांछन लगाना।
सूरत-शक्ल-चेहरा-मोहरा, आकृति।
मुहा.- सूरत दिखाना-सामने आना। सूरत बनाना-(१) अच्छा रूप देना या बनाना। (२) रूप बनाने में लापरवाही दिखाना। (३) भेस बदलना। (४) नाक-भौ सिकोड़ना, अरुचि प्रकट करना। (५) चित्र बनाना। सूरत बिगड़ना-(१) चेहरे की रंगत फिकी पड़ना। (२) बदसूरत या कुरूप होना। सूरत बिगाड़ना- (१) बदसूरत या कुरूप करना। (२) अपमानित करके चेहरा फीका कर देना। (३) दंड देकर चेहरा फीका या उदास कर देना।
कार्य-सिद्धि का मार्ग, उपाय, ढंग या युक्ति।
एक प्रकार की तल-वार जो सूरत नगर में बनती थी।
उत्तर भारत के हिंदी कृष्णभक्त कवियों में सर्वश्रेष्ठ जिनका समय वि. संवत् १५३५ से १५४० तक माना जाता है। इनका ՙसूरसागर՚ हिन्दी का सर्वश्रेष्ठ गीतकाव्य है। इसके अनेक पदों में ՙसूरदास՚ छाप भी मिलती है।
उ.-सूरदास स्वामी करुनामय बार-बार बंदौं तिहिं पाइ-१−१।
जिमींकंद जिसकी तरकारी बनती है।
उ.-(क) निबुआ सूरत आम अथानौ-१०−२४१। (ख) सूरन करि तरि सरस तरोई-२३२१।
एक संकर राग जो वर्षा में दिन के दूसरे पहर में गाया जाता है।
मथुरा प्रदेश का पुराना नाम।
संस्कृत का एक प्रसिद्ध छंद।
उ.- सोये श्वान (स्वान), पहरुआ सोये-१०-३।
मुहा.- श्वास रहते-जीते जी। श्वास छूटना-प्राण निकलना, मृत्यु होना।
उ.- सूर्पनखा ये समाचार सब लंका गाइ सुनाए-९−५७।
उ.-सूरदास सिंर देत सूरमा- २७१३।
हिन्दी के महाकवि सूरदास कृत गीतकाव्य का नाम जिसमें श्रीकृष्ण लीला के साथ-साथ अनेक पौराणिक कथाऎ राग-रागिनियों में वर्णित हैं। इसके दो रूप प्राप्त हैं-संग्रहात्मक और स्कंधात्मक। इसके लगभंग पाँच हजार पद आज प्राप्त हैं।
लोहे की बनी हुई स्त्री-मूर्ति (जिसको तपाकर आलिंगन करने से गुरू-पत्नी से व्यभिचार करनेवाले का पाप नष्ट होना कहा गया है)।
सौर जगत का सबसे ज्वलंत पिंड जिससे सब ग्रहों को गरमी और प्रकाश मिलता है, दिनकर, भानु।
मुहा. सूर्य को दीपक दिखाना- (१) जो स्वयं विख्यात हो उसका परिचय देने का (निरर्थक) प्रयत्न करना। (२) जो स्वयं गुणवान है, उसे कुछ बताने का निरर्थक प्रयत्न करना। सूरज पर थूका मुँह पर आता है- साधु-सज्जन और लोकोपकारी व्यक्ति पर कलंक या लांछन लगाने से उसका तो कुछ बिगड़ता नहीं, अंततः स्वयं ही लांछित होना पड़ता है। सूरज पर धूल फेंकना- साधु, निर्दोष और लोकोपकारी व्यक्ति पर कलंक या लांछन लगाना।
एक प्रकार का बिल्लौर या स्फटिक जिसमें से, सूर्य के सामने रखने पर, आँच निकलती है।
सूर्य का प्रकाश या दीप्ति।
पृथ्वी और सूर्य के बीच में चन्द्रमा के आ जाने और उसकी छाया पड़ने से होनेवाला ग्रहण जो अमावस्या को होता है।
हठयोग में वह अवस्था जब पिंगला नाड़ी से होकर प्राण कुंडलिनी में पहुँचते हैं।
जो क्षत्रियों के सूर्यवंश में उत्पन्न हुआ हो।
एक मांगलिक कृत्य जिसमें बच्चे को, चार महीने का हो जाने पर सूर्य का प्रथम बार दर्शन कराया जाता है।
एक व्रत जो रविवार को किया जाता है।
सूर्य के समान दिप्ति या प्रकाशमान।
श्रीकृष्णकी पत्नी लक्ष्मणा के प्रासाद का नाम
सूर्य का लोक (जो यूद्ध में मरने वाले वीरों और सूर्य के भक्तों को प्राप्त होता है)।
क्षत्रियों का वह प्रधान कुल जिसकी उत्पत्ति सूर्य से मानी गयी है।
भाला चुभने की सी पीड़ा, कसक, दर्द।
उ.- (क) समुझि न चरन गहे गोबिंद के उर अघ सूल सही-१−३२४। (ख) जियत न जैहै सूल तुम्हारौ-९−३६। (ग) मन की सूल हरी-१०−२४। (घ) सूर सुबचन मनोहर कहि-कहि अनुज सूल बिसरायौ-३७४। (ङ) सुनि सुन्दरि यह समौ गए तें सूल नई-२५३७। (छ) बिद्यमान बिरह-सूल उर में जु समात-२५४३।
वायु के प्रकोप से पेट में उठनेवाली अत्यधिक पीड़ा।
किसी नुकीली चीज, जैसे काँटे या भाले, से छेदना।
किसी नुकीली चीज, जैसे काँटे या भाले, से छिदना।
लोहे का नुकीला डंडा या वैसा ही कोई उपकरण जिस पर बैठाकर या जिससे लटकाकर प्राचीन काल में प्राणदंड दिया जाता था।
उ.- ताहि सूल पर सूली दियौ। ताकौ बदलौ तुमसौं लियौ- ३-५।
सिर की वह पीड़ा जो सूर्योदय से आरंभ होकर दिन बढ़ने के साथ-साथ बढ़ती और घटने के साथ घटकर सूर्यास्त को शांत हो जाती है।
संध्याकाल में सूर्य का छिपना या डूबना।
प्रातःकाल सूर्य का निकलना या उदय होना।
सूर्य के उदय होने का समय।
सूर्य की पूजा, उपासना और व्रत करनेवाला व्यक्ति या वर्ग।
सूर्य की पूजा-उपासना या आराधना करना।
उ.- ताहि सूल पर सूली दयौ-३−५।
कोई चुभनेवाली नुकीली चीज, काँटा।
उ.- पै तिहिं रिषि-दृग जाने नाहिं। खेलत सूल दए तिन माहिं-९−३।