शादी
आनंदोत्सव।
संज्ञा
(फ़ा.)

शादी
विवाह।
संज्ञा
(फ़ा.)

शाद्वल
रेगिस्तानी हरियाली और बस्ती।
संज्ञा
(सं.)

शान
तड़क-भड़क, ठाठ-बाट।
संज्ञा
(अ.)

शान
ठसक, ऎंठ, अकड़।
संज्ञा
(अ.)
मुहा.-शान दिखाना-ठसक दिखाना।

शान
करामात, चमत्कार।
संज्ञा
(अ.)

शान
प्रतिष्ठा, मर्यादा।
संज्ञा
(अ.)
मुहा.-शान जाना-मान भंग होना। शान घटना-इज्जत में कमी होना। शान मारी जाना-मान कम हो जाना। शान में बट्टा लगना-मान में कमी हो जाना। किसी की शान में (कहना)-किसी (प्रतिष्ठित व्यक्ति) के संबंध में या उसके प्रति (कुछ कहना)।

शान
धार तेज करने का पत्थर।
संज्ञा
(सं. शाण)

शानदार
तड़क-भड़क या ठाटबाट का।
वि.
(अ. शान + फ़ा. दार)

शानदार
भव्य, विशाल।
वि.
(अ. शान + फ़ा. दार)

शानदार
वैभव या ऎश्वर्यपूर्ण।
वि.
(अ. शान + फ़ा. दार)

शानदार
ठसक भरा।
वि.
(अ. शान + फ़ा. दार)

शान-शौकत
तड़क भड़क, ठाठ, सजावट।
संज्ञा
(अ. शान + शौक़त)

शान-शौकत
वैभव, ऎश्वर्य।
संज्ञा
(अ. शान + शौकत)

शाप
अहित या अनिष्ट-कामना-सूचक शब्द या कथन, कोसना।
संज्ञा
(सं.)

शाप
फटकार, धिक्कार, भर्त्सना।
संज्ञा
(सं.)

शाप
किसी से रुष्ट होकर शपथपूर्वक ऎसी बात कहना जिसका परिणाम अनिष्टकारी हो।
संज्ञा
(सं.)

शापग्रस्त
जिसे शाप दिया गया हो।
वि.
(सं.)

शापन
शाप दॆने के उद्देश्य से।
संज्ञा
(सं. शाप)
उ.- दुर्बासा शापन को आए तिनकी कछु न चलाई-सारा. ७७२।

शापना
शाप देना।
क्रि.स.
(सं. शाप)

शापना
कोसना, अमंगल-कामना करना।
क्रि.स.
(सं. शाप)

शापमुक्त
जिस पर शाप का प्रभाव शेष न रहा हो, जिसने शाप का परिणाम भोग लिया हो।
वि.
(सं.)

शापित
जिसे शाप दिया गया हो।
वि.
(सं.)

शाबल्य
विभिन्न भावों, वस्तुओं, रंगों आदि का मेल या मिलावट।
संज्ञा
(सं.)

शाबाश
वाह, धन्य (प्रशंसासूचक)।
अव्य.
(फ़ा.)

शाबाशी
प्रशंसा, साधुवाद।
संज्ञा
(फ़ा.)

शाब्दिक
शब्द का, शब्द-संबंधी।
वि.
(सं.)

शाब्दिक
शब्द-शास्त्रज्ञ।
संज्ञा

शाब्दिक
वैयाकरण।
संज्ञा

शाब्दी
शब्द से संबंध रखनेवाली।
वि.
(सं.)

शाली
चुभ गयी।
क्रि.स.
(हिं. सालना)
उ.- फिरि चितवन उर शाली री-८४६।

शाली
एक प्रत्य जो 'संपन्न' या 'वाला' -जैसा अर्थ देता है।
प्रत्य.
(सं. शालिन्))

शालीन
विनीत।
वि.
(सं.)

शालीन
चतुर, दक्ष।
वि.
(सं.)

शालीनता
नम्रता।
संज्ञा
(सं.)

शालीय
शाला-संबंधी।
वि.
(सं.)

शालै
पीड़ित करता है।
क्रि.स.
(हिं. सालना)
उ.-तौ कत कठिन कठोर होत मन मोहिं बहुत दुख शालै-३४९१।

शाल्मलि
सेमल का वृक्ष।
संज्ञा
(सं.)

शाल्मलि
सात द्वीपों में एक जो ऊख रस के समुद्र से घिरा कहा गया है।
संज्ञा
(सं.)
उ.- सातो द्वीप¨¨¨¨¨¨ जंबू प्लक्ष क्रौंच, शाक, शाल्मलि कुश पुष्कर भरपूर-सारा. ३४।

शाल्यो, शाल्यौ
पीड़ा पहुँचायी।
क्रि.अ.
(हिं. सालना)
उ.-सौति शाल उर में अति शाल्यो-२६७३।

श्लिष्ट
जिसमे श्लेष हो, शलेषयुक्त।
वि.
(सं.)

श्लील
उत्तम।
वि.
(सं.)

श्लील
शुभ।
वि.
(सं.)

श्लेष
मिलना, जुड़ना।
संज्ञा
(सं.)

श्लेष
संयोग।
संज्ञा
(सं.)

श्लेष
आलिंगन।
संज्ञा
(सं.)

श्लेष
एक काव्यालंकार।
संज्ञा
(सं.)

श्लेष्मा
बलगम, कफ।
संज्ञा
(सं. श्लेष्मन्)

श्लोक
शब्द, ध्वनि।
संज्ञा
(सं.)

श्लोक
स्तुति, प्रशंसा।
संज्ञा
(सं.)

सूली
फाँसी, प्राणदंड।
संज्ञा
(सं. शूल)

सूली
शिव, महादेव।
संज्ञा
(सं. शूलिन्)

सूवना, सूवनो
बहना, प्रावहित होना।
क्रि.अ.
(सं. स्रवन)

सूवना, सूवनो
तोता, कीर।
संज्ञा
(हिं. सूआ)

सूवा
तोता, शुक।
संज्ञा
(हिं. सूआ)

सूव
बहता या प्रवाहित होता है।
क्रि.अ.
(हिं. सूवना)
उ.- कहा करौं अति सूवै नयना, उमँगि चलत पग पानी।

सूस
एक जलजंतु।
संज्ञा
(हिं. सूँस)

सूसमार
सूस नामक जलजंतु।
संज्ञा
(सं. शिंशुमार)

सूसला
खरगोश।
संज्ञा
(सं. शश)

सूसि
एक जलजंतु।
संज्ञा
(हिं. सूस)

सूहा
एक तरह का लाल रंग।
संज्ञा
(हिं. सोहना)

सूहा
एक संकर रांग।
संज्ञा
(हिं. सोहना)

सूहा
लाल रंग का।
वि.

सूही
लाल रंग का, लाल।
वि.
(हिं. सूहा)

सृंखल
हथकड़ी-बेड़ी।
संज्ञा
(सं. श्रृंखल)

सृंखल
जो क्रम से हो, व्यवस्थित।
वि.

सृंखलता
क्रम के अनुसार और व्यवस्थित होने की दशा या भाव।
संज्ञा
(सं. श्रृंखलता)

सृंखला
पिरोयी हुई कड़ियों का समूह।
संज्ञा
(श्रृंखला)

सृंखला
जंजीर, साँकल।
संज्ञा
(श्रृंखला)

सृंखला
माला।
संज्ञा
(श्रृंखला)

सृंखला
कतार, पंक्ति, श्रेणी।
संज्ञा
(श्रृंखला)

सृंखला
एक काव्यालंकार।
संज्ञा
(श्रृंखला)

सृंग
पहाड़ की चोटी या शिखर।
संज्ञा
(सं. श्रृंग)

सृंग
सींग।
संज्ञा
(सं. श्रृंग)
उ.- (क) पाउँ चारि सिर सृंग गुंग मुख तब कैंसैं गुन गैहौ-१−३३१। (ख) सर्प इक आइ बहुरि तुम्हरैं निकट, ताहि सौं नाव मम सृंग बाँधौ-८−१६।

सृंग
कँगूरा।
संज्ञा
(सं. श्रृंग)

सृंग
सींग का बना एक तरह का बाजा।
संज्ञा
(सं. श्रृंग)
उ.- सृंग-बेनु-नाद करत, मुरली मधु अधर धरत-६१९।

सृंगार
सजावट।
संज्ञा
(सं. श्रृंगार)

सृंगार
वह जिससे शोभा बढ़े।
संज्ञा
(सं. श्रृंगार)

सृंगार
गहने-कपड़ों से अपने आपको सजाना।
संज्ञा
(सं. श्रृंगार)

सृंगार
साहित्य के नौ रसों में एक जो ‘रसराज’ कहा जाता है।
संज्ञा
(सं. श्रृंगार)

सृंगारना, सृंगारनो
सजाना।
क्रि.स.
(सं. श्रृंगारना)

सृंगारिया
देव-मूर्ति का श्रृंगार करनेवाला।
वि.
(सं. श्रृंगारिया)

सृंगी
हाथी।
संज्ञा
(सं. श्रृंगी)

सृंगी
पहाड़।
संज्ञा
(सं. श्रृंगी)

सृंगी
सींगवाला पशु।
संज्ञा
(सं. श्रृंगी)

सृंगी
सींग का बना हुआ एक प्रकार का बाजा।
संज्ञा
(सं. श्रृंगी)
उ.- मुरली बेंत बिषान देखियो सृंगी बेर सबेरो। लै जिनि जाइ चुराइ राधिका कछुक खिलौना मेरो-२९६५।

सृंगी
शिव, महादेव।
संज्ञा
(सं. श्रृंगी)

सृंगी
एक प्राचीन ऋषि जिनके शाप से परीक्षित को तक्षक नाग ने काटा था।
संज्ञा
(सं. श्रृंगी)
उ.- रिषि समाधि महँ त्यौंही रहयौ। सृंगी रिषि सौं लरिकन कहयौ। ¨¨¨। नृपति दोष कहियै किहिं जाइ। दियौ साप तिहिं तच्छक खाइ-१−२९०।

सृक
भाला, शूल।
संज्ञा
(सं.)

सृक
तीर, वाण।
संज्ञा
(सं.)

सृगाल
सियार, गीदड़।
संज्ञा
(सं. श्रृगाल)
उ.- (क) सिंह कौ भच्छ सृगाल न पावै-९−७९। (ख) आइ सृगाल सिंह बलि चाहत, यह मरजाद जात प्रभु तेरी-९−९३। फिरत सृगाल सज्यौ सव काटत चलत सो सिर लै भागी-९−१५८।

सृगाल
धोखेबाज धूर्त।
संज्ञा
(सं. श्रृगाल)

सृगाल
डरपोक, कायर।
संज्ञा
(सं. श्रृगाल)

सृगालिका
गीदड़ी. सियारिन।
संज्ञा
(सं. श्रृगालिका)

सृगालिका
लोमड़ी।
संज्ञा
(सं. श्रृगालिका)

सृगालिनी, सृगाली
गीदड़ी।
संज्ञा
(सं. श्रृगाल)

सृजक
रचना करनेवाला।
वि.
(सं. सृज)

सृजत
रचता है।
क्रि.स.
(हिं. सृजना)
उ.- पालत सृजत सँहारत सैंतत अंड अनेक अवधि पल आधे-९−५८।

सृजन
सृष्टि या रचना करने की क्रिया, उत्पादन।
संज्ञा
(सं. सृज्, सर्जन)

सृजन
सृष्टि, उत्पत्ति।
संज्ञा
(सं. सृज्, सर्जन)

सृक
हवा, वायु।
संज्ञा
(सं.)

सृक
कमल का फूल।
संज्ञा
(सं.)

सृक
हार, माला।
संज्ञा
(सं. स्रज, स्रक)
उ.- (क) सूर परस्पर करत कुलाहल गर सृक (पाठा.- सृग) पहिरावैनी-९−११। (ख) की सृक सीपज की बग-पंगति की मयूर की पीड पखी री-१६२७।

सृकाल
सियार।
संज्ञा
(सं. श्रृगाल)

सृक्क, सृक्व
ओठों का छोर, मुँह का कोना।
संज्ञा
(सं. सृक्व)

सृग
भाला, बरछा।
संज्ञा
(सं. सृक)

सृग
तीर, वाण।
संज्ञा
(सं. सृक)

सृग
हवा, वायु।
संज्ञा
(सं. सृक)

सृग
कमल का फूल।
संज्ञा
(सं. सृक)

सृग
हार, गजारा, माला।
संज्ञा
(सं. स्रज, स्रक)
उ.- गर-सृग पहिरावैनी-९−११।

सृजन
छोड़ने या निकालने की क्रिया।
संज्ञा
(सं. सृज्, सर्जन)

सृजनहार, सृजनहारा, सृजनहारो
रचने, बनाने या उत्पन्न करनेवाला।
वि.
(हिं. सृजन+हार, हारा)

सृजना, सृजनो
रचना, बनाना, सृष्टि करना।
क्रि.स.
(सं. सृज+हिं. ना)

सृत
जो खिसक गया हो।
वि.
(सं.)

सृत
जो चला गया हो, गत।
वि.
(सं.)

सृति
रास्ता, मार्ग।
संज्ञा
(सं.)

सृति
जन्म।
संज्ञा
(सं.)

सृति
चलना, गमन।
संज्ञा
(सं.)

सृति
आवागमन।
संज्ञा
(सं.)

सृति
सरकना।
संज्ञा
(सं.)

सृति
खिसकना।
संज्ञा
(सं.)

सृष्ट
पैदा, उत्पन्न।
वि.
(सं.)

सृष्ट
रचित, निर्मित।
वि.
(सं.)

सृष्ट
छोड़ा या निकाला हुआ।
वि.
(सं.)

सृष्ट
व्यक्त।
वि.
(सं.)

श्वासा
साँस।
संज्ञा
(सं. श्वास)
उ.- श्वासा तासु भए श्रुति चार।

श्वासा
प्राणवयु, प्राण।
संज्ञा
(सं. श्वास)

श्वासोच्छवास
वेग से साँस खींचना और निकालना।
संज्ञा
(सं.)

श्वेत
सफेद, धवल, निर्मल, उज्ज्वल।
वि.
(सं.)
उ.- श्वेत छत्र मनो प्राची दिशि उदय कियो निशि राका-२५६६।

श्वेत काक
सफेद कौआ अर्थात् (जो बात असंभव हो)।
संज्ञा
(सं.)

श्वेत गज
ऎरावत हाथी।
संज्ञा
(सं.)
उ.- अप्सरा पारजातक धनुष अश्व गज श्वेत ए पाँच सुरपतिहिं दीन्हें-८-८।

श्वेतता
सफेदी, उज्ज्वलता।
संज्ञा
(सं.)

श्वेतभानु
चंद्रमा।
संज्ञा
(सं.)

श्वेतांबर
सफेद वस्त्र पहननेवाला।
संज्ञा
(सं.)

श्वेतांबर
जैनियों के दो प्रधान संप्रदायों में एक।
संज्ञा
(सं.)

श्वेतांशु
चंद्रमा।
संज्ञा
(सं.)

ष-देवनागरी वर्णमाला का इकतीसवाँ वर्ण जो मूर्द्धा से उच्चरित होने के कारण 'मूर्द्धन्य' कहलाता है। प्राचीन काव्य-भाषा में इसका उंच्चारण कभी 'ख' और कभी 'श' के समान होता है।

षंड
नामर्द, नपुंसक।
संज्ञा
(सं.)

षंडामर्क
शुक्राचार्य के पुत्र का नाम जो प्रहलाद का शिक्षा-गुरु था।
संज्ञा
(सं.)
उ.- षंडामर्क जो पूछन लाग्यो तब यह उत्तर दीन-सारा. ११२।

षट, षट्
(गिनती में) छह।
वि.
(सं.)

षट, षट्
छह की संख्या।
संज्ञा

षटकोण
जिसमें छह कोण हों।
वि.
(सं.)

षटचक्र
कुंडलिनी के ऊपर पड़नेवाले छह चक्र।
संज्ञा
(सं.)

षटचक्र
कुचक्र।
संज्ञा
(सं.)

षटचरण
भौंरा, भ्रमर।
संज्ञा
(सं.)

षटताल
मृदंग की एक ताल।
संज्ञा
(सं.)

षटतिला
माघ कृष्ण एकादशी जब तिल खाने और दान करने का माहात्म्य है।
संज्ञा
(सं.)

षटदर्शन
भारतीय आर्यों के छह दर्शन या शास्त्रः यथा-सांख्य, मीमांसा, न्याय, वैशेषिक, योग और वेदांत।
संज्ञा
(सं.)

षटदश
सोलह।
वि.
(सं. षट्+दश)
उ.- षट्दश सहस कन्या असुर बंदि में नींद अरु भूख अहनिशि बिसारी-१० उ.-३१।

षटपद
छह पैरवाला।
वि.
(सं.)

षटपद
भौरा, भ्रमर।
संज्ञा
उ.- सूरदास पूरो दै षट्दश कहत फिरत हो सोई-३०२२।

षटपदी
छह पैरवाली।
वि.
(सं.)

षटपदी
भौरा, भ्रमरी।
संज्ञा

षटरस
छह प्रकार के स्वाद या रस-मधुर लवण, तिक्त, कटु, कषाय और अम्ल।
संज्ञा
(सं.)
उ.- बहु ब्यंजन बहु भाँति रसोई, षटरस के परकार-३९४।

षटरस
छह प्रकार के स्वादवाल।
वि.
उ.- षटरस ब्यंजन छाँड़ि रसोई साग बिदुर घर खाए-१-२४४।

षटराग
संगीत के छह राग-भैरव, मलार, श्रीराग, हिंडोल, मालकोस और दीपक।
संज्ञा
(सं. षट् + राग)

षटराग
बखेड़ा, जंजाल, झंझट।
संज्ञा
(सं. षट् + राग)

षटवांग
एक राजर्षि जिन्होंने इंद्र की सहायता की थी और जो केवल दो घड़ी की साधना से मुक्त हो गये थे।
संज्ञा
(सं.)
उ.- (क) नृप षट्वांग पूर्व इक भयौ, सु तौ द्वै घरी मैं तरि गयौ-१-३४२। (ख) ज्यौं षट्वांग तरथौ गुन गाइ। नृप षट्वांग भयौ भुव माहिं।¨¨¨¨ इंद्रपुरी षट्वांग सिधाए-१-२४३।

षडानन
जिसके छह मुख हों।
वि.
(सं.)

षडानन
स्वामिकार्तिक।
संज्ञा

षड्ज
संगीत के सात स्वरों में चौथा।
संज्ञा
(सं.)

षड्दर्शन
न्याय आदि छह दर्शन।
संज्ञा
(सं.)

षड्यंत्र
जाल, कुचक्र।
संज्ञा
(सं.)

षड्रस
छह प्रकार के स्वाद या रस-नमकीन, तीता, कड़ुवा, कसैला और खट्टा।
संज्ञा
(सं.)

षड्रिपु
काम, क्रोध आदि छह दोष जो प्राणी के शत्रु हैं।
संज्ञा
(सं.)

षष्टि
साठ।
वि.
(सं.)

षष्ठ
छठा।
वि.
(सं.)

षष्ठी
किसी पक्ष का छठा दिन।
संज्ञा
(सं.)

षष्ठी
संबंधकारक (व्याकरण)।
संज्ञा
(सं.)

षष्ठी
बालक के जन्म का छठा दिन या उस दिन का उत्सव।
संज्ञा
(सं.)

षाड़व
वे राग जिसमें केवल छह स्वर, स रे ग म प और ध लगते है, निषाद वर्जित है।
संज्ञा
(सं.)

षाण्मासिक
छमाही।
वि.
(सं.)

षोडश
सोलह।
वि.
(सं. षोडशन्)

षोडश
सोलहवाँ।
वि.
(सं. षोडशन्)

षोडश
सोलह की संख्या।
संज्ञा

षोडश, श्रृंगार
स्त्री का पूर्ण श्रृंगार जिसके सोलह अंग हैं।
संज्ञा
(सं.)

षोडश संस्कार
सोलह संस्कार-गर्भाधान, पुंसवन, सीमंतोन्नयन, , नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, यज्ञोपवीत, केशांत, समावर्तन और विवाह।
संज्ञा
(सं.)

षोडशी
सोलह से संबंधित, सोलहवीं।
वि.
(सं.)

षोडशी
सोलह वर्ष की (युवती)।
वि.
(सं.)

षोडशी
सोलह वर्ष की युवती।
संज्ञा

षोडशोपचार
पूजा के सोलह अंग-आवाहन, आसन, अर्ध्यपाद्य, आचमन, मधुपर्क, स्नान, वस्त्राभरण, यज्ञोपवीत, गंध (चंदन), पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, तांबूल, परिक्रमा और बंदना।
संज्ञा
(सं.)

षोड़स
सोलह।
वि.
(सं. षोडश)
उ.- षोड़स जुक्ति, जुवति चित षोड़स, षोड़स बरस निहारे-१-६०।

देवनागरी वर्णमाला का बत्तीसवाँ व्यंजन जिसका उच्चारण-स्थान दंत है।

सं
एक अव्यय जो शब्द के आदि में जुड़कर शोभा, समानता, निरंतरता, औचित्य आदि सूचित करता है।
अव्य
(सं. सम्)

सं
से।
अव्य
(सं. सम)

संकट
दो पहाड़ों के बीच का तंग रास्ता, दर्रा।
संज्ञा
(सं. सम + कृत, प्रा. संकट)

संकटा
एक प्रसिद्ध देवी।
संज्ञा
(सं.)

संकना, संकनो
डरना, भयभीत होना।
क्रि.अ.
(सं. शंका)

संकना, संकनो
शंका या संदेह करना।
क्रि.अ.
(सं. शंका)

सँकर
जंजीर।
संज्ञा
(सं. श्रृंखला)

सँकर
संकर।
संज्ञा
(हिं. संकर)

सँकर
तंग, सँकरा।
वि.
(हिं. सँकरा)

संकर
दो चीजों का मिलना।
संज्ञा
(सं.)

संकर
वह जिसकी उत्पत्ति भिन्न वर्णों या जातियों के स्त्री-पुरूष से हुई हो, दोगला।
संज्ञा
(सं.)

संकर
साहित्य में दो या अधिक अलंकारों की साथ-साथ प्रयुक्त होने की स्थिति-विशेष।
संज्ञा
(सं.)

संकर
दो या अधिक के योग से बना हुआ।
वि.

संकर
जो भिन्न वर्णों या जातियों के स्त्री-पुरूष से उत्पन्न हो, दोगला।
वि.

संकर
शिव, महादेव।
संज्ञा
(सं. शंकर)
उ.- (क) सनक संकर ध्यान धारत-१-३०८। (ख) संकर पारबती उपदेसत-२-३।

संकर घरनी
पार्वती।
संज्ञा
(सं. शंकर +गृहिणी)

संकरता
मिश्रित होने का भाव या धर्म, मिलावट।
संज्ञा
(सं.)

संकरता
दोगलापन।
संज्ञा
(सं.)

सँकरा
कम चौड़ा, पतला।
वि.
(सं. संकीर्ण)

सँकरा
कष्ट, दुख, विपत्ति।
संज्ञा

सँकरा
साँकल, जंजीर।
संज्ञा
(सं. श्रृंखला)

सँकराई
विपत्ति, दुख।
संज्ञा
(हिं. सँकरा)
उ.- श्री रघुबीर मोसौं जन जाकै, ताहि कहा सँकराई-९-१४६।

सँइतना
जोड़ना, इकट्ठा करना।
क्रि.स.
(सं. संचय)

सँइतना
सहेजना, सँभालना।
क्रि.स.
(सं. संचय)

सँउपना
देना, अर्पित करना।
क्रि.स.
(हिं. सौंपना)

संक
डर, भय।
संज्ञा
(सं. शंक)
उ.- (क) अजहुँ नाहिं संक धरत बानर मति-भंगा-९-९७। (ख) होइ सनमुख भिरौं, संक नहिं मन धरौं-९-१२९।

संक
संकोच।
संज्ञा
(सं. शंक)
उ.- इक अभरत लेहिं उतारि, देत न संक करै-१०-२४।

संक
संदेह।
संज्ञा
(सं. शंक)

संक
अनिष्टाशंका।
संज्ञा
(सं. शंक)

संकट
विपत्ति, दुख, कष्ट।
संज्ञा
(सं. सम + कृत, प्रा. संकट)
उ.- (क) काके हित श्रीपति ह्याँ ऐहैं, संकट रच्छा करिहैं-१-२९। (ख) सूर तुम्हारी आसा निबहै, संकट मैं तुम साथै-१-११२। (ग) संकट परैं जो सरन पुकारौं, तौ छत्री न कहाऊँ-९-१३२।

संकट
भीड़, समूह।
संज्ञा
(सं. सम + कृत, प्रा. संकट)

संकट
जल या थल के दो बड़े भागों को जोड़नेवाला पतला भाग।
संज्ञा
(सं. सम + कृत, प्रा. संकट)

शास्त्रज्ञ
शास्त्रों का ज्ञाता या वेत्ता।
वि.
(सं.)

शास्त्री
वह जो शास्त्रों का ज्ञाता हो।
संज्ञा
(सं.)

शास्त्री
आधुनिक विश्वविद्यालयों की एक उपाधि।
संज्ञा
(सं.)

शास्त्रीय
शास्त्र-सम्बन्धी।
वि.
(सं.)

शास्त्रोक्त
शास्त्रों में कहा हुआ।
वि.
(सं.)

शाह
बादशाह।
संज्ञा
(फ़ा.)

शाह
मुसलमान फकीरों की उपाधि।
संज्ञा
(फ़ा.)

शाह
धनी, महाजन।
संज्ञा
(फ़ा.)

शाहदरा
महल या किले नीचे बसी हुई आबादी या बस्ती।
संज्ञा
(फ़ा.)

शाही
शाहों का, राजसी।
वि.
(फ़ा.)

संकलपना, संकलपनो
मंत्र-विशेष पढ़कर दान देना या धर्म-कार्य करने का निश्चय करना।
क्रि.स.
(सं. संकल्प)

संकलपना, संकलपनो
इरादा या विचार होना।
क्रि.अ.

संकलपना, संकलपनो
संकल्प करने की क्रिया
संज्ञा

संकलपना, संकलपनो
इच्छा, कामना, अभिलाषा।
संज्ञा

संकला
साँकल, जंजीर।
संज्ञा
(सं. श्रृंखला)

संकलित
चुना हुआ, संगृहीत।
वि.
(सं.)

संकलित
इकट्ठा या एकत्र किया हुआ।
वि.
(सं.)

संकलित
जोड़ा हुआ, योजित।
वि.
(सं.)

संकल्प
पक्का विचार, दृढ़ निश्चय।
संज्ञा
(सं.)
उ.- (क) करि संकल्प अन्न-जल त्याग्यौ-१-३४१। (ख) गए कटि नीर लौं नित्य संकल्प करि करत स्नान इक भाव देख्यो-२५५४।

संकल्प
दान, पुण्य आदि के पूर्व मंत्रोच्चारण द्वारा अपना विचार व्यक्त करना।
संज्ञा
(सं.)
उ.- जब नृप भुव संकल्प कियो है, लागे देह पसारन-सारा. ३३९।

सँकराना, सँकरानो
सँकरा या संकुचित करना।
क्रि.स.
(हिं. सँकरा)

सँकराना, सँकरानो
बंद करना।
क्रि.स.
(हिं. सँकरा)

सँकराना, सँकरानो
सँकरा होना।
क्रि.अ.

सँकराना, सँकरानो
बंद होना, मुँदना।
क्रि.अ.

संकरी
दोगला।
वि.
(हिं. संकर)

संकरी
पार्वती।
संज्ञा
(सं. शंकरी)

संकर्षण, संकर्षन
खींचना।
संज्ञा
(सं. संकर्षण)

संकर्षण, संकर्षन
हल जोतना।
संज्ञा
(सं. संकर्षण)

संकर्षण, संकर्षन
श्रीकृष्ण के भाई बलराम जिनका आयुध हल था।
संज्ञा
(सं. संकर्षण)
उ.- (क) कालिनाग के फन पर निरतत संकर्षन को बीर-५७५। (ख) सूर प्रभु आकरषि ताते संकर्षण है नाम-३४८२।

संकर्षण, संकर्षन
एक वैष्णव संप्रदाय जिसके प्रवर्तक निंबार्क थे।
संज्ञा
(सं. संकर्षण)

संकल
जंजीर, साँकल।
संज्ञा
(सं. श्रृंखला)

संकलन
एकत्र या संग्रह करना।
संज्ञा
(सं.)

संकलन
संग्रह।
संज्ञा
(सं.)

संकलन
जोड़, योग।
संज्ञा
(सं.)

संकलन
ग्रंथों या पत्र-पत्रिकाओं से प्रसंग या प्रबंध-विशेष चुनने की क्रिया।
संज्ञा
(सं.)

संकलन
वह ग्रंथ जो इस प्रकार चुनकर तैयार किया गया हो।
संज्ञा
(सं.)

संकलप
पक्का विचार, दृढ़ निश्चय।
संज्ञा
(सं. संकल्प)

संकलप
दान, पुण्य आदि के पूर्व मंत्रोच्चारण से अपना विचार व्यक्त करना।
संज्ञा
(सं. संकल्प)

संकलप
वह मंत्र जिससे ऎसा विचार व्यक्त किया जाय।
संज्ञा
(सं. संकल्प)

संकलपना, संकलपनो
पक्का विचार या दृढ़ निश्चय करना।
क्रि.स.
(सं. संकल्प)

संकाइ
भयभीत होकर।
क्रि.अ.
(हिं. संकाना)
उ.- तब संडामर्का संकाइ, कह्यौ असुर-पति सौं यौं जा-७-२।

संकाना, संकानो
डरना, भयभीत होना।
क्रि.अ.
(सं. शंक)

संकाना, संकानो
शंकित होना।
क्रि.अ.
(सं. शंक)

संकाना, संकानो
डराना, भयभीत करना।
क्रि.स.

संकाना, संकानो
आशंकित करना।
क्रि.स.

संकार
इशारा, संकेत।
संज्ञा
(सं. संकेत)

संकारना, संकारनो
इशारा या संकेत करना।
क्रि.स.
(हिं. संकेत)

संकाश
मिलता-जुलता, समान, सदृश।
वि.
(सं.)

संकाश
पास, निकट, समीप।
वि.
(सं.)

संकीर्ण
तंग, सँकरा, संकुचित।
वि.
(सं.)

संकल्प
वह मंत्र जिसके द्वरा ऎसा विचार व्यक्त किया जाय।
संज्ञा
(सं.)

संकल्पना, संकलपनो
पक्का विचार या दृढ़ निश्चय करना।
क्रि.स.
(सं. संकल्प)

संकल्पना, संकलपनो
मंत्र पढ़कर दान, पुण्य आदि का निश्चय व्यक्त करना।
क्रि.स.
(सं. संकल्प)

संकल्पना, संकलपनो
इरादा या विचार होना।
क्रि.अ.

संकल्पना, संकलपनो
दृढ़ निश्चय होना।
क्रि.अ.

संकल्पना, संकलपनो
संकल्प करने की क्रिया।
संज्ञा

संकल्पना, संकलपनो
इच्छा, कामना, अभिलाषा।
संज्ञा

संकल्पित
संकल्प किया हुआ।
वि.
(सं. संकल्प)
उ.- नापौ देह हमारी द्विजवर सो संकल्पित कीन्हों-सारा. ३४१।

संका
डर, भय, संकोच।
संज्ञा
(सं. शंका)
उ.- (क)पहुँचे जाइ महर-मंदिर मैं, मनहिं न संका कीनी-१०-४। (ख) जब दधि-सुत हरि हाथ लियौ। खगपति-अरि डर, असुरनि संका, बासर-पति आनंद कियौ-१०-१४३। (ग) जनि संका जिय करौ लाल मेरे, काहे कौ भरमावहु-१०-१७९। (घ) भजी निसंक आइ तुम मोकौं गुरुजन की संका नहिं मानी-पृ. ३४३ (२०)।

संका
संदेह, आशंका।
संज्ञा
(सं. शंका)

संकीर्ण
छोटा, क्षुद्र।
वि.
(सं.)

संकीर्ण
नीच, तुच्छ।
वि.
(सं.)

संकीर्ण
जो उदार न हो अनुदार।
वि.
(सं.)

संकीर्ण
मिला हुआ, मिश्रित।
वि.
(सं.)

संकीर्ण
मिश्रित या संकर राग।
संज्ञा

संकीर्णता
सँकरापन।
संज्ञा
(सं.)

संकीर्णता
छोटापन।
संज्ञा
(सं.)

संकीर्णता
नीचता।
संज्ञा
(सं.)

संकीर्णता
अनुदारता।
संज्ञा
(सं.)

संकीर्तन
कीर्ति का भली भाँति वर्णन करना।
संज्ञा
(सं. संकीर्त्तन)

संकीर्तन
देवता आदि की उचित रीति से की गयी वंदना, भजन आदि।
संज्ञा
(सं. संकीर्त्तन)

संकु
नुकीली वस्तु।
संज्ञा
(पुं. शंकु)

संकु
मेख।
संज्ञा
(पुं. शंकु)

संकु
भाला, बरछा।
संज्ञा
(पुं. शंकु)

संकु
एक बाजा।
संज्ञा
(पुं. शंकु)

संकुचन
सिकुड़ना।
संज्ञा
(सं.)

संकुचित
लज्जा या संकोचयुक्त।
वि.
(सं.)

संकुचित
सिमटा, मुँदा या सिकुड़ा हुआ।
वि.
(सं.)
उ.- (क) जनु रविगत संकुचित कमल-जुग निसि अलि उड़न न पावँ-१०-६५। (ख) कुमुद्ध-बृंद संकुचित भए-१०-२०२।

संकुचित
तंग, सँकरा, संकीर्ण।
वि.
(सं.)

संकुचित
अनुदार।
वि.
(सं.)

संकुचित
अच्छे विचार न ग्रहण करनेवाला।
वि.
(सं.)

संकुल
घना।
वि.
(सं.)

संकुल
भरा हुआ, परिपूर्ण।
वि.
(सं.)

संकुल
मिला हुआ, युक्त।
वि.
(सं.)

संकुल
लड़ाई, युद्धंग।
संज्ञा

संकुल
झुंड, समूह, भीड़।
संज्ञा

संकुल
परस्पर विरोधी वाक्य।
संज्ञा

संकुलित
घना।
वि.
(सं.)

संकुलित
भरा हुआ, परिपूर्ण।
वि.
(सं.)

संकुलित
एकत्र।
वि.
(सं.)

संकुलित
सिकुड़ा हुआ।
वि.
(सं.)

सँकेत
कष्ट, संकट।
संज्ञा
(सं. संकष्ट)

संकेत
इशारा, इंगित।
संज्ञा
(सं.)

संकेत
स्थान जहाँ प्रेमी-प्रेमिका मिलना निश्चित करें।
संज्ञा
(सं.)

संकेत
निशान, चिह्न।
संज्ञा
(सं.)

संकेत
पते की बात।
संज्ञा
(सं.)

संकेत
घटना आदि का सूचक संक्षिप्त उल्लेख।
संज्ञा
(सं.)

संकेतना, संकेतनो
संकट या कष्ट में डालना।
क्रि.स.
(सं. संकीर्ण)

संकेतना, संकेतनो
संकेत करना।
क्रि.स.
(सं. संकेत)

संकेत विघट्टना
वह नायिका जो संकेतस्थल के नष्ट होने से दुखी हो।
संज्ञा
(सं.)

संकोचना, संकोचनो
संकुचित करना।
क्रि.स.
(सं. संकोच)

संकोचना, संकोचनो
संकोच करना।
क्रि.स.
(सं. संकोच)

संकोचित
जिसमें संकोच हो।
वि.
(सं.)

संकोचित
जो खिला या विकसित न हो।
वि.
(सं.)

संकोचित
लज्जित।
वि.
(सं.)

संकोचित
तलवार चलाने का एक ढंग।
संज्ञा

संकोची
सिकुड़नेवाला।
वि.
(सं.)

संकोची
लज्जा या संकोच करनवाला।
वि.
(सं.)

सँकोचै, संकोचै
संकोच न करे।
क्रि.अ.
(हिं. संकोचना)
उ.-सूरदास जौ बिधि न सँकोचै, तौ बैकुंठ न जाउँ-९-१६५।

संकोपना, संकोपनो
क्रुद्ध या अप्रसन्न होना।
क्रि.अ.
(सं. संकोप)

शिंगरफ
ईंगुर।
संज्ञा
(देश. ?)

शिंजन
झनकार, झनझनाहट।
संज्ञा
(सं.)

शिंजा
करधनी, नूपुर आदि की झनकार।
संज्ञा
(सं.)

शिंजा
धनुष की डोरी।
संज्ञा
(सं.)

शिंजित
झनकार करता हुआ।
वि.
(सं.)

शिंजिनी
करधनी या नूपुर के घुँघरू।
संज्ञा
(सं.)

शिंजिनी
धनुष की डोरी।
संज्ञा
(सं.)

शिंशपा, शिंशुपा
शीशम का पेड़।
संज्ञा
(सं. शिंशपा)

शिंशपा, शिंशुपा
अशोक का पेड़।
संज्ञा
(सं. शिंशपा)

शिकंजवी
फल के रस को ठंढे या गरम पानी में डालकर बनाया गया पेय।
संज्ञा
(फ़ा. शिकंजवीन)

सकेतित
जिसके संबंध में संकेत किया जाय।
वि.
(सं.)

सँकेलना, सँकेलनो
समेटना, एकत्र करना।
क्रि.स.
(हिं. सकेलना)

सँकेलना, सँकेलनो
सहेजना, सँभालना।
क्रि.स.
(हिं. सकेलना)

सँकोच, संकोच
खिंचाव, तनाव।
संज्ञा
(सं.)

सँकोच, संकोच
कुछ-कुछ लज्जा।
संज्ञा
(सं.)
उ.- मेरो अलकलड़ैतो मोहन ह्वैहै करत सँकोच-२७०७

सँकोच, संकोच
डर, भय।
संज्ञा
(सं.)
उ.- जारौं लंक, छेदि दस मस्तक सुर-संकोच निवारौं-९-१३२।

सँकोच, संकोच
आगा-पीछा, हिचकिचाहट।
संज्ञा
(सं.)

सँकोच, संकोच
बहुत सी बात को थोड़े में कहना।
संज्ञा
(सं.)

सँकोच, संकोच
एक काव्यालंकार।
संज्ञा
(सं.)

संकोचन
सिकुड़ने की क्रिया।
संज्ञा
(सं.)

संक्यो, संक्यौ
आशंकित या भयभीत हो गया।
क्रि.अ.
(हिं. संकना)
उ.- कंप्यौ गिरि अरु सेष संक्यौ, उदधि चल्यौ अकुलाइ-१०-१६६।

संक्रंदन
इंद्र।
संज्ञा
(सं.)

संक्रंदन
क्रंदन।
संज्ञा
(सं.)

संक्रमण
चलना, गमन।
संज्ञा
(सं.)

संक्रमण
घूमना-फिरना।
संज्ञा
(सं.)

संक्रमण
अतिक्रमण।
संज्ञा
(सं.)

संक्रमण
एक अवस्था से दूसरो में पहुँचना।
संज्ञा
(सं.)

संक्रमण
एक के हाथ से दूसरे हाथ या अन्य के अधिकार में पहुँचना।
संज्ञा
(सं.)

संक्रमिक
जो अंतरित या हस्तांतरित हुआ हो।
वि.
(सं.)

संक्रांत
प्राप्त।
वि.
(सं.)

संक्रांत
बीता हुआ।
वि.
(सं.)

संक्रांति
सूर्य का एक राशि से दूसरी में प्रवेश।
संज्ञा
(सं.)

संक्रांति
एक राशि से दूसरी में सूर्य के प्रवेश का समय।
संज्ञा
(सं.)

संक्रांति
वह दिन जब सूर्य एक राशि से दूसरी में प्रवेश करता है। हिन्दुओं में यह दिन एक पर्व माना जाता है।
संज्ञा
(सं.)

संक्रामक
जो (रोग) छूत या संसर्ग से फैले।
वि.
(सं.)

संक्रामण
अंतरित या हस्तांतरित करने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(सं.)

संक्रामित
जिसका संक्रामण हो।
वि.
(सं.)

संक्रोन
संक्रांति।
संज्ञा
(सं. संक्रांति)

संक्षिप्त
जो संक्षेप में कहा या लिखा जाय।
वि.
(सं.)

संक्षिप्त
थोड़ा, अल्प।
वि.
(सं.)

संक्षेप
थोड़े में कहना या लिखना।
संज्ञा
(सं.)

संक्षेप
विस्तार से कही या लिखी गयी बात का सार।
संज्ञा
(सं.)

संक्षेपण
संक्षिप्त रूप या सार प्रस्तुत करने की क्रिया।
संज्ञा
(सं.)

संक्षेपन
संक्षिप्त या सार रूप में।
अव्य.
(सं.)
उ.- वर्णन कियो प्रथम संक्षेपन अबहूँ वर्ण न पाये-सारा. ५३१।

संक्षेपतः
थोड़े या संक्षेप में।
अव्य.
(सं.)

संख
बड़ा घोंघा, कंबु, कंबोज।
संज्ञा
(सं. शंख)
उ.- संख कुलाहल सुनियन लागे-९-१२५।

संख
एक लाख करोड़ की संख्या।
संज्ञा
(सं. शंख)
उ.- केतिक संख जुगै जुग बीते मानव असुर अहार-९-३२।

संख
शंखासुर जो देवताओं को जीतकर वेद चुरा ले गया था जिनके उद्धार के लिए भगवान को मत्स्यावतार धारण करना पड़ा था।
संज्ञा
(सं. शंख)
उ.- चतुरमुख कह्यौ, संख असुर स्रुति तौ गयौ-८-१६।

संख
सागर-मंथन से निकले चौदह रत्नों में एक जो विष्णु को मिला था।
संज्ञा
(सं. शंख)
उ.- संख कौस्तुभ मनि लई पुनि आपु हरि-८-८।

संखचूड़
कंस का अनुचर एक दैत्य जिसे श्रीकृष्ण ने मारा था।
संज्ञा
(सं. शंखचूड़)
उ.- संखचूड़, मुष्टिक, प्रलंब अरु तृनावर्त संहारे-१-२७।

संखधर
शंख धारण करनेवाले विष्णु या उनके अवतार राम और कृष्ण।
संज्ञा
(सं. शंखधर)
उ.- संख-चक्र-धर, गदा-पद्म-धर-५७२।

संखासुर
एक दैत्य जो देवताओं को हराकर, वेदों को चुरा ले गया था जिनके उद्धार के लिए विष्णु ने मत्स्यावतार धारण किया था।
संज्ञा
(सं. शंखासुर)
उ.- (क) बहुरि संखासुरहिं मारि वेदाऽनि दिए-८-१६। (ख) चारि बेद लै गयौ सँखासुर, जल मैं रह्यौ लुकाई। मीन रूप धरिकै जब मारथौ-१०-२२१।

संखिया
एक प्रसिद्ध विष।
संज्ञा
(सं. श्रृंगिका)

संख्यक
संख्यायुक्त।
वि.
(सं.)

संख्या
एक, दो, तीन आदि गिनती।
संज्ञा
(सं.)

संख्या
अदद, अंक।
संज्ञा
(सं.)

सँग, संग
मिलना, मिलन।
संज्ञा
(सं. सङ्ग)

सँग, संग
साथ रहना, सहवास, संसर्ग।
संज्ञा
(सं. सङ्ग)
उ.- (क) बिपति परी तब सब सँग छाड़ै, कोउ न आवै नेरे-१-७९। (ख) साधु-संग मोकौं प्रभु दीजै-७-२।
मुहा.- संग लगना-साथ रहना। संग लगे फिरना-साथ-साथ रहना, पीछे पीछे फिरना, पीछे लगे रहना। सदा रहति सँग लागी-सदा साथ रहती है। उ.-घर की नारि बहुत हित जासौं रहती सदा सँग लागी- १-७९। संग लगाना-साथ-साथ रखना।

सँग, संग
सांसारिक विषयों के प्रति अनुराग या आसक्ति।
संज्ञा
(सं. सङ्ग)

सँग, संग
नदियों का संगम।
संज्ञा
(सं. सङ्ग)

संगत
संबंध, संसर्ग।
संज्ञा

संगत
उदासी साधुओं का मठ।
संज्ञा

संगत
संगीत में वाद्य बजाकर किया जानेवाला किसी कलाकार का साथ।
संज्ञा

संगतरा
संतरा (फल)।
संज्ञा
(फ़ा. संगतरः)

संगतराश
पत्थर काटने-गढ़नेवाला।
वि.
(फ़ा.)

संगति
संगत होने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(सं.)

संगति
मिलने की क्रिया, मेल, मिलाप।
संज्ञा
(सं.)

संगति
संग, साथ।
संज्ञा
(सं.)
उ.- (क) ज्यौं जन-संगति होति नाव मैं, रहति न परसैं पार-१-८४। (ख) सूरदास साधुनि की संगति बड़े भाग्य जो पाऊँ-१-३४०। (ग) साधु-संग प्रभु, मोकौं दीजै, तिहिं संगति निज भक्ति करीजै-७-२।

संगति
संबंध, संसर्ग।
संज्ञा
(सं.)

संगति
पूर्वापर प्रसंग की दृष्टि से ठीक बैठना या मेल खाना, प्रसंगानुकूलता।
संज्ञा
(सं.)

सँग, संग
साथ, सहित।
क्रि. वि.

सँग, संग
पत्थर, पाषाण।
संज्ञा
(फ़ा.)

संगठन
मेल, मिलाप, संयोग।
संज्ञा
(सं. संघटन)

संगठन
रचना, बनावट।
संज्ञा
(सं. संघटन)

संगठन
बिखरी हुई शक्तियों, लोगों आदि को एकत्रित करने या मिलाने की व्यवस्था।
संज्ञा
(सं. संघटन)

संगठन
वह संस्था जो ऎसी व्यवस्था करे।
संज्ञा
(सं. संघटन)

संगठित
जिसका संघटन हुआ हो।
वि.
(हिं. संगठन)

संगत
जो किसी वर्ग या जाति का होने के कारण उनके साथ रखा जा सके।
वि.
(सं.)

संगत
पूर्वापर प्रसंग की दृष्टि से ठीक बैठने या मेल खानेवाला (विचार या कार्य), प्रसंगानुकूल।
वि.
(सं.)

संगत
संग रहना, साथ, संगति।
संज्ञा

संगति
सभा, समाज।
संज्ञा
(सं.)

संगतिया
साथी, संगी।
संज्ञा
(हिं. संगत)

संगतिया
गवैये के साथ बजानेवाला।
संज्ञा
(हिं. संगत)

संगती
साथी, संगी।
संज्ञा
(हिं. संगत)

संगती
गवैये के साथ बजानेवाला।
संज्ञा
(हिं. संगत)

संगदिल
निर्दयी, निष्ठुर।
वि.
(फ़ा.)

संगदिली
निर्दयता, कठोरता।
संज्ञा
(फ़ा.)

संगम
मेल, मिलाप, संयोग।
संज्ञा
(सं.)

संगम
दो नदियों के मिलने का स्थान।
संज्ञा
(सं.)

संगम
साथ, संग।
संज्ञा
(सं.)

संगराम
युद्ध।
संज्ञा
(सं. संग्राम)

संगा
साथ, सहित।
क्रि. वि.
(हिं. संग)
उ.- (क) सूरदास मानो चली सुरसरी श्रीगोपाल सागर सुखसंगा-१९०५। (ख) तात मात निज नारि ल हरि जी सब संगा-१० उ.-१०५।

सँगाती
संगी, साथी, मित्र।
संज्ञा
(हिं. संग)
उ.- सूरदास प्रभु ग्वाल-सँगाती जानी जाति जनावति-१९७६।

संगिनि, संगिनी
साथ रहनेवाली, सखी, सहेली।
संज्ञा
(हिं. संगी)

संगिनि, संगिनी
पत्नी, भार्या।
संज्ञा
(हिं. संगी)

संगी
साथ रहनेवाला, साथी।
संज्ञा
(हिं. संग)
उ.- (क) नाथ अनाथनि ही के संगी-। (ख) संगी गए संग सब तजकै-१६४७।

संगी
मित्र, सखा, बंधु।
संज्ञा
(हिं. संग)
उ.- आए भाई स्याम के संगी-२९९७।

संगी
एक तरह का रेशमी कपड़ा।
संज्ञा
(देश.)

संगी
पत्थर का।
वि.
(फ़ा. संग = पत्थर)

संगीत
वह कार्य जिसमें नाचना, गाना और बजाना, तीनों हों; ताल, स्वर, लय आदि के नियमानुसार पद्य का उच्चारण, गाना।
संज्ञा
(सं.)
उ.- उघट्यौ सफल संगीत रीति-भव अंगनि अंग बनायौ-१-२०५।

संगीतज्ञ
संगीत का ज्ञाता।
वि.
(सं.)

संगीतज्ञ
गवैया।
वि.
(सं.)

संगीन
वह बरछी जो बंदूक के सिरे पर लगी रहती है।
संज्ञा
(फ़ा.)

संगीन
जो पत्थर का बना हो।
वि.

संगीन
मोटा या भारी।
वि.

संगीन
टिकाऊ, मजबूत।
वि.

संगीन
विकट, भीषण।
वि.

संगृहीत
संग्रह या एकत्र किया हुआ, संकलित।
वि.
(सं.)

संगृहीता
संग्रह करनेवाला।
वि.
(सं. संगृहीतृ)

संग्या
चेतनाशक्ति।
संज्ञा
(सं. संज्ञा)

शिकंजा
दबाने, कमने या पेरने का यंत्र।
संज्ञा
(फ़ा.)

शिकन
सिकुड़न, सिलवट।
संज्ञा
(फ़ा.)

शिकमी
दूसरे की ओर से खेती करनेवाला।
वि.
(फ़ा.)

शिकरा
एक प्रकार का बाज पक्षी।
संज्ञा
(फ़ा.)

शिकवा
शिकायत, उलाहना।
संज्ञा
(अ.)

शिकस्त
हार, पराजय।
संज्ञा
(फ़ा.)

शिकश्ता
टूटा हुआ।
वि.
(फ़ा. शिकस्तः)

शिकायत
बुराई करना।
संज्ञा
(अ. शिक़ायत)

शिकायत
उलाहना, उपालंभ।
संज्ञा
(अ. शिक़ायत)

शिकायत
रोग।
संज्ञा
(अ. शिक़ायत)

संगम
संभोग, समागम।
संज्ञा
(सं.)
उ.- (क) धनि त्रिय तुमको जो सुखदानी संगम जागत रैनि बिहानी-१९६७। (ख) सधन निकुंज सुरति-संगम मिलि मोहन कंठ लगायो-सारा. ७१८।

संगम
दो या अधिक ग्रह, नक्षत्र या अन्य वस्तुओं के मिलने का भाव या स्थान।
संज्ञा
(सं.)
उ.-बुध-रोहिनी-अष्टमी संगम बसुदेव निकट बुलायौ-१०-४।

संगमरमर, संगमर्मर
एक चिकना सफेद पत्थर।
संज्ञा
(फ़ा. सर्ग + अ. मर्मर)

संगमूसा
एक चिकना काला पत्थर।
संज्ञा
(फ़ा.)

संगर
युद्ध, संग्राम।
संज्ञा
(सं.)

संगर
विपत्ति।
संज्ञा
(सं.)

संगर
नियम।
संज्ञा
(सं.)

संगर
जहर, विष।
संज्ञा
(सं.)

संगर
सेना की रक्षा के लिए बनायी गयी खाई, धुस या दीवार।
संज्ञा
(फ़ा.)

संगर
मोरचा।
संज्ञा
(फ़ा.)

संग्या
वह विकारी शब्द जो व्यक्ति, वस्तु या भाव का बोधक हो।
संज्ञा
(सं. संज्ञा)

संग्रह
एकत्र करना, संचय।
संज्ञा
(सं.)
उ.- कहा काँच संग्रह के कीने, हरि जो अमोल मनी-८९४।

संग्रह
वह ग्रंथ जिसमें विषय या रीति-विशेष की रचनाएँ संगृहीत हों।
संज्ञा
(सं.)

संग्रह
स्थान जहाँ विशेष प्रकार की वस्तुएँ एकत्र की जाये।
संज्ञा
(सं.)

संग्रह
ग्रहण करने की क्रिया।
संज्ञा
(सं.)

संग्रहणी
एक प्रसिद्ध रोग।
संज्ञा
(सं.)

संग्रहणीय
संग्रह-योग्य।
वि.
(सं. संग्राहय)

संग्रहना, संग्रहनो
संग्रह करना।
क्रि.स.
(सं. संग्रहण)

संग्रहालय
स्थान जहाँ विशेष प्रकार की वस्तुओं का संग्रह हो।
संज्ञा
(सं.)

संग्रही
संग्रह करनेवाला।
वि.
(सं. संग्रहिन्)

संग्राम
लड़ाई, युद्ध।
संज्ञा
(सं.)
उ.- करत फिरत संग्राम सुगम अति कुसुम माल करवार-२९०५।

संग्राहक
संग्रह करनेवाला।
वि.
(सं.)

संग्राह्य
संग्रह करने योग्य।
वि.
(सं.)

संघ
समूह, समुदाय।
संज्ञा
(सं.)

संघ
सभा, समिति, समाज।
संज्ञा
(सं.)

संघ
वह संघटन जिसे नियमानुसार एक व्यक्ति के रूप में शासन का अधिकार हो।
संज्ञा
(सं.)

संघ
प्रतिनिधियों द्वारा प्रजातंत्रीय शासन।
संज्ञा
(सं.)

संघ
ऐसे राज्यों का समूह जो कछ बातों में स्वतंत्र हों और कुछ में केंद्रिय शासन के अधीन हों।
संज्ञा
(सं.)

संघ
बौद्धों की संघटित संस्था।
संज्ञा
(सं.)

संघचारी
झुंड बनाकर रहने-विचरनेवाले (पशु)।
वि.
(सं. संधचारिन्)

संघट
राशि, ढेर।
संज्ञा
(सं.)

संघट
लड़ाई, युद्ध।
संज्ञा
(सं.)

संघट
मुठभेड़।
संज्ञा
(सं.)

संघट
मिलन, संयोग।
संज्ञा
(सं.)

संघटन
मेल, मिलाप, मिलन, संयोग।
संज्ञा
(सं.)

संघटन
रचना, बनावट।
संज्ञा
(सं.)

संघटन
बिखरी हुई शक्तियों को एकत्र करना।
संज्ञा
(सं.)

संघटन
वह संस्था जो बिखरी हुई शक्तियों को एकत्र करने के लिए बने।
संज्ञा
(सं.)

संघटित
जिसका संघटन हुआ हो।
वि.
(सं.)

संघट्ट, संघट्टन
मिलन, मिलाप, संयोग।
संज्ञा
(सं.)

संघर्षी
संघर्ष करनेवाला।
वि.
(सं.)

संघ-स्थविर
बौद्ध संघाराम का प्रधान।
संज्ञा
(सं.)

संघाता
जमाव, झुंड, समूह।
संज्ञा
(सं.)

संघाता
विशेष कार्य से बना संघ या समूह।
संज्ञा
(सं.)

संघाता
निवास स्थान।
संज्ञा
(सं.)

संघाता
संग, साथ।
संज्ञा
(सं.)

संघाता
चोट, आघात।
संज्ञा
(सं.)

संघाता
मार डालना, वध।
संज्ञा
(सं.)

संघाता
इक्कीस नरकों में एक।
संज्ञा
(सं.)

संघाता
शरीर।
संज्ञा
(सं.)

संघट्ट, संघट्टन
रचना, बनावट।
संज्ञा
(सं.)

संघर
युद्ध।
संज्ञा
(सं. संगर)

संघर
विपत्ति।
संज्ञा
(सं. संगर)

संघरना, सँघरनो
संहार करना।
क्रि.स.
(सं.संहार)

संघराना, सँघरानो
(उदासीन) गायभैसों को दूध दुहने के लिए परचाना या फुसलाना।
क्रि.स.
(देश.)

संघर्ष, संघर्षण
रगड़, घिस्सा।
संज्ञा
(सं.)

संघर्ष, संघर्षण
होड़, स्पर्धा।
संज्ञा
(सं.)

संघर्ष, संघर्षण
रघड़ना, घिसना।
संज्ञा
(सं.)

संघर्ष, संघर्षण
दो दलों का विरोध जिसमें एक, दूसरे को दबाने का प्रयत्न करे।
संज्ञा
(सं.)

संघर्ष, संघर्षण
वह प्रयत्न या प्रयास जो विषम परिस्थिति से अपने को निकालकर आगे बढ़ने के लिए किया जाय।
संज्ञा
(सं.)

संघाता
घना, सघन।
वि.
(सं.)

संघाता
नष्ट।
वि.
(सं.)
उ.- तुमरे कुल कौं बेर न लागै होत भस्म संघात-९-७७।

संघातक
प्राण लेनेवाला।
वि.
(सं.)

संघातक
नष्ट या नाश करनेवाला।
वि.
(सं.)

सँघाती, संघाती
साथ रहनेवाला, साथी, सहचर।
संज्ञा
(सं. संघ)
उ.- (क) सदा सँघाती आपनो (रॆ) जिय कौ जीवन-प्रान-१-३२५। (ख) सदा सँघाती श्री जदुराइ-७-२। (ग) बिछुरे री मेरे बाल-सँघाती-२८८२।

संघाती, संघाती
मित्र।
संज्ञा
(सं. संघ)
उ.- जानति हौं तुम मानति नाहीं तुमहूँ श्याम-संघाती-२९८१।

संघाती, संघाती
प्राणनाशक।
वि.
(सं. संघात)

संघार
वध।
संज्ञा
(सं. संहार)

संघार
नाश।
संज्ञा
(सं. संहार)

संघारना, संघारनो
मार डालना, वध करना।
क्रि.स.
(हिं. संहारना)

संचक
इकट्ठा करनेवाला।
वि.
(सं. संचय)

संचति
इकट्ठा या संग्रह करती है।
क्रि.स.
(हिं. संचना)
उ.- ज्यौं मधुमाखी सँचति निरंतर, बन की ओट लई-१-५०।

संचना, संचनो
इकट्ठा या संग्रह करना।
क्रि.स.
(सं. संचयन)

संचना, संचनो
रक्षा या देखभाल करना।
क्रि.स.
(सं. संचयन)

संचय
ढेर, राशि, समूह।
संज्ञा
(सं.)

संचय
एकत्र या संग्रह करने की क्रिया।
संज्ञा
(सं.)

संचयन
संग्रह करने की क्रिया।
संज्ञा
(सं.)

संचयी
इकट्ठा या संग्रह करनेवाला।
वि.
(सं. संचयिन्)

संचयी
कंजूस, कृपण।
वि.
(सं. संचयिन्)

संचर
चलना।
संज्ञा
(सं.)

संघारना, संघारनो
नाश करना।
क्रि.स.
(हिं. संहारना)

संघाराम
बौद्ध श्रमणों का मठ, बिहार।
संज्ञा
(सं.)

संघारि
मार कर।
क्रि.स.
(हिं. संघारना)

संघारि
संघारि डारौं - मार डालूँ।
प्र.
उ.- सूर प्रभु सहित संघारि डारौं-५९०।

सँघेरना, सँघेरनो
पशु के दो पैर बाँधना जिससे वह दूर या तेज न जा सके।
क्रि.स.
(हिं. संग + करना)

संघेला
सहचर।
संज्ञा
(सं. संग)

संघेला
मित्र।
संज्ञा
(सं. संग)

संघोष
जोर का शब्द, घोष।
संज्ञा
(सं.)

संच
संग्रह, संचय।
संज्ञा
(सं. संचय)

संच
रक्षा, देख-भाल।
संज्ञा
(सं. संचय)

संचर
मार्ग।
संज्ञा
(सं.)

संचरण
चलना, गमन।
संज्ञा
(सं.)

संचरण
फैलना, प्रसरण।
संज्ञा
(सं.)

संचरण
काँपना।
संज्ञा
(सं.)

संचरना, संचरनो
घूमना-फिरना, चलना।
क्रि.अ.
(सं. संचरण)

संचरना, संचरनो
फैलना, प्रसरित होना।
क्रि.अ.
(सं. संचरण)

संचरना, संचरनो
प्रचलित या व्यवहृत होना।
क्रि.अ.
(सं. संचरण)

संचरना, संचरनो
चलाना, घुमाना।
क्रि.स.
(सं. संचारण)

संचरना, संचरनो
फैलाना।
क्रि.स.
(सं. संचारण)

संचरना, संचरनो
प्रचलित करना।
क्रि.स.
(सं. संचारण)

शिक्षा
उपदेश।
संज्ञा
(सं.)

शिक्षा
मंत्रोच्चारण का विषय जो छह वेदांगों में एक है।
संज्ञा
(सं.)

शिक्षा
शासन, नियंत्रण।
संज्ञा
(सं.)

शिक्षा
बुरा परिणाम।
संज्ञा
(सं.)

शिक्षार्थी
विद्यार्थी।
संज्ञा
(सं. शिक्षाथिन्)

शिक्षालय
विद्यालय।
संज्ञा
(सं.)

शिक्षिका
शिक्षा देनेवाली।
वि.
(सं.)

शिक्षित
पढ़ा-लिखा।
वि.
(सं.)

शिक्षित
पंड़ित।
वि.
(सं.)

शिखंड
मोर की पूँछ या पुच्छ।
संज्ञा
(सं.)
उ.- कुटिल कच भुव तिलक रेखा शीश शिखी शिखंड।

संचरना, संचरनो
इकट्ठा या एकत्र करना।
क्रि.स.
(सं. संचय)

संचरित
जिसमें या जिसका संचार हुआ हो।
वि.
(सं.)

संचरै
इकट्ठा, एकत्र या संग्रह करती है, उपस्थित या प्रस्तुत करती है।
क्रि.स.
(हिं. संचरना)
उ.- रसना द्विज दलि दुखित होत बहु, तउ रिसि कहा करै। छमि सब छोभ जु छाँड़ि, छवौ रस लै समीप सँचरै-१-११७।

संचान
बाज, शिकरा, श्येन (पक्षी)।
संज्ञा
(सं.)

सँचार, संचार
चलना, गमन।
संज्ञा
(सं.)

सँचार, संचार
फैलने विशेषतः भीतर फैलने, या विस्तृत होने की क्रिया, प्रवेश।
संज्ञा
(सं.)
उ.- (क) अर्जुन तब सरपिंजर कियौ, पंवन सँचार रहन नहिं दियो-ना. ४३०९। (ख) ता दिनतैं उर-भौन भयो सखि सिव-रिपु को संचार-२८८८।

सँचार, संचार
चलाने की क्रिया।
संज्ञा
(सं.)

सँचार, संचार
ग्रह का एक राशि से दूसरी में जाना।
संज्ञा
(सं.)

संचारक
चलानेवाला।
वि.
(सं.)

संचारक
फैलानेवाला।
वि.
(सं.)

संचारी
वायु, हवा।
संज्ञा
(सं. संचारिन्)

संचारी
संगीत में पहला या स्थाई पद या उसका कुछ अंश पुनः भिन्न से कहने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(सं. संचारिन्)

संचारी
काव्य के ३३ संचारी भाव।
संज्ञा
(सं. संचारिन्)

संचारी
संचरण करनेवाला, गतिशील।
वि.

संचारी
फैलायी, संचारित की।
क्रि.स.
(हिं. संचारना)
उ.- बन बरुही चातक रटै द्रुम द्युति सघन संचारी-२२९६।

संचारी भाव
सहित्य में वे भाव जो रस के उपयोगी होकर, मुख्य भाव की पुष्टि करते और स्थायी भाव की तरह स्थिर न रहकर, अत्यन्त चंचलता पूर्वक सब रसों में संचरित होते रहते हैं। इनको 'व्यभिचारी भाव' भी कहते हैं। इनकी संख्या ३३ है-अपस्मार (मूर्च्छा), अमर्ष (क्रोध या असहनशीलता), अलसता या आलस्य, अवहित्था (मनोभाव का दुराव-छिपाव), असूया या अनसूया (ईर्ष्या), आवेग, उग्रता, उन्माद, औत्सुक्य या उत्सुकता, गर्व, ग्लानि, चपलता, चिंता, जड़ता, दीनता या दैन्य, धृति, निद्रा, निर्वेद (निराशा-जन्य खिन्नता या विरक्ति), मति, मद, मरण, मोह, लज्जा या ब्रीड़ा, वितर्क, विबोध (जागना, जागरण), विषाद, व्याधि, शंका, श्रम, संत्रास (अहित-आशंकाजनित चिंता या भय), स्मृति, स्वप्न और हर्ष।
संज्ञा
(सं.)

संचारयो, संचारयौ
एकत्र किया।
क्रि.स.
(हिं. संचारना)
उ.-ईंधन दौरि दौरि संचारयो-१० उ.-५२।

संचालक
चलाने या गति देनेवाला, परिचालक।
वि.
(सं.)

संचालक
अपने निरीक्षण-निर्देशन में कार्य-विशेष चलाने या करानेवाला।
वि.
(सं.)

संचालन
चलाने की क्रिया, परिचालन।
संज्ञा
(सं.)

संचारक
प्रचार करनेवाला।
वि.
(सं.)

संचारना, संचारनो
फैलाना।
क्रि.स.
(सं. संचारण)

संचारना, संचारनो
प्रचार करना।
क्रि.स.
(सं. संचारण)

संचारना, संचारनो
(अस्त्र-शस्त्र) चलाना।
क्रि.स.
(सं. संचारण)

संचारना, संचारनो
जन्म देना, उत्पन्न करना।
क्रि.स.
(सं. संचारण)

संचारिका
कुटनी, दूती।
संज्ञा
(सं.)

संचारिका
चलानेवाली।
वि.

संचारिका
फैलानेवाली।
वि.

संचारिका
प्रचार करनेवाली।
वि.

संचारित
जिसका संचार किया गया हो।
वि.
(सं.)

संजाब
संजाफ घोड़ा।
संज्ञा
(फ़ा. संजाफ़)

संजीदगी
गंभीरता।
संज्ञा
(फ़ा. संजीदगी)

संजीदा
गंभीर।
वि.
(फ़ा. संजीदा)

संजीदा
बुद्धिमान।
वि.
(फ़ा. संजीदा)

संजीवनि, संजीवनी
जीवन, प्राण या शक्ति-दायिनी।
वि.
(सं. संजीवनी)

संजीवनि, संजीवनी
एक कल्पित औषधि सेवन से मृतक भी जी उठता माना गया है।
संज्ञा
उ.- (क) दौना-गिरि पर आहि सँजीवन बैद सुषेन बताई-९-१४९। (ख) श्री रघुनाथ सँजीवनि कारन मोकौं इहाँ पठायौ-९-१५५।

संजुक्त
जुड़ा हुआ।
वि.
(सं. संयुक्त)

संजुक्त
मिला हुआ।
वि.
(सं. संयुक्त)

संजुक्त
संबद्ध।
वि.
(सं. संयुक्त)

संजुक्त
साथ, सहित।
वि.
(सं. संयुक्त)

संचालन
वह प्रबंध या व्यवस्था जिससे कार्य होता रहे।
संज्ञा
(सं.)

संचालन
देख-रेख, नियंत्रण, निर्देशन।
संज्ञा
(सं.)

संचालित
जिसका संचालन किया गया हो या किया जा रहा हो।
वि.
(सं.)

संचि
एकत्र या संग्रह करके।
क्रि.स.
(हिं. संचना)
उ.- याहू सौंज संचि नहिं राखी, अपनी धरनि धरी-१-१३०।

संचित
एकत्र या संग्रह किया हुआ।
वि.
(सं.)

संचित
ढेर लगाया हुआ।
वि.
(सं.)

सँचिबो, सँचिबौ
एकत्र या संग्रह करने का भाव।
संज्ञा
(हिं. संचना)
उ.- सतगुरु कह्यौ, कहौं तोसौं हौं, राम-नाम-धन सँचिबौ।

संचु
सुख।
संज्ञा
(हिं. सचु)

संचु
हर्ष।
संज्ञा
(हिं. सचु)

सँचै
एकत्र या संचय करे।
क्रि.स.
(हिं. संचना)
उ.- सुमति सुरूप सँचै स्रद्धा-विधि-२-१२।

सँच्यो, सँच्यौ
एकत्र या संचय किया।
क्रि.स.
(हिं. संचना)
उ.- (क) देखत आनि सँच्यौ उर अंतर दै पलकनि कौ तारौ री-१०-१३५। (ख) सुख संच्यो स्रवन दुआर-३२४३।

संजम
इंद्रिय-निग्रह।
संज्ञा
(सं. संयम)
उ.- (क) गनिका किए कौन ब्रत संजम सुक-हित नाम पढ़ावै-१-१२२। (ख) नौमी नेम भली बिधि करै। दसमी कौं संजम बिस्तरै-९-५।

संजमी
संयम से रहनेवाला।
वि.
(सं. संयमी)

संजमी
इंद्रियनिग्रही।
वि.
(सं. संयमी)

संजय
धृतराष्ट्र का एक मंत्री जिसने दिव्य दृष्टि-संपन्न होने के कारण हस्तिनापुर में बैठे-बैठे उनको कुरुक्षेत्र के महाभारत-युद्ध का यथार्थ विवरण सुनाया था।
संज्ञा
(सं.)

संजात
उत्पन्न।
वि.
(सं.)

संजात
प्राप्त।
वि.
(सं.)

संजाफ
झालर, गोट।
संज्ञा
(फ़ा. संजाफ़)

संजाफ
घोड़ा जो आधा लाल और आधा हरा या सफेद हो।
संज्ञा

संजाफी
गोट या झालरदार।
वि.
(फ़ा. संजाफ़ी)

संजुग
युद्ध, संग्राम।
संज्ञा
(सं. संयुत)

संजुह
साथ सहित।
वि.
(सं. संयुक्त)
उ.- (क) ललित कन-संजुत कपोलनि लसत कज्जल अंक-२५३। (ख) कटि किंकिनि चंद्रमनि-संजुत-६२५।

संजोइ
सजाकर, सँजोकर।
क्रि.स.
(हिं. सँजोना)
उ.- चौक चंदन लीपि कै धरि आरती सँजोइ-१२-२६।

संजोइ
संग या साथ में।
क्रि. वि.
(सं. संयोग)

संजोइल
सजा-सजाया, सुसज्जित।
वि.
(हिं. सँजोना)

संजोइल
एकत्र या संग्रह करनेवाला।
वि.
(हिं. सँजोना)

संजोऊ
सजाने या सुसज्जित करनेवाला।
वि.
(हिं. सँजोना)

संजोऊ
एकत्र या संग्रह करनेवाला।
वि.
(हिं. सँजोना)

संजोऊ
तैयारी।
संज्ञा

संजोऊ
सामान, सामग्री।
संज्ञा

संजोग
संयोग।
संज्ञा
(सं. संयोग)
उ.- (क) रवि-ससि राहु संजोग बिना ज्यों लीजतु है मन मानि-२-३८। (ख) तड़ित-घन संजोग मानौ-६२७।

संजोग
संबंध, लगाव, चेतना।
संज्ञा
(सं. संयोग)
उ.- उहाँ जाइ कुरुपति बल-जोग, दियो छाँड़ि तन कौं संजोग-१-२८४।

संजोग
इत्तिफाक, अकस्मात घटित होना।
संज्ञा
(सं. संयोग)
उ.- नीकैं पहुँचे आइ तुम, भलौ बन्यौ संजोग-४३७।

संजोग
विधि-संयोग- विधाता की देन या व्यवस्था (से)।
यौ.
उ.- (क) बिधि-संयोग टारत नाहिं टरैं-९-७७। (ख) तीनि पुत्र भए बिधि-संजोग-९-१७४।

संजोगिनि, संजोगिनी
जो (स्त्री) पति या प्रेमी के साथ हो।
वि.
(सं. संयोगिनी)

संजोगी
मिले हुए, संयुक्त।
वि.
(सं. संयोगिन्)

संजोगी
जो प्रिया या प्रेमिका के साथ हो।
वि.
(सं. संयोगिन्)

सँजोना, सँजोनो
सजाना, सज्जित या अलंकृत करना।
क्रि.स.
(सं. सज्जा)

सँजोना, सँजोनो
इकट्ठा करना।
क्रि.स.
(सं. संचय)

सँजोवन
सजाने की क्रिया।
संज्ञा
(हिं. सँजोना)

सँजोवना
सज्जित या अलंकृत करना।
क्रि.स.
(सं. सज्जा, हिं. सँजौना)

सँजोवना
इकट्ठा, एकत्र या संग्रह करना।
क्रि.स.
(सं. संचय, हिं. संजोना)

सँजोबल, सँजोवस
सुसज्जित, अलंकृत।
वि.
(हिं. सँजोना)

सँजोबल, सँजोवस
सेना-सहित।
वि.
(हिं. सँजोना)

सँजोबल, सँजोवस
सजग, सावधान।
वि.
(हिं. सँजोना)

सँजोवा
सजावट, श्रृंगार।
संज्ञा
(हिं. सँजोना)

सँजोवा
जमाव, जमघट।
संज्ञा
(हिं. सँजोना)

संज्ञक
नाम या संज्ञा वाला।
वि.
(सं.)

संज्ञा
चेतनाशक्ति।
संज्ञा
(सं.)

संज्ञा
बुद्धि।
संज्ञा
(सं.)

संडसा
लोहे का एक औजार।
संज्ञा
(सं. संदंश)

संडसी
छोटा सँडसा।
संज्ञा
(हिं. सँडसा)

संडा
मोटा-ताजा।
वि.
(सं. शंड)

संडामर्क, संडामर्का
प्रहलाद के शिक्षा-गुरू।
संज्ञा
(सं. शंडामर्क)
उ.- पांच बरस की भई जब आइ, संडाम-र्कहिं लियौ बुलाइ।¨¨¨¨। संडामर्क रहे पचि हारि, राजनीति कहि बारंबार। ¨¨¨¨। तब संडामर्का संकाइ, कह्यौ असुर-पति सौं यों जाइ-७-२।

संडा-मुसंडा
मोटा-ताजा, हट्टा-कट्टा (व्यंग्य)।
वि.
[हिं. संडा + मुसंडा (अनु.)]

संडास
कुएँ-जैसा बना गहरा पाखाना, शौचकूप।
संज्ञा
(देश.)

संत
संन्यासी, महात्मा, त्यागी।
वि.
(सं. सत्)
उ.- (क) उद्वव संत सराह्यो-सारा. ५५८। (ख) सूर स्याम करान यह पठवत ह्वै आबैगे संत-२९२१।

संत
हरि-भक्त।
वि.
(सं. सत्)

संत
संन्यासी, महात्मा।
संज्ञा
उ. - सादर संत देखि मन मानौ प्रेखें प्राण हरै-२८०८।

संत
हरि-भक्त।
संज्ञा
उ.- भक्त सात्विकी सेवै संत, लखै तिन्हैं मूरति भगवंत-३-१३।

शिखंड
चोटी, शिखा।
संज्ञा
(सं.)
उ.- शोभित केश बिचित्र भाँति द्युति शिखि शिखंड हरनी- पृ. ३१६ (५४)

शिखंड
काकुल, काकपक्ष।
संज्ञा
(सं.)

शिखंडिनी
मोरनी, मयूरी।
संज्ञा
(सं.)

शिखंडिनी
द्रुपदराज की कन्या जो बाद में पुरूष हो गयी थी।
संज्ञा
(सं.)

शिखंडी
मोर, मयूर।
संज्ञा
(सं. शिखंडिन)

शिखंडी
मोर या मयूर की पूँछ।
संज्ञा
(सं. शिखंडिन)

शिखंडी
शिखा, चोटी।
संज्ञा
(सं. शिखंडिन)
उ.- शिखंडी शीश मुख मुरली बजावत।

शिखंडी
द्रुपदराज का वह पुत्र जो पहले कन्या-रूप में जन्मा था। महाभारत के युद्ध में भीष्म की मृत्यु का यही कारण बना था और अंत में अशवत्थामा द्वारा मारा गया था।
संज्ञा
(सं. शिखंडिन)

शिख
शिखा।
संज्ञा
(सं. शिखा)
उ.- फूली फिरति रोहिणी मैया नख-शिख करि सिंगार।

शिखर
सिरा, चोटी।
संज्ञा
(सं.)

संझा
शाम, संध्या।
संज्ञा
(सं. संध्या, प्रा. संझा)

संझावलि
राधा की सखी एक गोपी का नाम।
संज्ञा
(हिं. संझा)
उ.- कज्जल लै आई संझावली-२३१२।

सँझिया, सँझैया
शाम का भोजन।
संज्ञा
(हिं. संझा)

सँझोखा
शाम का समय।
संज्ञा
(हिं. संझा)

सँटिया , संटी
पतला बेंत या डंडी।
संज्ञा
(देश.)
उ.- (क) माता सैटिया द्वैक लगाए-३९१। (ख) सैटिया लै मारन जब लागी-८६१।

संठ
शांति, निस्तब्धता।
संज्ञा
(सं. शांत)

संठ
धूर्त।
वि.
(सं. शठ)

संठ
नीच।
वि.
(सं. शठ)
उ.- सुनि अरे संठ दसकंठ-९-१२९।

संड
मोटा-ताजा।
वि.
(हिं. संडा)

संडमुसंड
मोटा-ताजा, हट्टा-कट्टा (व्यंग्य)।
वि.
[हिं. संडा + मुसंडा (अनु.)]

संज्ञा
ज्ञान।
संज्ञा
(सं.)

संज्ञा
नाम।
संज्ञा
(सं.)

संज्ञा
वह विकारी शब्द जो किसी वस्तु, व्यक्ति या भाव का बोधक हो।
संज्ञा
(सं.)

संज्ञा
संकेत।
संज्ञा
(सं.)

संज्ञा
सात तत्वों में एक।
संज्ञा
(सं.)
उ.- पृथिवी अप तेज वायु नभ संज्ञा शब्द परस अरू गंध-सारा. ८।

संज्ञा
सूर्य की पत्नी जो विश्वकर्मा की पुत्री और यम-यमुना की माता थी।
संज्ञा
(सं.)

संज्ञाहीन
बेहोश, अचेत।
वि.
(सं.)

सँझला
संध्या-संबंधी।
वि.
(प्रा. संझा)

सँझबत्ती
संझा को जलन या जलाया जानेवाला दीपक।
संज्ञा
(प्रा. संझा + हिं. बत्ती)

सँझबत्ती
संझा को गाया जाने वाला गीत।
संज्ञा
(प्रा. संझा + हिं. बत्ती)

संतत
सदा, सर्वदा।
अव्य.
(सं.)
उ.- (क) संतत निकट रहत हौ। (ख) संतत सुभ चाहत-१-७७।

संतत
लगातार, निरंतर।
अव्य.
(सं.)

संतति
बाल-बच्चे, संतान।
संज्ञा
(सं.)

संतपन
साधुता, महात्मापन।
संज्ञा
(सं.)

संतप्त
खूब जला या तपा हुआ।
वि.
(सं.)

संतप्त
बहुत दुखी या पीड़ित।
वि.
(सं.)

संतरण
अच्छी तरह तैरने या तैरकर पार होने की क्रिया।
संज्ञा
(सं.)

संतरण
तारने या पार उतारनेवाला।
वि.

संतरा
एक प्रसिद्ध फल जो मीठा होता है।
संज्ञा
(पुर्त. संगतरा या फ़ा. संगतरः)

संतान
बाल-बच्चे, संतति।
संज्ञा
(सं.)
उ.- सुत-संतान-स्वजन-बनिता-रति घन समान उनई-१-५०।

संतान
कुल, वंश।
संज्ञा
(सं.)

संताप
आँच, जलन, ताप।
संज्ञा
(सं.)

संताप
मानसिक कष्ट या दुख।
संज्ञा
(सं.)
उ.- (क) आनँद-मगन राम-गुन गावै, दुख-संताप की काटि तनी-१-२९। (ख) प्रगट पाप संताप सूर अब कापर हठै गहौं ३-२। (ग) बिछुरनकौ संताप हमारौ तुम दरसन दै काट्यौ-९-८७।

संताप
शत्रु।
संज्ञा
(सं.)

संतापन
जलाना।
संज्ञा
(सं.)

संतापन
दुख या कष्ट देना।
संज्ञा
(सं.)

संतापन
कामदेव का एक वाण जो विरही को संतप्त करता है।
संज्ञा
(सं.)

संतापन
जलानेवाला।
वि.

संतापन
दुखदायी।
वि.

संतापना, संतापनो
जलाना , दग्ध करना।
क्रि.स.
(सं. संताप)

संतापना, संतापनो
दुख या कष्ट देना।
क्रि.स.
(सं. संताप)

संतापित
जला हुआ, दग्ध।
वि.
(सं.)

संतापित
दुखी।
वि.
(सं.)

संतापी
जलाने या दग्ध करनेवाला।
वि.
(सं. संतापिन)

संतापी
दुख या कष्ट देनेवाला।
वि.
(सं. संतापिन)
उ.- घातक, कुटिल, चबाई, कपटी महा कुटिल संतापी-१-१४०।

संतापै
दुख या कष्ट पहुँचाता है।
क्रि.स.
(हिं. संतापना)
उ.- (क) अरू पुनि लोभ सदा संतापै। (ख) हरि-माया सब जग संतापै-३-१३। (ग) सुख-दुख तनिकौ तिहिं न सँतापै-३-१३।

संति, संती
बदले या स्थान में।
अव्य.
(सं. संति ?)

संतुलन
तौल या भार बराबर होना या करना।
संज्ञा
(सं.)

संतुलन
दो पक्षों का बल बराबर होना या करना।
संज्ञा
(सं.)

संतुष्ट
जिसे संतोष हो गया हो।
वि.
(सं.)

संतुष्ट
जो सहमत हो गया हो।
वि.
(सं.)

संतोख, संतोष
हर स्थिति में प्रसन्न रहना और अधिक की कामना न करना।
संज्ञा
(सं. संतोष)
उ.- सील-संतोष सखा दोउ मेरे तिन्हैं बिगोवति भारी-१-१७३।

संतोख, संतोष
जी भर जाना, तृप्ति।
संज्ञा
(सं. संतोष)
उ.- (क) बहुतै काल भोग मैं किए, पै संतोष न आयो हिए-९-२। (ख) बहुत काल या भाँति बितायौ, पै रिषि-मन संतोष न आयौ-९-८।

संतोख, संतोष
हर्ष, सुख, आनंद।
संज्ञा
(सं. संतोष)

संतोषना, संतोषनो
तृप्त करना।
क्रि.स.
(सं. संतोष)

संतोषना, संतोषनो
प्रसन्न या सुखी करना।
क्रि.स.
(सं. संतोष)

संतोषना, संतोषनो
तृप्त होना।
क्रि.अ.

संतोषना, संतोषनो
प्रसन्न होना।
क्रि.अ.

संतोषि
संतोष देकर, संतुष्ट करके।
क्रि.स.
(हिं. संतोषना)
उ.- तिन्हैं संतोषि कह्यौ, देहु माँगै हमैं, बिष्नु की भक्ति सब चित्त धारौ-४-११।

संतोषित
संतुष्ट।
वि.
(हिं. संतोष)

संतोषी
जो सदा संतोष रखता हो।
वि.
(सं. संतोषिन्)

संतोख्यो, संतोख्यौ
संतोष दिया।
क्रि.स.
(हिं. संतोषना)
उ.- धनुर्भंजन जज्ञ हेत बोले इनहिं और डर नहीं सबन कहि संतोख्यौ-२५०३।

संत्रास
भय।
संज्ञा
(सं.)

संत्रास
अहित की आशंका से उत्पन्न चिंता या भय जिसको 'त्रास' भी कहते हैं और जो एक संचारी भाव है।
संज्ञा
(सं.)

संथा
एक बार में पढ़ा या पढ़ाया हुआ पाठ या अंश।
संज्ञा
(सं. संहिता ?)

संदंश
सँडसी।
संज्ञा
(सं.)

संदंश
चिमटी।
संज्ञा
(सं.)

संद
छेद, बिल, दरार।
संज्ञा
(सं. संधि)

संद
चंद्र, चंद्रमा।
संज्ञा
(सं. चंद्र)

संद
दबाव।
संज्ञा
(देश.)

संदहि
दबाव से।
संज्ञा
(देश. संद)
उ.- मनौ सुरग्रह ते सुर-रिपु कन्या सौतै आवति ढुरि संदहि।

संदर्भ
रचना, बनावट।
संज्ञा
(सं.)

संदर्भ
प्रबंध, निबंध।
संज्ञा
(सं.)

संदर्भ
वह आकर ग्रंथ जिसमें अनेक प्रकार की विशिष्ट बातें लिखी हों।
संज्ञा
(सं.)

संदर्भ
संबंधित प्रसंग या वर्णित विषय।
संज्ञा
(सं.)

संदर्शन
भली-भांति देखना।
संज्ञा
(सं.)

संदल
चंदन, श्रीखंड।
संज्ञा
(फ़ा.)

संदली
चंदन का (बना हुआ), चंदन से संबंधित।
वि.
(फ़ा. संदल)

संदली
चंदन जैसे हल्के पीले रंग का।
वि.
(फ़ा. संदल)

संदली
एक तरह का हल्का पीला रंग।
संज्ञा

संदली
एक तरह का हाथी।
संज्ञा

संदली
एक तरह का घोड़ा।
संज्ञा

संदि
मेल, संधि।
संज्ञा
(सं. संधि)

संदिग्ध
जिसमें संदेह या संशय हो।
वि.
(सं.)

संदिग्ध
जिस पर शक या संदेह हो।
वि.
(सं.)

संदिग्ध
एक प्रकार का व्यंग्य।
संज्ञा

संदिग्धता
संदिग्ध होने का भाव।
संज्ञा
(सं.)

संग्दिधत्व
संदिग्ध होने का भाव।
संज्ञा
(सं.)

संग्दिधत्व
एक काव्य दोष जो अर्थ के अस्पष्ट होने या तत्संबंधी संदेह बने रहने पर माना जाता है।
संज्ञा
(सं.)

संदिष्ट
कहा हुआ, कथित।
वि.
(सं.)

संदी
पलँग, शैया।
संज्ञा
(सं.)

संदीपक
उद्दीपनकारी, उद्दीपक।
वि.
(सं.)

संदीपन
उद्दीप्त करने की क्रिया, उद्दीपन।
संज्ञा
(सं.)

संदीपन
श्रीकृष्ण के गुरु जिनको श्रीकृष्ण ने गुरु-दक्षिणा में मृतक पुत्र ला दिये थे।
संज्ञा
(सं.)
उ.- संदीपन सुत तुम प्रभु दीने विद्या-पाठ करयो-१-१३३।

संदीपन
कामदेव के पाँच वाणों में एक।
संज्ञा
(सं.)

संदीपन
उद्दीपन करनेवाला।
वि.
(सं.)

संदूक
लकड़ी, टीन या लोहे का बना पिटारा, पेटी, बकस।
संज्ञा
(अ. संदूक़)
उ.- (क) संदूकनि भरि घरे ते न खोलै री-१५४९। (ख) कज्जल कुलुफ मेलि मंदिर में पलक संदूक पर अटके- पृ. ३२९ (८८)।

संदूकची, संदूकड़ी
लकड़ी, टीन या लोहे की छोटी पेटी
संज्ञा
(हिं. संदूक + ची.ड़ी)

संदूर
सिंदूर।
संज्ञा
(हिं. सिंदूर)

संदेश
समाचार, संवाद।
संज्ञा
(सं.)

शिकार
मृगया, अहेर, आखेट।
संज्ञा
(फ़ा.)

शिकार
जंतु जिसका आखेट किया गया हो।
संज्ञा
(फ़ा.)

शिकार
आहार।
संज्ञा
(फ़ा.)

शिकार
वह जिसके फँसने या वश में होने से अपना विशेष लाभ हो।
संज्ञा
(फ़ा.)
मुहा.- शिकार आना-ऎसे असामी का आना जिससे लाभ हो। शिकार करना-किसी असामी से खूब लाभ उठाना। सिकार खेलना-किसी असामी को खूब लूटना। किसी का शिकार होना-(१) किसी के द्वारा फाँसा जाना। (२) किसी पर मुग्ध या मोहित होना।

शिकारी
शिकार करनेवाला।
वि.
(फ़ा.)

शिक्षक
शिक्षा देनेवाला।
संज्ञा
(सं.)

शिक्षण
शिक्षा देने का कार्य।
संज्ञा
(सं.)

शिक्षा
पढ़ने-पढ़ाने की क्रिया।
संज्ञा
(सं.)

शिक्षा
विद्या का ग्रहण या अभ्यास।
संज्ञा
(सं.)

शिक्षा
दक्षता।
संज्ञा
(सं.)

संदेश
उद्देश्यविशेष से कही या कहलायी गयी बात।
संज्ञा
(सं.)

संदेश
एक प्रकार की बँगला मिठाई।
संज्ञा
(सं.)

संदेशहर
संदेश पहुँचानेवाला, दूत, बसीठ।
संज्ञा
(सं. संदेश +हर)

संदेस, संदेसा
किसी के द्वारा कहा या कहलाया गया समाचार या संदेश।
संज्ञा
(सं. संदेश)
उ.- (क) तब दारुक संदेस सुनायौ-१-१८४। (ख) हाथ मुद्रिका प्रभु दई संदेस सुनायौ-९-७२।

संदेशी, संदेसी
संदेश पहुँचानेवाला, दूत, बसीठ।
संज्ञा
(सं. संदेशिन्)

सँदेसो, संदेसो, संदेसौ
किसी के द्वारा कहलाया गया समाचार।
संज्ञा
(सं. संदेश)
उ.- (क) कहियौ नन्द सँदेसौ इतनौ जब हम वै इक थान-९-८३। (ख) कही सँदेसौ पति कौ-९-८४। (ग) सँदेसौ देवकी सौं कहियौ-ना. ३७९३।

संदेह
शक, संशय, शंका।
संज्ञा
(सं.)
उ.- (क) रघुपति, मन संदेह न कीजै-९-१४८। (ख) सूरदास प्रभु अंतर्यामी भक्त संदेह हरयौ-२५५२।

संदेह
एक अर्थालंकार।
संज्ञा
(सं.)

संदेहात्मक
जिसके प्रति संदेह हो।
वि.
(सं.)

संदेहात्मक
जिसके कारण संदेह हो।
वि.
(सं.)

संदेहास्पद
जिसमें संदेह हो।
वि.
(सं. संदेह + आस्पद)

संदेहास्पद
जिसके कारण संदेह हो।
वि.
(सं. संदेह + आस्पद)

संदेहैं
संशय को।
संज्ञा
(सं. संदेह)
उ.- तेरे सब संदेहैं देहौं-३-१३।

संदोल
कर्णफूल' नाम का गहना।
संज्ञा
(सं.)

संदोह
दूध दुहना।
संज्ञा
(सं.)

संदोह
वस्तु का पूर्ण रूप।
संज्ञा
(सं.)

संदोह
झुंड, समूह।
संज्ञा
(सं.)

संदोह
ढेर, राशि।
संज्ञा
(सं.)

संध
जोड़, संधि।
संज्ञा
(सं. संधि)
उ.- जरासंध की संथी जोरथौ हुतौ, भीम ता संध को चीर डारथो-१० उ.-५१।

संधान, संधनो
जुड़ना
क्रि.अ.
(सं. संधि)

संधान
धनुष पर वाण चढ़ाकर निशाना लगाने की क्रिया, लक्ष-वेध।
संज्ञा
(सं.)
उ.- (क) सुमिरत ही अहि डस्यौ पारधी कर छूटयौ संधान-१-९७। (ख) दिति दुर्बल अति अदिति हृष्टचित, देखि सूर संधान-९-२०। (ग) तबै सूर संधान सफल हौ रिपु कौ सीस उतारौं-९-१३७। (घ) भाल-तिलक भ्रुव चाप आप लै सोइ संधान संधानत-पृ. ३३६ (६१)।

संधान
खोजने-ढूँढ़ने का व्यापार।
संज्ञा
(सं.)

संधान
मिलाना, योजन।
संज्ञा
(सं.)

संधान
जमा-खर्च करना।
संज्ञा
(सं.)

संधान
मेल या जोड़-तोड़ बैठाना।
संज्ञा
(सं.)

संधान
संधि।
संज्ञा
(सं.)

संधान
काँजी।
संज्ञा
(सं.)

संधान
अचार।
संज्ञा
(सं.)

संधान
मदिरा।
संज्ञा
(सं.)

संधानत
निशाना लगाता या लक्ष्य साधता है।
क्रि.स.
(हिं. संधानना)
उ.- भाल तिलक भ्रुव चाप आप लै सोइ संधान संधानत- पृ. ३३६ (६१)।

संधानति
निशाना लगाती या लक्ष्य साधती है।
क्रि.स.
(हिं. संधानना)
उ.- सूर सुंदरी आपु ही कहा तू शर संधानति-२२५१।

संधानना, संधाननो
धनुष पर वाण चढ़ाकर निशाना लगाना या लक्ष्य पर तीर छोड़ना।
क्रि.स.
(सं. संधान + ना, नो)

संधानना, संधाननो
प्रयोग करने के लिए किसी अस्त्र को ठीक करना।
क्रि.स.
(सं. संधान + ना, नो)

संधानना, संधाननो
जोड़ना।
क्रि.स.
(सं. संधान + ना, नो)

संधाना
अचार।
संज्ञा
(सं. संधानिका)

सँधाने
धनुष पर तीर चढ़ाकर निशाना लगाया या लक्ष्य पर तीर छोड़े।
क्रि.स.
(हिं. संधानना)
उ.- (क) मनु मदन धनु-सर सँधाने देखि घन-कोदंड-१-३०७। (ख) काम-बाण पाँचौं संधाने-१० उ.-१०५।

सँधाने
अचार।
संज्ञा
(हिं. संधान)
उ.- अंब आदि दै सबै सँधाने। सब च़ाखे गोबर्धन राने-३९६।

सँधानौं
अचार।
संज्ञा
(हिं. संधान)
उ.- तुमकौं भावत पुरी सँधानौ-१०-२११।

संधि
दो चीजों का मेल, संयोग।
संज्ञा
(सं.)
उ.- जैसे खरी कपूर दोउ यक समय यह भई ऎसी संधि-२९१२।

संधि
दो चीजों के मिलने का जोड़।
संज्ञा
(सं.)

संधि
दो राजाओं या राज्यों के बीच होनेवाला मैत्री-संबंध।
संज्ञा
(सं.)

संधि
सुलह, मित्रता।
संज्ञा
(सं.)

संधि
शरीर में दो हडिडयों के मिलने का जोड़ या गाँठ।
संज्ञा
(सं.)

संधि
व्याकरण में दो अक्षरों के मेल से होनेवाला विकार।
संज्ञा
(सं.)

संधि
नाटक में प्रयोजन-विशेष के साधक कथांशों का अन्य से होनेवाला संबंध जो पाँच प्रकार का होता है- मुख, प्रतिमुख, गर्भ, विमर्श या अवमर्श और निर्वहण।
संज्ञा
(सं.)

संधि
सेंध, छेद।
संज्ञा
(सं.)

संधि
एक काल, युग या अवस्था के अंत और दूसरे के आरंभ के बीच का समय।
संज्ञा
(सं.)
उ.- वैस-संधि सुख तजी सूर हरि गए मधुपुरी माँहीं-३२४४।

संधि
(दो चीजों के बीच की) खाली जगह, अवकाश।
संज्ञा
(सं.)
उ.- धरनि आकास भयौ परिपूरन नैंकु नहीं कहुँ संधि बचायौ-५९१।

संधि
भेद, रहस्य।
संज्ञा
(सं.)

संधि-थली
संधि के निकट का खाली स्थान।
संज्ञा
(सं. संधि +स्थल)
उ.-मनहुँ बिबर ते उरग रिंग्यो तकि गिरि के संधि थली-२०७१।

संधि राग
सिदूर, सेंदुर।
संज्ञा
(सं.)

संधि-विच्छेद
समझौता तोड़ना या टूटना।
संज्ञा
(सं.)

संधि-विच्छेद
व्याकरण में किसी पद की संधि तोड़कर शब्द अलग करना।
संज्ञा
(सं.)

संध्या
शाम, सायंकाल।
संज्ञा
(सं.)
उ.- (क) संध्या समय निकट नहि आयो, ताके ढूँढ़न कौं उठि धायौ-५-३। (ख) संध्या समय होन आयौ-७-६।

संध्या
भारतीय आर्यों की एक उपासना जो प्रातः, मध्याह्न और सायंकाल को होती है।
संज्ञा
(सं.)

संध्या
सीमा।
संज्ञा
(सं.)

संन्यस्त
जिसने संन्यास लिया हो।
वि.
(सं. संन्यास)

संन्यस्त
काम में अत्यधिक संलग्न।
वि.
(सं. संन्यास)

संन्यास
भारतीय आर्यों के चार आक्षमों में अंतिम जिसमें सब कार्य निष्काम भाव से किये जाते हैं।
संज्ञा
(सं.)

संन्यास
क्षेत्र अथवा सीमा-विशेष में ही रहकर कार्य करने का व्रत या निंश्चय।
संज्ञा
(सं.)

संन्यासी
संन्यस-आश्रम में रहने और उसके नियमों का पालन करनेवाला।
संज्ञा
(सं. सन्यासिन्)

संपजना
उगना, पैदा होना।
क्रि.अ.
(सं. सम + उपजना)

संपजना
प्रकाशित होना।
क्रि.अ.
(सं. सम + उपजना)

संपत, संपति, संपत्ति
धन दौलत, जायदाद।
संज्ञा
(सं. संपत्ति)
उ.- (क) तैसैं धन-दारा सुख-संपति बिछुरत लगै न बार-१-८४। (ख) सूरदास मोहन दरसन बिनु सुख-संपति सपना-२५४७।

संपत, संपति, संपत्ति
ऎश्वर्य, वैभव।
संज्ञा
(सं. संपत्ति)

संपत, संपति, संपत्ति
कोई बहुमूल्य लाभ या प्राप्ति, परम निधि।
संज्ञा
(सं. संपत्ति)
उ.- (क) सत संजम-तीरथ-ब्रत कीन्हैं, तब यह संपति पाई-१०-१६। (ख) जे पद-कमल संभु की संपति-५६८।

संपत, संपति, संपत्ति
लक्ष्मी जिसकी उत्पत्ति समुद्र से मानी गयी है।
संज्ञा
(सं. संपत्ति)
उ.- कहौ तौ लंकु उखारि डारि देउँ जहाँ पिता संपति को-९-८४।

संपद, संपदा
वैभव, ऎश्वर्य।
संज्ञा
(सं. संपद)
उ.- देखि ब्रज की संपदा कौं फूलै सूरजदास-१०-२६।

संपद, संपदा
धन, पूँजी।
संज्ञा
(सं. संपद)
उ.- ऎसी विधि हरि पूजै सदा। हरि-हित लावै सब संपदा-९-५।

संपद, संपदा
सिद्धि।
संज्ञा
(सं. संपद)

संपात
संगम, समागम।
संज्ञा
(सं.)

संपात
संगम-स्थान।
संज्ञा
(सं.)

संपात
वह स्थान जहाँ एक रेखा दूसरी रेखा से मिले या उसको काटे।
संज्ञा
(सं.)

संपाति, संपाती
एक गिद्ध जो गरुड़ का ज्येष्ठ पुत्र और जटायु का बड़ा भाई था। सीता की खोज में गये हुए बानर-दल को संपाती ने ही उनका पता बताया था।
संज्ञा
(सं. संपाति)
उ.- आए तीर समुद्र के, कछ सोधि न पायौ। सूर सँपाती तहँ मिल्यौ, यह बचन सुनायौ-९-७२।

संपादक
काम पूरा या संपन्न करनेवाला।
संज्ञा
(सं.)

संपादक
किसी पत्र-पत्रिका या पुस्तक के क्रम, पाठ आदि को व्यवस्थित करनेवाला।
संज्ञा
(सं.)

संपादकत्व
संपादन करने का भाव।
संज्ञा
(सं.)

संपादकीय
संपादक-संबंधी।
वि.
(सं.)

संपादकीय
संपादक का लिखा हुआ।
वि.
(सं.)

संपादन
काम पूरा करना।
संज्ञा
(सं.)

संपादन
पत्र-पत्रिका या पुस्तक का क्रम, पाठ आदि व्यवस्थित करना।
संज्ञा
(सं.)

संपादित
पूर्ण किया हुआ।
वि.
(सं.)

संपादित
जिसका क्रम, पाठ आदि व्यवस्थित क्या गया हो।
वि.
(सं.)

संपीड़न
खूब दबाना, मलना या निचोड़ना।
संज्ञा
(सं. सम्पीडन)

संपाड़न
बहुत पीड़ा या दुख।
संज्ञा
(सं. सम्पीडन)

संपुट
कटोरे या दोने के आकार की कोई वस्तु।
संज्ञा
(सं.)
उ.- जलज संपुट सुभग छबि भरि लेत उर जनु धरनि-१०-१०९।

संपुट
पत्ते का बना दोना।
संज्ञा
(सं.)

संपुट
डिब्बा, पिटारी।
संज्ञा
(सं.)

संपुट
अंजुली।
संज्ञा
(सं.)

संपुट
फूल का कोश।
संज्ञा
(सं.)

संपद, संपदा
सौभाग्य।
संज्ञा
(सं. संपद)
उ.- सूरदास संपदा-आपदा जिनि कोऊ पतिआइ-१-२६५।

संपन्न
पूर्ण या सिद्ध किया हुआ।
वि.
(सं.)

संपन्न
सहित, युक्त।
वि.
(सं.)
उ.- सत्य-सील-सपन् सुमूरति-१-६९।

संपन्न
धन-धान्य से पूर्ण।
वि.
(सं.)

संपन्न
धनी।
वि.
(सं.)

संपर्क
लगाव, संसर्ग, संबंध।
संज्ञा
(सं.)

संपर्क
मेल, संयोग।
संज्ञा
(सं.)

संपर्क
स्पर्श।
संज्ञा
(सं.)

संपा
बिजली, विद्युत।
संज्ञा
(सं.)

संपात
एक साथ गिरना।
संज्ञा
(सं.)

शिखी
मुर्गा।
संज्ञा

शिखी
अग्नि।
संज्ञा

शिखी
तीन की संख्या।
संज्ञा

शिखी
दीपक।
संज्ञा

शिगूफा
कली।
संज्ञा
(फ़ा. शिगूफ़ा)

शिगूफा
फूल।
संज्ञा
(फ़ा. शिगूफ़ा)

शिगूफा
अनोखी या विचित्र बात।
संज्ञा
(फ़ा. शिगूफ़ा)
मुहा.- शिगूफा खिलाना- विनोद या झगड़ा कराने के लिए कोई नयी बात छेड़ देना। शिगूफा खिलना - विनोद या झगड़े के लिए कोई नयी बात छिड़ना। शिगूफा छोड़ना- (१) विचित्र बात कहना। (२) विनोद या झगड़े के लिए कोई बात कह देना।

शिति
सफेद।
वि.
(सं.)

शिति
काला, नीला।
वि.
(सं.)

शितिकंठ
शिव, महादेव।
संज्ञा
(सं.)

संप्रज्ञात
वह समाधि जिसमें विशयों के बोध से सर्वथा निवृत्त न होने के कारण आत्मा को अपने स्वरूप का पूरा-पूरा ज्ञान नहीं होता।
संज्ञा
(सं.)

संप्रति
इस समय, आजकल, अभी।
अव्य.
(सं.)

संप्रद
देनेवाला, दाता।
वि.
(सं.)

संप्रदान
(दान आदि) देने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(सं.)

संप्रदान
शिष्य को मंत्र या दीक्षा देना।
संज्ञा
(सं.)

संप्रदान
(व्याकरण में) वह कारक जिसमें कोई शब्द 'देना' क्रिया का लक्ष्य होता है।
संज्ञा
(सं.)

संप्रदाय
कोई विशेष धर्म-संबंधी मत।
संज्ञा
(सं.)

संप्रदाय
किसी सिद्धांत या मत के अनुयायियों का वर्ग या समूह।
संज्ञा
(सं.)

संप्रदाय
मार्ग, पथ।
संज्ञा
(सं.)

संप्रदाय
परिपाटी।
संज्ञा
(सं.)

संपुट
मुँहबंद पात्र।
संज्ञा
(सं.)

सँपुटी
कटोरी, प्याली।
संज्ञा
(सं. संपुट)

सँपूरन
पूर्ण, संपूर्ण।
वि.
(सं. संपूर्ण)
उ.- अष्टम मास सँपूरन होइ-३-१३।

सँपूरन
सफल, सिद्ध।
वि.
(सं. संपूर्ण)
उ.- भयो पूरब फल सँपूरन लह्यौ सुत दैतारी-२६२७।

सँपूरन
समाप्त।
वि.
(सं. संपूर्ण)
उ.- एक भोजन करि सँरूपन गई वैसेहि त्यागि- पृ. ३३९ (८४)।

संपूर्ण
खूब भरा हुआ।
वि.
(सं.)

संपूर्ण
सब, सारा।
वि.
(सं.)

संपूर्ण
खतम, समाप्त।
वि.
(सं.)

संपूर्ण
वह राग जिसमें सातों स्वर लगते हों।
संज्ञा

संपूर्णतः
पूर्ण रूप से।
क्रि.वि.
(सं.)

संपूर्णतया
भली भाँति।
क्रि.वि.
(सं.)

संपूर्णता
पूरा या सम्पूर्ण होने का भाव।
संज्ञा
(सं.)

संपूर्णता
अंत, समाप्ति।
संज्ञा
(सं.)

संपृक्त
संसर्गक या संबंध में आया हुआ, संबद्ध।
वि.
(सं.)

संपृक्त
मिला हुआ।
वि.
(सं.)

सँपेरा
साँप पालने और उसका तमाशा दिखानेवाला मदारी।
संज्ञा
(हिं. साँप)

संपै
धन-संपत्ति।
संज्ञा
(सं. संपत्ति)

सँपोला
साँप का बच्चा।
संज्ञा
(हिं. साँप +ओला)

सँपोलिया
साँप का बहुत छोटा बच्चा।
संज्ञा
(हिं. सँपोला +इया)

संपोषण
भली भाँति पालन-पोषण करने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(सं.)

संबंध
(व्याकरण में) एक कारक जिससे एक शब्द के साथ दूसरे का लगाव या संबंध सूचित होता है।
संज्ञा
(सं.)

संबंधातिशयोक्ति
अशियोक्ति' अलंकार का एक भेद।
संज्ञा
(सं.)

संबंधित
संबंध-युक्त।
वि.
(सं.)

संबंधी
लगाव या संपर्क रखनेवाला।
वि.
(सं. संबंधिन्)

संबंधी
सिलसिले या प्रसंग का, विषयक।
वि.
(सं. संबंधिन्)

संबंधी
रिश्तेदार, नातेदार।
संज्ञा

संबत
साल, वर्ष, संवत्सर।
संज्ञा
(सं. संवत्)
उ.- (क) द्वापर सहस एक की भई। कलियुग सत संबत रहि गई-१-२३०। (ख) सत संबत मानुष की आइ। आधी तो सोवत ही जाइ-७-८।

संबद्ध
जिससे संबंध हो।
संज्ञा
(सं.)

संबद्ध
बँधा या जुडा हुआ।
संज्ञा
(सं.)

संबद्ध
संयुक्त, सहित।
संज्ञा
(सं.)

संप्राप्त
आया या पहुँचा हुआ, उपस्थित।
वि.
(सं.)

संप्राप्त
पाया हुआ।
वि.
(सं.)

संप्राप्त
जो हुआ हो, घटित।
वि.
(सं.)

संप्रेक्षक
देखनेवाला, दर्शक।
संज्ञा
(सं.)

संप्रेक्षण
जाँच या निरीक्षण करना।
संज्ञा
(सं.)

संबंध
साथ-साथ बँधना, जुड़ना या मिलना।
संज्ञा
(सं.)

संबंध
वास्ता, लगाव, संपर्क।
संज्ञा
(सं.)

संबंध
रिश्ता, नाता।
संज्ञा
(सं.)

संबंध
बहुत मेल-जोल।
संज्ञा
(सं.)

संबंध
विवाह या उसका निश्चय।
संज्ञा
(सं.)

संबर
एक दैत्य जो कामदेव का शत्रु था।
संज्ञा
(सं. शंबर)

संबर
एक शस्त्र।
संज्ञा
(सं. शंबर)

संबर
युद्ध।
संज्ञा
(सं. शंबर)

संबल
राह का भोजन।
संज्ञा
(सं.)

संबल
वह साधन जिसके भरोसे पर कोई काम किया जाय।
संज्ञा
(सं.)

संबल
सहारा, आश्रय।
संज्ञा
(सं.)

संबाद
वार्तालाप, संवाद।
संज्ञा
(सं. संवाद)
उ.- कपिलदेव बहुरौ यौं कहथौ। हमैं-तुम्हैं संबाद जु भयौ-३-१३।

संबुद्ध
जिसे ज्ञान हो गया हो।
वि.
(सं.)

संबुद्ध
गौतम बुद्ध।
संज्ञा
(सं.)

संबुद्ध
(जैनियों के) जिन देव।
संज्ञा
(सं.)

संबोधन
जगाना।
संज्ञा
(सं.)

संबोधन
पुकारना।
संज्ञा
(सं.)

संबोधन
समझाना-बुझाना।
संज्ञा
(सं.)

संबोधन
जताना, विदित कराना।
संज्ञा
(सं.)

संबोधन
घीरज या सांत्वना देना।
संज्ञा
(सं.)

संबोधन
(व्याकरण में) वह कारक जिससे शब्द का किसी को पुकारना या बुलाना सूचित हो।
संज्ञा
(सं.)

संबोधन
(नाटक में) आकाश-भाषित।
संज्ञा
(सं.)

संबोधना, संबोधनो
समझाना-बुझाना, प्रबोधना।
क्रि.स.
(सं.)

संबोधित
जिसे पुकारा जाय।
वि.
(सं.)

संभर
भरण-पोषण करनेवाला।
वि.
(सं.)

संभरण
पालन-पोषण की व्यवस्था या साधन।
संज्ञा
(सं.)

संभरण
योजना।
संज्ञा
(सं.)

सँभरना, सँभरनो, सँभलना, सँभलनो
बोझ आदि का थामा या रोका जा सकना।
क्रि.अ.
(हिं. सँभलना)

सँभरना, सँभरनो, सँभलना, सँभलनो
सहारे या आधार पर ठहर सकना।
क्रि.अ.
(हिं. सँभलना)

सँभरना, सँभरनो, सँभलना, सँभलनो
सचेत या सावधान होना।
क्रि.अ.
(हिं. सँभलना)

सँभरना, सँभरनो, सँभलना, सँभलनो
गिरने, चोट खाने या हानि होने से बचना।
क्रि.अ.
(हिं. सँभलना)

सँभरना, सँभरनो, सँभलना, सँभलनो
बुरी दशा या स्थिति से बचे रहना।
क्रि.अ.
(हिं. सँभलना)

सँभरना, सँभरनो, सँभलना, सँभलनो
निर्वाह हो सकना।
क्रि.अ.
(हिं. सँभलना)

सँभरना, सँभरनो, सँभलना, सँभलनो
स्वास्थ्य-लाभ करना।
क्रि.अ.
(हिं. सँभलना)

संभव
उत्पत्ति।
संज्ञा
(सं. सम्भव)

संभव
संयोग, समागम।
संज्ञा
(सं. सम्भव)

संभव
हेतु, कारण।
संज्ञा
(सं. सम्भव)

संभव
उत्पन्न।
वि.

संभव
हो सकने योग्य।
वि.

संभवतः
संभव है कि।
अव्य.
(सं.)

संभवत
संभव होता या हो सकता है, सधता है।
क्रि.अ.
(हिं. संभवना)
उ.- धर्म-स्थापन-हेतु पुनि धारथो नर अवतार। ताको पुत्र-कलत्र सों नहिं संभवत पियार-१० उ.-४७।

संभवतया
संभव है कि।
अव्य.
(सं.)

संभवना, संभवनो
पैदा या उत्पन्न करना।
क्रि.स.
(हिं. संभव + ना)

संभवना, संभवनो
पैदा या उत्पन्न होना।
क्रि.अ.

संभवना, संभवनो
हो सकना।
क्रि.अ.

संभवनीय
जो हो सकता हो।
वि.
(सं.)

सँभार
होश-हवास, ध्यान, (तन-बदन की) सुध।
संज्ञा
(हिं. सँभालना)
उ.- (क) ब्याकुल भई गोपालहिं बिछुरे गयो गुन ज्ञान सँभार-३२१५। (ख) भोजन-भूषन की सुधि नाहीं, तनु की नहीं सँभार- पृ. ३३९ (८३)। (ग) मैमत भए जीव-जल-थल के तनु की सुधि न सँभार-पृ. ३४७ (५२)।

सँभार
निगरानी, देखरेख।
संज्ञा
(हिं. सँभालना)
उ.-सूरदास प्रभु अपने ब्रज की काहे न करत सँभार-२८२०।

सँभार
पालन-पोषण।
संज्ञा
(हिं. सँभालना)

सँभार
सार-सँभार- पालन-पोषण, देखभाल।
यौ.

सँभार
वश में रखने का भाव, रोक, निरोध।
संज्ञा
(हिं. सँभालना)

सँभार
सावधानी के साथ, सचेत होकर।
क्रि.अ.
उ.- प्रबल सत्रु आहै यह मार। यातैं संतौ, चलौ सँभार-१-२२९।

संभार
इकट्ठा या एकत्र करना, संचय।
संज्ञा
(सं.)

संभार
तैयारी, साज-सामान।
संज्ञा
(सं.)

संभार
भांडार, आगार।
संज्ञा
(सं.)

शिखर
पहाड़ की चोटी।
संज्ञा
(सं.)
उ.- मारूत सोर करत चातक पिक अरू नग शिखर सुहाई-२८२१।

शिखर
कँगूरा, कलश, गुंबद।
संज्ञा
(सं.)

शिखर
एक रत्न जो अनारदाने की तरह लाल और सफेद होता है।
संज्ञा
(सं.)
उ.- श्रीफल सकुचि रहे दुरि कानन शिखर हियो बिहरान।

शिखर
कुंद की कली।
संज्ञा
(सं.)

शिखरन
दही और चीनी से बना हुआ एक प्रसिद्ध पेय।
संज्ञा
(सं. शिखरिणी)

शिखरिणी
एक वर्णवृत्ति।
संज्ञा
(सं.)

शिखरा
एक गदा जो विश्वामित्र ने श्रीरामचंद्र को दी थी।
संज्ञा
(सं. शिखर)

शिखा
चोटी, चुटिया।
संज्ञा
(सं.)

शिखा
शिखा-सूत्र - चोटी और जनेऊ।
यौ.

शिखा
पंखों का गुच्छा, कलगी।
संज्ञा
(सं.)

संभार
सजावट।
संज्ञा
(सं.)

संभार
धन-सम्पत्ति।
संज्ञा
(सं.)

संभार
पालना-पोषण।
संज्ञा
(सं.)

संभार
देख-रेख, रखवाली।
संज्ञा
(सं.)

संभार
प्रबंध।
संज्ञा
(सं.)

सँभारत
सचेत या सावधान होता है।
क्रि.स.
(हिं. सँभालना)
उ.- कर्म सुख-हित करत होत दुःख नित, तऊ नर मूढ़ नाहीं सँभारत-८-१६।

सँभारत
रक्षा करता या बचाता है, देखरेख रखता है।
क्रि.स.
(हिं. सँभालना)
उ.- क्यौं न सँभारत ताहि-१-३२५।

सँभारति
रोक या पकड़ में रखती है, सँभालती है
क्रि.स.
(हिं. सँभालना)
उ.- अंचल नहीं सँभारति-२५६२।

सँभारना, सँभारनो
याद या स्मरण करना।
क्रि.स.
(सं. संभार)

सँभारना, सँभारनो
सँभालना।
क्रि.स.
(सं. संभार)

सँभारहि
सचेत या सावधान हो जाना।
क्रि.स.
(हिं. संभालना)
उ.- तातैं कहत सँभारहि रे नर, काई कौं इतरात-२-२२।

सँभारि
स्मरण द्वारा संचित करके।
क्रि.स.
(हिं. सँभारना)
उ.- (क) चतुरानन बल सँभारि मेघनाद आयो-९-९६। (ख) पूरब प्रीति सँभारि हमारे तुमको कहन पठायौ-३०६३।

सँभारि
नष्ट होने, खोने या बिगड़ने से बचाओ।
क्रि.स.
(हिं. सँभारना)
उ.- पाछैं भई सु भई सूर जन अजहुँ समुझि सँभारि-२-३१।

सँभारि
सकै सँभारि-बचा सकता या रक्षा कर सकता है।
प्र.
उ.- घालति छुरी प्रेम की बानी, सूरदास को सकै सँभारि-११६४।

सँभारि
सँभल जा, सावधान हो जा।
क्रि.स.
(हिं. सँभारना)
उ.- कह्यौ असुर, सुरपति सँभारि। लै करि बज्र मोहिं परडारि-६-५।

सँभारि
रोककर, काबू या नियंत्रण में रखकर।
क्रि.स.
(हिं. सँभारना)
मुहा.-सकी सँभारि-सम्हाल सकी। उ,- कठिन वचन सुनि स्त्रवन जानकी, सकी न वचन सँभारि-९-८९। मुख सँभारि-वाणी पर नियंत्रण रखकर। उ.- ये सब ढीठ गरब गोरस कैं, मुख सँभारि बोलतिं नहिं बात-१०-३०८।

सँभारि
सँभालकर, सावधानी के साथ।
क्रि.वि.
उ.- और सँभारि मनोरथ धरै-१० उ.-१०५।

सँभारि
होश-हवास, चेत, तन-बदन की सुध।
संज्ञा
(हिं. सँभार)
उ.- (क) काम-अंध कछु रहि न सँभारि। दुर्बासा रिषि कौं पग मारि-६-७। (ख) अंग अभरन उलटि साजे, रही कछु न सँभारि- पृ. ३३० (९३)।

संभारी
भरा हुआ, पूर्ण।
वि.
(सं. सम्भारिन्)

संभारी
चेते या ध्यान किया।
क्रि.स.
(हिं. सँभारना)
मुहा.- सुधि सँभारी-चेतना या ध्यान ठीक रखा। उ.-जमुना जू थकित भई, नहीं सुधि सँभारी-६४९।

सँभारे
सावधानी के साथ।
क्रि.वि.
(हिं. सँभालना)
उ.- बँधू, करियौ राज सँभारे-९-५४।

सँभारे
याद या स्मरण किया।
क्रि.स.
उ.- (क) जे पद-पदुम तात-रिस त्रासत मन-क्रम-बच प्रहलाद सँभारे-१-९४। (ख) तब तैं गोविंद क्यौं न सँभारे-१-३३४।

सँभारै
रक्षा, देखभाल या रखवाली करे।
क्रि.स.
(हिं. सँभालना)
उ.- (क) ऎसे बल बिन कौन सँभारै-१०५८। (ख) बिबस भई तनु न सँभारै री-११८४।

सँभारै
रोके, वश या काबू में रखे, सावधान रहे।
क्रि.स.
(हिं. सँभालना)
उ.- बिरही कहाँ लौ आपु सँभारै-३१८९।

सँभारौ
याद या स्मरण किया।
क्रि.स.
(हिं. सँभालना)
उ.- राग-द्वेष बिधि अबिधि असुचि सुचि जिहिं प्रभु जहाँ सँभारौ। कियौ न कबहुँ बिलंब कृपा निधि, सादर सोच निवारौ-१-१५७।

सँभारौ
स्मरण या याद करके एकत्र करो।
क्रि.स.
(हिं. सँभालना)
उ.- द्विरद कौ दंत उपटाय तुम लेत हौ, उहै बल आजु काहे न सँभारौ-२६०२। रोक, पकड़ या काबू में रखो।
मुहा.- बात करि मुख सँभारौ-वाणी पर नियंत्रण रख कर बात करो। उ.- बारन हौं करौं बारन सहित फटकिबौं, बावरे, बात कहि मुख सँभारौ-२६९०।

सँभारौ
आक्रमण के लिए ग्रहण किया।
क्रि.स.
(हिं. सँभालना)
उ.- दुरबासा कौं चक्र सँभारौ-१-७२।

सँभारौ
सचेत या सावधान होकर-अपनी रक्षा का प्रबंध करो।
क्रि.स.
(हिं. सँभालना)
उ.- जग्य माहिं तुम पसु जे मारे। ते सब ठाढ़े सस्त्रनि धारे। जोहत हैं वे पंथ तिहारौ। अब तुम अपनी आप सँभारौ-४-१२।

सँभारयो, सँभारयौ
(प्रहार करने को) लिया, उठाया, थामा।
क्रि.स.
(हिं. सँभालना)
उ.- जब जब भीर परी संतनि कौं चक्र सुदरसन तहा सँभारयौं-१-१४।

सँभारयो, सँभारयौ
स्मरण या याद किया।
क्रि.स.
(हिं. सँभालना)
उ.- अंध-अचेत-मूढ़मति बौरे! सो प्रभु क्यौं न सँभारयौ-१-३३६।
मुहा.- बैर सँभारयौ-पिछले बैर का स्मरण करके बदला लेने को प्रवृत्त हुआ। उ.- गरजि गरजि घन बरसन लागे, मानो सुरपति निज बैर सँभारयौ-२८३२।

सँभारयो, सँभारयौ
रक्षा की, बचाया।
क्रि.स.
(हिं. सँभालना)
उ.- काल तहीं तिहीं पकरि सँभारयौ। सखा प्रानपति तउ न सँभारयौ-४-१२।

सँभारयो, सँभारयौ
भार ऊपर लिया, भार उठाये रहा।
क्रि.स.
(हिं. सँभालना)
उ.- धरनि सीस धरि सेस गरब धरथौ, इहिं भर अधिक सँभारयौ-५६७।

सँभाल
रक्षा।
संज्ञा
(सं. सम्भार)

सँभाल
भरण-पोषण।
संज्ञा
(सं. सम्भार)

सँभाल
देखरेख।
संज्ञा
(सं. सम्भार)

सँभाल
प्रबंध, व्यवस्था।
संज्ञा
(सं. सम्भार)

सँभाल
होश-हवास, चेत, तन-बदन की सुध।
संज्ञा
(सं. सम्भार)

सँभालना, सँभालनो
भार ऊपर ले सकना या रखे रहना।
क्रि.स.
(सं. सभार)

सँभालना, सँभालनो
रोक, पकड़ या काबू में रखना।
क्रि.स.
(सं. सभार)

सँभालना, सँभालनो
हटने, गिरने या खिसकने से रोकना, थामना।
क्रि.स.
(सं. सभार)

सँभालना, सँभालनो
सहारा देना।
क्रि.स.
(सं. सभार)

सँभालना, सँभालनो
रक्षा करना।
क्रि.स.
(सं. सभार)

सँभालना, सँभालनो
बुरी दशा होने से बचाना।
क्रि.स.
(सं. सभार)

सँभालना, सँभालनो
पालन पोषण करना।
क्रि.स.
(सं. सभार)

सँभालना, सँभालनो
देखरेख करना।
क्रि.स.
(सं. सभार)

सँभालना, सँभालनो
प्रबंध या व्यवस्था करना।
क्रि.स.
(सं. सभार)

सँभालना, सँभालनो
निर्वाह करना।
क्रि.स.
(सं. सभार)

सँभालना, सँभालनो
रोग, व्यधि आदि की रोक-थाम करना।
क्रि.स.
(सं. सभार)

सँभालना, सँभालनो
सहेजना।
क्रि.स.
(सं. सभार)

सँभालना, सँभालनो
मनोवेग को रोकना।
क्रि.स.
(सं. सभार)

सँभाला
मरने के पहले सहसा चेतना-सी आ जाना।
संज्ञा
(हिं. सँभालना)
मुहा.-सँभाला लेना- मरने के पहले रोगी का सचेत होना या सँभल जाना।

संभावना
अनुमान, कल्पना।
संज्ञा
(सं. सम्भावना)

संभावना
हो सकना, मुमकिन होना।
संज्ञा
(सं. सम्भावना)

संभावना
एक काव्यालंकार।
संज्ञा
(सं. सम्भावना)

संभावना
क्रिया, कार्य।
संज्ञा
(सं. सम्भावना)

संभावित
जो हो सकता हो।
वि.
(सं. सम्भावित)

संभावित
ध्यान या कल्पना के योग्य।
वि.
(सं. सम्भावित)

संभावित
सम्मान का ध्यान रखनेवाला, स्वाभिमानी।
वि.
(सं. सम्भावित)

संभाव्य
जो हो सकता हो।
वि.
(सं. संम्भाव्य)

संभाव्य
अनुमान या कल्पना के योग्य।
वि.
(सं. संम्भाव्य)

संभाषण, संभाषन
बातचीत, कथोपकथन।
संज्ञा
(सं. सम्भाषण)
उ.- नैन सैन संभाषन कीन्हौ, प्यारी की उर तपनि मिटाई-७०१।

संभाषी
बात करनेवाला।
वि.
(सं. सम्भाषिन्)

संभीत
डरा हुआ, भयभीत।
वि.
(सं. सम्भीत)

संभु
शिव, महादेव।
संज्ञा
(सं. शम्भु)
उ.- (क) संभु की सपथ, सुनि कुकपि, कायर, कृपन, स्वास, आकास बनचर उड़ाउँ-९-१२९। (ख) जे पद कमल संभु की संपति-५६८।

संभु-भूषण, संभु-भूषन
चंद्रमा।
संज्ञा
(सं. शम्भु-भूषण)
उ.- मनहुँ सोभित अभ्र-अंतर संभु-भुषन वेष-६३५।

संभूत
उत्पन्न।
वि.
(सं. सम्भूत)

संभूत
एक साथ उत्पन्न होनेवाले।
वि.
(सं. सम्भूत)

संभूत
युक्त, सहित।
वि.
(सं. सम्भूत)

संभूय
एक साथ, साझे में।
अव्य.
(सं. सम्भूय)

संभृत
एकत्र।
वि.
(सं. सम्भृत)

संभृत
पोषित।
वि.
(सं. सम्भृत)

संभेद
मिले हुए प्राणियों, पदार्थों आदि का वियोग या अलगाव।
संज्ञा
(सं. सम्भेद)

संभेद
विरोध कराने की नीति।
संज्ञा
(सं. सम्भेद)

संभेद
किस्म, प्रकार।
संज्ञा
(सं. सम्भेद)

संभोग
वस्तु आदि का सुख-पूर्वक उपयोग या व्यवहार।
संज्ञा
(सं. सम्भोग)

संभोग
रतिक्रीड़ा।
संज्ञा
(सं. सम्भोग)

संभोग
संयोग श्रृंगार।
संज्ञा
(सं. सम्भोग)

संभोग
भोग-विलास की सामग्री या साधन।
संज्ञा
(सं. सम्भोग)
उ.- जदपि कनकमय रची द्वारका सखी सकल संभोग-१० उ.-१०२।

संभोगी
संभोग करनेवाला।
वि.
(हिं. संभोग)

संभोग्य
जिसका सुख भोगा जाय।
वि.
(सं. संभोग्य)

संभोग्य
व्यवहार या उपयोग के उपयुक्त।
वि.
(सं. संभोग्य)

संभ्रम
उतावली, आतुरता।
संज्ञा
(सं. सम्भ्रम)

संभ्रम
भ्रम में पड़ने की घबराहट या व्याकुलता।
संज्ञा
(सं. सम्भ्रम)

संभ्रम
दौड़धूप, प्रयत्न।
संज्ञा
(सं. सम्भ्रम)

संभ्रम
उत्कंठा।
संज्ञा
(सं. सम्भ्रम)

संभ्रम
आदर, मान।
संज्ञा
(सं. सम्भ्रम)

संभ्रम
उतावली या आतुर होकर।
क्रि.वि.
उ.- सूर सुनत संभ्रम उठि दौरत, प्रेम-मगन, तन दसा बिसारे-१-२४०।

संभ्रमना, संभ्रमनो
उतावली या आतुरता होना।
क्रि.अ.
(सं. सम्भ्रम)

संभ्रमना, संभ्रमनो
भ्रम में पड़ने की घबराहट या व्याकुलता होना।
क्रि.अ.
(सं. सम्भ्रम)

संभ्रमना, संभ्रमनो
उत्कंठा होना।
क्रि.अ.
(सं. सम्भ्रम)

संभ्रम्यो, संभ्रम्यौ
भ्रम में पड़ने से घबराहट या व्याकुलता हुई।
क्रि.अ.
(सं. सम्भ्रम)
उ.- जगत पितामह संभ्रम्यौ, गयौ लोक फिरि आइ-४९२।

संभ्रांत
भ्रम में पड़ने से घबराया हुआ या व्याकुल।
वि.
(सं. सम्भ्रान्त)

संभ्रांत
सम्मानित, प्रतिष्ठित।
वि.
(सं. सम्भ्रान्त)

संभ्राजना, लंभ्राजनो
पूर्णतया सुशोभित होना।
क्रि.अ.
(सं. सम्भ्राज)

संमत
मान्य, सम्मति-युक्त।
वि.
(सं. सम्मत)
उ.-यह प्रसिद्ध सबहीं को संमत बड़ौ बड़ाई पावै-१-१९२।

संयंता
संयमी, निग्रही।
संज्ञा
(सं. संयंतृ)

संयत
बँधा हुआ, बद्ध।
वि.
(सं.)

संयत
पकड़ या दबाव में रखा हुआ।
वि.
(सं.)

संयत
व्यवस्थित, नियमबद्ध।
वि.
(सं.)

संयत
निग्रही, संयमी।
वि.
(सं.)

शिखा
आग की लपट।
संज्ञा
(सं.)

शिखा
दीप की लौ।
संज्ञा
(सं.)

शिखा
नोक, सिरा।
संज्ञा
(सं.)

शिखा
शिखर।
संज्ञा
(सं.)

शिखि
मोर, मयूर।
संज्ञा
(सं.)
उ.- चीरि फारि करिहौं भगौहौं शिखिनि शिखी लवलेस।

शिखि
अग्नि।
संज्ञा
(सं.)

शिखि
तीन की संख्या।
संज्ञा
(सं.)

शिखिवाहन
कुमार कार्तिकेय।
संज्ञा
(सं.)

शिखी
जिसके चोटी हो।
वि.
(सं. शिखिन्)

शिखी
मोर, मयूर।
संज्ञा
उ.- कुटिल कच भू तिलक रेखा सीस शिखी शिखंड।

संयत
सीमा या मर्यादा के भीतर रहनेवाला।
वि.
(सं.)

संयम
रोक, दाब।
संज्ञा
(सं.)

संयम
निग्रह, चित्तवृत्ति-निरोध का कार्य।
संज्ञा
(सं.)

संयम
बुरी या हानिकारक बातों से बचने का भाव या कार्य।
संज्ञा
(सं.)

संयम
बाँधना, बंधन।
संज्ञा
(सं.)

संयम
सीमा या औचित्य के भीतर होना या रहना।
संज्ञा
(सं.)

संयम
योग में ध्यान, घारणा और समाधि का साधन।
संज्ञा
(सं.)

संयमन
दाब, रोक।
संज्ञा
(सं.)

संयमन
चित्त-वृत्ति-निरोध, निग्रह।
संज्ञा
(सं.)

संयमन
बाँधना, कसना।
संज्ञा
(सं.)

संयमन
खींचना, तानना।
संज्ञा
(सं.)

संयमन
यमपुर।
संज्ञा
(सं.)

संयमनी
यमपुरी।
संज्ञा
(सं.)

संयमित
रोक या दाब में रखा हुआ।
वि.
(सं.)

संयमित
दमन किया हुआ।
वि.
(सं.)

संयमित
बँधा या कसा हुआ।
वि.
(सं.)

संयमित
संयम या निग्रह के द्वारा रोका हुआ।
वि.
(सं.)

संयमी
मनोभावों को वश मे रखनेवाला, आत्मनिग्रही।
वि.
(सं. संयमिन्)

संयमी
बुरी या हानि कारक बातों से बचनेवाला।
वि.
(सं. संयमिन्)

संयुक्त
जुड़ा, सटा या लगा हुआ।
वि.
(सं.)

संयुक्त
मिला हुआ।
वि.
(सं.)

संयुक्त
साथ रहकर या मिलकर काम करनेवाला।
वि.
(सं.)

संयुक्त
साथ, सहित।
वि.
(सं.)

संयुक्त
पूर्ण, समन्वित।
वि.
(सं.)

संयुग
मेल, मिलाप।
संज्ञा
(सं.)

संयुग
भिड़त।
संज्ञा
(सं.)

संयुग
लड़ाई, यद्ध।
संज्ञा
(सं.)

संयुत
जुड़ा, बँधा या लगा हुआ।
वि.
(सं.)

संयुत
साथ, सहित, संबद्ध।
वि.
(सं.)
उ.- मनो मर्कत कनक संयुत खच्यो काम सँवारि-१५६४।

संयूत
साथ, सहित, संयुक्त।
वि.
(सं.)
उ.- जहाँ आदि निजलोक महानिधि रमा सहस संयूत-सारा. १४।

संयोगी
मिलने या मिलानेवोला।
वि.
(सं. संयोगिन्)

संयोगी
जो प्रिया या प्रेमिका के साथ हो।
वि.
(सं. संयोगिन्)
उ.-अधर सुधा-रस सुकृत पान दै, कान्ह भए अति भोगी।¨¨¨¨ तासों रहत सँयोगी- सारा. ५६७।

संयोजक
जोड़न या मिलानेवला।
संज्ञा
(सं.)

संयोजक
व्याकरण में दो शब्दों, उपवाक्यों या वाक्यों के बीच में आकर उन्हें जोड़नेवाला शब्द।
संज्ञा
(सं.)

संयोजक
समिति का वह सदस्य जिसे बैठक बुलाने और उसकी अध्यक्षता करने का अधिकार दिया जाय।
संज्ञा
(सं.)

संयोजन
जोड़ने या मिलाने की क्रिया।
संज्ञा
(सं.)

संयोजन
आयोजन, व्यवस्था।
संज्ञा
(सं.)

संयोजित
जोड़ा या मिलाया हुआ।
वि.
(सं.)

संयोज्य
जोड़ने या मिलाने योग्य।
वि.
(सं.)

संयोज्य
जो जोड़ा या मिलाया जाने को हो।
वि.
(सं.)

संयोग
मिलावट, मिश्रण।
संज्ञा
(सं.)

संयोग
मिलाप, संभोग, समागम (श्रृंगार)।
संज्ञा
(सं.)

संयोग
लगाव, संबंध।
संज्ञा
(सं.)
उ.- (क) तदपि मनहिं बसत बंसीवट ललिता के संयोग-१० उ.-१०२।

संयोग
सहवास, रतिक्रीड़ा।
संज्ञा
(सं.)

संयोग
मतैक्य।
संज्ञा
(सं.)

संयोग
जोड़, योग।
संज्ञा
(सं.)

संयोग
दो या कई बातों का सहसा एक साथ हो जाना, इत्तफाक।
संज्ञा
(सं.)
उ.- सबै संयोग जुरे है सजनी हठि करि घोष उजारयो-२८३२।
मुहा.- संयोग से- बिना पूर्वनीश्चय या किसी योजना के, अकस्मात।

संयोग
अवसर।
संज्ञा
(सं.)
उ.- आंवत जात डगर नहिं पावत गोबर्द्धन पूजा संयोग-९१९।

संयोग, श्रृंगार
श्रृंगार रस का वह विभाग जिसमें प्रेमियों के मिलन या संयोग आदि का वर्णन हो।
संज्ञा
(सं.)

संयोगी
मिला हुआ।
वि.
(सं. संयोगिन्)

संयोना
सजाना।
क्रि.स.
(हिं. सँजोना)

संरक्षक
देखरेख या रक्षा करनेवाला।
संज्ञा
(सं.)

संरक्षक
पालन-पोषन करने और आश्रय में रखनेवाला।
संज्ञा
(सं.)

संरक्षक
अभिभावक।
संज्ञा
(सं.)

संरक्षण
हानि, विपत्ति आदि से रक्षा करना।
संज्ञा
(सं.)

संरक्षण
आश्रय या देखरेख में रखकर पालन-पोषण या संवर्द्धन करना।
संज्ञा
(सं.)

संरक्षण
देखरेख, निगरानी।
संज्ञा
(सं.)

संरक्षण
अधिकार।
संज्ञा
(सं.)

संरक्षित
सँभालकर रखा या बचाया हुआ।
वि.
(सं.)

संरक्षित
देखरेख या संरक्षा में लिया हुआ।
वि.
(सं.)

संलाप
नाटक का वह संवाद जिसमें क्षोभ या आवेग न होकर धीरता हो।
संज्ञा
(सं.)

संलापक
संलाप करनेवाला।
संज्ञा
(सं.)

संलापक
नाटक का वह संवाद जिसमें धीरता हो।
संज्ञा
(सं.)

संलापक
एक प्रकार का उपरूपक।
संज्ञा
(सं.)

संवत, संवत्
साल, वर्ष।
संज्ञा
(सं. संवत्)
उ.- सत संवत आयु कुल होई-१० उ.-१०३।

संवत, संवत्
चालू वर्ष-गणना का कोई वर्ष।
संज्ञा
(सं. संवत्)

संवत, संवत्
महाराज विक्रमादित्य के समय से प्रचलित वर्ष-गणना का कोई वर्ष।
संज्ञा
(सं. संवत्)

संवत्सर
साल, वर्ष।
संज्ञा
(सं.)
उ.- सरस संवत्सर लीला गावै जुगल तरन चित लावै- सारा. ११०७।

सँवर
स्मरण।
संज्ञा
(सं. स्मृति)

सँवर
हाल, समाचार, वृत्तान्त।
संज्ञा
(सं. स्मृति)

संलक्षण
लखना, पहचानना।
संज्ञा
(सं.)

संलक्षित
लखा या पहचाना हुआ।
वि.
(सं.)

संलक्षित
लक्षणों से जाना हुआ।
वि.
(सं.)

संलक्ष्य
जो देखने में आ सके।
वि.
(सं.)

संलक्ष्य-क्रम-व्यंग्य
वह व्यंजना जिसमें वाच्यार्थ के उपरांत व्यंग्यार्थ-बोध का क्रम लक्षित हो।
संज्ञा
(सं.)

संलग्न
लगा या सटा हुआ।
वि.
(सं.)

संलग्न
जुड़ा हुआ, संबद्ध।
वि.
(सं.)

संलग्न
जो अन्त में जुड़ा या लगा हो।
वि.
(सं.)

संलाप
बातचीत, वार्तालाप।
संज्ञा
(सं.)

संलाप
आप ही कुछ बोलना या बड़बड़ाना जो पूर्व राग की दस दशाओं के अंतर्गत एक दशा है।
संज्ञा
(सं.)

संवर
रोक, परिहार।
संज्ञा
(सं.)

संवर
निग्रह।
संज्ञा
(सं.)

संवर
चुनना, पसंद करना।
संज्ञा
(सं.)

संवर
कन्या का वर या पति चुनना।
संज्ञा
(सं.)

संवर
मार्ग का भोजन।
संज्ञा
(सं. संबल)

संवर
सहारा, साधन।
संज्ञा
(सं. संबल)

संवरण
रोकना, दूर करना।
संज्ञा
(सं.)

संवरण
छिपाना, गोपन करना।
संज्ञा
(सं.)

संवरण
विचार, इच्छा या चित्तवृत्ति को रोकना या दबाना।
संज्ञा
(सं.)

संवरण
अंत या समाप्त करना।
संज्ञा
(सं.)

संवर्द्धन
बढ़ना, वृद्धि होना।
संज्ञा
(सं.)

संवर्द्धन
पालना-पोसना।
संज्ञा
(सं.)

संवर्द्धन
बढ़ाना।
संज्ञा
(सं.)

संवहन
ढोना।
संज्ञा
(सं.)

संवहन
दिखाना।
संज्ञा
(सं.)

संवाद
बातचीत।
संज्ञा
(सं.)

संवाद
समाचार, वृत्तांत।
संज्ञा
(सं.)

संवाद
कथा-प्रसंग।
संज्ञा
(सं.)

संवादी
बातचीत करनेवाला।
वि.
(सं. संवादिन्)

संवादी
अनुकूल या मेल में होनेवाला।
वि.
(सं. संवादिन्)

शाब्दी
शब्द पर निर्भर रहनेवाली।
वि.
(सं.)

शाम
साँझ, संध्या।
संज्ञा
(फ़ा.)
मुहा.-शाम फूलना-संध्या की लालिमा फैलना।

शाम
श्रीकृष्ण।
संज्ञा
(सं. श्याम)

शाम
काला, श्याम।
वि.

शाम
नीला।
वि.

श्यामकर्ण
घोड़ा जिसके कान काले या श्याम रंग के हों।
संज्ञा
(सं.)

शामत
दुर्भाग्य, दुर्दशा।
संज्ञा
(अ.)
मुहा.- शामत का घेरा या मारा-जिसकी दुर्दशा होने को हो। शामत सवार होना या सिर पर खेलना-दुर्दशा का समय आना।

शामियाना
बड़ा तंबू।
संज्ञा
(फ़ा. शामियानः)

शामिल
मिला हुआ, सम्मिलित।
वि.
(फ़ा.)

शायक
तीर, बाण।
संज्ञा
(सं.)

शिथिलता
थकान, थकावट।
संज्ञा
(सं.)

शिथिलता
आलस्य।
संज्ञा
(सं.)

शिथिलता
नियम के पालन में कड़ाई की कमी।
संज्ञा
(सं.)

शिथिलता
शक्ति की कमी।
संज्ञा
(सं.)

शिथिलता
वाक्य में शब्द-संगठन या अर्थ-संबंध की कमी।
संज्ञा
(सं.)

शिथिलता
तर्क या प्रमाण में कुछ कमी।
संज्ञा
(सं.)

शिथिलाई
शिथिलता।
संज्ञा
(सं. शिथिल)

शिथिलाना
ढीला पड़ना।
क्रि.अ.
(सं. शिथिल)

शिथिलाना
थकना, श्रांत होना।
क्रि.अ.
(सं. शिथिल)

शिथिलाने
थक गये, श्रांत हो गये।
क्रि.अ.
(हिं. शिथिलाना)
उ.- करत सिंगार परस्पर दोऊ अति आलस शिथिलाने-१७२१।

संवरण
चुनना, पसंद करना।
संज्ञा
(सं.)

संवरण
कन्या का वर या पति चुनना।
संज्ञा
(सं.)

सँवरना, सँवरनो
बनना, ठीक होना।
क्रि.अ.
(हिं. सँवारना का अक.)

सँवरना, सँवरनो
सजना, अलंकृत होना।
क्रि.अ.
(हिं. सँवारना का अक.)

सँवरना, सँवरनो
याद या स्मरण करना।
क्रि.स.
(हिं. सुमिरन)

सँवरा, सँवरिया
श्याम।
वि.
(हिं. साँवला)

संवर्त्त
प्रलय काल के सात मेघों में एक।
संज्ञा
(सं.)

संवर्त्त
इंद्र का अनुचर एक मेघ जिससे बहुत जल बरसता है।
संज्ञा
(सं.)

संवर्त्तन
फेरा देना, लपेटना।
संज्ञा
(सं.)

संवर्द्धक
बढ़ानेवाला।
वि.
(सं.)

संवादी
संगीत में वह स्वर जो वादी के साथ मिलकर उसकी मधुरता बढ़ाता हो।
संज्ञा

सँवार
समाचार।
संज्ञा
(सं.संवाद)

सँवार
सजाने या सेवारने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(हिं. सँवारना)

सँवार
सजाकर, सज्जित करके।
क्रि.स.
उ.- जैसे कोऊ गेह सँवार-१० उ.-१२९।

संवार
शब्दोच्चारण का वह प्रयत्न जिसमें कंठ सिकुड़ता है।
संज्ञा
(सं.)

संवारण
रोकना, निषेध करना।
संज्ञा
(सं.)

सँवारत
रचाते, सजाते या अलंकृत करते है।
क्रि.स.
(हिं. सँवारना)
उ.- गोबर्धन पर बेनु बजावत, फूलन भेष सँवारत-सारा. ४७२।

सँवारत
शस्त्रादि तेज करते है।
क्रि.स.
(हिं. सँवारना)
उ.- कहुँ कर लैकै सस्त्र सँवारत-सारा. ६६६।

सँवारति
सजाती या अलंकृत करती है।
क्रि.स.
(हिं. सँवारना)
उ.- जसुमति राधा कुँवरि सँवारति-७०४।

सँवारन
(काम) बनाने या सँभालने वाले।
संज्ञा
(हिं. सँवारना)
उ.-कृपानिधान दानि दामोदर सदा सँवारन काज-१-१०९।

सँवारना, सँवारनो
ठीक करना।
क्रि.स.
(हिं. सँवर्णन्)

सँवारना, सँवारनो
सजाना, अलंकृत करना।
क्रि.स.
(हिं. सँवर्णन्)

सँवारना, सँवारनो
क्रमबद्ध या व्यवस्थित करना।
क्रि.स.
(हिं. सँवर्णन्)

सँवारना, सँवारनो
सुचारु रूप से काम करना।
क्रि.स.
(हिं. सँवर्णन्)

संवारना
रोकना, मना करना।
क्रि.अ.
(सं. संवारण)

सँवारि
(अस्त्र-शस्त्र) तेज करके।
क्रि.स.
(हिं. सँवारना)
उ.- राख्यौ सुफल सँवारि सान दै कैसे निफल करौं वा बानहिं-९-९५।

सँवारि
सजाकर, अलंकृत करके।
क्रि.स.
(हिं. सँवारना)
उ.- (क) भवन सँवारि नारि रस लोभ्यौ-१-२१६। (ख) गाइ बच्छ सँवारि लाए-१०-१६।

सँवारि
बनाकर, रचकर।
क्रि.स.
(हिं. सँवारना)
उ.- (क) कंठ कठुला नील मनि अंभोजमाल सँवारि-१०-१६९। (ख) सीस सचिक्कन केस हो बिच सीमत सँवारि-२०६५।

सँवारि
व्यंजन आदि ठीक से बनाकर।
क्रि.स.
(हिं. सँवारना)
उ.- यह सुनताहिं मन हर्ष बढ़ायो कियो पकवान सँवारि-९९२।

सँवारी
बुरी दशा का सुधार कर लो।
क्रि.स.
(हिं. सँवारना)
उ.-पतित उधारन बिरद जानिकै बिगरी लेहु सँवारी-१-११८।

सँवारी
(व्यंजन आदि) सावधानी से बनाकर।
क्रि.स.
(हिं. सँवारना)
उ.- तुरत करौ सब भोग सँवारी-१००७।

सँवारी
रची या बनायी हुई।
क्रि.स.
(हिं. सँवारना)
मुहा.- दई सँवारी-बिधाता की गड़ी हुई (व्यंग्य)। उ.- जुबती हैं सब दई सँवारी घर बनहूँ में रहति भरी-१६१७।

सँवारे
बना दिये, सुधार दिये, ठीक कर दिये।
क्रि.स.
(हिं. सँवारना)
उ.- (क) सबके काज सँवारे-१-२५। (ख) जिन हमरे सब काज सँवारे-१-२८६।

सँवारे
पकाये, पका कर तैयार किये।
क्रि.स.
(हिं. सँवारना)
उ.- अरु खुरमा सरस सँवारे-१०-१८३।

सँवारै
रचती या बनाती है।
क्रि.स.
(हिं. सँवारना)
उ.- मुडली पटिया पारि सँवारै-३०२६।

सँवारै
सजाती है।
क्रि.स.
(हिं. सँवारना)
उ.- ललिता रुचिकरि धाय आपने सुमन सुगंधनि सेज सँवारे-१९३०।

सँवारौ
बनाओ, निर्मित करो।
क्रि.स.
(हिं. सँवारना)
उ.- (क) हाड़नि कौ तुम बज्र सँवारौ-६-५। (ख) तब ब्रह्मा यह बचन उचारौ। मय माया-मय कोट सँवारौ-७-७।

सँवारौ
सुधारो।
क्रि.स.
(हिं. सँवारना)
मुहा.- परलोक सँवारौ-ऎसी वेद-विधि से क्रिया-कर्म करो जिससे उनकी गति सुधर जाय। उ.- राजा कौ परलोक सँवारौ-९-५०।

सँवारयो, सँवारयौ
सजाया।
क्रि.स.
(हिं. सँवारना)
उ.-झूठ-साँच करि माया जोरी रचि-पचि भवन सँवारयौ-१-३३६।

सँवारयो, सँवारयौ
(सुस्वाद) बनाया।
क्रि.स.
(हिं. सँवारना)
उ.-सुरस निमोननि स्वाद सँवारयौ-२३२१।

सँवारयो, सँवारयौ
(काम) बना दिया।
क्रि.स.
(हिं. सँवारना)
उ.-सूरदास प्रभु की यह लीला ब्रज कौ काज सँवारयौ-४३३।

संवास
साथ-साथ रहना।
संज्ञा
(सं.)

संवास
सार्वजनिक निवासस्थान।
संज्ञा
(सं.)

संवास
घर, मकान।
संज्ञा
(सं.)

संवाहक
ढोनेवाला।
वि.
(सं.)

संवाही
ढोनेवाला।
वि.
(सं.)

संविद
चेतन, चेतनायुक्त।
वि.
(सं.)

संविद्
चेतना।
संज्ञा
(सं.)

संविद्
बोध, समझ।
संज्ञा
(सं.)

संविद्
अनुभूति।
संज्ञा
(सं.)

संविद्
वृत्तांत।
संज्ञा
(सं.)

संविद्
नाम, संज्ञा।
संज्ञा
(सं.)

संविदा
समझौता, ठेका।
संज्ञा
(सं.)

संविधान
व्यवस्था।
संज्ञा
(सं.)

संविधान
रचना।
संज्ञा
(सं.)

संविधान
शासन का विधान।
संज्ञा
(सं.)

संविधान
रीति, विधि।
संज्ञा
(सं.)

संवृत
ढका या बंद किया हुआ।
वि.
(सं.)

संवृत
दबाया या दमन किया हुआ।
वि.
(सं.)

संवृत
रक्षित।
वि.
(सं.)

संवृद्ध
बढ़ा हुआ।
वि.
(सं.)

संवृद्ध
उन्नत।
वि.
(सं.)

संवृद्धि
बढ़ती।
संज्ञा
(सं.)

संवृद्धि
समृद्धि।
संज्ञा
(सं.)

संवेग
पूर्ण तेजी या वेग।
संज्ञा
(सं.)

संवेग
घबराहट।
संज्ञा
(सं.)

संवेग
भय।
संज्ञा
(सं.)

संवेग
अतिरेक।
संज्ञा
(सं.)

संवेद
बोध, ज्ञान।
संज्ञा
(सं.)

संवेदन
विशेष चेतना या अनभूति होना, सुख-दुख आदि का अनुभव करना।
संज्ञा
(सं.)

संवेदन
जताना, बोध कराना।
संज्ञा
(सं.)

संवेदन
बोध, ज्ञान।
संज्ञा
(सं.)

संवेदना
मन का बोध या अनुभव।
संज्ञा
(सं. संवेदना)

संवेदना
किसी का कष्ट देखकर मन में होने वाला दुख, सहानुभूति।
संज्ञा
(सं. संवेदना)

संवेद्य
बोध या अनुभव करने योग्य।
वि.
(सं.)

संवेद्य
बताने या जताने योग्य।
वि.
(सं.)

संवेद्य
स्वसंवेद्य जो स्वयं ही अनुभव किया जा सके, दूसरे को बताया न जा सके।
यौ.

संशय
संदेह।
संज्ञा
(सं.)

संशय
आशंका।
संज्ञा
(सं.)

संशयात्मक
जिसमें संदेह हो।
वि.
(सं.)

संशोधित
ठीक किया या सुधारा हुआ।
वि.
(सं.)

संश्रय
मेल, संयोग।
संज्ञा
(सं.)

संश्रय
लगाव, संबंध।
संज्ञा
(सं.)

संश्रय
सहारा, आश्रय।
संज्ञा
(सं.)

संश्रित
जुड़ा या मिला हुआ।
वि.
(सं.)

संश्रित
शरण में आया हुआ।
वि.
(सं.)

संश्रित
आश्रित।
वि.
(सं.)

संश्लिष्ट
मिला या सटा हुआ।
वि.
(सं.)

संश्लिष्ट
मिश्रित, सम्मिलित।
वि.
(सं.)

संश्लिष्ट
आलिंगित।
वि.
(सं.)

संशयात्मा
जिसके मन में संदेह या अविश्वास बना रहे या शेष हो।
वि.
(सं.)

संशयालु
संदेह करनेवाला।
वि.
(सं.)

संशयी
जो प्रायः संशय या संदेह करता हो, शक्की।
वि.
(सं. संशयिन्)

संशुद्ध
शुद्ध किया हुआ।
वि.
(सं.)

संशोधक
ठीक या शोधन करनेवाला।
वि.
(सं.)

संशोधक
बुरी दशा सुधारनेवाला।
वि.
(सं.)

संशोधन
शुद्ध करना।
संज्ञा
(सं.)

संशोधन
ठीक करना, दोष दूर करना।
संज्ञा
(सं.)

संशोधन
प्रस्ताव आदि में घटाने-बढ़ाने का सुझाव।
संज्ञा
(सं.)

संशोधित
शुद्ध किया हुआ।
वि.
(सं.)

शिथिलित
जो शिथिल हो गया हो।
वि.
(सं.)

शिथिले
शिथिल, श्रांत।
वि.
(सं. शिथिल)
उ.- भए अंग शिथिले-२७१२।

शिनाख्त
पहचान।
संज्ञा
(फ़ा. शिनाख्त)

शिनाख्त
गुण या स्वरूप की परख।
संज्ञा
(फ़ा. शिनाख्त)

शिफऱ
ढाल।
संज्ञा
(फ़ा. सिवर)

शिफऱ
शून्य।
संज्ञा
(अ. सिफ़र)

शिया
सहायक।
संज्ञा
(अ. शीया)

शिया
अनुयायी।
संज्ञा
(अ. शीया)

शिया
मुसलमानों का वह संप्रदाय जो हजरत अली को पैगंबर का उत्तराधिकारी मानता है।
संज्ञा
(अ. शीया)

शिर
मुंड, कपाल।
संज्ञा
(सं. शिरस्)

संश्लेषण
सटाना, मिलाना।
संज्ञा
(सं.)

संश्लेषण
कार्य-कारण आदि का मिलान या विचार करना, 'विश्लेषण' का विपरीतार्थक।
संज्ञा
(सं.)

संस, संसइ
संशय, आशंका।
संज्ञा
(सं. संशय)
उ,- (क) करुना करी छाँड़ि पग दीन्हौ, जानि सुरनि मन संस-१०-६४। (ख) सूरस्याम के मुख यह सुनि तब मन मन कीन्हौ संस-११२७।

संसक्त
सटा या लगा हुआ।
वि.
(सं.)

संसक्त
संबद्ध।
वि.
(सं.)

संसक्त
लीन, लिप्त।
वि.
(सं.)

संसक्त
प्रवृत्त, अनुरक्त।
वि.
(सं.)

संसक्तिं
मिलान, सटान।
संज्ञा
(सं.)

संसक्तिं
जोड़, संबद्धता।
संज्ञा
(सं.)

संसक्तिं
लीनता।
संज्ञा
(सं.)

संसर्ग
साथ, संगति।
संज्ञा
(सं.)

संसर्ग
सहवास, समागम।
संज्ञा
(सं.)

संसर्ग दोष
संगत का दोष।
संज्ञा
(सं.)

संसर्गी
लगाब रखनेवाला।
वि.
(सं. संसर्गिन्)

संसा
संदेह, संशय।
संज्ञा
(सं. संशय)

संसार
दुनिया, जगत, सृष्टि।
संज्ञा
(सं.)
उ.- (क) हरि बिन अपनौ को संसार-१-८४। (ख) यह संसार विषय-विष-सागर, रहत सदा सब घेरे-१-८५।

संसार
इहलोक, मर्त्यलोक।
संज्ञा
(सं.)

संसार
माया-जाल।
संज्ञा
(सं.)

संसार
घर-गृहस्थी।
संज्ञा
(सं.)

संसार-तिलक
एक तरह का चावल।
संज्ञा
(सं.)

संसक्तिं
प्रवृत्ति, अनुरक्ति।
संज्ञा
(सं.)

संसद
सभा, मंडली।
संज्ञा
(सं.)

संसद
राजसभा।
संज्ञा
(सं.)

संसद
प्रजा के प्रतिनिधियों की राजसभा।
संज्ञा
(सं.)

संसय
संदेह, संशय।
संज्ञा
(सं.)
उ.- (क) यह वर दै हरि कियौ उपाइ। नारद मन संसय उपजाइ-१-२२६। (ख) तेरे हृदै न संसय राखौं-२-३७।

संसरण
चलना, गमन करना।
संज्ञा
(सं.)

संसरण
संसार, जगत।
संज्ञा
(सं.)

संसरण
सड़क, मार्ग।
संज्ञा
(सं.)

संसर्ग
लगाव, संबंध।
संज्ञा
(सं.)

संसर्ग
मिलाप, संयोग।
संज्ञा
(सं.)

संसार-भावन
संसार को दुखमय जानना।
संज्ञा
(सं.)

संसारी
लौकिक, सांसारिक।
वि.
(सं. संसारिन्)

संसारी
संसार की माया में फँसा हुआ।
वि.
(सं. संसारिन्)
उ.- (क) हरि हौं महा अधम संसारी-१-२७३। (ख) भजन-रहित बूड़त संसारी-१-२१९।

संसारी
बार-बार जन्मनेवाला।
वि.
(सं. संसारिन्)

संसारी
लोक-व्यवहार में कुशल।
वि.
(सं. संसारिन्)

संसिक्त
जो खूब भीगा हूआ हो।
वि.
(सं.)

संसिक्त
जो खूब सींचा हुआ हो।
वि.
(सं.)

संसी
सँड़सी।
संज्ञा
(हिं. सँड़सी)

संसृति
संसार, जगत।
संज्ञा
(सं.)

संसृष्ट
मिश्रित, संश्लिष्ट।
वि.
(सं.)

संसृष्ट
संबद्ध।
वि.
(सं.)

संसृष्ट
अंतर्गत, सम्मिलित।
वि.
(सं.)

संसृष्ट
संगृहीत।
वि.
(सं.)

संसृष्टि
मिलावट, मिश्रण।
संज्ञा
(सं.)

संसृष्टि
संबंध, लगाव।
संज्ञा
(सं.)

संसृष्टि
रचना, संयोजन।
संज्ञा
(सं.)

संसृष्टि
संग्रह।
संज्ञा
(सं.)

संसृष्टि
साहित्य में दो या अधिक अलंकारों का इस प्रकार आना कि सब स्वतंत्र हों, एक दूसरे के आश्रित नहीं।
संज्ञा
(सं.)

संसै
संदेह, आशंका।
संज्ञा
(सं. संशय)

संसौ
साँस, श्वास।
संज्ञा
(सं. श्वास)

संसौ
प्राण, जीवन-शक्ति।
संज्ञा
(सं. श्वास)

संसौ
संदेह, आशंका।
संज्ञा
(सं. संशय)

संस्करण
शुद्ध या सुधार करना।
संज्ञा
(सं.)

संस्करण
सुंदर या परिष्कृत करना।
संज्ञा
(सं.)

संस्करण
विहित सस्कार करना।
संज्ञा
(सं.)

संस्करण
पत्र-पत्रिका या पुस्तक की एक बार की छपाई, आवृत्ति।
संज्ञा
(सं.)

संस्कर्ता
संस्कार करनेवाला।
संज्ञा
(सं.)

संस्कार
सुधार, शुद्धि।
संज्ञा
(सं.)

संस्कार
परिष्कार।
संज्ञा
(सं.)

संस्कार
स्वभाव का शोधन।
संज्ञा
(सं.)

संस्तुत
परिचित, ज्ञात।
वि.
(सं.)

संस्तुत
जिसकी सिफारिश या प्रशंसा की गयी हो।
वि.
(सं.)

संस्तुति
सिफारिश।
संज्ञा
(सं.)

संस्तुति
प्रशंसा।
संज्ञा
(सं.)

संस्था
ठहरने की क्रिया या भाव, स्थिति।
संज्ञा
(सं.)

संस्था
व्यवस्था, रूढ़ि, मर्यादा।
संज्ञा
(सं.)

संस्था
जत्था, गिरोह, समूह।
संज्ञा
(सं.)

संस्था
कोई संघटित समाज, मंडल या वर्ग।
संज्ञा
(सं.)

संस्था
जीवन के क्षत्र- विशेष से संबंध रखन्वाला परंपरागत विधान या नियम।
संज्ञा
(सं.)

संस्थान
ठहरने की क्रिया या भाव, ठहराव, स्थिति।
संज्ञा
(सं.)

संस्कृत
परिमार्जित, परिष्कृत।
वि.
(सं.)

संस्कृत
सुधारा या ठीक किया हुआ।
वि.
(सं.)

संस्कृत
सजाया-सँवारा हुआ।
वि.
(सं.)

संस्कृत
जिसका उपनयन या समावर्त्तन संस्कार हुआ हो
वि.
(सं.)

संस्कृत
भारतीय आर्यों की प्राचीन साहित्यिक भाषा, देववाणी।
संज्ञा
(सं.)

संस्कृति
सफाई, शुद्धि।
संज्ञा
(सं.)

संस्कृति
सुधार, संस्कार, परिष्कार।
संज्ञा
(सं.)

संस्कृति
व्यक्ति, जाति अथवा राष्ट्र आदि के जीवन-व्यापार की वे बातें जिनसे उसके आचार-विचार, कला-कौशल, बौद्धिक विकास, सभ्यता आदि का परिचय मिल सके।
संज्ञा
(सं.)

संस्तवन
स्तुति या प्रशंसा करना।
संज्ञा
(सं.)

संस्तवन
किर्ति या यश बखानना।
संज्ञा
(सं.)

संस्कार
शिक्षा, उपदेश, संगत, वातावरण आदि का मन पर पड़ा हुआ-प्रभाव।
संज्ञा
(सं.)

संस्कार
पूर्व जन्म का प्रभाव जो अनश्वर आत्मा के साथ लगे रहने से नये जन्म में भी स्वभाव का अंग बन जाता है।
संज्ञा
(सं.)

संस्कार
परंपरा से चला आने वाला कृत्य जिसका विधान अवसर-विशेष के लिए हो।
संज्ञा
(सं.)

संस्कार
हिदुओं में शुद्ध और उन्नत करनेवाले वे कृत्य जिनकी संख्या किसी ने बारह और किसी ने सोलह बतायी है गर्भाधान, पुंसवन, सीमंतोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, उपनयन, मुंजन या केशांत, यज्ञोपवीत या समावर्त्तन और विवाह।
संज्ञा
(सं.)

संस्कार
मृतक का क्रिया-कर्म।
संज्ञा
(सं.)

संस्कारक
शुद्ध या परिष्कृत करनेवाला।
वि.
(सं.)

संस्कारक
संस्कार करनेवाला।
वि.
(सं.)

संस्कारी
संस्कार करनेवाला।
वि.
(सं. संस्कारिन्)

संस्कारी
जो अच्छे गुणों या संस्कारों से युक्त हो।
वि.
(सं. संस्कारिन्)

संस्कृत
शुद्ध किया हुआ, जिसका संस्कार हुआ हो।
वि.
(सं.)

संस्थान
बैठाना, स्थापन।
संज्ञा
(सं.)

संस्थान
जीवन, अस्तित्व।
संज्ञा
(सं.)

संस्थान
ठहरने का स्थान।
संज्ञा
(सं.)

संस्थान
बस्ती, जनपद।
संज्ञा
(सं.)

संस्थान
सार्वजनिक स्थान जहाँ सर्वसाधारण एकत्र हो सके।
संज्ञा
(सं.)

संस्थान
प्रबंध, व्यवस्था।
संज्ञा
(सं.)

संस्थान
साहित्य, कला, विज्ञान आदि की उन्नति के लिए स्थापित संस्था, मंडल या वर्ग।
संज्ञा
(सं.)

संस्थापक
भवन आदि स्थापित करनेवाला।
वि.
(सं.)

संस्थापक
नयी बात चलानेवाला, प्रवर्तक।
वि.
(सं.)

संस्थापक
संस्था आदि स्थापित करनेवाला।
वि.
(सं.)

शिथिल
ढीलाढाला।
वि.
(सं.)

शिथिल
सुस्त, धीमा।
वि.
(सं.)

शिथिल
हारा-थका।
वि.
(सं.)
उ.- देह शिथिल भई उठ्यो न जाई।

शिथिल
आलसी।
वि.
(सं.)

शिथिल
बात पर दृढ़ न रहनेवाला।
वि.
(सं.)

शिथिल
जिसका पालन कड़ाई के साथ न हो।
वि.
(सं.)

शिथिल
जो सुनायी न दे।
वि.
(सं.)

शिथिल
जो दबाव में न रहा हो।
वि.
(सं.)

शिथिलई
शिथिलता।
संज्ञा
(सं. शिथिल)

शिथिलता
ढिलाई, ढीलापन।
संज्ञा
(सं.)

संस्पर्श
भली भाँति स्पर्श का भाव।
संज्ञा
(सं.)

संस्पर्श
गहरा लगव, घनिष्ठ संबंध।
संज्ञा
(सं.)

संस्पर्शी
स्पर्श करनेवाला।
वि.
(सं. संस्पर्शिन्)

संस्पृष्ट
सटा या लगा हुआ।
वि.
(सं.)

संस्पृष्ट
परस्पर जुड़ा हुआ या संबद्ध।
वि.
(सं.)

संस्मरण
भली भाँति स्मरण।
संज्ञा
(सं.)

संस्मरण
भली भाँति सुमिरना या नाम लेना।
संज्ञा
(सं.)

संस्मरण
किसी व्यक्ति के स्वभाव आदि पर प्रकाश डालनेवाली स्मरणीय घटनाएँ या उनका उल्लेख।
संज्ञा
(सं.)

संस्मरणीय
भली भाँति स्मरण करने योग्य।
वि.
(सं.)

संस्मरणीय
नाम जपने या सुमिरने योग्य।
वि.
(सं.)

संस्थापक
रूप या आकार देनेवाला।
वि.
(सं.)

संस्थापन
भवन आदि उठाना या निर्मित करना।
संज्ञा
(सं.)

संस्थापन
स्थित या प्रतिष्ठित करना।
संज्ञा
(सं.)

संस्थापन
नयी बात चलाना।
संज्ञा
(सं.)

संस्थापन
रूप या आकार देना।
संज्ञा
(सं.)

संस्थापन
संस्था या मंडल आदि स्थापित करना।
संज्ञा
(सं.)

संस्थापित
भवन आदि उठाया हुआ या निर्मित।
वि.
(सं.)

संस्थापित
स्थित किया हुआ, प्रतिष्ठित।
वि.
(सं.)

संस्थापित
चलाया हुआ, प्रवर्तित।
वि.
(सं.)

संस्थापित
(संस्था मंडल आदि) स्थापित।
वि.
(सं.)

संस्मरणीय
जिसकी याद सदा बनी रहे।
वि.
(सं.)

संस्मरणीय
जिसके संस्मरण उल्लेखनिय हों।
वि.
(सं.)

संस्मरणीय
जिसका स्मरण मात्र रह गया हो, अतीत।
वि.
(सं.)

संस्मरक
याद दिलाने या स्मरण करानेवाला।
वि.
(सं.)

संहंता
वध करनेवाला।
वि.
(सं. संहंतृ)

संहत
खूब जुड़ा या सटा हुआ, संबद्ध।
वि.
(सं.)

संहत
सहित, संयुक्त।
वि.
(सं.)

संहत
कड़ा, सख्त।
वि.
(सं.)

संहत
गठा हुआ, घना।
वि.
(सं.)

संहत
एकत्र।
वि.
(सं.)

संहत
घायल, आहत।
वि.
(सं.)

संहत
नृत्य की एक मुद्रा।
संज्ञा

संहति
मेल, मिलान।
संज्ञा
(सं.)

संहति
इकट्ठा होने का भाव।
संज्ञा
(सं.)

संहति
राशि।
संज्ञा
(सं.)

संहति
झुंड, समूह।
संज्ञा
(सं.)

संहति
गठन, घनत्व।
संज्ञा
(सं.)

संहति
जोड़, संधि।
संज्ञा
(सं.)

संहर
नाश, वध।
संज्ञा
(सं. संहार)

संहरण
संग्रह या एकत्र करना।
संज्ञा
(सं.)

संहरण
(केश का) एक साथ बाँधना या गूँथना।
संज्ञा
(सं.)

संहरण
नाश, संहार या ध्वंस करना।
संज्ञा
(सं.)

संहरना, संहरनो
नाश या वध करना।
क्रि.स.
(सं. संहार)

संहरना, संहरनो
नाश या वध होना।
क्रि.अ.

संहरि
मरवाकर।
क्रि.स.
(हिं. सिंहरना)
उ.- नातरु कुटुँब कसल संहरि कै कौन काज अब जीजै-१-२६९।

संहरी
वध कर दिया।
क्रि.स.
(हिं. संहरना)
उ.- जब नृप ओर दृष्टि तिहिं करी। चक्र सुदरसन सो सहरी-९-५।

संहरैं
वध या नाश करते है।
क्रि.स.
(हिं. संहरना)
उ.- (क) ताकी सक्ति पाइ हम करैं। प्रतिपालैं बहुरौ संहरैं-४-३। (ख) ऎसे असुर किते संहरैं-७-२।

संहरै
मारता या वध करता है।
क्रि.स.
(हिं. संहरना)
उ.-मंत्री कहै, अखेट सो करै। बिषय-भोग जीवन संहरै-४-१२।

संहर्ता
इकटठा या एकत्र करनेवाला।
संज्ञा
(सं. संहर्तृ)

संहर्ता
नाश या वध करनेवाला।
संज्ञा
(सं. संहर्तृ)

संहर्ष
उमंग से रोओं का खड़ा होना, पुलक।
संज्ञा
(सं.)

संहर्ष
स्पर्धा, होड़।
संज्ञा
(सं.)

संहर्ष
ईर्ष्या।
संज्ञा
(सं.)

संहर्ष
संधर्ष।
संज्ञा
(सं.)

संहात
समूह, जमावड़ा।
संज्ञा
(सं.)

संहार
बटोरना, समेटना, इकटठा करना।
संज्ञा
(सं.)

संहार
संग्रह, संचय।
संज्ञा
(सं.)

संहार
(केश) बाँधना या गूँथना।
संज्ञा
(सं.)

संहार
छोड़ा हुआ वाण अपनी ओर लौटाना।
संज्ञा
(सं.)

संहार
अंत, समाप्ति।
संज्ञा
(सं.)

संहार
नाश, ध्वंस।
संज्ञा
(सं.)
उ.- अब सबकौ संहार होत है-५९५।

संहार
(युद्ध आदि में) मार डालना।
संज्ञा
(सं.)

संहार
(अस्त्र आदि को) व्यर्थ करना।
संज्ञा
(सं.)

संहार
वध कर दो, मार डालो।
क्रि.स.
(हिं. संहारना)
उ.-परसुराम सौं यौं कही, माँ कौं बेगि सँहार-९-१४।

संहारक
मार डालनेवाला।
वि.
(सं.)

संहारक
नाश या ध्वंस करनेवाला।
वि.
(सं.)

संहारकर्ता
मार डालनेवाला।
वि.
(सं.)

संहारकर्ता
नाशा या ध्वंस करनेवाला।
वि.
(सं.)

संहारकारी
नाशा या ध्वंस करनेवाला।
वि.
(सं. संहारकारिन्)

संहारकारी
वध करनेवाला।
वि.
(सं. संहारकारिन्)

संहारकाल
संसार के समस्त प्राणियों के नाश का समय, प्रलयकाल।
संज्ञा
(सं.)

सँहारत, संहारत
नाश या ध्वंस करता है।
क्रि.स.
(हिं. संहारना)
उ.- (क) पालत, सृजत, सँहारत, सैंतत अंठ अनेक अवधि पल आधे-९-५२। (ख) जग सिरजत पालत संहारत पुनि क्यौं बहुरि करथो-१० उ.-१३१।

सँहारन, सहारन
मारने या वध करनेवाले।
वि.
(हिं. संहारना)
उ.-(क) असुर-सँहारन भक्तनि-तारन पावन-पतित कहावत बाने-३८०। (ख) अधा बका संहारन ऎई-२५८१।

सँहारन, सहारन
वध या नाश करने (के लिए)।
संज्ञा
उ.-असुर सँहारन आए-२५८१।

संहारना, संहारनो
मार डालना, वध करना।
क्रि.स.
(सं. संहार)

संहारना, संहारनो
नाश या ध्वंस करना।
क्रि.स.
(सं. संहार)

संहारि
वध करके, मारकर।
क्रि.स.
(हिं. संहारना)
उ.-(क) असुर-कुलहिं संहारि धरनि कौ भार उतारौं-४३१। (ख) अधा-बका संहारि-५८९। (ग) योधा सुभट संहारि-२६२५।

संहारिक
मार डालनेवाला।
वि.
(सं.)

संहारिक
नाश या ध्वंस कर देनेवाला।
वि.
(सं.)

संहारी
मार डाली।
क्रि.स.
(हिं. सँहारना)
उ.- सुन्यौ कंस पूतना सँहारी, सॉच भयौ ताके जिय भारी-१०-५८।

सँहारे, संहारे
मार डाले।
क्रि.स.
(हिं. संहारना)
उ.-(क) ये बालक तैं बृथा सँहारे-१-१८९। (ख) सुनि पुकार निसिचर बहु आए, कूदि सबन संहारे-सारा. २८४।

संहारेउ
मार डाला।
क्रि.स.
(हिं. संहारना)
उ.-सहस कवच इक असुर सँहारेउ-सारा. ६८।

संहारै
मारे, मारता है।
क्रि.स.
(हिं. संहारना)
उ.- जीव नाना संहारै-४-१२।

सँहारो, संहारो
वध करो।
क्रि.स.
(हिं. संहारना)
उ.- दसकंधंर कौं बेगि संहारो-सारा. २५९।

संहारौं
मार डालूँ, वध कर दूँ।
क्रि.स.
(हिं. संहारना)
उ.-बेगि संहारौं सकल घोष-सिसु-१०-४९।

संहारौ
मार डाला।
क्रि.स.
(हिं. संहारना)
उ.-चोंच फारि बका संहारौ-४२७।

संहार्य
संग्रह योग्य।
वि.
(सं. संहार्य्य)

संहार्य
निवारण या परिहार के योग्य।
वि.
(सं. संहार्य्य)

संहारयो, संहार्यो
मार डाला, वध किया।
क्रि.स.
(हिं. संहारना)
उ.-सकटा तृत इनहिं संहारथो-२५८१।

संहित
एकत्र किया हुआ।
वि.
(सं.)

संहित
जड़ा या लगा हुसा, संबद्ध।
वि.
(सं.)

संहित
सम्मिलित।
वि.
(सं.)

संहित
सहित, संयुक्त।
वि.
(सं.)

संहित
विधि या नियम की संहिता के रूप में प्रस्तुत किया हुआ।
वि.
(सं.)

संहिता
मेल, मिलावट।
संज्ञा
(सं.)

संहिता
(व्याकरण में) संधि।
संज्ञा
(सं.)

संहिता
वह ग्रंथ जिसका पाठ प्राचीन काल से गृहीत चला आता हो।
संज्ञा
(सं.)

संहिता
विधि-नियम आदि का संग्रह।
संज्ञा
(सं.)

संहिता
वेदों का मंत्र-भाग।
संज्ञा
(सं.)
उ.-तातैं हरि करि ब्यासऽवतार। करी संहिता बेद बिचार-१-२३०।

संहृत
एकत्र किया हुआ सेगृहीत।
वि.
(सं.)

शिर
मस्तक
संज्ञा
(सं. शिरस्)

शिर
सिरा, चोटी।
संज्ञा
(सं. शिरस्)

शिर
प्रधान, मुखिया।
संज्ञा
(सं. शिरस्)

शिरकत
साझा।
संज्ञा
(अ. शिरक़त)

शिरकत
कार्य में योग या सहयोग।
संज्ञा
(अ. शिरक़त)

शिरत्राण, शिरत्रान
सिर की रक्षा के लिए पहनी जानेवाली लोहे की टोपी।
संज्ञा
(सं. शिरत्रान)
उ.- टूटत धुजा पताक छत्र रथ चाप चक्र शिरत्राण।

शिरफूल
सिर का शीशफूल नामक आभूषण।
संज्ञा
(हिं. शिर + हिं. फूल)

शिरमौर
मुकुट।
संज्ञा
(हिं. शिर + हिं. मौर)

शिरमौर
श्रेष्ठ व्यक्ति।
संज्ञा
(हिं. शिर + हिं. मौर)

शिरमौर
नायक।
संज्ञा
(हिं. शिर + हिं. मौर)

संहृत
नष्ट, ध्वस्त।
वि.
(सं.)

संहृत
समाप्त।
वि.
(सं.)

संहृत
(अस्त्र आदि) रोका हुआ, निवारित।
वि.
(सं.)

संहृति
समेटने की क्रिया।
संज्ञा
(सं.)

संहृति
संग्रह।
संज्ञा
(सं.)

संहृति
नाश, ध्वंस।
संज्ञा
(सं.)

संहृति
अंत, समाप्ति।
संज्ञा
(सं.)

संहृति
रोक, परिहार।
संज्ञा
(सं.)

संहृति
प्रलय।
संज्ञा
(सं.)

संहृति
छीनना, हरण।
संज्ञा
(सं.)

सउत
सपत्नी।
संज्ञा
(हिं. सौत)

सउतेला
विमाति से उत्पन्न।
वि.
(हिं. सौतेला)

सक
‘शक’ जाति।
संज्ञा
(सं. शक)

सक
संदेह, शंका।
संज्ञा
(अ. शक)

सक
शक्ति।
संज्ञा
(सं. शक्ति)

सकट
गाड़ी, छकड़ा।
संज्ञा
(सं. शकट)
उ.- (क) सकट कौ रूप धरि असुर लीन्हौ-१०-६२। (ख) सहस सकट भरि कम चलाए-५८३।

सकटा
गाड़ी, छकड़ा।
संज्ञा
(सं. शकट)
उ.- सब गोपिनि मिलि सकटा साजे-४०२।

सकटा
शकटासुर जिसे श्रीकृष्ण ने मारा था।
संज्ञा
(सं. शकट)
उ.- नैकु फटक्यो लात, सबद भयौ आघात, गिरयौ भहरात, सकटा सँहारयौ-१०-६२।

सकटासुर
कंस का अनुचर एक दैत्य जिसे श्रीकृष्ण ने मारा था।
संज्ञा
(सं. शकट + असुर)
उ.- प्रथम पूतना मारि का सकटासुर पेख्यौ-४८९।

सकटैं
सकटासुर ने।
संज्ञा
(हिं. संकटा)
उ.- मुहाँचुही सेनापति कीन्हीं, सकटैं गर्व बढ़ायौ-१०-६१।

संगीत में षड़ज स्वर का सूचक अक्षर।
संज्ञा
(सं.)

पिंगल में 'सगण' का सूचक अक्षर या उसका संक्षिप्त रूप।
संज्ञा
(सं.)

एक उपसर्ग जो शब्दारंभ में जुड़कर 'सह' (जैसे सजीव, सपरिवार), 'स्व' या 'एक ही' (जैसे सगोत्र), 'सु' (जैसे सपूत) आदि अर्थ सूचित करता है।
उप

सइ
से, साथ।
अव्य.
(सं. सह)

सइ
एक कारक-चिह्न जो करण और अपादान में लगता है, से, द्वारा।
अव्य.
(प्रा. सुंतो)

सइना
फौज, सेना।
संज्ञा
(सं. सेना)

सइयो
सहेली, सजनी।
संज्ञा
(सं. सखी)

सइबर, सइवर
सेवार, शैवाल।
संज्ञा
(सं. शैवल)
उ.- चिकुर सइबर निकरि अरुझति सकति नहिं निरुवारि-२०२८।

सउँ
करण या अपादान कारक का चिह्न, से, द्वारा।
अव्य.
(हिं. सों)

सउजा
शिकार।
संज्ञा
(सं. शावक)

सकत
बल।
संज्ञा
(सं. शक्ति)

सकत
संपत्ति।
संज्ञा
(सं. शक्ति)

सकत
सकता है।
क्रि.अ.
(हिं. सकना)

सकत
राखि सकत-रख सकता है।
प्र.
उ.- देखि साहस सकुच मानत राखि सकत न ईस-१-१०६।

सकत
सकत दिखाइ- (दूसरे को) दिखा सकता है।
प्र.
उ.- चाँपी पूँछ लुकावत अपनी, जुवतिनि कौं नहिं सकत दिखाइ-५५५।

सकता
बल, सामर्थ्य।
संज्ञा
(सं. शक्ति)

सकति
बद, सामयी।
संज्ञा
(सं. शक्ति)

सकति
सकती है।
क्रि.अ.
(हिं. सकना)
उ.- (क) बुद्धि रचतिं तरि सकति न सोधा, प्रेम बिबस ब्रजनारि-६३६। (ख) चिकुर सइबर निकरि अरूझति सकति नहिं निरूवारि-२०२८।

सकती
‘शक्ति’ अस्त्र।
संज्ञा
(सं. शक्ति)

सकती
बल।
संज्ञा
(सं. शक्ति)

सकर्मक क्रिया
वह 'क्रिया' शब्द जिसका कार्य 'कर्म' पर समाप्त हो।
संज्ञा
(सं.)

सकल
सब, समास्त।
वि.
(सं.)
उ.-(क) बाँधै सिंधु सकल सैना मिलि-९-११०। (ख) मीड़त हाथ सकल गोकुल जन-२५३६।

सकल
समस्त वस्तु, संबंध आदि।
संज्ञा
उ.-सकल तजि, भजि मन चरन मुरारि-२-३१।

सकल
निर्गुण ब्रह्म और सगुण प्रकृति।
संज्ञा

सकलकल
सोलहों कलाओं से युक्त।
वि.
(सं.)

सकलात
ओढ़ने की रजाई, दुल़ाई।
संज्ञा
(देश.)

सकलात
सौगात, उपहार।
संज्ञा
(देश.)

सकलात
मखमल (कपड़ा)।
संज्ञा
(देश.)

सकलाती
उपहार-रूप में देने योग्य।
वि.
(हिं. सकलात)

सकलाती
अच्छा, बढ़िया, उत्तम।
वि.
(हिं. सकलात)

सकना, सकनो
कुछ करने में समर्थ या योग्य होना।
क्रि.अ.
(सं. शक् या शक्य)

सकना, सकनो
डरना, शंकित होना।
क्रि.अ.
(सं. शंका)

सकपकाना, सकपकानो, सकबकाना, सकबकानो
अचरज करना।
क्रि.अ.
(अनु. सकपक, सकबक)

सकपकाना, सकपकानो, सकबकाना, सकबकानो
आगा-पीछा करना, हिचकना।
क्रि.अ.
(अनु. सकपक, सकबक)

सकपकाना, सकपकानो, सकबकाना, सकबकानो
लज्जित होना।
क्रि.अ.
(अनु. सकपक, सकबक)

सकपकाना, सकपकानो, सकबकाना, सकबकानो
ऐसी चेष्टा करना जिससे प्रेम, लज्जा, शंका आदि भाव सम्मिलित रूप से व्यंजित हों।
क्रि.अ.
(अनु. सकपक, सकबक)

सकरना, सकरनो
मंजूर या स्वीकृति होना।
क्रि.अ.
(सं. स्वीकरण)

सकरना, सकरनो
माना जाना।
क्रि.अ.
(सं. स्वीकरण)

सकरुण
जिसमें दया हो।
वि.
(सं.)

सकर्मक
वह 'क्रिया' शब्द, वाक्य में जिसका 'कर्म' भी वर्तमान हो।
वि.
(सं.)

सकलौ
सारा, समस्त।
वि.
(सं. सकल)
उ.-बिनसि जात तेज-तप सकलौ-६-५।

सकसकात
डर से काँपता है।
क्रि.अ.
(हिं. सकसकाना)
उ.-सकसकात तन भीजि पसीना-७४८।

सकसकाना, सकसकानो
बहुत डर कर काँपने लगना।
क्रि.अ.
(अनु.)

सकसकी
बहुत डर से होने वाली कँपकँपी।
संज्ञा
(हिं. सकसकाना)
उ.-आए हौ सुरति किए ठाठ करख लिये सकसकी धकधकी हिए-२००९।

सकसना, सकसनो, सकसाना, सकसानो
डरना, भयभीत होना।
क्रि.अ.
(अनु.)

सकसना, सकसनो, सकसाना, सकसानो
अड़ना, अटकना।
क्रि.अ.
(अनु.)

सकसना, सकसनो, सकसाना, सकसानो
फँसना।
क्रि.अ.
(अनु.)

सका
भिश्ती।
संज्ञा
(अ. सक्क़ा)

सकाए
डरे, भयभीत हुए।
क्रि.अ.
(हिं. सकाना)
उ.-प्रबल बल जानि मन में सकाए-२६०८।

सकात
संदेह या शंका करते हैं।
क्रि.अ.
(हिं. सकाना)
उ.-देखि सैन ब्रज लोग सकात-१०६७।

सकानो, सकानौ
संदेह या शंका करना।
क्रि.अ.
(सं. शंका)

सकानो, सकानौ
डरना, भयभीत होना।
क्रि.अ.
(सं. शंका)

सकानो, सकानौ
डर या भय से संकोच करना या हिचकना।
क्रि.अ.
(सं. शंका)

सकानो, सकानौ
दुखी होना।
क्रि.अ.
(सं. शंका)

सकान्यो, सकान्यौ
डर या भय से काँपने लगा।
क्रि.अ.
(हिं. सकाना)
उ.-थरथराइ चानूर सकांन्यो-२६०६।

सकाम
जिसे किसी बात की कामना या इच्छा हो।
वि.
(सं.)

सकाम
जिसकी कामना या इच्छा पूरी हो गयी हो।
वि.
(सं.)

सकाम
जिसमें कामवासना हो।
वि.
(सं.)

सकाम
जो किसी स्वार्थ या फल की इच्छा से काम करे।
वि.
(सं.)

सकाम
प्रेम करनेवाला।
वि.
(सं.)

सकामा
जिस (स्त्री) में काम-वासना हो।
वि.
(सं.)

सकामी
जिसमें कामना या इच्छा हो।
वि.
(सं. सकामिन्)

सकामी
जिसमें काम-वासना हो, विषयी।
वि.
(सं. सकामिन्)

सकामी
फल के लोभ से कार्य करनेवाला।
वि.
(सं. सकामिन्)
उ.-भक्त सकामी दूजो होइ, क्रम-क्रम करिकै उधरै सोइ-३-१३।

सकार
स' अक्षर।
संज्ञा
(सं.)

सकार
स' वर्ण जैसी ध्वनि।
संज्ञा
(सं.)

सकार
सबेरे, प्रातःकाल।
क्रि.वि.
(सं. सकाल)
उ.-बहुरि यह मग जाहु-आवहु राति साँझ सकार-११७१।

सकारना, सकारनो
मंजूर या स्वीकार करना।
क्रि.अ.
(सं. स्वीकरण)

सकारना, सकारनो
हुंडी' मान्य करना।
क्रि.अ.
(सं. स्वीकरण)

सकारात्मक
स्वीकृति या सहमति-सूचक (कथन या उत्तर)।
वि.
(हिं. सकार + आत्मक)

सकात
डरता है।
क्रि.अ.
(हिं. सकाना)
उ.-मुक्ता मनौ चुगत जुग खंजन ¨¨¨¨¨। मानौ सूर सकात सरासन उड़िबे कौं अकुलात-३६६।

सकात
(भय से) संकोच करता या हिचकता है।
क्रि.अ.
(हिं. सकाना)
उ.-इहै बड़ौ दुख गाँव-बास को चीन्हे कोउ न सकात-१०८७।

सकात
सकता है।
क्रि.अ.
(हिं. सकना)
उ.-बोलत है बतियाँ तुतरौहीं चलि चरननि न सकात-१०-२९४।

सकान
डरा, भयभीत हुआ।
क्रि.अ.
(हिं. सकाना)
उ.-अति ही कोमल अजान सुनत नृपति जिय सकान तनु बिनु जनु भयौ प्रान मल्लनि पै आए-२६००।

सकाना
संदेह या शंका करना।
क्रि.अ.
(सं. शंका)

सकाना
डरना, भयभीत होना।
क्रि.अ.
(सं. शंका)

सकाना
डर या भय से संकोच करना या हिचकना।
क्रि.अ.
(सं. शंका)

सकाना
दुखी होना।
क्रि.अ.
(सं. शंका)

सकाने
डरे, भयभीत हुए।
क्रि.अ.
(हिं. सकाना)
उ.-(क) बालक बृच्छ धेनु सबै मन अतिहिं सकान-४३१। (ख) गये अकुलाइ धाइ मो देखत नेकहुँ नहीं सकाने- पृ. ३२२ (१५)।

सकानै
डरकर, भयभीत होकर।
क्रि.वि.
(हिं. सकाना)
उ.-मानौ मन्मथ फंद त्रास ते फिरत कुरंग सकानै-२०५३।

शिरस्त्राण, शिरस्त्रान
युद्ध में योद्धाओं द्वारा सर की रक्षा के लिए पहना जानेवाला लोहे का टोप, कूँड़।
संज्ञा
(सं. शिरस्त्राण)

शिरहन
तकिया।
संज्ञा
(हिं. शिर + सं. आधान)

शिरहन
(पलँग आदि का) सिरहाना।
संज्ञा
(हिं. शिर + सं. आधान)

शिरा
(रक्त की छोटी) नाड़ी।
संज्ञा
(सं.)

शिरा
पानी का सोता या स्त्रोत।
संज्ञा
(सं.)

शिरीष
सिरस का पेड़।
संज्ञा
(सं.)

शिरोधार्य
सिर पर धरने योग्य, सादर मान्य।
वि.
(सं. शिरोधार्य्य)

शिरोभूषण
सिर का आभूषण।
संज्ञा
(सं.)

शिरोभूषण
मुकुट।
संज्ञा
(सं.)

शिरोभूषण
श्रेष्ठ व्यक्ति।
संज्ञा
(सं.)

सकारे, सकारौ
सबेरे, प्रातःकाल।
क्रि.वि.
(सं. सकाल)
उ.-पुनि खेलिहौ सकारे-१०-२२६।

सकारे, सकारौ
नियत समय से पूर्व।
क्रि.वि.
(सं. सकाल)

सकारे, सकारौ
जल्दी, शीघ्र।
क्रि.वि.
(सं. सकाल)

सकिलना, सकिलनो
सरकाना।
क्रि.अ.
(हिं. फिसलना)

सकिलना, सकिलनो
सिकुड़ना, सिमटना।
क्रि.अ.
(हिं. फिसलना)

सकिलना, सकिलनो
पूरा या संपादित हो सकना।
क्रि.अ.
(हिं. फिसलना)

सकीं
समर्थ हुईं।
क्रि.अ.
(हिं. सकना)
उ.-तदपि सूर तरि सकीं न सोभा-६२८।

सकी
समर्थ हुईं।
(हिं. सकना)
उ.-कहि न सकी, रिस ही रिस भरि गई, अति ही ढीठ कन्हाई-३७७।

सकील
गरिष्ठ।
वि.
(अ. सक़ील)

सकील
भारी।
वि.
(अ. सक़ील)

सकुचनो
(फूल का) मुँदना या बंद होना।
क्रि.अ.
(हिं. सकुच + नो)

सकुचाइ
बंद या संकुचित हो जाता है।
क्रि.अ.
(हिं. सकुचना)
उ.-कुमुद निसि सकुचाइ-१०-३५२।

सकुचाइ
संकुचित या लज्जित हो जाता है।
क्रि.अ.
(हिं. सकुचना)

सकुचाइ
गए सकुचाइ-संकुचित या लज्जित-से हो गये।
प्र.
उ.-यह बानी सुनतहिं करुनामय तुरत गए सकुचाइ-५५६।

सकुचाई
संकुचित होने का भाव।
संज्ञा
(सं. सकोच)

सकुचाई
लज्जा, संकोच।
संज्ञा
(सं. सकोच)

सकुचात
सकुचता या संकोच करता है।
क्रि.अ.
(हिं. सकुचना)
उ.-यातैं जिय अकुलात नाथ की होइ प्रतिज्ञा झूठी-९-८७।

सकुचातो, सकुचातौ
सकुचता या संकोच करता है।
क्रि.अ.
(हिं. सकुचना)
उ.-मंत्री ज्ञान न औसर पावै कहत बात सकुचातौ-१-४०।

सकुचाना
संकोच करना।
क्रि.अ.
(सं. संकोच)

सकुचाना
सिकोड़ना।
क्रि.स.

सकुच
शर्म, लाज, संकोच।
संज्ञा
(सं. संकोच)
उ.-(क) मोसौं बात सकुच तजि कहिए-१-३३६। (ख) ताहू सकुच सरन आए की होत जु निपट निकाज-१-१८१। (ग) तातैं मोहिं सकुच अति लागै-३-१३। (घ) सकुच छाँड़ि मैं तोहिं कहत-६७१। (ङ) सबेके सकुच गँवाए-७९४।

सकुचत
सिमटता-सिकुड़ता या संकुचित होता है।
क्रि.अ.
(हिं. सकुचना)
उ.-जब दधि-रिपु हरि हाथ लियौ।¨¨¨। बिदुखि सिंधु सकुचत, सिव सोचत-१०-१४३।

सकुचत
(फूल) मुँदता या संपुटित होता है।
क्रि.अ.
(हिं. सकुचना)
उ.-तरनि किरनहिं परसि मानौ कुमुद सकुचत भोर-३५८।

सकुचत
लज्जा या संकोच करके।
क्रि.अ.
(हिं. सकुचना)
उ.-सकुचत फिरत जो बदन छिपाए, भोजन कहा मँगइए-१-२३९।

सकुचति
संकोच करती है।
क्रि.अ.
(हिं. सकुचना)
उ.-यह उपमा कापै कहि आवै, कछुक कहौं सकुचति हौं जिय पर-१०-९३।

सकुचन
संकोच से।
संज्ञा
(हिं. संकोच)
उ.-जदपि मोहिं बहुतै समुझावत सकुचन लीजतु भानि-२७४७।

सकुचना
लज्जा या संकोच करना।
क्रि.अ.
(हिं. सकुच + ना)

सकुचना
(फूल का) मुँदना या बंद होना।
क्रि.अ.
(हिं. सकुच + ना)

सकुचनि
संकोच की।
संज्ञा
(हिं. संकोच + नि)
उ.-भागी जिय अपमान जानि जनु सकुचनि ओट लई-२७९१।

सकुचनो
लज्जा या संकोच करना।
क्रि.अ.
(हिं. सकुच + नो)

सकुच्यो, सकुच्यौ
लज्जित या संकुचित हुआ।
क्रि.अ.
(हिं. सकुचना)
उ........ सुफलकसुत मन हीं मन सकुच्यो करौं कहा अब काजा-१० उ.-२७।

सकुन
चिड़िया, पक्षी।
संज्ञा
(सं. शकुंत)

सकुन
शुभ लक्षण।
संज्ञा
(सं. शकुन)

सकुनि, सकुनी
पखेरू, पक्षी।
संज्ञा
(सं. शकुंत)

सकुनि, सकुनी
गांधारी का भाई जो कौरवों का मामा था और जिसके कपट से पांडवों की जुए में हार हुई थी।
संज्ञा
(सं. शकुनि)
उ.-भीषम द्रोन करन अस्थामा सकुनि सहित काहू न सरी-१-२४९।

सकुपना, सकुपनो
क्रोध या रोष करना।
क्रि.अ.
(हिं. कोपना)

सकुल्य
एक ही कुल या गोत्र का।
वि.
(सं.)

सकूनत
रहने की जगह।
संज्ञा
(अ.)

सके
(काम करने में) समर्थ हुए।
क्रि.अ.
(हिं. सकना)

सके
रहि न सके-(अपने को) रोकने में समर्थ न हुए।
प्र.
उ.-रहि न सके नरसिंह रूप धरि, गहि कर असुर पछारयौ-१-१०९।

सकुचाना
लज्जित करना।
क्रि.स.

सकुचानी
लज्जाकर, संकोच करके।
क्रि.अ.
(हिं. सकुचाना)
उ.-बैठि गईं तरुनी सकुचानी-७९९।

सकुचि
संकोच करके संकुचित होकर।
क्रि.अ.
(हिं. सकुचना)
उ.-(क) कछु चाहौं सकुचि मन मैं रहौं, आपने कर्म लखि त्रासु आवै-१-११०। (ख) सकुचि गनत अपराध-समुद्रहिं बूँद तुल्य भगवान-१-८।

सकुचि
सकुचि गयौ- संकुचित हो गया।
प्र.
उ.-सकुचि गयौ मुख डर तैं-३५४।

सकुचि
सकुचि जात - संकुचित हो जाता है।
प्र.
उ.- ब्रज-बनिता सब चोर कहतिं तोहिं लाजनि सकुचि जात मुख मेरौ-३९९।

सकुचाना, सकुचानो
संकोच किया।
क्रि.अ.
(हिं. सकुचाना)
उ.-जहाँ गया तहँ भलौ न भावत सब कोऊ सकुचानो-१-१०२।

सकुची
मुँदी या संपुटित हो गयी।
क्रि.अ.
(हिं. सकुचना)
उ.-कुमुदिनि सकुची-१०-२३३।

सकुचीला, सकुचौहाँ
संकोच करनेवाला, लजानेवाला, संकोची।
वि.
(हिं. संकोच)

सकुचैं
संकोच या ख्याल करें।
क्रि.अ.
(हिं. सकुचना)
उ.-ब्रज की ढीठी गुवारि, हाट की बेचनहारि, सकुचैं न देत गारि झगरत हूँ-१०-२९५।

सकुचैए
लज्जा या संकोच कीजिए।
क्रि.अ.
(हिं. सकुचना)
उ.-गुरु-पितु-गृह बिनु बोलेहु जैए। है यह नीति नाहिं सकुचैए-४-५।

सकेत
इशारा, संकेत।
संज्ञा
(सं. संकेत)

सकेत
प्रेमी-प्रेमिका-मिलन का निर्दिष्ट स्थान।
संज्ञा
(सं. संकेत)

सकेत
सँकरा, संकुचित।
वि.
(सं. संकीर्ण)

सकेत
दुख, कष्ट, विपत्ति।
संज्ञा

सकेतना, सकेतनो
सिकुड़ना, सिमटना, मुँदना, संकुचित होना।
क्रि.अ.
(हिं. संकेत)

सकेती
कष्ट, विपत्ति।
संज्ञा
(हिं. संकेत)

सकेरना, सकेरनो
समेटना।
क्रि.स.
(हिं. समेटना)

सकेरा
शीघ्रता।
संज्ञा
(सं. सकाल)

सकेल
इकट्ठा करके।
क्रि.स.
(हिं. सकेलना)

सकेलत
दबाता है।
क्रि.स.
(हिं. सकेलना)
उ.-बिदरि चले घन प्रलय जानिकै, दिगपति दिग दंतीनि सकेलत-१०-६३।

सकेलना, सकेलनो
इकट्ठा या एकत्र करना।
क्रि.स.
(सं. संकलन)

सकेलना, सकेलनो
कसना।
क्रि.स.
(सं. संकलन)

सकेलना, सकेलनो
दबाना।
क्रि.स.
(सं. संकलन)

सकेला
एक तरह की तलवार।
संज्ञा
(अ. सैक़ल)

सकेलि
एकत्र करके।
क्रि.स.
(हिं. सकेलना)
उ.-पर सकल सकेलि घर के-१० उ.-५२।

सकेले
इकट्ठा या जमा किये।
क्रि.स.
(हिं. सकेलना)
उ.-जो बनिता सुत-जूथ सकेले हय-गय बिभव घनेरौ-१-२६६।

सकै
(कुछ करने में) समर्थ हो।
क्रि.अ.
(हिं. सकना)
उ.-(क) खाइ न सकै-९-३९। (ख) ऎसी को सकै करि बिनु मुरारी-८-१७।

सकोच
सिकुड़ने की क्रिया।
संज्ञा
(सं. संकोच)

सकोच
लज्जा।
संज्ञा
(सं. संकोच)

सकोच
हिचकिचाहट।
संज्ञा
(सं. संकोच)

सकोरना, सकोरनो
संकुचित करना।
क्रि.स.
(हिं. सिकोड़ना)

सकोरना, सकोरनो
तंग या सँकरा करना।
क्रि.स.
(हिं. सिकोड़ना)

सकोरा
मिट्टी की चौड़ी कटोरी की तरह का एक पात्र।
संज्ञा
(हिं. कसोरा)

सकोरत
संकुचित करता है।
क्रि.स.
(हिं. सकोड़ना)
उ.-तैसें बदन सकोरत है-१३१२।

सकोरति
संकुचित करती है।
क्रि.स.
(हिं. सकोड़ना)
उ.-भौह सकोरति-१२३३।

सकोरि
संकुचित करके।
क्रि.स.
(हिं. सकोड़ना)
उ.-बदन सकोरि भौंह मोरत है-८५६।

सकोरै
संकुचित करती या सिकोड़ती है।
क्रि.स.
(हिं. सकोड़ना)
उ.-कबहुँ भ्रू निरखि रिस करि सकोरै- पृ. ३१६ (५८)।

सकोरथो, सकोरथौ
संकुचित किया।
क्रि.स.
(हिं. सकोड़ना)
उ.-(क) सूरदास प्रभु अंग सकोरथो ब्याकुल देख्यो ब्याल-५५६। (ख) बार-बार तुम भौंह सकोरथो-११५०।

सक्करपारा
शक्कर में पगा हुआ मैदे का बना एक पकवान।
संज्ञा
(हिं. शक्कर + पाग)
उ.-सक्करपारे सद पागे-१०१८३।

सकौ
(कुछ करने में) समर्थ हो।
क्रि.अ.
(हिं. सकना)
उ.-नाथ, सकौ तौ मोहिं उधारौ-१-१३१।

सकोचति
सिकोड़ती है।
क्रि.स.
(हिं. सकोचना)

सकोचना, सकोचनो
सिकोड़ना।
क्रि.स.
(हिं. सकोचना)

सकोचना, सकोचनो
लजाना।
क्रि.स.
(हिं. सकोचना)

सकोचना, सकोचनो
हिचकिचाना।
क्रि.स.
(हिं. सकोचना)

सकोड़ना
समेटना।
क्रि.स.
(हिं. सिकोड़ना)

सकोड़ना
संकुचित करना।
क्रि.स.
(हिं. सिकोड़ना)

सकोड़ना
तंग या सकरा करना।
क्रि.स.
(हिं. सिकोड़ना)

सकोपना, सकोपनो
गुस्सा, कोप या क्रोध करना।
क्रि.अ.
(हिं. कोपना)

सकोपित
नाराज, क्रुद्ध।
वि.
(सं. स +कुपित)

सकोरना, सकोरनो
समेटना।
क्रि.स.
(हिं. सिकोड़ना)

सक्करी
शर्करी' नामक छंद।
संज्ञा
(सं. शर्करी)

सक्का
भिश्ती, मशकवाला।
संज्ञा
(फ़ा. सक्का)

सक्त
आसक्त।
वि.
(सं.)

सक्त
संलग्न।
वि.
(सं.)

सक्ति
बल, शक्ति।
संज्ञा
(सं. शक्ति)
उ.-ताकी सक्ति पाइ हम करैं, प्रतिपालैं बहुरौ संहरैं-४-३।

सक्तु
सत्तू।
संज्ञा
(सं. शक्तु)

सक्यो, सक्यौ
(कुछ करने में) समर्थ हुआ।
क्रि.अ.
(हिं. सकना)
उ.-(क) वातैं दूनी देह धरी, असुर न सक्थौ सम्हारि-४३१। (ख) सरिता-जल चल न सक्थौ-६२३।

सक्र
इंद्र।
संज्ञा
(सं. शक्र)

सक्र
मेघ।
संज्ञा
(सं. शक्र)

सक्रघन
इंद्रास्त्र, वज्र।
संज्ञा
(सं. शक्रघन)

शिरोमणि
चूड़ामणि।
संज्ञा
(सं.)

शिरोमणि
श्रेष्ठ व्यक्ति।
संज्ञा
(सं.)

शिरोमणि
माला में सुमेरू।
संज्ञा
(सं.)

शिरोरुह
सिर के बाल।
संज्ञा
(सं.)

शिला
पत्थर।
संज्ञा
(सं.)

शिला
चट्टान।
संज्ञा
(सं.)
उ.- डारि दियो ताहि शिला पर बालक ज्यों खेल्यो-२५७७।

शिला
न हिलने-डोलनेवाला व्यक्ति (व्यंग्य)।
संज्ञा
(सं.)

शिला
भूमि या खेत में पड़ा हुआ एक-एक दाना बीनने का काम।
संज्ञा
(सं.)

शिला
राधा की एक सखी का नाम।
संज्ञा
(सं.)
उ.- शिला नाम ग्वालिनि अचानक आइ गहे कन्हाई-२४१९।

शिलाजीत
काले रंग की एक ओषधि।
संज्ञा
(सं. शिलाजतु)

सक्र-सरोवर
इंद्रकुंड' नामक स्थान जो व्रज में है।
संज्ञा
(सं. शक्र-सरोवर)

सक्रारि
इंद्र का शत्रु मेघनाद।
संज्ञा
(सं. शक्रारि)

सक्रिय
जिसमें क्रिया या क्रियाशीलता भी हो।
वि.
(सं.)

सक्रिय
जो क्रिया-रूप में हो।
वि.
(सं.)

सक्रिय
जिसमें कुछ करके दिखाया जाय।
वि.
(सं.)

सक्रियता
सक्रिय' या क्रियाशील होने का भाव।
संज्ञा
(सं.)

सक्षम
जिसमें क्षमता हो।
वि.
(सं.)

सक्षम
जो कुछ करने में समर्थ हो।
वि.
(सं.)

सखनि
सखाओं को।
संज्ञा
(हिं. सखा + नि)
उ.-ये बसिष्ठ कुल-पूज्य हमारे पालागन कहि सखनि सिखावत-९-१६७।

संखर
तेज धारवाला, पैना।
वि.
(हिं. स + खर)

संखर
तेज, उग्र।
वि.
(हिं. स + खर)

संखर
प्रबल।
वि.
(हिं. स + खर)

सखरी
कच्ची रसोई।
संज्ञा
(हिं. निखरी से अनु.)

सखरी
पहाड़ी।
संज्ञा
(सं. शिखर)

सखा
सदा साथ रहनेवाला, संगी।
संज्ञा
(सं. सखिन)
उ.-धूम बढ़थौ लोचन खस्यौ सखा न सूझथौ संग-१-३२५।

सखा
दोस्त, मित्र।
संज्ञा
(सं. सखिन)
उ.-सखा बिप्र दारिद्र हरथो-१-२६।

सखा
साहित्य में 'नायक' का सहचर जो सुख-दुख में उसके साथ रहता है और जिससे वह मन की सब बात कहता है। ये 'सखा' चार प्रकार के होते हैं-पीठमर्द, विट, चेट और विदूषक।
संज्ञा
(सं. सखिन)

सखाई
संगी, साथी, सहचर।
संज्ञा
(हिं. सखा)
उ.-मधुकर, तुम हौ स्याम सखाई-३३४४।

सखार
खारा।
वि.
[सं. स +हिं. खार (क्षार)]

सखार
क्षारयुक्त।
वि.
[सं. स +हिं. खार (क्षार)]

सखुन
कौल, वचन।
संज्ञा
(फ़ा. सख़ुन)
मुहा.- सखुन देना-वचन देना। सखुन डालना-(१) कुछ चाहना या याचना करना। (२) कोई बात या प्रश्न पूछना।

सखुन
कथन, उक्ति।
संज्ञा
(फ़ा. सख़ुन)

सखुन
कविता, काव्य।
संज्ञा
(फ़ा. सख़ुन)

सखुनतकिया
वह शब्द या वाक्यांश जो कुछ लोगों की जबान पर ऎसा चढ़ जाता है कि बात करते समय बार-बार कहा जाता है, तकियाकलाम।
संज्ञा
(फ़ा. सख़ुन +तक़िया)

सख्त
कड़ा, कठोर।
वि.
(फ़ा. सख्त)

सख्त
कठिन।
वि.
(फ़ा. सख्त)

सख्त
कड़ा या कठोर बर्ताव या व्यवहार करनेवाला।
वि.
(फ़ा. सख्त)

सख्य
सखा' होने का भाव, सखापन।
संज्ञा
(सं.)

सख्य
दोस्ती, मित्रता।
संज्ञा
(सं.)

सख्य
भक्ति का वह रूप जिसम इष्टदेव को सखा मानकर सेवा-उपासना कौ जाय।
संज्ञा
(सं.)
उ.-बंदन दासपनौ से करै, भक्तनि सख्य-भाव अनुसरै-९-५।

सखिनि
सखियों को।
संज्ञा
(सं. सखी)
उ.-आछौ दिन सुनि महरि जसोदा सखिनि बोलि सुध गान करथौ-१०-८८।

सखियनि
सखियों ने।
संज्ञा
(सं. सखी)
उ.-ऎपन की सी पूतरी सब सखियनि कियौ सिंगार-१०-४०।

सखी
सहेली, सहचरी।
संज्ञा
(सं.)
उ.-हरषी सखी सहेलरी (हो) अनँद भयौ सिभ-जोग-१०-४०।

सखी
मित्र (स्त्री)।
संज्ञा
(सं.)

सखी
साहित्य मॆं नायिका की सहचरी जिससे वह हृदय की भी बात कहती हो। इसके चार कार्य हैं-मंडन, शिक्षा, उपालंभ और परिहास।
संज्ञा
(सं.)

सखी
एक छंद।
संज्ञा
(सं.)

सखी
दाता, दानी।
वि.
(अ. सखी)

सखीभाव
वैष्णव भक्ति का एक प्रकार जिसमें भक्त स्वयं को इष्ट या आराध्यदेव की पत्नी या सखी मानकर उसकी सेवा-उपासना करता है।
संज्ञा
(सं.)

सखीसंप्रदाय
वैष्णव भक्तों का वह संप्रदाय जिसमें सखीभाव की सेवा, उपासना या आराधना की जाती हो।
संज्ञा
(सं.)

सखुन
बातचीत, वार्तालाप।
संज्ञा
(फ़ा. सख़ुन)

सख्यता
सख्य-भाव।
संज्ञा
(सं. संख्य)

सगण
छंदशास्त्र में वह गण जिसमें प्रथम दो वर्ण लघु और अंतिम दीर्घ (llऽ) हो।
संज्ञा
(सं.)

सगत, सगति, सगती
बल, सामर्थ्य।
संज्ञा
(सं. शक्ति)

सगत, सगति, सगती
शिव-शक्ति, पार्वती।
संज्ञा
(सं. शक्ति)

सगदा
एक मादक द्रव्य।
संज्ञा
(देश.)

सगन
सगण।
संज्ञा
(सं. सगण)

सगन
सगुन।
संज्ञा
(सं. शकुन)

सगनौती
शगुन विचारने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(सं. शकुन)

सगनौती
मंगलपाठ।
संज्ञा
(सं. शकुन)

सगपहती
साग मिलाकर बनायी गयी दाल।
संज्ञा
(हिं. साग + पहती=दाल)

सगबग
तरबतर, लथपथ।
वि.
(अनु.)

सगबग
द्रवित।
वि.
(अनु.)

सगबग
भरा हुआ, परिपूर्ण।
वि.
(अनु.)

सगबग
चटपट, शीघ्र, तुरंत।
क्रि.वि.

सगबगाना, सगबगानो
तरबतर या लथपथ होना।
क्रि.अ.
(हिं. सगबग)

सगबगाना, सगबगानो
शंक्ति या भयभीत होना।
क्रि.अ.
(हिं. सगबग)

सगबगाना, सगबगानो
चकित होना।
क्रि.अ.
(हिं. सगबग)

सगबगाना, सगबगानो
तरबतर या लथपथ करना।
क्रि.स.

सगबगाना, सगबगानो
शंक्ति या भयभीत करना।
क्रि.स.

सगबगाना, सगबगानो
चकित करना।
क्रि.स.

सगर
अयोध्या के एक सूर्यवंशी राजा जिनके साठ हजार पुत्रों को कपिल मुनि ने भस्म कर दिया था। राजा भगीरथ और श्री रामचन्द्र उन्हीं के वंशज थे।
संज्ञा
(सं.)
उ.-नातो मानि सगर सागर सौं कुस-साथरी परयौ-९-१२२।

सगर
सब।
वि.
(हिं. सगरा)

सगरा
सब, समस्त, सकल।
वि.
(सं. सकल)

सगरा
बड़ा जलाशय।
संज्ञा
(सं. सागर)

सगरा
समुद्र, सागर, सिंधु।
संज्ञा
(सं. सागर)

सगरी
सब, सारी।
वि.
(हिं. सगरा)
उ.-(क) उरहन लै आवति हैं सगरी-१०-३१९। (ख) सूर स्याम जहँ तहाँ खिझावत जो मनभावत, दूरि करौं लंगर सगरी-१०४५। (ग) हौं जानति हौं फौज मटन की लूटि लई सगरी-२१०६।

सगरो, सगरौ
सारा का सरा, सब का सब।
वि.
(हिं. सगरा)
(क) दूध, दही, माखन लै डारि देत सगरौ-१०-३३६। (ख) अनबोहनी तनक नहिं दैहौं, ऎसेहिं छीनि लेहु बरु सगरौ- पृ. २३५ (३१)।

सगर्भ
सहोदर (भाई)।
वि.
(सं.)

सगर्भा
गर्भवती।
वि.
(सं.)

सगर्भा
सहोदरा।
वि.
(सं.)

सगल
सब, सारा।
वि.
(सं. सकल)

सगलगी
बहुत सगापन या आत्मीयता दिखाने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(हिं. सगा + लगना)

सगलगी
खुशामद, चापलूसी।
संज्ञा
(हिं. सगा + लगना)

सगला, सगालो
सब, कुल, सारा।
वि.
(सं. सकल)

सगा
एक माता से उत्पन्न, सहोदर।
वि.
(सं.स्वक्)

सगा
निकट संबंध का।
वि.
(सं.स्वक्)

सगाइ, सगाई
सगे होने का भाव, सगापन, आत्मीयता।
संज्ञा
[हिं. सगा + आई (प्रत्य.)]

सगाइ, सगाई
पारिवारिक या आत्मीयता का संबंध, नाता, रिश्ता।
संज्ञा
[हिं. सगा + आई (प्रत्य.)]
उ.-(क) त्रियनि कहथौ, जग झूठ सगाई-८९६। (ख) सूर स्याम वह गई सगाई वा मुरली के संग-२७२९। (ग) दिवस चारि करि प्रीति सगाई रस लै अनत गए-२९९३। (घ) सूर जहाँ लगि स्याम गात हैं तिनसे कत कीजिए सगाई-३०५३। (ङ) सूरदास प्रभु रँगे प्रेम रँग जारौं जोग सगाई-३१०९। (च) उनसौं हमसौं कौन सगाई-३२०८।

सगाइ, सगाई
एक या समान वर्ग का होने का भाव या उसकी अवस्था।
संज्ञा
[हिं. सगा + आई (प्रत्य.)]

सगाइ, सगाई
मँगनी, विवाह का निश्चय।
संज्ञा
[हिं. सगा + आई (प्रत्य.)]
उ.-तासौं तेरी भई सगाई-१० उ.-३२।

सगाइ, सगाई
विधवा या परित्यक्त के साथ पुरुष का वह संबंध जो कुछ जातियों में विवाह के समानं ही माना जाता है।
संज्ञा
[हिं. सगा + आई (प्रत्य.)]

सगापन
सगा या आत्मीय होने का भाव।
संज्ञा
(हिं. सगा + पन)

सगारत
सगा या आत्मीय होने का भाव।
संज्ञा
[हिं. सगा + आरत (प्रत्य.)]

सगी
निकट संबंधवाली, आत्मीयता का परिचय देनेवाली।
वि.
(हिं. सगा)
उ.-वह मूरति, वह सुख दिखरावै सोई सूर सगी-२७९०।

सगुण
ब्रह्म का वह रूप सत, रज और तम गुणों से युक्त होने के कारण साकार माना जाता है।
संज्ञा
(सं.)

सगुण
वह भक्ति-संप्रदाय जिसमें ब्रह्म को 'सगुण' मानकर उसके अवतारों की पूजा-उपासना होती है। सूरदास, तुलसीदास आदि भक्त इसी वर्ग के थे।
संज्ञा
(सं.)

सगुणता
सगुण होने का भाव।
संज्ञा
(सं.)

सगाणी
सगुण।
वि.
(सं. सगुण)

सगुन
सगुण।
संज्ञा
(सं. सगुण)
उ.-सोइ सगुन ह्वै नंद की दाँवरी बँधावै-१-४।

सगुन
शकुन।
संज्ञा
(सं. शकुन)
उ.-(क) इतनौ कहत नैन उर फरके सगुन जनायौ अंग-९-८३। (ख) निकसत सगुन भले नहिं पाए-३७०।

सगुनई
सगुण होने का भाव, सगुणता।
संज्ञा
[सं. सगुण + अई (प्रत्य.)]
उ.-सूर सगुनई जात मधुपुरी निर्गुन नाम भए-३०९०।

सगुनता
सगुण होने का भाव, सगुणता।
संज्ञा
(सं. सगुणता)

सगुनाई
सगुण होने का भाव, सगुणता।
संज्ञा
[सं. सगुण + आई (प्रत्य.)]
उ.-बिछरत तनु नाम ज्यों हठि तिहिं छिन गई नहीं सगुनाई-२७८४।

सगुनाना, सगुनानो
सगुन या शकुन बतलाना।
क्रि.स.
[हिं. सगुन + आना (प्रत्य.)]

सगुनाना, सगुनानो
सगुन या शकुन देखना या निकालना।
क्रि.स.
[हिं. सगुन + आना (प्रत्य.)]

सगुनावै
शकुन बताता है।
क्रि.स.
[हिं. सगुन + आना (प्रत्य.)]
उ.-भौंरा इक चहुँ दिसि ते उड़ि-उड़ि करन लागि कछु गावै। उत्तम भाषा ऊँचे चढ़ि चढ़ि अंग अंग सगुनावै-२९४६।

सगुनिया
शकुन विचारने और बतलानेवाला।
वि.
[हिं. सगुन + इया (प्रत्य.)]

सगानौती
भावी शुभाशुभ या शकुन विचारने की क्रिया।
संज्ञा
[हिं. सगुन + औती (प्रत्य.)]
उ.-बैठी जननि करति सगुनौती। लछिमन राम मिलैं अब मोकौं दोउ अमोलक मोती-९-१६४।

सगानौती
मंगलपाठ, मंगलाचरण।
संज्ञा
[हिं. सगुन + औती (प्रत्य.)]

सगुरा
जिसने गुरु से दीक्षा ली हो।
वि.
(हिं. स + गुरु)

शिलान्यास
भवन, मंदिर आदि की नींव का पहला पत्थर रखा जाना।
संज्ञा
(सं.)

शिलालेख
पत्थर पर लिखा लेख।
संज्ञा
(सं.)

शिलावृष्टि
ओले बरसना।
संज्ञा
(सं.)

शिलाहरि
शालग्राम की मूर्ति।
संज्ञा
(सं.)

शिलाहारी
शिला या अन्नकण बीन कर जीवन-निर्वाह करनेवाला।
संज्ञा
(सं.)

शिलीमुख
भौंरा, भ्रमर।
संज्ञा
(सं.)
उ.-(क) कुँवरि ग्रसित श्रीखंड अहिभ्रम चरण शिलीमूख लाम। (ख) कुंचित अलक शिलीमुख मानो लै मकरंद उड़ाने।

शिलीमुख
तीर, वाण।
संज्ञा
(सं.)

शिल्प
हाथ की कारीगरी, दस्तकारी।
संज्ञा
(सं.)

शिल्प
कला-संबंधी व्यवसाय।
संज्ञा
(सं.)

शिल्पकला
हाथ की कारीगरी।
संज्ञा
(सं.)

सगुरा
जिसने गुरु से कार्य-विशेष की सम्यक शिक्षा पायी हो।
वि.
(हिं. स + गुरु)

सगे
निकट या घनिष्ठ संबंध या आत्मीयता रखनेवाले।
वि.
(हिं. सगा)
उ.-जानति नहीं, कहूँ नहिं देखे, मिलि गई मनहुँ सगे-१३१८।

सगोती, सगोत्र, सकोत्रिय
एक गोत्र के लोग।
संज्ञा
(सं. सगोत्र)

सगोती, सगोत्र, सकोत्रिय
नाते-रिश्तेदार, भाई-बंधु।
संज्ञा
(सं. सगोत्र)

सगौ
प्रेम या आत्मीयता का संबंध रखनेवाला।
वि.
(हिं. सगा)
उ.-तौ लगि यह संसार सगौ है जौ लगि लेहि न नाम-१-७६।

सगौती
खाने का मांस।
संज्ञा
(देश.)

सग्गा
घनिष्ठ संबंधी।
वि.
(हिं. सगा)

सघन
घना, गँझा हुआ, अविरल।
वि.
(सं.)
उ.-(क) सघन बृन्दाबन अगम अति जाइ कहुँ न भुलाइ-६१०। (ख) चरतिं धेनु अपनैं अपनैं रँग, अतिहिं सघन बन चारौ-६११।

सघन
घनघोर, अटूट, अबिरल।
वि.
(सं.)
(क) सघन गुंजत बैठि उन पर भौंरहूँ बिरमाहिं-१-३३८। (ख) गत पतंग राका ससि बिय सँग, घटा सघन सोभात-२१८५। (ग) निसि अँधरीं, बीजु चमकै सघन बरषै मेह-१०-५।

सघन
ठोस।
वि.
(सं.)

सघनता
सघन होने का भाव।
संज्ञा
(सं.)

सच
जैसा हो वैसा (कहा या लिखा हुआ)।
वि.
(सं. सत्य)

सच
यथार्थ, वास्तविक।
वि.
(सं. सत्य)

सच
सही, ठीक।
वि.
(सं. सत्य)

सचन
सेवा करने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(सं.)

सचना, सचनो
इकटठा या एकत्र करना।
क्रि.स.
(सं. संचयन)

सचना, सचनो
पूरा या संपादित करना।
क्रि.स.
(सं. संचयन)

सचना, सचनो
बनाना, निर्माण करना।
क्रि.स.
(सं. संचयन)

सचना, सचनो
बचाना, रक्षा करना।
क्रि.स.
(सं. संचयन)

सचना, सचनो
सजना।
क्रि.अ.
(हिं. सजना)

सचना, सचनो
सजाना, सज्जित करना।
क्रि.स.

सचमुच
वास्तव में, यथार्थ रूप में।
अव्य.
[हिं. सच+ मुच(अनु.)]

सचमुच
अवश्य, निश्चय, निस्संदेह।
अव्य.
[हिं. सच+ मुच(अनु.)]

सचरना, सचरनो
(किसी बात का) फैलना या संचरित होना।
क्रि.अ.
(सं. संचरण)

सचरना, सचरनो
(किसी वस्तु या प्रथा का) प्रचलित या व्यवहृत होना।
क्रि.अ.
(सं. संचरण)

सचरना, सचरनो
प्रवेश या संचार करना।
क्रि.अ.
(सं. संचरण)

सचराचर
संसार के चर-अचर या स्थावर-जंगम, सभी पदार्थ और प्राणी।
संज्ञा
(सं.)

सचरे
प्रविष्ट हुए, संचार किया।
क्रि.अ.
(हिं. सचरना)
उ.-(क) जा दिन तैं सचरे गोपिनि मैं, ताही दिन तैं करत लँगरैया-७३५। (ख) कुटिल अलक भ्रुव चारु नैन मिलि सचरे स्रवन समीप सुमिति-२२२३।

सचल
जो अचल न हो, चलता हुआ, गतिशील, जंगम।
वि.
(सं.)

सचल
चंचल।
वि.
(सं.)

सचित्
ज्ञान या चेतनायुक्त।
वि.
(सं.)

सचित्त
जिसका ध्यान एक ही ओर हो।
वि.
(सं.)

सचिरे
प्रविष्ट हुए।
क्रि.अ.
(हिं. सचरना)
उ.-अंगन सर सचिरे-३१७९।

सचिव
मित्र।
संज्ञा
(सं.)

सचिव
वजीर, मंत्री।
संज्ञा
(सं.)
उ.-कहौ तौ सचिव-सबंधु सकल अरि एकहिं एक पछारौं-९-१०८।

सची
इंद्र-पत्नी, इंद्राणी।
संज्ञा
(सं. शची)
उ.-सची नृपति सौं यह कहि भाषी। नृप सुनिकै बिरदै मैं राखी-६-७।

सची
सजायी, सज्जित की।
क्रि.स.
(हिं. सचना)
उ.-जो कछु सकल लोक की सोभा लै द्वारका सची री-१० उ.-८६।

सची-सुत
जयंत।
संज्ञा
(सं. शची + सुत)

सचु
सुख, आनन्द।
संज्ञा
(देश.)
उ.-(क) सहज भजै नँदलाल कौं सो सब सचु पावै-२-९। (ख) जौ लै मीन दूध मैं डारै बिनु जल नहिं सचु पावै-२-१०। (ग) कब वह मुख बहुरौ देखौंगी कब वैसो सचु पैहौं-२५१०। (घ) कानन भवन रैनि अरु बासर कहूँ न सचु लहिए-२८९२।

सचु
खुशी, प्रसन्नता।
संज्ञा
(देश.)

सचाई
सच्चापन, सत्यता।
संज्ञा
(सं. सत्य, प्रा. सच्च)

सचाई
यथार्थता।
संज्ञा
(सं. सत्य, प्रा. सच्च)

सचान
बाज पक्षी, श्येन।
संज्ञा
(सं. संचान)
उ.-हौं अनाथ बैठथौ द्रुम डरिया पारधि साधे बान। ताकैं डर मैं भाज्यौ चाहत, ऊपर ढुवथौ सचान-१-९७।

सचारना, सचारनो
(किसी बात को) फैलाना या संचरित करना।
क्रि.स.
(हिं. सचारना)

सचारना, सचारनो
(किसी वस्तु या प्रथा को) प्रचलित या व्यवहत करना।
क्रि.स.
(हिं. सचारना)

सचारना, सचारनो
प्रवेश या संचार कराना।
क्रि.स.
(हिं. सचारना)

सचावट
सच्चाई, सच्चापन, सत्यता।
संज्ञा
[हिं. सच + आवट (प्रत्य.)]

सचिंत
जिसे चिंता हो, चिंतित।
वि.
(सं.)

सचि
एकत्र या संग्रह करके, बचाकर।
क्रि.स.
(हिं. सचना)
उ.-हम शर घात ब्रजनाथ सुधानिधि राखे बहुत जतन करि सचि सचि-२९०२।

सचिक्कण, सचिक्कन
बहुत चिकन या स्निग्ध।
वि.
(सं. सचिक्कण)
उ.-सीस सचिक्कन केस हो बिच सीमंत सँवारि-२०६५।

सचु
संतोष।
संज्ञा
(देश.)

सचुपाना
चुप या मौन होना।
क्रि.अ.
(हिं. चुपाना)

सचुपाना
चुप या मौन करना या कराना।
क्रि.स.

सचेत
चेतनायुक्त।
वि.
(सं. सचेतन)
उ.-ऎरावत अमृत कै प्याए, भयौ सचेत इंद्र तब धाए-६-५।

सचेत
समझदार।
वि.
(सं. सचेतन)

सचेत
सजग, सावधान।
वि.
(सं. सचेतन)

सचेतन
जिसमें ज्ञान या चेतना हो।
वि.
(सं.)

सचेतन
जो जड़ न हो, चेतन।
वि.
(सं.)

सचेतन
समझदार, चतुर।
वि.
(सं.)

सचेतन
सजग, सावधान।
वि.
(सं.)

सचेती
सचेत होन का भाव।
संज्ञा
(हिं. सचेत)

सचेती
सजगता, सावधानी।
संज्ञा
(हिं. सचेत)

सचेष्ट
जिसमें चेष्टा हो।
वि.
(सं.)

सचेष्ट
जो चेष्टा कर रहा हो।
वि.
(सं.)

सचै
जमा करता है, संग्रह या संचय करता है।
क्रि.स.
(हिं. सचन)
उ.-जाकी जहाँ प्रतीति सूर सो सर्वस तहाँ सचै री-२२७०।

सचैन
सुख के साथ, सानंद।
क्रि.वि.
(हिं. स + चैन)
उ.-सूरदास प्रभु सब बिधि नागर पीवत हौं रस परम सचैन-२०८७।

सचैयत
सच्चाई, सच्चापन, सत्यता।
संज्ञा
[हिं. सच्च + ऎयत (प्रत्य.)]

सच्चरित, सच्चरित्न
अच्छ चाल-चलनवाला, सदाचारी।
वि.
(सं.)

सच्चरित, सच्चरित्न
अच्छा चालचलन, सदाचार।
संज्ञा

सच्चर्या
सदाचार।
संज्ञा
(सं. सच्चर्य्या)

सच्चा
सच बोलनेवाला।
वि.
(सं. सत्य)

सच्चा
यथार्थ, वास्तविक।
वि.
(सं. सत्य)

सच्चा
जो झूठा या बनावटी न हो।
वि.
(सं. सत्य)

सच्चा
जैसा चाहिए उतना और वैसा।
वि.
(सं. सत्य)

सच्चाई
सच्चापन, सत्यता।
संज्ञा
[हिं. सच्च+ आई (प्रत्य.)]

सच्चापन
सत्य होने का भाव, सच्चाई, सत्यता।
संज्ञा
(हिं. सच्चा + पन)

सच्चाहट
सच्चाहोने का भाव, सत्यता।
संज्ञा
[हिं. सच्चा + हट (प्रत्य.)]

सच्चिकन
बहुत चिकना।
वि.
(सं. सचिक्कण)

सच्चित्
(सत्-चित से युक्त) ब्रह्म।
संज्ञा
(सं.)

सच्दिनन्द
(सत्, चित् और आनंद से युक्त) ब्रह्म।
संज्ञा
(सं.)

सज
सुन्दरता।
संज्ञा
(हिं. सजावट)

सजग
सचेत, सावधान।
वि.
(सं. सज्ञान)
उ.- कुब-लिया मल्ल मुष्टिक चानूर सों होई तुम सजग कहि सबनि ऐंठ्यौ-२५६३।

सजगता
सजग रहने या होन की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(हिं. सजग)

सजगता
सावधानी, सतर्कता।
संज्ञा
(हिं. सजग)

सजदार
सुन्दर, सजीला।
वि.
[हिं. सज+ फ़ा. दार]

सजधज
बनाव-सिंगार, सजावट।
संज्ञा
[हिं. सज + धज(अनु.)]

सजन
भला या सज्जन व्यक्ति।
संज्ञा
(सं. सत् +जन)

सजन
पति।
संज्ञा
(सं. सत् +जन)

सजन
स्वजन, घनिष्ठ संबंध वाले प्रिय व्यक्ति।
संज्ञा
(सं. सत् +जन)
उ.- (क) धरी इक सजन कुटुँब मिलिबैठे रूदन बिलाप कराहीं-१-३१९। (ख) सजन-कुटुँब परिजन बढ़े सुत-दारा-धन-धाम-१-३२५। (ग) सजन प्रीतम नाम लै लै दै परस्पर गारि-१०-२६।

सजन
प्रियतम, उपपति।
संज्ञा
(सं. सत् +जन)

सजन
जिसमें लोग हों, जन सहित।
वि.
(सं.)

सजना
सज्जित या अलंकृत होना, श्रूंगार होना, सजाया जाना।
क्रि.अ.
(सं. सज्जा)

सजना
भला लगना, शोभा देना, शोभित होना।
क्रि.अ.
(सं. सज्जा)

सजना
सजाना, सुसज्जित करना।
क्रि.स.

सजनी
सखी, सहेली।
संज्ञा
(हिं. सजन)
उ.- (क) अब लौं कानि करी मैं सजनी बहुतै मूँड़ चढ़ायौ- पृ. ३२२ (१३)। (ख) मदन गोपाल देखत ही सजनी सब दुख सोक बिसारे-२५६९।

सजल
जिसमें पानी हो, जल से पूर्ण या युक्त।
वि.
(सं.)
उ.- सजल देह, कागद तैं कोमल किहिं बिधि रखै प्रान-१-३०४।

सजल
आँसू भरे या अश्रुपूर्ण (नयन)।
वि.
(सं.)
उ.- त्रास तैं अति चपल गोलक सजल सोभित छोर-३५८।

सजला
चार सहोदरों में तीसरा जो दूसरे से छोटा परन्तु अन्तिम से बड़ा हो।
वि.
(हिं. मँझला से अनु.)

सजला
जल से भरी हुई।
वि.
(सं. सजल)

सजवना, सजवनो
अलंकृत करना।
क्रि.स.
(हिं. सजाना)

शिल्पकार
कारीगर, शिल्पी।
संज्ञा
(सं.)

शिल्पकारी
दस्तकारी, कारीगरी।
संज्ञा
(सं.)

शिल्पकारी
कारीगर, शिल्पी।
संज्ञा

शिल्पी
दस्तकार, कारीगर।
संज्ञा
(सं. शिल्पिन्)

शिल्पी
चितेरा, चित्रकार।
संज्ञा
(सं. शिल्पिन्)

शिव
मंगल, कल्याण।
संज्ञा
(सं.)

शिव
पानी, जल।
संज्ञा
(सं.)

शिव
महादेव, शंकर, शंभु।
संज्ञा
(सं.)

शिवता
शिव होने का भाव या धर्म।
संज्ञा
(सं.)
उ.- शिव शिवता इनहीं सों लही।

शिवदिशा
ईशान कोण।
संज्ञा
(सं.)

सच्चिन्मय
सत् और चैतन्यस्वरूप।
वि.
(सं.)

सच्छंद
पूर्ण स्वतंत्र।
वि.
(सं. स्वच्छंद)

सच्छत
घायल।
वि.
(सं. सक्षत)

सच्छास्त्र
अच्छा या उत्तम शास्त्र।
संज्ञा
(सं. सद् +शास्त्र)

सच्छी
गवाह, साखी।
संज्ञा
(सं. साक्षी)

सच्यो, सच्यौ
एकत्र या संचित था या किया।
क्रि.स.
(हिं. सचना)
उ.- (क) सोधि-सकल गुन काछि दिखायौ अंतर हो जो सच्यौ-१-१७४। (ख) यह मुख अबलौं कहाँ सच्यौ-पृ. ३५० (६७)। (ग) हरि-मुख-कमल सच्यो रस सजनी अति आनंद पियूष पिये-२०३५।

सछोलि
छीलकर।
क्रि.स.
(हिं. छोलना)
उ.- टेंटी टेंट सछोलि कियो पुनि-।

सज
सजन की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(हिं. सजावट)

सज
बनावट, गढ़न।
संज्ञा
(हिं. सजावट)

सज
शोभा।
संज्ञा
(हिं. सजावट)

सजवना, सजवनो
यथाक्रम रखना।
क्रि.स.
(हिं. सजाना)

सजवल
सजावट।
संज्ञा
(हिं. सजना)

सजवल
सुन्दरता।
संज्ञा
(हिं. सजना)

सजवल
तैयारी, उपक्रम।
संज्ञा
(हिं. सजना)

सजवल
ठाटबाट।
संज्ञा
(हिं. सजना)

सजवाई
सजवाने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
संज्ञा
[हिं. सजना + वाई (प्रत्य.)]

सजवाना, सजवानो
सुसज्जित करवाना।
क्रि.स.
(हिं. सजाना का प्रे.)

सजा, सजाइ, सजाई
अपराध का दंड।
संज्ञा
(फ़ा. सज़ा, हिं. सजा)

सजा, सजाइ, सजाई
करौं सजाई- दंड दूँगा।
प्र.
उ.- मेरी बलि औरहिं लै सौंपत, इनकी करौं सजाई-९१६।

सजा, सजाइ, सजाई
कारागार में बंद रखने का दंड।
संज्ञा
(फ़ा. सज़ा, हिं. सजा)

सजाइ
सजाकर।
क्रि.स.
(हिं. सजाना)
उ.- बहुत धरे जल-माँझ सजाइ-५८२।

सजाई
सजाने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
संज्ञा
(हिं. सजाना + आई)

सजागर
जो सोता न हो, जागता हुआ।
वि.
(सं.)

सजागर
सजग, सतर्क, सावधान।
वि.
(सं.)

सजात
जो साथ ही जन्मा हो।
वि.
(सं.)

सजात
जो एक ही स्थान पर जन्मे, पले और रहते हों।
वि.
(सं.)

सजाति, सजातीय
एक ही जाति या वर्ग के (लोग या पदार्थ)।
वि.
(सं.)

सजाति, सजातीय
एक ही आकार-प्रकार या आकृति-प्रकृति के (लोग या पदार्थ)।
वि.
(सं.)

सजान
जानकार, ज्ञाता।
वि.
(सं. सज्ञान)

सजान
होशियार, चतुर।
वि.
(सं. सज्ञान)

सजाना, सजानो
यथाक्रम या यथास्थान रखना।
क्रि.स.
(सं. सज्जा)

सजाना, सजानो
सँवारना, श्रृंगार करना, अलंकृत करना।
क्रि.स.
(सं. सज्जा)

सजाना, सजानो
तैयार करना।
क्रि.स.
(सं. सज्जा)

सजाय
दंड।
संज्ञा
(हिं. सजा)

सजायो
सजाकर या सँवारकर तैयार किया या रखा।
क्रि.स.
(हिं. सजाना)
उ.- सदं माखन घृत दही सजायौ-१०१९०।

सजाव
एक तरह का दही।
संज्ञा
(देश.)

सजाव
सजावट, बनाव।
संज्ञा
(हिं. सजाना)

सजावट
सज्जित या सज हुए होने का भाव या धर्म।
संज्ञा
(हिं. सजाना)

सजावट
शोभा।
संज्ञा
(हिं. सजाना)

सजावट
तैयारी, उपक्रम।
संज्ञा
(हिं. सजाना)

सजीवता
सजीव होने का भाव।
संज्ञा
(सं.)

सजीवन, सजीवनि, सजीवनी
संजीवनी नामक बटी जो मरे हुए को भी जिलानेवाली कही जाती है।
संज्ञा
(सं. संजीवन, हिं. संजीवनी)
उ.- सूरदास मनु जरी सजीवनि श्री रघुनाथ पठाई-९-८०।

सजीवन, सजीवनि, सजीवनी
वह व्यक्ति या पदार्थ जो संजीवनी के समान प्राण या जीवनदाता हो।
संज्ञा
(सं. संजीवन, हिं. संजीवनी)
उ.- कोउ कोउ उबरयौ साधु-संग जिन स्याम-सजीवनि पायौ-२-३२।

सजीवनमूर, सजीवनमूरी, सजीवनमूल, सजीवनमूली, सजीवनिमूर, सजीवनिमूरी, सजीवनिमूल, सजीवनिमूली
संजीवनी नामक बूटी जो मृतकों को भी जिलानेवाली मानी जाती है।
संज्ञा
(हिं. संजीवनी + मूल)

सजीवनमूर, सजीवनमूरी, सजीवनमूल, सजीवनमूली, सजीवनिमूर, सजीवनिमूरी, सजीवनिमूल, सजीवनिमूली
अत्यंत प्रिय व्यक्ति या वस्तु।
संज्ञा
(हिं. संजीवनी + मूल)

संजीवनी मंत्र
वह (कल्पित) मंत्र जो मृतक को भी जिला लेनेवाला माना जाता है।
संज्ञा
(सं. संजीवन + मंत्र)

संजीवनी मंत्र
वह मंत्र जिससे कोई कार्य सुगमता से हो जाय।
संज्ञा
(सं. संजीवन + मंत्र)

सजुग
सचेत, सतर्क।
वि.
(हिं. सजग)

सजूरी
एक तरह की मिठाई।
संज्ञा
(देश. या अनु. खजूरी)
उ.- (क) माधुरि अति सरस सजूरी। (ख) घेवर मालपुआ मोतिलाड़ू सधर सजूरी सरस सँवारी-१०-२२७।

सजैया
अपराध का दंड।
संज्ञा
(हिं. सजा)

सजी
(अस्त्र-शस्त्र से सज्जित होकर) प्रस्तुत हुई।
क्रि.अ.
(हिं. सजना)
उ.- जानि कठिन कलिकाल कुटिल नृप संग सजी अघ-सैनी-९-११।

सजी
संबद्ध की, सुशोभित की।
क्रि.अ.
(हिं. सजना)
उ.- मुरली अधर सजी बलबीर-६५८।

सजीब
जिसमें प्राण हो।
वि.
(सं. सजीव)

सजीब
ओजयुक्त, ओजस्वी।
वि.
(सं. सजीव)

सजीला
सजधज से रहनेवाला, छैल-छबीला।
(हिं. सजना + ईला)

सजीला
सुन्दर, सुडौल।
(हिं. सजना + ईला)

सजीव
जिसमें प्राण या जीवन हो।
वि.
(सं.)

सजीव
जिसमें ओज या तेज हो।
वि.
(सं.)

सजीव
जो बहुत तेज या फुर्तीला हो।
वि.
(सं.)

सजीव
प्राणी, जीवधारी।
संज्ञा

सजावट
ठाट।
संज्ञा
(हिं. सजाना)

सजावना, सजावनो
सजाने या अलंकृत करने की क्रिया।
संज्ञा
(हिं. सजाना)
उ.- स्फटिक सिंहासन मध्य राजत हाटक सहित सजावनो-२२८०।

सजावना, सजावनो
तैयार या सुसज्जित करने की क्रिया।
संज्ञा
(हिं. सजाना)

सजावना, सजावनो
सजाना।
क्रि.स.
(हिं. सजाना)

सजावहु
तैयार करो।
क्रि.स.
(हिं. सजाना)
उ.- बल समेत तन कुसल सूर प्रभु हरि आये आरती सजावहु-१० उ.-२३।

सजि
अस्त्रशस्त्र से सज्जित या प्रस्तुत होकर।
क्रि.अ.
(हिं. सजाना)
उ.- ब्रज पर सजि पावस दल आयौ-२८१९।

सजि
धारण करके।
क्रि.अ.
(हिं. सजाना)
उ.- घन तन दिव्य कवच सजि-९-१५८।

सजि
अलंकृत होकर।
क्रि.अ.
(हिं. सजाना)
उ.- अंग सुभग सजि ह्वै मधु मूरति-१०-४९।

सजि
सजाकर, तैयार करके।
क्रि.अ.
(हिं. सजाना)
उ.- अगम सिंघु जतननि सजि नौका हठि क्रम भार भरत-१-५५।

सजियो
(सप्रेम या सरूचि) रखी या डाली जाय।
क्रि.स.
(हिं. सजाना)
उ.- नाहिंन मीन जीवत जल बाहर गो घृत मैं सजियो-३१४७।

सजैया
करौं सजैया- अपराध का दंड दूँ।
प्र.
उ.- आवन तौ घर देहु स्याम को जैसी करौं सजैया-८६२।

सजोना, सजोनो
सज्जित करना।
क्रि.स.
(हिं. सजाना)

सजोना, सजोनो
सामान इकट्ठा करना।
क्रि.स.
(हिं. सजाना)

सजोयल
सजी हुई, क्रम-बद्ध।
वि.
(हिं. सँजोना या सजाना)
उ.- स्याम घटा गज असन बाजि रथ चित बगपाँति सजोयल-२८१९।

सज्ज
सजावट।
संज्ञा
(हिं. साज)

सज्ज
ठाट-बाट।
संज्ञा
(हिं. साज)

सज्ज
सामग्री।
संज्ञा
(हिं. साज)

सज्जन
शरीफ, भला।
वि.
(सं. सत् +जन)

सज्जन
अच्छे वंश या कुल का।
वि.
(सं. सत् +जन)

सज्जनता
भलमंसी, सौजन्य।
संज्ञा
(सं.)

सज्जी
पूरी, साबुत।
वि.
(हिं. सज्जा)

सज्जे
पूरे, साबुत।
वि.
(हिं. सज्जा =पूरा)

सज्ञान
ज्ञानवान।
वि.
(सं.)

सज्ञान
चतुर, सयाना।
वि.
(सं.)

सज्ञान
विवेकयुक्त, बुद्धिमान।
वि.
(सं.)

सज्या
सजधज, सजावट।
संज्ञा
(सं. सज्जा)

सज्या
वेश-भूषा।
संज्ञा
(सं. सज्जा)

सज्या
पलँग, शैया।
संज्ञा
(सं. शय्या)
उ.- भीषम सर-सज्या पर परयौ-१-१७६।

सट
जटा।
संज्ञा
(सं.)

सटक
सटकने की क्रिया।
संज्ञा
(अनु. सट)

सज्जनताई
भलमंसी।
संज्ञा
(सं. सज्जनता)

सज्जा
सजाने की क्रिया, भाव, सजावट।
संज्ञा
(सं.)

सज्जा
वेश-भूषा।
संज्ञा
(सं.)

सज्जा
कार्य-विशेष से संबंधित साधन या उपकरण।
संज्ञा
(सं.)

सज्जा
उन साधनों या उपकरणों को व्यवस्थित करना।
संज्ञा
(सं.)

सज्जा
चारपाई, पलँग, शैया।
संज्ञा
(सं. शय्या)
उ.- आपुन पौढ़ि अधर सज्जा पर कर-पल्लव पलुटावति-६५५।

सज्जा
पूरा, साबुत।
वि.
(हिं. सारा)

सज्जित
सजा हुआ, अलंकृत।
वि.
(सं.)

सज्जित
आवश्यक साधनों से युक्त।
वि.
(सं.)

सज्जी
एक तरह का क्षार।
संज्ञा
(सं. सर्जिका)

शिवनंदन
गणेश।
संज्ञा
(सं.)

शिवनंदन
कार्तिकेय।
संज्ञा
(सं.)

शिवनामी
वह चादर जिस पर 'शिव' या 'जय शिव' लिखा हो।
संज्ञा
(सं.)

शिवनिर्माल्य
शिव पर चढ़ायी गयी वस्तु जिसके ग्रहण का निषेध है।
संज्ञा
(सं.)

शिवनिर्माल्य
त्याज्य या अग्राह्य वस्तु, वस्तु जो ग्रहण न की जाय।
संज्ञा
(सं.)

शिवपुरी
काशी, वाराणसी।
संज्ञा
(सं.)

शिवरात्रि
फाल्गुन बदी चतुर्दशी जब शिव जी के पूजन, वत आदि का माहात्म्य है।
संज्ञा
(सं.)

शिवरिपु
कामदेव।
संज्ञा
(सं.)
उ.- ता दिन ते उर-भौन भयो सखि शिवरिपु को संचार-२८८८।

शिवलिंग
शिव की पिंडी जिसकी पूजा की जाती है।
संज्ञा
(सं.)

शिवलोक
कैलास।
संज्ञा
(सं.)

सटकारना, सटकारनो
पतली छड़ी या कोड़े से 'सटसट' शब्द करते हुए मारना।
क्रि.स.
(हिं. सटकार)

सटकारना, सटकारनो
झटकारना।
क्रि.स.
(हिं. सटकार)

सटकारना, सटकारनो
पशुओं को हाँकना।
क्रि.स.
(हिं. सटकार)

सटकारा
चिकने और लंबे (बाल)।
वि.
(अनु.)

सटकारी
पतली-लंबी छड़ी।
संज्ञा
(हिं. सटकार)

सटकि
धीरे से चंपत होकर, चुप-चाप खिसककर।
क्रि.अ.
(हिं. सटकना)

सटकि
गयौ सटकि-चुपचाप या धीरे से खिसक गया।
प्र.
उ.- असुर यह घात तकि गयौ रन ते सटकि-१० उ.-३५

सटक्का
दौड़, झपट।
संज्ञा
(अनु. सट)
मुहा.-सटक्का मारना-दौड़ या झपट कर चले जाना।

सटना, सटनो
दो चीजों का इस प्रकार एक में मिलना या लगना कि दोनों पार्श्व या तल एक दूसरे से लग जायँ।
क्रि.अ.
(सं. स + स्था)

सटना, सटनो
चिपकना।
क्रि.अ.
(सं. स + स्था)

सटक
धीरे से या चुपचाप चल देना।
संज्ञा
(अनु. सट)

सटक
पतली छड़ी।
संज्ञा
(अनु. सट)

सटक
हुक्का पीने की लचीली नली ना नैचा।
संज्ञा
(अनु. सट)

सटकन
सटकने या चुपचाप चंपत होने की क्रिया।
संज्ञा
(हिं. सटकना)

सटकना, सटकनो
धीरे से खिसक जाना या चंपत हो जाना।
क्रि.अ.
(अनु. सट)

सटकना, सटकनो
अन्न की बालों से अनाज निकालने के लिए उन्हें कूटना-पीटना।
क्रि.स.

सटकाना, सटकानो
छड़ी या कोड़े से 'सट' शब्द करते हुए मारना।
क्रि.स.
(हिं. सटकना)

सटकाना, सटकानो
सट-सट' करते हुए हुक्का पीना।
क्रि.स.
(हिं. सटकना)

सटकार
सटकने, झटकने या फटकारने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(अनु. सट)

सटकार
पशुओं को हाँकने की क्रिया।
संज्ञा
(अनु. सट)
उ.- सारथी पाय रूख दये सटकार हय द्वारकापुरी जब निकट आई-१० उ.-१५६।

सटना, सटनो
साथ होना, मिलना।
क्रि.अ.
(सं. स + स्था)

सटपट
इधर-उधर की या व्यर्थ की बातें या काम।
संज्ञा
(अनु.)

सटपट
शील, संकोच।
संज्ञा
(अनु.)

सटपट
दुबिधा, असमंजस।
संज्ञा
(अनु.)

सटपट
डर, भय।
संज्ञा
(अनु.)

सटपट
सटपटाने की क्रिया, घबराबट, चकपकाहट।
संज्ञा
(अनु.)

सटपटाना, सटहटानो
सटपट' की ध्वनि होना।
क्रि.अ.
(अनु.)

सटपटाना, सटहटानो
घबराना।
क्रि.अ.
(अनु.)

सटर-पटर
छोटा-मोटा, तुच्छ या व्यर्थ का (काम)।
वि.
(अनु. सटपट)

सटर-पटर
झंझट या उलझन का काम।
संज्ञा

सटर-पटर
तुच्छ या व्यर्थ का काम।
संज्ञा

सटसट
सट' शब्द के साथ, सटासट।
क्रि.वि.
(अनु.)

सटसट
शीघ्र, तुरंत।
क्रि.वि.
(अनु.)

सटा
घोड़े या शेर की गरदन के बाल, अयाल, केसर।
संज्ञा
(सं. सट या हिं. जटा)

सटा
जटा।
संज्ञा
(सं. सट या हिं. जटा)

सटा
चोटी, शिखा।
संज्ञा
(सं. सट या हिं. जटा)

सटाक
सट' शब्द।
संज्ञा
(अनु.)

सटान
सटने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(हिं. सटना)

सटान
सटने या मिलने का जोड़।
संज्ञा
(हिं. सटना)

सटाना, सटानो
दो चीजों को इतने समीप करना कि उनका तल या पार्श्व परस्पर मिल जाय।
क्रि.स.
(हिं. सटना)

सटाना, सटानो
मिलाना, जोड़ना, चिपकाना।
क्रि.स.
(हिं. सटना)

सटाय
घटिया, खराब।
वि.
(देश.)

सटाल
सिंह, केसरी।
संज्ञा
(सं.)

सटियल
घटिया, खराब।
वि.
[हिं. सड़ियल (अनु.)]

सटिया
गुप्त रूप से कुचक्र या षङयंत्र रचकर किसी को अपनी ओर मिलाने की क्रिया।
संज्ञा
(हिं. सटाना)
उ.- उनहूँ जाइ सौंह दै बूझौ, मै करि पठयौ सटिया-१-१९२।

सटिया
एक तरह की चूड़ी।
संज्ञा
(हिं. सटाना)

सटिया
पतली छड़ी।
संज्ञा
(हिं. साँटी)

सटीक
जिसमें (मूल के साथ) टीका-व्याख्या भी हो।
वि.
(सं.)

सटीक
जैसा चाहिए ठीक वैसा ही।
वि.
(हिं. ठीक)

सट्टा
इकरारनामा।
संज्ञा
(देश.)

सट्टा
खरीद-बिक्री का वह प्रकार जो केवल तेजी-मंदी के विचार से अतिरिक्त लाभ के लिए होता है।
संज्ञा
(देश.)

सट्टा
हाट, बाजार।
संज्ञा
(हिं. हाट या सट्टी)

सट्टा-बट्टा
हेलमेल।
संज्ञा
(हिं. सटना + अनु. बट्टा)

सट्टा-बट्टा
अनुचित संबंध।
संज्ञा
(हिं. सटना + अनु. बट्टा)

सट्टा-बट्टा
चालबाजी।
संज्ञा
(हिं. सटना + अनु. बट्टा)
मुहा.-सट्टा-बट्टा लड़ाना-कार्य-सिद्धि के लिए अनुचित चाल चलना।

सट्टी
हाट, बाजार।
संज्ञा
(हिं. हट्टी)
मुहा.-सट्टी मचाना-हाट-बाजार जैसा शोर करना। सट्टी लगाना-बहुत सी चीजें इधर-उधर बिखरा या फैला देना।

सठ
मूर्ख, बुद्धिहीन।
वि.
(सं. शठ)
उ.- (क) इते मान यह सूर महासठ हरि-नग बदलि विषय-बिष आनत-१-११४। (ख) रे सठ, बिन गोविंद सुख नाहीं-१-३२३।

सठ
दुष्ट।
वि.
(सं. शठ)

सठई
दुष्टता।
संज्ञा
(हिं. सठ)

सठई
मूर्खता।
संज्ञा
(हिं. सठ)

सड़ना
पानी मिले पदार्थ में खमीर उठना या आना।
क्रि.अ.
(हिं. सड़न)

सड़ना
बुरी, गिरी हुई या हीन दशा में रहना।
क्रि.अ.
(हिं. सड़न)

सड़सठ
वह संख्या जो साठ से सात अधिक हो।
संज्ञा
[हिं. सड़(=सात) + साठ]

सड़ाना
किसी पदार्थ में विकार और दुर्गंध आने तक डाल रखना।
क्रि.स.
(हिं. सड़ना)

सड़ाना
पानी मिले पदार्थ में खमीर उठाना।
क्रि.स.
(हिं. सड़ना)

सड़ाना
बुरी या हीन दशा में डाल रखना।
क्रि.स.
(हिं. सड़ना)

सड़ायँध
किसी चीज के सड़ने पर उसमें से आनेवाली दुर्गंध।
संज्ञा
(हिं. सड़न + गंध)

सड़ाव
सड़ने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(हिं. सड़ना)

सड़ासड़
सड़सड़' शब्द के साथ।
क्रि.वि.
(अनु. सड़)

सड़ासड़
बहुत जल्दी-जल्दी।
क्रि.वि.
(अनु. सड़)

सठता
मूर्खता।
संज्ञा
(हिं. सठ)

सठता
शठता।
संज्ञा
(हिं. सठ)

सठमति
मूर्ख।
वि.
(सं. शठ + मति)

सठमति
दुष्ट।
वि.
(सं. शठ + मति)

सठियाना, सठियानो
साठ वर्ष का होना।
क्रि.अ.
[हिं. साठ + इयान (प्रत्य.)]

सठियाना, सठियानो
बुड्डा होना।
क्रि.अ.
[हिं. साठ + इयान (प्रत्य.)]

सठियाना, सठियानो
बूढ़ा हो जाने से विवेक का कम हो जाना, बूढ़ा होकर बुद्धि खो-बैठना।
क्रि.अ.
[हिं. साठ + इयान (प्रत्य.)]

सड़क
चौड़ा मार्ग, राजपथ।
संज्ञा
(अ. शरक़)

सड़न
सड़ने (विकार और दुर्गंध आने) की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(हिं. सड़ना)

सड़ना
किसी पदार्थ में विकार और दुर्गंध आने लगना।
क्रि.अ.
(हिं. सड़न)

सड़ियल
सड़ा-गला।
वि.
[हिं. सड़ना + इयल (प्रत्य.)]

सड़ियल
रद्दी, खराब।
वि.
[हिं. सड़ना + इयल (प्रत्य.)]

सड़ियल
तुच्छ, निकम्मा।
वि.
[हिं. सड़ना + इयल (प्रत्य.)]

सत
सत्य।
वि.
(सं. सत्)
उ.- (क) भीषम पर-तिज्ञा सत भाषी-५६९। (ख) आध पैड़ बसुधा दै राजा, नातरु चलि सत हारी-८-१४।

सत
साधु, सज्जन।
वि.
(सं. सत्)

सत
नित्य, स्थायी।
वि.
(सं. सत्)

सत
शुद्ध, पवित्र।
वि.
(सं. सत्)

सत
श्रेष्ठ, उत्तम।
वि.
(सं. सत्)

सत
सत्यतापूर्ण धर्म या आचरण।
संज्ञा
उ.- (क) सतजुग सत त्रेता तप कीजै द्वापर पूजा चारि-२-२। (ख) सत-संजम तीरथ-ब्रत कीन्हैं-१०-१६।
मुहा.-सत पर चढ़ना- पति के मृत शरीर के साथ पत्नी का सती होना। सत पर रहना (से न हटना) -पतिव्रता रहना। सत न टरई-सदा पातिव्रत-धर्म का आचरण करेगी, सती रहेगी, उसका पातिव्रत धर्म दृढ़ और अटल रहेगा। उ.- श्री रघुनाथ प्रताप पतिब्रत सीता सत न टरई-९-७८।

सत
भक्ति का एक रूप।
संज्ञा
उ.- माता, भक्ति चारि परकार। सत रज तम गुन सुदधा सार-३-१३।

सत
प्रकृति के तीन गुणों में एक जो सबसे उत्तम है और जिसके लक्षण ज्ञान, शांति, शुद्धता आदि है।
संज्ञा
(सं. सत्व)

सत
मूल तत्व, सार भाग।
संज्ञा
(सं. सत्व)

सत
जीवनी शक्ति।
संज्ञा
(सं. सत्व)

सत
सौ।
वि.
(सं. शत)
(क) सत-सत अघ प्रति रोमनि-१-१९२। (ख) धन्य सूर एकौ पल इहिं सुख का सत कल्प जिएँ-१०-९९।

सत
सात' का संक्षिप्त रूप जो यौगिक शब्दों के आरंभ में प्रयुक्त होता है।
वि.
(हिं. सात)

सत
सात, जो संख्या में सात हो।
वि.
(हिं. सात)

सतएँ
(जन्मकुंडली के) सातवें घर या स्थान में।
अव्य.
(हिं. सात)
उ.- ऊँच नीच जुवती बहु करिहै सतएँ राहु परे हैं-१०-८६।

सतकार
आदर-सम्मान।
संज्ञा
(सं. सत्कार)

सतकारना, सतकारनो
आदर-सत्कार करना।
क्रि.स.
(सं. सत्कार + ना)

सतगुरु
सच्चा और उत्तम गुरु या दीक्षक।
संज्ञा
(सं. सत् + गुरु)
उ.- (क) सतगुरु कौ उपदेस हृदय धरि जिनि भ्रम सकल निवारयौ-१-३३६। (ख) सब्दहिं सब्द भयौ उजियारौ, सतगुरु भेद बतायौ-४-१३। (ग) सतगुरु-कृपा-प्रसाद कछुक तातैं कहि आवै-४९२। (घ) माथे नहीं महावत सतगुरु अंकुस ध्यान कर टूटो-३४०१।

शिववाहन
बैल, नंदी।
संज्ञा
(सं.)

शिवशैल
कैलास।
संज्ञा
(सं.)

शिवा
पार्वती, गिरिजा।
संज्ञा
(सं.)
उ.- जेहि रस शिव सनकादि मगन भए शंभु रहत दिन साधा। सो रस दिये सूर प्रभु तोको शिवा न लहति अराधा।

शिवा
सियार की मादा, सियारिन।
संज्ञा
(सं.)

शिवालय
शिव का मन्दिर।
संज्ञा
(सं.)

शिवालय
देव-मंदिर।
संज्ञा
(सं.)

शिवालय
मरघट, श्मशान।
संज्ञा
(सं.)

शिवाला
शिव का मंदिर।
संज्ञा
(सं. शिवालय)

शिवाला
देव-मंदिर।
संज्ञा
(सं. शिवालय)

शिवि
राजा उशोनर का पुत्र एक राजा जो ययाति का दौहित्र था और जो अपनी दान-शीलता के लिए बहुत प्रसिद्ध है।
संज्ञा
(सं.)

सतगुरु
परमात्मा।
संज्ञा
(सं. सत् + गुरु)

सतजुग
चार युगों में पहला जिसे 'कृत युग' भी कहते है। पुण्य और सत्यता की अधिकता के कारण यह युग सर्व-श्रेष्ठ माना जाता है।
संज्ञा
(सं. सत्ययुग)
उ.- (क) सतजुग लाख बरस की आइ-१-२३०। (ख) सतजुग सत त्रेता तप कीजै द्वापर पूजा चारि-२-२।

सतत
सदा, निरंतर।
अव्य.
(सं.)
उ.- नैन चकोर सतत दरसन ससिकर अरचन अभिराम-२-१२।

सततगति
हवा, वायु।
संज्ञा
(सं.)

सतदल
कमल।
संज्ञा
[सं. शतदल (सौ दलवावा)]
उ.- कनकबेलि सतदल सर मंडित हृद तर लता लवंग-३३२७।

सतनजा
वह मिश्रण जिसमें सात तरह के अनाज हों।
संज्ञा
(हिं. सात + अनाज)

सतपतिया
जिसके सात पति हों।
वि.
(हिं. सात + पति)

सतपतिया
व्यभिचारिणी।
वि.
(हिं. सात + पति)

सतपदी
भाँवर, भँवरी।
संज्ञा
(सं. सप्तपदी)

सतपात
कमल।
संज्ञा
(सं. शतपत्र)

सतफेरा
भाँवर, भँवरी।
संज्ञा
(हिं. सात + फेरा)

सतभाई
सच्चे या अच्छे भाव से।
क्रि.वि.
(सं. सद्भाव)
उ.- जूठनि की कछु संक नै मानी बिदा किए सत भाई-१-१३।

सतभाएँ
अच्छे भाव से।
क्रि.वि.
(सं. सद्भाव)

सतभाएँ
सच्चाई के साथ, सत्यतापूर्वक।
क्रि.वि.
(सं. सद्भाव)

सतभामा
सत्यभामा जो श्रीकृष्ण की एक पटरानी थी।
संज्ञा
(सं. सत्यभामा)
सतभामा करि सोक पिता को जदुपति पास सिधाई-१० उ.-२७।

सतभाय, सतभाव
अच्छा भाव।
संज्ञा
(सं. सद्भाव)

सतभाय, सतभाव
सीधापन।
संज्ञा
(सं. सद्भाव)

सतभाय, सतभाव
सच्चापन, सच्चाई।
संज्ञा
(सं. सद्भाव)
उ.- हँसत कहत किधौं सतभाव-१२४०।

सतभाय, सतभाव
अच्छे भाव से।
क्रि.वि.

सतभाय, सतभाव
सच्चाई के साथ।
क्रि.वि.

सतभौंरी
भाँवर, भँवरी।
संज्ञा
(हिं. सात +भँवरी)

सतम
सौवाँ।
वि.
(सं. शत)
उ.- रिषिनि कहयौ, तुव सतम जज्ञ आरंभ लखि इंद्र कौ राज-हित कँप्यौ हीयौं-४-११।

सतमख
सौ यज्ञ करनेवाला।
वि.
(सं. शत + मख)

सतमख
देवराज इन्द्र।
संज्ञा

सतमासा
सातवें महीने जन्मनेवाला (शिशु)।
वि.
(हिं. सात + मास)

सतमासा
वह रसम जो शिशु के गर्भ में आने पर सातवें महीने की जाती है।
संज्ञा

सतयुग
चार युगों मे पहला जो 'कृतयुग' भी कहलाता है। पुण्य और सत्य की अधिकता के कारण यह युग अन्य तीनों युगों से श्रेष्ठ समझा जाता है।
संज्ञा
(सं. सत्ययुग)

सतरंग, सतरंगा
जिसमें सात रंग हों, सात रंगवाला।
वि.
(हिं. सात + रंग)

सतरंग, सतरंगा
इन्द्रधनुष।
संज्ञा

सतरंज
एक प्रसिद्ध खेल।
संज्ञा
(फ़ा. शतरंज)

सतर
लकीर, रेखा।
संज्ञा
(अ.)

सतर
कतार, पंक्ति, अवली।
संज्ञा
(अ.)

सतर
टेढ़ा, वक्र।
वि.

सतर
कुपित, क्रुद्ध।
वि.
उ.- (क) हमसौं सतर होत सूरज प्रभु कमल देहु अब जाइ-५३७। (ख) कहा हमारौ मन यह राखै अरु हमहीं पर सतर गई-१२६७। (ग) सतर होति काहे को माई- पृ. ३२३ (२७)।

सतर
जल्दी से।
क्रि.वि.
(सं. सत्वर)

सतरह
वह संख्या जो दस से सात अधिक हो।
संज्ञा
(हिं. सत्तरह)

सतरह
सत्तरह की संख्या जो अष्टांग योग और नवधा भख्ति की सूचक मानी जाती है। अथवा पासे के खेल का वह दाँव जिसमें दो छक्के और एक पंजा साथ-साथ पड़ते हैं।
संज्ञा
(हिं. सत्तरह)
उ.- राखि सतरह सुनि अठारह चोर पाँचों मारि-१-३०९।

सतराइ
क्रोध करके, कुपित होकर।
क्रि.अ.
(हिं. सतराना)
उ.- लाज नहीं तुम आवई बोलत जब सतराइ-११३३।

सतराई
दुश्मनी, शत्रुता।
संज्ञा
(सं. शत्रु + आई)
उ.- कोउ कहै होई करम दुखदाता। सो तौ मैं न कीन्ह सतराई।

सतरात
कोप या क्रोध करता है।
क्रि.अ.
(हिं. सतराना)
उ.- (क) काहे को सतरात, बात मैं साँची भाषत-१०१८। (ख) आदि-बुन्यादि सबै हम जानति काहे को सतरात-११२४। (ग) सुनहु सखी सतरात इते पर हम पर भौहैं तानत-पृ. ३२८ (७७)।

सतराति
कोप या क्रोध करती हो (हूँ)।
क्रि.अ.
(हिं. सतराना)
उ.- (क) धन तुम लिए फिरति हौ, दान देत सतराति-१०३६। (ख) नित ही, नित बूझति ये मोसों मैं इन पर सतराति-१६१३। (ग) बहियाँ गहत सतराति कौन पर-२०४७।

सतराना, सतरानो
कुढ़ना, चिढ़ना।
क्रि.अ.
(हिं. सतर)

सतराना, सतरानो
कोप या क्रोध करना।
क्रि.अ.
(हिं. सतर)

सतरानी
कुपित या क्रुद्ध हुई।
क्रि.अ.
(हिं. सतराना)
उ.- जाइ करौ ह्वँ बोध सबनि को मोपर कत सतरानी-१८८३।

सतराने
कुपित या क्रुद्ध हुए।
क्रि.अ.
(हिं. सतराना)
उ.- तुमहिं उलटि हम पर सतराने-११३६।

सतराहट
चिढ़, कुढ़न।
संज्ञा
(हिं. सतराना+हट)

सतराहट
गुस्सा, कोप, क्रोध।
संज्ञा
(हिं. सतराना+हट)

सतरौहाँ
क्रुद्ध, कुपित।
वि.
(हिं. सतराना)

सतरौहॉ
कोप या क्रोध-सूचक।
वि.
(हिं. सतराना)

सतर्क
तर्कयुक्त।
वि.
(सं.)

सतर्क
सचेत।
वि.
(सं.)

सतर्कता
सावधानी।
संज्ञा
(सं.)

सतर्पना, सतर्पनो
भली-भाँति तुष्ट या तृप्त करना।
क्रि.स.
(सं. सतर्पण)

सतलज
शतुद्र नदी जो पंजाब की पाँच प्रसिद्ध नदियों में एक है।
संज्ञा
(सं. शतद्रु)

सतलड़ा
जिसमें सात लड़ें हों।
वि.
(हिं. सात + लड़)

सतलड़ा
हार जिसमें सात लड़ें हों।
संज्ञा

सतलड़ी
जिसमें सात लड़ियाँ हों।
वि.
(हिं. सात + लड़ी)

सतलड़ी
सात लड़ियों की माला।
संज्ञा

सतवंती, सतवती
सती पतिव्रता।
वि.
(हिं. सत्य+वंती)

सतसंग
भली संगत, साधु-सज्जनों का नाथ।
संज्ञा
(सं. सत्संग)
उ.-सुनि सतसंग होत जिय आलस, बिषयिनि सँग बिसरामी-१-१४८।

सतसंगति
भली संगत, साधु-सज्जनों का नाथ, सत्संग।
संज्ञा
(सं. सत+हिं. संगत)
उ.- अजहूँ मूढ़ करौ सतसंगति, संतनि मैं कछु पैहै-१-८६।

सतसंगी
सत्संग करनेवाला।
वि.
(सं. सत्संगी)

सतसई
एक ही तरह की सात सौ चीजों का समूह।
संज्ञा
(हिं. सात + सं. शती)

सतसई
वह ग्रंथ जिसमें सात सौ छंदों (विशेषतया दोहों) का संग्रह हो।
संज्ञा
(हिं. सात + सं. शती)

सतसठ
सड़सठ।
वि.
(हिं. सात + साठ)

सत-सार
सार-तत्व।
संज्ञा
(सं. सत्य + सार)

सत-सार
प्राण या जीदन शक्ति।
संज्ञा
(सं. सत्य + सार)
उ.- निसा निमेष कपाट लगे बिनु ससि मूषत सत-सार-२८८८।

सतह
वस्तु का ऊपरी तल।
संज्ञा
(अ.)

सतहत्तर
सत्तर से सात अधिक की संख्या।
संज्ञा
(सं. सप्तसप्तति, पा. सत्तसत्तति, प्रा. सत्तहत्तरि)

सतहरा
जिसने सत्य (हार-कर) छोड़ दिया हो।
वि.
(सं. सत्व + हिं. हारना)

सतांग
रथ, यान।
संज्ञा
(सं. शतांग)

सताए
पीड़ित किया (किये)।
क्रि.स.
(हिं. सताना)
उ.- (क) राज-धर्म सुनि इहै सूर जिहिं प्रजा न जाहिं सताए-३३-६३। (ख) सूरदास प्रभु तुम्हरे मिलन बिना मदन की ताप सताए-३३८३।

सतानंद
राजा जनक के पुरोहित जो गौतम ऋषि के पुत्र थे।
संज्ञा
(सं.)

सताना, सतानो
तंग करना, कष्ट या दुख देना।
क्रि.स.
(सं. संतापन, प्रा. संतावन)

सतायो, सतायौ
पीड़ित किया, दुख दिया।
क्रि.स.
(हिं. सताना)
उ.-(क) दुरबासा अँबरीष सतायौ-९-३८। (ख) कह्यौ सुरनि, तुम रिषिहिं सतायौ, तातैं कर रहि गयौ उचायौ-९-३। (ग) इन नैननि मोहिं बहुत सतायौ- पृ. ३२२ (१३)।

सतावत
कष्ट देता या पीड़ित करता है, दुख देता है।
क्रि.स.
(हिं. सतावना)
उ.- ऊधौ, इतने मोहिं सतावत-३०-७६।

सतावति
कष्ट देती है।
क्रि.स.
(हिं. सतावना)
उ.- प्रभु तुव माया मोहि सतावति-१-२२६।

सतावना, सतावनो
तंग करना, दुख या संताप देना।
क्रि.स.
(हिं. सताना)

सतावै
दुख या संताप देता है।
क्रि.स.
(हिं. सतावना)
उ.-नाहिनैं नाथ जिय सोच धन-धरनि को, मरन सें अधिक यह दुख सतावै-१० उ.-५०।

सति
सत्य।
संज्ञा
(सं. सत्य)

सतिभाइ
सद्भाव से।
क्रि.वि.
(सं. सत्य + भाव)
उ.- पवनपुत्र बोल्यौ सतिभाइ-९-१५५।

सतिभाउ, सतिभाऊ
सद्भावना के साथ।
क्रि.वि.
(सं. सत्य + भाव)
उ.-की तू कहति बात हँसि मोसों की बूझति सतिभाऊ-१२६०।

सतिभाएँ, सतिभायें
सद्भावना से।
क्रि.वि.
(सं. सत्य + भाव)
उ.- (क) पूछे समाचार सतिभाएँ-१-२८४। (ख) सुख सजनी सतिभायें सँवारी-१० उ.-३९।

सती
पति के अतिरिक्त किसी अन्य पुरुष का पतिभाव से ध्यान न करनेवाली, पतिव्रता, साध्वी।
वि.
(सं.)
उ.- सूरदास स्वामी सौं बिमुख ह्वै सती कैसैं भोग-१-३२१।

सती
पति के शव के साथ अथवा उसके मरने पर किसी भी अन्य प्रकार से प्राण त्याग देनेवाली (स्त्री)।
वि.
(सं.)

सती
दक्ष प्रजापति की कन्या जो शिवजी को ब्याही थी।
संज्ञा
उ.- (क) सती दच्छ की पुत्री भई। दच्छ सो महादेव कौं दई-४-५।

सती
सच्चा, सत्यनिष्ठ।
वि.
(सं. सत +ई)
उ.-जती सती तापस आराधैं-१-२६३।

सतीचौरा
वह चबूतरा या वेदी जो किसी पतिव्रता के सती होने के स्थान पर, उसकी स्मृति में, बनाया जाता है।
संज्ञा
(सं. सती+चौरा)

सतीत्व
सती हीने का भाव, पातिव्रत।
संज्ञा
(सं.)

सतीपन
सतीत्व, पातिव्रत धर्म।
संज्ञा
[सं. सती. +पन (प्रत्य.)]

सतुआ
सत्तू।
संज्ञा
(हिं. सत्तू)

सतून
खंभा, स्तंभ।
संज्ञा
(फ़ा. सुतून)

सतूना
बाज की वह झपट जिसमें वह शिकार के ठीक ऊपर से एक बारगी उस पर टूट पड़ता है।
संज्ञा
(हिं. सतून)

सतृष्ण
जिसमें तृष्णा हो।
वि.
(सं.)

सतोखना, सतोखनो
प्रसन्न या संतुष्ट करना।
क्रि.स.
(सं. सतोषण)

सतोखना, सतोखनो
धैर्य या सांत्वना देना।
क्रि.स.
(सं. सतोषण)

सतोगुण
प्रकृति के तीन गुणों में सर्वोत्तम जो सत्कार्यों की ओर प्रवृत्त करता है।
संज्ञा
(सं. सत्वगुण)

सतोगुणी
जो सत्वगुण से युक्त हो, सात्विक।
वि.
(सं. सतोगुण)

सतौसर
सतलड़ा।
वि.
(सं. सप्तसृक)

सत्
सत्यतापूर्ण धर्म।
संज्ञा
(सं.)

शारंगपाणि, शारंगपाणी, शारंगपानि, शारंगपानी
शारंग' नामक धनुष हाथ में लेनेवाले, विष्णु या उनके प्रमुख अवतार राम और कुष्ण।
संज्ञा
(सं.)
उ.- सुत के हेत मर्म नहिं पायो प्रगटे शारँगपानी-३४३५।

शारद
शरद्काल-संबंधी।
वि.
(सं.)

शारद
सरस्वती।
संज्ञा
(सं. शारदा)
उ.- शारद का बरनै मति भोरी-२४४३।

शारदा
वीणा-विशेष।
संज्ञा
(सं.)

शारदा
सरस्वती, भारती।
संज्ञा
(सं.)

शारदा
एक प्राचीन लिपि।
संज्ञा
(सं.)

शारदी, शारदीय
शरद् काल-संबंधी।
वि.
(सं.)

शारिका
मैना (चिड़िया)।
संज्ञा
(सं.)

शारीरिक
शरीर संबंधी।
वि.
(सं.)

शार्ङ्गु
कमान, धनुष।
संज्ञा
(सं.)

शिविका
डोली, पालकी।
संज्ञा
(सं.)

शिविर
डेरा, पालकी।
संज्ञा
(सं.)

शिविर
सेना का पड़ाव, छावनी।
संज्ञा
(सं.)

शिविर
किला, कोट, दुर्ग।
संज्ञा
(सं.)

शिशिर
एक ऋतु जो माघ-फाल्गुन में होती है।
संज्ञा
(सं.)
उ.- परम दीन जनु शिशिर हेम हत अंबुज गत बिनु पात।

शिशिर
जाड़ा, शीत-काल।
संज्ञा
(सं.)

शिशिर
बरफ, पाला, हिम।
संज्ञा
(सं.)

शिशिरांत
शिशिर के अंत या पश्चात् की ऋतु, बसंत।
संज्ञा
(सं.)

शिशु
छोटा बच्चा।
संज्ञा
(सं.)
उ.- शंख चक्र भुज चारि बिराजत अति प्रताप शिशु भेषा हो।

शिशुता
बचपन, बाल्यावस्था।
संज्ञा
(सं.)
उ.- अति शिशुता में ताहि सँहारयो -९८६।

सत्
सौ।
वि.
(सं. शत)

सत्
किसी पदार्थ का मूल तत्व, सार भाग।
संज्ञा
(सं. सत्व)

सत्
जीवनी शक्ति।
संज्ञा
(सं. सत्व)

सत्कर्ता
अच्छा कार्य या सत्कर्म करनेवाला।
वि.
(सं. सत्कर्तृ)

सत्कर्ता
सत्कार करनेवाला।
वि.
(सं. सत्कर्तृ)

सत्कर्म
अच्छा काम।
संज्ञा
(सं. सत्कर्मन्)

सत्कर्म
पुण्य, धर्मकाय।
संज्ञा
(सं. सत्कर्मन्)

सत्कर्म
अच्छा संस्कार।
संज्ञा
(सं. सत्कर्मन्)

सत्कार
आनेवाले का आदर-सम्मान।
संज्ञा
(सं.)
उ.- सूरदास सत्कार किएँ तैं ना कछु घटै तुम्हारौ-१-२१५।

सत्कार
धन आदि भेंट देकर किया जानेवाला आदर-सम्मान।
संज्ञा
(सं.)

सत्कार
आतिथ्य।
संज्ञा
(सं.)

सत्कारक
सत्कार करनेवाला।
वि.
(सं.)

सत्कार्य
उत्तम कार्य।
संज्ञा
(सं. सत्कार्य्य)

सत्कार्य्य
सत्कार करने योग्य।
वि.
(सं.)

सत्कार्य्य
जिसका सत्कार करना हो।
वि.
(सं.)

सत्कार्य्य
जिस (मृतक) का क्रिया-कर्म करना हो।
वि.
(सं.)

सत्कार्य्य
उत्तम कार्य।
संज्ञा

सत्कार्य्यवाद
वह दार्शनिक सिद्धांत जिसके अनुसार इस जगत की उत्पत्ति किसी मूल सत्ता से मानी जाती है।
संज्ञा
(सं.)

सत्कीर्ति
उत्तम कीर्ति।
संज्ञा
(सं. सत्कीर्त्ति)

सत्कुल
उत्तम कुल।
संज्ञा
(सं.)

सत्कृत
उत्तम रीति से किया हुआ।
वि.
(सं.)

सत्कृत
जिसका आदर-सत्कार किया गया हो।
वि.
(सं.)

सत्कृत
आदर-सत्कार।
संज्ञा

सत्कृत
सत्कर्म।
संज्ञा

सत्कृति
सत्कर्मी।
वि.
(सं.)

सत्कृति
उत्तम कार्य या कृति।
संज्ञा

सत्क्रिया
आदर-सत्कार।
संज्ञा
(सं.)

सत्क्रिया
आतिथ्य।
संज्ञा
(सं.)

सत्क्रिया
तैयारी।
संज्ञा
(सं.)

सत्क्रिया
सत्कर्म।
संज्ञा
(सं.)

सत्त
किसी पदार्थ का सार भाग या तत्व।
संज्ञा
(सं. सत्व)

सत्त
जीवनी शक्ति।
संज्ञा
(सं. सत्व)

सत्त
जीव, प्राणी।
संज्ञा
(सं. सत्व)

सत्त
मनुष्य।
संज्ञा
(सं. सत्व)

सत्त
काम की चीज, तत्व।
संज्ञा
(सं. सत्व)

सत्त
सत्य।
संज्ञा
(सं. सत्य)
उ.- धर्म-सत्त मेरे पितु माता-१-१७३।

सत्त
सतीत्व, पातिव्रत।
संज्ञा
(सं. सत्य)

सत्त
सात (संख्या)।
वि.
(हिं. सात)

सत्ता
साठ और दस की संख्या।
संज्ञा
(सं. सप्तति, प्रा. सत्तरह)

सत्तरह
दस और सात की संख्या।
संज्ञा
(सं. सप्तदश, रा. सत्तरह)

सत्तरह
पासे के खेल का वह दाँव जिसमें दो छक्के और एक पंजा साथ-साथ पड़ते हैं। या अष्टांग योग और नवधा भक्ति का योग-सूचक अंक।
संज्ञा
(सं. सप्तदश, रा. सत्तरह)
उ.-राखि सत्तरह (सतरह) सुनि अठारह चोर पाँचों मारि-१-३०९।

सत्ता
विद्यमान होने का भाव या उसकी अवस्था, अस्तित्व।
संज्ञा
(सं.)

सत्ता
शक्ति, सामर्थ्य।
संज्ञा
(सं.)

सत्ता
अधिकार, प्रभुत्व।
संज्ञा
(सं.)
मुहा.- सत्ता चलाना या जताना- शक्ति या अधिकार दिखाना या सिद्ध करना।

सत्ता
ताश का वह पत्ता जिसमें सात बूटियाँ हों।
संज्ञा
(हिं. सात)

सत्ताईस
बीस और सात की संख्या।
संज्ञा
(सं. सप्तविंशति, प्रा. सत्ताईसा)

सत्ताधारी
जिसके हाथ में शक्ति, सामर्थ्य या अधिकार हो, अधिकारी।
वि.
(सं.)

सत्तानबे
नब्बे और सात की संख्या।
संज्ञा
(सं. सप्तनवति, प्रा. सत्तनवइ)

सत्तावन
पचास और सात की संख्या।
संज्ञा
(सं. सप्तपंचाशत, प्रा. सत्तावन्ना)

सत्ताशास्त्र
वह दर्शन जिसमें पारमार्थिक सत्ता का विवेचन हो।
संज्ञा
(सं.)

सत्तासी
अस्सी और सात की संख्या।
वि.
(सं. सप्ताशीति, प्रा. सत्तासी)

सत्तू
भुने हुए जौ, चने, लावा आदि का चूर्ण।
संज्ञा
(सं. सक्तुक्त, प्रा. सत्तुअ)
मुहा.- सत्तू बाँधकर पीछे पड़ना- (१) पूरी तैयारी के साथ किसी काम को करने में लगना। (२) सब काम-धंधा छोड़ कर किसी के विरुद्ध प्रयत्न करना।

सत्पथ
उत्तम मार्ग।
संज्ञा
(सं.)

सत्पथ
उत्तम आचार-व्यवहार, सदाचार।
संज्ञा
(सं.)

सत्पथ
श्रेष्ठ सिद्धांत।
संज्ञा
(सं.)

सत्पात्र
श्रेष्ठ और सदाचारी व्यक्ति।
संज्ञा
(सं.)

सत्पात्र
(कन्या के योग्य) उत्तम वर।
संज्ञा
(सं.)

सत्पात्र
दान आदि ग्रहण करने के योग्य उत्तम, सदाचारी और धर्मनिष्ठ व्यक्ति।
संज्ञा
(सं.)

सत्पुरुष
सदाचारी और सज्जन व्यक्ति।
संज्ञा
(सं.)

सत्यंकार
वादा पूरा करना।
संज्ञा
(सं.)

सत्यंकार
वादा निश्चित करने के लिए अग्रिम दिया जानेवाला धन, अग्रिम।
संज्ञा
(सं.)

सत्य
जिसके ठीक या यथार्थ होने में किसी प्रकार का संदेह न हो।
वि.
(सं.)
उ.- ज्यों कोउ दुख-सुख सपनैं जोइ, सत्य मनिलै ताकौं सोइ-३-१३।

सत्य
जैसा हो या होना चाहिए वैसा।
वि.
(सं.)

सत्य
असल, यथार्थ, वास्तविक।
वि.
(सं.)
उ.-कौन सत्य कछु मर्म न पावत -१०-उ.-५।

सत्य
ठीक बात, यथार्थ य वास्तविक तत्व।
संज्ञा

सत्य
उचित या धर्म की बात।
संज्ञा
उ.- सत्य-सील सपन्न सुमूरति सुर-नर-मुनि भक्तनि भावै-१-६९।

सत्य
पारमार्थिक सत्ता जो सदा ज्यों की त्यों रहे।
संज्ञा

सत्य
ऊपर के सात लोकों में सबसे ऊपरी।
संज्ञा

सत्य
चार युगों में प्रथम जिसमें पुण्य और सदाचार की अधिकता रहना माना जाता है।
संज्ञा

सत्य
प्रतिज्ञा, शपथ।
संज्ञा

सत्यकाम
उत्तम, सत्य और सद् बातों की कामना रखनेवाला या प्रेमी।
वि.
(सं.)

सत्यतः
वास्तव में, यथार्थतः।
अव्य.
(सं.)

सत्यता
सत्य या यथार्थ होने का भाव।
संज्ञा
(सं.)

सत्यता
नित्यता।
संज्ञा
(सं.)

सत्यधन
जिसे सत्य सर्वप्रिय हो।
वि.
(सं.)

सत्यनारायण
विष्णु का एक नाम या रूप जिसकी कथा प्रायः पूर्णिमा को कही-सुनी जाती है।
संज्ञा
(सं.)

सत्यपुरुष
ईश्वर, परमात्म।
संज्ञा
(सं.)

सत्यप्रतिज्ञ
वचन का सच्चा।
वि.
(सं.)

सत्यब्रत
जिसने सदा सत्य बोलने की प्रतिज्ञा या निश्चय किया हो।
वि.
(सं. सत्यव्रत)

सत्यब्रत
एक राजा जिसने ʽप्रलयʼ देखने की कामना या अभिलाषा की थी।
संज्ञा
उ.- सत्यब्रत कहयौ, परलै दिखायौ-८-१६।

सत्ययुग
चार युगों में पहला जिसे 'कृतयुग' भी कहते हैं और जो पुण्य, धर्म तथा सदाचार के कारण अन्य तीनों युगों से श्रेष्ठ समझा जाता है।
संज्ञा
(सं.)

सत्ययुगी
सत्ययुग-संबंधी।
वि.
(सं. सत्ययुग)

सत्ययुगी
बहुत प्राचीन।
वि.
(सं. सत्ययुग)

सत्ययुगी
सज्जन, धर्मात्मा।
वि.
(सं. सत्ययुग)

सत्यलोक
ऊपर के सात लोकों में सबसे ऊपरी जहाँ ब्रह्मा का निवास कहा गया है।
संज्ञा
(सं.)
उ.- सत्यलोक जनलोक, तप लोक और महर निज लोक- सारा. २२।

सत्यवती
सच बोलनवाली।
वि.
(सं.)

सत्यवती
सत्य-धर्म का पालन करनेवाली।
वि.
(सं.)

सत्यवती
ʽमत्स्यगंधाʼ नामक धीवर-कन्या जिसके गर्भ से कुमारी अवस्था में ही पराशर ऋृषि के संयोग से कृष्णद्वैपायन या व्यास की उत्पत्ति हुई थी।
संज्ञा
उ.-सत्यवती मच्छोदरि नारी।¨¨¨¨। तहाँ परासर रिषि चलि आए। बिबस होइ तिहिं कैं मद छाए। रिषी कहयौ ताहि, दान-रति देहि।¨¨¨¨। सत्यवती सराप-भय मानि, रिषि कौ बचन कियौ परमान।¨¨¨¨। व्यासदेव ताके सुत भए-१-२२९।

सत्यवादी
सच बोलनेवाला।
वि.
(सं. सत्यवादिन्)

सत्यवादी
वचन या धर्म पर दृढ़ रहनेवाला।
वि.
(सं. सत्यवादिन्)

सत्यवान, सत्यवान्
सच बोलनेवाला।
वि.
(सं. सत्यवत्)

सत्यवान, सत्यवान्
प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहनेवाला।
वि.
(सं. सत्यवत्)

सत्यवान, सत्यवान्
शाल्व देश के राजा द्युमत्सेन का पुत्र जो अल्पायु था; परन्तु जीसकी पत्नी ने अपने पातिव्रत्य के बल से जिसे मृत्योपरांत पुनः जिला लिया था।
संज्ञा

सत्यव्रत
सत्य बोलने का निश्चयी।
वि.
(सं.)

सत्यव्रत
सत्य बोलने का प्रण, नियम या निश्चय।
संज्ञा

सत्यव्रत
एक सूर्यवंशी राजा जिसके तप से प्रसन्न होकर परब्रह्म ने उसे दर्शन दिया था।
संज्ञा
उ.- सत्यव्रत राजा रविवंसी पहिलैं भए मनु बंस। कीनौ तप बहु भाँति परम रुचि प्रगट भए हरि-अंस- सारा. ९१।

सत्यसंध
सत्यप्रतिज्ञ।
वि.
(सं.)

सत्यसंध
श्रीरामचंद्र का एक नाम।
संज्ञा

सत्या
सच्चाई, सत्यता।
संज्ञा
(सं.)

सत्या
व्यास की माता सरस्वती।
संज्ञा
(सं.)

शिशुता
शिशु का भाव, धर्म या कार्य।
संज्ञा
(सं.)

शिशुताई
शिशु का भाव, धर्म या कार्य।
संज्ञा
(सं. शिशुता)
उ.- जसुमति भाग सुहागिनी हरि को सुत जानै। मुख मुख जोरि बतावई शिशुताई ठानै।

शिशुपन
बचपन।
संज्ञा
(सं. शिशु + (हिं. पन)

शिशुपाल
चेदि देश का राजा जो रूक्मिणी से विवाह करना चाहता था और जिसे श्रीकृष्ण ने पांडवों के राजसूय यज्ञ में मारा था।
संज्ञा
(सं.)
उ.- देस देस के नृपति जुरे सब भीष्म नृपति के धाम। रूक्म कह्यो, शिशुपाल को देहौं नहीं कृष्ण सों काम - सारा. ६२८।

शिष
शिष्य।
संज्ञा
(सं. शिष्य)

शिष
सीख, सिखावन।
संज्ञा
(सं. शिक्षा)
उ.- आपुन को उपचार करौ कछु तब औरन शिष देहु-३०१३।

शिष
चोटी, शिखा जो मुंडन के समय सिर पर रक्खी जाती है।
संज्ञा
(सं. शिखंड या शिखा)
उ.- कटि पट पीत पिछौरी बाँधे कागपच्छ शिख शीश।

शिषरी
जिसमें शिखर हो।
वि.
(सं. शिखर)

शिषा
चोटी।
संज्ञा
(सं. शिखा)

शिषि
चेला।
संज्ञा
(सं. शिष्य)

सत्या
सीता का एक नाम।
संज्ञा
(सं.)

सत्याग्रह
किसी न्यायपूर्ण बात के लिए शांतिपूर्वक आग्रह करना।
संज्ञा
(सं.)

सत्याग्रही
किसी न्यायपूर्ण बात के लिए शांतिपूर्वक आग्रह करनेवाला।
वि.
(सं.)

सत्यानाश, सत्यानास
मटियामेट, ध्वंस, सर्वनाश।
संज्ञा
(सं. सत्ता + नाश)

सत्यानाशी, सत्यानासी
सर्वनाश करनेवाला।
वि.
(हिं. सत्यानाश)

सत्र
यज्ञ।
संज्ञा
(सं.)

सत्र
घर, गृह।
संज्ञा
(सं.)

सत्र
वह स्थान जहाँ दीनों को भोजन दिया जाता हो, छेत्र, सदा-वर्त।
संज्ञा
(सं.)

सत्र
वह काल या समय जिसमें एक कार्य निरंतर समान गति से चलता रहे।
संज्ञा
(सं.)

सत्रह
दस और सात की संख्या का।
वि.
(सं. सत्तरह)
उ.- सत्रह सौ भोजन तहँ आए-३९६।

सत्राइ, सत्राई
दुश्मनी, शत्रुता।
संज्ञा
(सं. शत्रुता)
उ.- (क) कोउ कहै सत्रु होइ दुखदाई। सो तौ मैं न कीन्ह सत्राई-१-२९०। (ख) मम सत्राई हिरदैं आन, करिहै वह तेरौ अपमान।¨¨¨¨। सिव कहयौ मेरैं नहिं सत्राई-४-५। (ग) उनकैं मन नाहीं सत्राई-९-५।

सत्राजित
एक यादव जिसने सुर्य की तपस्या करके स्यमंतक मणि प्राप्त की थी और उसके खो जाने पर श्रीकृष्ण को चोरी लगाई थी। जब श्रीकृष्ण ने जांबवान से युद्ध करके उसकी मणि ला दी तब उसने अपनी पुत्री सत्यभामा का विवाह श्रीकृष्ण के साथ कर दिया था।
संज्ञा
(सं.)

सत्रु
दुश्मन, शत्रु।
संज्ञा
(सं. शत्रु)
उ.- (क) सुर-अरु असुर कस्यप के पुत्र। भ्रात बिमात आपु मैं सत्रुं-३-९। (ख) सैल-सिला-द्रुम बरषि ब्योम चढ़ि सत्रु-समूह सँहारौं-९-१०८। (ग) छठऎं सुक्र तुला के सनि जुत सत्रु रहन नहिं पैहैं-१०-८६।

सत्रुघन
श्रीराम के सबसे छोटे भाई।
संज्ञा
(सं. शत्रुघ्न)
उ.- नाहीं भरत-सत्रुगन सुंदर जिनसौं चित्त लगायौ-९-१४६।

सत्रुता
दुश्मनी, शत्रुता।
संज्ञा
(सं. शत्रुता)
उ.-पृथु कहथौ, नाथ, मेरैं न कछु सत्रुता अरु न कछकामना, भक्ति दीजै-४-११।

सत्रुहन
श्रीराम के सबसे छोटे भाई।
संज्ञा
(सं. शत्रुघ्न)
उ.- लछिमन भरत सत्रुहन सुन्दर राजिव-लोचन राम-९-२०।

सत्व
होने का भाव, अस्तित्व।
संज्ञा
(सं.)

सत्व
सार, तत्व।
संज्ञा
(सं.)

सत्व
आत्मतत्व, चैतन्य।
संज्ञा
(सं.)

सत्व
प्राण, जीवनी शक्ति।
संज्ञा
(सं.)

सत्व
प्रकृति के तीन गुणों में एक जिसके फलस्वरूप अच्छे कर्मों की ओर ही प्रवृत्ति रहती है।
संज्ञा
(सं.)

सत्व
जीवधारी, प्राणी।
संज्ञा
(सं.)

सत्व
शक्ति, सामंर्थ्य।
संज्ञा
(सं.)

सत्वगुण
वह गुण या प्रकृति जो अच्छे कर्मों की ही प्रवृत्त करे।
संज्ञा
(सं.)

सत्वगुणी
जो अच्छे कर्मों की ओर ही प्रवृत्त रहे, उत्तम प्रकृतिवाला।
वि.
(सं.)

सत्वर
शीघ्र, तुरंत।
क्रि.वि.
(सं.)
उ.-सत्वर सूर सहाय करै को रही छिनक की बात-३१६५।

सत्संग
साधु-सज्जनों के साथ उठना-बैठना, भली संगत।
संज्ञा
(सं.)

सत्संग
वह समाज जिसमें धर्मोपदेश आदि होते हों।
संज्ञा
(सं.)

सत्संगति
अच्छी संगत।
संज्ञा
(सं. सत्संग)

सत्संगी
अच्छी संगत में रहनेवाला।
वि.
(हिं. सत्संग)

सत्संगी
धर्म-कर्म के आयोजक समाजों में भाग लेनेवाला।
वि.
(हिं. सत्संग)

सत्समागम
भलों का साथ।
संज्ञा
(सं.)

सथर
भूमि, पृथ्वी।
संज्ञा
(सं. स्थल)

सथिया
स्वस्तिक चिह्न ( ) जो मंगल-सूचक और सिद्धिदायक माना जाने के कारण विशेष अवसरों पर कलश, दीवार आदि पर बनाया जाता है।
संज्ञा
(सं. स्वस्तिक, प्रा. सत्थिअ)
उ.- (क) द्वार सथिया देति स्यामा सात सींक बनाइ-१०-२६। (ख) कौरनि सथिया चीततिं नवनिधि-९०-३२।

सथिया
देवताओं आदि के पद-तल का चिह्न-विशेष।
संज्ञा
(सं. स्वस्तिक, प्रा. सत्थिअ)

सथिया
भारतीय ढंग का अस्त्र-चिकित्सक।
संज्ञा
(सं. स्वस्तिक, प्रा. सत्थिअ)

सद
तुरन्त, तत्काल।
अव्य.
(सं. सद्य)
उ.- करहु कृपा अपने जन पर सद-१८२।

सद
ताजा।
वि.
उ.- (क) सद दधि-माखन द्यौं आनि-१०-१८३। (ख) माखन-रोटी सद दही जेंवत रुचि उपजाय-४३१।

सद
हाल का, नया, नवीन।
वि.

सद
अच्छा, बढ़िया, उत्तम।
वि.
(सं. सद)

सद
आदत, टेव, प्रकृति।
संज्ञा
(सं. सत्व)

सद
मंडली, सभा, समिति।
संज्ञा
(सं. सदसु)

सद
छोटा मंडप।
संज्ञा
(सं. सदसु)

सदई
सदैव, सर्वदा।
अव्य.
(हिं. सदा)

सदका
खैरात, दान।
संज्ञा
(अ. सदकः)

सदका
वह वस्तु जो किसी के सिर पर से उतार कर रास्ते या चौराहे पर रखी जाय, उतारा, उतारन।
संज्ञा
(अ. सदकः)

सदका
वह वस्तु जो किसी की कल्याण या मंगल-कामना से, उसके सर पर से उतारकर किसी को दी जाय, निछावर।
संज्ञा
(अ. सदकः)
उ.- सूरदास प्रभु अपने सदका घरहिं जान हम दीजै-१०५३।

सदके
निछावर किया हुआ।
वि.
(हिं. सदका)
मुहा.-सदके जाऊँ बलि जाऊँ,निछावर होऊँ।

सदगति
मरने के बादु उत्तम लोक में जाना।
संज्ञा
(सं. सद्गति)
उ.- आज्ञा होइ करौं अब सोइ। जातैं मेरी सदगति होइ-१-३४१।

सदगति
सदा चलता रहनेवाला।
वि.
(सं. सद् +गति)

सदगति
हवा, वायु।
संज्ञा

सदगति
सूर्य।
संज्ञा

सदचारी
उत्तम आचरणवाला।
वि.
(हिं. सदाचारी)

सदचारी
ठीक और सत्य।
वि.

सदन
घर, मकान।
संज्ञा
(सं.)
उ.- (क) बरनौं कहा सदन की सोभा बैकुंठहुँ तैं राजै री-१०-१३९। (ख) गहथौ स्याम-कर कर अपने सों लिए सदन को आई-२५८७।

सदन
आलय, स्थान।
संज्ञा
(सं.)
उ.- सुनि स्त्रवन दसबदन, सदन-अभिमान, कै नैन की सैन अंगद बुलायौ-९-१२९।।

सदन
वह स्थान जहाँ किसी विषय पर विचार करने या नियय, विधान आदि बनाने के लिए सदस्यों या प्रतिनिधियों की बैठक हो।
संज्ञा
(सं.)

सदन
ऎसी बैठक में भाग लेनेवालों का समूह।
संज्ञा
(सं.)

सदन
एक कसाई का नाम जो प्रसिद्ध हरि-भक्त था।
संज्ञा
(सं.)

सदन
ताजा।
वि.
(सं. सद्यस्)

सदन
नया।
वि.
(सं. सद्यस्)

सदना
एक कसाई का नाम जो प्रसिद्ध हरि-भक्त था।
संज्ञा
(देश.)

सदना
छेद से रस-रसकर चूना या टपकना।
क्रि.अ.
(सं. सदन=थिराना)

सदमा
मानसिक आघात।
संज्ञा
(अ. सद्मः)

सदय
दयालु, दयायुक्त।
वि.
(सं.)

सदर
खास, प्रधान, मुख्य।
वि.
(अ. सद्र)

सदर
केंद्रस्थल।
संज्ञा

सदर
सभापति।
संज्ञा

सदर्थना, सदर्थनो
समर्थन करना।
क्रि.स.
(सं. समर्थन)

सदसद्विवेक
भले-बुरे का ज्ञान।
संज्ञा
(सं.)

सदसि
सदस्य या सभ्यों के बैठन का स्थान, सभा, समाज।
संज्ञा
(सं. सदस्य)

सदस्य
मेंबर, सभासद।
संज्ञा
(सं.)

सदस्यता
सदस्य का भाव या पद।
संज्ञा
(सं.)

सदा
हमेशा, नित्य, सदैव।
अव्य.
(सं.)
उ.- (क) सुमिरन कथा सदा सुखदायक- १-८३। (ख) यह संसार बिषय-बिष-सागर रहत सदा सब घेरे-१-८५।

सदा
निरंतर।
अव्य.
(सं.)

सदा
गूँज।
संज्ञा
(अ.)

सदा
आवाज, ध्वनि।
संज्ञा
(अ.)

सदा
पुकार।
संज्ञा
(अ.)

सदाई
नित्य ही सदैव।
अव्य.
(हिं. सदा)
उ.- (क) बिलसत मदन सदाई-६२६। (ख) प्रभु-पतिव्रत तुम करौ सदाई-८९६।

सदाकत
सच्चाई।
संज्ञा
(अ. सदाक़त)

सदाचरण
अचछा चाल-चलन।
संज्ञा
(सं.)

सदाचार
अच्छा आचरण।
संज्ञा
(सं.)

सदाचार
शिष्ट या सज्जनोचित व्यवहार।
संज्ञा
(सं.)

सदाचारिता
सदाचारी' होने का भाव, शिष्टता।
संज्ञा
(हिं. सदाचारी)

सदाचारी
अत्तम आचरणवाला।
वि.
(हिं. सदाचार)

सदाफर, सदाफल
जो (वृक्ष) सदा फूलता-फलता हो।
वि.
(सं. सदाफल)

सदाफर, सदाफल
एक तरह का नीबू।
संज्ञा

सदाफर, सदाफल
गूलर।
संज्ञा

सदाफर, सदाफल
नारियल।
संज्ञा

सदाफर, सदाफल
बेल।
संज्ञा

सदाबरत
वह स्थान जहाँ दीन अनाथों को नित्य भोजन बटता हो।
संज्ञा
(सं. सदावर्त)

सदाबहार
सदा हरा-भरा रहनेवाला (वृक्ष)।
वि.
(हिं. सदा +फ़ा. बहार)

सदारत
सभापतित्व।
संज्ञा
(अ.)

सदावर्त
वह स्थान जहाँ दीनहीनों को नित्य भोजन बटता हो।
संज्ञा
(सं. सदाव्रत)

सदावर्त
वह दान जो नित्य दिया जाय।
संज्ञा
(सं. सदाव्रत)

सदाशय
जिसके भाव उच्च और उदार हों, सज्जन, शिष्ट, उदार।
वि.
(सं.)

सदाशयता
सदाशय' होने का भाव, सज्जनता, उदारता।
संज्ञा
(सं.)

सदाशिव, सदासिव
शिव, महादेव।
संज्ञा
(सं. सदाशिव)
उ.- पाइ सुधि मोहिनी की, सदासिव चले जाइ भगवान सों कहि सुनाई-८-१०।

सदाशिव, सदासिव
सदा कल्याण करनेवाला।
वि.

सदासुहागिन, सदासुहागिनि, सदासुहागिनी
जो (स्त्री) कभी पतिहीन या विधवा न हो।
वि.
(हिं. सदा + सुहागिनि)

शिषी
मोर, मयूर।
संज्ञा
(सं. शिखी)

शिष्ट
शांत।
वि.
(सं.)

शिष्ट
सुशील।
वि.
(सं.)

शिष्ट
श्रेष्ठ।
वि.
(सं.)

शिष्ट
सज्जन, सभ्य।
वि.
(सं.)

शिष्ट
शालीन।
वि.
(सं.)

शिष्टता
सज्जनता, सभ्यता।
संज्ञा
(सं.)

शिष्टता
शालीनता।
संज्ञा
(सं.)

शिष्टता
उत्तमता, श्रेष्ठता।
संज्ञा
(सं.)

शिष्टाचार
सभ्य आचरण।
संज्ञा
(सं.)

सदासुहागिन, सदासुहागिनि, सदासुहागिनी
वेश्या (परिहास)।
संज्ञा

सदी
शताब्दी।
संज्ञा
(अ.)

सदी
सैकड़ा।
संज्ञा
(अ.)

सदुपदेश, सदुपदेस
उत्तम शिक्षा।
संज्ञा
(सं. सदुपदेश)

सदुपदेश, सदुपदेस
अच्छी सलाह।
संज्ञा
(सं. सदुपदेश)

सदुपयोग
अच्छी तरह या अच्छे काम में उपयोग करना।
संज्ञा
(सं. सद् + उपयोग)

सदूर
शेर, सिंह।
संज्ञा
(सं. शार्दूल)

सद्दश, सद्दस
समान रूप-रंग का, अनुरूप।
वि.
(सं. सदृश)
उ.- तड़ित बसन धनस्याम सदृस तन-६९।

सद्दश, सद्दस
बराबर, तुल्य।
वि.
(सं. सदृश)

सद्दशता
अनुरूपता।
संज्ञा
(सं.)

सद्दशता
तुल्यता।
संज्ञा
(सं.)

सदेह, सदेहियाँ
बिना शरीर का त्याग किये, सशरीर।
क्रि.वि.
(सं. सदेह)

सदेह, सदेहियाँ
(मानव) देह या शरीर धारण करके, प्रत्यक्ष या मूर्तिमान होकर।
क्रि.वि.
(सं. सदेह)
उ.- मानौं चारि हंस सरवर तैं बैठे आइ सदेहियाँ-१--१९।

सदैव
हमेशा, सर्वदा।
अव्य.
(सं.)

सदोष
जिसमें दोष हो।
वि.
(सं.)

सदोष
जिसने अपराध किया हो, दोषी।
वि.
(सं.)

सद्गति
उत्तम अवस्था।
संज्ञा
(सं.)

सद्गति
मरने के बाद अच्छे लोक की प्राप्ति।
संज्ञा
(सं.)

सद्गुण
उत्तम गुण।
संज्ञा
(सं.)

सद्गुणी
अच्छे गुणवाला।
वि.
(हिं. सद्गुण)

सद्गुरु
उत्तम शिक्षक या आचार्य।
संज्ञा
(सं.)

सद्गुरु
वह धर्मोपदेशक या मंत्रदाता जो शिष्य को भव-बंधन से मुक्त कराने में समर्थ हो।
संज्ञा
(सं.)

सद्गुरु
परमात्मा।
संज्ञा
(सं.)

सद्-ग्रंथ
उत्तम शिक्षा से युक्त ग्रंथ।
संज्ञा
(सं. सत् + ग्रंथ)

सद्-ग्रंथ
वह धर्म-ग्रंथ जिसके मनन और आचरण से भव-बंधन से मुक्त होने की प्रेरणा और सिद्धि मिले।
संज्ञा
(सं. सत् + ग्रंथ)

सद्द
शब्द, ध्वनि।
संज्ञा
(सं. शब्द, प्रा. सद्द)

सद्द
तुरंत, तत्काल।
अव्य.
(सं. सद्य)

सद्द
तुरंत का बना, ताजा।
वि.

सद्द
हाल का, नया, नवीन।
वि.

सद्धर्म
श्रेष्ठ या उत्तम धर्म।
संज्ञा
(सं.)

सद्धर्म
(भगवान बुद्ध का) बौद्ध धर्म।
संज्ञा
(सं.)

सद्भाव
प्रेम, हित और शुभचिंतना का भाव।
संज्ञा
(सं.)

सद्भाव
(किसी कार्य के करने में) सच्चा और निष्कपट भाव।
संज्ञा
(सं.)

सद्भाव
मेलजोल, मैत्री।
संज्ञा
(सं.)

सद्भावना
शुभ या उत्तम भाव।
संज्ञा
(सं.)

सद्भावना
प्रेम, हित या मंगल का भाव।
संज्ञा
(सं.)

सद्म
घर, गृह।
संज्ञा
(सं. सदमन्)

सद्म
युद्ध।
संज्ञा
(सं. सदमन्)

सद्य, सद्यः
आज ही।
अव्य.
(सं. सद्य)

सद्य, सद्यः
अभी, इसी समय।
अव्य.
(सं. सद्य)

सद्य, सद्यः
तुरंत, शीघ्र।
अव्य.
(सं. सद्य)

सद्य, सद्यः
अभी का, ताजा।
वि.
उ.- माखन रोटी सद्य जम्यौ दधि-१०-२१२।

सद्रूप
अच्छे रूपवाला, सुंदर।
वि.
(सं.)

सद्रूप
उत्तम आचरणवाला।
वि.
(सं.)
उ.- साधु-सील सद्रूप पुरुष को अपजस बहु उच्चरतौ-१-२०३।

सद्रूपता
सद्रूप' होने का भाव, सुंदरता।
संज्ञा
(सं.)

सद्रूपता
सदाचार।
संज्ञा
(सं.)

सद्वृत्त
सदाचारी।
वि.
(सं.)

सद्वृत्ति
सदाचार।
संज्ञा
(सं.)

सद्व्रत
उत्तम व्रत या निश्चय।
संज्ञा
(सं.)

सद्व्रत
जिसने उत्तम व्रत या निश्चय किया हो।
वि.

सद्व्रत
सदाचारौ।
वि.

सद्व्रती
उत्तम व्रत या निश्चय करनेवाला।
वि.
(सं.)

सद्व्रती
सदाचारी।
वि.

सधना
काम पूरा होना।
क्रि.अ.
(हिं. साधना)

सधना
मतलब निकलना।
क्रि.अ.
(हिं. साधना)

सधना
अभ्यस्त होना।
क्रि.अ.
(हिं. साधना)

सधना
गौं पर चढ़ना, प्रयोजन-सिद्धि के उपयुक्त या अनुकूल होना।
क्रि.अ.
(हिं. साधना)

सधना
निशाना या लक्ष्य ठीक होना।
क्रि.अ.
(हिं. साधना)

सधना
हो सकना।
क्रि.अ.
(हिं. साधना)

सधर
ऊपर का होंठ।
संज्ञा
(सं.)

सधर्मी
समान गुण या विशेषता वाला।
वि.
(सं. सधर्मिन्)

सधर्मी
तुल्य।
वि.
(सं. सधर्मिन्)

सधवा
जिसका पति जीवित हो, सुहाग या सौभाग्यवती (स्त्री)।
वि.
(हिं. विधवा का अनु.)

सधाना
साधने का कार्य दूसरे से कराना।
क्रि.स.
(हिं. साधना)

सधाना
सिद्ध या संपन्न करना।
क्रि.स.
(हिं. साधना)

सधाना
पशु-पक्षियों को कार्य-विशेष के लिए शिक्षित करना या सिखलाना।
क्रि.स.
(हिं. साधना)

सधुक्कड़ी
साधुओं की, साधुओं जैसी।
वि.
[हिं. साधु + उक्कड़ (प्रत्य.)]

सधुक्कड़ी
साधु' होने का भाव, साधुता।
संज्ञा

सधायो, सधायौ
साधने को प्रवृत किया।
क्रि.स.
(हिं. सधाना)
उ.- राधा, मौनव्रत किन सधायो-१२६८।

सधावन
सधाने या साधने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(हिं. सधाना)
उ.- पवन सधावन भवन छोड़ावन नवल रसाल गोपाल पठायो-२९९९।

सधूम
धुएँ, कोहरे या भाप सहित।
क्रि.वि.
(सं.)

सधे
खूब सिखा-सिखाया, अच्छी तरह सधा हुआ।
वि.
(हिं. सधना)
उ.- कबहुँक सधे अस्व चढ़ि आपुन नाना भाँति नचावत-सारा. १९०।

सध्यो, सध्यौ
(कार्य) पूरा या संपादित हुआ।
क्रि.स.
(हिं. सधना)
सध्यौ नहिं धर्म सुचि सील तप ब्रत कछू कहा मुख लै तुम्हैं बिनै करिए-१-११०।

सनंक
सन्नाटा, नीरवता।
संज्ञा
(अनु. सनसन)

सनंदन
ब्रह्मा का चार मानसपुत्रों में एक जो कपिल मुनि के पूर्व सांख्य मत के प्रवर्तक थे।
संज्ञा
(सं.)
उ.- ब्रह्मा ब्रह्मरूप उर धारि। मन सौं प्रगट किए सुत चारि। सनक सनंदन सनतकुमार। बहुरि सनातन नाम ये चार-३-६।

सन
एक पौधा जिसके रेशों से रस्सी और टाट बनते हैं।
संज्ञा
(सं. शण)
उ.- सन और सूत चीर-पाटंबर लै लंगूर बँधाए-९-९८।

सन
साथ।
प्रत्य.
(सं. संग)

सन
से' विभक्ति का पुराना रूप।
अव्य.
(प्रा. संतो)
उ.- (क) बरबस सरम करत हठ हम सन-१६८७। (ख) जो कछु भयो तो कहिहौं तुम सन-२७९२। (ग) यह रजायसु होत मो सन कहत बदरी जान-१० उ.-१०४।

सन
वेग से चलने या निकलने का शब्द।
संज्ञा
(अनु.)

सन
स्तब्ध।
वि.
(हिं. सन्न)

सनकारना, सनकारनो
इशारा या संकेत करना।
क्रि.स.
(हिं. सैन + करना)

सनकारना, सनकारनो
सचेत या सावधान करना।
क्रि.स.
(हिं. सैन + करना)

सनकारना, सनकारनो
इशारे या संकेत से बुलाना।
क्रि.स.
(हिं. सैन + करना)

सनकारना, सनकारनो
किसी काम-के लिए इशारा करना।
क्रि.स.
(हिं. सैन + करना)

सनकियाना
पागल या झक्की हो जाना, पगलाना।
क्रि.अ.
(हिं. सनकाना)

सनकियाना
किसी को सनकने में प्रवृत्त करना, किसी को पागल कर देना या बनाना।
क्रि.स.
(हिं. सनकना)

सनकियाना
इशारा या संकेत करना।
क्रि.स.
(हिं. सैन)

सनकर्षन
श्रीकृष्ण के भाई बलराम का एक नाम।
संज्ञा
(सं. संकर्षण)
उ.- जिननी मधि सनमुख संकर्षन खैंचत कान्ह खस्यौ सिर-चीर-१०-१६१।

सनत, सनत्
ब्रह्मा।
संज्ञा
(सं. सनत्)

सनतकुमार, सनत्कुमार
ब्रह्मा के चार मानसपुत्रों में एक।
संज्ञा
(सं. सनत्कुमार)
उ.- ब्रह्मा ब्रह्मरूप चित धारि। मन सौं प्रगट किए सुत चारि। सनक सनंदन सनतकुमार। बहुरि सनातन नाम ये चार-३-६।

सन
मौन।
वि.
(हिं. सन्न)
मुहा.- जी सन होना-घबरा जाना।

सनई
सन' की जाति का एक पौधा।
संज्ञा
(हिं. सन)

सनक
पागलों की सी धुन, झक या प्रवृत्ति।
संज्ञा
(सं. शंक=खटका)
मुहा.- सनक चढ़ना (सवार होना) -पागल-जैसी धुन या झक होना या चढ़ना।

सनक
ब्रह्मा के चार मानसपुत्रों में एक।
संज्ञा
(सं.)
उ.- ब्रह्मा ब्रह्मरूप चित धारि। मन सौं प्रगट किए सुत चारि। सनक सनंदन सनतकुमार। बहुरि सनातन नाम ये चार-३-६।

सनकना, सनकनो
पागल होना।
क्रि.अ.
(हिं. सनक)

सनकना, सनकनो
पागलों की सनक-जैसा आचरण करना।
क्रि.अ.
(हिं. सनक)

सनकना, सनकनो
शंकित होना, आभास या संकेत पाकर चौकन्ना होना।
क्रि.अ.
(सं. शंक)

सनकना, सनकनो
वेग से किसी ओर जाना या फेंका जाना।
क्रि.अ.
(अनु. सनसन)

सनकाना, सनकानो
किसी को सनकने को प्रवृत्त करना।
क्रि.स.
(हिं. सनकना)

सनकाना, सनकानो
किसी को आभास या संकेत करके सचेत या चौकन्ना करना।
क्रि.स.
(हिं. सनकना)

शिष्टाचार
विनय, नम्रता।
संज्ञा
(सं.)

शिष्टाचार
दिखावटी सभ्य व्यवहार।
संज्ञा
(सं.)

शिष्टाचार
आवभगत, स्वागत-सत्कार।
संज्ञा
(सं.)

शिष्य
विद्यार्थी, अंतेवासी।
संज्ञा
(सं.)
उ.- तीर चलावत शिष्य सिखावत धर निशान देखरावत।

शिष्य
चेला, शागिर्द।
संज्ञा
(सं.)

शिष्य
दीक्षा या मंत्र लेनेवाला।
संज्ञा
(सं.)

शिष्यता
शिष्य होने का भाव या धर्म।
संज्ञा
(सं.)

शिष्या
विद्यार्थिनी।
संज्ञा
(सं.)

शिष्या
चेली।
संज्ञा
(सं.)

शीकर
ओस, तुषार।
संज्ञा
(सं.)

सनतसुजात, सनत्सुजात
ब्रह्मा के सात मानसपुत्रों में एक।
संज्ञा
(सं. सनत्सुजात)

सनद
प्रमाण।
संज्ञा
(अ.)

सनद
प्रमाणपत्र।
संज्ञा
(अ.)

सनना, सननो
लेई जैसा गीला होकर मिलना।
क्रि.अ.
(हिं. सानना)

सनना, सननो
लेई जैसा गीली वरतु लगना, उससे मिलना या ओतप्रोत होना।
क्रि.अ.
(हिं. सानना)

सनना, सननो
लीन या लिप्त होना।
क्रि.अ.
(हिं. सानना)

सनबंध
रिश्ता।
संज्ञा
(सं. संबंध)

सनबंध
लगाव।
संज्ञा
(सं. संबंध)

सनम
प्रियतम।
संज्ञा
(अ.)

सनमान
आदर-सत्कार।
संज्ञा
(सं. सम्मान)
उ.- पुनि सनमान रिषिन सब कीन्हौ-१-३४१।

सनमानना, सनमाननो
आदर-सत्कार करना।
क्रि.स.
(सं. सम्मान)

सनमुख
आगे, सामने, समक्ष।
अव्य.
(सं. सम्मुख)
(क) धरि न सकत पग पछमनौ सर सनमुख उर लाग-१-३२५। (ख) सनमुख होइ सूर के स्वामी भक्तनि कृपा-निधान-९-१३४।

सनसनाना, सनसनानो
सनसन' शब्द करते हुए बहना या चलना।
क्रि.अ.
(अनु. सनसन)

सनसनाहट
सनसन करते हुए चलन या बहने का शब्द, उसकी क्रिया या भाव।
संज्ञा
(अनु. सनसन)

सनसनाहट
सनसनी।
संज्ञा
(अनु. सनसन)

सनसनी
शरीर के संवेदन सूत्रों का एक प्रकार का स्पंदन जिसमें कोई अंगकुछ देर को जड़-सा होकर 'सनसन' करता जान पड़ता है, झनझनाहट झुनझुनी।
संज्ञा
(अनु. सनसन)

सनसनी
अत्यंत भय या आश्चर्यपूर्ण स्तब्धता, उत्तेजना या क्षोभ।
संज्ञा
(अनु. सनसन)

सनसनी
सन्नाटा, नीरवता।
संज्ञा
(अनु. सनसन)

सना
करणकारकीय चिह्न, से, साथ।
प्रत्य.
(सं. संग)

सनाढ्य
ब्रह्मणों का एक वर्ग।
संज्ञा
(सं. सन=दक्षिणा + आढथ)

सनातन
अत्यंत प्राचीन काल।
संज्ञा
(सं.)

सनातन
बहुत प्राचीन समय से चला आता हुआ व्यवहार, क्रम या परंपरा।
संज्ञा
(सं.)

सनातन
ब्रह्मा के चर मानसपूत्रों में एक।
संज्ञा
(सं.)
उ.- ब्रह्मा ब्रह्म रूप उर धारि। मन सौं प्रगट किए सुत चारि। सनक सनंदन सनत कुमार। बहुरि सनातन नाम ये चार-३-६

सनातन
अत्यंत प्राचीन, अनादि काल का।
वि.

सनातन
बहुत समय से चला आनेवाला, परंपरागत।
वि.

सनातन
सदा रहनेवाला, नित्य, शाश्वत।
वि.
उ.- (क) आदि सनातन हरि अविनासी। सदा निरंतर घट-घट वासी-१०-३। (ख) सूरदास प्रभु ब्रह्मा सनातन सुत हित करि दोउ लीन्हौ री-१०-९८।

सनातन धर्म
प्राचीन धर्म।
संज्ञा
(सं.)

सनातन धर्म
परंपरागत धर्म।
संज्ञा
(सं.)

सनातन धर्म
वर्तमान हिंदू धर्म जो परंपरागत है और जिसमें पुराण, बहुदेवोपासना, मूर्तिपूजन, तीर्थ-व्रत आदि माननीय है।
संज्ञा
(सं.)

सनातन पुरुष
विष्णु भगवान।
संज्ञा
(सं.)

सनातनी
प्राचीन या परंपरागत धर्म में विश्वास रखनेवाला।
संज्ञा
(सं. सनातन)

सनातनी
वर्तमान हिंदू धर्म का अनुयायी।
संज्ञा
(सं. सनातन)

सनातनी
अत्यंत प्राचीन।
वि.

सनातनी
परम्परागत।
वि.

सनाथ
जिसका कोई रक्षक या स्वामी हो।
वि.
(सं.)
उ.- सूरदास प्रभु कंस-निकंदन देवकि करनि सनाथ-२५३४।

सनाथ
अभीष्ट-प्राप्ति से जिसका अस्तित्व सार्थक या सफल हो गया हो।
वि.
(सं.)
उ.- भए सखि नैन सनाथ हमारे-२५६९।

सनाथा
जिसका कोई रक्षक या स्वामी हो।
वि.
(सं. सनाथ)
उ.- निदरि मारयौ असुर पूतना आदि ते धरनि पावन करी भई सनाथा-२६१८।

सनान
नहाना, स्नान।
संज्ञा
(सं. सनान)
उ.- तीरथ कोटि सनान करैं फल जैसो दरसन पावत-२-१७।

सनाल
नाल-सहित।
संज्ञा
(हिं. स + नाल)
उ.- मनु जुग जलज सुमेर सृंग तें जाइ मिले सम ससिहिं सनाल-३४५३।

सनाह
बख्तर, कवच।
संज्ञा
(सं. सन्नाह)
उ.- (क) बहुत सनाह समर सर बेधे-१-२७८। (ख) मारै मार करत भट दादुर पहिरे बहु बरन सनाह-२८२६।

सनि
सौर जगत का सातवाँ ग्रह जो फलित ज्योतिष में अशुभ और कष्टदायक माना जाता है; परन्तु कुछ ग्रहों से मिलकर अत्यंत सुख और लाभदायक भी हो जाता है।
संज्ञा
(सं. शनि)
उ.- (क) छठएँ सुक्र तुला के सनि जुत सत्रु रहन नहिं पैहैं-१०-८६। (ख) मानौं गुरु सनि कुज आगैं करि ससिहिं मिलन तम के गन आए-१०-१०४।

सनि
से' विभक्ति का एक प्राचीन विकृति रूप।
अव्य.
(हिं. सन)

सनित
सना या मीला हुआ, मिश्रित।
वि.
(हिं. सनना)

सनीचर
सौर जगत का सातवाँ ग्रह जो फलित ज्योतिष में प्रायः कष्टदायक, परतु विशेष स्थिति में सुखदायक भी माना जाता है।
संज्ञा
(सं. शनैश्चर)
उ.- कर्म-भवन के ईस सनीचर स्याम बरन तन ह्वैहैं-१०-८६।

सनीचरी
शनि की दशा जिसमें दुख, व्याधि आदि की अधिकता रहती है।
संज्ञा
(हिं. सनीचर)
मुहा.-मीन की सनीचरी मीन राशि पर शनि की स्थिति की वह दशा जिसके फलस्वरूप राजा, प्रजा, सबका सर्वनाश होना माना जाता है।

सनेस, सनेसा
संदेश।
संज्ञा
(सं. संदेश)

सनेह
वात्सल्य, स्नेह।
संज्ञा
(सं. स्नेह)
उ.- ता दिन सूर सहर सब चक्रित सबर सनेह तज़्यौ पितुमात-९-३८।

सनेह
प्रेम, प्रणय।
संज्ञा
(सं. स्नेह)
उ.- (क) सुनि सनेह कुरंग कौ स्रवननि राच्यौ राग-१-३२५।

सनेह
श्रद्धा, भक्ति।
संज्ञा
(सं. स्नेह)
उ.- करि हरि सौं सनेह मन साँचौ-१-८३।

सनेह
प्रेम या आत्मीयता के संबंध।
संज्ञा
(सं. स्नेह)
उ.- (क) बिछुरत हंस बिरह के सूलनि, झूठे सबै सनेह-८०१। (ख) बिछुरति सहति बिरह के सूलनि, झूठे सबै सनेह-८९७।

सनेहिया
मित्र।
संज्ञा
(सं. स्नेही)

सनेहिया
प्रियतम।
संज्ञा
(सं. स्नेही)

सनेही
स्नेह या प्रेम करनेवाला।
वि.
(सं. स्नेह)
उ.- सूधी प्रीति न जसुदा जानै स्याम सनेही ग्वैयाँ-३७१।

सनेही
मित्र।
संज्ञा

सनेही
प्रियतम।
संज्ञा

सनेहौ
प्रेम और आत्मीयता का संबंध भी।
संज्ञा
(सं. स्नेह)
उ.- सबनि सनेहौ छाँड़िदयौ-१-२९८।

सनै सनै
धीरे-धीरे।
अव्य.
(सं. शनैः शनैः)
उ.- मेरी भक्ति चतुर्विधि करै। सनै सनै त सब निस्तरै।¨¨¨¨सनै सनै बिधिलोकहिं जाइ-३-१३।

सनौ
मिला हुआ, युक्त।
अव्य.
(सं. संग)

सन्
वर्ष।
संज्ञा
(अ.)

सन्
संवत।
संज्ञा
(अ.)

सन्न
संज्ञा-शून्य, जड़, निष्चेष्ट।
वि.
(हिं. सुन्न या अनु.)

सन्न
भौचक्क, स्तब्ध।
वि.
(हिं. सुन्न या अनु.)

सन्न
भय से मौन।
वि.
(हिं. सुन्न या अनु.)
मुहा.- सन्न मारना एकबारगी चुप हो जाना।

सन्नद
बँधा, कसा या जकड़ा हुआ।
वि.
(सं.)

सन्नद
कवच आदि धारण करके तैयार।
वि.
(सं.)

सन्नद
उद्यत, प्रस्तुत।
वि.
(सं.)

सन्नद
काम में जुटा हुआ।
वि.
(सं.)

सन्नाटा
किसी प्रकार का शब्द न होने की अवस्था, नीरवता।
संज्ञा
[हिं. सुन्न+आटा (प्रत्य.)]

सन्नाटा
निर्जनता।
संज्ञा
[हिं. सुन्न+आटा (प्रत्य.)]

सन्नाटा
अत्यंत भय या आश्चर्य से निश्चेष्टता या स्तब्धता।
संज्ञा
[हिं. सुन्न+आटा (प्रत्य.)]
मुहा.-सन्नटा छाना (संन्नाटे में आना)-(सबका) स्तब्ध रह जाना।

सन्नाटा
खामोशी, चुप्पी, मौन।
संज्ञा
[हिं. सुन्न+आटा (प्रत्य.)]
मुहा.- सन्नाटा खींचना (मारना)-उपस्थित जनों का बिलकुल चुप हो जाना। सन्नाटा छाना-(सबका) शांत या मौन हो जाना।

सन्नाटा
किसी तरह की चहल-पहल न होना, उदासी।
संज्ञा
[हिं. सुन्न+आटा (प्रत्य.)]
मुहा-सन्नाटा बीतना-उदासी में समय कटना।

सन्नाटा
जहाँ किसी प्रकार का शब्द न हो, नीरव।
वि.

सन्नाटा
जहाँ कोई न हो, निर्जन।
वि.

सन्नाटा
जोर से हवा के चलने का शब्द।
संज्ञा
(अनु. सनसन)

सन्नाटा
तेज चलती हवा को चीर कर गति से बढ़ने का शब्द।
संज्ञा
(अनु. सनसन)
मुहा.-सन्नाटे के साथ या से-बड़ी तेजी से।

सन्नाह
बख्तर, कवच।
संज्ञा
(सं.)
उ.- पीत पट डारि कंचुकी मोचित करनि कवच सन्नाह ए छुटत तन ते-१७००।

सन्निकट
पास, समीप, निकट।
अव्य.
(सं.)

सन्निकर्ष
संबंध।
संज्ञा
(सं.)

सन्निकर्ष
निकटता।
संज्ञा
(सं.)

सन्निधान
समीपता, निकटता।
संज्ञा
(सं.)

सन्निधान
वह स्थान जहाँ धन एकत्र किया जाय।
संज्ञा
(सं.)

सन्निधान
स्थापित करने या रखने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(सं.)

सन्निधि
समीपता, निकटता।
संज्ञा
(सं.)

सन्निपात
एक प्रसिद्ध रोग।
संज्ञा
(सं.)

सन्निविष्ट
किसी के अन्तर्गत आया, मिलाया या समाया हुआ।
वि.
(सं.)

सन्निविष्ट
स्थापित, प्रतिष्ठित।
वि.
(सं.)

सन्निवेश
साथ बैठने या स्थित होने का भाव।
संज्ञा
(सं.)

सन्निवेश
जमाकर या सजाकर रखने का भाव।
संज्ञा
(सं.)

सन्निवेश
अटना या समाना।
संज्ञा
(सं.)

सन्निवेश
इकट्ठा या एकत्र होना।
संज्ञा
(सं.)

सन्निवेश
समाज, समूह।
संज्ञा
(सं.)

सन्निवेश
स्थापना।
संज्ञा
(सं.)

सन्निवेश
बनावट।
संज्ञा
(सं.)

सन्निवेशन
मिलाना, सम्मिलित करना।
संज्ञा
(सं.)

सन्निवेशन
जमाकर या सजाकर रखना।
संज्ञा
(सं.)

सन्निवेशन
स्थापित या प्रतिष्ठित करना।
संज्ञा
(सं.)

सन्निवेशन
व्यवस्था।
संज्ञा
(सं.)

सन्निहित
निकट या समीप की।
वि.
(सं.)

सन्निहित
रखा या धरा हुआ।
वि.
(सं.)

शीकर
जलकण।
संज्ञा
(सं.)

शीकर
वर्षा की छोटी-छोटी बूँदें, फुहार।
संज्ञा
(सं.)

शीघ्र
चटपट, तुरंत।
क्रि.वि.
(सं.)

शीघ्रगामी
तेज चलनेवाला।
वि.
(सं. शीघ्रगामिन्)

शीघ्रता
तेजी, फुरती।
संज्ञा
(सं.)

शीत
ठंढा
वि.
(सं.)

शीत
शिथिल।
वि.
(सं.)

शीत
जाड़ा।
संज्ञा

शीत
तुषार, पाला।
संज्ञा

शीतकर
चंद्रमा।
संज्ञा
(सं.)

सन्निहित
टिकाया हुआ।
वि.
(सं.)

सन्मान
आदर सत्कार।
संज्ञा
(सं. सम्मान)
उ.- करि सन्मान कहयौ या भाइ-१-२८४।

सन्मानना, सन्माननो
आदर सत्कार करना।
क्रि.स.
(हिं. सनमानना)

सन्माने
आदर सत्कार किया।
क्रि.स.
(हिं. सनमानना)
उ.- आये जान नृपति सन्माने कीन्हीं अति मनुहार- सारा. २३१।

सन्मुख
सामने, समक्ष।
अव्य.
(सं. सम्मुख)
(क) सहि सन्मुख तउ सीत-उष्न कौं सोई सुफल करै-१११७। (ख) स्याम त्रिया सन्मुख नहिं जोवत-१९९६।

सन्यास
छोड़ना त्याग।
संज्ञा
(सं. संन्यास)

सन्यास
वैराग्य, विरक्ति।
संज्ञा
(सं. संन्यास)

सन्यास
चौथा आश्रम।
संज्ञा
(सं. संन्यास)

सन्यासी
त्यागी।
वि.
(सं. संन्यासी)

सन्यासी
विरक्त।
वि.
(सं. संन्यासी)

सन्यासी
जो चतुर्थ आश्रमी हो।
वि.
(सं. संन्यासी)

सपंक, सपंका
कीचड़ से भरा हुआ।
वि.
(सं. स + पंक)

सपंक, सपंका
जिसे पार करना कठिन हो, बीहड़।
वि.
(सं. स + पंक)

सपक्ष
जो अपने पक्ष में हो।
वि.
(सं.)

सपक्ष
पोषक, समर्थक।
वि.
(सं.)

सपक्ष
मित्र, सहायक।
संज्ञा

सपक्ष
जिसके पंख हों।
वि.
(सं. स + पक्ष=पंख)

सपक्षी
जो अपने पक्ष का हो।
वि.
(सं. सपक्ष)

सपक्षी
पोषक, समर्थक।
वि.
(सं. सपक्ष)

सपच
चांडाल।
संज्ञा
(सं. श्वपच)

सपचना, सपचनो
पूरा होना।
क्रि.अ.
(हिं. सपुचना)

सपचना, सपचनो
बढ़ना।
क्रि.अ.
(हिं. सपुचना)

सपचना, सपचनो
(आग) सुलगना।
क्रि.अ.
(हिं. सपुचना)

सपत्न
बैरी, विरोधी, शत्रु।
वि.
(सं.)

सपत्नी
एक पति की दूसरी पत्नी, सौत।
संज्ञा
(सं.)

सपत्नीक
पत्नी के साथ।
वि.
(सं.)

सपथ
कसम, सौगंध।
संज्ञा
(सं. शपथ)
उ.- (क) इती न करौं, सपथ तौ हरि की, छत्रिय गतिहिं न पाऊँ-१-२७०। (ख) सूर सपथ मोहिं इनहिं दिननि मैं लैं जु आइहौं कृपानिधानहिं-९-९५। (ग) संभु कीं सपथ, सुनि कुकपि कायर कृपन स्वास आकास बनचर उड़ाऊँ-९-१२८।

सपदि
जल्दी-जल्दी, तुरंत, शीघ्र (चलकर)।
क्रि.वि.
(हिं. स + पद=पैर)

सपनंतर
स्वप्न में देख हुई, स्वप्न-काल की।
वि.
(सं. स्वप्न + अंतर)
उ.- जो मैं कहत रह्यौ भयौ सोई सपनंतर की प्रगट बताई-९३२।

सपन, सपना
निद्रावस्था में मानसिक दृष्टि से दिखायी देनेवाला दृश्य।
संज्ञा
(सं. स्वप्न)
उ.- (क) जग-प्रभुत्व प्रभु देख्यौ जोइ। सपन-तुल्य छनभंगुर होइ-७-२। (ख) दरसन कियौ आइ हरि जी को कहत सपन की साँची-१०उ.-११२।
मुहा.- सपना हो जाना (होना) - इतना दुर्लभ हो जाना कि देखने को भी न मिले। सपना देखना- सी अलभ्य पदार्थ को पाने की आशा करना (व्यंग्य )।

सपनाना
स्वप्न दिखलाना।
क्रि.स.
(हिं. सपना + आना)

सपनाना
स्वप्न देखना।
क्रि.अ.

सपनी
सपना देखने की स्थिति या अवस्था।
संज्ञा
(हिं. सपना)

सपनैं
सपने में।
संज्ञा
(हिं. सपना)
उ.- (क) ज्यौं कोउ दुख-सुख सपनैं जोइ। सत्य मानि लै ताकौं सोइ-३-१३। (ख) सूर स्याम सपनैं नहिं दरसत, मुनिजन ध्यान लगावत-४६८।

सपनौ
सपना, स्वप्न।
संज्ञा
(हिं. सपना)
उ.- जीवन-जन्म अल्प सपनौ सौं समुझि देखि मन माहीं-१-३१९।

सपरना, सपरनो
काम का पूरा होना या निबटना।
क्रि.अ.
(सं. संपादन, प्रा. संपाडन)

सपरना, सपरनो
काम का हो सकना।
क्रि.अ.
(सं. संपादन, प्रा. संपाडन)
मुहा.- सपर जाना - मर जाना।

सपरना, सपरनो
तैयार होना, तैयारी करना।
क्रि.अ.
(सं. संपादन, प्रा. संपाडन)

सपराना, सपरानो
काम पूरा करना या निबटाना।
क्रि.स.
(हिं. सपरना)

सपराना, सपरानो
काम को पा कर पाना या कर सकना।
क्रि.स.
(हिं. सपरना)

सपरिकर
अनुचरों और ठाट-बाट के साथ।
क्रि.वि.
(सं.)

सपरिच्छद
तैयारी या ठाट-बाट-सहित।
क्रि.वि.
(सं.)

सपर्या
पूजा-उपासना, आराधना।
संज्ञा
(सं.)

सपाट
बराबर, समतल।
वि.
(सं. स + पट्ट)
मुहा.- पारि सपाट - तोड़-फोड़कर बराबर करके। उ.- बड़ौ माट घर धरयौ जुगनि कौ, टूक-टूक कियौ सबनि परकि। पारि सपाट चले, तब पाए-१०-३१८।

सपाट
जिसकी सतह पर उभार या खुरदुरापन न हो, चिकना।
वि.
(सं. स + पट्ट)

सपाट
जो क्षितिज की ओर दूर तक सीधा चला गया हो।
वि.
(सं. स + पट्ट)

सपाटा
चलने, दौड़ने या उड़ने का वेग, झोंका।
संज्ञा
(सं. सर्पण=सरकना)

सपाटा
झपट, झपट्टा।
संज्ञा
(सं. सर्पण=सरकना)

सपाटा
सैर-सपाटा- मन-बहलाव के लिए किसी रमणीक स्थान में घूमना-फिरना।
यौ.

सपाद
चरण-सहित।
वि.
(सं.)

सपाद
जिसमें एक पूरे अंश के साथ चौथाई और मिला हो, सवाया।
वि.
(सं.)

सपाद
सपाद लक्ष - सवा लाख।
यौ.

सपिंड
जो एक ही कुल के हों और एक ही पितरों को पिंडदान करते हों।
वि.
(सं.)

सपिंडी
मृतकों के श्राद्ध की एक क्रिया जिसके द्वारा वह अन्य पितरों मे मिलाया या सम्मिलित किया जाता है।
संज्ञा
(सं.)

सपुचना
पूरा होना, पूर्णता तक पहुँचना।
क्रि.अ.
(सं. संपूर्ण)

सपुचना
बढ़ना।
क्रि.अ.
(सं. संपूर्ण)

सपुचना
आग सुलगना।
क्रि.अ.
(सं. संपूर्ण)

सपुलक
पुलक या हर्ष के साथ।
वि.
(सं.)

सपूत
योग्य और कर्तव्यनिष्ठ (पुत्र)।
वि.
(सं. सुपुत्र, प्रा. सपुत्त, सउत्त)
उ.- (क) लरिका छरकि मही सौं देखै, उपज्यौ पूत सपूत महरि कैं-१०-३१८। (ख) पूत सपूत भयौ कुल मेरैं अब मै जानी बात-१०-३२९।

सपूत
गुणवान और आज्ञाकारी पुत्र।
संज्ञा

सपूती
सपूत होने का भाव।
संज्ञा
(हिं. सपूत)

सपूती
योग्य और कर्तव्यनिष्ठ पुत्र उत्पन्न करनेवाली माता।
संज्ञा
(हिं. सपूत)
उ.-लछिमन जनि हौं भई सपूती राम-काज जौ आवै-९-१५२।

सपूतौ
योग्य और कर्तव्यनिष्ठ (पुत्र)।
वि.
(हिं. सपूत)
उ.-कहा बहुत जो भए सपूतौ एकै बंसा-४३१।

सपूतौ
योग्य और गणवान पुत्र।
संज्ञा

सपेट
झपट।
संज्ञा
(हिं. सपाटा)

सपेत, सपेद
श्वेत, उज्ज्वल।
वि.
(फ़ा. सफ़ैद, हिं. सफ़ेद)

सपेती, सपेदी
श्वेतता उज्ज्वलता।
संज्ञा
(हिं. सफ़ेदी )

सपेती, सपेदी
चूने की पुताई।
संज्ञा
(हिं. सफ़ेदी )

सपेती, सपेदी
उषःकाल का उज्ज्वल प्रकाश।
संज्ञा
(हिं. सफ़ेदी )

सप्त
सात (गिनती)।
वि.
(सं.)
उ.-(क) हरिजू की आरती बनी।¨¨¨¨ मही सराव, सप्त सागर घृत बाती सैल घनी-२-२८। (ख) जो कुल माहिं भक्त मम होइ। सप्त पुरुष लौं उधरै सोइ-७-२।

सप्तऋृषि
सात ऋृषियों का समूह या मंडल।
संज्ञा
(सं. सप्तर्षि)
उ.-ध्रुव समान आए री जु सप्तऋृषि बहुरि तौ हेर ह्वैहै-२२४६।

सप्तक
सात वस्तुओं का समूह।
संज्ञा
(सं.)

सप्तक
संगीत में सात स्वरों का समूह।
संज्ञा
(सं.)
(क) प्रथमनाद बल घेरि निकट लै मुरली सप्तक सुर बंधान सौं-१५३९। (ख) कबहुँक नृत्य करत कौतूहल सप्तक भेद दिखावत-२३५४।

सप्तजिह्व
अग्नि जिसकी सात जिह्वाएँ मानी गयी हैं।
संज्ञा
(सं.)

सप्तद्वीप
पृथ्वी के सात बड़े विभाग जिनके नाम ये हैं-जंबू, कुश, प्लक्ष, शाल्मलि, क्रौंच, शाक और पुष्कर।
संज्ञा
(सं.)

सप्तधातु
शरीर के सात द्रव्य-रक्त, पित्त, मांस वसा, मज्जा, अस्थि और शुक्र।
संज्ञा
(सं.)

सप्तपदी
विवाह की एक रीति जिसमें वर-वधू अग्नि की सात परिक्रमाएँ करके विवाह पक्का करते हैं, भाँवर, भँवरी।
संज्ञा
(सं.)

सप्तपदी
(किसी बात को) अग्नि की साक्षी देकर पक्का करना।
संज्ञा
(सं.)

सप्तपाताल
पृथ्वी के नीच सात लोक - अतल, वितल, सुतल, रसातल, तलातल, महातल और पाताल।
संज्ञा
(सं.)

सप्तपुरी
सात पवित्र नगर या पुरी-अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार (माया), काशी, कांची, अवंतिका (उज्जयिनी) और द्वारका।
संज्ञा
(सं.)

सप्तम
सातवाँ।
वि.
(सं.)
उ.-सप्तम दिन तोहिं तच्छक खाइ-१-२९०।

सप्तमातृका
सात शक्तियाँ जिनका पूजन शुभ कार्यों के पूर्व होता है - ब्रह्मा या ब्राह्माणी, महेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इंद्राणी और चामुंडा।
संज्ञा
(सं.)

सप्तमी
सातवीं।
वि.
(सं.)

सप्तमी
चांद्र मास के किसी पक्ष की सातवीं तिथि या दिन।
संज्ञा

सप्तमी
व्याकरण में अधिकरण कारक की विभक्ति।
संज्ञा

सप्तर्षि
सात ऋृषियों का समूह या मंडल जिनके नाम कहीं ये बताये गये हैं- गौतम, भरद्वाज, विश्वामित्र, यमदग्नि, वसिष्ठ, कस्यप और अत्रि; तथा कहीं ये-मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलह, क्रेतु, पुलस्त्य और वसिष्ठ।
संज्ञा
(सं.)

सप्तर्षि
सात तारों का समूह जो ध्रुवतारे के चारो ओर घूमता जान पड़ता है।
संज्ञा
(सं.)

सप्तशंती
सात सौ का समूह।
संज्ञा
(सं.)

सप्तशंती
सात सौ पद्यों या छंदों का समूह।
संज्ञा
(सं.)

सप्तस्वर
संगीत के सात स्वर-स, ऋृ, ग, म, प, ध और नि।
संज्ञा
(सं.)

सप्ताह
सात दिनों का समूह।
संज्ञा
(सं.)

सप्ताह
सोमवार से रविवार तक के सात दिन।
संज्ञा
(सं.)

सप्ताह
ʽश्रीमद्-भागवतʼ जैसे किसी धर्मग्रंथ का पाठ जो सात दिन में पढ़ या सुन लिया जाय।
संज्ञा
(सं.)

सप्रमाण
प्रमाण या साक्षी के साथ।
वि.
(सं.)

सप्रमाण
ठीक, प्रामाणिक।
वि.
(सं.)

सफ
पंक्ति।
संज्ञा
(फ़ा. सफ़.)

सफ
विछावन।
संज्ञा
(फ़ा. सफ़.)

सफ
तलवार।
संज्ञा
(फ़ा. सैफ़.)

सफर
यात्रा।
संज्ञा
(अ. सफ़र)

सफरी
सफर में काम आनेवाला।
वि.
(हिं. सफर)

शीरा
चाशनी।
संज्ञा
(फ़ा.)

शीर्ण
टूटा-फूटा।
वि.
(सं.)

शीर्ण
गिरा हुआ।
वि.
(सं.)

शीर्ण
फटा-पुराना।
वि.
(सं.)

शीर्ण
मुरझाया हुआ।
वि.
(सं.)

शीर्ण
दुबला-पतला।
वि.
(सं.)

शीर्ष
सिर।
संज्ञा
(सं.)

शीर्ष
माथा।
संज्ञा
(सं.)

शीर्ष
सिरा।
संज्ञा
(सं.)

शीर्षक
सिर।
संज्ञा
(सं.)

सफरी
रास्ते का सामान या खर्च।
संज्ञा
(सं.)

सफरी
अमरूद।
संज्ञा
(सं.)

सफरी
श्रीफल मधुर चिरौंजी आनी। सफरी चिउरा अरुन खुबानी -१०-२११।
संज्ञा
(सं.)

सफरी
एक तरह की मछली।
संज्ञा
(सं. शफरी)

सफल
जो फल से युक्त हो।
वि.
(सं.)

सफल
जिसका कुछ फल या परिणाम निकले, जिसका करना या होना व्यर्थ न जाय, सार्थक।
वि.
(सं.)
उ.-ता छिन हृदय-कमल प्रफुलित ह्वै जनम सफल करि लेखौं-९-३५।

सफल
पूरा होना।
वि.
(सं.)

सफल
जो कृतकार्य हुआ हो।
वि.
(सं.)

सफलता
सफल होने का भाव, कार्य-सिद्धि।
संज्ञा
(सं.)

सफलता
पूर्णता।
संज्ञा
(सं.)

सफलित
सार्थक।
वि.
(हिं. सफल)

सफलित
कृतकार्य।
वि.
(हिं. सफल)

सफलीभूत
जो सफल हुआ हो।
वि.
(सं.)

सफा
स्वच्छ।
वि.
(हिं. साफ)

सफा
पवित्र।
वि.
(हिं. साफ)

सफा
जो खुरदुरा न हो, चिकना।
वि.
(हिं. साफ)

सफा
पुस्तक आदि का पृष्ठ।
संज्ञा
(अ. सफ़हः)

सफाई
स्वच्छता, निर्मलता।
संज्ञा
(हिं. सफा)

सफाई
कूड़ा-करकट हटाने की क्रिया।
संज्ञा
(हिं. सफा)

सफाई
अर्थ या अभिप्राय प्रकट होने का गुण।
संज्ञा
(हिं. सफा)

सफाई
मन में मैल या दुर्भाव न रहना।
संज्ञा
(हिं. सफा)

सफाई
छल, कपट या दुराव का न होना।
संज्ञा
(हिं. सफा)

सफाई
दोष या आरोप का हटना, निर्दोषिता।
संज्ञा
(हिं. सफा)
मुहा.- सफाई देना- (किसी को) निर्दोष प्रमाणित करना। सफाई होना- (किसी का) निर्दोष सिद्ध होना।

सफाई
लेन देन का हिसाब साफ होना।
संज्ञा
(हिं. सफा)

सफाई
झगड़े का निबटारा।
संज्ञा
(हिं. सफा)

सफाचट
स्वच्छ।
वि.
(हिं. साफ)

सफाचट
चिकना।
वि.
(हिं. साफ)

सफेद
उजला, श्वेत।
वि.
(फ़ा. सुफ़ैद)
मुहा.- रंग सफेद पड़ जाना (होना) -भय आदि से चेहरे का रंग फीका पड़ जाना या मुख का कांति हीन हो जाना। स्याह-सफेद-भला-बुरा।

सफेदपोश
साफ कपड़े पहननेवाला।
संज्ञा
(फ़ा. सुफ़ैद +पोश)

सफेदपोश
शिक्षित और कुलीन।
संज्ञा
(फ़ा. सुफ़ैद +पोश)

सफेदा
जस्ते का चूर्ण या भस्म।
संज्ञा
(फ़ा. सुफ़ैदा)

सफेदा
एक तरह का बढ़िया आम।
संज्ञा
(फ़ा. सुफ़ैदा)

सफेदा
एक तरह का बढ़िया खरबूजा।
संज्ञा
(फ़ा. सुफ़ैदा)

सफेदा
एक बड़ा वृक्ष।
संज्ञा
(फ़ा. सुफ़ैदा)

सफेदी
उजलापन।
संज्ञा
(हिं. सफेद)
मुहा.-सफेदी आना-बाल सफेद होना, बुढापा आना। सफेदी छाना-बहुत भय के कारण मुख का कांतिहीन हो जाना।

सफेदी
दीवार आदि पर चूने की पुताई।
संज्ञा
(हिं. सफेद)

सफेदी
उषःकाल का प्रकाश।
संज्ञा
(हिं. सफेद)

सबंधु
भाई-बन्धुओं के साथ।
क्रि.वि.
(हिं. स + बंधु)
उ.-कहौ तौ सचिव-सबंधु सकल अरि एकहिं क पछारौं-९-१०८।

सब
जितने हों कुल समस्त।
वि.
(सं. सर्व, प्रा. सब्ब)
उ.-हेरी देत चले सब बालक-६११।

सब
पूरा, सारा।
वि.
(सं. सर्व, प्रा. सब्ब)

सबक
पाठ।
संज्ञा
(फ़ा. सबक़)

सबक
उपदेश।
संज्ञा
(फ़ा. सबक़)

सबज
हरे रंग का।
वि.
(हिं. सब्ज)

सबद
आवाज, ध्वनि।
संज्ञा
(सं. शब्द)
उ.-सबद करयो आघात, अघासुर टेरि पुकारयौ-४३१।

सबद
वर्ण या अक्षरों से बनी सार्थक ध्वनि।
संज्ञा
(सं. शब्द)

सबद
साध-महात्मा के वचन।
संज्ञा
(सं. शब्द)

सबद
उपदेशपूर्ण बात।
संज्ञा
(सं. शब्द)

सबदरसी, सबदर्सी
(संसार में) सब कुछ देखनेवाला।
वि.
(सं. सर्वदर्शी)

सबव
कारण।
संज्ञा
(अ.)

सबव
साधन।
संज्ञा
(अ.)

सबर
धैर्य, संतोष।
संज्ञा
(अ.सब्र)
उ.-ता दिन सुर सहर सब चक्रित सबर-स्नेह तज्यौ पितु-मात-९-३८।
मुहा.- किसी का सबर पड़ना- अत्याचार करने वाले को, सब तरह के अत्याचार सबर या सहन-शीलता के साथ सहनेवाले का या इसकी ʽहायʼ का कुफल भोगना पड़ना।

सबरा
सब, समस्त।
वि.
(हिं. सब)

सबरा
सारा, पूरा।
वि.
(हिं. सब)

सबरी
सब, कुल, समस्त।
वि.
(हिं. सबरा)

सबरी
सारी, पूरी।
वि.
(हिं. सबरा)

सबरी
शबर नामक अनार्य जाति की एक स्त्री भक्त जिसके जूठे बेर श्रीराम ने सराह-सराह कर खाये थे।
(सं. सबरी)
उ.-सबरी आस्रम रघुबर आये। अरघासन दै प्रभु बैठाए-९-६७।

सबरै
सँवरे, बने, सुधरे।
क्रि.स.
(हिं. सँवरना)
उ.-बिगरै सबरै हमरे सिर ऊपर बल कौ बीर रखवारौ-९८७।

सबल
बलवान, प्रबल।
वि.
(सं.)
(क) सूर प्रभु की सबल माया, देति मोहिं भुलाइ-१-४५। (ख) माया सबल धाम-धन-बनिता बाँध्थौ हौ इहिं साज-१-१०८।

सबल
जिसके साथ फौज या सेना का बल हो।
वि.
(सं.)
उ.-सुभट अनेक सबल दल साजे, परे सिंधु के पार-९-८३।

सबार, सबारे, सबारैं, सबारौ
शीघ्र, जल्दी।
क्रि.वि.
(हिं. सबेरा)
उ.-(क) घर के कहत सबारे काढ़ौ भूत होइ धरि खैहै-१-८६। (ख) चलौ न बेगि, सबारे जैए ऊजि आपनैं धाम-१०-२००। उ.- अबलौं कहा सोए मनमोहन और बार तुम उठत सबार-४०३।

सबार, सबारे, सबारैं, सबारौ
उपयुक्त या निश्चित समय से पूर्व।
क्रि.वि.
(हिं. सबेरा)
उ.- अबलौं कहा सोए मनमोहन और बार तुम उठत सबार-४०३।

सबार, सबारे, सबारैं, सबारौ
सबेरे, प्रातःकाल।
क्रि.वि.
(हिं. सबेरा)
उ.-जेवन करन चली जब भीतर छींक परी तौ आज सबारे-५९५।

सबार, सबारे, सबारैं, सबारौ
साँझ सबारैं-सबेरे-शाम, हर समय दिन भर।
यौ.
उ.-(क) उरहन कै कै साँझ सबारैं, तुमहिं बँधायौ स्याम-३५५। (ख) अब को निकरै साँझ सबारौ-७६२।

सबारयो, सबारयौ
इतनी सबेरे।
क्रि.वि.
(हिं. सबेरा)
उ.-बोलि उठे बलराम, स्याम कत उठे सबारयौ-४३१।

सबिता
सूर्य, रवि।
संज्ञा
(सं. सविता)
(क) सूर महरि सबिता सौं बिनवति, भली स्याम की जोटी-७०२। (ख) बार-बार सबिता सौं माँगति, हम पावैं पति स्याम सुजान-७८५।

सबी
तसबीर, चित्र।
संज्ञा
(अ. शबीह)

सबील
मार्ग।
संज्ञा
(अ.)

सबील
उपाय।
संज्ञा
(अ.)

सबील
प्रबंध, व्यवस्था।
संज्ञा
(अ.)

सबील
पौशाला।
संज्ञा
(अ.)

सबूत
प्रमाण।
संज्ञा
(अ.)

सबेर
जल्दी, शीघ्र।
क्रि.वि.
(अनु. बेर या हिं. सबेरा)
उ.-कूदि परयौ चढ़ि कदम तैं खबरि न करौ सबेर-५८९।

सबेर
कुछ समय में।
यौ.
देर-सबेर

सबेर
कभी जल्दी, कभी देर।
यौ.
देर-सबेर

सबेर
कभी-कभी।
यौ.
देर-सबेर

सबेरा
प्रातःकाल।
संज्ञा
(हिं. स. + बेला)

सबेरे
प्रातःकाल को।
क्रि.वि.
(हिं. सबेरा)
उ.-ऊधौ जाहु सबेरे ह्माँ तै बैगि गहर जनि लावहु-३३४०।

सबेरो, सबेरौ
प्रातःकाल।
संज्ञा
(हिं. सबेरा)

सबेरो, सबेरौ
जल्दी, शीघ्र।
क्रि.वि.
उ.-जो कोऊ तेरौ हितकारी सो कहै काढ़ि सबेरौ- १-३१९।

सबेरो, सबेरौ
हर समय
क्रि.वि.

सबेरो, सबेरौ
कुछ समय में।
यौ.
बेर-सबेरौ

सबेरो, सबेरौ
कभी जल्दी, कभी देर।
यौ.
बेर-सबेरौ

सबेरो, सबेरौ
हर समय, कभी-कभी।
यौ.
बेर-सबेरौ
उ.-मुरली जेंत बिषान देखिए श्रृंगी बेर-सबेरौ-२९६५।

सबै
सभी (संख्यावाचक)
वि.
(हिं. सब + ही)
उ.-(क) सुख मैं आइ सबै मिलि बैठत रहत तहूँ दिसि घेरे-१-७९। (ख) ता दिन तेरे तन तरुवर के सबै पात झरि जैहैं-१-८६।

सबै
सारा, समस्त (परिमाणवाचक)।
वि.
(हिं. सब + ही)
उ.-जिती हुती जग मैं अवमाई सो मैं सबै करी- १-१३०।

सब्ज
हरे रंग का, हरा।
वि.
(फ़ा. सब्ज)

सब्ज
कच्चा और ताजा (फूल, फल आदि)।
वि.
(फ़ा. सब्ज)

सब्ज
सुंदर और लहलहाता हुआ।
वि.
(फ़ा. सब्ज)
मुहा.-सब्ज बाग दिखाना- (किसी स्वार्थ से) बड़ी बड़ी आशाएँ दिखाना।

सब्ज
शुभ, उत्तम।
वि.
(फ़ा. सब्ज)

सब्जा
हरियाली।
संज्ञा
(हिं. सब्ज)

सब्जा
भाँग, विजया।
संज्ञा
(हिं. सब्ज)

सब्जा
पन्ना नामक रत्न।
संज्ञा
(हिं. सब्ज)

सब्जी
हरियाली।
संज्ञा
(फ़ा. सब्जी)

सब्जी
हरी तरकारी।
संज्ञा
(फ़ा. सब्जी)

सब्द
ध्वनि, आवाज।
संज्ञा
(सं. शब्द)
उ.- (क) ताकी सरन रहयौ क्यौं भावैं सब्द न सुनिऐ कान-१-१३४। (ख) यहै सब्द सुनियत गोकुल मैं-६२२।

सब्द
वर्णों या अक्षरों से बनी सार्थक ध्वनि।
संज्ञा
(सं. शब्द)

सब्द
संत-महात्माओं के वचन या पद।
संज्ञा
(सं. शब्द)

सब्द
शिक्षा या उपदेश-प्रधान उक्ति।
संज्ञा
(सं. शब्द)

सब्र
धर्य, संतोष।
संज्ञा
(अ.)
मुहा.- (किसी का) सब्र पड़ना - अत्याचारी को, अत्याचार सहन करनेवाले के धैर्य या उसकी ʽआहʼ का कुफल भोगना पड़ना। सब्र कर बैठना (लेना) - हानि, अनिष्ट या अत्याचार को सह लना। सब्र समेटना- ऐसा अन्याय या निर्दयता का कार्य करना कि दूसरे की ʽआहʼ का कुफल भोगना पड़े।

सभा
समिति, गोष्ठी, परिषद्।
संज्ञा
(सं.)

शीर्षक
माथा।
संज्ञा
(सं.)

शीर्षक
सिरा, चोटी।
संज्ञा
(सं.)

शीर्षक
विषय-परिचायक शब्द या उपवाक्य जो लेख या प्रबंध के आरंभ में लिखा जाय।
संज्ञा
(सं.)

शील
आचरण, चरित्र।
संज्ञा
(सं.)

शील
स्वभाव, प्रकृति।
संज्ञा
(सं.)

शील
उत्तम स्वभाव या प्रकृति।
संज्ञा
(सं.)

शील
कोमल हृदय।
संज्ञा
(सं.)

शील
संकोच, ध्यान।
संज्ञा
(सं.)
मुहा.- शील तोड़ना - बेमुरौव्वती दिखाना। आँखों में शील न होना - लज्जा, संकोच का भाव न होना, बेमुरौव्वत होना।

शील
प्रवृत्ति या स्वभाववाला।
वि.

शीलवान, शीलवान्
अच्छे आचरण या चरित्रवाला।
वि.
(सं. शीलवत्)

सभा
समूह, मंडली।
संज्ञा
(सं.)
उ.-डासन काँस कामरी ओढ़न बैठन गोप-सभा ही-२२८५।

सभा
वह संस्था या समूह जो विषय-विशेष पर विचार करने के लिए बनायी गयी हो।
संज्ञा
(सं.)

सभा
राजदरबार, राजसभा।
संज्ञा
(सं.)
उ.-(क) सभा मँझार दुष्ट दुस्सासन द्रौपदि आनि धरी-१-१६। (ख) द्रुपद-सुताहिं दुष्ट दुरजोधन सभा माँहिं पकरावै-१-१२२।

सभाग
सौभाग्य।
संज्ञा
(हिं. स + भाग)

सभाग
जो सौभाग्यशाली हो।
वि.

सभागा
भाग्यशाली।
वि.
(हिं. सभाग)

सभागी
भाग्यशालिनी।।
वि.
(हिं. सभागा)
उ.-चिरजीवौ मेरौ लाड़िलौ, मैं भई सभागी-१०-६८।

सभागी
छोटों को पुकारने का एक शुभ संबोधन।
अव्य.
उ.-कहाँ चली उठि भोरही सोवै न सभागी-१५४१।

सभागृह
वह स्थान जहाँ सभा या समिति की बैठक हो।
संज्ञा
(सं.)

सभागे
भाग्यशाली।
वि.
(हिं. सभाग)
उ.-(क) अहो बसुदेव जाहु लै गोकुल तुम हौ परम सभागे-१०-४। (ख) रसिक रासिका को सुख लूट्यौ स्याम सभागे-२२७५।

सभापति
सभा का प्रधान।
संज्ञा
(सं.)

सभा-चतुर
जो सभा या समाज में सम्मिलित होकर चतुराई से बात कर सके।
वि.
(सं.)

सभा-चतुरी
सभा-समाज में बैठकर रुचिकर बातें करने की चतुरता या योग्यता।
संज्ञा
(सं.)

सभा-मंडप
वह स्थान जहाँ सभा-समाज की बैठक हो।
संज्ञा
(सं.)

सभा-मंडप
देव-मंदिरों में वह स्थान जहाँ बैठकर भक्तजन कीर्तन आदि करते हों।
संज्ञा
(सं.)

सभासद
सदस्य, सभ्य।
संज्ञा
(सं.)
उ.-पोच-पिसुन लस दसन सभासद प्रभु अनंग मंत्री बिन भीति-२२२३।

सभीत
डरा हुआ।
वि.
(हिं. स + भीत)
उ.-अखुटित रहत सभीत ससंकित, सुकृत सब्द नहिं पावैं-१-४८।

सभ्य
सदस्य, सभासद।
संज्ञा
(सं.)

सभ्य
भला और शिष्ट व्यक्ति।
संज्ञा
(सं.)

सभ्य
भला, शिष्ट।
वि.

सभ्यता
सदस्यता।
संज्ञा
(सं.)

सभ्यता
भलमंसी, शिष्टता।
संज्ञा
(सं.)

सभ्यता
वे बातें जो किसी व्यक्ति, जाति या राष्ट्र के सुजन, शिष्ट, शिक्षित और उन्नत होने की सूचक हों।
संज्ञा
(सं.)

समंजन
ठीक करना या बैठाना।
संज्ञा
(सं.)

समंजन
हिसाब ठीक करना।
संज्ञा
(सं.)

समंजस
उचित।
वि.
(सं.)

समंजस
अभ्यस्त।
वि.
(सं.)

समंत
सीमा, छोर
संज्ञा
(सं.)

समंत
सब, कुल, समस्त।
वि.

समंदर
सागर, समुद्र।
संज्ञा
(सं. समुद्र)

समंदर
बड़ा तालाब या झील।
संज्ञा
(सं. समुद्र)

सम
समान, तुल्य।
संज्ञा
(सं.)
उ.-(क) अम्रित ता सम नाहीं-१-२४१। (ख) आपु बिषमत तजि दोउ सम भै बानक ललित त्रिभंग-३३२८।

सम
जिसमें कहीं उतार-चढ़ाव या हेर-फेर न हो।
वि.
(सं.)

सम
जिसका तल ऊबर-खाबड़ न होकर बराबर या चौरस हो।
वि.
(सं.)
उ.-धनुष सों टारि पर्वत किए एक दिसि, पृथ्वी सम करि प्रजा सब बसाई-४-११।

सम
जिस (संख्या) को दो से भाग करने पर शेष कुछ न बचे।
वि.
(सं.)

सम
(किसी के) समान या बराबर।
अव्य.
उ.-(क) जौ पै राम-भक्ति नहिं जानी, कह सुमेर सम दान किए-१-८९। (ख) रंक सुदामा कियौ इंद्र सम-१-९५। (ग) देखियत ह्वै रज्वा सम डारयौ-५७४। (घ)नहिं तिहुँ भुवन कोउ सम तुम्हारे-१० उ.-३१।

सम
संगीत में वह स्थान जहाँ लय के विचार से गति की समाप्ति होती है और गायक या वादक का सर अपने आप हिल जाता है।
संज्ञा

सम
एक अर्थालंकार।
संज्ञा

सम
अंतः करण तथा इंद्रियों का संयम।
संज्ञा
(सं. शम)
उ.-गो कहयौ, हरि बैकुंठ सिधारे, सम-दम उनहीं संग पधारे-१-१२९०।

सम
माफी, क्षमा।
संज्ञा
(सं. शम)

सम
शांति।
संज्ञा
(सं. शम)

सम
जहर, विष।
संज्ञा
(अ.)

सम
शपथ, सौगंध।
संज्ञा
(अ. क़सम)

समकक्ष
समान।
वि.
(सं.)

समकक्ष
बराबरी का।
वि.
(सं.)

समकालीन
जो (दो या कई) एक ही समय में हुए हों।
वि.
(सं.)

समकिति
सम्यकता।
संज्ञा
(सं. सम्यक)

समकियाना, समकियानो
बिखरी चीजें यथाक्रम रखना-या सजाना।
क्रि.स.
(हिं. सम + करना)

समकोण
९० अंश का कोण।
संज्ञा
(सं.)

समक्ष
सामने, सम्मुख।
अव्य.
(सं.)

समग्र
सारा, सब।
वि.
(सं.)

समग्री
सामान, पदार्थ।
संज्ञा
(हिं. सामग्री)
उ.-(क) भोग-समग्री भरे भँडार-९-८। (ख) छाक-सामग्री सबै जोरि कै वाकैं कर दै तुरत पठाई-४५७।

समझ
जानने-समझने की बुद्धि।
संज्ञा
(सं. सम्बुद्ध, प्रा. समुज्झ, समुंझ)

समझदार
बुद्धिमान।
वि.
(हिं. समझ + फ़ा. दार)

समझदारी
समझदार होने का भाव, बुदिधमानी।
संज्ञा
(हिं. समझदार)

समझना, समझनो
पढ़ या सुनकर हृदयंगम करना।
क्रि.स.
(हिं. समझ)

समझना, समझनो
विचार करके ध्यान में लाना।
क्रि.स.
(हिं. समझ)

समझना, समझनो
किसी परिचित या ज्ञात विषय में अधिक अनुमान करना।
क्रि.स.
(हिं. समझ)

समझाना, समझानो
दूसरे को समझने को प्रवृत्त करना।
क्रि.स.
(हिं. समझना)

समझाव, समझावा
समझने या समझाने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(हिं. समझना, समझाना)

समझौता
आपस में ही होनेवाला निबटारा।
संज्ञा
(हिं. समझ)

समतल
जिसकी तह या तल बराबर हो, सपाट, चौरस।
वि.
(सं.)

समता
सम या समान होने का भाव, बराबरी, समानता।
संज्ञा
(सं.)
उ.-कोटि स्वर्ग सम सुखउ न मानत हरि समीप समता नहिं पावत-३२४२।

समताई
बराबरी, समता।
संज्ञा
(सं. समता)
उ.-अचिहिं करी उन अंपतई हरि सों समताइ-पृ. ३२३ (२०)।

समतुल, समतूल
बराबर, समान।
वि.
(सं. हिं. सम + तोल)
उ.-तो समतुल कन्या किन उपजी जो कुल सत्रु न मारथौ-९-१३४।

समतूली
बराबरी।
संज्ञा
(हिं. समतूल)

समतोल
बराबर।
वि.
(सं. सम +हिं. तोल)

समतोलन
महत्व की दृष्टि से समान रखना।
संज्ञा
(सं.)

समतोलन
दोनों पलड़ों या पक्षों को समान रखना।
संज्ञा
(सं.)

समत्थ
समर्थ।
वि.
(सं. समर्थ)

समत्व
बराबरी, तुल्यता।
संज्ञा
(सं.)

समद
सागर।
संज्ञा
(सं. समुद्र)

समदत
सौंपना, समर्पित करना।
क्रि.स.
(हिं. समदना)

समदत
भेंट या उपहार देना।
क्रि.स.
(हिं. समदना)

समदत
समर्पित करते ही, सौंपते ही।
क्रि.वि.
उ.-(क) तनया जा मातनि कौं समदत नैन नीर भरि आए-९-२७। (ख) समदत भई अनाहत बानी कंस कान झनकारा-१०-४।

समदन
उपहार, भैंट।
संज्ञा
(सं. समादान)

समदन
मुसाकात, भेंट।
संज्ञा
(सं. समादान)

समदन
लड़ाई, युद्ध।
संज्ञा
(सं.)

समदना, समदनो
सौंपना, समर्पित करना।
क्रि.स.
(हिं. समदन)

समदना, समदनो
उपहार या भेंट देना।
क्रि.स.
(हिं. समदन)

समदना, समदनो
आनंद या उमंगमें भरक रभेंटना, प्रेमपूर्वक या सप्रेम मिलना।
क्रि.अ.

समदर्शन, समदर्सन
सबको समान समझनेवाला।
वि.
(सं. समदर्शन)

समदरसी, समदर्शी
सबको बराबर या समान समझने या माननेवाला।
वि.
(सं. समदर्शिन्)
उ.-समदरसी है नाम तुम्हारौ-१-२२०।

समदे
मिले, भेंटे।
क्रि.अ.
(हिं. समदना)
उ.-यह कहिकै समदे सकल जन नयन रहे जल छाई-१० उ.-१२३।

समद्दष्टि
समदर्शी की दृष्टि या भावना।
संज्ञा
(सं.)
उ.-जो समदृष्टि आदि निर्गुन पद तौ कत चित्त चोराए-३२०१।

समधिक
बहुत, अधिक।
वि.
(सं.)

समधियाना
समधी का घर।
संज्ञा
(हिं. समधी)

समधी
वर-वधू के पिता।
संज्ञा
(सं. सम्बन्धी)

समधी
मान्य संबंधी।
संज्ञा
(सं. सम्बन्धी)
उ.-ताल पखावज चले बजावत समधी सोभा कौं- १-१५१।

समधिन, समधिनि
समधी की पत्नी।
संज्ञा
(हिं. समधी)
उ.-इहिं भाँति चतुर सुजान समधिनि सकति रति सबसौं करै- १० उ.- २४।

समन
दोष, विकार आदि दबाना।
संज्ञा
(सं. शमन)

समन
शांति।
संज्ञा
(सं. शमन)

समन
यम, यमराज।
संज्ञा
(सं. शमन)

सम-नाम
समानार्थक शब्द।
संज्ञा
(सं.)

समन्वय
विरोध का अभाव।
संज्ञा
(सं.)

समन्वय
मिलन, संयोग।
संज्ञा
(सं.)

समन्वय
कार्य-कारण का निर्वाह।
संज्ञा
(सं.)

समन्वित
जिसका समन्वय हुआ हो।
वि.
(सं.)

समन्वित
मिला हुआ, संयुक्त।
वि.
(सं.)

समन्वित
जो किसी के अन्तर्गत या सम्मिलित हो।
वि.
(सं.)

शीतकाल
हेमंत और शिशिर ऋतु।
संज्ञा
(सं.)

शीतल
ठंढा।
वि.
(सं.)

शीतल
शांत।
वि.
(सं.)

शीतलता
ठंढापन।
संज्ञा
(सं.)

शीतलता
जड़ता।
संज्ञा
(सं.)

शीतलताई
शीतलता। ठंढापन, सर्दी।
संज्ञा
(सं.)

शीतलताई
जड़ता, स्थिरता।
संज्ञा
(सं.)

शीतला
एक देवी।
संज्ञा
(सं.)

शीतला
चेचक।
संज्ञा
(सं.)

शीरा
शर्बत।
संज्ञा
(फ़ा.)

समपाद
छंद जिसके चारो चरण बराबर या समान हों।
संज्ञा
(सं.)

समबुद्धि
जिसकी बुद्धि सुख-दुख, लाभ-हानि आदि की स्थिति में समान रहे।
वि.
(सं.)

समय
वक्त, काल।
संज्ञा
(सं.)
उ.-(क) बहुरि संध्या समय होन आयौ-७-६। (ख) प्रात समय रवि-किरनि कोंवरी-१०-७३।

समय
मौका, अवसर।
संज्ञा
(सं.)
उ.-(क) तीनौ पन ऎसे हीं खोए, समय गये पर जाग्यौ-१-७३। (ख) त्रिय-नगन समय पति राखी-५६९।
मुहा.-समय पाइ - सुअवसर या उचित अवसर देखकर। उ.- समय पाइ ब्रज बात चलाई-३४१८। तनेहोंमाद।

समय
सुख या दुख के दिन।
संज्ञा
(सं.)

समय
अच्छे-बूरे दिन, सुख-दुख के दिन।
यौ.
समय-कुसमय

समय
हर समय।
यौ.
समय-कुसमय

समय
फुरसत, अवकाश।
संज्ञा
(सं.)
उ.-बुधि-बिबेक बिचित्र पौरिया समय न कबहूँ पावैं-१-४०।

समय
अंत, परिणाम।
संज्ञा
(सं.)

समया
संकट का अवसर, बुरे दिन।
संज्ञा
(सं. समय)
उ.-और मित्र ऎसे समया महँ कत पहिचान करैं-१० उ.-७४।

समयौ
अवसर।
संज्ञा
(सं. समय)
उ.-तिन अँकनि कोउ फिरि नहिं बाँचत गत स्वास्थ समयौ-१-२९८।

समर
लड़ाई, युद्ध, संग्राम
संज्ञा
(सं.)
उ.-(क) लगन नहिं देत कहूँ समर-आँच ताती-१-२३। (ख) बहुत सनाह समर सर बेधे-१-२७८।

समर
कामदेव।
संज्ञा
(सं. स्मर)

समरत्थ, समरथ
कोई काम करने की शक्ति या योग्यता रखनेवाला।
वि.
(सं. समर्थ)
उ.-(क) अब यह बिथा दूरि करिबे कौं और न समरथ कोई-१-११८। (ख) सूर स्याम गुरु ऎसौ समरथ, छिन मै लै उधरै-६-६।

समरत्थ, समरथ
शक्ति और साधन-संपन्न।
वि.
(सं. समर्थ)
उ.-(क) सिंह कौ भच्छ सृगाल न पावै, हौं समरथ की नारी-९-७९। (ख) कै यह ठौर लियौ कहुँ आइ रहयौ कोऊ समरथ नर-१० उ.-७०।

समरपना, समरपनो
समर्पण करना, भैंट में देना।
क्रि.स.
(हिं. समर्पना)

समरपे
भेंट में दिये, अर्पित किये।
क्रि.स.
(हिं. समर्पना)
उ.-जिन तन-मन-धन मोहिं प्रान समरपे सील-सुभाव बढ़ाई-९-७।

समर-भूमि
युद्ध-क्षेत्र।
संज्ञा
(सं.)

सम-रस
समान रसवाले।
वि.
(सं. सम + रस)

सम-रस
समान विचारवाले।
वि.
(सं. सम + रस)

सम-रस
सदा एक सा रहनेवाला।
वि.
(सं. सम + रस)

समर-शायी
जो युद्ध में मारा गया हो, जिसे वीरगति मिली हो।
वि.
(सं. समरशायिन्)

समर-शैया
युद्ध-भूमि में घायल होकर गिरने की स्थिति।
संज्ञा
(सं. समर + शय्या)

समर-सेज, समर-सेज्या
युद्ध, क्षेत्र में घायल होकर गिरने की अवस्था।
संज्ञा
(सं. समर + हिं. सेज)
उ.-पौढ़े कहा समर-सेज्या सुत-१-२९।

समरांगण, समरांगन
लड़ाई का मैदान, युद्ध-क्षेत्र।
संज्ञा
(सं. समरांगण-)

समराना, समरानो
सजाना या सजवाना।
क्रि.स.
(हिं. सँवारना)

समराना, समरानो
सँवारना या सँवरवाना।
क्रि.स.
(हिं. सँवारना)

समरारी, समुरारी
समर-भूमि में युद्ध की इच्छा से उपस्थित वीर योद्धा।
संज्ञा
(सं. समर + अरि)
उ.-समरारी को कुयस, कुयस की प्रगट एक ही काल-२०९७।

समर्थ
कोई काल करने की शक्ति मा योग्यता रखनवाला।
वि.
(सं.)

समर्थ
शक्ति और साधन-संपन्न।
वि.
(सं.)
उ.-ब्रह्म पूरन अकल कला तें रहित ए हरता-करता समर्थ और नाहीं-२५५६।

समर्थ
अधिकार रखनेवाला, सक्षक।
वि.
(सं.)

समर्थ
प्रभावित कर सकनेवाला।
वि.
(सं.)

समर्थ
काम में आ सकने योग्य।
वि.
(सं.)

समर्थक
समर्थन करनेवाला।
वि.
(सं.)

समर्थता
समर्थ होने का भाव या धर्म।
संज्ञा
(सं.)

समर्थता
शक्ति, सामर्थ्य।
संज्ञा
(सं.)

समर्थन
किसी विचार या मत से सहमत होकर उसका पोषण करना।
संज्ञा
(सं.)

समर्थित
जिसका समर्थन हुआ हो।
वि.
(सं.)

समर्थक
समर्पण करने वाला।
वि.
(सं.)

समर्पण
किसी को आदरपूर्वक या भेंट-स्वरूप कुछ देना।
संज्ञा
(सं.)

समर्पण
श्रद्धा या भक्तिपूर्वक कुछ अर्पित करना।
संज्ञा
(सं.)

समर्पण
अपना अधिकार, दायित्व आदि दूसरे को सौपना।
संज्ञा
(सं.)

समर्पण
विवाद, युद्ध आधि से बचने के लिए अपने को विपक्षी या किसी अधिकारी के हाथ में सौप देना।
संज्ञा
(सं.)

समर्पण
देना, दान।
संज्ञा
(सं.)

समर्पत
दान देते या अर्पित करते है।
क्रि.स.
(हिं. समर्पना)
उ.-एकनि कौं गौ-दान समर्पत-१०-२५।

समर्पना, समर्पनो
भेंट देना, अर्पित करना।
क्रि.स.
(सं. समर्पण)

समर्पना, समर्पनो
सौंपना।
क्रि.स.
(सं. समर्पण)

समर्पि
अर्पित या अर्पण करके।
क्रि.स.
(हिं. समर्पना)
उ.-तंदुल घिरत समर्पि स्याम कौं संत परोसौ करतौ-१-२९७।

समर्पित
जो समर्पण किया गया हो।
वि.
(सं.)
उ.-तनु आत्मा समर्पित तुम कहँ पाछे उपजि परी यह बात-१० उ.-११।

समर्पित
जो सौंपा गया हो।
वि.
(सं.)

समर्पिती
जिसे समर्पण किया गया हो।
वि.
(सं. समर्पित)

समर्पिती
जिसे सौपा गया हो।
वि.
(सं. समर्पित)

समर्पौं
अर्पित या अर्पण करो।
क्रि.स.
(हिं. समर्पना)
उ.-सबै समपों सूर स्याम कौ, यह साँचौ मत मेरौ-१-२६६।

समवयस्क
बराबर की उम्र का।
वि.
(सं.)

समवर्ती
पास या साथ रहनेवाला।
वि.
(सं. समवर्तिन्)

समवर्ती
समकालीन।
वि.
(सं. समवर्तिन्)

समवाय
झुंड, समूह।
संज्ञा
(सं.)

समवाय
सदा बना रहनेवाला या नित्य संबंध।
संज्ञा
(सं.)

समवायी
नित्य संबंध रखनेवाला।
वि.
(सं. समवायिन्)

समवृत्त
छंद जिसके चारो चरण समान वर्ण या मात्रावाले हों।
संज्ञा
(सं.)

समस्त
जो समास द्वारा मिलाया गया हो, समासयुक्त।
वि.
(सं.)

समस्या
जटिल या विकट प्रसंग।
संज्ञा
(सं.)

समस्या
छंद आदि का वह चरणार्द्ध जो नया और स्वतंत्र छंद बनाने के लिए कवियों को दिया जाता है।
संज्ञा
(सं.)

समस्या-पूर्ति
दिये हुए चरणार्द्ध के आधार पर स्वतंत्र छंद बनाना।
संज्ञा
(सं.)

समाँ
वक्त, समय।
संज्ञा
(हिं. समय)
मुहा.- समा बँधना- (संगीत, काव्य-पाठ आदि का) इतनी उत्तमता से संपन्न होना कि उपस्थित जनसमूह तन्मय हो जाय।

समा
साल, वर्ष।
संज्ञा
(सं.)

समाइ
लीन होकर, लीन हो जाय।
क्रि.अ.
(हिं. समाना)
उ.- (क) सनै सनै बिधि-लोकहिं जाइ, ब्रह्या सँग हरि पदहिं समाइ-३-१३। (ख) ताहि सुनौ जो प्रीति कै सो हरि पदहिं समाइ-१८६१।

समाइ
जाइ समाइ - जाकर लीन जाय।
प्र.
उ.- जाइ समाइ सूर वा निधि मैं बहुरि न उलटि जगत में नाचै-२-११।

समाइ
गए समाइ- लोप से हो गये।
प्र.
उ.- मंदिर में गए समाइ, स्यामल तनु लखि न जाइ-१०-२७५।

समाइ
कहा-समाइ-कैसे समा सकता या सहा जा सकता है ?
प्र.
उ.-पलक वोट निमि पर अनखाती यह दुख कहा समाइ-३४४४।

समवेत
जमा याइकटठा किया हुआ, एकत्र, संचित।
वि.
(सं.)

समवेत
सम्मिलित।
वि.
(सं.)

समवेत
नित्य संबंध से बंधा हुआ।
वि.
(सं.)

समष्टि
सबका समूह, ʽव्यक्तिʼ का विपरीतार्थक।
संज्ञा
(सं.)
उ.- सूरदास सोई समष्टि करि व्यष्टिभाव मन लाव-२-३८।

समसरि
बराबर, समान।
वि.
(सं. सम)
उ.- (क) सूरदास सिसुता-सुख जलनिधि कहँ लौं कहौं, नहिं कोउ समसरि-१०-१२०। (ख) अपनी समसरि और गोप जे तिनको साथ पठाये-५८३।

समसरि
बराबरी, समानता।
संज्ञा
उ.- दुहन देहु कछु दिन अरू मोकौं तब करिहौ मो समसरि आई-६६८।

समसान
शमशान।
संज्ञा
(सं. शमशान)

सम-सामयिक
जो (दो या कई) एक ही समय में हुए हों।
वि.
(सं. सम+ सामयिक)

समस्त
सब, कुल, समग्र।
वि.
(सं.)

समस्त
मिलाया हुआ, संयुक्त।
वि.
(सं.)

समाइ
सकै न समाइ-भरा नहीं जा सकता है।
प्र.
उ.-सूर-दास प्रभु सिमुता कौ सुख सकै न हृदय समाइ- १०-१७८।

समाइ
गयो समाइ-लीन हो गया, पच गया, मिल गया।
प्र.
उ.-वह्वल देखि जननि व्याकुल भइ अंग विष गयौ समाइ-७५८।

समाई
समान की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(हिं. समाना)

समाई
शक्ति, सामर्थ्य।
संज्ञा
(हिं. समाना)

समाई
हैसियत औकात।
संज्ञा
(हिं. समाना)

समाउँ
भर या समा जाता है।
क्रि.अ.
(हिं. समाना)
उ.- ह्याँ के वासी अवलोकत हौं आनँद उर न समाउँ-९-१६५।

समाऊँ
समा जाऊँ।
क्रि.अ.
(हिं. समाना)
उ.- अंग सुभग सजि, ह्वै मधु मूरति नैननि माँह समाऊँ-१०४९।

समाए
लीन हो गया।
क्रि.अ.
(हिं. समाना)
उ.- पुनि सबको रचि अंड आपु मैं आपु समाए-२-३६।

समाए
आ गया, भर सका, समा सका।
क्रि.अ.
(हिं. समाना)
उ.- अति बिसाल चंचल अनियारे हि-हाथनि न समाए-६७५।

समाक
सब, पूरा।
वि.
(सं. सम्यक)

समाजवाद
वह सिद्धांत जो समाज में सब प्रकार की समानता स्थापित करनेवाला हो।
संज्ञा
(सं.)

समाजवादी
ʽसमाजवादʼ के स्द्धांत में विश्वास रखनेवाला।
वि.
(सं.)

समाजी
आर्य समाज का मतानुयायी।
संज्ञा
[हिं. (आर्य) समाज ]

समाजी
नर्तकी के साथ तबला, सारंगी आदि बजानेवाला बर्ग।
संज्ञा
(हिं. समाज)

समाज्ञा
यश, कीर्ति।
संज्ञा
(सं.)

समात
समाता है।
क्रि.अ.
(हिं. समाना)
उ.-(क) अमर मुनि फूले सुख न समात मुदित मति-१०-६। (ख) अति अनुराग संग कमला तन पुलकित अंग न समात हियौ-१०-१४३।

समात
रुकता या ठहरता है।
क्रि.अ.
(हिं. समाना)
उ.-ठाढ़ो थक्यो उतर नहिं आवै लोचन जल न समात-२४५७।

समाति
समाती है।
क्रि.अ.
(हिं. समाना)
उ.-(क) संपति घर न समाति-१०-३६। (ख) विद्यमान बिरह-सूल उर में जु समाति-२५४३।

समातो, समातौ
समा जाता।
क्रि.अ.
(हिं. समाना)
उ.-यह ब्यापार वहाँ जु समातो हुती बड़ी नगरी-३१०४।

समादर
यथेष्ट सम्मान-सत्कार।
संज्ञा
(सं.)

शुंभ
एक असुर जो प्रहलाद का पौत्र और निशुंभ का भाई था; यह दुर्गा द्वारा मारा गया था।
संज्ञा
(सं.)

शुक
तोता।
संज्ञा
(सं.)

शुक
रावण का एक दूत।
संज्ञा
(सं.)

शुक
शुकदेव जी।
संज्ञा
(सं.)

शुकदेव
कृष्णद्वैपायन के पुत्र जिनका राजा परीक्षित को दिया हुआ मोक्ष-धर्म का उपदेश आज ‘श्रीमद्भागवत’ के रूप में उपलब्ध है।
संज्ञा
(सं.)

शुक-नलिका
वह नली या नलनी जो तोते को पकड़ने के लिए इस प्रकार बनायी जाती है कि उसके बैठते ही घूम जाती है और तोता उलटकर नीचे आ जाता है एवं उड़ने की शक्ति भुला देने के कारण पकड़ लिया जाता है।
संज्ञा
(सं.)

शुकराना
कृतज्ञता।
संज्ञा
(अ. शुक्र)

शुकराना
धन्यवाद के रूप में दिया जानेवाला धन।
संज्ञा
(अ. शुक्र)

शुकवाह
कामदेव जिसका वाहन तोता माना गया है।
संज्ञा
(सं.)

शुकी
मादा तोता, तोती, सुग्गी।
संज्ञा
(सं.)

समागत
कहीं से आया हुआ (अतिथि आदि)
वि.
(सं.)

समागत
उपस्थित या प्रस्तुत (प्रसंग आदि)।
वि.
(सं.)

समागम
आना, आगमन।
संज्ञा
(सं.)

समागम
मिलना, मिलन।
संज्ञा
(सं.)
उ.- ना हरि-भक्ति न साधु-समागम रह्यो बीच ही लटकैं-१-२९२। (ख) सूरदास प्रभु संत-समागम आनँद अभय निसान बजावै-१-२३३। (ग) धरनि तृन तनु रोम पुलकित पिय समागम जानि-२८२८।

समागम
मैथुन, संभोग।
संज्ञा
(सं.)
उ.- प्रथम समागम आनँद-आगम दूलह वर-दुलहिनी दुलारी-१०३-३९।

समाचार
हाल, खबर, संवाद।
संज्ञा
(सं.)
उ.- (क) पूछे समाचार सति भाएँ-१-२८४। (ख) काहू समा चार कछु पूछे-४-५। (ख) श्री रघुनाथ और लछिमन के समाचार सब पाये-९-९०।

समाचार पत्र
अखबार।
संज्ञा
(सं.)

समाज
समूह।
संज्ञा
(सं.)

समाज
एक ही कार-बार, आचार-विचार या समस्या के लोगों का वर्ग या समुदाय।
संज्ञा
(सं.)
उ.-कछु डर नाहिंन जिय मैं डरपत अति आनंद समाज-सारा- ४२।

समाज
सभा, समिति।
संज्ञा
(सं.)

समाद्दत
यथेष्ट रूप से सम्मानित।
वि.
(सं.)

समाध
समाधि।
संज्ञा
(सं. समाधि)

समाधा
निपटारा।
संज्ञा
(सं.)

समाधा
विरोध दूर करना।
संज्ञा
(सं.)

समाधा
समाधान।
संज्ञा
(सं.)

समाधा
समाधि।
संज्ञा
(सं. समाधि)
उ.-नहिं पावत जो रस योगीजन तब तब करत समाधा-१२३६।

समाधान
किसी का संदेह, आशंका आदि दूर करने को दिया जानेवाला उत्तर जिससे उसे संतोष हो जाय।
संज्ञा
(सं.)
उ.-(क) समाधान सुरगन को करिकै-सारा. २९४। (ख) समाधान सबहिनि को कीन्हो- सारा. ३०१। (ग) तुम हरि समाधान को पठए हमसों कहन सँदेस- ३२३२।

समाधान
मतभेद या विरोध दूर करना।
संज्ञा
(सं.)

समाधान
निराकरण।
संज्ञा
(सं.)

समाधान
समाधि।
संज्ञा
(सं.)

समाधान
ध्यान।
संज्ञा
(सं.)

समाधान
समर्थन।
संज्ञा
(सं.)

समाधान
नाटक की मुखसंधि के बारह अंगों में एक जिसमें बीज को ऎसे रूप में पुनः प्रस्तुत किया जाय कि नायक या नायिका का अभिमत पूर्णरूप से स्पष्ट हो जाय।
संज्ञा
(सं.)

समाधानना, समाधाननो
संदेश, आशंका आदि दूर करके संतुष्ट करना।
क्रि.स.
(सं. समाधान)

समाधानना, समाधाननो
धैर्य या सांत्वना देना।
क्रि.स.
(सं. समाधान)

समाधि
ईश्वर के ध्यान में मग्न होना।
संज्ञा
(सं.)
उ.- (क) रिषि की कपट-समाधि बिचारि, दियौ भुजंग मृतक गर डारि-१-२९०। (ख) सुचिरुचि सहज समाधि साधि सठ, दीनबंधु करुनामय उर धरि-१-३१२। (ग) सिव समाधि जिहिं अंत न पावैं-१०-३। (घ) जिहिं सुख कौं समाधि सिव साधी-१०-१२८।

समाधि
योग का चरम फल जो उसके आठ-अंगों में अंतिम है। इसके चर भेद है-संप्रज्ञात, सवितर्क, सविचार और सानंद। इस अवस्था में मनुष्य के चित्त की सब वृत्तियाँ नष्ट हो जाती है, बाह्म जगत से किसी प्रकार का संबंध नहीं रह जाता और अनेक प्रकार की शक्तियों के साथ अंत में कैवल्य की प्राप्ति होती है।
संज्ञा
(सं.)
सो अष्टांग जोग कौं करै।¨¨¨¨। क्रम क्रम सौं पुनि करै समाधि। सूर स्याम भजि मिटै उपाधि-२-२१।

समाधि
प्राणी की वह अवस्था जिसमें उसकी चेतना नष्ट हो जाती है और वह कोई शारीरिक क्रिया नहीं कर पाता।
संज्ञा
(सं.)

समाधि
मौन।
संज्ञा
(सं.)

समाधि
निद्रा।
संज्ञा
(सं.)

समाधि
मृत व्यक्ति की अस्थियाँ या शव गाड़ना।
संज्ञा
(सं.)

समाधि
वह स्थान जहाँ शव या अस्थियाँ गाड़ी जायँ।
संज्ञा
(सं.)

समाधि
एक अर्थालंकार।
संज्ञा
(सं.)

समाधित
जिसने समाधि सगायी हो।
वि.
(सं.)

समाधिस्थ
जो समाधि में लगा हो।
वि.
(सं.)

समान
रूप, गुण, आकार आदि में एक जैसा, बराबर, तुल्य।
वि.
(सं.)
उ.- (क) तुमहिं समान और नहिं दूजै-१-१११। (ख) सुनि थके देव बिमान, सुर-बधु चित्र समान-६२३। (ग) कोमल कमल समान देखियत ये जसुमति के बारे-२५६९।
मुहा.-एक समान-बिलकुल मिलते-जुलते।

समान
समान वर्ण-एक ही स्थान से उच्चरित होनेवाले वर्ण जैसे, त, थ, द, ध।
यौ.

समान
बराबरी, समानता
संज्ञा

समानता
बराबरी, तुल्यता
संज्ञा
(सं.)

समानान्तर
वे रेखाएँ जो आदि से अंत तक समान अंतर पर ही रहें।
संज्ञा
(सं. समान + अंतर)

समानो
समा गया, भर गया।
क्रि.अ.
(हिं. समाना)
उ.- तिहूँ भूवन भरि नाद समानौ- पृ. ३४७ (५३)।

समान्यो, समान्यौ
समा गया, भर गया।
क्रि.अ.
(हिं. समाना)
उ.- (क) गैयन भीतर आइ समान्यौ-२३७३। (ख) सूर उहै निज रूप स्याम कौ है मन माँझ समान्यो-३१२७।

समापक
समाप्त करनेवाला।
वि.
(सं.)

समापत
खत्म, समाप्त।
वि.
(सं. समाप्त)

समापन
कार्य पूरा या समाप्त करना।
संज्ञा
(सं.)

समापन
विचार, विवाद आदि से बचने के लिए समाप्ति का आदेश देना या प्रस्ताव करना।
संज्ञा
(सं.)

समापन
मार डालना।
संज्ञा
(सं.)

समापन
समाधान।
संज्ञा
(सं.)

समापन्न
समाप्त किया हुआ।
वि.
(सं.)

समापिका क्रिया
व्याकरण में वह क्रिया जिससे किसी कार्य की समाप्ति सूचित हो।
संज्ञा
(सं.)

समापित
समाप्त किया हुआ।
वि.
(सं.)

समापी
समाप्त करनेवाला।
वि.
(सं.)

समाप्त
जो खत्म या पूरा हो गया हो।
वि.
(सं.)

समाप्ति
किसी चलते हुए कार्य का खत्म या पूरा होना।
संज्ञा
(सं.)

समाप्ति
सीमा, अवधि आदि का अंत होना।
संज्ञा
(सं.)

समाप्ति
(अस्तित्व आदि) न रह जाना।
संज्ञा
(सं.)

समाप्य
समाप्त करने योग्य।
वि.
(सं.)

समाप्य
जो समाप्त होने को हो।
वि.
(सं.)

समाय
समा जाय, भर जाय, लीन हो जाय।
क्रि.अ.
(हिं. समाना)
उ.- जाइ समाय सूर वा निधि मैं बहुरि जगत नहिं नाचै-१-८१।

समायो, समायौ
समा गया।
क्रि.अ.
(हिं. समाना)
उ.- तब तनु तजि मुख माहिं समायौ-१-२२६।

समाना
किसी वस्तु, अंग आदि के भीतर पहुँचकर भर जाना या लीन हो जाना।
क्रि.अ.
(सं. समावेश)

समाना
कहीं से आकर उपस्थित होना, पहुँचना।
क्रि.अ.
(सं. समावेश)

समाना
किसी वस्तु आदि में भरना।
क्रि.स.

समानाधिकरण
व्याकरण में किसी शब्द या पद का अर्थ या संबंध स्पष्ट करने के लिए प्रयुक्त किया जानेवाला समानार्थी शब्द या पद।
संज्ञा
(सं.)

समानार्थ
वह शब्द जिसका अर्थ दूसरे के समान अर्थात् वही हो, पर्याय।
संज्ञा
(सं.)

समानार्थक
(किसी शब्द या पद के) समान अर्थ रखनेवाला, पर्यायवाची।
वि.
(सं.)

समानी
समा गयी, भर गयी, लीन हो गयी।
क्रि.अ.
(हिं. समाना)
उ.- (क) सूर अगिनि सब बदन समानी-६१५। (ख) कहा करौं, सुन्दर मूरति इन नयननि माँझ समानी-११९८। (ग) बुधी बिबेक बल बचन चातुरी मनहुँ उलटि उन माँझ समानी- पृ. ३३२ (२९)। (घ) नव से नदी चलत मर्यादा सूधी सिंधु समानी-२०४४।

समाने
समा गये, भर गये, लीन हो गये।
क्रि.अ.
(हिं. समाना)
उ.- (क) कबहुँ अघासुर बदन समाने-४९७। (ख) कोउ बन में रहे दुरि, कोऊ गगन समाने-१२९६। (ग) नैना नैननि माँझ समाने- पृ. ३२७ (६४)। (घ) सो मति मूढ़ कहत अबलनि सों, नहिं सो हृदय समाने-३२१३।

समाने
बराबर, तुल्य।
वि.
(हिं. समान)
उ.- मन-बच-कर्म पल वोट न भावत, छिन युग बरस समाने-पृ. ३२७ (६४)।

समानै
बराबर, तुल्य।
वि.
(हिं. समान)

समायो, समायौ
डूब गया।
क्रि.अ.
(हिं. समाना)
उ.- मन-कृत दोष अथाह तरंगिनि तरि नहिं सक्यौ, समायौ-१-६७।

समारंभ
अच्छी तरह शुरू या आरंभ होना।
संज्ञा
(सं.)

समारंभ
समारोह।
संज्ञा
(सं.)

समारना, समारनो
ठीक करना।
क्रि.स.
(हिं. सँवारना)

समारना, समारनो
सजाना।
क्रि.स.
(हिं. सँवारना)

समारना, समारनो
काम बनाना।
क्रि.स.
(हिं. सँवारना)

समारोह
धूम-धाम, तड़क-भड़क।
संज्ञा
(सं.)

समारोह
धूम-धाम, तड़क-भड़क से होनेवाला कोई उत्सव या आयोजन।
संज्ञा
(सं.)

समर्थ
समान अर्थवाला शब्द, पर्याय।
संज्ञा
(सं.)

समार्थक
समान अर्थवाला पर्यायवाची।
वि.
(सं.)

समावत
समाता है।
क्रि.अ.
(हिं. समाना)
उ.- गोप-सखा सब बन निहारत उर आनँद न समावत-४७९।

समावनो
समाने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(हिं. समाना)
उ.- अधर अरून छबि कोटि बज्र दुति ससि गन रूप समावनो-२२८०।

समावर्त्तन
लौटना, वापस आना।
संज्ञा
(सं.)

समावर्त्तन
वह संस्कार या आयोजन जो शिक्षार्थी के शिक्षा समाप्त कर लेने पर, स्नातक होकर उसके लौटने के समय प्राचीन गुरूकुलों में किया जाता था या आधुनिक विश्वविद्यालयो में होता है।
संज्ञा
(सं.)

समाविष्ट
जो समाया हुआ, सम्मिलित या अन्तर्गत हो।
वि.
(सं.)

समावृत्त
जिसका समावर्तन संस्कार हो चुका हो।
वि.
(सं.)

समावेश
एक साथ रहना।
संज्ञा
(सं.)

समावेश
एक वस्तु का दूसरी के अंतर्गत होना।
संज्ञा
(सं.)

समावेशित
जो किसी में समाया हुआ या किसी के अंतर्गत हो।
वि.
(सं.)

समावै
भर जाय, लीन हो जाय, समा जाय।
क्रि.अ.
(हिं. समाना)
उ.- (क) आधे मैं जल-वायु समावै।¨¨¨¨। प्रान-वायु पुनि आइ समावै-३-१३। (ख) सूरदास सो प्रेम हरि-हियै न समावै री-६२९।

समालोचक
समालोचना करनेवाला।
वि.
(सं.)

समालोचन
भली-भाँति देख-भाल कर गुण-दोषों का पता लगाना।
संज्ञा
(सं.)

समालोचन
उक्त प्रकार तो ज्ञात गुण-दोषों विवेचना करना।
संज्ञा
(सं.)

समालोचना
भली भाँति देख-भालकर गुण-दोषों का पता लगाना।
संज्ञा
(सं.)

समालोचना
उक्त प्रकार से ज्ञात गुण-दोषों की विवेचना करना।
संज्ञा
(सं.)

समालोचना
वह रचना जिसमें उक्त विवेचना की गयी हो।
संज्ञा
(सं.)

समालोची
समालोचना करनेवाला, समालोचक।
वि.
(सं. समालोचिन्)

समाव
समाने क्रिया या भाव।
संज्ञा
(हिं. समाई)

समाव
शक्ति, सामर्थ्य।
संज्ञा
(हिं. समाई)

समाव
हैसियत, बिसात।
संज्ञा
(हिं. समाई)

शुंड
हाथी की सूड़।
संज्ञा
(सं.)

शुंड
हाथी की कनपटी से बहनेवाला मद।
संज्ञा
(सं.)

शुंडा
सूड़।
संज्ञा
(सं.)

शुंडा
मद्यपान का स्थान।
संज्ञा
(सं.)

शुंडा
शराब।
संज्ञा
(सं.)

शुंडा
वेश्या।
संज्ञा
(सं.)

शुंडादंड
हाथी की सूड़।
संज्ञा
(सं.)

शुंडाल
हाथी।
संज्ञा
(सं.)

शुंडि
हाथी की सूड़।
संज्ञा
(सं. शुंड)
उ.- वाम कर गहि शुंडि डारिहौं अमरपुर हाँक दै तुरत गज को बँकारे-२५९०।

शुंडिन, शुंडी
हाथी।
संज्ञा
(सं. शुंडिन)
उ.- भुजा भुज धरत मनो द्विरद शुंडिन लरत उर उरनि भिरे दोउ जुरे मन ते-१७००।

समास
संक्षेप।
संज्ञा
(सं.)

समास
समर्थन।
संज्ञा
(सं.)

समास
संग्रह।
संज्ञा
(सं.)

समास
सम्मिलिन।
संज्ञा
(सं.)

समास
व्याकरण में दो या अधिक शब्दों का संयोग। इसके चार मुख्य भेद हैं- अव्ययी भाव, तत्पुरूष, समानाधिकरण तत्पुरूष या कर्मधारय और द्वंद्व।
संज्ञा
(सं.)

समासक
समास चिन्ह जो पदों के सामासिक होने का सूचक होता है।
संज्ञा
[सं. समास + क(प्रत्य.)]

समासोक्ति
एक अर्थालंकार।
संज्ञा
(सं.)

समाहना, समाहनो
सामने आना, सामना करना।
क्रि.अ.
(हिं. सामुहें=सामने)

समाहना, समाहनो
पकड़ना।
क्रि.स.
(सं. समाहित)

समाहार
बहुत सी चीजों को इकट्ठा करना।
संज्ञा
(सं.)

समाहार
राशि, ढेर।
संज्ञा
(सं.)

समाहार
मिलाना, मिलाप कराना।
संज्ञा
(सं.)

समाहार
व्याकरण में द्वंद्व समासका एक भेद।
संज्ञा
(सं.)

समाहित
एकत्र, संगृहीत।
वि.
(सं.)

समाहित
शांत।
वि.
(सं.)

समाहित
समाप्त।
वि.
(सं.)

समाहित
स्वीकृत।
वि.
(सं.)

समाहित
ʽसमाधिʼ नामक एक अर्थालंकार का दूसरा नाम।
संज्ञा

समाहिं
मग्न या लीन हो जाते है।
क्रि.अ.
(हिं. समाना)
उ.- अतिहिं मगन महा मधुर रस रसन मध्य समाहिं-१-३३८।

समाही
समा जाता है, लीन हो जाता है।
क्रि.अ.
(हिं. समाना)
उ.- (क) जैसै नदी, समुद्र समाही- पृ. ३१९ (८४)। (ख) ज्यों पानी में होत बुदबुदा पुनि ता माहिं समाही-१० उ.१३१।

समिति
सभा, समाज।
संज्ञा
(सं.)

समिद्ध
जलता हुआ।
वि.
(सं.)

समिद्ध
उत्तेजित।
वि.
(सं.)

समिध
अग्नि।
संज्ञा
(सं.)

समिधा
हवन-कुंड म जलान की लकड़ी।
संज्ञा
(सं. समिधि)

समिर
हवा, वायु,
संज्ञा
(सं. समीर)

समी
ʽशमीʼ वृक्ष।
संज्ञा
(हिं. शमी)

समीक
एक क्षमाशील ऋषि जिनके गले में परीक्षित ने मरा हुआ साँप डाल दिया था और जिनके पुत्र ने उनको सातवें दिन तक्षक नाग द्वारा डसे जाने का शाप दिया था।
संज्ञा
(सं. शमीक)
उ.- इक दिन राइ अखेटक गयौ।¨¨¨। रिषि समीक कैं आस्त्रम आयौ।¨¨। दियौ भुजंग मृतक गर डारि-१-२९०।

समीकरण
(दो या अधिक वस्तुओं, राशियों आदि को) समान करने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(सं.)

समीकरण
गणित में ज्ञात राशि से अज्ञात का पता लगाने की क्रिया।
संज्ञा
(सं.)

समीकरण
यह सिद्ध करना कि अमुक-अमुक राशियाँ या मान समान हैं।
संज्ञा
(सं.)

समीक्षक
समीक्षा करनेवाला।
वि.
(सं.)

समीक्षण
देखना-भालना, जाँच-पड़ताल।
संज्ञा
(सं.)

समीक्षण
आलोचना।
संज्ञा
(सं.)

समीक्षा
देखने-भालने या जाँच-पड़ताल करने की क्रिया।
संज्ञा
(सं.)

समीक्षा
समालोचना।
संज्ञा
(सं.)

समीचीन
ठीक।
वि.
(सं.)

समीचीन
उचित।
वि.
(सं.)

समीचीनता
ठीक, उचित या न्यायसंगत होने का भाव।
संज्ञा
(सं.)

समीति
प्रीति या मित्रता-भाव से।
क्रि.वि.
(सं.)
उ.- जिनि पतियाहु मधुर सुनि बातैं लागे करन समीति-३०५४।

समीति
सभा, समाज।
संज्ञा
(सं. समिति)

समीप
पास, निकट।
क्रि.वि.
(सं.)
उ.- छहौं रस लै समीप सँचरै-१-११७।

समीप
सामने, तुलना में।
क्रि.वि.
(सं.)
उ.- कोटि स्वर्ग सम सुखउ न मानत हरि समीप समता नहिं पावत-३१४२।

समीपता
समीप ही स्थित, निकटता।
संज्ञा
(सं.)

समीपवर्ती
निकट का।
वि.
(सं. समीपवर्त्तिन्)

समीपस्थ
निकट का।
वि.
(सं.)

समीपै
पास, निकट।
क्रि.वि.
(सं. समीप)
उ.- सुभग कर आनन समीपै मुरलिया इहिं भाइ-६२७।

समीर
हवा, वायु।
संज्ञा
(सं.)
उ.- रघुपति रिस पावक प्रचंड अति सीता-स्वास समीर-९-१५८।

समीर-कुमार
हनुमान।
संज्ञा
(सं. समीर + कुमार)

समीरण
हवा, वायु।
संज्ञा
(सं.)

समीहा
चेष्टा।
संज्ञा
(सं.)

समीहा
इच्छा।
संज्ञा
(सं.)

समुंदर
सागर, समुद्र।
संज्ञा
(सं. समुद्र)

समुचित
उचित।
वि.
(सं.)

समुचित
उपयुक्त।
वि.
(सं.)

समुच्चय
कुछ चीजों का एक में मिलना।
संज्ञा
(सं.)

समुच्चय
ढेर, राशि, समूह।
संज्ञा
(सं.)

समुच्चय
एक अर्थालंकार।
संज्ञा
(सं.)

समुच्चयबोधक
व्याकरण में वह अव्यय जो दो शब्दों, पदों या वाक्यों को परस्पर जोड़ता हो।
संज्ञा
(सं.)

समुच्चित
ढेर या राशि-रूप में इकट्ठा किया हुआ।
वि.
(सं.)

समुझाना, समुझानो
समझाने की बात करना।
क्रि.स.
(हिं. समुझाना)

समुझाना, समुझानो
धीरज देना।
क्रि.स.
(हिं. समुझाना)

समुझायो, समुझायौ
समझाया-बुझाया।
क्रि.स.
(हिं. समझाया)

समुझायो, समुझायौ
धीरज दिया।
क्रि.स.
(हिं. समझाया)

समुझायो, समुझायौ
समझाने क्रिया, भाव या उसका प्रभाव।
संज्ञा
उ.- छिन छिन सुरति करत जसुमति की परत न मन समुझायो-१० उ.-७८।

समुझाव, समुझावा
समझाने समझाने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(हिं. समुझाना)

समुझावत
समझाते-बुझाते हो, प्रबोधते हो।
क्रि.स.
(हिं. समुझाना)
उ.- मधुकर, हमहीं क्यौं समुझावत-२९८९।

समुझावति
समझाती या प्रबोधती है।
क्रि.स.
(हिं. समुझाना)
उ.- जैहैं बिगरि दाँत ये आछे तातैं कहि समुझावति-१०-२२२।

समुझावही
समझाता या प्रबोधता है।
क्रि.स.
(हिं. समुझाना)
उ.- सूर दुष्ट समुझावही त्यौं त्यौं जिय खरई-२८६१।

समुझावहु
समझाते या प्रबोधते हो।
क्रि.स.
(हिं. समुझाना)
उ.- ऊधौ, हमैं कहा समुझावहु-३२०६।

समुझावै
बताता या सिखाता है।
क्रि.स.
(हिं. समुझाना)
उ.- बचन-रचन समुझावै-१-१८६।

समुझावै
समझाता या प्रबोधता है, समझाती या प्रबोधती है।
क्रि.स.
(हिं. समुझाना)
उ.- (क) सूरदास आपुहिं समझावै लोग बुरौ जिनि मानौ-१-६३। (ख) ऐसौ पुरूषारथ सुनि जसुमति खीझति फिरि समुझावै-४८२।

समुझि
समझ-बुझकर, ध्यान देकर।
क्रि.स.
(हिं. समुझना)
उ.- (क) रे मन, समुझि सोचि-बिचारि - १-३०९। (ख) बौरे मन, समुझि-समुझि कछु चेत -१-३२२।

समुझिबी
समझ लो या लेंगे, जान लेंगे या लो।
क्रि.स.
(हिं. समुझना)
उ.- इतने महि सब तात समुझिबी चतुर सिरोमनि नाह-२८६८।

समुझी
समझ में आयी।
क्रि.स.
(हिं. समुझना)

समुझी
समुझी न परी- समझ में नहीं आई, जान नहीं पाया।
प्र.
उ.- कौन भाँति हरि कृपा तुम्हारी, सो स्वामी समुझी न परी-१-११५।

समुझे
समझने-बुझनेवाले।
वि.
(हिं. समुझना)
उ.- सूरदास समुझे की यह गति, मन ही मन मुसुकायौ-४-१३१।

समुझैए
समझाइए-बुझाइए, प्रबोधिए।
क्रि.स.
(हिं. समुझना)
उ.-कामी होइ काम आतुर तेहि कैसे कै समुझैए-२२७५।

समुझैहौं
समझाऊँ-बुझाऊँगी, प्रबोधूँगी।
क्रि.स.
(हिं. समुझाना)
उ.- किहिं बिधि करि कान्हहिं समुझैहौं-१०-१८९।

समुझ्यो, समुझ्यौ
समझ-बूझ सका, जान सका।
क्रि.स.
(हिं. समुझना)
उ.- मैं अज्ञान कछू नहिं समझ्यौ परि दुख-पुंज सह्यो-१-४६।

समुच्चित
एकत्र, संगृहीत।
वि.
(सं.)

समुज्ज्वल
बहुत चमकीला।
वि.
(सं.)

समुज्ज्वल
बहुत प्रकाशमान।
वि.
(सं.)

समुझ
अक्ल, बुद्धि।
संज्ञा
(हिं. समझ)
उ.- गुन अवगुन की समुझ न संका परि आई यह टेव-१-१५०।

समुझत
समझता, बूझता या ध्यान में लाता है।
क्रि.स.
(हिं. समुझना)
उ.- (क) मगन भयौ माया रस लंपट समुझत नाहिं हटी-१-९८। (ख) जुग जुग जनम, मरन अरू बिछरन, सब समुझत मत-भेव-१-१००।

समुझना, समुझनो
कोई बात विचार करके ध्यान में लाना।
क्रि.स.
(हिं. समुझना)

समुझना, समुझनो
किसी बात का स्वरूप आदि देखकर तद्विषयक अनुमान या कल्पना करना।
क्रि.स.
(हिं. समुझना)

समुझाइ
अच्छी तरह बताकर या समझा-बुझाकर।
क्रि.स.
(हिं. समुझाना)
उ.- मन तोसौं किती कही समुझाइ-१-३१७।

समुझाईं
समझाया-बुझाया।
क्रि.स.
(हिं. समुझाना)
उ.- मानैं नहीं, कितौ समुझाईं-३९१।

समुझाई
समझाया-बुझाया।
क्रि.स.
(हिं. समुझाना)
उ.-मन मैं सोच न करि तू माता, यह कहिकै समुझाई-९-८०

समुदायो
झुंड या समूह में।
संज्ञा
(सं. समुदाय)
उ.- सूर चेल बन तें गृह को प्रभु बिहँसत मिलि समुदायो-२३१६।

समुदित
उन्नत।
वि.
(सं.)

समुदित
उत्पन्न।
वि.
(सं.)

समुद्यय
अच्छी तरह से तैयार।
वि.
(सं.)

समुद्र
सागर, उदधि।
संज्ञा
(सं.)
उ.- आए तीर समुद्र के-९-७२।

समुद्र
किसी विषय के ज्ञान, गुण आदि का बहुत बड़ा आगार।
संज्ञा
(सं.)

समुद्रकांची
पृथ्वी जिसकी मेखला समुद्र है।
संज्ञा
(सं. समुद्रकाञ्ची)

समुद्रकांता
नदी।
संज्ञा
(सं. समुद्रकान्ता)

समुद्रचुलुक
अगस्त्य मुनि जिन्होंने सारा समुद्र चुल्लुओं से पी डाला था।
संज्ञा
(सं.)

समुद्रज
समुद्र से उत्पन्न।
वि.
(सं.)

शायक
तलवार।
संज्ञा
(सं.)

शायक
शौकीन।
वि.
(अ. शायक)

शायक
इक्छुक।
वि.
(अ. शायक)

शायद
कदाचित्, संभव है।
अव्य.
(फ़ा.)

शायर
कवि।
संज्ञा
(अ.)

शायरी
कविता, काव्य।
संज्ञा
(फ़ा.)

शाया
प्रकट।
वि.
(अ.)

शाया
प्रकाशित।
वि.
(अ.)

शायी
सोने या शयन करनेवाला।
वि.
(सं. शायिक)

शारंग
सारंग।
संज्ञा
(सं. सारंग)

शीलवान, शीलवान्
अच्छे स्वभाववाला।
वि.
(सं. शीलवत्)

शीलता
‘शील’ का भाव।
संज्ञा
(सं.)

शीला
राधा की एक सखी का नाम।
संज्ञा
(सं.)
उ.- (क) कहि राधा किन हार चुरायो।¨¨¨¨। सुषमा शीला अवधा नंदा वृन्दा यमुना सारि-१५८०। (ख) वै निशि बसे महल शीला के -१९३२। (ग) शीला नाम ग्वालिनी तेहि गहे कृष्न धपि धाई हो-२४४९।

शीश
सिर।
संज्ञा
(सं. शीर्ष)
मुह. - शीश धनै- शोक या पछतावे से सिर पीटना। शीश धुनै- शोक या पछतावे से सिर पीटता है। उ.-शीश धुनै दोऊ कर मीड़ै अंतर साँच परयो-१० उ.-६८। शीश नीचे नवाना-लाज या संकोच से सिर झुकाना। शीश निच्यो क्यों नावत-लाज या संकोच से सिर क्यों झुकाता है ? उ.-सूर शीश निच्यो क्यों नावत, अब काहे नहिं बोलत-३१२१।शीश पड़ना-भाग या हिस्से में आना, स्वयं परिणाम भुगतना। शीश परयो-भाग में आया, परिणाम भुगतना पड़ा। उ.-जानि-बूझि मैं यह कृत कीन्हों सो मेरे ही शीश परयो-१६६८।

शीशम
एक प्रसिद्ध पेड़।
संज्ञा
(फ़ा.)

शीशमहल
वह स्थान या महल जहाँ सब ओर शीशे जड़े हों।
संज्ञा
(फ़ा. शीशा + अ. महल)

शीशा
काँच।
संज्ञा
(फ़ा. शीशः)

शीशा
दर्पण।
संज्ञा
(फ़ा. शीशः)

शीशी
काँच का पात्र-विशेष।
संज्ञा
(हिं. शीशा)

शुंग
एक क्षत्रिय वंश जो मौर्यो के पश्चात मगध साम्राज्य का स्वामी बना।
संज्ञा
(सं.)

समुद
सागर, समुद्र।
संज्ञा
(सं. समुद्र)
उ.- (क) त्रिदसपति समुद के मथन के बचन जो सो सकल ताहि कहि कैं सुनाए-८-८। (ख) हम लंकेस-दूत प्रतिहारी समुद तीर कौं जात अन्हाए-९-१२०।

समुदय
उदय।
संज्ञा
(सं.)

समुदय
दिन।
संज्ञा
(सं.)

समुदय
युद्ध।
संज्ञा
(सं.)

समुदय
सब, कुल, समस्त।
वि.

समुदय
ढेर, राशि।
संज्ञा
(सं. समुदाय)

समुदय
गरोह, झुंड, समूह।
संज्ञा
(सं. समुदाय)

समुदाइ, समुदाई
समूह, समुदाय।
संज्ञा
(सं. समुदाय)
उ.- सुख-संपति दारा-सुत झूठ सबै समुदाइ-१-३१७।

समुदाय
ढेर, राशि।
संज्ञा
(सं.)

समुदाय
झुंड, समूह।
संज्ञा
(सं.)

समुद्रज
मोती आदि रत्न जो समुद्र से उत्पन्न माने जाते हैं।
संज्ञा

समुद्रफेन
समुद्र का फेन या झाग।
संज्ञा
(सं.)

समुद्री, समुद्रीय
समुद्र का।
वि.
(सं. समुद्रीय)

समुद्री, समुद्रीय
समुद्र में होनेवाला।
वि.
(सं. समुद्रीय)

समुन्नत
भली भाँति उन्नत।
वि.
(सं.)

समुन्नति
यथेष्ट उन्नति।
संज्ञा
(सं.)

समुन्नति
महत्ता।
संज्ञा
(सं.)

समुन्नति
उच्चता।
संज्ञा
(सं.)

समुल्लास
आनंद, उल्लास।
संज्ञा
(सं.)

समुल्लास
ग्रंथादि का प्रकरण या परिच्छेद।
संज्ञा
(सं.)

समूर
मूलसहित।
वि.
(सं. स + मूल)

समूरा
सारा, समूचा।
वि.
(सं. समस्त)

समूरा
मूल सहित।
वि.
(सं. स+ मूल)

समूल
जिसमें जड़ या मूल हो।
वि.
(सं.)

समूल
जिसका कारण या हेतु हो।
वि.
(सं.)

समूल
जड़-मूल से।
क्रि.वि.

समूह
एक तरह की चीजों का ढेर।
संज्ञा
(सं.)
उ.- अधम-समूह उधारन कारन तुम जिय जक पकरी-१-१३०।

समूह
(मनुष्यों का) समुदाय।
संज्ञा
(सं.)
उ.- सैल-सिला-द्रम बरषि व्योम चढ़ि सत्रु-समूह सँहारौं-९-१०८।

समूहतः
सामूहिक रूप से।
क्रि.वि.
(सं.)

समृत
ज्ञान जो स्मरणशक्ति से प्राप्त हो।
संज्ञा
(सं. स्मृति)

समूचा
सब, कुल।
वि.
(सं. समुच्चय)

समूचा
बिना कटा-पिटा, पूरा, सारा।
वि.
(सं. समुच्चय)

समूढ़
एकत्र, संचित।
वि.
(सं.)

समूढ़
भोगा हुआ।
वि.
(सं.)

समूढ़
ठीक, संगत।
वि.
(सं.)

समूढ़
हाल का जन्मा हुआ।
वि.
(सं.)

समूढ़
विवाहित।
वि.
(सं.)

समूढ़
समूह।
संज्ञा

समूढ़
भंडार, आगार।
संज्ञा

समूर
ʽशंबरʼ या ʽसाबरʼ मृग।
संज्ञा
(सं.)

समुहा
सामने।
वि.क्रि.वि.
(सं. सम्मुख)

समुहाइ, समुहाई
सामजे होकर।
क्रि.अ.
(हिं. समुहाना)
उ.- (क) सोचति चली कुँवरि घर हीं तैं। खरिक गई समुहाइ-६७९। (ख) सुन्दरि गयी गृह समुहाइ-३९६।

समुहाइ, समुहाई
मुकाबला या सामना करती है, सामने आकर अड़ती है।
क्रि.अ.
(हिं. समुहाना)
उ.- माधौ, नैंकु हटकौ गाइ। ¨¨¨¨। ढीठ, निठुर, न डरति काहूँ, त्रिगुन ह्वै समुहाइ-१-५६।

समुहाना
सामने आना।
क्रि.अ.
(सं. सम्मुख)

समुहाना
सामने आकर अड़ना, सामना करना।
क्रि.अ.
(सं. सम्मुख)

समुहाना
समूह बनाना, एकत्र होना।
क्रि.अ.
(हिं. समूह)

समुहाने
(किसी के) सामने या सम्मुख आ गये।
क्रि.अ.
(हिं. समूहाना)
उ.- सुनि मृदु बचन देखि उन्नत कर हरषि सबै समुहाने-५०३।

समुहानो
सामने आना।
क्रि.अ.
(सं. सम्मुख)

समुहानो
सामना करना।
क्रि.अ.
(सं. सम्मुख)

समुहाहिं
एकत्र होकर, समूह बनाकर।
क्रि.अ.
(हिं. समूह)
उ.- सूर राधा सहित गोपी चलीं ब्रज समुहाहिं-१३०६।

समै
समय।
संज्ञा
(सं. समय)
उ.- (क) सुरत समै के चिह्न राधिका राजत रंग भरे-२११४। (ख) तब तेहि समै आनि ऐरापति ब्रजपति सों कर जोरे-१११८।

समैबो, समैबौ
जल में समाने या निमज्जित होने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(हिं. समाना)
उ.- कैसै बसन उतारि धरैं हम कैसैं जलहिं समैबौ-७७९।

समैया
समाता है।
क्रि.स.
(हिं. समाना)
उ.- फूँकि फूँकि जननी पय प्यावति, सुख पावति जो उर न समैया-१०-२२९।

समैहै
समायगी, समा सकेगी।
क्रि.स.
(हिं. समाना)
उ.- जिन पै ते लै आए ऊधौ, तिनहिं के पेट समैहै-३१०५।

समैहौं
समाऊँगी, समा जाऊँ गी।
क्रि.स.
(हिं. समाना)
उ.- तजि अकास पिय भौन समैहौं-१२०७।

समो
समय।
संज्ञा
(सं. समय)
उ.- अब वहि देस नंदनंदन कहँ कोउ न समो जनावत-२८३५।

समोई
लीन हुई।
क्रि.स.
(हिं. समोना)

समोई
रही समोई - समा गयी, लीन हो गयी।
प्र.
उ.- कहा कहौं कछु कहत न आवै तन मन रही समोई-३१०३।

समोखना, समोखनो
बहुत जोर देकर कहना।
क्रि.स.
(सं. सम्मुख)

समोधना, समोधनो
समझा-बुझाकर शांत करना या उचित मार्ग पर लाना।
क्रि.स.
(सं. सम्बोधन)

समोधे
समझा बुझाकर शांत किया।
क्रि.स.
(हिं. समोधना)
उ.- ठानी कथा प्रबोधि तबहिं फिरि गोप समोधे-३४४३।

समोना, समोनो
मिलाना।
क्रि.स.
(हिं. समाना)

समोना, समोनो
डूबना।
क्रि.अ.

समोना, समोनो
लीन होना।
क्रि.अ.

समोना, समोनो
(पकवान) जिसमें मोयन मिला हो, जो (पकवान) मोयन मिलाने से बहुत मुलायम हो गया हो।
वि.
(हिं. स + मोयन)

समोयो, समोयौ
मिलाया।
क्रि.स.
(हिं. समोना)
उ.- तातौ जल आनि समोयौ अन्हवाइ दियौ, मुख धोयौ-१०-१८३।

समोयो, समोयौ
मिल गया, लीन या विलीन हो गया।
क्रि.अ.
उ.- जज्ञ समय सिसुपाल सुजोधा अनायास लै जोति समोयौ-१-५४।
मुहा. गरद समोयौ- धूल में मिल गया, नष्ट हो गया। उ.- सौ भैया दुरजोधन राजा, पल मैं गरद समोयौ-१-४३।

समोसा
एक नमकीन पकवान।
संज्ञा
(देश.)

समौ
समय।
संज्ञा
(सं. समय)
मुहा.- समौ गए तें - उपयुक्त समय या अवसर बीत जाने पर। उ.- (क) सुनि सुंदरि यह समौ गए तें पुनि न सूल सहि जैहै-२०३३। (ख) अब काहे जल मोचत सोचत समौ गए तें सूल नई-२५३७। समौ पहिचान- उपयुक्त समय या अवसर देखकर। उ.- करिये बिनती कमलनयन सों सूर समौ पहिचान-२५२२।

समौरिया
समान उम्र का।
वि.
(सं. सम + हिं. उमर)

समृत
साहित्य में किसी भूली बात का याद आना जो एक संचारी भाव है।
संज्ञा
(सं. स्मृति)

समृत
प्रियतम संबंधी बातों का याद आना जो पूर्वराग की दस अवस्थाओं में एक है।
संज्ञा
(सं. स्मृति)

समृत
हिंदू धर्म-शास्त्र।
संज्ञा
(सं. स्मृति)
उ.- समृत-बेद-मारग हरि-पुर कौं तातौं लियौ भुलाई-१-१८७।

समृद्ध
धन- संपत्तिवाला।
वि.
(सं.)

समृद्धि
धन-वैभव-संपन्नता।
संज्ञा
(सं.)

समृद्धी
धन-वैभव बढ़ानेवाला।
वि.
(सं. समृद्धिन्)

समृद्धी
धन-वैभव- संपन्नता।
संज्ञा
(सं. समृद्धि)

समेटना, समेटनो
बिखरी हुई चीजों को इकट्ठा करना।
क्रि.स.
(हिं. सिमटना)

समेत
मिला हुआ, संयुक्त।
वि.
(सं.)

समेत
साथ, सहित।
अव्य.
उ.- (क) अस्व समेत बभ्रु-बाहन लै सुफल जज्ञ-हित आए-१-२९। (ख) बल समेत नृप कंस बोलाए-२५६८। (ग) गज समेत तोहि डारौं मारी-२५८९।

सम्मान्य
आदर के योग्य।
वि.
(सं.)

सम्मिलन
मिलना, मिलाप।
संज्ञा
(सं.)

सम्मिलित
मिला हुआ, युक्त।
वि.
(सं.)

सम्मिश्रण
मिलने या मिलाने की क्रिया।
संज्ञा
(सं.)

सम्मिश्रण
मेल, मिलावट।
संज्ञा
(सं.)

सम्मुख
सामने, समक्ष।
अव्यय.
(सं.)

सम्मुखी
दर्पण, मुकुर।
संज्ञा
(सं. सम्मुखिन्)

सम्मुखी
जो सामने या समक्ष हो।
वि.

सम्मुखीन
जो समाने हो।
वि.
(सं.)

सम्मुहँ, सम्मुहें, सम्मुहों, सम्मुहौं
सामने, समक्ष।
क्रि.वि.
(सं. सम्मुख)

सम्मत
जिसकी राय मिलती हो, सहमत।
वि.
(सं.)

सम्मति
राय, सलाह।
संज्ञा
(सं.)

सम्मति
अनुमति आदेश।
संज्ञा
(सं.)

सम्मति
मत, विचार अभिप्राय।
संज्ञा
(सं.)
उ.- सोचि-विचार सकल स्रुति सम्मति, हरि तैं और न आगर-१-९१।

सम्मति
एकमत होना।
संज्ञा
(सं.)

सम्मति
प्रस्ताव या विचार के पक्ष में दी जानेवाली अनुमति।
संज्ञा
(सं.)

सम्मान
गौरव, प्रतिष्ठा।
संज्ञा
(सं.)

सम्मानना, सम्माननो
आदर या सम्मान करना।
क्रि.स.
(सं. सम्मान)

सम्मानित
जिसका सम्मान किया गया हो।
वि.
(सं.)

सम्मानित
जिसका सब सम्मान करें, प्रतिष्ठित।
वि.
(सं.)

शुक्त
खट्टा।
वि.
(सं.)

शुक्त
अप्रिय।
वि.
(सं.)

शुक्ति, शुक्तिका
सीप, सीपी।
संज्ञा
(सं.)

शुक्तिज
मोती, मुक्ता।
संज्ञा
(सं.)

शुक्र
एक चमकीला ग्रह।
संज्ञा
(सं.)

शुक्र
एक ऋषि जो दैत्यों के गुरू थे।
संज्ञा
(सं.)

शुक्र
वृहस्पतिवार और शनिवार के बीच का दिन।
संज्ञा
(सं.)

शुक्र
वीर्य।
संज्ञा
(सं.)

शुक्र
बल, पौरूष।
संज्ञा
(सं.)

शुक्रगुजार
कृतज्ञ।
वि.
(अ. शुक्र + फ़ा. गुजार)

सम्मेलन
सभा, समाज।
संज्ञा
(सं.)

सम्मेलन
जमा-बड़ा, जमघट।
संज्ञा
(सं.)

सम्मेलन
मिलाप, संगम।
संज्ञा
(सं.)

सम्मोह
प्रेम।
संज्ञा
(सं.)

सम्मोह
भ्रम, संदेह।
संज्ञा
(सं.)

सम्मोह
बेहोशी, मूर्छा।
संज्ञा
(सं.)

सम्मोह
एक छंद।
संज्ञा
(सं.)

सम्मोहक
मोहनेवाला, लुभावना।
वि.
(सं.)

सम्मोहन
मोहित या मुग्ध करने की क्रिया।
संज्ञा
(सं.)

सम्मोहन
एक प्राचीन-अस्त्र जिससे शत्रु-पक्ष को मोहित कर लिया जाता था।
संज्ञा
(सं.)

सम्हार, सम्हाल,
रक्षा।
संज्ञा
(हिं. सँभाल, सँभार)

सम्हार, सम्हाल,
पोषण या देखभाल का भार।
संज्ञा
(हिं. सँभाल, सँभार)

सम्हार, सम्हाल,
तन-बदन या शरीर की सुध।
संज्ञा
(हिं. सँभाल, सँभार)
उ.- तन की सुधि-सम्हार कछु नाहीं-७९९।

सम्हार, सम्हाल,
सुधार या बनाकर।
क्रि.स.
(हिं. सम्हालना)

सम्हार, सम्हाल,
दीन्ही बात सम्हार - बात सुधार या बना दी।
प्र.
उ.- हीरा जनम दियौ प्रभु हमकौं, दीन्ही बात सम्हार-१-१९६।

सम्हारत, सम्हालत,
सुधारता है।
क्रि.स.
(हिं. सम्हारना, सम्हालना)
उ.- पछिले कर्म सम्हारत नाहीं, करत नहीं कछु आगैं-१-६१।

सम्हारति, सम्हालति
ठीक या व्यवस्थित रखती है।
क्रि.स.
(हिं. सम्हारना, सम्हालना)
उ.- आनँद उर अंचल न सम्हारति सीस सुमन बरसावति-१०-२३।

सम्हारति, सम्हालति
बुरी दशा में जाने से बचाती या रक्षा करती है।
क्रि.स.
(हिं. सम्हारना, सम्हालना)
उ.- पद-रिपु पट अँटक्यौ न सम्हारति उलट न पलट खरी-६५९।

सम्हारन
ʽसम्हालनेʼ की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(हिं. सम्हारना)

सम्हारन
सम्हारन लागे- समेटने, बटोरने या इकट्ठा करने लगे।
प्र.
उ.- मरती बेर सम्हारन लागे जो कछु गाड़ि धरी-१-७१।

सम्रित, सम्रिति
किसी पुरानी या भूली हुई बात का स्मरण हो आना जो एक संचारी भाव माना गया है।
संज्ञा
(सं. स्मृति)

सम्रित, सम्रिति
प्रियतम के संबंध में पुरानी बातों का रह-रहकर याद आना जो पूर्वराग की दस अवस्थाओं म एक है।
संज्ञा
(सं. स्मृति)

सम्रित, सम्रिति
वे हिंदू धर्मशास्त्र जिनकी रचना वेदों का स्मरण-चिंतन करके की गयी थी।
संज्ञा
(सं. स्मृति)

सम्रित, सम्रिति
ʽस्मरणʼ नामक अलंकार।
संज्ञा
(सं. स्मृति)

सम्हरना, सम्हरनो, सम्हलना, सम्हालनो
किसी बोझ आदि का रोका या कर्तव्य आदि का निर्वाह किया जा सकना।
क्रि.अ.
(हिं. सँभलना)

सम्हरना, सम्हरनो, सम्हलना, सम्हालनो
आधार या सहारे पर रुका या टिका रहना।
क्रि.अ.
(हिं. सँभलना)

सम्हरना, सम्हरनो, सम्हलना, सम्हालनो
सावधान होना।
क्रि.अ.
(हिं. सँभलना)

सम्हरना, सम्हरनो, सम्हलना, सम्हालनो
बचाव करना।
क्रि.अ.
(हिं. सँभलना)

सम्हरना, सम्हरनो, सम्हलना, सम्हालनो
रोग से छूटकर स्वस्थता प्राप्त करना।
क्रि.अ.
(हिं. सँभलना)

सम्हरना, सम्हरनो, सम्हलना, सम्हालनो
सुधरना।
क्रि.अ.
(हिं. सँभलना)

सम्मोहन
कामदेव के पाँच बाणों में एक।
संज्ञा
(सं.)

सम्मोहन
जिससे मोह उपजे, मोहकारक।
वि.

सम्यक, सम्यक्
पूरा, सब।
वि.
(सं. सम्यक)

सम्यक, सम्यक्
सब प्रकार से।
क्रि.वि.

सम्यक, सम्यक्
भली भाँति।
क्रि.वि.

सम्राज्ञी
सम्राट की पत्नी।
संज्ञा
(सं.)

सम्राज्ञी
साम्राज्य की अधीश्वरी।
संज्ञा
(सं.)

सम्राट, सम्राट्
बड़ा राजा।
संज्ञा
(सं. सम्राज)

सम्रित, सम्रिति
वह ज्ञान जो स्मरणशक्ति से प्राप्त होता रहता है।
संज्ञा
(सं. स्मृति)

सम्रित, सम्रिति
याद, स्मरण।
संज्ञा
(सं. स्मृति)

सम्हारना, सम्हालना
भार ऊपर लेना।
क्रि.स.
(हिं. सँभालना)

सम्हारना, सम्हालना
रोककर वश में रखना।
क्रि.स.
(हिं. सँभालना)

सम्हारना, सम्हालना
गिरने न देना।
क्रि.स.
(हिं. सँभालना)

सम्हारना, सम्हालना
रक्षा करना।
क्रि.स.
(हिं. सँभालना)

सम्हारना, सम्हालना
बुरी दशा में जाने से बचाना।
क्रि.स.
(हिं. सँभालना)

सम्हारना, सम्हालना
पालन-पोषण या देखरेख करना।
क्रि.स.
(हिं. सँभालना)

सम्हारना, सम्हालना
ठीक तरह से काम करना।
क्रि.स.
(हिं. सँभालना)

सम्हारना, सम्हालना
ठीक या व्यवस्थित रखना, अस्तव्यस्त न होने देना।
क्रि.स.
(हिं. सँभालना)

सम्हारना, सम्हालना
सहेजना।
क्रि.स.
(हिं. सँभालना)

सम्हारना, सम्हालना
सुधार लेना।
क्रि.स.
(हिं. सँभालना)

सम्हारहुगे, सम्हालहुगे
निभाओगे।
क्रि.स.
(हिं. सम्हारना, सम्हालना)
उ.- अपनौ बिरद सम्हारहुगे तौ यामैं सब निबरी-१-१३०।

सम्हारि, सम्हालि
सँभालो।
क्रि.स.
(हिं. सम्हारना, सम्हालना)
मुहा.- सुरति सम्हारि होश में आओ, सचेत या सावधान हो जाओ। उ.- भली भई अबकैं हरि बाँचे अब तौ सुरति सम्हारि-१०-७९।

सम्हारि, सम्हालि
भार आदि रोका या उठा सका।
क्रि.स.
(हिं. सम्हारना, सम्हालना)
उ.- बातैं दूनी देह धरी, असुर न सक्यौ सम्हारि-४३१।

सम्हारि, सम्हालि
सुधार या सम्हाल लेती है।
क्रि.स.
(हिं. सम्हारना, सम्हालना)
उ.- ज्यौं बालक अपराध सत जननी लेति सम्हारि-४९२।

सम्हारि, सम्हालि
रक्षा करके।
क्रि.स.
(हिं. सम्हारना, सम्हालना)
मुहा.- लैहैं सम्हारि - रक्षा कर सकेगा। उ.- सूर कौन सम्हारि लैहै चढ़यौ इंद्र प्रचारि-९५०। नाहिंन परत सम्हारि- धैर्य नहीं रह जाता, धीरज छटने लगता है। उ.- सूर प्रभु ब्रत देखि इनको नाहिंन परत सम्हारि-७७७।

सम्हारी, सम्हाली
बचायी, रक्षा की।
क्रि.स.
(हिं. सम्हारना, सम्हालना)
उ.- अंबर हरत द्रुपद-तनया की दुष्ट-सभा मधि लाज सम्हारी-४९२।

सम्हारी, सम्हाली
मनोवेग को रोका, सम्हाला।
क्रि.स.
(हिं. सम्हारना, सम्हालना)

सम्हारी, सम्हाली
नहिं सके सम्हारी- मनोवेग की रोक नहीं सके, अधीर या द्रवित हो गये।
प्र.
उ.- थर थर अंग कँपति सुकुमारी। देखि स्याम नहिं सके सम्हारी-७९९।

सम्हारे, सम्हाले
सचेत या सावधान हुए, ध्यान दिया।
क्रि.अ.
(हिं. सम्हारना, सम्हालना)
उ.- देवबानी भई जीत भई राम की ताउ पै मूढ़ नाहीं सम्हारे-१० उ.-३३।

सम्हारै, सम्हालै
रक्षा करता है, बचाता या सुधारता है।
क्रि.स.
(हिं. सम्हारना, सम्हालना)
उ.- हरि तोहिं बारंबार सम्हारै-२०३८।

सम्हारै, सम्हालै
सम्हालकर, सचेत या सावधान होकर।
क्रि.स.
(हिं. सम्हारना, सम्हालना)
उ.- तब झुकि बोली ग्वालि बात किन कहौ सम्हारै-२९९०।

सम्हारो, सम्हारौ, सम्हालो, सम्हालौ
बचाता या सँभालता है।
क्रि.स.
(हिं. सम्हारना, सम्हालना)
उ.- लोटत पीत पराग कीच में नीच न अंग सम्हारो-२९९०।

सम्हारथो, सम्हारथौ, सम्हाल्यो, सम्हाल्यौ
बचाया, रोका, रक्षा की, सँभाला।
क्रि.स.
(हिं. सम्हारना, सम्हालना)

सम्हारथो, सम्हारथौ, सम्हाल्यो, सम्हाल्यौ
नहिं जात सम्हारयौ - बचा नहीं सका, रोक या सँभाल नहीं सका।
प्र.
उ.- निरतत पद पटकत फन-फन-प्रति, बमत रूधिर, नहिं जात सम्हारयौ-५६४।

सयन
सोना, निद्रित होना, शयन।
संज्ञा
(सं. शयन)
उ.- (क) देखि सयन-गति त्रिभुवन कंपै, ईस बिरंचि मावै-१०-६५। (ख) छीरसमुद्र सयन संतत-३९२।

सयल
पर्वत, शैल।
संज्ञा
(सं. शैल)

सयल
सब,समस्त।
वि.
(सं. सकल)

सयान
चतुरता, चालाकी, सयानापन।
संज्ञा
(हिं. सयाना)
उ.- (क) ब्याकुल रिस तन देखि कै सब गयौ सयान-२२६९। (ख) देखौं सकल सयान तिहारो लीने छोरि फटके-३१०७।

सयान
समझदारी।
संज्ञा
(हिं. सयाना)
उ.- (क) तब लगि सबै सयान रहै-६४६। (ख) अब यह कौन सयान बहुरि ब्रज जा कारन उठि आए हो-२९८६।

सयान
सार, तत्व, बुद्धिमत्ता।
संज्ञा
(हिं. सयाना)
उ.- नाहिनैं कछु सयान ज्ञान में इह नीके हम जानैं-३२११।

सयान
बुद्धि, विवेक।
संज्ञा
(हिं. सयाना)
उ.- एतो बालक अजान देखो, उनके सयान कहा-२६०४।

सयानप, सयानपन
चालाकी, चतुरता।
संज्ञा
(हिं. सयाना, सयानपन)
उ.- तेरे तनक मान मोहन के सबै सयानप भूले-२-७५।

सयानप, सयानपन
समझदारी।
संज्ञा
(हिं. सयाना, सयानपन)
उ.- (क) बाँधन गए, बँधायौ आपुन, कौन सयानप कीन्हौ-८-१५। (ख) सूरदास बिरही क्यौं जीवै कौन सयानप एहू-३३८२।

सयाना
पूर्ण अवस्था का, वयस्क।
वि.
(सं. सज्ञान)

सयाना
चतुर, चालाक, बुद्धिमान।
वि.
(सं. सज्ञान)

सयाना
धूर्त।
वि.
(सं. सज्ञान)

सयानी
पूर्ण या परिपक्व अवस्था की, वयस्क।
वि.
(हिं. सयाना)
उ.- भली बुद्धि तेरैं जिय उपजी बड़ी बैस अब भई सयानी-३६८।

सयानी
चतुर, चालाक, बुद्धिमती।
वि.
(हिं. सयाना)
उ.- (क) औरनि सों दुराव जो करती तौ हम कहतीं भली सयानी-१२६२। (ख) तुम इह करति सबै वह जानति, हम सब तैं वह बड़ी सयानी-१२८४। (ग) जिनि सोचहु सुखमान सयानी-२८५३।

सयानी
चतुराई से भरी हुई।
वि.
(हिं. सयाना)
उ.- लोग सब कहत सयानी बातैं-२७१३।

सयाने, सयानैं
पूर्ण या परिपक्व अवस्था के, वयस्क।
वि.
(हिं. सयाने)
उ.- (क) द्वै बालक बैठारि सयाने, खेल रच्यौ ब्रज-खोरी-६०४। (ख) गोप-बालक कछु सयाने, नंद के सुत बाल-६१०। (ग) सूर स्याम अब होहु सयाने बैरिनि के मुख खेहु-१००४। (घ) रूठेहिं आदर देत सयाने, इहै सूरज सगाइए-१६८८।

सयाने, सयानैं
चतुर, बुद्धिमान।
वि.
(हिं. सयाने)
उ.- (क) जा जस कारन देत सयाने तन-मन-धन सब साजु-२८५१। (ख) सूर सपथ दै ऊधौ पूछो इहिं ब्रज कौन सयानै-३२१९।

सयानो, सयानौ
चतुर, बुद्धिमान।
वि.
(हिं. सयाना)
उ.- और काहि बिधि करौं तुमहिं तै कौन सयानौ-४९२।

सयानो, सयानौ
चतुरतापूर्ण, बुद्धिमानी का।
वि.
(हिं. सयाना)
उ.- कीजै कछु उपकार परायो यहै सयानो काज-२८५१।

सयान्यो, सयान्यौ
चतुरता, सयानापन।
संज्ञा
(हिं. सयाना)
उ.- चूक परी मोको सबही अँग कहा करौं गई भूलि सयान्यो-१४६०।

सरंजाम
कार्य की समाप्ति।
संज्ञा
(अ. सर + अंजाम)

सरंजाम
प्रबंध, व्यवस्था।
संज्ञा
(अ. सर + अंजाम)

सरंजाम
सामान।
संज्ञा
(अ. सर + अंजाम)

सर
ताल, तालाब, जलाशय।
संज्ञा
(सं. सरस्)
उ.- मानहु मकर सुधा-सर क्रीड़त-६४५।

सर
तीर, बाण।
संज्ञा
(सं. शर)
उ.- (क) सूरदास सर लग्यौ सचानहिं-१-९७। (ख) धर्म कहैं सर-सयन गंग-सुत तेतिक नाहिं सँतोष-१-२१५।

सर
बराबरी, समानता।
संज्ञा
(सं. सदृश)
उ.- (क) ब्रज-जुवती ब्रजजन ब्रजवासी कहत स्याम सर कौन करै-९८९। (ख) कहाँ स्याम की तुम अर्धागिनि, मैं तुम सर की नाहीं-२९३७।
मुहा.- (किसी का) सूर पूजना- (किसी की) बराबरी का सकना, (किसी के) समान हो सकना।

सर
सिर।
संज्ञा
(फ़ा.)

सर
सिरा।
संज्ञा
(फ़ा.)

सर
चरम सीमा।
संज्ञा
(फ़ा.)
मुहा.- सर (तक) पहुँचाना- ठिकाने, हद या चरम सीमा तक पहुँचाना।

सर
पराजित किया हुआ।
वि.

सर
बलपूर्वक दबाया हुआ।
वि.

सर
प्रभावित, अभिभूत।
वि.
मुहा.- सर करना- (१) वश में करना, दबाना। (२) खेल में हराना या पराजित करना।

सर
ऐसा अवसर जो कार्य-विशेष के उपयुक्त न हो।
संज्ञा
(सं. अवसर से अनु.)

सर
जब अवसर या अवकाश हो।
संज्ञा
(सं. अवसर से अनु.)
उ.- सेवा यहै नाम सर-अवसर जो काहुहिं कहि आयो-१-१९३।
मुहा.- सर-अवसर न जानना (देखना या समझना)-यह न सोचना कि अमुक कार्य के लिए कोई अवसर उपयुक्त या अनुकूल है या नहीं। सर-अवसर नहिं जान्यो- यह न समझा कि अमुक कार्य के लिए उपयुक्त या अनुकूल अवसर है या नहीं। उ.- नृप सिसुपाल महापद पायौ, सर-अवसर नहिं जान्यो।

सर
ʽसर-सरʼ की ध्वनि के साथ।
क्रि.वि
(अनु.)
उ.- साँटी दीन्हीं सर-सर-३७३।

सरई
(काम) हो सकता या चल सकता है, पूरा पड़ सकता है।
क्रि.अ.
(हिं. सरना)
उ.- आगैं बृच्छ फरै जो बिष-फर, बृच्छ बिना किन सरई-१०-४।

शुचि
निष्पाप, निर्दोष।
वि.
(सं.)

शुचि
स्वच्छ हृदयवाला।
वि.
(सं.)

शुचिता
पवित्रता, निर्मलता।
संज्ञा
(सं.)

शुद्ध
पवित्र।
वि.
(सं.)

शुद्ध
ठीक, सही।
वि.
(सं.)

शुद्ध
दोष-रहित, निर्दोष।
वि.
(सं.)
उ.- पुष्य नक्षत्र नौमि जु परम दिन लगन शुद्ध शुक्रवार- सारा. १६०।

शुद्ध
जिसमें किसी प्रकार की मिलावट न हो, खालिस।
वि.
(सं.)

शुद्धता
पवित्रता।
संज्ञा
(सं.)

शुद्धता
ठीक होने का भाव।
संज्ञा
(सं.)

शुद्धता
निर्दोषता।
संज्ञा
(सं.)

सरंकडा
ʽसरपतʼ की तरह की एक वनस्पति जिसकी छड़ें गाँठदार होती हैं।
संज्ञा
(सं. शरकांड)

सरक
ʽसरकनेʼ की क्रिया या भाव, चलना, खिसकना।
संज्ञा
(हिं. सरकना)

सरक
नशे की खुमारी।
संज्ञा
(हिं. सरकना)
उ.- बारंबार सरक मदिरा की अपरस रटत उधारे-२९९०।

सरक
मद्यपात्र।
संज्ञा
(हिं. सरकना)

सरक
यात्री-दल।
संज्ञा
(हिं. सरकना)

सरकना, सरकनो
खिसकना, किसी तरह हटना।
क्रि.अ.
(हिं. खिसकना या सं. सरण)

सरकना, सरकनो
नियत काल से आगे टल जाना।
क्रि.अ.
(हिं. खिसकना या सं. सरण)

सरकना, सरकनो
काम चलना, निर्वाह होना।
क्रि.अ.
(हिं. खिसकना या सं. सरण)

सरकश
नटखट, शरारती।
वि.
(फ़ा.)

सरकश
उद्दंड।
वि.
(फ़ा.)

सरकश
शासन या नियंत्रण न मननेवाला।
वि.
(फ़ा.)

सरकार
स्वामी।
संज्ञा
(फ़ा.)

सरकार
शासनसता।
संज्ञा
(फ़ा.)

सरकारी
स्वामी का।
वि.
(फ़ा.)

सरकारी
शासन का।
वि.
(फ़ा.)

सरकि
किसी ओर को खिसक या हटकर।
क्रि.अ.
(हिं. सरकना)

सरकि
सरकि रही- एक ओर को खिसक या हट रही है।
प्र.
उ.- सूरदास मदन दहत पिय प्यारी सुनि ज्यों क्यों कहयो, त्यों त्यों बरू उतकों सरकि रही-२२३६।

सरक्क
मस्त, मत्त।
वि.
(हिं. सरक)

सरखत
वह कागज जिस पर किराये, लेनदेन आदि की शर्तें लिखी हों।
संज्ञा
(फ़ा. सरखत़)

सरग
स्वर्ग।
संज्ञा
(सं. स्वर्ग)
उ.- मोकौं पंथ बतायौ सोई नरक की सरग लहौं-१-१५१।

सरग
सुखदायी स्थान।
संज्ञा
(सं. स्वर्ग)

सरग
सुख-शांतिपूर्ण परिवार।
संज्ञा
(सं. स्वर्ग)

सरगतिया, सरगतीय
अप्सरा।
संज्ञा
(सं. स्वर्ग + हिं. त्रिया)

सरगतिया, सरगतीय
देवांगना।
संज्ञा
(सं. स्वर्ग + हिं. त्रिया)

सरगना
डींग हाँकना।
क्रि.अ.
(देश.)

सरगना
सरदार, अगुवा।
संज्ञा
(फ़ा. सरग़ना)

सरगम
संगीत में सात स्वरों का समूह या उनके चढ़ाव-उतार का क्रम।
संज्ञा
(हिं. स रे ग म)

सरगर्म
जोशीला।
वि.
(फ़ा.)

सरगर्म
उत्साही।
वि.
(फ़ा.)

सरगर्मी
जोश।
संज्ञा
(फ़ा.)

सरगर्मी
उत्साह।
संज्ञा
(फ़ा.)

सर-घर
तरकश।
संज्ञा
(सं. शर = तीर + हिं. घर)

सरघा
मधुमक्खी।
संज्ञा
(सं.)

सरज
कमल।
संज्ञा
(सं. सर + ज)
उ.- प्रफुलित सरज सरोवर सुंदर-२८५३।

सरजना, सरजनो
रचना, बनाना।
क्रि.स.
(हिं. सिरजना)

सरजना, सरजनो
उत्पन्न या तैयार करना।
क्रि.स.
(हिं. सिरजना)

सरजना, सरजनो
बनना, रचा जाना।
क्रि.अ.

सरजना, सरजनो
उत्पन्न होना।
क्रि.अ.

सरजा
सरदार।
संज्ञा
(फ़ा. सरजाह या अ. शरजः)

सरजा
शेर, सिंह।
संज्ञा
(फ़ा. सरजाह या अ. शरजः)

सरजा
शिवाजी का एक नाम।
संज्ञा
(फ़ा. सरजाह या अ. शरजः)

सरजिव
जीवित।
वि.
(सं. सजीव)

सरजिव
ओजपूर्ण।
वि.
(सं. सजीव)

सरजिव
प्रभावशाली।
वि.
(सं. सजीव)

सरजिव
सशक्त।
वि.
(सं. सजीव)

सरजी
बनी (हैं), रची गयी (हैं)।
क्रि.अ.
(हिं. सरजना)
उ.- बिरह सहन को हम सरजी है।

सरजीवन
जिलाने या जीवन-शक्ति देनेवाला।
वि.
(सं. संजीवन)

सरजीवन
हरा-भरा, ताजा।
वि.
(सं. संजीवन)

सरजीवन
उपजाऊ, उर्वर।
वि.
(सं. संजीवन)

सरजीवन
प्रसन्न या प्रफुल्ल करनेवाला।
वि.
(सं. संजीवन)

सरजीवन
संजीवनी (बूटी)।
संज्ञा

सरजोर
बलवान।
वि.
(फ़ा. सरजोर)

सरजोर
जबरदस्त, प्रबल।
वि.
(फ़ा. सरजोर)

सरजोर
उद्दंड।
वि.
(फ़ा. सरजोर)

सरजोर
विद्रोही।
वि.
(फ़ा. सरजोर)

सरजोरी
जबरदस्ती, प्रबलता।
संज्ञा
(हिं. सरजोर)

सरजोरी
उद्दंता।
संज्ञा
(हिं. सरजोर)

सरजोरी
विद्रोह।
संज्ञा
(हिं. सरजोर)

सरट
छिपकली।
संज्ञा
(सं.)

सरट
गिरगिट।
संज्ञा
(सं.)

सरदार
शासक।
संज्ञा
(फ़ा.)

सरदार
रईस, अमीर।
संज्ञा
(फ़ा.)

सरदारी
नायक या प्रधान का पद, कार्य का भाव।
संज्ञा
(हिं. सरदार)

सरदियाना, सरदियानो
सरदी से ठंडा हो जाना।
क्रि.अ.
(हिं. सरदी)

सरदियाना, सरदियानो
आवेश शांत होना।
क्रि.अ.
(हिं. सरदी)

सरदी
ठंढक।
संज्ञा
(फ़ा. सर्दी)

सरदी
जाड़ा।
संज्ञा
(फ़ा. सर्दी)

सर-धन
तरकश।
संज्ञा
(सं. शर+हिं. धरना)

सरधा
श्रद्धा।
संज्ञा
(सं. श्रद्धा)

सरन
रक्षा, आश्रय।
संज्ञा
(सं. शरण)
उ.- (क) इहिं कलिकाल-ब्याल-मुख ग्रासित सूर सरन उबरै-१-११७। (ख) सरन आए की प्रभु लाज धरिए-१-१८०। (ग) पटपटात टूटत अँग जान्यौ सरन-सरन सु पुकारयौ-५५६।

सरण
सरकना, खिसकना।
संज्ञा
(सं.)

सरणी
रास्ता, मार्ग।
संज्ञा
(सं.)

सरणी
ढर्राढंग।
संज्ञा
(सं.)

सरणी
पगडंडी।
संज्ञा
(सं.)

सरणी
लकीर, रेखा।
संज्ञा
(सं.)

सरत
(काम बनता या चलता है।
क्रि.अ.
(हिं. सरना)
उ.- इहिं बिधि भ्रमत सकल निसि दिन गत कछु न काज सरत-१-५५।

सरता बरता
बँटाई।
संज्ञा
(हिं. बरतना + अनु. सरतना)
मुहा.- सरता बरता करना - किसी तरह आपस में ही बाँट-बँटाई करके काम चला लेना।

सर-ताज
मुकुट।
संज्ञा
(हिं. सिरताज)

सर-ताज
शिरोमणि।
संज्ञा
(हिं. सिरताज)

सर-ताज
सरदार, नायक।
संज्ञा
(हिं. सिरताज)

सर-ताज
स्वामी।
संज्ञा
(हिं. सिरताज)

सरद
शीतल।
वि.
(फ़ा. सर्द)

सरद
सुस्त।
वि.
(फ़ा. सर्द)

सरद
शरद ऋृतु।
संज्ञा
(हिं. शरद)
उ.- ब्रज प्राची राका तिथि जसुमति, सरद सरस रितु नंद-१३३१।

सरदई
ʽसरवाʼ फल के, हलका हरापन लिए हुए, पीले रंग का।
वि.
(हिं. सरदा)

सरदई
हल्का हरापन लिये पीला रंग।
संज्ञा

सर-दर
एक सिरे से।
क्रि.वि.
(फ़ा. सर+दर=भाव)

सर-दर
सब मिलाकर औसत में।
क्रि.वि.
(फ़ा. सर+दर=भाव)

सरदा
एक तरह का खरबूजा।
संज्ञा
(फ़ा. सर्दः)

सरदार
नायक, अगुआ।
संज्ञा
(फ़ा.)
उ.- तुम अपने चित सोचत जा को असुरन के सरदार-२३-७७।

सरनगत
शरण में आया हआ।
वि.
(सं. शरणागत)

सरनगत
सरनगत भऐं- शरण में जानेपर।
प्र.
उ.- सूरदास गोपाल सरनगत भऐं न कौ गति पावत-१-१८१।

सरना, सरनो
सरकना, खिसकना।
क्रि.अ.
(सं. शरण)

सरना, सरनो
हिलना-डोलना।
क्रि.अ.
(सं. शरण)

सरना, सरनो
काम चलना, उद्देश्य सिद्ध होना, पूरा पड़ना।
क्रि.अ.
(सं. शरण)

सरना, सरनो
किसी के काम या उपयोग में आना।
क्रि.अ.
(सं. शरण)

सरना, सरनो
किया जाना, निबटना, संपादित होना।
क्रि.अ.
(सं. शरण)

सरना, सरनो
निभना, पटना, परस्पर सद्भाव या प्रेम-भाव रहना।
क्रि.अ.
(सं. शरण)

सरनाई
आश्रय, रक्षा।
संज्ञा
(सं. शरण)
उ.- (क) सूर कुटिल राखौ सरनाई-१-२०१। (ख) इतनी कृपा करी नहिं काहू, जिनि राखे सरनाई-५५७।

सरनाई
आश्रय या रक्षा में लेनेवाले, शरण में रखनेवाले।
वि.
उ.- नमस्कार करि बिनय सुनाई, राखि राखि असरन-सरनाई-६-५।

शुक्रवार
वृहस्पतिवार और शनिवार के बीच का दिन या वार।
संज्ञा
(सं.)

शुक्रचार्य
एक ऋषि जो महर्षि भुगु के पुत्र और दैत्यों के गुरू थे। उनकी पुत्री देवयानी राजा ययाति को ब्याही थी। उन्होंने देवगुरू वृहस्पति-पुत्र कच को संजीवनी विद्या सिखायी थी।
संज्ञा
(सं. शुक्राचार्य्य)

शुक्रिया
धन्यवाद।
संज्ञा
(फ़ा.)

शुक्ल
सफेद, उजला, धवल।
वि.
(सं.)

शुक्ल
ब्राह्मणों की एक पदवी।
संज्ञा

शुक्ल
उजला पाख या पक्ष।
संज्ञा

शुक्ल पक्ष
अमावास्या के बाद प्रतिपदा से पूर्णिमा तक का पक्ष जिसमें प्रतिदिन चंद्रकला के बढ़ते रहने से रात उजेली होती है।
संज्ञा
(सं.)

शुक्लाभिसारिका
वह परकीया नायिका जो शुक्ल पक्ष या चाँदनी रात में प्रियतम से मिलने संकेतस्थल पर जाती है।
संज्ञा
(सं.)

शुचि
शुद्ध, पवित्र।
वि.
(सं.)
उ.- माली मिल्यो माल शुचि लैकै-२६४३।

शुचि
स्वच्छ, निर्मल।
वि.
(सं.)

सरनागत
शरण में आया हुआ।
वि.
(सं. शरणागत)
उ.- (क) सरनागत की ताप निवारी-१-१२८। (ख) अर्जुन कहयौ, जानि सरनागत, कृपा करौ ज्यौं पूर्व करी-१-२६८।

सरनाम
प्रसिद्ध, विख्यात।
वि.
(फ़ा.)

सरनी
ढंग, रीति।
संज्ञा
(सं. सरणी)
उ.- (क) ब्रज-जुवती सब देखि थकित भई सुन्दरता की सरनी-१०-१२३।

सरनी
रास्ता, पगडंडी, मार्ग।
संज्ञा
(सं. सरणी)

सरनी
लकीर, लीक, रेखा।
संज्ञा
(सं. सरणी)

सरनैं
शरण में।
संज्ञा
(सं. शरण)
उ.- बलि सुरपति कौं बहु दुख दयौ, तब सुरपति हरि-सरनैं गयौ-८-७।

सरपंच
पंचों में प्रधान, पंचायत का सभापति।
संज्ञा
(फ़ा. सर+हिं. पंच)

सरपंजर, सरपँजरा, सरपिंजरो, सरपिंजरौ
बाणों का बना हुआ घेरा।
संज्ञा
(सं. शर+ हिं. पिंजरा)
उ.- अर्जुन तब सर-पिंजर कियौ। पवन सँचार रहन नहिं दियौ-ना. ४३०९।

सरप
साँप।
संज्ञा
(सं. सर्प)

सरपट
घोड़े की तेज चाल की तरह दोड़ते हुए।
क्रि.वि.
(सं. सर्पण)

सरपत
एक तरह की घास जिससे छप्पर आदि छाये जाते हैं।
संज्ञा
(सं. सरपत्र)

सरपना, सरपनो
सरकना, खिसकना।
क्रि.अ.
(सं. सर्पण)

सरपना, सरपनो
धीरे-धीरे आगे बढ़ना।
क्रि.अ.
(सं. सर्पण)

सरपरस्त
रक्षक।
वि.
(फ़ा.)

सरपरस्त
अभिभावक।
वि.
(फ़ा.)

सरपरस्ती
रक्षा।
संज्ञा
(फ़ा.)

सरपरस्ती
अभिभावकता।
संज्ञा
(फ़ा.)

सरपेच
पगड़ी के ऊपर की कलगी।
संज्ञा
(फ़ा.)

सरफराना, सरफरानो
घबराना।
क्रि.अ.
(अनु.)

सरबंगी
सर्वज्ञ।
वि.
(सं. सर्वज्ञ)
उ.- सूधी कहै सबन समुझावत हे साँचे सरबंगी-२९९७।

सरबरि, सरबरी
बराबरी, समानता।
संज्ञा
(हिं. सर-बर)
उ.- (क) ताकी सरबरि करै सो झूठौ, जाहि गोपाल बड़ौ करै-१-०३४। (ख) जब लगि जिय घटअंतर मेरैं कौ सरबरि करि पावै-१-२७५। (ग) खगपति सौं सरबरि करी तू-५८९।

सरबरि, सरबरी
बराबर, समान।
वि.
उ.- दिननि हमहूँ तुम सरबरी, तुव छवि अधिकाई-पृ. ३१७ (६१)

सरबरि, सरबरी
रात, रात्रि।
संज्ञा
(सं. शर्वरी)

सरबस
सारी संपत्ति और जमा-पूँजी, सब कुछ।
संज्ञा
(सं. सर्वस्व)
उ.- (क) सिव कौ धन संतनि कौ सरबस, महिमा बेद-पुरान बखानत-१-११४। (ख) सरबस लै हरि धरयौ सबनि कौ-६५४।

सरबोर
तरबतर, खूब तर।
वि.
(हिं. सराबोर)

सरभ
पशु (हाथी, शेर, ऊँट, बानर आदि)।
संज्ञा
(सं. शरभ)

सरभ
टिड्डी।
संज्ञा
(सं. शरभ)

सरम
हया, लाज।
संज्ञा
(हिं. शरम)
उ.- (क) सूर सुहरि अब मिलहु कृपा करि बरबस सरम करत हठ हम सन-१६८७। (ख) रिसन उठी भहराइ झटकि भुज छवत कहा पिय सरम नहीं-२१४२।

सरमा
देवताओं की एक कुतिया जिसका उल्लेख ऋग्वेद में है।
संज्ञा
(सं.)

सरमा
कुतिया।
संज्ञा
(सं.)

सरबंधी
तीरदाज, धनुर्धर।
वि.
(सं. शरबंध)

सरबंधी
संबंधी।
संज्ञा
(सं.सम्बन्धी)

सरब
सब।
वि.
(सं. सर्व)

सरब
पूरा।
वि.
(सं. सर्व)

सरबज्ञ
सब कुछ का ज्ञाता।
वि.
(सं. सर्वज्ञ)
उ.- (क) तुम सरबज्ञ सबै बिधि समरथ असरन-सरन मुरारि-१-१११। (ख) सूर स्याम सरबज्ञ कृपानिधि-१-१२१।

सरबर
बराबरी, समानता।
संज्ञा
(हिं. सर+अनु. बर)
उ.- (क) सेवक करै स्वामि सों सरबर इनि बातनि पति जाइ-९८५। (ख) मूरख, उन तुम सरबर करै-१० उ.-३२।

सरबर
बराबर, समान।
वि.

सरबर
व्यर्थ की या बहुत बढ़-चढ़कर की जानेवाली बात।
संज्ञा
(अनु.)

सरबरन
समान, तुल्य।
वि.
(हिं. सरबर)
उ.- कृष्न-पद-मकरंद पावन और नहिं सरबरन-१-३०८।

सरबरना, सरबरनो
(किसी की) बराबरी या समता करना।
क्रि.अ.
(हिं. सरबर)

सरमाइ
लजाता या लजाती है।
क्रि.अ.
(हिं. शरमाना)
उ.- (क) नासिका सुक नयन खंजन कहत कवि सरमाइ-१२९४। (ख) उरज परसत स्याम सुन्दर नागरी सरमाइ-१८४९।

सरमाई
लज्जित हुआ या हुई।
क्रि.अ.
(हिं. शरमाना)

सरमाई
गए सरमाई-लज्जित हो गये।
प्र.
(हिं. शरमाना)
उ.- यह सुनि अमर गए सरमाई-१०६५।

सरमात
लजाता या लज्जित होता है।
क्रि.अ.
(हिं. शरमाना)
उ.- तुम तौ अति ही करत बड़ाई, मन मेरो सरमात-१४२४।

सरमाना
लज्जित होना।
क्रि.अ.
(हिं. शरमाना)

सरमानी
लज्जित हुई।
क्रि.अ.
(हिं. शरमाना)
उ.- बेसरि नाउँ लेत सरमानी तब राधा झहरानी-१५३४।

सरमाने
लज्जित हुए।
क्रि.अ.
(हिं. शरमाना)
उ.- हम तौ आज बहुत सरमाने मुरली टेरि बजायो-१७००।

सरमानो
लज्जित होना।
क्रि.अ.
(हिं. शरमाना)

सरमाया
पूँजी, संपत्ति।
संज्ञा
(फ़ा. शरमायः)

सरमिष्ठा
दानवराज वृषपर्वा की पुत्री जो दानव-गुरू शुक्राचार्य की पुत्री देवायानी की प्रसन्नता के लिए उसकी दासी बनकर राजा ययाति के यहाँ गयी थी और राजा से जिसके तीन पुत्र उत्पन्न हुए थे।
संज्ञा
(सं. शर्मिष्ठा)
उ.- कहयौ, सरमिष्ठा, सुत कहँ पाए ? उनि कहयौ, रिषि किरपा तैं जाए-९-१७४।

सरवर, सरवरि, सरवरी
स्पर्धा, होड़।
संज्ञा
(सं. सदृश, प्रा. सरिस+वर)

सरवरिया
सरयूपार का।
वि.
(हिं. सरवार)

सरवरिया
सरयूपारी (व्यक्ति)।
संज्ञा

सरवांक, सरवाक
डिबिया।
संज्ञा
(सं. शरावक)

सरवांक, सरवाक
प्याला, कटोरी।
संज्ञा
(सं. शरावक)

सरवांक, सरवाक
सकोरा।
संज्ञा
(सं. शरावक)

सरवान
तंबू।
संज्ञा
(देश.)

सरवान
झंडा।
संज्ञा
(देश.)

सरवार
सरयू नदी के उस पार का प्रदेश।
संज्ञा
(सं. सरयू+पार)

सरस
सरोवर।
संज्ञा
(सं. सरस)

सरमैहौ
लज्जित होगे, शरमाओगे।
क्रि.अ.
(हिं. शरमाना)
उ.- सूर स्याम राधा की महिमा रहै जानि सरमैहौ-१४९८।

सरयू
उत्तर भारत की एक प्रसिद्ध नदी जिसका नाम ऋग्वेद में हैं और जिसके किनारे पर प्राचीन अयोध्या नगरी बसी थी।
संज्ञा
(सं.)

सररात
वेग से हवा चलती है।
क्रि.अ.
(हिं. सरराना)
उ.- घटा घनधोर घहरात अररात दररात सररात ब्रज लोग डरपे-९४६।

सरराना, सररानो
वेग से हवा। बहने या उसमें किसी चीज के वेग से चलने का शब्द होना।
क्रि.अ.
(अनु. सर सर)

सरल
जो टेढ़ा न हो, सीधा।
वि.
(सं.)

सरल
सीधा-सादा, भोलाभाला।
वि.
(सं.)

सरल
सहज, सुगम।
वि.
(सं.)

सरलता
सीधापन।
संज्ञा
(सं.)

सरलता
सिधाई, भोलापन।
संज्ञा
(सं.)

सरलता
सहजता, सुगमता।
संज्ञा
(सं.)

सरवंग
संपूर्ण शरीर।
संज्ञा
(सं. सर्वांग)

सरवंग
किसी चीज, काम या बात के सब भाग या अंग।
संज्ञा
(सं. सर्वांग)

सरवंग
सब प्रकार से।
क्रि.वि.

सरवन
अंधक मुनि का पुत्र जो माता-पिता को बहँगी में बिठाकर तीर्थ-यात्रा कराने के कारण अपनी मातृ-पितृ-भक्ति के लिए प्रसिद्ध है।
संज्ञा
(सं. श्रमण)

सरवन
मात-पितृ-भक्त पुत्र।
संज्ञा
(सं. श्रमण)

सरवन
श्रमण।
संज्ञा
(सं. श्रमण)

सरवन
मातृ-पितृ-भक्त (पुत्र)।
वि.

सरवन
कान।
संज्ञा
(सं. श्रवण)

सरवर
तालाब, जलाशय।
संज्ञा
(सं. सरोवर)
उ.- (क) सरवर नीर भरै, भरि उमड़ै-१-२६५। (ख) मानौं चारि हंस सरवर तैं बैठे आइ सदेहियाँ-९-१९।

सरवर, सरवरि, सरवरी
बराबरी, समानता।
संज्ञा
(सं. सदृश, प्रा. सरिस+वर)
उ.- सूरदास हयाँ की सरवरि नहिं कप्लबृच्छ सुरधेनु-४९१।

सरस
रसीला, रसयुक्त।
वि.
(सं.)

सरस
गीला, तर।
वि.
(सं.)
उ.- (क) ह्वै गयौ सरस समीर दुहूँ दिसि-९५७। (ख) सरस बसन तन पोंछि स्याम को-१०-२२६।

सरस
हरा-भरा और ताजा।
वि.
(सं.)

सरस
सुंन्दर, मनोहर।
वि.
(सं.)
उ.- (क) संबत सरस बिभावन-१०-८६। (ख) ब्रजप्राची राकातिथि जसुमति सरद सरस रितु नंद-१३३१। (ग) स्यामा निसि में सरस बनी री-१५९९।

सरस
मीठा, मधुर।
वि.
(सं.)

सरस
जिसमें भाव जगाने की शक्ति हो, भावपूर्ण।
वि.
(सं.)

सरस
रसिक, भावुक, सहृदय।
वि.
(सं.)

सरसई
शारदा, भारती।
संज्ञा
(सं. सरस्वती)

सरसई
सरसता, रसपूर्णता।
संज्ञा
(सं. सरस)

सरसई
हरापन, ताजापन।
संज्ञा
(सं. सरस)

सरसई
फलों के सरसों बराबर छोटे दाने या अंकुर जो पहले दिखायी देते हैं।
संज्ञा
(हिं. सरसों)

सरसता
‘सरस’ होने का भाव।
संज्ञा
(सं.)

सरसता
रसीलापन।
संज्ञा
(सं.)

सरसता
रसिकता।
संज्ञा
(सं.)

सरसता
सुंन्दरता।
संज्ञा
(सं.)

सरसता
मधुरता।
संज्ञा
(सं.)

सरसता
भावपूर्णता।
संज्ञा
(सं.)

सरसना, सरसनो
हरा होना, पनपना।
क्रि.अ.
(सं. सरस)

सरसना, सरसनो
बढ़ना, वृद्धि या उन्नति को प्राप्त होना।
क्रि.अ.
(सं. सरस)

सरसना, सरसनो
सोहना, शोभित होना।
क्रि.अ.
(सं. सरस)

शुद्धांत
रनिवास, अन्तःपुर।
संज्ञा
(सं.)

शुद्धि
शुद्ध होने का कार्य।
संज्ञा
(सं.)

शुद्धि
सफाई, स्वच्छता।
संज्ञा
(सं.)
उ.- .... नारि आतुरी गई वन तीर तनु शुद्धि हेती-२०५६।

शुद्धि
वह कृत्य जो अशुभ व्यक्ति को शुद्ध करने के लिए किया जाता है।
संज्ञा
(सं.)

शुद्धोदन
एक शाक्य राजा जो गौतम बुद्ध के पिता थे।
संज्ञा
(सं.)

शुबहा
संदेह।
संज्ञा
(अ.)

शुबहा
भ्रम।
संज्ञा
(अ.)

शुभंकर
कल्याण करनेवाला।
वि.
(सं.)

शुभ
अच्छा।
वि.
(सं.)

शुभ
कल्याणकारी।
वि.
(सं.)

सरसना, सरसनो
रसपूर्ण होना।
क्रि.अ.
(सं. सरस)

सरसना, सरसनो
कोमल भाव की उमंग में भरना।
क्रि.अ.
(सं. सरस)

सरसब्ज
हरा-भरा, लहलहाता हुआ।
वि.
(फ़ा. सरसब्ज)

सरसब्ज
जहाँ हरियाली हो।
वि.
(फ़ा. सरसब्ज)

सरसब्ज
जहाँ सुख हो।
वि.
(फ़ा. सरसब्ज)

सर-सर
जमीन पर (सर्प-जैसी) रेंगने की ध्वनि।
संज्ञा
(अनु.)

सर-सर
हवा के चलने से उत्पन्न ध्वनि।
संज्ञा
(अनु.)

सर-सर
‘सर-सर’ की ध्वनि के साथ।
क्रि.वि.
उ.- साँटी दीन्हीं सर-सर-३७३।

सरसराना, सरसरानो
सर-सर की ध्वनि होना।
क्रि.अ.
(अनु. सर सर)

सरसराना, सरसरानो
वायु का सर-सर ध्वनि करते हुए बहना।
क्रि.अ.
(अनु. सर सर)

सरसराना, सरसरानो
(सर्प जैसे) कीड़े का तेजी से चलना।
क्रि.अ.
(अनु. सर सर)

सरसराना, सरसरानो
जल्दी-जल्दी कोई काम होना।
क्रि.अ.
(अनु. सर सर)

सरसराहट
(साँप आदि के) रेंगने की ध्वनि।
संज्ञा
(हिं. सरसर+आहट)

सरसराहट
तेजी से हवा के चलने का शब्द।
संज्ञा
(हिं. सरसर+आहट)

सरसराहट
शरीर पर रेंगने-जैसा अनुभव, सुर-सुराहट।
संज्ञा
(हिं. सरसर+आहट)

सरसरी
जो (दृष्टि) जमी हुई या एकाग्र न हो, जो जल्दी की हो।
वि.
(फ़ा. सरासरी)

सरसरी
मोटे तौर पर, स्थूल रूप से।
क्रि.वि.

सरसाई
सरसता।
संज्ञा
(हिं. सरस)

सरसाई
शोभा, सुंदरता।
संज्ञा
(हिं. सरस)

सरसाई
अधिकता।
संज्ञा
(हिं. सरस)

सरसाई
हरी-भरी, ताजी।
वि.

सरसाई
शोभित हुई।
क्रि.अ.
(हिं. सरसाना)

सरसाना, सरसानो
रस से पूर्ण या युक्त करना।
क्रि.स.
(हिं. सरसाना)

सरसाना, सरसानो
हरा-भरा करना।
क्रि.स.
(हिं. सरसाना)

सरसाना, सरसानो
हरा-भरा होना।
क्रि.अ.

सरसाना, सरसानो
बढ़ना।
क्रि.अ.

सरसाना, सरसानो
सोहना, शोभित होना।
क्रि.अ.

सरसाना, सरसानो
रसपूर्ण होना।
क्रि.अ.

सरसाना, सरसानो
भाव की उमंग में भरना।
क्रि.अ.

सरसाम
सन्निपात (रोग)।
संज्ञा
(फ़ा.)

सरसार
मग्न।
वि.
(फ़ा. सरशार)

सरसार
चूर।
वि.
(फ़ा. सरशार)

सरसिक
सारस पक्षी।
संज्ञा
(सं. सरसीक)

सरसिका
छोटा तालाब, बावली।
संज्ञा
(सं.)

सरसिज
वह जो ताल से उत्पन्न होता हो।
संज्ञा
(सं.)

सरसिज
कमल।
संज्ञा
(सं.)

सरसिजनैनी
जिसके नेत्र कमल (के समान सुन्दर) हों।
वि.
(सं. सरसिज+हिं. नयनी)
उ.- जा जल सुद्ध निरखि सनमुख ह्वै, सुंदरि सरसजिनैनी-९-११।

सरसिजयोनि
(कमन से उत्पन्न) ब्रह्मा।
संज्ञा
(सं.)

सरसिरुह
(सर से उत्पन्न) कमल।
संज्ञा
(सं.)

सरसी
छोटा ताल या सरोवर।
संज्ञा
(सं.)

सरसी
बावली।
संज्ञा
(सं.)

सरसी
एक वर्णवृत्त।
संज्ञा
(सं.)

सरसीक
सारस पक्षी।
संज्ञा
(सं.)

सरसीरुह
(सर से उत्पन्न) कमल।
संज्ञा
(सं.)

सरसेटना, सरसेटनो
भला-बुरा कहना।
क्रि.स.
(अनु.)

सरसों, सरसौं
एक धान्य या पौधा जिसके छोटे-छोटे बीजों से तेल निकलता है और पत्तों का साग बनता है।
संज्ञा
(सं. सर्षय)
उ.- (क) सरसौं मेथी सोवा पालक-३९६। (ख) सोवा अरू सरसों सरसाई-२३२१।

सरसौंहा
सरस करनेवाला।
वि.
(हिं. सरस)

सरस्वति, सरस्वती
एक प्राचीन नदी जिसकी क्षीण धारा कुरूक्षेत्र में अब भी है।
संज्ञा
(सं. सरस्वती)
उ.- आजु सरस्वति-तट रहौ सोइ-१-२८९।

सरस्वति, सरस्वती
विद्या।
संज्ञा
(सं. सरस्वती)

सरस्वति, सरस्वती
विद्या की देवी, भारती, शारदा।
संज्ञा
(सं. सरस्वती)
उ.- मनहुँ सरस्वति संग उभय दुज कल मराल अरू नील कठीर-१०-१६१।

सरस्वती-पूजा
सरस्वती का एक उत्सव जो कहीं वसंत-पंचमी को और कहीं-कहीं आश्विन में होता है।
संज्ञा
(सं.)

सरहंग
सिपाही।
संज्ञा
(फ़ा.)

सरहंग
सेनानायक।
संज्ञा
(फ़ा.)

सरहंगी
सिपाहीगीरी।
संज्ञा
(फ़ा.)

सरहंगी
वीरता।
संज्ञा
(फ़ा.)

सरह
पतिंगा।
संज्ञा
(सं. शलभ, प्रा. सरह)

सरह
‘टिड्डी’ नामक कीड़ा।
संज्ञा
(सं. शलभ, प्रा. सरह)

सरहज
साले की पत्नी।
संज्ञा
(सं. श्यालजाया)

सरहथ
एक हथियार जिससे मछली का शिकार किया जाता है।
संज्ञा
(सं. शर या शल्य+हिं. हाथ)

सरहद
सीमा।
संज्ञा
(फ़ा. सर+अ. हद)

सरहद
चौहद्दी की रेखा।
संज्ञा
(फ़ा. सर+अ. हद)

सरहद
सीमा की भूमि, सिवान।
संज्ञा
(फ़ा. सर+अ. हद)

सरहरा
चिकना।
वि.
(सं. सरण)

सरा
चिता।
संज्ञा
(सं. शर)

सरा
बाण, तीर।
संज्ञा

सरा
सराय।
संज्ञा
(हिं. सराय)

सराई
सलाई, सलाका।
संज्ञा
(हिं. सलाई)

सराई
सकोरा।
संज्ञा
(सं. शराव)

सराख
छड़, सलाख।
संज्ञा
(हिं. सलाख)

सराजाम
सामग्री।
संज्ञा
(फ़ा. सरअंजाम)

सराफी
सराफ का काम।
संज्ञा
(हिं. सराफ)

सराफी
महाजनी या मुंडालिपि।
संज्ञा
(हिं. सराफ)

सराब
मदिरा।
संज्ञा
(अ. शराब)

सराबोर
बहुत भौगा हुआ।
वि.
(सं. स्त्राव+हिं. बोर)

सराय
मुसाफिरखाना।
संज्ञा
(फ़ा.)
मुहा.- सराय का कुत्ता- मतलबी यार-दोस्त। सराय की भठियारी (भठियारिन) - लड़ाका और निर्लज्ज स्त्री।

सरायो, सरायौ
(काम) कराया या निकाला।
क्रि.स.
(हिं. सराना)
उ.- पुरूष भँवर दिन चार आपने अपनो चाउ सरायौ-१६५८।

सराव
शराब पीने का प्याला, मद्यपात्र।
संज्ञा
(सं. शराव)

सराव
सकोरा, कटोरा।
संज्ञा
(सं. शराव)

सराव
दीया।
संज्ञा
(सं. शराव)

सराव
आरती के ऊपर का दीपक जिसमें घी भरा जाता है।
संज्ञा
(सं. शराव)
उ.- हरि जू की आरती बनी।¨¨¨। मही सराव सप्त सागर घृत बाती सैल घनी-२-२८।

सराध
श्राद्ध।
संज्ञा
(सं. श्राद्ध)
उ.- जज्ञ-सराध न कोऊ करै-१-२३०।

सराना, सरानो
काम पूरा करना।
क्रि.स.
(हिं. सारना)

सराना, सरानो
काम पूरा करना।
क्रि.स.
(हिं. सारना)

सराप
शाप।
संज्ञा
(सं. शाप)
उ.- (क) जय अरू बिजय कर्म कह कीन्हौं, ब्रह्म सराप दिवायौ-१०४। (ख) सत्यवती सराप-भय मान, रिषि कौ बचन कियौ परमान-१-२२९।

सरापना, सरापनो
शाप देना, कोसना।
क्रि.स.
(सं. शाप)

सरापना, सरापनो
गाली देना।
क्रि.स.
(सं. शाप)

सरापै
शाप दे।
क्रि.स.
(हिं. सरापना)
उ.- मति माता करि कोप सरापै, नहिं दानव ठग मति कौ-९-८४।

सराफ
सोने-चाँदी का व्यापारी।
संज्ञा
(अ. सर्राफ़)

सराफ
बट्टा काटकर रूपये भुना देनेवाले दूकानदार।
संज्ञा
(अ. सर्राफ़)

सराफा
सराफों का बाजार।
संज्ञा
(हिं. सराफ)

सरावग, सरावगी
जैन।
संज्ञा
(सं. श्रावक)

सरासन
धनुष।
संज्ञा
(सं. शरासन)
उ.- (क) मनौ सरास धरे कर स्मर भौंह चढ़ै सर बरषै री-१०-१३७। (ख) मानौ सूर सकात सरासन, उड़ीबै कौं अकुलात-३९६।

सरासर
पूरा-पूरा।
अव्य.
(फ़ा.)

सरासर
प्रत्यक्ष।
अव्य.
(फ़ा.)

सराह
बड़ाई, प्रशंसा।
संज्ञा
(हिं. सराहना)

सराहत
बड़ाई या प्रशंसा करता है।
क्रि.स.
(हिं. सराहना)
उ.- ग्वालनि कर तैं कौर छुड़ावत मुख लै मेलि सराहत गात-४६६।

सराहती
बड़ाई या प्रशंसा करती।
क्रि.स.
(हिं. सराहना)
उ.- उन विपदनि कुंचित जो करते कछुअन जीव सराहती-३२४७।

सराहना
बड़ाई करना।
क्रि.स.
(सं. शलाघन्)

सराहना
तारीफ, बड़ाई, प्रशंसा।
संज्ञा

सराहनीय
बड़ाई या प्रशंसा योग्य।
वि.
(हिं. सराहना)

शुभ
मंगल, कल्याण।
संज्ञा

शुभचिंतक
कल्याण चाहनेवाला।
वि.
(सं.)

शुभ्र
सफेद, उजला, श्वेत।
वि.
(सं.)

शुमार
गिनती, गणना
संज्ञा
(फ़ा.)

शुमार
हिसाब।
संज्ञा
(फ़ा.)

शुरू
आरंभ।
संज्ञा
(अ. शरुअ)

शुल्क
कर।
संज्ञा
(सं.)

शुल्क
दहेज, दायजा।
संज्ञा
(सं.)

शुल्क
किराया।
संज्ञा
(सं.)

शुल्क
मूल्य।
संज्ञा
(सं.)

सराहनीय
अच्छा, बढ़िया।
वि.
(हिं. सराहना)

सराहनो
बड़ाई करना।
क्रि.स.
(सं. श्लाघन्)

सराहि
बड़ाई करके, अच्छा बताकर।
क्रि.स.
(हिं. सराहना)
उ.- बारंबार सराहि सूर प्रभु साग बिदुर घर खाहीं-१-२४१।

सराहों, सराहौं
तारीफ या बड़ाई करती हूँ।
क्रि.स.
(हिं. सराहना)
उ.- सराहौं तेरो नंद हियौ-२६९८।

सरि
झरना, निर्झर।
संज्ञा
(सं.)

सरि
नदी, सरिता।
संज्ञा
(सं. सरित)

सरि
लड़ी, श्रृंखला।
संज्ञा
(सं. सृक)

सरि
समता, बराबरी।
संज्ञा
(प्रा. सरिस)
उ.- (क) और न सरि करिबे कौं दूजौ महा मोह मम देस। १-१४१ (ख) कौन करै इनकी सरिआन-४३५। (ग) राम-नाम-सरि तऊ न पूजै जौ तनु गारौ जाइ हिवार-२-३।

सरि
बराबर, समान, सदृश।
वि.
उ.- (क) सुनहु स्याम तुमहूँ सरि नाहीं-५३७। (ख) एक प्रबीन अरु सखा हमारे, जानी तुम सरि कौन-२९२५।

सरि
तक, पर्यात।
क्रि.वि.

सरिका
मोतियों की लड़ी।
संज्ञा
(सं.)

सरिगम, सरिगमा
संगीत के सात स्वर या उनके चढ़ाव- उतार का क्रम।
संज्ञा
(हिं. सरगम)
उ.- सरिगमा पधनिसा संसप्त सुरनि गाइ- पृ. ३५२ (८३)।

सरित, सरिता, सरित्
धारा।
संज्ञा
(सं. सरित्=प्रवाहित)
उ.- बानवृष्टि स्त्रोनित करि सरिता, ब्याहत लगी न बार-।

सरित, सरिता, सरित्
नदी।
संज्ञा
(सं. सरित्=प्रवाहित)
उ.- (क) जैसैं सरिता मिलै सिंधु कौं, बहुरि प्रवाह न आवै-२-१०। (ख) अपनी गति तजत पवन सरिता नहिं ढरै- ६५२। (ग) स्याम सुन्दर सिंधु सनमुख सरित उमँगि बही-ना. २३८१।

सरितपति, सरितराज, सरितापति
सागर, समुद्र।
संज्ञा
(हिं. सरित, सरिता+राजा, पति)
उ.- याकौ कहा परेखौ निरखौ, मधु छीलर, सरितापति खारौ-९-३६।

सरिया
पतली छड़।
संज्ञा
(सं. शर)

सरियाना, सरियानो
तरतीब या क्रम से लगाना या रखना।
क्रि.स.
(हिं. सरि=पंक्ति)

सरियाना, सरियानो
सुलझाना।
क्रि.स.
(हिं. सरि=पंक्ति)

सरिवरि
बराबरी, समता।
संज्ञा
(हिं. सर=वरि)

सरिश्ता
कचहरी, अदालत।
संज्ञा
(फ़ा. सरिश्तः)

सरिश्ता
कार्यालय।
संज्ञा
(फ़ा. सरिश्तः)

सरिश्ता
संबंध।
संज्ञा
(फ़ा. सरिश्तः)

सरिस
समान, सदृश।
वि.
(सं. सदृश, प्रा. सरिस)
उ.- पाहन सरिस कठोर-९-८३।

सरिहै
काम होगा, पूरा पड़ेगा, निर्वाह होगा।
क्रि.प्र.
(हिं. सरना)
उ.- (क) आरज पंथ चले कहा सरिहे स्यामहिं संग फिरौ री-१६७२। (ख) लाज गए कछु काज नं सरिहै, बिछुरत नंद के तात- २५३१।

सूरी
(काम) पूरा हुआ, (उद्देश्य) सिद्ध हुआ।
क्रि.अ.
(हिं. सरना)
उ.-भैया-बंधु कुटुम्ब घनेरे तिनतैं कछु न सरी- १-७१। (ख) सूरदास तैं कछु सरी नहिं, परी काल फँसरी-१-७१। (ग) सूर प्रभु के संग बिलसत सकल कारज सरी-१०-३०२।

सरीक
किसी काम में साथ देनेवाला।
वि.
(अ. शरीक़)

सरीक
मिला हुआ, सम्मिलित।
वि.
(अ. शरीक़)

सरीकता
साझा।
संज्ञा
(हिं. सरीक+ता)

सरीका, सरीखा
समान।
वि.
(प्रा. सरिस

सरीर
देह, शरीर।
संज्ञा
(सं. शरीर)
उ.- (क) देख्यौ भरत तरुन अति सुंदर। थूल सरीर रहित सब दुंदर-५-३। (ख) जद्यपि बिद्यमान सब निरखत दुःख सरीर भरयौ-१-१००।

सरीसृप
रेंगनेवाले जंतु।
संज्ञा
(सं.)

सरुज
रोगी।
वि.
(सं.)

सरुझना
सुलझ जाना।
क्रि.अ.
(हिं. सुलझना)

सरुष
कुपित, क्रुद्ध।
वि.
(सं.)

सरुप
जिसमें आकार या रूप हो।
वि.
(सं.)

सरुप
सुंदर, मनोहर।
वि.
(सं.)

सरुप
समान रूपवाला।
वि.
(सं.)

सरुप
व्यक्ति, पदार्थ आदि की आकृति।
संज्ञा

सरुप
मुर्ति, चित्र।
संज्ञा
उ.- सो सरूप हिरदै महँ आन। रहियौ करत सदा मम ध्यान-१-२८६।

सरुप
वह जिसने कोई देव-रूप धारण किया हो।
संज्ञा

सरुप
देव अवतार।
संज्ञा
उ.- हँसत गोपाल नंद के आगैं, नंद सरूप न जान्यौ-१०-२६३।

सरूर
नशे की तरंग।
संज्ञा
(फ़ा. सुरूर)

सरूरुह
कमल।
संज्ञा
(सं. सरोरुह)

सरेख
सयाना, समझदार।
वि.
(सं. श्रेष्ठ)

सरेखना, सरेखनो
सँभालना।
क्रि.स.
(हिं. सहेजना)

सरेस
एक लसदार वस्तु।
संज्ञा
(फ़ा. सरेश)

सरेस
चिपकनेवाला, लसीला।
वि.

सरेस
जो हर समय साथ लगा रहे।
वि.

सरै
(काम) पूरा होता है, (उद्देश्य) सिद्ध होता है।
क्रि.स.
(हिं. सरना)
उ.- (क) कियै नर की स्तुती कौन कारज सरै, करै सो अपनौ जनम हारै-४-११। (ख) बहुत उपाइ करै बिरहिनि, कछु न चाव सरै-२७८३।

सरै
बनता-बिगड़ता है।
क्रि.स.
(हिं. सरना)

सरै
(प्रण आदि) पूरा होता या करता है।
क्रि.स.
(हिं. सरना)
उ.- चक्र धरे बैकुँठ तैं धाए, वाकी पैज सरै-१-८२।

सरैगौ
(काम) पूरा, सिद्ध या संपन्न होगा।
क्रि.स.
(हिं. सरना)
उ.-राज काज तुमतैं सरैगो, काया अपनी पोषु-३०२६।

सरोंट
शिकन, सिलवट।
संज्ञा
(हिं. सिलवट)

सरो
एक वृक्ष।
संज्ञा
(फ़ा. सर्व)

सरोकार
वास्ता, लागव।
संज्ञा
(फ़ा.)

सरोकार
पारस्परिक व्यवहार का संबंध।
संज्ञा
(फ़ा.)

सरोज
कमल।
संज्ञा
(सं.)
उ.-(क) बंदौ चरन सरोज तिहारे-१-९४। (ख) बाहु-पानि सरोज-पल्लव-१-३०७।

सरोजना
पाना, प्राप्त करना।
क्रि.स.
(देश.)

सरोजमुखी
कमल-जैसा मुखवाली।
वि.
(सं.)

सरोजै
कमल के (समान)।
संज्ञा
(सं. कमल)
उ.-काम कमान समान भौंह दोउ चंचल नैन सरोजै-पृ. ३४५ (४१)।

सरोजिनी
कमल से भरी सरसी।
संज्ञा
(सं.)

सरोजिनी
कमलों का समूह।
संज्ञा
(सं.)

सरोजिनी
कमलिनी।
संज्ञा
(सं.)

सरोजी
जहाँ कमल हों।
वि.
(सं. सरोजिन्)

सरोट
शिकन, सिलवट।
संज्ञा
(हिं. सिलवट)

सरोता
सुननेवाले।
संज्ञा
(सं. श्रोता)

सरोद
बीन या सारंगी की तरह का एक प्रसिद्ध बाजा।
संज्ञा
(फ़ा.)

सरोरूह
कमल।
संज्ञा
(सं.)

सरोवर
तालाब।
संज्ञा
(सं.)
उ.-(क) चकई री, चलि चरन-सरोवर जहाँ न प्रेम-वियोग-१-३३७। (ख) मानसरोवर छाँड़ि हंस तट-कागा-सरोवर न्हावै-३-१३।

सरोवरी
सरसी, छोटा ताल।
संज्ञा
(सं. सरोवर)
उ.-श्रीपति केलि-सरोवरी सैसव जल भरिपूरि-२०६५।

सरोष
कुपित, क्रुद्ध।
वि.
(सं.)

सरोही
एक चिड़िया।
संज्ञा
(हिं. सिरोही)

सरौ
(काम, उद्देश्य या लाभ) सिद्ध या पूरा हुआ या होगा।
क्रि.स.
(हिं. सरना)
उ.-(क) सकल सुरनि कौ कारज सरौ, अंतर्धान रूप यह करौ-७-२। (ख) नैंकु धीरज धरौ, जियहिं कोउ जिनि डरौ, कहा इहिं सरौ, लोचन मुँदाए-५९६।

सरौ
कटोरी, प्याली।
संज्ञा
(सं. शराव)

सरौ
एक वृक्ष।
संज्ञा
(हिं. सरो)

सरौता
सुपारी काटने का प्रमुख औजार।
संज्ञा
(सं. सार=लोहा + पत्र, प्रा. सारवत्त)

सर्ग
चलना, गमन।
संज्ञा
(सं.)

सर्ग
संसार, सृष्ठि।
संज्ञा
(सं.)

सर्ग
बहाव, प्रवाह।
संज्ञा
(सं.)

सर्ग
उत्पत्ति-स्थान।
संज्ञा
(सं.)

सर्ग
जीव, प्राणी।
संज्ञा
(सं.)

सर्ग
संतान।
संज्ञा
(सं.)

सर्ग
स्वभाव, प्रकृति।
संज्ञा
(सं.)

सर्ग
ग्रंथ का अध्याय।
संज्ञा
(सं.)

सर्गबंध, सर्गबद्ध
(काव्य या ग्रंथ) जो अध्यायों में विभक्त हो।
वि.
(सं.)

सर्गुन
सगुण।
वि.
(सं. सगुण)
उ.-बिनु बानी ए उमँगि सजल होइँ सुमिरि सुमिरि वा सर्गुन जसहिं-३०१७।

सर्जन
(कोई चीज) चलाना, छोड़ना या फेंकना।
संज्ञा
(सं.)

सर्जन
निकालना।
संज्ञा
(सं.)

सर्जन
बनाना, रचना।
संज्ञा
(सं.)

सर्जू
सरयू नदी।
संज्ञा
(सं. सरयू)

सर्त
दाँव, बाजी।
संज्ञा
(हिं. शर्त)

सर्त
प्रतिबंध।
संज्ञा
(हिं. शर्त)

सर्त
पारस्परिक निश्चय।
संज्ञा
(हिं. शर्त)

सर्द
ठंढा।
वि.
(फ़ा.)

सर्द
सुस्त।
वि.
(फ़ा.)

सर्द
मंद।
वि.
(फ़ा.)
मुहा.-सर्द होना- (१) ठंडा होना। (२) मर जाना। (३) मंद या धीमा होना। (४) उत्साहहीन या उदासीन हो जाना।

सर्दा
एक तरह का खरबूजा।
संज्ञा
(पं.)

सर्दार
नायक।
संज्ञा
(फ़ा. सरदार)

सर्दी
ठंढ।
संज्ञा
(फ़ा.)

सर्दी
जाड़ा।
संज्ञा
(फ़ा.)

शुल्क
फीस।
संज्ञा
(सं.)

शुल्क
पत्र-पत्रिका का (वार्षिक) चंदा।
संज्ञा
(सं.)

शुश्रषा
सेवा, परिचर्या।
संज्ञा
(सं.)

शुष्क
सूखा।
वि.
(सं.)

शुष्क
जलहीन।
वि.
(सं.)

शुष्क
नीरस।
वि.
(सं.)

शुष्क
जिसमें मन न लगे।
वि.
(सं.)

शुष्क
निर्रथक।
वि.
(सं.)

शुष्क
मोह-ममता आदि से रहित, निर्मम।
वि.
(सं.)

शुष्क
अरसिक।
वि.
(सं.)

सर्पराज
वासुकि।
संज्ञा
(सं.)

सर्पारि
सर्पों का शत्रु।
संज्ञा
(सं.)

सर्पारि
गरुड़।
संज्ञा
(सं.)

सर्पारि
नेवला।
संज्ञा
(सं.)

सर्पारि
मोर, मयूर।
संज्ञा
(सं.)

सर्पिणी
साँप की मादा, साँपिन।
संज्ञा
(सं.)

सर्पिल
साँप की चाल जैसा टोढ़ा-तिरछा।
वि.
(सं.)

सर्पिल
जो साँप-सा कुंडली मारे हो।
वि.
(सं.)

सर्पी
धीरे-धीरे चलनेवाला।
वि.
(सं. सर्पिन्)

सर्फ
खर्च किया हुआ।
वि.
(अ. सर्फ़)

सर्प
साँप।
संज्ञा
(सं.)
उ.-सर्प इक आइहै तुम्हरै निकट, ताहि सौं नाव मम सृंग बाँधौ-८-१६।

सर्प-काल
गरुड़।
संज्ञा
(सं.)

सर्प-गति
सर्प की चाल।
संज्ञा
(सं.)

सर्प-गति
टेढ़ी चाल, कपटभरी रीति।
संज्ञा
(सं.)

सर्पपति
शेषनाग।
संज्ञा
(सं.)

सर्पपति
वासुकि।
संज्ञा
(सं.)

सर्पप्रिय
चंदन।
संज्ञा
(सं.)

सर्पबेल, सर्पबेलि
पान।
संज्ञा
(सं. सर्पबेल)

सर्पयज्ञ, सर्पयाग
वह यज्ञ जो जनमेजय ने सपों के संहार के लिए किया था।
संज्ञा
(सं.)

सर्पराज
शेषनाग।
संज्ञा
(सं.)

सर्फा
खर्च, व्यय।
संज्ञा
(अ. सर्फ़ः)

सर्ब
सब, समस्त।
वि.
(सं.)
उ.-(क) बच्छ बालक, लै गयौ धरि, तुरत कीन्हें सर्ब-४८५। (ख) सूर भक्त बत्सलता बरनौं सर्ब कथा कौ सार-१-२६७।

सर्ब
सर्वत्र।
अव्य.
उ.-सूर-चन्द्र नक्षत्र-पावक सर्ब तासु प्रकास-२-२७।

सर्बदा
हमेशा, सदा।
अव्य.
(सं. सर्वदा)
उ.-सदा सर्बदा राज राम कौ-९-१७।

सर्बस
सारी जमा-पूँजी।
संज्ञा
(सं. सर्वस्व)

सर्बोपरि
सबसे ऊपर, सबसे बढ़कर।
वि.
(सं. सर्वोपरि)
उ.-सर्बोपरि आनंद अखंडित-१-८७।

सर्म
हया, लाज।
संज्ञा
(हिं. शरम)

सरयो, सरयौ
(काम या उद्देश्य) बना या सिद्ध हुआ।
क्रि.अ.
(हिं. सरना)
उ.-बेर सूर की निठुर भए प्रभु मेरौ कछु न सरयौ-१-१३३।

सरथो, सरथौ
(आयु) पूरी या समाप्त हो गयी।
क्रि.अ.
(हिं. सरना)
उ.-सुनहुँ कंस, तव आइ सरयौ-१०-५९।

सर्रा
धुरा, धुरी।
संज्ञा
(अनु. सर सर)

सर्वग
सब जगह जा सकनेवाला।
वि.
(सं.)

सर्वगत
जो सबमें हो, सर्वव्यापक।
वि.
(सं.)

सर्वगामी
सब जगह जा सकनेवाला।
वि.
(सं.)

सर्वग्रास
वह ग्रहण जा जिसमें चंद्र या सूर्य का सारा बिंब ढक जाता है, खग्रास ग्रहण।
संज्ञा
(सं.)

सर्वजनीन
सबसे संबंधित, सबका।
वि.
(सं.)

सर्वजित, सर्वजिय
सबको जीत लेनेवाला।
वि.
(सं. सर्वजित)

सर्वजित, सर्वजिय
सबसे बढ़कर।
वि.
(सं. सर्वजित)

सर्वज्ञ
सब कुछ जाननेवाला।
वि.
(सं.)
उ.-तुम सर्वज्ञ सबै बिधि पूरन-१-१०३।

सर्वज्ञ
ईश्वर।
संज्ञा

सर्वज्ञ
ओंकार।
संज्ञा

सर्वज्ञता
ՙसर्वज्ञ՚ होने का गुण या भाव (जो ईश्वर का एक गुण माना जाता है)।
संज्ञा
(सं.)

सर्वज्ञा
सब कुछ जाननेवाली।
वि.
(सं.)

सर्वतत्र
जिसे सब (शास्त्रादि) मानते हों।
वि.
(सं.)

सर्वतः
सब ओर।
अव्य.
(सं.)

सर्वतः
सब तरह से।
अव्य.
(सं.)

सर्वतः
पूर्ण रूप से।
अव्य.
(सं.)

सर्वतोभद्र
सब तरह से कल्याणकारी।
वि.
(सं.)

सर्वतोभद्र
जिसका सिर, दाढ़ी, मूँछ-सब मुड़े हों।
वि.
(सं.)

सर्वतोभद्र
देव-पूजन के वस्त्रों पर बनाया जानेवाला एक तरह का मांगलिक चिह्न।
संज्ञा

सर्वतोभद्र
हठयोग में बैठने का एक आसन या मुद्रा।
संज्ञा

सर्राटा
तेज हवा चलने का सर्र-सर्र शब्द।
संज्ञा
(अनु. सर्र सर्र)

सर्राटा
तेज भागने का सर्र-सर्र शब्द।
संज्ञा
(अनु. सर्र सर्र)
मुहा.- सर्राटा भरना- (तेजी से) सर्र-सर्र शब्द करते हुए जाना।

सर्राफ
सोने-चाँदी का व्यापारी।
संज्ञा
(अ. सर्राफ़)

सर्राफ
रुपये-पैसे भुनानेवाला।
संज्ञा
(अ. सर्राफ़)

सर्राफा
सराफों का बाजार।
संज्ञा
(हिं. सर्राफ)

सर्व
सब, सारा।
वि.
(सं.)
उ.-सर्वरी सर्व बिहानी तोहिं मनावति-२०४८।

सर्व-काम
सब तरह की इच्छाएँ रखनेवाला।
वि.
(सं.)

सर्व-काम
सब तरह की इच्छाएँ पूरी रखनेवाला।
वि.
(सं.)

सर्व-कामद
सब इच्छाएँ पूरी रखनेवाला।
वि.
(सं.)

सर्व-काल
हर समय, सदा।
क्रि.वि.
(सं.)

सर्वतोभद्र
एक तरह का चित्रकाव्य।
संज्ञा

सर्वतोभाव
सब प्रकार से।
क्रि.वि.
(सं.)

सर्वतोमुख
जिसके मुँह चारों ओर हो।
वि.
(सं.)

सर्वतोमुख
जो सब दिशाओं में प्रवृत्त हो।
वि.
(सं.)

सर्वतोमुख
सब जगह मिलने या होनेवाला, व्यापक।
वि.
(सं.)

सर्वतोमुखी
जो सब दिशाओं में प्रवृत्त हो।
वि.
(सं.)

सर्वतोमुखी
सब जगह मिलने या होनेवाली।
वि.
(सं.)

सर्वत्न
सब जगह।
अव्य.
(सं.)

सर्वथा
सब तरह से, सब प्रकार से।
अव्य.
(सं.)

सर्वथा
बिलकुल, पूरा।
अव्य.
(सं.)

सर्वभोगी
अच्छी-बुरी, सभी चीजों का भोग करनेवाला।
वि.
(सं.)

सर्वमंगला
सब तरह से कल्याण या मंगल करनेवाला।
वि.
(सं.)

सर्वरी
रात, रात्रि।
संज्ञा
(सं. शर्वरी)
उ.-(क) उगत अरुन बिगत सर्वरी, ससांक किरन-हीन-१०-२०५। (ख) सर्वरी सर्व तोहिं मनावति राधारानी-२२४८।

सर्वविद्
सर्वज्ञ।
वि.
(सं.)

सर्वविद्
ईश्वर।
संज्ञा

सर्वविद्
ओंकार।
संज्ञा

सर्वव्यापक
जो सबमें व्याप्त हो।
वि.
(सं.)

सर्वव्यापक
ईश्वर।
संज्ञा

सर्वव्यापी
जो सबमें व्याप्त हो।
वि.
(सं.)

सर्वव्यापी
ईश्वर।
संज्ञा

सर्वदर्शी
सब कुछ देखनेवाला।
वि.
(सं. सर्वदर्शिन्)

सर्वदा
हमेशा, सदा।
अव्य.
(सं.)

सर्वदैव
सदा ही, सदैव।
अव्य.
(सं.)

सर्वनाम
संज्ञा शब्द के स्थान पर प्रयुक्त होनेवाला शब्द (व्याकरण)।
संज्ञा
(सं. सर्वनामन्)

सर्वनाश
पूरी बरबरदी, सत्यानाश।
संज्ञा
(सं.)

सर्वनाशक
सब कुछ नष्ट करनेवाला।
वि.
(सं.)

सर्वनाशी
सत्यानाश करनेवाला।
वि.
(सं.)

सर्वप्रिय
जो सबको प्रिय हो।
वि.
(सं.)

सर्वप्रियता
सबको प्रिय लगने या होने का भाव, लोकप्रियता।
संज्ञा
(सं.)

सर्वभक्षी
सब कुछ खानेवाला।
वि.
(सं. सर्वभक्षिन्)

सर्वशः
पूरा-पूरा।
अव्य.
(सं.)

सर्वशः
पूर्णरूप से।
अव्य.
(सं.)

सर्वशत्तिमान, सर्वशक्तिमान्
जो सब कुछ करने में समर्थ हो।
वि.
(सं. सर्वशत्तिमात्)

सर्वशत्तिमान, सर्वशक्तिमान्
ईश्वर।
संज्ञा

सर्वश्री
एक आदरसूचक विशेषण जिसका प्रयोग साथ-साथ प्रयुक्त कई नामों में से प्रत्येक के साथ ՙश्री՚ का प्रयोग न करके, सामूहिक ՙश्री՚ सूचक रूप में, केवल प्रथम नाम के साथ प्रयुक्त होता है।
वि.
(सं.)

सर्वश्रेष्ठ
सबसे उत्तम।
वि.
(सं.)

सर्वसंहार
काल।
संज्ञा
(सं.)

सर्वसंहार
यमराज।
संज्ञा
(सं.)

सर्वस
सारी जमा-पूँजी, सर्वस्व।।
संज्ञा
(सं.)
उ.-जाकी जहाँ प्रतीति सूर सो सर्वस तहाँ सँचै री-२२७०।

सर्व-सम्मत
जिससे सब सहमत हों।
वि.
(सं.)

शुष्कता
सूखापन।
संज्ञा
(सं.)

शुष्कता
जलहीनता।
संज्ञा
(सं.)

शुष्कता
नीरसता।
संज्ञा
(सं.)

शुष्कता
रूखापन।
संज्ञा
(सं.)

शुष्कता
निर्ममता।
संज्ञा
(सं.)

शुष्कता
अरसिकता।
संज्ञा
(सं.)

शुष्क हृदय
अरसिक, अभावुक।
वि.
(सं.)

शूकर
सुअर, वाराह।
संज्ञा
(सं.)

शूकर
विष्णु का तीसरा अवतार जो वाराह का था।
संज्ञा
(सं.)
उ.- आई छींक नाक ते प्रगटे सूकर अति लघु रूप- सारा. ४०।

शूकर क्षेत्र
एक तीर्थ जो नैमिषारण्य कें निकट है और जहाँ भगवान ने वाराह अवतार लेकर हिरण्यकेशी को मारा था; आजकल यह स्थान ‘सोरो’ नाम से प्रसिद्ध है।
संज्ञा
(सं.)

सर्व-सम्मति
वह स्थिति जिसमें, किसी प्रसेग में, सभी संबंधितजन सहमत हों।
संज्ञा
(सं.)

सर्व-साधारण
सारा जन-समूह।
संज्ञा
(सं.)

सर्व-सामान्य
जो सबमें समान हो।
वि.
(सं.)

सर्व-सिद्धि
सभी कार्यों की सिद्धि।
संज्ञा
(सं.)

सर्वसु
सारी जमा-जथा या संपत्ति।
संज्ञा
(सं. सर्वस्व)
उ.-सूरदास प्रभु सर्वसु लै गए हँसत हँसत रथ हाँक्यौ-२५४६।

सर्वसोख
सब कुछ निगल जाने, ले लेने या हजम कर जानेवाला।
वि.
(सं. सर्व + हिं सोखना)

सर्वसोख
काल।
संज्ञा

सर्वसोख
यमराज।
संज्ञा

सर्वस्व
सारी जमा-जथा।
संज्ञा
(सं.)

सर्वहर
सब कुछ हर लनेवाला।
वि.
(सं.)

सर्वहर
काल।
संज्ञा

सर्वहर
यमराज।
संज्ञा

सर्वहारी
सब कुछ हर लनेवाला।
वि.
(सं. सर्वहारिन्)

सर्वहारी
काल।
संज्ञा

सर्वहारी
यमराज।
संज्ञा

सर्वांग
सब प्रकार से।
क्रि.वि.
(सं.)

सर्वांग
सारा शरीर।
संज्ञा

सर्वांग
(किसी वस्तु आदि के) सब अंग या अंश।
संज्ञा

सर्वांगीण
सब अंगों से संबंधित।
वि.
(सं.)

सर्वांगीण
सब अंगों से युक्त, संपूर्ण।
वि.
(सं.)

सर्वाणी
दुर्गा, पार्वती।
संज्ञा
(सं.)

सर्वात्मा
आत्मा-रूप में सारे विश्व में व्याप्त चेतन सत्ता, ब्रह्म।
संज्ञा
(सं. सर्वात्मान्)

सर्वाधिकार
पूर्ण प्रभुत्व।
संज्ञा
(सं.)

सर्वाधिकार
सभी प्रकार का अधिकार।
संज्ञा
(सं.)

सर्वाधिकारी
जिसे सभी अधिकार हों।
वि.
(सं.)

सर्वास्तिवाद
एक दार्शनिक सिद्धांत जिस में सभी वस्तुओं की सत्ता यथार्थ मानी जाती है, असत्य नहीं।
संज्ञा
(सं.)

सर्वास्तिवादी
उक्त सिद्धांत का माननेवाला।
वि.
(सं.)

सशर्वे, सर्वेश्वर
सबका स्वामी।
संज्ञा
(सं.)

सशर्वे, सर्वेश्वर
ईश्वर, परमेश्वर।
संज्ञा
(सं.)

सर्वेसर्वा
जिसे सब अधिकार हों।
वि.
(सं. सर्वे-सर्वाः)

सलज्ज
जिसे लज्जा लगे।
वि.
(सं.)

सलज्ज
शरमाते या लजाते हुए।
क्रि.वि.

सलतनत
बादशाहत।
संज्ञा
(अ. सल्तनत)

सलतनत
माम्राज्य।
संज्ञा
(अ. सल्तनत)

सलतनत
आराम, सुभीता।
संज्ञा
(अ. सल्तनत)

सलतनत
प्रबंध।
संज्ञा
(अ. सल्तनत)
मूहा.- सलतनत बैठना- प्रबंध ठीक होना।

सलना, सलनो
छिदना, भिदना।
क्रि.अ.
(सं. शल्य)

सलना, सलनो
छेद में किसी चीज का डाला जाना।
क्रि.अ.
(सं. शल्य)

सलब
बरबाद, नष्ट।
वि.
(अ. सल्ब)

सलभ
पतिंगा।
संज्ञा
(सं. शलभ)

सर्वोत्तम
सबसे उत्तम।
वि.
(सं.)

सर्वोदय
वह सिद्धांत जिसमें सबकी सभी प्रकार की उन्नति का समर्थन हो।
संज्ञा
(सं.)

सर्वोपरि
सबसे ऊपर या बढ़कर।
वि.
(सं.)

सर्षप
सरसों।
संज्ञा
(सं.)

सल
सिलवट।
संज्ञा
(देश.)

सल
परत, तह।
संज्ञा
(देश.)

सल
जानकारी।
संज्ञा
(देश.)

सल
परिचय।
संज्ञा
(देश.)

सल
पानी, जल।
संज्ञा
(सं.)

सल
एक कीड़ा।
संज्ञा
(सं.)

सलमा
सोने-चाँदी का बहुत पतला या महीन तार, बादला।
संज्ञा
(अ. सलमः)

सलवट
सिकुड़न, सिमटन।
संज्ञा
(हिं. सिलवट)

सलवार
एक तरह का ढीला पाजामा जिसे प्रायः स्त्रियाँ पहनती हैं।
संज्ञा
(फ़ा. शलवार)

सलसलाना, सलसलानो
हल्की खुजली या सरसराहट होना।
क्रि.अ.
(अनु.)

सलसलाना, सलसलानो
गुदगुदी होना।
क्रि.अ.
(अनु.)

सलसलाना, सलसलानो
रेंगना।
क्रि.अ.
(अनु.)

सलसलाना, सलसलानो
खुजलाना।
क्रि.स.

सलसलाना, सलसलानो
गुदागुदाना।
क्रि.स.

सलसलाना, सलसलानो
बहुत शीघ्रता से काम करना।
क्रि.स.

सलसलाहट
सलसल शब्द।
संज्ञा
(अनु.)

सलसलाहट
खुजली।
संज्ञा
(अनु.)

सलसलाहट
गुदगुदी।
संज्ञा
(अनु.)

सलसलाहट
लपझप जैसी शीघ्रता।
संज्ञा
(अनु.)

सलहज
साले की पत्नी।
संज्ञा
(हिं. साला)

सलाइ
चुभाकर, पीड़ित होकर।
क्रि.स.
(हिं. सलाना)
उ.-सौति साल सलाइ बैठी डुलति इत उत नाहिं-२०२१।

सलाई
काठ या धातु की महीन सींक जैसी छड़।
संज्ञा
(सं. शलाका)

सलाई
सुरमो लगाने की सींक जैसे छड़।
संज्ञा
(सं. शलाका)
मुहा.- सलाई फेरना- (१) आँख में सलाई से सुरमा आदि लगाना। (२) किसी को अंधा करने के लिए गरम सलाई आँखों में लगाना।

सलाई
सालने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
संज्ञा
(हिं. सालना)

सलाक
पतली छड़, सलाख।
संज्ञा
(सं. शलाका)
उ.- पलकनि सूल सलाक सही है, निसि-वासर दोउ रहत अरे रीपृ.- ३२७ (६०)।

सलाक
तीर, बाण।
संज्ञा

सलाकना, सलाकनो
सलाई जैसी चीज से कुरेदकर चिह्न बनाना।
क्रि.अ.
(सं. शलाका)

सलाकनि
सलाखों से।
संज्ञा
(हिं. सलाक+नि)
उ.- सहि न सकति अति बिरह त्रास तनु आगि सलाकनि जारी-३२४६।

सलाका
सलाख।
संज्ञा
(सं. शलाका)
सहि न सकति अलि, गुरु ज्ञान सलाका।

सलाख
धातु की छड़।
संज्ञा
(फ़ा. सलाख)

सलाम
प्रणाम।
संज्ञा
(अ.)
मुहा.- दूर से सलाम करना- बुरी वस्तु या बुरे आदमी से बचकर या दूर रहना। सलाम है - दूर ही रहना चाहते हैं, बाज आये। सलाम करके चलना - अप्रसन्न होकर विदा लेना। सलाम फेरना-किसी से इतना अप्रसन्न होना कि प्रणाम भी स्वीकार न करना।

सलामता
हानि या आपत्ति से बचा हुआ या रक्षित।
वि.
(अ.)

सलामत
जीवित और स्वस्थ।
वि.
(अ.)

सलामत
कायम, बरकरार, स्थित।
वि.
(अ.)

सलामत
खरियत से, सकुशल।
क्रि.वि.

सलामती
तंदुरूस्ती, स्वस्थता।
संज्ञा
(अ. सलामत)

सलिलज
कमल, नीरज।
संज्ञा

सलिला
नदी।
संज्ञा
(सं. सलिल)

सलीका
काम ठीक-ठीक करने का ढंग।
संज्ञा
(अ. सलीक़ः)

सलीका
हुनर, लियाकत।
संज्ञा
(अ. सलीक़ः)

सलीका
शिष्टता।
संज्ञा
(अ. सलीक़ः)

सलीता
एक तरह का बहुत मोटा कपड़ा।
संज्ञा
(देश.)

सलीता
झोला, थैला।
संज्ञा
(देश.)

सलील
लीला युक्त।
वि.
(सं.)

सलील
खिलाड़ी।
वि.
(सं.)

सलील
कोतुकी, कौतूहलप्रिय।
वि.
(सं.)

सलामती
कुशल-क्षेम।
संज्ञा
(अ. सलामत)

सलामती
जिंदगी, जीवन।
संज्ञा
(अ. सलामत)

सलामी
प्रणाम करने की क्रिया।
संज्ञा
(अ. सलामी)

सलामी
सैनिकों आदि की शस्त्रों से प्रणाम करने की रीति या प्रणाली।
संज्ञा
(अ. सलामी)

सलामी
उक्त रीति से किसी माननीय व्यक्ति का अभिवादन।
संज्ञा
(अ. सलामी)
मुहा.- सलामी उतारना (देना)- उक्त प्रकार से किसी माननीय व्यक्ति का अभिवादन करना। सलामी लेना - उक्त अभिवादन को स्वीकार करना।

सलामी
जो स्थान कुछ-कुछ ढालू हो।
वि.

सलाह
राय, परामर्श।
संज्ञा
(अ.)
मुहा.- सलाह ठहराना - (सबका) निश्चय करना।

सलाहकार
राय या परामर्श देनेवाला।
वि.
(अ. सलाह+फ़ा. कार)

सलिल
पानी, जल।
संज्ञा
(सं.)
उ.- (क) सलिल सौं सब रंग तजि कै एक रंग मिलाइ-१-७०। (ख) जनु सीतल सौ तप्त सलिल दै सुखित समोइ करे-९-१७१।

सलिलज
जो जल से उत्पन्न हो।
वि.
(सं.)

शूकरी
सुअरी, वाराही।
संज्ञा
(सं.)

शूची
सूई।
संज्ञा
(सं.)

शूद्र
चार वर्णों में अन्तिम।
संज्ञा
(सं.)

शूद्रद्युति
नीला रंग।
संज्ञा
(सं.)

शूद्रा
शूद्र वर्ण की स्त्री।
संज्ञा
(सं.)

शूद्री
शूद्र वर्ण की स्त्री।
संज्ञा
(सं.)

शून्य
खाली स्थान।
संज्ञा
(सं.)

शून्य
आकाश।
संज्ञा
(सं.)

शून्य
एकांत स्थान।
संज्ञा
(सं.)

शून्य
बिंदी, सिफर।
संज्ञा
(सं.)

सलीस
सुगम।
वि.
(अ.)

सलीस
मुहावरेदार।
वि.
(अ.)

सलूक
बर्ताव।
संज्ञा
(अ. सलूक़)

सलूक
उपकार।
संज्ञा
(अ. सलूक़)

सलूक
मेल-मिलाप।
संज्ञा
(अ. सलूक़)

सलूक
तौर-तरीका।
संज्ञा
(अ. सलूक़)

सलूनो
रक्षाबंधन।
संज्ञा
(सं. श्रावणी ?)

सलोक
श्लोक।
संज्ञा
(सं. शलोक)

सलोन, सलोना
नमकीन।
वि.
(हिं. स+लोन)

सलोन, सलोना
रसीला, सुन्दर।
वि.
(हिं. स+लोन)
उ.- (क) इत सुन्दरी बिचित्र उतहिं घनस्याम सलोना-११३२। (ख) खेलै फागं नैन सलोन री रँग राँची ग्वालिनि-२-४०५।

सवाँगना, सवॉगनो
बनावटी वेश या रूप बनाना।
क्रि.अ.
(हिं. स्वाँगना)

सवा
चौईथा (भाग) सहित।
वि.
(सं. स+पाद)

सवाई
जयपुर के महाराजाओं की एक उपाधि।
संज्ञा
(हिं. सवा)

सवाई
एक और चौथाई, सवाया।
वि.

सवाई
सामान्य से अधिक।
वि.
उ.- (क) मान करौ तुम और सवाई-१८८८। (ख) प्रीतम सो जो रहै एकरस निसि बढ़ि प्रेम सवाई-३३१०।

सवाद
कुछ खाने पीने से जीभ को होनेवाला अनुभव, खाने-पीने का सुखद अनुभव।
संज्ञा
(सं. स्वाद)
उ.- (क) ज्यौं गूँगौ गुरू खाइ अधिक रस, सुख-सवाद न बतावै-२-१०। (ख) सो रस है मोहूँ कौ दुरलभ, तातैं लेंत सवाद-१०-६४।

सवाद
किसी बात में होनेवाली रूचि या उससे मिलनेवाला आनंद।
संज्ञा
(सं. स्वाद)

सवादिक, सवादिल
स्वादिष्ट।
वि.
(सं. स्वादिष्ट)

सवाब
पुण्य।
संज्ञा
(अ.)

सवाब
उपकार।
संज्ञा
(अ.)

सलोनापन
नमकीन होने का भाव।
संज्ञा
(हिं. सलोना+पन)

सलोनापन
सुन्दर होने भाव।
संज्ञा
(हिं. सलोना+पन)

सलोनी
सुन्दरी।
वि.
(हिं. सलोना)

सलोनी
जिसमें नमक पड़ा हो।
वि.
(हिं. सलोना)
उ.- दाल भात घृत कढ़ी सलोनी-सारा. १८७।

सलोनो
रक्षाबंधन।
संज्ञा
(सं. श्रावणी ?)

सलोल
बहुत चंचल या हिलता-डोलता।
वि.
(सं. स+लोल)
उ.- लोचन जलज मधुप अलकावलि कुंडल मीन सलोल-पृ. ३४४ (३५)।

सल्लम
गाढ़ा (कपड़ा)।
संज्ञा
(देश.)

सल्लाह
राय, परामर्श।
संज्ञा
(हिं. सलाह)

सल्लू
बेवकूफ, मूर्ख।
वि.
(देश.)

सल्व
शल्व।
संज्ञा
(सं. शल्व)

सव
मृत शरीर।
संज्ञा
(सं. शव)
उ.- फिरत सृगाल सज्यौ सव कटात चलत सो सीस लै भागि-९-१५८।
मुहा.- सव साजना- चिता बनाकर उस पर जलाने के लिए शव रखना।

सवत, सवति
सौत, सपत्नी।
संज्ञा
(हिं. सौत)
मुहा.- कीने सवति बजाइ - खुल्लमुखुल्ला या सबको जताकर किसी की सौत करना। उ.- सूरदास प्रभु हम पर ताको कीने सवति बजाइ-२३२९।

सवत्स
जिसके साथ बच्चा हो।
वि.
(सं.)

सवन
प्रसव।
संज्ञा
(सं.)

सवन
यज्ञ।
संज्ञा
(सं.)

सवयस्क
समान अवस्थावाला।
वि.
(सं.)

सवया
सखी, सहेली, सहचरी।
संज्ञा
(सं.)

सवर्ण
समान, सदृश।
वि.
(सं.)

सवर्ण
एक ही वर्ण या जाति का।
वि.
(सं.)

सवाँग
बनावटी वेश या रूप।
संज्ञा
(हिं. स्वाँग)
उ.- सूरदास प्रभु जब जब देखत नट सवाँग सो काछे -पृ. ३३१ (६)।

सवाया
पूरे से एक चौथाई अधिक।
वि.
(हिं. सवा)

सवाया
सामान्य से कुछ अधिक।
वि.
(हिं. सवा)

सवार
वह जो (घोड़े, गाड़ा या वाहन पर) चढ़ा हो।
संज्ञा
(फ़ा.)

सवार
घुसड़वार सैनिक।
संज्ञा
(फ़ा.)

सवार
(घोड़े, गाड़ी या वाहन आदि पर) चढ़ा हुआ।
वि.
उ.- सुरपुर तैं आयौ रथ सजिकै, रघुपति भए सवार-९-१५८।
मुहा.- पाँचवा सबार बनना - योग्यता या पात्रता ने होने पर भी बड़ों के साथ अपनी गिनती कराने का प्रयत्न करना।

सवार
जल्दी, शीघ्र।
क्रि.वि.
(हिं. सबार)
उ.- सूरदास प्रभु सों हठ कीन्हो उठि चल क्यों न सवार-२२११।

सवार
सबेरा, प्रातःकाल।
संज्ञा

सवारना, सवारनो
सजाना, अलंकृत करना।
क्रि.स.
(हिं. सँवारना)

सवारा
प्रातःकाल।
संज्ञा
(हिं. सबेरा)

सवारि
जल्दी, शीघ्र।
क्रि.वि.
(हिं. सबार)
उ.- सहज सिथिल पल्लव ते हरि जू लीन्हों छोरि सवारि-पृ. ३४८ (५)।

सवाल
वह जो पूछा जाय, प्रश्न।
संज्ञा
(अ.)

सवाल
माँग, याचना।
संज्ञा
(अ.)

सवाल
गणित का प्रश्न।
संज्ञा
(अ.)

सवाल-जवाब
बहस, तर्क-वितर्क, वाद-विवाद।
संज्ञा
(अ.)

सवाल-जवाब
तकरार, हुज्जत, झगड़ा।
संज्ञा
(अ.)

सविकल्प
संदेहयुक्त, संदिग्ध।
वि.
(सं.)

सविकल्प
दो प्रकार की समाधियों में एक जो किसी आलंबन की सहायता से होती है।
संज्ञा

सविता
रवि, सूर्य।
संज्ञा
(सं. सवितृ)
उ.- जनु जल सोखि लयो सो सविता-२०६२।

सविता
बारह की संख्या।
संज्ञा
(सं. सवितृ)

सविता
आक, मदार।
संज्ञा
(सं. सवितृ)

सवारी
जल्दी, शीघ्र, तुरन्त।
क्रि.वि.
(हिं. सबार)
उ.- (क) सुरपति-पूजा करौ सवारी-१००७। (ख) तुम सुन्दरी काकी बधू घर जाहु सवारी-पृ. ३१७ (६३)।

सवारी
किसी चीज पर (विशेषतः) चलने के लिए चढ़ने की क्रिया।
संज्ञा
(फ़ा.)

सवारी
वह चीज या वाहन जिस पर सवार हुआ जाय।
संज्ञा
(फ़ा.)

सवारी
वह व्यक्ति जी सवार हो।
संज्ञा
(फ़ा.)

सवारी
बड़े आदमी, देव-मूर्ति आदि के साथ चलनेवाला जलूस।
संज्ञा
(फ़ा.)

सवारे
शीघ्र, तुरन्त।
क्रि.वि.
(हिं. सबार)
उ.- (क) जेहि हठ तजै प्रान प्यारी सो जतन सवारे करिए-२२७५। (ख) ह्वै यह जीति विधाता इनकी करहु सहाय सवारे-२५६९।

सवारे
सबेरा, प्रातःकाल।
संज्ञा
उ.- यहै देत लवनी नित मोकौ, छिन छिन साँझ-सवारे-१०-१८९।

सवारैं, सवारै
सबेरे, प्रातःकाल को ही।
संज्ञा
(हिं. सबार)
उ.- (क) साँझ-सवारै आवन लागी-७१०। (ख) निकट बैठारि सब बात तेई कही गए जे भाषि नारद सवारैं-२४६६।

सवारो, सवारौ
शीघ्र, तुरंत।
क्रि.वि.
(हिं. सबार)
उ.- इह उपदेस आपुनो ऊधौ, राखौ ढाँप सवारो-३२०५।

सवाल
पूछने की क्रिया।
संज्ञा
(अ.)

सविता
ईश्वर।
संज्ञा
(सं. सवितृ)

सवेरा
सुबह, प्रातः-काल।
संज्ञा
(हिं. स+सं. वेला)

सवेरा
निश्चित समय या उपयुक्त अवसर से पूर्व का समय।
संज्ञा
(हिं. स+सं. वेला)

सवैया
सवा सेर का बाँट।
संज्ञा
(हिं. सवा+ऎया)

सवैया
वह पहाड़ा जिसमें संख्याओं का सवाया रहता है।
संज्ञा
(हिं. सवा+ऎया)

सवैया
सबाया भाग।
संज्ञा
(हिं. सवा+ऎया)

सवैया
एक प्रसिद्ध छंद जिसके प्रत्येक चरण में सात भगण और एक गुरु होता है। इसे ՙमालिनी՚, ՙमदिरा՚ और ՙदिवां՚ भी कहते हैं।
संज्ञा
(हिं. सवा+ऎया)

सवैया
जो सवाया हो।
वि.

सव्य
बाँया, बाम।
वि.
(सं.)

सव्य
दाहना, दाँया।
वि.
(सं.)

सव्य
उलटा, प्रतिकूल।
वि.
(सं.)

सव्यसाची
अर्जुन जो दाहने और बायें, दोनों हाथों से तीर चला सकते थे।
संज्ञा
(सं.)

सशंक
जिसे शंका हो, शंकित।
वि.
(सं.)

सशंक
डरा हुआ, भयभीत।
वि.
(सं.)

सशंकना
शंका या संदेह करना, शंकित होना।
क्रि.अ.
(सं. सशंक)

सशंकना
डरना, भयभीत होना।
क्रि.अ.
(सं. सशंक)

सशक्त
बली, शक्तिशाली।
वि.
(सं.)

सशस्त्र
शस्त्रों से युक्त।
वि.
(सं.)

सशस्त्र
शस्त्रों से लज्जित।
वि.
(सं.)

ससंकि
शंकित होकर।
क्रि.अ.
(हिं. सशंकना)
उ.- बिडरत बिझुकि जानि रथ ते मृग जनु ससंकि ससि लंगर सारे-१३३३।

ससंकित
शंकित होकर।
क्रि.अ.
(हिं. सशंकना)
उ.- अखुटित रहत सभीत ससंकित सुकृत सब्द नहिं पावै-१-४८।

सस
चंद्रमा।
संज्ञा
(सं. शशि)

सस
चंद्रमा का काला धब्बा या कलंक।
संज्ञा
(सं. शशि)

सस
अनाज।
संज्ञा
(सं. शस्य)

सस
खेतीबारी।
संज्ञा
(सं. शस्य)

ससक, ससका
खरगोश।
संज्ञा
(सं. शशक)

ससकाई
चंद्रमा की कालिमा।
संज्ञा
(सं. शशक+हिं. आई)
उ.- माँग उरग नब तरनि तरौना तिलक भाल ससि की ससकाई-१८८७।

ससना, ससनो
कष्ट सहना।
क्रि.अ.
(सं. शासन)

ससना, ससनो
समाना, प्रविष्ट होना।
क्रि.अ.
(देश.)

ससना, ससनो
साँस लेने में कष्ट होना।
क्रि.अ.
(हिं. साँस)

शून्य
कुछ न होना, अभाव।
संज्ञा
(सं.)

शून्य
ईश्वर।
संज्ञा
(सं.)

शून्य
खाली, रिक्त।
वि.

शून्य
निराकार।
वि.

शून्य
जो कुछ न हो।
वि.

शून्य
विहीन, रहित।
वि.

शून्यता
शून्य होने का भाव या धर्म।
संज्ञा
(सं.)

शूप
सूप, फटकनी।
संज्ञा
(सं.)

शूर
बहादुर, वीर।
वि.
(सं.)
उ.- वादत बड़े शूर की नाईं अबहिं लेत हौं प्राण तुम्हारो-२५९०।

शूरता, शूरताइ, शूरताई
वीरता।
संज्ञा
(सं. शूरता)

ससहर
चंद्रमा।
संज्ञा
(सं. शशिधर)

ससहरना, ससहरनो
डरना।
क्रि.अ.
(हिं. सिहरना)

ससांक
चंद्रमा।
संज्ञा
(सं. शशांक)
उ.- उगत अरुन बिगत सर्वरी, ससांक किरनहीन-१०-२०५।

ससा
खरगोश।
संज्ञा
(सं. शशा)

ससा ससाना, ससानो
धबराना, विकल होना।
क्रि.अ.
(हिं. सासना)

ससा ससाना, ससानो
काँपना।
क्रि.अ.
(हिं. सासना)

ससि
चंद्रमा।
संज्ञा
(सं. शशि)
उ.- (क) रवि-ससि किये प्रदच्छिनकारी-३-३४। (ख) बारिज ससि बैर जानि जिय-१०-१६४।

ससि
अनाज, धान्य।
संज्ञा
(सं. शस्य)

ससिधर, ससिहर
चन्द्रमा।
संज्ञा
(सं. शशिधर)

ससी
चन्द्रमा।
संज्ञा
(सं. शशि)

ससुधौटी
सुधा का पात्र।
संज्ञा
(सं. स+ हिं. सुधौटी)
उ.- हरि-कर राजति माखन-रोटी। मनु बारिज ससि बैर जानि जिय गह्यौ सुधा ससुधौटी-१०-१६४।

ससुर, ससुरा
पति या पत्नी का पिता।
संज्ञा
(सं. श्वशुर)

ससुरा, ससुराल
पति या पत्नी के पिता का घर।
संज्ञा
(सं. श्वशुर+आलय)

सस्ता
थोड़े मूल्य का, जो महँगा न हो।
वि.
(सं. स्वस्थ)

सस्ता
जिसका मूल्य गिर गया हो।
वि.
(सं. स्वस्थ)
मुहा.-सस्ता समय- वह समय जब सब चीजें थोड़े ही मूल्य पर मिल जाती हों। सस्ता छूटना- (१) साधारण से भी कम दाम पर बिक जाना। (२) सहज में ही या बहुत थोड़ी हानि सहकर किसी काम या भंझट से छुटकारा पा जाना।

सस्ता
जो बहुत थोड़े परिश्रम, व्यय या कार्य से प्राप्त हो जाय।
वि.
(सं. स्वस्थ)

सस्ता
घटिया मामूली।
वि.
(सं. स्वस्थ)

सस्ताना, सस्तानो
सस्ता होना।
क्रि.अ.
(हिं. सस्ता)

सस्ताना, सस्तानो
सस्ते दाम पर बेचना।
क्रि.स.

सस्ताना, सस्तानो
थकावट टूर करना।
क्रि.अ.
(हिं. सुसताना)

सस्ती
साधारण से भी कम मूल्य की।
वि.
(हिं. सस्ता)

सस्ती
जिसका मूल्य गिर गया हो।
वि.
(हिं. सस्ता)

सस्ती
जो बहुत थोड़े श्रम या व्यय से प्राप्त हो जाय।
वि.
(हिं. सस्ता)

सस्ती
घटिया, मामूली।
वि.
(हिं. सस्ता)

सस्ती
सस्ता होने का भाव।
संज्ञा

सस्ती
वह समय जब सब चीजें सस्ते दाम पर मिल जायँ।
संज्ञा

सस्तो, सस्तौ
जो थोड़े ही श्रम से सिद्धि प्राप्त करा दे।
वि.
(हिं. सस्ता)
उ.- जहाँ तहाँ तैं सब आवैंगे सुनि-सुनि सस्तौ नाम-१-१९१।

सस्त्र
हथियार जिन्हें हाथ में पकड़े रहकर ही वार किया जाय।
संज्ञा
(सं. शस्त्र)
उ.- (क) जुद्ध न करौं सस्त्र नहिं पकरैं, एक ओर सेना सिगरी-१-२६८। (ख) जेतक सस्त्र सो किए प्रहार-६-५।

सस्त्रनि
हथियारों या शस्त्रों को।
संज्ञा
(सं. शस्त्र)
उ.- ते सब ठाढ़ सस्त्रनि धारे-४-१२।

सस्त्रीक
स्त्री या पत्नी के साथ।
वि.
(सं.)

सहकार
सहायक।
संज्ञा
(सं.)

सहकार
सहयोग।
संज्ञा
(सं.)

सहकारता, सहकारिता
मिलकर काम करना।
संज्ञा
(सं.)

सहकारता, सहकारिता
मदद, सहायता।
संज्ञा
(सं.)

सहकारी
सहयोगी, साथी।
संज्ञा
(सं. सहकारिन्)

सहकारी
सहायक।
संज्ञा
(सं. सहकारिन्)

सहगमन
किसी के साथ जाने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(सं.)

सहगमन
पति के शव के साथ स्त्री के सती होने की क्रिया।
संज्ञा
(सं.)
उ.- ज्यौं सहगमन सुन्दरी के सँग बहु बाजन हैं बाजत-९-१३०।

सहगान
कई लोगों के साथ मिलकर गाना।
संज्ञा
(सं.)

सहगान
वह गान जो इस प्रकार गाया जाय।
संज्ञा
(सं.)

सस्मित
हँसता हुआ।
वि.
(सं. स+स्मित)

सस्मित
मुस्कराकर, हँसकर।
क्रि.वि.

सस्य
अनाज।
संज्ञा
(सं.)

सस्य
खेतीबारी।
संज्ञा
(सं.)

सहँगा
सस्ता।
वि.
(हिं. महँगा का अनु.)

सह
समेत, सहित।
अव्य.
(सं.)
उ.- मनु बराह भूधर सह पुहमी धरी दसन की कोटी-१०-१६४।

सह
सहनशील।
वि.
(सं.)

सह
योग्य, समर्थ।
वि.
(सं.)

सहकार
सुगन्धित पदार्थ।
संज्ञा
(सं.)

सहकार
आम का पेड़।
संज्ञा
(सं.)

सहगामिनि, सहगामिनी
वह स्त्री जो पति के शव के साथ सती हो जाय।
संज्ञा
(सं. सहगामिनि)

सहगामिनि, सहगामिनी
पत्नी।
संज्ञा
(सं. सहगामिनि)

सहगामिनि, सहगामिनी
सहेली।
संज्ञा
(सं. सहगामिनि)

सहगामिनि, सहगामिनी
सहगमन।
संज्ञा
उ.- (क) गंधारी सहगामिनि कियौ-१-२८४। (ख) सब नारिति सहगामिनि कियौ-९-९।

सहगामी
साथ चलनेवाला।
संज्ञा
(सं. सहगामिन्)

सहगामी
साथ रहनेवाला, साथी।
संज्ञा
(सं. सहगामिन्)

सहगामी
अनुकरण करनेवाला, अनुयायी।
संज्ञा
(सं. सहगामिन्)

सहगौन
सहगमन।
संज्ञा
(सं. सहगमन)

सहचर
संगी साथी।
संज्ञा
(सं.)

सहचर
पति।
संज्ञा
(सं.)

सहचारी
सेवक।
संज्ञा
(सं. सहचारिन्)

सहज
सगा भाई।
संज्ञा
(सं.)

सहज
स्वभाव।
संज्ञा
(सं.)

सहज
साथ-साथ उत्पन्न होनेवाला।
वि.

सहज
प्राकृतिक, स्वाभाविक।
वि.
उ.- (क) नाभि-हृद रोमावली अलि चले सहज सुभाव-१-३०७।

सहज
प्रकृत, साधारण।
वि.
उ.- मनौ नव घन दामिनी, तजि रही सहज सुबेस-६३३।

सहज
सरल, सुगम।
वि.

सहज
सुगमता से।
क्रि.वि.
उ.- बहुरौ ध्यान सहज ही होइ-३-१३।

सहज
सरल और आडंबररहित रूप में।
क्रि.वि.
उ.- सहज भजै नँदलाल कौं सो सब सचु पावै-२-९।

सहज
सीधेपन से, सिधाई से।
क्रि.वि.
उ.- हम माँगत हैं सहज सों तुम अति रिस कीन्हों-२५७६।

सहजता
सरलता, सुगमता।
संज्ञा
(सं.)

सहजता
स्वाभाविकता।
संज्ञा
(सं.)

सहज-ध्यान
वह ध्यान जो सुगम रूप में किया जाय और जिसके लिए आसन, मुद्रा आदि की आवश्कता न हो।
संज्ञा
(सं.)

सहज-पंथ
गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय का एक वर्ग।
संज्ञा
(सं.)

सहज-बुद्धि
जीव-जंतु या प्राणी की स्वाभाविक ज्ञान-शक्ति।
संज्ञा
(सं.)

सहज-समाधि
वह समाधि जो सुगम रूप में लगायी जाय और जिसके लिए आसन, मुद्रा आदि की आवश्यकता न हो।
संज्ञा
(सं.)
उ.- सुति रुचि सहज समाधि साधि सठ, दीनबंधु करुनामय उर धरि-१-३१२।

सहजात
साथ-साथ उत्पन्न होनेवाला, सहोदर।
वि.
(सं.)

सहजात
यमज।
वि.
(सं.)

सहजिया
सहज-पंथानयायी।
वि.
(सं.)

सहजिवी
साथ रहनेवाला।
वि.
(सं.)

सहचर
सेवक।
संज्ञा
(सं.)

सहचरि, सहचरी
पत्नी।
संज्ञा
(सं. सहचारि)

सहचरि, सहचरी
सेविका।
संज्ञा
(सं. सहचारि)

सहचरि, सहचरी
सखी, सहेली।
संज्ञा
(सं. सहचारि)
उ.- (क) सुपनेहुसंयोग सहति नहिं सहचरि सौति भई-२७९१। (ख) गावहिं सब सहचरी कुँवरि तामस करि हेरयौ-१० उ.-८।

सहचर
साथ।
संज्ञा
(सं.)

सहचर
साथी।
संज्ञा
(सं.)

सहचारिणी, सहचारिनि, सहचारिनी
सखी, सहेली।
संज्ञा
(सं. सहचारिणी)

सहचारिणी, सहचारिनि, सहचारिनी
पत्नी।
संज्ञा
(सं. सहचारिणी)

सहचारिता
ՙसहचरी՚ होने का भाव।
संज्ञा
(सं.)

सहचारी
संगी साथी, सहचर।
संज्ञा
(सं. सहचारिन्)

सहत
सहन करता है, सहता है।
क्रि.स.
(हिं. सहना)
उ.- (क) कौर-कौर कारन कुबुद्धि जड़ किते सहत अपमान-१-१०३। (ख) सूर सो मृग ज्यौं बान सहत कित-१-३२०।

सहताना, सहतानो
आराम करके थकावट दूर करना।
क्रि.अ.
(हिं. सुसताना)

सहतिं
सहती या सहन करती हैं।
क्रि.स.
(हिं. सहना)
उ.- सलिल तैं सब निकसि आवहु बृथा सहतिं तुषार-७८६।

सहति
भोगती, झेलती या बरदाश्त करती है।
क्रि.स.
(हिं. सहना)
उ.- (क) कत हौ सीत सहति ब्रज संदरि-७८७। (ख) सहति बिरह के सूलनि-८९७। (ग) बात मेरी सुनति नाहिंन, कतहिं निंदा सहति-११८९।

सहदान
अनेक देवताओं के लिए एक ही में दिया जानेवाला दान।
संज्ञा
(सं.)

सहदानि, सहदानी
निशानी, पहचान, चिह्न।
संज्ञा
(सं. संज्ञान)
उ.- (क) लेहु मातु सहदानि मुद्रिका दई प्रीति करि नाथ-९-८३। (ख) चरन चापि महि प्रगट करी पिय सेष सीस सहदानी-२०७६।

सहदूल
सिंह।
संज्ञा
(सं. शार्दूल)

सहदेव
राजा पांडु के पाँच पुत्रों में सबसे छोटा पुत्र जो माद्री के गर्भ से अश्विनीकुमारों के औरस से जन्मा था।
संज्ञा
(सं.)

सहदेव
जरासंध का पुत्र जो महाभरत के युद्ध में अभिमन्यु द्वारा मारा गया था।
संज्ञा
(सं.)

सहधर्मिणी
पत्नी।
संज्ञा
(सं. सहधर्म्मिणी)

शार्ङ्गु
विष्णु या उनके प्रमुख अवतारों, राम और कृष्ण के हाथ में रहनेवाला धनुष।
संज्ञा
(सं.)

शार्ङ्गुघर
विष्णु या उनके प्रमुख अवतार राम और कृष्ण जो 'शार्ङ्ग' नामक धनुष धारण करते कहे गये हैं।
संज्ञा
(सं.)

शार्ङ्गुपाणि
विष्णु या उनके प्रमुख अवतार राम और कृष्ण जिनके हाथ में 'शार्ङ्ग' नामक धनुष रहना माना जाता है।
संज्ञा
(सं.)

शार्दूल
बाघ।
संज्ञा
(सं.)

शार्दूल
सिंह।
संज्ञा
(सं.)

शार्दूल
सर्वश्रेष्ठ, सर्वोत्तम।
वि.

शार्दूलविक्रीडित
एक वर्णवृत्त।
संज्ञा
(सं.)

शाल
एक वृक्ष।
संज्ञा
(सं.)

शाल
सालने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(हिं. साल)

शाल
पीड़ा, वेदना।
संज्ञा
(हिं. साल)
उ.- सौति शाल उर में अति शाल्यो-२६७३।

शूरमा
वीर।
वि.
(सं. शूर)
उ.- सूरदास सिर देत शूरमा सोइ जानै व्यावहार-२९०५।

शूरसेन
मथुरा का राजा जो वसुदेव का पिता और श्रीकृष्ण का पितामह था।
संज्ञा
(सं.)

शूरसेन
मथुरा और उसका निकटवर्ति प्रदेश जहाँ राजा सूरसेन का राज्य था।
संज्ञा
(सं.)

शूरा
बहादुर, वीर।
वि.
(सं. शूर)

शूरा
सूर्य, भानु, रवि।
संज्ञा
(हिं. सूर्य)

शूर्पकर्ण
हाथी।
संज्ञा
(सं.)

शूर्पकर्ण
गणेश।
संज्ञा
(सं.)

शूर्पणखा, शूर्पनखा
रावण की बहन जिसके नाक-कान लक्ष्मण ने काटे थे।
संज्ञा
(सं. शूर्पणखा)

शूल
एक प्राचीन-अस्त्र।
संज्ञा
(सं.)

शूल
सूली।
संज्ञा
(सं.)

सहना
बरदाश्त करना, भेलना,।
क्रि.स.
(सं. सहन)

सहभोज
लोगों का साथ भोजन करना।
संज्ञा
(सं.)

सहभोजी
साथ खानेवाला।
वि.
(सं.)

सहम
डर।
संज्ञा
(फ़ा.)

सहम
हिचक, संकोच।
संज्ञा
(फ़ा.)

सहमत
एक मत का।
वि.
(सं.)

सहमति
किसी के साथ एकमत या सहमत होने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(सं.)

सहमना, सहमनो
डरना।
क्रि.अ.
(फ़ा. सहम)

सहमरण
स्त्री का सती होना।
संज्ञा
(सं.)

सहमाना, सहमानो
डराना।
क्रि.स.
(फ़ा. सहम)

सहधर्मी
पति।
संज्ञा
(सं. सहधर्म्मी)

सहन
सहने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(सं.)

सहन
क्षमा।
संज्ञा
(सं.)

सहन
आज्ञा या आदेश पालन करना।
संज्ञा
(सं.)

सहन
घर का आँगन या चौक।
संज्ञा
(अ.)

सहन
एक तरह का रेशमी कपड़ा।
संज्ञा
(अ.)

सहनशील
बरदाश्त या सहन करनेवाला, सहिष्णु।
वि.
(सं.)

सहनशील
संतोषी।
वि.
(सं.)

सहनशीलता
सहनशील होने का भाव, सहिष्णुता।
संज्ञा
(सं.)

सहनशीलता
संतोष।
संज्ञा
(सं.)

सहयोग
साथ मिलकर काम करने का व्यापार या भाव।
संज्ञा
(सं.)

सहयोग
संग, साथ।
संज्ञा
(सं.)

सहयोग
सहायता।
संज्ञा
(सं.)

सहयोगी
साथ मिलकर काम करनेवाला व्यक्ति।
संज्ञा
(सं.)

सहयोगी
वह जो एक ही कार्यालय या विभाग में काम करता हो।
संज्ञा
(सं.)

सहयोगी
साथी, सहकारी।
संज्ञा
(सं.)

सहयोगी
समवयस्क।
संज्ञा
(सं.)

सहयोगी
समकालीन।
संज्ञा
(सं.)

सहर
धीरे, रुक रुककर।
क्रि.वि.
(हिं. सहराना)

सहर
बनबिलाव।
संज्ञा
(देश.)

सहलगी
साथ लगे रहने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(हिं. सहलगा)

सहलगी
सहचरी।
संज्ञा
(हिं. सहलगा)

सहलगी
साथ-साथ लगी रहनेवाली।
वि.

सहलाना, सहलानो
धीरे धीरे ङाथ फेरना।
क्रि.स.
(अनु.)

सहलाना, सहलानो
धीरे-धीरे मलना।
क्रि.स.
(अनु.)

सहवास
साथ-साथ रहना, संग, साथ।
संज्ञा
(सं.)

सहवास
मैथुन, संभोग।
संज्ञा
(सं.)

सहवासी
साथी।
संज्ञा
(सं.)

सहवासी
पति।
संज्ञा
(सं.)

सहस
हजार, हजारों।
वि.
(सं. सहस्त्र)
उ.- (क) सहस सकट भरि कमल चलाए-५८३। (ख) सोरह सहस घोषकुमारि-७९५।

सहर
सबेरा, प्रातःकाल।
संज्ञा
(अ.)

सहर
जाटू-टोना।
संज्ञा
(अ. सेह्न)

सहर
पुर, नगर।
संज्ञा
(फ़ा. शहर)
उ.- (क) ता दिन सूर सहर सब चक्रित सबर-सनेह तज्यौ पितु मात-९-३८। (ख) आनँद मगन नर गोकुल सहर के-१०-३०। (ग) जीवन हैं ये स्याम, सहर के-६०७।

सहराना, सहरानो
धीरे-धीरे हाथ फेरना, धीरे-धीरे मलना।
क्रि.स.
(हिं. सहलाना)

सहरी
र्निजल व्रत के दिन बहुत तड़के किया जानेवाला भोजन।
संज्ञा
(अ.)

सहरी
एक तरह की मछली।
संज्ञा
(सं. शफ़री)

सहरी
नगर या पुर का।
वि.
(हिं. सहर)

सहल
सरल, सहज, सुगम।
वि.
(अ.)

सहलग, सहलगा
साय-साथ लगा रहनेवाला।
वि.
(सं. सह+हिं. लगना)

सहलग, सहलगा
साथी, सहचर।
संज्ञा

सहसक
लगभग हजार।
वि.
(सं. सहस+एक)
उ.- मन सहसक केसरि लै दीनो-८४३३।

सहस किरन
सूर्य।
संज्ञा
(सं. सहस्त्रकिरण)

सहसगो
सूर्य।
संज्ञा
(सं. सहस्त्रगु)

सहसचरण
सूर्य।
संज्ञा
(सं. सहस्त्रचरण)

सहसजिभ्या, सहसजीभ, सहसजीभी
शेषनाग।
संज्ञा
(सं. सहस्त्रजिह्व)

सहसदल
कमल।
संज्ञा
(सं. सहस्त्रदल)

सहसनयन
इंद्र।
संज्ञा
(सं. सहस्त्रनयन)

सहसनाम
वह स्तोत्र जिसमें किसी देवता के हजार नाम हों।
संज्ञा
(सं. सहस्त्र+नाम)

सहसनाम
महाप्रभु वल्लभाचार्य का ՙपुरुषोत्तम सहस्त्रनाम नामक՚ ग्रंथ।
संज्ञा
(सं. सहस्त्र+नाम)
उ.- सहसनाम तहँ तिन्हैं सुनायौ-१-२२६।

सहसनैन
इंद्र।
संज्ञा
(सं. सहस्त्रनयन)

सहसफन, सहसफनी
शेषनाग।
संज्ञा
(सं. सहस्त्रफण)
उ.- हरि जू की आरती बनी।¨¨¨¨¨ डाँड़ी सहसफनी-२-२६।

सहसबदन
शेषनाग।
संज्ञा
(सं. सहस्त्रबदन)

सहसबाहु
राजा कृतवीर्य का पुत्र ՙहैहय՚ जिसे कार्तवीयार्जून भी कहते हैं। इसने रावण को युद्ध में परास्त किया था और पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए परशुराम ने इसे मार डाला था।
संज्ञा
(सं. सहस्त्रबाहु)
उ.- सहसबाहु रविबंसी भयौ। ¨¨¨¨¨। सहसबाहु तब ताकौ गह्यौ-९-१३।

सहसमुख
शेषनाग।
संज्ञा
(सं. सहस्त्रमुख)

सहसवदन
शेषनाग।
संज्ञा
(सं. सहस्त्रवदन)

सहससीस
शेषनाग।
संज्ञा
(सं. सहस्त्रशीर्ष)

सहसा
एकाएक, अचानक।
अव्य.
(सं.)

सहसाई
सहायता।
संज्ञा
(सं. सहाय)

सहसाई
सहायता करनेवाला व्यक्ति।
संज्ञा

सहसाक्ष, सहसाक्षि, सहसाखि, सहसाखी
इन्द्र।
संज्ञा
(सं. सहस्त्राक्ष)

सहसान
मोर, मयूर।
संज्ञा
(सं.)

सहसानन
शेषनाग।
संज्ञा
(सं. सहस्त्रानन)
उ.- (क) चारि बदन मैं कहं कहौं, सहसानन नहिं जान-४९२। (ख) सहसानन जहि गावै हो-१५५७।

सहसौ
हजार, हजारों।
वि.
(सं. सहस्त्र)
उ.- सेष सकुचि सहसौ फल पेलत-१०-६३।

सहस्मार
शरीर के भीतरी आठ कमलों या चक्रों में एक जिसे ՙशून्य चक्र՚ भी कहते हैं। यह सहस्त्र दलवाला और मस्तिष्क के ऊपरी भाग में स्थित कहा गया है।
संज्ञा
(सं.)

सहस्त्र
हजार की संख्या।
संज्ञा
(सं.)

सहस्त्र
जो गिनती में हजार हो।
वि.
उ.- (क) सतजुग लाख बरस की आइ, त्रेता दस सहस्त्र कहि गाइ-१-२३०। (ख) साठ सहस्त्र सगर के पुत्र-९-९।

सहस्त्र
सूर्य।
संज्ञा
(सं.)

सहस्त्रकरण
सूर्य।
संज्ञा
(सं.)

सहस्त्रचक्षु
इन्द्र।
संज्ञा
(सं. सहस्त्रचक्षुस्)

सहस्त्रकिरण
सूर्य।
संज्ञा
(सं.)

सहस्त्रकिरण
विष्णु।
संज्ञा
(सं.)

सहस्त्रदल
कमल, पद्म।
संज्ञा
(सं.)

सहस्त्रधारा
देवताओं को स्नान कराने का पात्र जिसमें हजार छेद होते हैं।
संज्ञा
(सं.)

सहस्त्रनयन
इन्द्र।
संज्ञा
(सं.)

सहस्त्रनाम
वह स्तोत्र जिसमें किसी देवता के हजार नाम हों।
संज्ञा
(सं.)

सहस्त्रनाम
महाप्रभु वल्लभाचार्य का ՙपुरुषोत्तम सहस्त्रनाम नामक՚ ग्रंथ।
संज्ञा
(सं.)

सहस्त्रपत्र
कमल, पद्म।
संज्ञा
(सं.)

सहस्त्रपाद
सूर्य।
संज्ञा
(सं.)

सहस्त्रपाद
विष्णु।
संज्ञा
(सं.)

सहस्त्रबाहु
सूर्यवंशी राजा कृतवीर्य का पुत्र जो ՙहैहय՚ और ՙसहस्त्रार्जुन՚ नामों से भी प्रसिद्ध है। इसने एक बार रावण को पराजित किया था। मुनि जमदग्नि की कामधेनु हरने और उनकी हत्या करने के अपराध में उनके पुत्र परशुराम ने उसे मार डाला था।
संज्ञा
(सं.)

सहाइ, सहाई
फौज, सेना।
संज्ञा

सहाइ, सहाई
सहन करके या की, सहन करने को प्रवृत्त किया।
क्रि.स.
(हिं. सहना)

सहाउ, सहाऊ
सहायक।
वि.
(सं. सहाय)

सहाध्यायी
सहपाठी।
संज्ञा
(सं. सहाध्यायिन्)

सहाना, सहानो
सहन करने को प्रवत्त या विवश करना।
क्रि.स.
(हिं. सहना)

सहाना, सहानो
राजसी।
वि.
(फ़ा. शाहाना)

सहाना, सहानो
उत्तम।
वि.
(फ़ा. शाहाना)

सहाना, सहानो
एक तरह का राग (संगीत)।
संज्ञा

सहानी
एक रंग जो पीलापन लिये हुए लाल हो।
संज्ञा
(फ़ा. शाहाना)

सहानुगमन
सती होना, सहगमन।
संज्ञा
(सं.)

शूल
त्रिशूल।
संज्ञा
(सं.)

शूल
काँटा।
संज्ञा
(सं.)

शूल
तेज दर्द।
संज्ञा
(सं.)

शूल
टीस, पीड़ा, कसक, दुख।
संज्ञा
(सं.)
उ.- (क) तुम लछिमन निज पुरहिं सिधारो। बिछुरन भेंट देहु लघु बंधू जियत न जैहै शूल (सूल) तुम्हारौ-९-३६। (ख) मन तोसों कोटिक बार कही। समुझ न चरन गहत गोविंद केउर अघ शूल (सूल) सही-१-३४४। (ग) अब काहे सोचत जल मोचत समौ गए ते शूल नई-२५३७। (घ) को जानै तन छूटि जाइगो शूल रहै जिय साधो-२५५८।

शूल
छड़, सलाख, शलाका।
संज्ञा
(सं.)

शूल
झंडा, पताका।
संज्ञा
(सं.)

शूलधर, शूलधारी
शिव, शंकर।
संज्ञा
(सं.)

शूलना
शूल के समान गड़ना।
क्रि.अ.
(सं. शूल)

शूलना
कष्ट या दुख देना।
क्रि.अ.
(सं. शूल)

शूलपाणी, शूलपानि
हाथ में शूल धारण करनेवाले, महादेव।
संज्ञा
(सं. शूलपाणि)

सहस्त्रभुज
सहस्त्रबाहु।
संज्ञा
(सं. सहस्त्र+भुजा)

सहस्त्रभुजा
देवी का वह रूप जब महिषासुर का वध करने के लिए उनकी हजार भुजाएँ हो गयी थीं।
संज्ञा
(सं.)

सहस्त्रलोचन
इंद्र।
संज्ञा
(सं.)

सहस्त्रलोचन
विष्णु।
संज्ञा
(सं.)

सहस्त्राक्ष
इन्द्र।
संज्ञा
(सं.)

सहस्त्राक्ष
विष्णु।
संज्ञा
(सं.)

सहस्त्राब्द
हजार वर्ष।
संज्ञा
(सं.)

सहस्त्रार्जुन
सहस्त्रबाहु।
संज्ञा
(सं.)

सहाइ, सहाई
सहायता करनेवाला।
वि.
(सं. सहाय)
उ.- (क) सूर स्याम ¨¨¨¨¨ गिरि लै भए सहाई-१-१२२। (ख) जहाँ तहाँ सो होत सहाई-३९१। (ग) जहँ तहै तुमहिं सहाइ सदा हौ-६०७। (घ) राजसूर्य यज्ञ को कियो अरंभ मै जानिं कै नाथ तुमको सहाई-१० उ.-५१।

सहाइ, सहाई
सहायता।
संज्ञा
उ.- (क) हरिजू ताकी करी सहाइ-७-२। (ख) ना जानौं धौं कौन पुन्य तैं को करि लेत सहाइ-१०-८१। (ग) तिनके चरन सरोज सूर अब किए गुरु कृपा सहाइ-२५५५।

सहानुभूति
किसी के दुख से दुखी या द्रवित होना।
संज्ञा
(सं.)

सहाब
एक तरह का गहरा लाल रंग जो कुसुम के फूलों से बनता है।
संज्ञा
(फ़ा. शहाब)

सहाय
सहायता।
संज्ञा
(सं.)
(क) कह न सहाय करी भक्तनि की-१-२५। (ख) कौन सहाय करै घर अपने मेटै बिधि अपना-२५४७। (ग) इनकी करहु सहाय सवारे-१५६९। (घ) सत्वर सूर सहाय करै को-३१६५।

सहाय
सहारा, भरोसा।
संज्ञा
(सं.)

सहाय
सहायक।
वि.
उ.- तेरौ पुन्य सहाय भयौ है-१०-३३५।

सहायक
सहायता करनेवाला।
वि.
(सं.)
उ.- सूरदास हम दृढ़ करि बंकरे अब ये चरन सहायक-१-१७७।

सहायक
जो (छोटी नदी) बड़ी नदी में मिलती हो।
वि.
(सं.)

सहायक
अधीन काम करनेवाला, सहकारी।
वि.
(सं.)

सहायता
मदद, कार्य में सहयोग।
संज्ञा
(सं.)

सहायता
कार्य-विशेष के लिए दिया जानेवाला धन।
संज्ञा
(सं.)

सहायी
सहायक।
वि.
(सं. सहाय)

सहायी
सहायता।
संज्ञा

सहायी
आश्रय।
संज्ञा

सहायौ
सहायक।
वि.
(सं. सहाय)
उ.- तुमहिं बिना प्रभु कौन सहायौ-३९१।

सहार
सहने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(हिं. सहारना)

सहार
सहनशीलता।
संज्ञा
(हिं. सहारना)

सहारना, सहारनो
बर्दाश्त या सहन करना, सहना।
क्रि.स.
(हिं. सहार)

सहारना, सहारनो
अपने ऊपर भार लेना या सँभालना
क्रि.स.
(हिं. सहार)

सहारना, सहारनो
गवारा करना।
क्रि.स.
(हिं. सहार)

सहारना, सहारनो
सहारा देना।
क्रि.स.
(हिं. सहार)

सहारा
मदद, सहायता।
संज्ञा
(हिं. सहाय)

सहारा
आश्रय।
संज्ञा
(हिं. सहाय)

सहारा
भरोसा।
संज्ञा
(हिं. सहाय)
मुहा.-सहारा पाना-सहायता पाना। सहारा देना-(१) सहायता करना। (२) टेक देना। (३) आसरा देना। (४) आश्रय देना। (५) रोकना। सहारा ढूँढ़ना-आसरा ताकना।

सहारि
सहन करके।
क्रि.स.
(हिं. सहारना)

सहारि
सकी सहारि-सहन कर सकी।।
प्र.
उ.- कठिन बचन सुनि स्रवन जानकी, सकी न बचन सहारि (सँभारि)-९-१९।

सहारे
सहायक।
वि.
(हिं. सहारा)
उ.- सो उबरथौ भयौ धर्म सहारे-५९५।

सहारो, सहारौ
आश्रय।
संज्ञा
(हिं. सहारा)
उ.- सूर पतित कौ और ठौर नहिं है हरि-नाम सहारौ-१-३३९।

सहालग
ब्याह-शदी के दिन, लगन।
संज्ञा
(सं. सह+हिं. लगाव या लगता)

सहालग
लाभ के दिन।
संज्ञा
(सं. सह+हिं. लगाव या लगता)

सहावल
लटकन, साहुल।
संज्ञा
(हिं. साहुल)

सहाहीं
सहायक।
वि.
(सं. सहाय)
उ.- तब अति ध्यान कियौ श्रीपति को, केसव भये सहाहीं-सारा. ३९।

सहिंजन
एक वृक्ष।
संज्ञा
(हिं. सहिजन)

सहि
झेलकर, बरदाश्त करके।
क्रि.स.
(हिं. सहना)
उ.- सहि सन्मुख तउ सीत-उष्न कौं, सोई सुफल करै-१-११७।

सहि
सहि जैहै-झेली या सहन की जायगी।
प्र.
उ.- सुनि सुन्दरि यह समौ गए तें पुनि न सूल सहि जैहै-२०३३।

सहि
लई सहि कै-झेल ली, सहन कर ली।
प्र.
उ.- हमसों कही, लई हम सहि कै जिय गुन लेहु सयाने-३००६।

सहि
सहि सकत- झेली जा सकती है, सहन की जा सकती है।
प्र.
उ.- सहि न सकति अति बिरह त्रास तनु आगि सलाकनि जारी-३२४६।

सहि
सहि सकी-सहन कर सकी।
प्र.
उ.- सहि न सकी, रिस ही रिस भरि गई बहुतै ढीठ कन्हाई-३७७।

सहिए, सहिऎ
बरदाश्त या सहन कीजिए।
क्रि.स.
(हिं. सहना)
उ.- (क) सखा-भीर लै पैठत घर मैं आपु खाइ तौ सहिऎ-१०-३२२। (ख)कैसे रिस मन सहिए जू-२०१५।

सहिक
स्पष्ट और निश्चित (कथन)।
वि.
[सं. स(अस्) + हिं. क (प्रत्य.)]

सहिक
वास्तविक।
वि.
[सं. स(अस्) + हिं. क (प्रत्य.)]

सहिक
दृढ़ और निश्चित।
वि.
[सं. स(अस्) + हिं. क (प्रत्य.)]

सहिजन
एक वृक्ष जिसकी फलियों की तरकारी बनती है।
संज्ञा
(सं. शोभांजन)

सहिजानी
निशानी।
संज्ञा
(सं. संज्ञान)

सहित, सहितै
साथ, समेत।
अव्य.
(सं. सहित)
उ.- (क) लक्ष्मी सहित होति नित क्रीड़ा-१-३३७। (ख) बेगि बढ़ै बल सहित बिरध लट-१०-१३८। (ग) सूर राधा सहित गोपी चलीं ब्रज समुहाहिं-१३०६। (घ) गिरिवर सहितै ब्रजै बहाई-१०४१।

सहिदान
निशान, चिह्न।
संज्ञा
(सं. संज्ञान)

सहिदानि, सहिदानी
निशानी, पहचान, चिह्न।
संज्ञा
(सं. संज्ञान)
उ.- (क) कछु इक अंगनि की सहिदानी मेरी दृष्टि परी-९-६३। (ख) लेहु मातु सहिदानि मुद्रिका दई कृपा करि नाथ-९-८३।

सहिबे
सहन करने की क्रिया, सहना।
संज्ञा
(हिं. सहना)
उ.- मन मानै सोऊ कहि डारौ पालागैं हम सुनि सहिबे को-२००४।

सहियत
भोगते या सहते हैं।
क्रि.स.
(हिं. सहना)
उ.- इतनो दुख सहियत-२८५६।

सहियै
भोगिए, सहन कीजिए।
क्रि.स.
(हिं. सहना)
उ.- (क) जम की त्रास न सहियै-१-६२। (ख) इतौ द्वंद जिय सहिए-२-१८।

सहिष्णु
सहन करनेवाला।
वि.
(सं.)

सहिष्णुता
सहनशीलता।
संज्ञा
(सं.)

सहिंजन
एक वृक्ष जिसकी फलियों की तरकारी बनती है।
संज्ञा
(हिं. सहिजन)
उ.- फूले फूले सहींजन छौंके-२३२१।

सही
सच, सत्य।
वि.
(फ़ा. सहीह)
उ.- करवत चिन्ह कहै हरि हमकौं ते अब होत सही-२५०१।

सही
यथार्थ, प्रामाणिक।
वि.
(फ़ा. सहीह)

सही
ठीक, शुद्ध।
वि.
(फ़ा. सहीह)
मुहा.-सही पड़ना-ठीक उतरना, सच होना, प्रमाणित होना। सही परी-ठीक या सत्य हुआ। उ.- (क) निगमनि सही परी-१०-६९। (ख) तीनिलोक अरु भुवन चतुरदस बेद पुरानन सही परी-२६५६। सही भरना- (१) मान लेना। (२) सत्यता की साक्षी देना।

सही
छाप, दस्तखत, हस्ताक्षर।
संज्ञा
उ.- रही ठगी, चेटक सो लाग्यौ परि गयी प्रीति सही-१०-२८१।
मुहा.-सही करना-मान लेना। करैं सही-मान लें, अंगीकार कर लें। उ.- अब जोई पद देहि कृपा करि सोइ हम करैं सही-३३७०।

सही
भोगी, बरदाश्त या सहन की, झेली।
क्रि.स.
(हिं. सहना)
उ.- (क) उर अघ-सूल सही-१-३२४। (ख) सही दूध-दही की हानि-१०-२७६। (ग) पलकनि सूल-सलाक सही है-पृ. ३२७ (६०)। सही बिपति तनु गाढ़ी-२५३५।

सही
परतिं सही-सही जाती हैं।
प्र.
उ.- कहा करौं दिनप्रति की बातैं, नाहिंन परतिं सही-१०-२९१।

सही
परतिं सही-सहन की जाती है।
प्र.
उ.- (क) नाहिंन सही परति मौंपै अब दारुन त्रास निसाचर केरी-९-९३। (ख) दित प्रति कैसैं सही परति है दूध-दही की हानि-१०-२८०।

सही
सत्य ही, सचमुच, वस्तुतः।
क्रि.वि.

सही-सलामत
भलाचंगा, स्वस्थ।
वि.
(हिं. सही+अ. सलामत)

सही-सलामत
जिसमें कोई बाधा न पड़े।
वि.
(हिं. सही+अ. सलामत)

सही-सलामत
सकुशल, कुशलपूर्वक।
क्रि.वि.

सहुँ
सामने।
अव्य.
(सं. सम्मुख)

सहुँ
ओर।
अव्य.
(सं. सम्मुख)

सहु
सारा, कुल।
वि.
(हिं. सब)

सहूँ
झेलूँ, सहन करूँ।
क्रि.स.
(हिं. सहना)
उ.- निपट निलज बैल (?) बिलखि सहूँ-१०-२९५।

सहूलियत
आसानी, सुगमता।
संज्ञा
(फ़ा.)

सहृदय
दूसरे का सुख-दुख समझनेवाला।
वि.
(सं.)

सहृदय
दयालु, भला, सज्जन।
वि.
(सं.)

सहेटना, सहेटनो
समेटना।
क्रि.स.

सहेटना, सहेटनो
सँभालना।
क्रि.स.

सहेटी
घुमक्कड़।
वि.
(हिं. सहेटना)

सहेत
प्रेमी-प्रेमिका-मिलन का पूर्व निश्चित एकान्त स्थल।
संज्ञा
(सं. संकेत)

सहेत
हेतु या उद्देश्य से।
क्रि.वि.
(सं. स+हेतु)

सहेत
प्रेम या प्रीति से।
क्रि.वि.
(सं. स+हेतु)

सहेतुक
जिसमें कुछ उद्देश्य हो।
वि.
(सं.)

सहेतुक
किसी हेतु या उद्देश्य से।
क्रि.वि.

सहेलरा
सुहावना।
वि.
(हिं. सुहेल)

सहेलरा
सुखद।
वि.
(हिं. सुहेल)

सहृदय
रसिक, भावुक।
वि.
(सं.)

सहृदयता
सहृदय होने का भाव।
संज्ञा
(सं.)

सहृदयता
दयालुता, सौजन्य।
संज्ञा
(सं.)

सहृदयता
रसिकता, भावुकता।
संज्ञा
(सं.)

सहेज
(दही का) जामन।
संज्ञा
(देश.)

सहेजना, सहेजनो
सँभालना।
क्रि.स.
(हिं. सही)

सहेजना, सहेजनो
समझा-बुझाकर सुपुर्द करना।
क्रि.स.
(हिं. सही)

सहेजवाना, सहेजवानो
सहेजने को प्रवृत्त करना।
क्रि.स.
(हिं. सहेजना)

सहेट
मिलने का स्थल।
संज्ञा
(हिं. संकेत)

सहेटना, सहेटनो
घूमना-फिरना।
क्रि.अ.
(देश.)

शूलिक
सूली या फाँसी देनेवाला।
वि.
(सं.)

शूली
शिव।
संज्ञा
(सं. शूलिन)

शूली
एक नरक।
संज्ञा
(सं. शूलिन)

शूली
पीड़ा, कष्ट।
संज्ञा
(सं.)

श्रृंखल
करधनी, मेखला।
संज्ञा
(सं.)

श्रृंखल
जंजीर, साँकल।
संज्ञा
(सं.)

श्रृंखल
हथकड़ी-बेढ़ी।
संज्ञा
(सं.)

श्रृंखलता
क्रमबद्ध होने का भाव।
संज्ञा
(सं.)

श्रृंखला
सिलसिला, क्रम।
संज्ञा
(सं.)

श्रृंखला
जंजीर, साँकल।
संज्ञा
(सं.)

सहेलरा
मित्र।
संज्ञा

सहेलरा
साथी।
संज्ञा

सहेलरी
सहेली, सखी, सहचरी।
संज्ञा
(हिं. सहेलरा)
उ.- हरषी सखी-सहेल री (हो) आनँद भयौ सुभ जोग-१०-४०।

सहेला
सुंदर।
वि.
(हिं. सुहेला)

सहेला
सुखद।
वि.
(हिं. सुहेला)

सहेला
मित्र।
संज्ञा

सहेला
साथी।
संज्ञा

सहेलि, सहेली
सखी, संगिनी।
संज्ञा
[सं. सह+ हिं. एली(प्रत्य.)]
उ.- (क) बिनु रघुनाथ और नहिं कोऊ, मातु, पिता न सहेली-९-९३। (ख) कबहुँ रहसत मचत लै सँग एक-एक सहेलि-२२७८। (ग) एकै मत सब भईं सहेली-३१४४।

सहेस
सानंद, लहर्ष।
क्रि.वि.
(सं. स+हर्ष)

सहैंगे
सहन करेंगे।
क्रि.स.
(हिं. सहना)
उ.- बासर निसि कहुँ होत न न्यारे बिछरन हृदय सहैंगे-२५००।

सहै
सहन करे या करता है।
क्रि.स.
(हिं. सहना)
उ.- (क) लोभ लिए दुर्बचन सहै-१-५३। (ख) घर आसा सब दुख सहै-१-३२५। (ग) त्रिभुवन नाथ नाह जो पावै सहै सो क्यों बनवास-९-८३।

सहैया
सहायक।
संज्ञा
(हिं. सहाय)

सहैया
सहायता।
संज्ञा
उ.- (क) स्याम कहत नहिं भुजा पिरानी ग्वालनी कियो सहैया-१०७१। (ख) जब-जब गाढ़ परति है हमकौ, तहँ करि लेत सहैया-२३७४।

सहैया
सहन करनेवाला, सहनशील।
वि.
(सं. सहन)

सहोक्ति
एक काव्यालंकार।
संज्ञा
(सं.)

सहोदर, सहोवर
एक ही माता के गर्भ से जन्म लेनेवाला, सगा।
वि.
(सं. सहोदर)

सहोदर, सहोवर
सगा भाई।
संज्ञा

सहोदरा, सहोदरी, सहोवरि, सहोवरी
सगी बहन।
संज्ञा
(सं. सहोदरा)

सहोदरा, सहोदरी, सहोवरि, सहोवरी
एक ही माता के गर्भ से जन्म लेनेवाली।
वि.

सहौं
सहन करूँ।
क्रि.स.
(हिं. सहना)
उ.- (क) कहाँ लगि सहौं रिस-१०-२९५। (ख) ब्रज बसि काके बोल सहौं-२७७४। (ग) समुझि आपनी करनी गुसाईं काहे न सूल सहौं-११-२।

साँईं
मालिक, स्वामी।
संज्ञा
(सं. स्वामी)
उ.- तुम हर्ता तुम कर्ता एकै तुम हौ अखिल भुवन के साईं-२५५८।

साँईं
ईश्वर।
संज्ञा
(सं. स्वामी)

साँईं
पति।
संज्ञा
(सं. स्वामी)

साँईं
(मुसलमान) फकीर।
संज्ञा
(सं. स्वामी)

साँक
अनिष्ट का भय।
संज्ञा
(सं. शंका)

साँक
ՙशंका՚ नामक संचारी भाव।
संज्ञा
(सं. शंका)

साँक
संदेह, संशय।
संज्ञा
(सं. शंका)

साँक
जिसके शंका या संदेह हो।
वि.
(सं. सशंक)

साँक
डरा हुआ, भयभीत।
वि.
(सं. सशंक)

सॉकड़
जंजीर, सीकड़।
संज्ञा
(सं. श्रृंखल)

सहौ
सहन करो।
क्रि.स.
(हिं. सहना)
उ.- तुम जिनि सहौ स्याम सुन्दर बर, जेती में जु सही-१-२५८।

सह्य
जो सहा जा सके।
वि.
(सं.)

सह्य
बम्बई प्रान्त का ՙसहथाद्रि՚ पर्वत।
संज्ञा
(सं.)

सह्याद्रि
बम्बई प्रान्त का एक पर्वत।
संज्ञा
(सं.)

सह्यो, सह्यौ
सहन किया, सहा।
क्रि.स.
(हिं. सहना)
उ.- किहिं जुग इतौ सह्यौ-१-४९।

सह्यो, सह्यौ
भार उठाया।
क्रि.स.
(हिं. सहना)
उ.- इहिं भरु अधिक सह्यौ अपनैं सिर अमित अंडमय बेष-५७०।

सह्यो, सह्यौ
सह्यौ न जाइ-सहा या सहन किया नहीं जाता।
प्र.
उ.- ताकौ बिषम बिषाद अहो मुनि मोपै सह्यौ न जाइ-९-७।

साँइयाँ
पति।
संज्ञा
(हिं. साँईं)
उ.- जागिहै मेरौ साँइयाँ-५७७।

साँइयाँ
स्वामी।
संज्ञा
(हिं. साँईं)

साँइयाँ
परमेश्वर।
संज्ञा
(हिं. साँईं)

सॉकड़
पैर का एक गहना जो चाँदी का बनता है।
संज्ञा
(सं. श्रृंखल)

साँकड़ा
पैर में पहनने का चाँदी का एक गहना।
संज्ञा
(सं. श्रृंखला)

साँकर
जंजीर, श्रृंखला।
संज्ञा
(सं. श्रृंखला)

साँकर
सँकरा।
वि.
(सं. संकीर्ण)

साँकर
कष्टपूर्ण।
वि.
(सं. संकीर्ण)

साँकर
संकट, विपत्ति।
संज्ञा

साँकरा
कम चौड़ा, तंग, सँकरा।
वि.
(हिं. सँकरा)

साँकरा
कष्ट या दुखमय।
वि.
(हिं. सँकरा)

साँकरा
कष्ट, दुख।
संज्ञा

साँकरा
कष्ट या दुख का समय या अवस्था।
संज्ञा

साँखा
ՙशंका՚ नामक संचारी भाव।
संज्ञा
(सं. शंका)

साँखा
संदेह।
संज्ञा
(सं. शंका)

साँख्य
छह भारतीय दर्शनों में एक जिसके कर्त्ता महर्षि कपिल थै। इसमें सृष्टि की उत्पत्ति के क्रम की चर्चा है तथा जड़ प्रकृति और चेतन पुरूष को जगत का मूल माना गया है।
संज्ञा
(सं.)

साँख्यिकी
विषय-विशेष की संख्याएँ एकत्र करके निष्कर्ष निकालना।
संज्ञा
(सं.)

साँख्यिकी
इस उद्देश्य से एकत्र की गयी संख्याएँ।
संज्ञा
(सं.)

साँग, सांग
एक तरह की बरछी, शक्ति।
संज्ञा
(सं. शक्ति)
उ.- ताहि आवत निरखि स्याम निज साँग को काटि करि साल्व की सुधि भुलाई-१० उ. ५६।

साँग, सांग
पूर्ण, सफलता से सम्पन्न।
वि.
(सं. स+अंग)
उ.- मैं अपमान रूद्र कौ कियौ। तब मम जज्ञ सांग नहिं भयौ-४-५।

साँग, सांग
बनावटी वेश या रूप।
संज्ञा
(हिं. स्वाँग)

साँग, सांग
नकल।
संज्ञा
(हिं. स्वाँग)

साँगि, सांगी
छोटी बरछी।
संज्ञा
(हिं. साँग)

साँकरी
कम चौड़ी, तंग।
वि.
(हिं. साँकरा)
उ.- (क) नाचत फिरत साँकरी खोरि-१०-३२७। (ख) रोकि रहत गहि गली साँकरी-१०-३२८। (ग) तब घिरे साँकरी खोरि-२४४७।

साँकरे
कम चौड़ा, तंग।
वि.
(हिं. साँकरा)

साँकरे
छोटा, छोटे श्रेत्रफल या आकार का।
वि.
(हिं. साँकरा)
उ.- सोभा-सिंधु समाइ कहाँ लौं हृदय साँकरे ऎन-२७६५।

साँकरे
संकट के दिवस या स्थिति।
संज्ञा
उ.- हरि तुम साँकरे के साथी-१-११२।

साँकरैं
संकट के समय या स्थिति में।
संज्ञा
(हिं. साँकरा)
उ.- तुम बिनु साँकरैं को काकौ-१-११३।

सांकर्य
मिले हुए या संकर होने का भाव।
संज्ञा
(हिं. संकरता)

सांकर्य
दोगलापन।
संज्ञा
(हिं. संकरता)

सांकेतिक
इशारे या संकेत का।
वि.
(सं.)

सांकेतिक
जो संकेत-रूप में हो।
वि.
(सं.)

साँखा
अनिष्ट का भय।
संज्ञा
(सं. शंका)

संगोपांग
अंगों और उपांगों सहित, सम्पूर्ण।
अव्य.
(सं. साङ्गोपाङ्ग)

सांघातिक
संघात सम्बन्धी।
वि.
(सं.)

सांघातिक
घातक (चोट या प्रहार)।
वि.
(सं.)

सांघातिक
बड़े संकट का।
वि.
(सं.)

साँच
ठीक, सत्य, सिद्ध, यथार्थ।
वि.
(सं. सत्य)
उ.- पतित पावन बिरद साँच (तौ) कौन भाँति करिहौ-११२४।
मुहा.- साँच -झूठ करि - झूठे-सच्चे व्यापार से, उचित-अनुचित सभी कुछ करके। उ.- साँच-झूठ करि माया जोरी-१-३०२।

साँच
सच बोलनेवाला।
वि.
(सं. सत्य)

साँचना, साँचनो
संचित करना।
क्रि.स.
(सं. संचय)

साँचना, साँचनो
किसी चीज में भरना।
क्रि.स.
(सं. संचय)

साँचला
जो सच बोले, सच्चा।
वि.
(हिं. साँच)

साँचा
वह उपकरण जिसमें कोई गीली या गाढ़ी चीज डालकर आकार-विशेष की बनायी जाय।
संज्ञा
(सं. स्थाता)
मुहा.- साँचा (सांचे में) ढला - रूप-आकार में सुन्दर और सुडौल होना। साँचा (साँचे में) ढालना-बहुत सुन्दर और सुडौल बनाना।

साँची
पुस्तक की बेड़े बल की छपाई।
संज्ञा
(हिं. साँचा)

साँची
ठीक, सत्य, यथार्थ।
वि.
(हिं. साँचा)
उ.- (क) साँची बिरूदावलि-१-१२२। (ख) मन-क्रम-बचन कहति हौं साँची, मैं मन तुमहिं लगायो-१२२३। (ग) कहि कुसलातैं, साँची बातैं-३४४१। (घ) दरसन कियौ आइ हरि जी को कहत सपन की साँची-१० उ.-११२।

साँची
सच या सत्य बोलनेवाली।
वि.
(हिं. साँचा)
उ.- यह है बिन कलंक की साँची, हम कलंक में सानी-१६०३।

साँची
सत्य ही, सचमुच।
क्रि.वि.

साँचे
सच्चे।
वि.
(हिं. साँच)
उ.- दीनानाथ हमारे ठाकुर साँचे प्रीति-निबाहक-१-१९।

साँचे
सत्य ही, सचमुच, वस्तुतः।
क्रि.वि.
उ.- हौं जानौं साँचे मिले माधौ भूलो यह अभिमान-२७८८।

साँचे
उपकरण-विशेष में, जिससे विभिन्न आकारों और रूपों की वस्तुएँ बनायी जाती हैं।
संज्ञा
(हिं. साँचा)
मुहा.- साँचे भरि काढ़ी - साँचे में ढालकर सुन्दर और सुडौल बनायी है। उ.- अँगिया बनी कुचनि सौं माढ़ी। सूरदास प्रभु रीझि थकित भए मनहुँ काम साँचे भरि काढ़ी-१०-३००। एक ही साँचे के ढले या भरे हुए- एक ही रूप-रंग, आकार या स्वभाव के। भरे दोउ एक ही साँचे- दोनों एक ही रूप, आकार या स्वभाव के हैं। उ.- मानो भरे दोउ एकहिं साँचे-३०५१।

साँचेन
सत्य बोलनेवालों को।
वि.सवि.
(हिं. साँच)
उ.- लावहिं साँचेन को खोर-११-३।

साँचैंहिं
सत्य ही, सचमुच।
क्रि.वि.
(हिं. साँच)
उ.- साँचैहिं सुत भयौ नँदनायक कैं-१०-२३।

साँचौ
सच्चा, ठीक, यथार्थ।
वि.
(हिं. साँच)
उ.- (क) प्रभु, तेरौ बचन-भरोसौ साँचौ-१-३२। (ख) सूर स्याम कौ सौदा साँचौ-१-३१०।

साँचा
किसी आयोजित बड़ी कृति का छोटा नमूना।
संज्ञा
(सं. स्थाता)

साँचा
बेल-बूटे छापने का ठप्पा या छापा।
संज्ञा
(सं. स्थाता)

साँचा
गठी हुई देह, शरीर।
संज्ञा
(सं. स्थाता)

साँचा
सत्य।
वि.
(हिं. साँच)

साँचा
सत्यवादी।
वि.
(हिं. साँच)

साँचि
सत्य।
वि.
(हिं. साँच)
उ.- मेरी कही साँचि तुम जानौ, कीजै आगत-स्वागत-१४८२।

साँचिया
साँचा बनानेवाला।
वि.
(हिं. साँचा)

साँचिला
जो सच बोले, सच्चा।
वि.
(हिं. साँचला)

साँचिले
ठीक, यथार्थ।
वि.
(हिं. साँचला)
उ.- सूरदास प्रभु साँचिले उपमा कवि गाए-१९७५।

साँची
पान-विशेष।
संज्ञा
(हिं. साँची नगर ?)

श्रृंखला
करधनी, मेखला।
संज्ञा
(सं.)

श्रृंखला
कतार, श्रेणी।
संज्ञा
(सं.)

श्रृंखला
एक काव्यालंकार।
संज्ञा
(सं.)

श्रृंखलावद्ध
जो सिलसिल या क्रम से हो।
वि.
(सं.)

श्रृंखलावद्ध
जो जंजीर से बँधा हो।
वि.
(सं.)

श्रृंखलित
क्रमबद्ध।
वि.
(सं.)

श्रृंखलित
पिरोया हुआ।
वि.
(सं.)

श्रृंग
पर्वत का शिखर, चोटी।
संज्ञा
(सं.)

श्रृंग
(पशु के) सींग।
संज्ञा
(सं.)
उ.- भक्ति बिन बैल बिराने ह्यैहौ। पाँउ चारि शिर श्रृंग (सृंग) गुंग मुख तब कैसे गुन गैहौ-१-३३१।

श्रृंग
कँगूरा।
संज्ञा
(सं.)

साँझ, साँझि
शाम, सायंकाल।
संज्ञा
(सं. संध्या)
उ.- (क) देखियत नहिं भवन माँझ, जैसोइ तन तैसि साँझि-१०-२७६। (ख) साँझ-सवारे आवन लागी-७१०।

साँझी
देव-मंदिरों या भक्तों के यहाँ भूमि या मिट्टी के चबूतरे अथवा दीवारों पर रंगीन चूर्ण या फूल-पत्तियों से, सावन के महीने में बनाये गये विविध लीलाओं के चित्र या विशेष आकृतियाँ आदि।
संज्ञा
(हिं. साँझ)

साँट
छड़ी।
संज्ञा
(अनु. सट)

साँट
कोड़ा।
संज्ञा
(अनु. सट)

साँट
शरीर पर बना हुआ छड़ी या कोड़े की मार का चिह्न।
संज्ञा
(अनु. सट)

साँटा
कोड़ा।
संज्ञा
(हिं. साँट=छड़ी)

साँटा
गन्ना।
संज्ञा
(हिं. साँट=छड़ी)

साँटा
बदला, प्रतिकार।
संज्ञा
(देश.)

साँटि
किसी के बदले में।
क्रि.वि.
(देश.)

साँटि
मेल-मिलाप।
संज्ञा
(हिं. सटना)
उ.- नैननि साँटि करी मिलि नैननि।

साँटिया
साँटेमार।
संज्ञा
(हिं. साँटा)

साँटिया
डुग्गी या डौंड़ी पीटनेवाला।
संज्ञा
(देश.)

सॉटी
पतली छड़ी।
संज्ञा
(हिं. साँट)
उ.- (क) साँटी लिये दौरि भुज पकरयौ-१०-२५३। (ख) मारन कौं साँटी कर तौरै-३४४। (ग) साँटी दीन्हीं सर-सर-३४४।

सॉटी
मेल-मिलाप।
संज्ञा
(हिं. सटना)

सॉटी
बदला।
संज्ञा
(हिं. सटना)

साँटेमार
राजा की सवारी के साथ साँटा लेकर चलनेवाले सिपाही।
संज्ञा
(हिं. साँटा+मारना)

साँठ
पैर में पहनने का ՙसाँकड़ा՚ नामक गहना।
संज्ञा
(देश.)

साँठ
गन्ना।
संज्ञा
(देश.)

साँठ
सरकंडा।
संज्ञा
(देश.)

साँठ
हेलमेल।
संज्ञा
(हिं. सटना)

साँठ
सम्बन्ध।
संज्ञा
(हिं. सटना)

साँठ
पूँजी, मूलधन।
संज्ञा
(हिं. गाँठ से अनु.)

साँठ
साँठ-गाँठ- गुप्त सम्बन्ध या मेल।
यौ.

साँठ
गुप्त संधि या क्रुचक।
यौ.

साँठना, साँठनो
पकड़ना।
क्रि.स.
(हिं. सटना)

साँठा
गन्ना।
संज्ञा
(सं. शरकांड)

साँठा
सरकंडा।
संज्ञा
(सं. शरकांड)

साँठी
पूँजी, धन।
संज्ञा
(हिं. गाँठ से अनु.)

साँड़
बैल जो केवल गर्भाधान करने के लिए पाला जाता है।
संज्ञा
(सं. षंड)

साँड़
बैल जो मृतक की स्मृति में दागकर छोड़ दिया जाता है।
संज्ञा
(सं. षंड)
मुहा.- साँड़ की तरह (सा) घूमना - आजाद और बेफिक्र धूमना। साँड़ की तरह डकराना- बहुत जोर से या डरावना शब्द करके चिल्लाना।

सांत
जिसके दुष्ट विचारों का अन्त हो गया हो।
वि.
(सं. शांत)

सांत
विध्न-बाधा से रहित।
वि.
(सं. शांत)

सांत
धीर और सौम्य।
वि.
(सं. शांत)

सांत
मौन।
वि.
(सं. शांत)

सांत
मृत।
वि.
(सं. शांत)

सांत
साहित्य के नौ रसों में एक।
संज्ञा

सांतनु
भीष्म पितामह के पिता का नाम।
संज्ञा
(सं. शांतनु)
उ.- तौ लाजौं गंगा-जननी कौं सांतनु-सुत न कहाऊँ-१-२६९।

सांतनु-सुत
भीष्म पितामह।
संज्ञा
(सं. शांतनु+सुत)

सांति
चित्त की आवेगहीनता।
संज्ञा
(सं. शांति)
उ.- बहुरि पुरान अठारह किये। पै तउ सांति न आई हिये-१-२३०।

सांति
गतिहीनता।
संज्ञा
(सं. शांति)

सांति
सन्नाटा, नीरवता।
संज्ञा
(सं. शांति)

सांति
मार-काट या विघ्ना-बाधा का प्रभाव।
संज्ञा
(सं. शांति)

सांति
धीरता और सौम्यता।
संज्ञा
(सं. शांति)

सांति
मृत्यु।
संज्ञा
(सं. शांति)

सांति
अमंगल आदि दूर करनेवाले धार्मिक कृत्य।
संज्ञा
(सं. शांति)

सांत्वना
ढारस, धीरज।
संज्ञा
(सं.)

साँथरी
चटाई, बिछौना।
संज्ञा
(सं. संस्तर)

साँद, साँदा
लकड़ी जो पशु को भागने से रोकने के लिए गले में बाँधी जाती है।
संज्ञा
(देश.)

सांदीपन, सांदीपनि
एक प्रसिद्ध मुनि जिन्होंने श्रीकृष्ण और बलराम को धनुर्वेद की शिक्षा दी थी।
संज्ञा
(सं. सान्दीपनि)

सांद्र
जंगल, बन।
संज्ञा
(सं.)

साँड़
ऊँट।
संज्ञा

साँड़
खूब मजबूत।
वि.

साँड़
आवरा, चरित्रहीन।
वि.

साँड़नी
ऊँटनी जो बहुत तेज चलने के लिए प्रसिद्ध है।
संज्ञा
(हिं. साँड़)

साँड़िया
साड़नी-सवार।
संज्ञा
(हिं. साँड़)

सांत
जिसका अंत अवश्य होता हो।
वि.
(सं. स+अंत)

सांत
अंत-युक्त।
वि.
(सं. स+अंत)

सांत
राग आदि से रहित।
वि.
(सं. शांत)

सांत
गति रहित।
वि.
(सं. शांत)

सांत
शब्द-रहित।
वि.
(सं. शांत)

सांद्र
घना।
वि.

सांद्र
कोमल।
वि.

सांद्र
सुन्दर।
वि.

सांद्रता
‘सांदु’ होने का भाव।
संज्ञा
(सं.)

साँध, सांध
निशाना, लक्ष्य।
संज्ञा
(सं. संधान)

साँध, सांध
संधि।
संज्ञा
(सं. संधि)

साँध, सांध
संधि का, संधि-संबंधी।
वि.
(सं.)

साँधत
निशाना साधता है।
क्रि.स.
(हिं. साँधना)
उ.- हँसि हँसि नाग-फाँस सर साँधत बंधन बंधु समेत बँधायौ-९-१४१।

साँधना, साँधनो
निशान साधना, लक्ष्य या संधान करना।
क्रि.स.
(सं. संधान)

साँधना, साँधनो
पूरा करना, साधना।
क्रि.स.
(सं. साधन)

साँधना, साँधनो
एक में मिलाना, मिश्रित या सम्मिलित करना।
क्रि.स.
(सं. सेधि)

साँधना, साँधनो
सानना।
क्रि.स.
(सं. सेधि)

साँधना, साँधनो
टूटी रस्सी में जोड़ लगाना।
क्रि.स.
(सं. सेधि)

साँधा
टूटी रस्सी आदि को जोड़ने से पड़ी हुई गाँठ।
संज्ञा
(सं. सेधि)
मुहा.- साँधा मारना - टूटी रस्सी को गाँठ लगाकर जोड़ना।

साँधि, सांधि
संधि।
संज्ञा
(सं. संधि)

साँधि, सांधि
निशाना साधकर, लक्ष्य या संधान करके।
क्रि.स.
(हिं. साँधना)
उ.- (क) सप्त ताल सर साँधि बालि हति-९-७०। (ख) भृकुटी सर धनु साँधि बचनबर-१८८७।

साँधिल
साधक।
वि.
(हिं. साधना)

साँधे
लक्ष्य या संधान किये हुए।
वि.
(हिं. साँधना)
उ.- राम धनुष अरू सायक साँधे, सिय-हित मृग पाछैं उठि धाए-९-५८।

साँधे
लक्ष्य या संधान किये।
क्रि.स.

साँध्य
संध्या-सम्बन्धी।
वि.
(सं.)

साँप
भुजगं, सर्प।
संज्ञा
(सं. सर्प, प्रा. सप्प)
मुहा.- कलेजे पर साँप लोटना- (किसी की उन्नति या सफलता देखकर) ईर्ष्या आदि के कारण बहुत दुख होना। साँप सूँघ जाना- (१) साँप के काटने से निर्जीव हो जाना। (२) सर्वथा गतिहीन और मौन हो जाना (व्यंग्य)। साँप की तरह केंचुल छोड़ना या झाड़ना- पुराना और भद्दा रूप-रंग छोड़कर नया और सुन्दर रूप धारण करना (व्यंग्य)। साँप के मुँह में - बड़े जोखिम या संकट में। साँप-छँछूदर की दशा -बहुत असमंजस और दुबिधा की दशा या स्थिति।

साँप
बहुत दुष्ट और निर्दयी व्यक्ति।
संज्ञा
(सं. सर्प, प्रा. सप्प)

सांपत्तिक
संपत्ति का, आर्थिक।
वि.
(सं. साम्पत्तिक)

साँपधरन
शिवाजी।
संज्ञा
(हिं. साँप+ सं. धारण)

साँपि, साँपिन, साँपिनि, साँपिनी
सर्प की मादा।
संज्ञा
(हिं. साँप)
उ.- पूँछ राखी चाँपि, रिसनि काँपि काली काँपि, देखि सब साँपि-अवसान भूले-५५२।

साँपि, साँपिन, साँपिनि, साँपिनी
दुष्ट और कुटिल नारी।
संज्ञा
(हिं. साँप)

साँपि, साँपिन, साँपिनि, साँपिनी
घोड़े के शरीर की एक भौंरी जो अशुभ समझी जाती है।
संज्ञा
(हिं. साँप)

साँपियाँ
गहरा भूरा या काला रंग जो साँप के रंग जैसा होता है।
संज्ञा
(हिं. साँप)

सांप्रत
अभी, इसी समय।
अव्य.
(सं. साम्प्रत)

सांप्रतिक
आधुनिक।
वि.
(सं. साम्प्रतिक)

साम्प्रदायिक
संप्रदाय का
वि.
(सं. साम्प्रदायिक)

साम्प्रदायिकता
सांप्रदायिक होने का भाव।
संज्ञा
(सं. साम्प्रदायिकता)

साम्प्रदायिकता
केवल अपने संप्रदाय का ही हित चाहने की संकुचित भावना या दृष्टि।
संज्ञा
(सं. साम्प्रदायिकता)

सांब
श्रीकृष्ण का पुत्र जो जांबवंती के गर्भ से जन्मा था। अत्यन्त रूपवान होने का इसे बहुत गर्व था। इसका विवाह दुर्योधन की पुत्री लक्ष्मणा से हुआ था।
संज्ञा
(सं. साम्ब)
उ.- स्याम सुनि सांब गयौ हस्तिनापुर तुरत लक्ष्मणा जहाँ स्वयंवर रचायो-१० उ.४६।

सांबर
राहखर्च, पाथेय।
संज्ञा
(सं. संबल)

सांबर
सांभरहिरन।
संज्ञा
(सं.)

सांबर
साँभरनमक।
संज्ञा
(सं.)

सांबरी
जादूगरी, माया।
संज्ञा
(सं. साम्बरी)

सांभर
राजपूताने की एक झील जिसके खारे पानी से नमक बनता है।
संज्ञा
(सं. सम्भल या साम्भल)

सांभर
उक्त झील के पानी से बना हुआ नमक।
संज्ञा
(सं. सम्भल या साम्भल)

श्रृंग
सिंगी बाजा।
संज्ञा
(सं.)
उ.- कंस ताल करताल बजावत श्रृंग (सृंग) मधुर मुँहचंग।

श्रृंगवेरपुर
एक प्राचीन नगर जहाँ रामायणकाल में निषादराज गुह की राजधानी थी।
संज्ञा
(सं.)

श्रृंगार
नौ रसों में एक जो रसराज, कहा जाता है और जिसका स्थायी भाव रति, आलंबन विभाव नायक-नायिका, उद्दीपन सखा-सखी, वन-बाग, चंद्र, हाव-भाव आदि हैं। यह रस दो प्रकार का होता है- संयोग और वियोग।
संज्ञा
(सं.)

श्रृंगार
स्त्रियों की सजावट; श्रृंगार १६ हैं - उबटन, स्नान, वस्त्र धारण, सँवारना, काजल लगाना, माँग भरना, महावर लगाना, तिलक लगाना, चिबुक और कपोल पर तिल बनाना, मेंहदी रचाना, सुगंधित लेप लगाना, आभूषण पहनना, पुष्पमाल धारण करना, पान खाना और मिस्सी लगाना।
संज्ञा
(सं.)

श्रृंगार
किसी चीज की सजावट।
संज्ञा
(सं.)

श्रृंगार
भक्ति का वह रूप जिसमें भक्त अपने को पत्नी और इष्टदेव को पति मानता है।
संज्ञा
(सं.)

श्रृंगार
वह जिससे किसी की शोभा बढ़े।
संज्ञा
(सं.)
उ.- यशुमति कोख सराहि बलैया लेन लगीं ब्रजनार। ऐसो सुत तेरे गृह प्रगटयो या ब्रज को श्रृंगार।

श्रृंगारत
श्रृंगार करते हैं।
क्रि.स.
(हिं. श्रृंगारना)
उ.- मोहन मोहिनी अंग श्रृंगारत- पृ. ३८८ (८०)।

श्रृंगारना
श्रृंगार करना, सजाना।
क्रि.स.
(सं. श्रृंगार)

श्रृंगारमंडल
व्रज का एक स्थान जहाँ श्रीकृष्ण द्वारा राधिका का श्रृंगार किया जाना प्रसिद्ध है।
संज्ञा
(सं.)

सांभर
एक तरह का हिरन।
संज्ञा
(सं. सम्भल या साम्भल)

सांभर
राहखर्च, पाथेय।
संज्ञा
(सं. संबल)

साँमुहें
सामने, सम्मुख।
अव्य.
(सं. सम्मुख)

साँवत
योद्धा।
संज्ञा
(सं. सामन्त)

साँवत
सामन्त।
संज्ञा
(सं. सामन्त)

साँवत
एक तरह का राग।
संज्ञा

साँवर, साँवरा
श्याम रंग का।
वि.
(हिं. साँवरा)

साँवर, साँवरा
सलोना, सुन्दर।
वि.
(हिं. साँवरा)

साँवर, साँवरा
श्रीकृष्ण का एक नाम।
संज्ञा

साँवर, साँवरा
पति, प्रियतम, प्रेमी।
संज्ञा

साँवरी
श्याम वर्ण की।
वि.
(हिं. साँवला)
उ.- जहाँ जमुना बहै सुभग साँवरी-३४३०।

साँवरे
श्याम रंगवाले।
वि.
(हिं. साँवला)
उ.- मानो गज-मुक्ता मरकत पर सोभित सुभग साँवरे गात-१०-१५९।

साँवरे
श्रीकृष्ण ने।
संज्ञा
उ.- मेरे साँवरे जब मुरली अधर धरो-६२३।

साँवरैं
श्रीकृष्ण ने।
संज्ञा
(हिं. साँवरा)
उ.- सूर सरबस हरथौ साँवरैं-१०-३०७।

साँवरो, साँवरौ
श्याम वर्ण का।
वि.
(हिं. साँवरा)
उ.- साँवरौ मनमोहन माई-६१६।

साँवरो, साँवरौ
विष्णु या उनके अवतार राम और कृष्ण।
संज्ञा
उ.- छाड़ि सुखधाम अरु गरुड़ तजि साँवरौ, पवन के गवन तैं अधिक धायौ-१-५।

साँवल
श्याम रंग का।
वि.
(हिं. साँवला)
उ.- उज्जल साँवल बपु सोभित अंग-१६१३।

साँवल
श्रीकृष्ण का एक नाम।
संज्ञा

साँवल
पति, प्रियतम, प्रेमी।
संज्ञा

साँवलता, साँवलताई
सावला' होने का भाव, श्यामता।
संज्ञा
(हिं. साँवला)

साँस
वह संधि या दरार जिसमें से होकर हवा पानी आ-जा सके।
संज्ञा
(सं. श्वास)
मुहा.-(किसी पदार्थ या वस्तु का) साँस लेना-(किसी पदार्थ या वस्तु में) संधि या दरार पड़ जाना।

साँस
किसी अवकाश में भरी हुई हवा।
संज्ञा
(सं. श्वास)

साँसत
दम छुटने-जैसी बहुत यातना या पीड़ा।
संज्ञा
(हिं. साँस+त)

साँसत
झंझट, बखेड़ा।
संज्ञा
(हिं. साँस+त)

साँसत
सजा, दंड।
संज्ञा
(हिं. साँस+त)

साँसतघर
काल कोठरी।
संज्ञा
(हिं. साँसत+घर)

साँसतघर
वह घर हवा-रोशनी न आती हो।
संज्ञा
(हिं. साँसत+घर)

साँसना
सजा या दंड देना।
क्रि.स.
(सं. शासन)

साँसना
बहुत अधिक कष्ट या यातना पहुँचाना।
क्रि.स.
(सं. शासन)

साँसना
डाँटना, उपटना।
क्रि.स.
(सं. शासन)

साँवला
श्याम वर्ण का।
वि.
(सं. श्यामला)

साँवला
श्रीकृष्ण का एक नाम।
संज्ञा

साँवला
पति, प्रियतम, प्रेमी।
संज्ञा

साँवलापन
साँवला होने का भाव, अवस्था या गुण, श्यामलता।
संज्ञा
(हिं. साँवला+पन)

साँवाँ
एक तरह का घटिया जन।
संज्ञा
(सं. श्यामक)

साँवाँ
साँवला।
वि.
(सं. श्याम)

साँवाँ
काला।
वि.
(सं. श्याम)

साँस
नाक या मुँह से हवा खींचने और निकालने की क्रिया, दम।
संज्ञा
(सं. श्वास)
मुहा.-साँस उखड़ना-मरते समय बहुत कष्ट से साँस ले पाना। साँस ऊपर-नीचे होना- (१) साँस रुकना, दम घुटना। (२) बहुत घबरा जाना। साँस खींचना- दम साधना। साँस चढ़ना-परिश्रम आदि से साँस का बहुत जल्दी-जल्दी चलना। साँस चढ़ाना-दम साधना। साँस टूटना- मरते समय बहुत कष्ट से साँस ले पाना। साँस तक न लेना-बिलकुल चुप-चाप या मौन होना। साँस फूलना-(१) दमे का रोग होना। (२) जल्दी-जल्दी साँस चलना। गहरी, ठंढी या लंबी साँस भरना या लेना- (१) बहुत अधिक दुख के कारण लंबी साँस लेकर और रोककर धीरे-धीरे छोड़ना। (२) बहुत संतोष का अनुभव करना। साँस रहते- जीते जी, जीवित रहते हुए। साँस रुकना-साँस के लेने-निकालने में किसी कारण से बाधा होना। उलटी साँस लेना- (१) मरते समय बहुत कष्ट से साँस ले पाना। (२) बहुत अधिक दुख आदि के कारण लम्बी साँस लेकर और रोककर धीरे-धीरे निकलना या छोड़ना।

साँस
फुरसत, छुट्टी, अवकाश।
संज्ञा
(सं. श्वास)
मुहा.-साँस लेना-कोई काम करते करते थककर विश्राम लेने के लिए ठहरना या रुकना।

साँस
गुंजाइश, दम, समाई।
संज्ञा
(सं. श्वास)

साँसना
बहुत अधिक कष्ट या यातना।
संज्ञा

साँसना
दंड।
संज्ञा

साँसना
डाँट-डपट।
संज्ञा

सांसर्गिक
संसर्ग-सम्बन्धी।
वि.
(सं.)

सांसर्गिक
संसर्ग के कारण उत्पन्न होनेवाला।
वि.
(सं.)

साँसा
साँस, श्वास।
संज्ञा
(हिं. साँस)

साँसा
जिंदगी, जीवन।
संज्ञा
(हिं. साँस)

साँसा
प्राण।
संज्ञा
(हिं. साँस)

साँसा
घोर कष्ट।
संज्ञा
(हिं. साँसत)

साँसा
चिंता।
संज्ञा
(हिं. साँसत)
मुहा.-साँसा चढ़ना-बहुत चिंता होना।

साइक
खड़्ग।
संज्ञा
(सं. शायक)

साइत
क्षण, पल।
संज्ञा
(अ. साअत)

साइत
समय।
संज्ञा
(अ. साअत)

साइत
मुहूर्त।
संज्ञा
(अ. साअत)

साइत
शुभ समय।
संज्ञा
(अ. साअत)

साइयाँ
स्वामी।
संज्ञा
(हिं. साँईं)

साइयाँ
पति।
संज्ञा
(हिं. साँईं)

साइयाँ
परमेश्वर।
संज्ञा
(हिं. साँईं)

साइर
सागर, समुद्र।
संज्ञा
(सं. सागर)
उ.- जनक-सुता हेत हत्यौ लंकपति, बाँध्यौ साइय-(सायर)-पाँज-१-२५५।

साईं
प्रभु, स्वामी।
संज्ञा
(सं. स्वामी)

साईं
परमेश्वर।
संज्ञा
(सं. स्वामी)

साईं
पति।
संज्ञा
(सं. स्वामी)

साई
पेशगी, बयाना।
संज्ञा
(हिं. साइत ?)
उ.- साई बजाना-जिससे साई पायी हो, उसके यहाँ जाकर गाना-बजाना।

साई
सोने या शयन करनेवाला।
वि.
(हिं. शायी)

साई
जलसाई-जलशायी, जल में शयन करनेवाले विष्णु।
यौ.
उ.- अच्युत रहै सदा जलसाई-१०-३।

साउज
शिकार।
संज्ञा
(हिं. सावज)

साऊ
महाजन।
संज्ञा
(हिं. शाह)
उ.- मोसौं कहना मोल को लीनौ, आपु कहावत साऊ-३८१।

साकभरी
साँभर झील या उसका निकटवर्ती प्रदेश।
संज्ञा
(सं. शाकम्भरी)

साक
साग-भाजी, सब्जी।
संज्ञा
(सं. शाक)
उ.- साक पत्र लै सबै अघाए-१-१२२।

साक
रोब, धाक।
संज्ञा
(हिं. साका)
मुहा.-साक चलना-प्रभाव माना जाना, धाक बँधना। चलति साक- (सर्वत्र) प्रभाव या धाक है। उ.- करजकर पर कमल वारत चलति जहँ-तहँ साक-१४१३।

साँसा
शक, संदेह।
संज्ञा
(सं. संशय)

साँसा
डर।
संज्ञा
(सं. संशय)
मुहा.-साँसा पड़ना-संदेह होना।

सांसारिक
संसार-सम्बन्धी, लौकिक।
वि.
(सं.)

साँसी
साँस, श्वास।
संज्ञा
(हिं. साँस)

साँसो
संशय, संदेह।
संज्ञा
(हिं. साँसा)

सांस्कृतिक
संस्कृति-सम्बन्धी।
वि.
(सं.)

सा
समान, तुल्य।
अव्य.
(सं. सदृश)

सा
एक परिमाण-सूचक शब्द।
अव्य.
(सं. सदृश)

सा
संगीत में षड़ज-सूचक शब्द।
संज्ञा
(सं. षड्ज)

साइक
तीर।
संज्ञा
(सं. शायक)

साक-चेरी, साकचेरी
हिना, मेंहदी।
संज्ञा
(सं. शाक+हिं. चेरी ?)

साकट, साकत
शाक्त मत का अनुयायी।
वि.
(सं. शाक्त)
उ.- तुम साकट वै भगत भागवत राग-द्वेष तैं न्यारे-१-२४२।

साकट, साकत
जिसने गुरु-दीक्षा न ली हो।
वि.
(सं. शाक्त)

साकट, साकत
जो मद्य-माँस-सेवी हो।
वि.
(सं. शाक्त)

साकट, साकत
दुष्ट, कुटिल।
वि.
(सं. शाक्त)

साकट, साकत
शक्ति।
संज्ञा
(सं. शाक्ति)

साकर
तंग, सँकरा।
वि.
(सं. संकीर्ण)

साकर
शक्कर।
संज्ञा
(हिं. शक्कर)

साकर
जंजीर, श्रृंखला।
संज्ञा
(हिं. साँकल)
उ.- धावत अध अवनी आतुर तजि साकर सगुन सु छूटो-३४०१।

साकल, साकला
जंजीर।
संज्ञा
(हिं. साँकल)

साकार
कल्पना या (योजना) जिसे क्रियात्मक रूप दिया जाय।
वि.
(सं.)

साकार
ईश्वर का अवतारी या मूर्तिमान रूप।
संज्ञा

साकारता
साकार' होने का भाव।
संज्ञा
(सं.)

साकारोपासना
ईश्वर की मूर्ति, रूप या अवतार की उपासना।
संज्ञा
(सं.)

साकिन
रहनेवाला, निवासी।
वि.
(अ.)

साकी
शराब पिलानेवाला।
संज्ञा
(अ. साक़ी)

साकी
वह जिससे प्रेम किया जाय।
संज्ञा
(अ. साक़ी)

साकेत
अयोध्या नगरी।
संज्ञा
(सं.)

साकेत
भगवान रामचन्द्र का लोक या धाम।
संज्ञा
(सं.)

साक्षर
पढ़ा लिखा, शिक्षित।
वि.
(सं.)

श्रृंगारमंडल
प्रेमी-प्रेमिका का मिलन या क्रीड़ास्थल।
संज्ञा
(सं.)

श्रृंगारहाट
वह बाजार जहाँ वेश्यालय हों, चकला।
संज्ञा
(सं. श्रृंगार+हिं. हाट)

श्रृंगारिक
श्रृंगार-संबंधी।
वि.
(सं.)

श्रृंगारित
जिसका श्रृंगार हुआ हो।
वि.
(सं.)

श्रृंगारिया
जो देवताओं का श्रृंगार करे।
वि.
(सं. श्रृंगार + हिं. इया)

श्रृंगारिया
बहुरूपिया।
वि.
(सं. श्रृंगार + हिं. इया)

श्रृंगारी
श्रृंगार-संबंधी।
वि.
(सं. श्रृंगार)

श्रृंगारे
सजाये-सँवारे।
क्रि.स.
(हिं. श्रृंगारना)
उ.- कहुँ गजराज बाजि श्रृंगारे, तापर चढ़े जु आप-सारा ६७७।

श्रृंगि
जिसके सींग हों।
वि.
(सं. श्रृंगिन्)

श्रृंगी
पहाड़, पर्वत।
संज्ञा
(सं. श्रृंगिन्)

साकल्य
सकलता, पूर्णता।
संज्ञा
(सं.)

साका, साकौ
संवत्।
संज्ञा
(सं. शाका)

साका, साकौ
ख्याति, प्रसिद्धि।
संज्ञा
(सं. शाका)

साका, साकौ
यश, कीर्ति।
संज्ञा
(सं. शाका)

साका, साकौ
कीर्ति का स्मारक।
संज्ञा
(सं. शाका)

साका, साकौ
रोब, धाक।
संज्ञा
(सं. शाका)
मुहा.-साका चलना-रोब या धाक बँधना, प्रभाव माना जाना। साका चलाना या बाँधना-रोब या धाक जमाना, प्रभाव डालना। साकौ कीन्हौ-रोब या धाक जमाकर कीर्ति या ख्याति प्राप्त की है। उ.- ऎसौ और कौन त्रिभुवन मैं तुम सरि साकौ कीन्हौ-१०-३५।

साका, साकौ
ऎसा असामान्य कार्य जिससे कर्ता की कीर्ति या ख्याति बढ़े।
संज्ञा
(सं. शाका)

साकार
जिसका आकार या स्वरूप हो।
वि.
(सं.)

साकार
मूर्त, मूर्तिमान, साक्षात्।
वि.
(सं.)

साकार
स्थूल।
वि.
(सं.)

साक्षरता
साक्षर होने का भाव।
संज्ञा
(सं.)

साक्षात, साक्षात्
सामने, प्रत्यक्ष।
अव्य.
(सं. साक्षात)

साक्षात, साक्षात्
साकार, मूर्तिमान।
वि.

साक्षात, साक्षात्
मुलाकात, भेंट, देखा-देखी, मिलन।
संज्ञा

साक्षात्कार
मुलाकात, भेंट, मिलन।
संज्ञा
(सं.)

साक्षी
वह जिसने किसी घटना को स्वयं देखा हो।
संज्ञा
(सं. साक्षिन्)

साक्षी
गवाह, साखी।
संज्ञा
(सं. साक्षिन्)

साक्षी
देखनेवाला, वर्शक।
संज्ञा
(सं. साक्षिन्)

साक्षी
किसी बात को कहकर प्रमाणित करने की क्रिया, गवाही।
संज्ञा

साक्ष्य
गवाही।
संज्ञा
(सं.)

साखा
वंश या जाति का उपभेद।
संज्ञा
(सं. शाखा)

साखामृग
बंदर।
संज्ञा
(सं. शाखामृग)
उ.- महा मधुर प्रिय बानी बोलत, साखामृग तुम किहिं के तात-९-६९।

साखि, साखी
गवाह, साक्षी।
संज्ञा
(सं. साक्षि, हिं. साखी)
उ.- (क) ऊँच-नीच ब्योरौ न रहाई। ताकी साखी मैं सुनि भाइ-१-२३०। (ख) सकल देव-मुनि साखी-१०-४। (ग) ग्वाल सबै हैं साखी-७७४। (घ) भए चंद्र सूरज तहाँ साखी-२४५९।

साखि, साखी
गवाही, साक्षी।
संज्ञा
उ.- (क) चिंता तजै परीच्छित राजा सुनि सिख-साखि हमार-१-२२२। (ख) अब लौं हमारी जग में चलती नई पुरानी साखी-२७३९।
मुहा.-साखी पुकारना-गवाही देना। पुकारत साखि-गवाही देता है। उ.- सूरदास स्वामी के आगे निगम पुकारत साखि-३३७३।

साखि, साखी
ज्ञान-संबंधी दोहे, पद या कविता।
संज्ञा

साखि, साखी
पेड़, वृक्ष।
संज्ञा
(सं. शाखिन्)

साखू
शाल वृक्ष।
संज्ञा
(सं. शाख या शाल)

साखै
गवाही या साक्षी (देते) हैं।
क्रि.स.
(हिं. साखना)
उ.- जाति-पाँति-कुल कानि न मानत वेद-पुराननि साखै-१-१५।

साखोच्चारन
विवाह के अवसर पर वर-वधू का वंश-परिचय देने की क्रिया।
संज्ञा
(सं. शाखोच्चारण)

साग
कुछ पेड़ पौधो की पत्तियाँ जो तरकारी की तरह खायी जाती है।
संज्ञा
(सं. शाक)
उ.- (क) साग चना सँग सब चौराई-२३२१। (ख) भक्त के बस भक्त-वत्सल बिदुर सातों साग खायो-१० उ.-१८।

साक्ष्य
दृश्य।
संज्ञा
(सं.)

साख
गवाह।
संज्ञा
(हिं. साक्षी)

साख
गवाही।
संज्ञा
(हिं. साक्षी)

साख
रोब, धाक।
संज्ञा
(हिं. साका)

साख
मर्यादा।
संज्ञा
(हिं. साका)

साख
लेनदेन आदि में खरेपन की मान्यता।
संज्ञा
(हिं. साका)

साख
वृक्ष की शाखा या डाली।
संज्ञा
(सं. शाखा)
उ.- सुर तरुवर की साख लेखिनी लिखत सारदा हारै-१-१८३।

साखना, साखनो
गवाही देना।
क्रि.स.
(हिं. साख)

साखर
पढ़ा लिखा, साक्षर।।
वि.
(सं. साक्षर)

साखा
पेड़ की टहनी या डाली।
संज्ञा
(सं. शाखा)
उ.- (क) फल की आसा चित्त धरि, जो बृच्छ बढ़ावै। महामूढ़ सो मूल तजि साखा जल नावै-२-९। (ख) साखा पत्र भए जल मेलत-१०-१७३।

साग
तरकारी, भाजी।
संज्ञा
(सं. शाक)

साग
साग-पात-रूखा-सूखा भोजन।
यौ.

साग
तुच्छ और निकम्मी चीज।
यौ.
मुहा.-साग-पात समझना-बहुत तुच्छ समझना।

सागर
समुद्र।
संज्ञा
(सं.)
उ.-देखौ माई, सुंदरता कौ सागर-६२८।

सागर
झील, जलाशय।
संज्ञा
(सं.)

सागर
आकर, निधान।
संज्ञा
(सं.)
उ.-कलानिधान सकल गुन-सागर-१-७।

सागर
दशनामी साधुओं की उपाधि या सांप्रदायिक नाम।
संज्ञा
(सं.)

सागौन
एक वृक्ष।
संज्ञा
(सं. शाल)

साग्र
सब, कुल, समस्त।
वि.
(सं.)

साग्र
आदि या आरंभ से।
क्रि.वि.

साग्रह
जोर देकर, आग्रहपूर्वक।
क्रि.वि.
(सं.)

साचरी
एक रागिनी।
संज्ञा
(सं.)

साचेत
चेतनायुक्त।
वि.
(सं. सचेत)

साचेत
सचेत।
वि.
(सं. सचेत)

साच्छात
सामने, सम्मुख, प्रत्यक्ष रूप में।
अव्य.
(सं. साक्षात्)
उ.-(क) जीवनि-आस प्रबल स्त्रुति लेखी। साच्छात सो तुममैं देखी-१-२८४। (ख) ब्रह्मादिक खोजत नित जिनकौं। साच्छात् देख्यौ तुम तिनकौं-८००।

साच्छात
साकार, मूर्तिमान।
वि.

साच्छात
मुलाकात, भेंट, मिलन।
संज्ञा

साच्छ, साछ
गवाह।
संज्ञा
(सं. साक्षी)

साच्छ, साछ
गवाही, साक्षी।
संज्ञा

साच्छी, साछी
गवाही।
संज्ञा
(सं. साक्षी)

साज
सजावट का काम, बात या तैयारी।
संज्ञा
(फ़ा. साज़ या सं. सज्जा)
उ.-सूर अब डर न करि जुद्ध को साज करि-९-१४२।

साज
वैभव, शोभा आदि की सूचक बातें।
संज्ञा
(फ़ा. साज़ या सं. सज्जा)
उ.- या बिधि राजा करथौ बिचारि राज-साज सबहीं कौं डारि-१-३४१।

साज
सजावट सामान, उपकरण या साग्री।
संज्ञा
(फ़ा. साज़ या सं. सज्जा)
उ.-कर कंकन कंचन थार मंगल-साज लिए-१०-२४।

साज
रंग-ढंग, स्थिति, दशा।
संज्ञा
(फ़ा. साज़ या सं. सज्जा)
उ.-और पतित आवत न आँखि-तर देखत अपनौ साज-१-९६।

साज
बाजा, वाद्य।
संज्ञा
(फ़ा. साज़ या सं. सज्जा)
मुहा.-साज छेड़ना-बाजा बजाना शुरू करना।

साज
लड़ाई के हथियार।
संज्ञा
(फ़ा. साज़ या सं. सज्जा)

साज
मेल-जोल।
संज्ञा
(फ़ा. साज़ या सं. सज्जा)

साज
बनाने या मरम्मत करनेवाला।
वि.

साजति
सजाती है।
क्रि.स.
(हिं. साजना)
उ.-(क) नैन दोउ आँजति नासा बेसरि साजति-२०८०। (ख) उलटि अंग आभूषन साजति-२५७२।

साजन
सज्जन।
संज्ञा
(सं. सज्जन)

साजना, साजनो
प्रेमी।
संज्ञा
(हिं. साजन)

साज-बाज
तैयारी, उपक्रम।
संज्ञा
(हिं. साज+अनु. बाज)

साज-बाज
मेल-जोल, घनिष्ठता।।
संज्ञा
(हिं. साज+अनु. बाज)

साज-सामान
माल-असबाब, सामग्री।
संज्ञा
(हिं. साज+सामान)

साज-सामान
ठाटबाट।
संज्ञा
(हिं. साज+सामान)

साजिंदा
बाजा बजानेवाला।
संज्ञा
(फ़ा. साजिंदः)

साजि
अवसर के अनुकुल रूप म प्रस्तुत करके।
क्रि.स.
(हिं. साजना)
उ.-दिन दस लौं जल-कुंभ साजि दीप-दान करवायौ-९-५०।

साजिया
सजानेवाला।
वि.
(हिं. सजाना)

साजिया
परमेश्वर।
संज्ञा

साजिया
बाजा बजानेवाला।
संज्ञा
(हिं. साज)

साजन
प्रेमी, प्रिय, वल्लभ।
संज्ञा
(सं. सज्जन)
उ.-सूरदास गोपी क्यौं जीवैं बिछुरे हरि जी साजन-१० उ.-९९।

साजन
पति, भर्ता।
संज्ञा
(सं. सज्जन)

साजन
साज-श्रृंगार।
संज्ञा
(सं. सज्जा)
उ.-(क) सूरदास प्रभु मिली राधिका अंग अंग करि साजन-६२२। (ख) दूलह फिरत ब्याह के साजन-३१८३।

साजन
सजाने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(हिं. साजना)

साजन
आवश्यकतानुसार तैयारी करना।
क्रि.स.

साजन
सग्यो साजन-सजाने लगा।
प्र.
उ.-फौज मदन लग्यो साजन-२८१७।

साजना, साजनो
क्रमानुसार रखना।
क्रि.स.
(हिं. सजाना)

साजना, साजनो
अलंकृत करना।
क्रि.स.
(हिं. सजाना)

साजना, साजनो
अलंकृत होना।
क्रि.अ.
(हिं. सजना)

साजना, साजनो
पति।
संज्ञा
(हिं. साजन)

साजिश
कुचक्र, षड्यंत्र।
संज्ञा
(फ़ा. साज़िश)

साजु
(तैयारी या साधना के) उपकरण या साधन।
संज्ञा
(हिं. साज)
उ.-कैसे हैं निबहत अबलन पै कठिन योग के साजु- ८०८।

साजु
तैयारी, उपक्रम।
संज्ञा
(हिं. साज)
उ.-चितवति हुती झरोखैं ठाढ़ी किये मिलन कों साजु-८०८।

साजु
ऎश्वर्य-सूचक बातें और साधन।
संज्ञा
(हिं. साज)
उ.-जा जस कारन देत सयाने तन-मन-धन सब साजु-२८५१।

साजुज्य
संपूर्ण मिलन।
संज्ञा
(सं. सायुज्य)

साजुज्य
मुक्ति का वह रूप जिसमें जीवत्मा जाकर परमात्मा में लीन हो जाय।
संज्ञा
(सं. सायुज्य)

साजे
सजाये, तैयार किये।
क्रि.स.
(हिं. साजना)
उ.-सब गोपिन मिलि सकटा साजे-४१२।

साजे
धारण किये।
क्रि.स.
(हिं. साजना)
उ.-सकल सभा जिय जानिकै साजे हथियारा-१० उ.-८।

साजैं
शोभित होते हैं।
क्रि.अ.
(हिं. साजना)
उ.- सूरदास प्रभु महा भक्ति तैं जाति अजातिहिं साजे-१-३६।

साजैं
सजाता है।
क्रि.स.

श्रृंगी
एक ऋषि जो शमीक के पुत्र थे और जिनके शाप से तक्षक ने राजा परीक्षित को डसा था।
संज्ञा
(सं. श्रृंगिन्)

श्रृंगी
सींगवाला पशु।
संज्ञा
(सं. श्रृंगिन्)

श्रृंगी
सींग का बना बाजा।
संज्ञा
(सं. श्रृंगिन्)

श्रृंगी
शिव, महादेव।
संज्ञा
(सं. श्रृंगिन्)

श्रृंगी
एक प्राचीन देश।
संज्ञा
(सं. श्रृंगिन्)

श्रृंगेरी
दक्षिण भारत का एक प्रसिद्ध मठ जिसके अधीश्वर ‘शंकराचार्य’ कहलाते हैं।
संज्ञा
(सं.)

श्रृग, श्रृगाल
गीदड़।
संज्ञा
(सं. श्रृगाल)

श्रृग, श्रृगाल
भीरू, कायर।
वि.

शेख
शेष।
संज्ञा
(सं. शेष)

शेख
मुसलमानों का एक वर्ग।
संज्ञा
(अ. शेख)

साटमार
(साँटे मार-मार-कर) हाथियों को लड़ानेवाला।
संज्ञा
(हिं. साँट+मारना)

साटि, साटी
सामान।
संज्ञा
(देश.)

साटि, साटी
जमापूँजी।
संज्ञा
(देश.)

साटि, साटी
कमची, पतली छड़ी।
संज्ञा
(देश.)

साठ
पचास और दस की संख्या।
संज्ञा
(सं. षष्ठि)

साठ
जो पचास और दस हो।
वि.
उ.- साठ सहस्र सागर के पुत्र-९-९।

साठनाठ
जिसकी पूँजी नष्ट हो गयी हो, निर्धन।
वि.
[हिं. साँठि+नाठ (नष्ठ)]

साठनाठ
रूखा, नीरस।
वि.
[हिं. साँठि+नाठ (नष्ठ)]

साठनाठ
तितर-बितर, अस्तव्यस्त।
वि.
[हिं. साँठि+नाठ (नष्ठ)]

साठा
ईख, गन्ना।
संज्ञा
(देश.)

साजै
सोहता है।
क्रि.अ.
(हिं. साजना)

साजै
सजाता है।
क्रि.स.

साजौं
सजाकर तैयार करूँ।
क्रि.अ.
(हिं. साजना)
उ.- सूर साजौं सबै, देहुँ डाँड़ी अबै, एक तैं एक रन करि बताऊँ-९-१२९।

साजौ
सजाया या क्रमानुसार तैयार किया हुआ।
वि.
(हिं. साजना)
उ.- (क) सीरा साजौ लेहु ब्रजपती-३९६। (ख) सद माखन साजौ दधि मीठौ-४५६।

साज्यो, साज्यौ
सजाया या क्रमानुसार प्रस्तुत किया हुआ।
वि.
(हिं. साजना)

साज्यो, साज्यौ
सजा हुआ है, शोभित है।
क्रि.अ.
उ.- देखो माई, रूप सरोवर साज्यो-पृ. ३४४ (३४)।

साझा
भाग, हिस्सा।
संज्ञा
(सं. साधक)

साझा
हिस्सेदारी।
संज्ञा
(सं. साधक)

साझिया, साझी
हिस्सेदार।
(हिं. साझा)

साझे
भाग, हिस्सा।
संज्ञा
(हिं. साझा)
उ.- साझे भाग नहीं काहू को, हरि की कृपा निनारी-२९००।

साझेदार
हिस्सेदार।
संज्ञा
(हिं. साझा+फ़ा. दार)

साझेदारी
हिस्सेदारी।
संज्ञा
(हिं. साझेदार)

साझो
हिस्सेदारी।
संज्ञा
(हिं. साझा)
उ.- बहुरिन जीवन-मरन सों साझो करी मधुप की प्रीति-२८८४।

साट
छड़ी।
संज्ञा
(हिं. साँट)
उ.- साट सकुच नहिं मानहीं बहु बारनि मारि-१२६७।

साट
(स्त्रियों की) साड़ी।
संज्ञा
(देश.)

साट
बेचने की क्रिया, विक्रय।
संज्ञा
(?)

साटक
भूसी, छिलका।
संज्ञा
(सं. हाटक से अनु.)

साटक
बिलकुल निकम्मी या तुच्छ वस्तु।
संज्ञा
(सं. हाटक से अनु.)

साटना, साटनो
दो चीजों को जोड़ना, मिलाना।
क्रि.स.
(हिं. सटाना)

साटना, साटनो
किसी को गुप्त रीति से अपनी ओर मिला लेना।
क्रि.स.
(हिं. सटाना)

साठा
एक तरह का धान।
संज्ञा
(देश.)

साठा
एक तरह की मधुमक्खी।
संज्ञा
(देश.)

साठा
साठ वर्ष की उम्रवाला।
वि.
(हिं. साठ)

साठि
साठ।
वि.
(हिं. साठ)
उ.- (क) साठि पुत्र अरु द्वादस कन्या-१-४३। (ख) साठि सहस की कथा सुनाए-९-९।

साठी
एक तरह का धान।
संज्ञा
(सं. षष्टिक)

साढ़ी
चौड़े किनारे की, स्त्रियों के पहनने की धोती।
संज्ञा
(सं. शाटिका)

साढ़ी
दूध के ऊपर की मलाई।
संज्ञा
(हिं. साढ़ी)

साढ़साती
शनि ग्रह की साढ़े सात दिन, मास या वर्ष की दशा जिसका फल बहुत बुरा होता है।
संज्ञा
(हिं. साढ़े+सात)

साढ़ी
फसल जो असाढ़ मास में बोई जाती है, असाढ़ी।
संज्ञा
(हिं. असढ़)

साढ़ी
दूध के ऊपर जमने या पड़नेवाली मलाई।
संज्ञा
(सं. सार)
उ.- (क) सब हेरि धरी है साढ़ी, लई ऊपर ऊपर काढ़ी-१०-१८३। (ख) नीरस करि छाँड़ी सुफलक-सुत जैसैं दूध बिन साढ़ी-२५३५।

सातिक
सतोगुणी।
वि.
(सं. सात्विक)

सातिक
पवित्र।
वि.
(सं. सात्विक)

सातिक
सत्वगुण से उत्पन्न।
वि.
(सं. सात्विक)

सातों, सातौं
कुल सात, सब सात।
वि.
(हिं. सात)
उ.- सातौं द्वीप राज ध्रुव कियौ-४-९।
मुहा.-सातौं भूल जाना-पाँच इंद्रियों के साथ-साथ मन और बुद्धि का भी काम न करना, होश-हवास चला जाना।

सात्
एक प्रत्यय जो शब्दांत में जुड़कर 'मिला हुआ' या 'रूप में आया हुआ' अर्थ देता है।
वि.
(सं.)

सात्म्य
एकरूपता, सरूपता।
संज्ञा
(सं.)

सात्यकि, सात्यकी
एक यादव जिसने श्रीकृष्ण और अर्जुन से अस्त्र विद्या सीखी थी।
संज्ञा
(सं. सात्यकि)

सात्व
सत्वगुण-सम्बन्धी।
वि.
(सं.)

सात्वती
शिशुपाल की माता का नाम।
संज्ञा
(सं.)

सात्वती
सुभद्रा का एक नाम।
संज्ञा
(सं.)

साढ़ी
चौड़े किनारे की जनानी धोती।
संज्ञा
(हिं. साड़ी)

साढ़ू
साली का पति।
संज्ञा
(सं. श्यालिवोढर)

साढ़ेसाती
शनि ग्रह की वह दशा जो साढ़े सात दिन, मास या वर्ष की होती हे और जिसका फल बहुत बुरा होता है।
संज्ञा
(हिं. साढ़े+सात+ई)
मुहा.-साढ़ेसाती आना या चढ़ना-दुर्दशा या। विपत्ति के दुर्दिन आना या होना।

सातंक
आतंक के साथ।
क्रि.वि.
(सं. स+आतंक)

सात
जो पाँच और दो योग के बराबर हो।
वि.
(सं. सप्त)
उ.- तद्यपि भवन भाव नहिं ब्रज बिनु खोजौ दीपै सात-३३५१।
मुहा.-सात-पाँच या पाँच और सात- (१) चालाकी, चतुरता। उ.-सूरदास प्रभु के वै बचन सुनहु मधुर मधुर अब मोहिं भूली री पाँच और सात- पृ. ३१५ (४८)। (२) मक्कारी, धूर्तता। सात-पाँच करना- (१) बहाना करना या बनाना। (२) झगड़ा या उपद्रव करना। (३) चतुराई दिखाना। (४) मक्कारी या धूर्तता करना। सात परदे में रखना- (१) बहुत छिपाकर रखना। (२) बहुत सँभालकर रखना। सात समुद्र पार- बहुत दूर। सात राजाओं की साक्षी देना-किसी बात की सत्यता को दृढ़ता-पूर्वक कहना। सात राजा साखि-सत्यता की दृढ़ता-पूर्वक पूष्टि करके। उ.- मनसि बचन अरु कर्मना कछ कहति नाहिंन राखि। सूर प्रभु यह बोल हिरदय सात राजा साखि।

सात
एक प्रत्यय जो 'मिला हुआ' या 'रूप में आया हुआ' अर्थ देता है।
वि.
(सं. सात्)

सातत्य
सतत' का भाव, निरंतरता।
संज्ञा
(सं.)

सात फेरी
विवाह की भाँवर नामक रीति जिसमें वर-वधू अग्नि की सात परिक्रमाएँ करते हैं।
संज्ञा
(हिं. सात+फेरी)

सातवें, सातवैं
जो क्रम में सात के स्थान पर हो।
वि.
(हिं. सात)
उ.- सातवैं दिवस दिखराइहौं प्रलय तोहिं-८-१६।

साता
सात।
वि.
(हिं. सात)
उ.- पियौ पय मोद करि घूँट साता-४४०।

सात्वती
नाटक की एक वृत्ति जिसका व्यवहार वीर, रौद्र, अद्भुत और शांत रसों में होता है। इसमें नायक के वाक्यों से उसकी, दानशीलता आदि गुण प्रकट होते हैं।
संज्ञा
(सं.)

सात्विक
सत्वगुण से सम्बन्ध रखनेवाला, सतोगुणी।
वि.
(सं.)

सात्वक
सत्वगुण से उत्पन्न।
वि.
(सं.)

सात्वक
जिसमें सत्वगुण कौ प्रचानता हो।
वि.
(सं.)

सात्वक
निर्मल, पवित्र।
वि.
(सं.)

सात्वक
सतोगुण से उत्पन्न आठ अंग-विकार-स्तंभ, स्वेद, रोमांच, स्वरभंग, कंप, वैवर्ण्य, अश्रु और प्रलय।
संज्ञा

सात्वक
सात्वती वृत्ति।
संज्ञा

सात्वक
विष्णु।
संज्ञा

सात्वक
वह भक्त जिसकी वृत्ति में सत्वगुण की प्रधानता हो।
संज्ञा

सात्वकी
सत्वगुण से सम्बन्धित।
वि.

सात्वकी
भक्त जिसकी वृत्ति में सात्विकता की प्रधानता हो।
संज्ञा
उ.- भक्त सात्विकी सेवै संत, लखै तिन्हैं मूरति भगवंत ¨¨¨¨¨ भक्त सात्विकी चाहत मुक्ति-३-१३।

साथ
संगत, सहचार।
संज्ञा
(सं. सहित)
मुहा.-साथ छूटना-अलग होना। साथ देना-सहायता या सहयोग देना। साथ लेना- अपने संग ले चलना या रखना। साथ सोना- समागम करना। साथ रहकर या सोकर मुँह छिपाना- बहुत घनिष्ठता होने पर भी संकोच या दुराव करना। साथ का (को)-सहायक खाद्य पदार्थ। साथ का खेला-बचपन का साथी। साथ की खली-बचपन की सहचरी।

साथ
साथी, संगी।
संज्ञा
(सं. सहित)

साथ
मेल, मित्रता।
संज्ञा
(सं. सहित)

साथ
एक सम्बन्ध सूचक अव्यय, सहित।
अव्य.
उ.- (क) रहत विषय के साथ-१-११२। (ख) सेना साथ बहुत भाँतिनि की-१-१४१। (ग) अपनी समसरि और गोप जे तिनको साथ पठाए-५८३।
मुहा.-साथ ही-सिवा, अतिरिक्त। साथ-साथ या साथ ही साथ-एक ही सिलसिले में। एक साथ- एक क्रम या सिलसिले में।

साथ
प्रति, से।
अव्य.

साथ
द्वारा।
अव्य.
उ.- नखन साथ तब उदर बिदारयौ-७-२।

साथरा
बिछौना।
संज्ञा
(देश.)

साथरा
चटाई।
संज्ञा
(देश.)

साथरी
बिछौना।
संज्ञा
(देश.)

साथरी
चटाई, कुश की बनी चटाई।
संज्ञा
(देश.)
उ.- (क) कुस-साथरी बैठि इक आसन-९-१२१। (ख) नातौ मान सगर सागर सौं कुस-साथरी परयौ-९१२२।

साथी
साथ रहनेवाला, संगी।
संज्ञा
(हिं. साथ)
उ.- तुम अलि कमलनयन के साथी-३३२०।

साथी
सहायक।
संज्ञा
(हिं. साथ)
उ.- हरि तुम साँकरे के साथी-१-११२।

साथै
(साथी या सहायक) रूप में (हों या रहते हों)।
संज्ञा
(हिं. साथ)
उ.- सूर तुम्हारी आसा निबहै संकट मैं तुम साथै-१-११२।

सादगी
सादापन।
संज्ञा
(फ़ा.)

सादगी
सीधापन।
संज्ञा
(फ़ा.)

सादर
आदर सहित।
क्रि.वि.
(सं. स+आदर)

सादा
साधारण और संक्षिप्त बनावट का।
वि.
(फ़ा. सादः)

सादा
जिसके ऊपर बेल-बूटे-जैसा सजावट का काम न हो।
वि.
(फ़ा. सादः)

सादा
बिना मेल या मिलावट का।
वि.
(फ़ा. सादः)

सादा
जो छल-कपट न जानता हो, सीधा।
वि.
(फ़ा. सादः)

सादा
सीधा-सादा-सरल हृदयवाला।
यौ.

सादापन
सादगी।
संज्ञा
(हिं. सादा+पन)

सादी
वह पूरी जिसमें पीठी, दाल आदि न भरी हो।
संज्ञा
(हिं. सादा)

सादी
लाल' चिड़िया की मादा।
संज्ञा
(हिं. सादा)

सादी
शिकारी।
संज्ञा
(फ़ा. सद=शिकार)

सादी
घोड़ा।
संज्ञा
(फ़ा. सद=शिकार)

सादी
घुड़सवार व्यक्ति।
संज्ञा
(फ़ा. सद=शिकार)

सादी
व्याह, विवाह।
संज्ञा
(फ़ा. शादी)

सादूर
सिंह।
संज्ञा
(सं. शार्दूल)

शेखचिल्ली
बड़ी-बड़ी बातें गढ़ने या हाँकनेवाला।
संज्ञा
(अ. शेख + हिं. चिल्ली)

शेखर
सिर, माथा।
संज्ञा
(सं.)

शेखर
मुकुट, किरीट।
संज्ञा
(सं.)

शेखर
पर्वत की चोटी, शिखर।
संज्ञा
(सं.)

शेखर
सर्वश्रेष्ठ-व्यक्ति।
संज्ञा
(सं.)

शेखावत
एक क्षत्रिय जाति।
संज्ञा
(सं. शेष)

शेखी
घमंड, गर्व।
संज्ञा
(फ़ा. शेखी)

शेखी
ऐंठ, अकड़।
संज्ञा
(फ़ा. शेखी)

शेखी
डींग, गर्व की बात।
संज्ञा
(फ़ा. शेखी)
मुहा.- शेखी झड़ना, दूर होना या निकलना- घमंड चर हो जाना। शेखी बघारना, मारना या हाँकना - डींग मारना, गर्वभरी बातें करना।

शेखीबाज
घमंडी, अभिमानी।
वि.
(फ़ा. शेखी + बाज़)

साध
भूत-प्रेत आदि को साधने या वश में करनेवाला।
वि.
(सं.)

साध
जो दूसरे के स्वार्थ-साधन में सहायक हो।
वि.
(सं.)

साध
वह जिससे कोई कार्य सिद्ध हो, जरिया, साधन।
संज्ञा

साध
वह हेतु या लक्षण जिसके आधार पर कोई बात सिद्ध करने का प्रयत्न किया जाय।
संज्ञा

साधतिं
अभ्यास में संलग्न रहती है, साधना करती हैं।
क्रि.स.
(हिं. साधना)
उ.- गौरीपति पूजतिं, तप साधतिं, करत रहतिं नित नेम-७८२।

साधन
काम को सिद्ध करने की क्रिया, विधान।
संज्ञा
(सं.)
उ.- दुर्मति अति अभिमान ज्ञान बिन सब साधन तैं टरतौं-१-२०३।

साधन
निर्देश, आदेश आदि के अनुसार कार्य का रूप देना।
संज्ञा
(सं.)

साधन
कर्तव्य या दायित्य का निर्वाह।
संज्ञा
(सं.)

साधन
वह उपचार या कार्य जिससे दोष या क्षति का परिहार हो।
संज्ञा
(सं.)

साधन
सामान या उपकरण जिससे कोई वस्तु तैयार की जाय।
संज्ञा
(सं.)

सादूर
हिंसक पशु।
संज्ञा
(सं. शार्दूल)

साद्दश्य
समान या सदृश होने का भाव, समानता।
संज्ञा
(सं.)

साद्दश्य
बराबरी, तुलना।
संज्ञा
(सं.)

साध
इच्छा, कामना, अभिलाषा।
संज्ञा
(सं. श्रद्धा=उत्कट कामना)
उ.- (क) हरि देखन की साध भरी-९०२। (ख) बार-बार ललचात साध करि, सकुचति पुनि-पुनि बाला-२०७४। (ग) जोइ जोई मन की साध कहौं मैं करिहौं सोई-२६२५। (घ) कल्पतरु देखिबे की भई साध मोहिं-१० उ.-३१।
मुहा.-(किसी बात की) साध न रहने देना - सब प्रकार से इच्छा पूरी कर लेना या कर देना। साध राधना-इच्छा पूरी करना या होना।

साध
गर्भ के सातवें महीने होनेवाला उत्सव।
संज्ञा
(सं. श्रद्धा=उत्कट कामना)

साध
अच्छा, उत्तम।
वि.
(सं. साधु)

साध
सज्जन।
वि.
(सं. साधु)
उ.- हौं असाध, तुम साध हौ-१८१४।

साध
साधु, महात्मा।
वि.
(सं. साधु)
उ.- महाराज, तुम तौ हौ साध-९-३।

साधक
साधना करनेवाला।
वि.
(सं.)

साध
तप करनेवाला, तपस्वी।
वि.
(सं.)
उ.- पचि पचि रहे सिद्ध-साधक मुनि तऊ न घटै बढ़ै-१-२६३।

साधन
कार्य पूरा करने की शक्ति या सामर्थ्य।
संज्ञा
(सं.)

साधन
उपाय, युक्ति।
संज्ञा
(सं.)

साधन
औषध के लिए धातु-शोधन-कार्य।
संज्ञा
(सं.)

साधन
साधना, उपासना।
संज्ञा
(सं.)
उ.- (क) साधन मंत्र-जंत्र उद्यम बल ये सब डारो धोई-१-२६२। (ख) जप, तप ब्रत संजम साधन तैं द्रवित होत पाषान-७६५।

साधन
सहायता।
संज्ञा
(सं.)

साधन
कारण, हेतु।
संज्ञा
(सं.)

साधन
तपस्या-द्वारा मंत्र सिद्ध करना।
संज्ञा
(सं.)

साधनता
साधन का भाव या धर्म।
संज्ञा
(सं.)

साधनता
साधन-क्रिया, साधना।
संज्ञा
(सं.)
उ.- कहि आचार भक्ति बिधि भाषी हंस-धर्म प्रगटायो। कही बिभूति सिद्ध साधनता आस्रम चार कहायो-सारा. ८४४।

साधनहार, साधनहारा
साधने या सिद्ध करनेवाला।
वि.
(सं. साधना+ हिं. हार)

साधनहार, साधनहारा
जो साधा या सिद्ध किया जा सके।
वि.
(सं. साधना+ हिं. हार)

साधनहार, साधनहारा
जो हो सकता हो, साध्य।
वि.
(सं. साधना+ हिं. हार)

साधना
कार्य सिद्ध करने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(सं.)

साधना
उपासना, आराधना।
संज्ञा
(सं.)

साधना
साधन।
संज्ञा
(सं.)

साधना
कार्य सिद्ध या पूरा करना।
क्रि.स.
(सं. साधन)

साधना
निशाना लगाना, लक्ष्य या संधान करना।
क्रि.स.
(सं. साधन)

साधना
अभ्यास करना।
क्रि.स.
(सं. साधन)

साधना
शोधना, शुद्ध करना।
क्रि.स.
(सं. साधन)

साधना
सच्चा प्रमाणित करना।
क्रि.स.
(सं. साधन)

साधना
पक्का करना, ठहराना।
क्रि.स.
(सं. साधन)

साधना
इकट्ठा या एकत्र करना।
क्रि.स.
(सं. साधन)

साधना
वश में करना।
क्रि.स.
(सं. साधन)

साधना
बनावटी को असल की तरह कर दिखाना।
क्रि.स.
(सं. साधन)

साधनिक
साधन का।
वि.
(सं.)

साधनिक
कार्य-साधन से सम्बन्ध रखनेवाला।
वि.
(सं.)

साधनी
जमीन या दीवार की सीध नापने का औजार।
संज्ञा
(सं. साधन)

साधनी
राज, मेमार।
संज्ञा
(सं. साधन)

साधनीय
साधना करने के योग्य।
वि.
(सं.)

साधनीय
जो हो सके या साधा जा सके।
वि.
(सं.)

साधनो
साधना।
क्रि.स.
(सं. साधन)

साधर्म्ध
समान धर्म या गुणों से युक्त होने की अवस्था या भाव, 'वैधर्म्य' का विपर्याय।
संज्ञा
(सं.)

साधा
इच्छा, कामना।
संज्ञा
(हिं. साध)
उ.- (क) मनहुँ तड़ित घन इंदु तरनि, ह्वै बाल करत रस साधा-७०५। (ख) कहाँ मिली नँदनंदन को जिन पुरयौ मन की साधा-११३५। (ग) मैं जानी यह बात हृदय की रही नहीं कछ साधा-१४३७। (घ) कहति कंत (मोहिं) झूलन की साधा-२२७७।

साधार
जिसका आधार हो।
वि.
(सं. स+आधार)

साधारण
जिसमें कोई विशेषता न हो, सामान्य।
वि.
(सं.)

साधारण
सरल, सहज।
वि.
(सं.)

साधारण
सार्वजनिक।
वि.
(सं.)

साधारण
सबके समझने योग्य, सुगम।
वि.
(सं.)

साधारणतः, साधारणतया
सामान्य रूप से।
अव्य.
(सं. साधारणतः)

साधारणतः, साधारणतया
अक्सर, प्रायः, बहुधा।
अव्य.
(सं. साधारणतः)

साधारणता
साधारण' होने का भाव या धर्म।
संज्ञा
(सं.)

साधारणी
एक अप्सरा का नाम।
संज्ञा
(सं.)

साधारणीकरण
विशिष्ठ तत्वों के आधार पर ऎसा सामान्य नियम या सिद्धांत स्थिर करना जो उन सब पर समान रूप से प्रयुक्त हो।
संज्ञा
(सं.)

साधारणीकरण
सज्जन गुण-धर्म के आधार पर अनेक तत्वों में समानता स्थिर करना।
संज्ञा
(सं.)

साधि
सिद्ध या सम्पन्न करके, साधकर।
क्रि.स.
(हिं. साधना)
उ.- जब तैं रसना राम कह्यौ। मानौ धर्म साधि सब बैठयौ , पढ़िबै मैं धौं कहा रहयौ-२-८।

साधि
सिद्ध या साधन करो।
क्रि.स.
(हिं. साधना)
उ.- सुचि रुचि सहज समाधि साधि सठ, दीनबंधु करुनामय उर धरि-१-३१२।

साधिका
सिद्ध या साधना करनेवाली।
वि.
(सं.)

साधिकार
अधिकारपूर्वक।
क्रि.वि.
(सं.)

साधिकार
जिसे अधिकार प्राप्त हो।
वि.

साधिकार
जो अधिकारपूर्वक कहा या किया जाय।
वि.

साधित
सिद्ध किया या साधा हुआ।
वि.
(सं.)

साधी
सिद्ध या सम्पन्न की, लगायी।
क्रि.स.
(हिं. साधना)
उ.- जिहिं सुख कौं समाधि सिव साधी-१०-२२।

साधु
संत, महात्मा।
संज्ञा
(सं.)
उ.- (क) साधु-निंदक स्वाद-लंपट कपटी गुरु-द्रोही-१-१२४। (ख) एक अधार साधु-संगति कौ-१-१३०।

साधु
शिष्ट या सज्जन पुरुष।
संज्ञा
(सं.)
मुहा.-साधु-साधु कहना- अच्छा काम करने पर किसी की बहुत प्रशंसा करना।

साधु
भला, उत्तम।
वि.

साधु
प्रशंसनीय।
वि.

साधु
शिष्ट और शुद्ध (भाषा)।
वि.

साधु
उपयुक्त।
वि.

साधु
ठीक है (स्वीकारात्मक)।
अव्य.

साधु
बहुत और उत्तम।
अव्य.

साधुता
साधु' होने का भाव या धर्म।
संज्ञा
(सं.)

साधुता
साधु का या साधु-जैसा आचरण।
संज्ञा
(सं.)

साधुता
सज्जनता।
संज्ञा
(सं.)

साधुता
नेकी, भलाई।
संज्ञा
(सं.)

साधुता
सिधाई, सीधापन।
संज्ञा
(सं.)

साधुवाद
उत्तम कार्य करने पर 'साधु-साधु' कहकर उसकी प्रशंसा करना।
संज्ञा
(सं.)

साधू
साधु-संत।
संज्ञा
(सं. साधु)

साधे
सिद्ध या संपन्न किये।
क्रि.स.
(हिं. साधना)
उ.- राघव आवत हैं अवध आज। रिपु जीते, साधे देव-काज-९-१६६।

साधे
ठाने, पक्का किये, ठहराये।
क्रि.स.
(हिं. साधना)
उ.- सुफलत-सुत मिलि ढँग ठान्यो है, साधे बिष मन घात-३३५१।

साधे
निशाना ठीक किये (है)।
क्रि.स.
(हिं. साधना)
उ.- हौं अनाथ बैठ्यौ द्रुम-डरिया पारधि साधे बान-१-९७।

साधैं
साधना करती हैं।
क्रि.स.
(हिं. साधना)
उ.- पति कैं हेत नेम तप साधैं-७९९।

साधै
करता है।
क्रि.स.
(हिं. साधना)
उ.- मुक्ति हेत जोगी स्रम साधै-१-१०४।

साधै
इकट्ठा या एकत्र करती है।
क्रि.स.
(हिं. साधना)
उ.- जसुमति जोरि जोरि रजु बाँधै। अंगुर द्वै द्वै जोंवरि साधै-३९१।

साधो, साधौ
संत, साधु।
संज्ञा
(सं. साधु)

साधो, साधौ
लालसा, कामना।
संज्ञा
(हिं. साध)
उ.- (क) नैन मरत दरसन की साधो-१८०९। (ख) मिटै न दरस की साधो-२५०८। (ग) को जानै तन छूट जायगो, सूल रहै जिय साधो-२७५८।

साधो, साधौ
सिद्ध या संपन्न किया।
क्रि.स.
(हिं. साधना)
उ.- बहुरि नृप आपनौ कर्म साधौ-८-१६।

साध्य
(सिद्ध या संपन्न) करने योग्य।
वि.
(सं.)

साध्य
जो सिद्ध या संपन्न हो सके।
वि.
(सं.)

साध्य
सरल, सहज, सुगम।
वि.
(सं.)

साध्य
(बात) जो सिद्ध या प्रमाणित करना हो।
वि.
(सं.)

शेखीबाज
डींग मारनेवाला।
वि.
(फ़ा. शेखी + बाज़)

शेफालि, शेफालिका, शेफाली
निर्गुडी (पौधा)।
संज्ञा
(सं.)

शेर
बाघ, सिंह।
संज्ञा
(फ़ा.)
मुहा.- शेर होना - उद्दंड हो जाना।

शेर
बहुत वीर और साहसी पुरूष।
संज्ञा
(फ़ा.)

शेर
(उर्दू) कविता के दो चरण।
संज्ञा
(अ.)

शेरदहाँ
शेर के मुँहवाला।
वि.
(फ़ा.)

शेरदहाँ
पुराने ढंग की एक बंदूक।
संज्ञा

शेरपंजा
बघनहा।
संज्ञा
(फ़ा. शेर + हिं. पंजा)

शेरबच्चा
शेर का बच्चा।
संज्ञा
(फ़ा. शेर + हिं. बच्चा)

शेरबच्चा
साहसी मनुष्य।
संज्ञा
(फ़ा. शेर + हिं. बच्चा)

साध्य
(रोग) जो ठीक किया जा सके।
वि.
(सं.)

साध्य
बारह गणदेवता।
संज्ञा

साध्य
देवता।
संज्ञा

साध्य
ज्योतिष के सत्ताइस योगों में इक्कीसवाँ जो बहुत शुभ माना जाता है।
संज्ञा

साध्य
वह पदार्थ जिसका अनुमान किया जाय।
संज्ञा

साध्य
प्रश्न या समस्या रूप में सामने आनेवाली बात जिसे ठीक सिद्ध करना हो।
संज्ञा

साध्य
शक्ति, सामर्थ्य।
संज्ञा

साध्यता
साध्य का भाव या धर्म।
संज्ञा
(सं.)

साध्यो, साधयौ
सिद्ध, संपन्न या पूर्ण किया।
क्रि.स.
(हिं. साधना)
उ.- लै चरनोदक निज ब्रत साध्यौ-९-५।

साध्यो, साधयौ
साधन किया, साधा।
क्रि.स.
(हिं. साधना)
उ.- (क) सकल जोग ब्रत साध्यौ-१२-१२८। (ख) मन-क्रम-बच हरि सों धरि पतिब्रत प्रेम योग तप साध्यौ-३०१४।

साध्यो, साधयौ
लक्ष्य का संधान किया।
क्रि.स.
(हिं. साधना)
उ.- लागत तो जानो नहिं बिषम बाण साध्यौ-२८०६।

साध्वी
पतिव्रता।
वि.
(सं.)

साध्वी
शुद्ध चरित्र या आचरणवाली, सच्चरित्रा।
वि.
(सं.)

सानंद
आनंदपूर्वक।
क्रि.वि.
(सं.)

सान
वह पत्थर जिस पर घिसकर अस्त्रादि की धार तेज की जाती है।
संज्ञा
(सं. शाण)
मुहा.-सान देना या धरना-धार तेज करना। सान धराना-धार तेज कराना। सान धराए-(हथियार) तेज किये हुए। लै लै ते हथियार आपने सान धराए त्यौं-१-१५१।

सान
ठाट-बाट।
संज्ञा
(अ. शान)

सान
ठसक।
संज्ञा
(अ. शान)

सानना
किसी चूर्ण को तरल पदार्थ मिलाकर गीला करना, गूँधना।
क्रि.स.
(हिं. सनना)

सानना
मिलाना, मिश्रित करना।
क्रि.स.
(हिं. सनना)

सानना
एक के दोष, अपराध आदि के लिए उसके साथ दूसरे को अकारण ही दोषी या अपराधी बनाने का प्रयत्न करना।
क्रि.स.
(हिं. सनना)

सानना
घोलना।
क्रि.स.
(हिं. सनना)

सानना
धार तेज करना।
क्रि.स.
(हिं. सान=शाण)

साना
शांत होना।
क्रि.अ.
(सं. शांत)

साना
समाप्त होना।
क्रि.अ.
(सं. शांत)

साना
नष्ट होना।
क्रि.अ.
(सं. शांत)

साना
शांत करना।
क्रि.स.

साना
समाप्त करना।
क्रि.स.

साना
नष्ट करना।
क्रि.स.

सानि
मिलाकर, लपेटकर, मिश्रित करके।
क्रि.स.
(हिं. सानना)
उ.- (क) यह सुनि धावत धरनि चरन की प्रतिमा खगी पंथ में पाई। नैन नीर रघुनाथ सानि सो सिव ज्यों गात चढ़ाई-९-६४। (ख) सानि-सानि दधि-भात लियौ कर सुहृद सखनि कर देत-४१६। (ग) रंग कापै होत न्यारो हरद-चूनो स नि-८९५। (घ) जोग पाती हाथ दीनी बिष लगायौ सानि-३३५५।

सानि
घोलकर।
क्रि.स.
(हिं. सानना)
उ.- दूध औटथौ आनि अधिक मिसरी सानि-४४०।

सानिका
मुरली, वंशी।
संज्ञा
(सं.)

सानी
भूसा या चारा जो पानी से सानकर पशुओं को खिलाया जाता है।
संज्ञा
(हिं. सानना)

सानी
अनुचित रीति से एक में मिलाए हुए कई खाद्य पदार्थ (व्यंग्य)।
संज्ञा
(हिं. सानना)

सानी
दूसरा, द्वितीय।
वि.
(अ.)

सानी
बराबरी का, समानता करनेवाला।
वि.
(अ.)

सानी
बेजोड़, अद्वितीय, अनुपम।
यौ. लासानी

सानी
मिलायी, मिश्रित की।
क्रि.स.
(हिं. सानना)
उ.- सद दधि-माखन द्यौं आनी। तापर मधुमिसरी सानी-१०-१८३।

सानी
लपेट या लथेड़ दी, भिगो दी।
क्रि.स.
(हिं. सानना)
उ.- मेरे सिर की नई बहनियाँ, लै गोरस मैं सानी-१०-३३८।

सानी
भरी या लिपटी हुई, सनी हुई।
वि.
(हिं. सनना)
उ.- यह है बिन कलंक की साँची, हम कलंक में सानी-१६३०।

सानु
पर्वत की चोटी, शिखर।
संज्ञा
(सं.)

सानु
छोर, सिरा।
संज्ञा
(सं.)

सानु
चौरस जमीन।
संज्ञा
(सं.)

सानु
बन, जंगल।
संज्ञा
(सं.)

सानु
लंबा-चौड़ा।
वि.

सानु
चौरस सपाट।
वि.

सानुज
अनुज के साथ।
क्रि.वि.
(सं. स+अनुज)

साने
लगे या जड़े हुए।
वि.
(हिं. सनना)
उ.- भूषन मय मनि साने-१३५४।

साने
भरे या लिपटे हुए।
वि.
(हिं. सनना)
उ.- जैसे हरि तैसे तुम सेवक कपट चतुरई साने हो-३०१५।

सानै
मिलाती है या सानती है।
क्रि.स.
(हिं. सानना)
उ.- तब महरि बाँह गहि आनै। लै तेल उबटनो सानै-१०-१८३।

सान्निधि
समीप।
क्रि.वि.
(सं.)

सान्निध्य
समीपता, निकटता।
संज्ञा
(सं.)

सान्निध्य
मुक्ति का वह प्रकार जिसमें आत्मा, परमात्मा समीप पहुँचती मानी जाती है।
संज्ञा
(सं.)

सान्निध्यता
समीप होने का भाव या धर्म।
संज्ञा
(सं.)

सान्यो, सान्यौ
मिलाया, मिश्रित किया।
क्रि.स.
(हिं. सानना)

सान्यो, सान्यौ
साना
क्रि.स.
(हिं. सानना)

सान्यो, सान्यौ
लिपटा या सम्मिलित है।
क्रि.स.
(हिं. सानना)
उ.- ऊख माहिं ज्यों रस है सान्यौ-३-१३।

साप
किसी के अनिष्ट की कामना से कहा हुआ वाक्य।
संज्ञा
(सं. शाप)
उ.- (क) दैहौं साप, महा दुख भरै-१-२२९। (ख) धन्य धन्य रिषि साप हमारे-३८५।

सापत्न्य
सपत्नी का भाव।
संज्ञा
(सं.)

सापत्न्य
सौत या सपत्नी का पुत्र।
संज्ञा
(सं.)

सापत्न्य
शत्रु।
संज्ञा
(सं.)

सापन
शाप देने की क्रिया या भाव, शाप देने (को)।
संज्ञा
(सं. शाप)
उ.- (क) कौरव-काज चले रिषि सापन-१-१३। (ख) अतिथि रिषीस्वर सापन आए-१-२८२।

सापना, सापनो
अनिष्ट की कामना से कोई बात कहना, शाप देना।
क्रि.स.
(हिं. साप)

सापना, सापनो
कोसना, दुर्वचन कहना।
क्रि.स.
(हिं. साप)

सापै
शाप दे।
क्रि.स.
(हिं. सापना)
उ.- जिय अति डरयौ, मोहिं मति सापै, ब्याकुल बचन कहंत-९-८३।

सापेक्ष
जो किसी तत्व, विचार आदि से संबंधित होने के कारण उसकी अपेक्षा रखता हो।
वि.
(सं.)

सापेक्ष
किसी की अपेक्षा करनेवाला।
वि.
(सं.)

सापेक्ष
जो निर्णय या आदेश की अपेक्षा में रूका हो।
वि.
(सं.)

सापेक्षता
सापेक्ष' होने का भाव।
संज्ञा
(सं.)

सापेक्षवाद
वह सिद्धांत जिसमें दो बातें एक दूसरे की अपेक्षक मानी जाती हैं।
संज्ञा
(सं.)

साप्ताहिक
सप्ताह-संबंधी।
वि.
(सं.)

साप्ताहिक
प्रति सप्ताह होनेवाला।
वि.
(सं.)

साप्ताहिक
प्रति सप्ताह छपने या प्रकाशित होनेवाला।
वि.
(सं.)

साफ
स्वच्छ, निर्मल।
वि.
(अ. साफ़)

साफ
शुद्ध।
वि.
(अ. साफ़)

साफ
दोषरहित।
वि.
(अ. साफ़)

साफ
स्पष्ट।
वि.
(अ. साफ़)

साफ
उज्जवल।
वि.
(अ. साफ़)

साफ
जिसमें गड़बड़ी या झगड़ा-बखेड़ा न हो।
वि.
(अ. साफ़)

साफ
चमकीला।
वि.
(अ. साफ़)

साफ
जिसमें छल कपट न हो।
वि.
(अ. साफ़)
मुहा. साफ-साफ सुनाना- खरी बातें कहना।

साफ
जिसके सुनने-समझने में कठिनाई न हो।
वि.
(अ. साफ़)

साफ
समतल।
वि.
(अ. साफ़)

साफ
जिसमें विध्न-बाधा न हो।
वि.
(अ. साफ़)

साफ
सादा, कोरा।
वि.
(अ. साफ़)

साफ
जिसमें कुछ सार- तत्व न रह गया हो।
वि.
(अ. साफ़)

साफ
जिसमें रद्दी भाग न हो।
वि.
(अ. साफ़)

साफ
खाली।
वि.
(अ. साफ़)
मुहा.- साफ करना- (१) मार डालना। (२) चौपट कर देना। (३) खा-पी जाना।

साफ
लेन-देन का निपटना या चुकता होना।
वि.
(अ. साफ़)
उ.- बढ़ौ तुम्हार बरामद हूँ कौ लिखि किन्हो है साफ-१-१४३।

साफ
बिना किसी दाग, द्वेष या कलंक के।
क्रि.वि.

साफ
बिना हानि या कष्ट उठाये।
क्रि.वि.

साफ
इस तरह कि किसी को पता न लगे या कोई बाधक न बन सके।
क्रि.वि.

साफ
बिलकुल, नितांत।
क्रि.वि.

साफल्य
सफलता, सिद्धि।
संज्ञा
(सं.)

साफा
पगड़ी, मुरेठा, मुड़ासा।
संज्ञा
(अ. साफ़ः)

साफा
पशु-पक्षियों को किसी उद्देश्य से उपवास कराना।
संज्ञा
(अ. साफ़ः)
मुहा. साफा देना - भूखा रखना।

साफा
वस्त्रादि को साबुन लगाकर साफ करना।
संज्ञा
(अ. साफ़ः)

साफी
छोटा रूमाल।
संज्ञा
(हिं. साफ)

साफी
वहं कपड़ा जो गाँजा पीनेवाले चिलम के नीचे रखते हैं।
संज्ञा
(हिं. साफ)

साफी
भाँग छानने का कपड़ा।
संज्ञा
(हिं. साफ)

साबर
सँभर (हिरन)।
संज्ञा
(सं. शंबर)

शेरबच्चा
एक तरह की बंदूक।
संज्ञा
(फ़ा. शेर + हिं. बच्चा)

शेरबबर
सिंह, केसरी।
संज्ञा
(फ़ा.)

शेवाल
सेवार, सेवाल।
संज्ञा
(सं.)

शेष
बची हुई वस्तु, भाग या संख्या।
संज्ञा
(सं.)

शेष
अंत, समाप्ति।
संज्ञा
(सं.)

शेष
फल, परिणाम।
संज्ञा
(सं.)

शेष
नाश, मरण।
संज्ञा
(सं.)

शेष
सहस्त्र फनों का सर्पराज जिसके फनों पर पृथ्वी टिकी है, अनंत।
संज्ञा
(सं.)

शेष
लक्ष्मण जो ‘शेष’ का अवतार कहे जाते हैं।
संज्ञा
(सं.)

शेष
बलराम जो ‘शेष’ का अवतार कहे जाते हैं।
संज्ञा
(सं.)

साबर
साँभर का चमड़ा।
संज्ञा
(सं. शंबर)

साबर
शबर जाति के लोग।
संज्ञा
(सं. शंबर)

साबर
एक प्रकार का सिद्ध मंत्र जो शिव कृत माना जाता है।
संज्ञा
(सं. शंबर)
उ.- साबर मंत्र लिख्यौ स्रुतिद्वार।

साबर
शबर-संबंधी।
वि.
(सं. शाबर)

साबल
बरछी, भाला।
संज्ञा
(सं. शंबर)

साबिक
पहले का, पुराने समय का।
वि.
(अ. साबिक़)
उ.- साबिक जमा हुती जो जोरी मिनजालिक तल ल्यायौ-१-१४३।

साबिक
साबिक-दस्तूर - जैसा पहले था वैसे ही।
पद

साबिका
जान-पहचान।
संज्ञा
(अ. साबिक़ा)

साबिका
सरोकार, संबंध, ब्यवहार, संपर्क।
संज्ञा
(अ. साबिक़ा)
मुहा. साबिका पड़ना - (१) काम पड़ना। (२) संबंध होना। (३) लेन-देन होना।

साबित
जिसा सबूत दिया गया हो।
वि.
(फ़ा.)

साबित
पूरा।
वि.
(अ. सबूत)

साबित
ठीक।
वि.
(अ. सबूत)
उ.- द्वै लोचन साबित नहिं तेऊ -१४२८।

साबित
पक्का।
वि.
(अ. सबूत)

साबुत
संपूर्ण।
वि.
(फ़ा. सबूत)

साबुत
दुरूस्त, ठीक।
वि.
(फ़ा. सबूत)

साबुत
पक्का, दृढ़।
वि.
(फ़ा. सबूत)

साबुन
शरीर, वस्त्रादि साफ करने का एक प्रसिद्ध पदार्थ।
संज्ञा
(अ. साबून)

साबूदाना
सागू के तने के गूदे से तैयार किये गये दाने जो शीध्र पच जाने के लिए प्रसिद्ध हैं।
संज्ञा
(अँ. सैगो+हिं. दाना)

साभार
कृतज्ञतापूर्वक।
क्रि.वि.
(सं. स+आभार)

सामंजस्य
औचित्य, उपयुक्तता।
संज्ञा
(सं.)

सामंजस्य
अनुकूलता।
संज्ञा
(सं.)

सामंजस्य
विरोध या विषमता का अभाव, एकरसता।
संज्ञा
(सं.)

सामंत
वीर, योद्धा।
संज्ञा
(सं.)

सामंत
बड़ा और शक्तिशाली जमींदार या सरदार।
संज्ञा
(सं.)

सामंती
एक रागिनी।
संज्ञा
(सं.)

सामंती
सामंत का भाव या पद।
संज्ञा
(सं. सामंत)

साम
वे वेद-मंत्र जो गेय हों।
संज्ञा
(सं. सामन्)

साम
चारों वेदों में तीसरा।
संज्ञा
(सं. सामन्)

साम
मीठी बातें, मधुर भाषण।
संज्ञा
(सं. सामन्)

साम
राजनीति के चार अंगों में एक जिसमें शत्रु से मीठी-मीठी बातें करके उसे अपनी ओर मिला लिया जाता है।
संज्ञा
(सं. सामन्)

साम
मित्रता।
संज्ञा
(सं. सामन्)

साम
श्याम, श्रीकृष्ण।
संज्ञा
(सं. श्याम)

साम
श्याम, साँवला।
वि.

साम
साँझ, संध्या।
संज्ञा
(फ़ा. शाम)

साम
प्रभु।
संज्ञा
(सं. स्वामी)

साम
पति।
संज्ञा
(सं. स्वामी)

सामक
साँवा' नामक अन्न।
संज्ञा
(सं. श्यामक)

सामक
सामवेद का ज्ञाता।
वि.
(सं.)

सामकारी
मधुरभाषी।
वि.
(सं. सामकारिन्)

सामकारी
मधुर वचन बोलने की रीति-नीति।
संज्ञा

सामग
सामवेद का गायक या ज्ञाता।
वि.
(सं.)

सामग्री
(आवश्यक) वस्तुएँ।
संज्ञा
(सं.)

सामग्री
धर-गृहस्थी के काम की वस्तु।
संज्ञा
(सं.)

सामग्री
साधन, उपकरण।
संज्ञा
(सं.)

सामत
दुर्भाग्य।
संज्ञा
(अ. शामत)

सामत
शामत का मारा-अभागा।
पद

सामत
विपत्ति, दुर्दशा।
संज्ञा
(अ. शामत)
मुहा. शामत सवार होना - विपत्ति का समय आना।

सामना
समक्ष या सम्मुख होने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(हिं. सामने)

सामना
मुलाकात मेंट, मिलन।
संज्ञा
(हिं. सामने)

सामना
किसी पदार्थ का आगे का भाग।
संज्ञा
(हिं. सामने)

सामयिकता
सामयिक होने का भाव।
संज्ञा
(सं.)

सामयिकता
वर्तमान समय या स्थिति के विचार से युक्त दृष्टिकोण या अवस्था।
संज्ञा
(सं.)

सामरथ
शक्ति, क्षमता।
संज्ञा
(सं. सामर्थ्य)

सामरस्य
समरसता।
संज्ञा
(सं. सम+रस)

सामरा
साँवला।
वि.
(हिं. साँवला)

सामरा
श्याम, श्रीकृष्ण।
संज्ञा

सामरिक
समर-संबंधी।
वि.
(सं.)

सामर्थ, सामर्थ्य
समर्थ' होने ता भाव।
संज्ञा
(सं. सामर्थ्य)

सामर्थ, सामर्थ्य
ताकत, शक्ति।
संज्ञा
(सं. सामर्थ्य)

सामर्थ, सामर्थ्य
योग्यता।
संज्ञा
(सं. सामर्थ्य)

सामना
मुकाबला, विरूद्ध या विपक्ष में होना।
संज्ञा
(हिं. सामने)
मुहा. सामना करना समक्ष या सम्मुख रहकर जवाब देना या धृष्टता करना।

सामने
समक्ष, सम्मुख।
क्रि.वि.
(सं. सम्मिख, पु. हिं. सामुहें)
मुहा.-सामने आना- आगे या सम्मुख आना। सामने का-(१) जो सम्मुख या समक्ष हो। (२) जो अपनी उपस्थिति में घटित हुआ हो। (३) जो अपनी उपस्थिति में जन्मा या पला हो। सामने करना-सम्मुख या समक्ष उपस्थित करना। सामने की बात-बात जो अपने सामने घटित हुई हो। सामने पड़ना-दिखायी दे जाना। सामने होना- (स्त्री का) परदा न करके सम्मुख या समक्ष आना।

सामने
मौजूदगी या उपस्थिति में।
क्रि.वि.
(सं. सम्मिख, पु. हिं. सामुहें)

सामने
सीधे या आगे की ओर।
क्रि.वि.
(सं. सम्मिख, पु. हिं. सामुहें)

सामने
मुकाबले में, विरुद्ध।
क्रि.वि.
(सं. सम्मिख, पु. हिं. सामुहें)

सामने
तुलना में।
क्रि.वि.
(सं. सम्मिख, पु. हिं. सामुहें)

सामबेद
चारों वेदों में तीसरा।
संज्ञा
(सं. सामवेद)
उ.-भीर भई दसरथ के आँगन सामबेद धुनि छाई-९-१७।

सामयिक
समय से संबंध रखनेवाला।
वि.
(सं.)

सामयिक
वर्तमान समय का।
वि.
(सं.)

सामयिक
समय की दृष्टि से ठीक, उचित या उपयक्त, समयानुसार।
वि.
(सं.)

सामर्थ, सामर्थ्य
शब्द की व्यंजनाशक्ति।
संज्ञा
(सं. सामर्थ्य)

सामवेद
भारतीय आर्यों के चार वेदों में तीसरा जिसकी ऋचाऎ गायत्री छंद में हैं।
संज्ञा
(सं. सामन)

सामवेदिक, सामवेदी
सामवेद-संबंधी।
वि.
(सं. सामवेदिन्)

सामवेदिक, सामवेदी
जो सामवेद का ज्ञाता हो।
वि.
(सं. सामवेदिन्)

सामसाली
साम, दाम, दंड, भेद, राजनीति के इन चार अंगों का ज्ञाता, राजनीतिज्ञ।
वि.
(सं. साम+शाली)

सामहिं
सम्मुख, समक्ष।
अव्य.
(हिं. सामने)

सामाँ
उपकरण।
संज्ञा
(फ़ा. सामान)

सामाँ
साधन।
संज्ञा
(फ़ा. सामान)

सामाँ
आवश्यक वस्तुएँ।
संज्ञा
(फ़ा. सामान)

सामाँ
माल-असबाब।
संज्ञा
(फ़ा. सामान)

सामाँ
साँवली।
वि.
(सं. श्यामा)

सामाँ
श्यामा, राधा।
संज्ञा

सामाजिक
समाज से संबंधित।
वि.
(सं.)

सामाजिकता
लौकिकता।
संज्ञा
(सं.)

सामान
सामग्री, उपकरण।
संज्ञा
(फ़ा.)

सामान
तैयारी, आयोजन, उपक्रम।
संज्ञा
(फ़ा.)

सामान
माल-असबाब।
संज्ञा
(फ़ा.)
मुहा.-सामान बाधना-चलने की तैयारी करना।

सामान्य
मामूली, साधारण।
वि.
(सं.)

सामान्य
लगभग सबसे संबंध रखनेवाला।
वि.
(सं.)

सामान्य
सार्वजनिक।
वि.
(सं.)

सामान्य
बराबरी, समानता।
संज्ञा
(सं.)

सामान्य
सारे वर्ग में समान रूप से पाया जानेवाला गुण या धर्म।
संज्ञा
(सं.)

सामान्य
एक काव्यालंकार।
संज्ञा
(सं.)

सामान्यतः. सामान्यतया
साधारण रूप से।
क्रि.वि.
(सं.)

सामान्यतः. सामान्यतया
जैसा साधारणतः होता है।
क्रि.वि.
(सं.)

सामान्यता
मामूली या सामान्य होने का भाव या स्थिति।
संज्ञा
(सं.)

सामान्यता
लगभग सर्वत्र सामान्य रूप से पाये जाने का भाव या स्थिति।
संज्ञा
(सं.)

सामान्य बुद्धि
वह सहज बुद्धि जो सामान्यतया सभी में होती है और जिससे वे साधारण कार्य अंतःप्रेरणा से ही किया करते हैं।
संज्ञा
(सं.)

सामान्य विधि
साधारण कर्तव्य या दायित्व-संबंधी आज्ञा या विधि।
संज्ञा
(सं.)

सामान्या
नायिका जो धन लेकर पर पुरुष से संबंध रखती है।
संज्ञा
(सं.)

शाल
ऊनी या रेशमी चादर, दुशाला।
संज्ञा
(फ़ा.)

शालक
सालने या पीड़ा पहुँचाने वाला।
वि.
(हिं. सालना)
उ.-जो रिपु तुम पहिले हति हाँडे बहुरि भए मम शालक-३१६५।

शालक
नाश करनेवाला।
वि.
(हिं. सालना)
उ.-¨¨¨¨¨¨ अनंत शक्ति प्रभु असुर शालक- १० उ.- ३५।

शालक
मसखरा, हँसोड़।
वि.
(सं.)

शालग्राम
गंडकी नदी से प्राप्त पत्थर की बटिया जिस पर चक्र का चिह्न बना रहता है; यह विष्णु की मूर्ति मानी जाती है।
संज्ञा
(सं.)

शालत
पीड़ा पहुँचाती है।
क्रि.स.
(हिं. सालना)
उ.-सूर नंद के हृदय सालत सदा-२४६६।

शालति
पीड़ा पहुँचाती है।
क्रि.स.
(हिं. सालना)
उ.-अब वै शलति हैं उर महियाँ-२५४२।

शालभ
पतिंगों के संबंध का।
वि.
(सं.)

शालव
सौभ रज्य का राजा जो शिशुपाल का मित्र था और जो उसकी मृत्यु कै पश्चात् द्वारका का घेरा डालने पर श्रीकृष्ण द्वारा मारा गया था।
संज्ञा
(सं. शाल्व)
उ.- (क) शालव दंतबक्र बनारसी को नृपति चढ़े दल साजि मानो रविहिं छाए-१० उ.- २१। (ख) कीन्हों युद्ध आप शालव सों उन बहु माया कीनी-सारा. ७९२।

शाला
घर, गृह।
संज्ञा
(सं.)

शेष
बचा हुआ।
वि.

शेष
समाप्त।
वि.
उ.- बातें करत शेष निसि आई ऊषा गए असनान-सारा.।

शेष
दूसरे, अन्य, अतिरिक्त।
वि.

शेषधर
शिव, महादेव।
संज्ञा
(सं.)

शेषनाग
शेष जिसके सहस्त्र फनों पर पृथ्वी टिकी मानी जाती है।
संज्ञा
(सं.)

शेषशायी
विष्णु जो शेषनाग पर शयन करनेवाले माने जाते हैं।
संज्ञा
(सं.)

शेषांश
बचा हुआ या शेष अंश।
संज्ञा
(सं.)

शेषांश
अंतिम भाग।
संज्ञा
(सं.)

शेषांचल
दक्षिण भारत का एक पर्वत।
संज्ञा
(सं.)

शैक्षिक
शिक्षा-संबंधी।
वि.
(सं.)

सामासिक
समास का या समास-संबंधी।
वि.
(सं.)

सामासिक
समास से युक्त।
वि.
(सं.)

सामिग्री
सामग्री।
संज्ञा
(सं. सामग्री)

सामियाना
बड़ा तंबू।
संज्ञा
(हिं. शामियाना)

सामिल
सम्मिलित।
वि.
(फ़ा. शामिल)

सामिष
(भोजन) जिसमें आमिष (मांस, मछली आदि) का अंश हो।
वि.
(सं.)

सामी
प्रभु।
संज्ञा
(सं. स्वामी)

सामी
पति।
संज्ञा
(सं. स्वामी)

सामीप्य
निकटता, समीपता।
संज्ञा
(सं.)

सामीप्य
मुक्ति का एक प्रकार जिसमें जीव का परमाराध्य के समीप पहुँच जाना माना जाता है।
संज्ञा
(सं.)
उ.-सालोक्य सामीप्य नासारोपिता भुज चारि-२९२४।

सामीर
वायु, पवन।
संज्ञा
(सं. समीर)

सामीर्य
वायु का, वायु-संबंधी।
वि.
(सं.)

सामुझि
अक्ल, बुद्धि।
संज्ञा
(हिं. समझ)

सामुदायिक
समुदाय संबंधी।
वि.
(सं.)

सामुद्र
समुद्र- संबंधी।
वि.
(सं.)

सामुद्र
जो समुद्र से उत्पन्न हुआ हो।
वि.
(सं.)

सामुद्रिक
समुद्र-संबंधी।
वि.
(सं.)

सामुद्रिक
वह विद्या जिसमें मनुष्य की हथेली या शारीरिक लक्षण देखकर जीवन की घटनाऎं तथा शुभाशुभ फल आदि बताये जाते हैं।
संज्ञा

सामुद्रिक
इस विद्या का ज्ञाता व्यक्ति।
संज्ञा

सामुहाँ, सामुहीं, सामुहें, समुहैं
सामने।
अव्य.
(पु. हिं. सामुहें)
उ.- (क) रथ तैं उतरि चक्र कर लीन्हौ, सुभट सामुहैं आए-१-२७४। (ख) जाके अस्त्र तिनहिं तेहि मारयौ, चले सामुहीं खौरी-२५८६। (ग) मैं जब चली सामुहैं पकरन तब के गुन कहा कहिऎ-१०-३२२।

सामूहिक
समूह से संबंधित।
वि.
(सं.)

साम्य
समता, समानता।
संज्ञा
(सं.)

साम्यवाद
एक पाश्चात्य सामाजिक सिद्धांत जिसके अनुसार समाज में सभी को समान होना चाहिए, किसी को न बहुत अमीर होना चाहिए न बहुत गरीब; समाजवाद, समष्टिवाद।
संज्ञा
(सं.)

साम्यवादी
उक्त सिद्धान्त का समर्थक, समाज या समष्टिवादी।
वि.
(सं.)

साम्राज्य
बड़ा या सार्वभौम राज्य।
संज्ञा
(सं.)

साम्राज्य
पूर्ण अधिकार, आधिपत्य।
संज्ञा
(सं.)

साम्राज्यवाद
वह सिद्धांत जिसके अनुसार साम्राज्य बनाये रखा और बढ़ाया जाय।
संज्ञा
(सं.)

साम्राज्यवादी
उक्त सिद्धांत का समर्थक।
वि.
(सं.)

सायं
शाम, संध्या।
संज्ञा
(सं.)

सायं
संध्या-संबंधी, संध्याकालीन।
वि.

सायंकाल
संध्या का समय
संज्ञा
(सं.)

सायंकालीन
संध्या के समय का।
वि.
(सं.)

साय
शाम, संध्या।
संज्ञा
(सं. सायं)

सायक
तीर, बाण।
संज्ञा
(सं.)
उ.- (क) त्यागति प्रान निरखि सायक-धनु-१-२९। (ख) राम धनुष अरु सायक साँधे-९-५८।

सायक
खड्ग।
संज्ञा
(सं.)

सायक
(कामदेव के पाँच वाणों के कारण) पाँच की संख्या।
संज्ञा
(सं.)

सायत
पल, क्षण।
संज्ञा
(अ. साअत)

सायत
समय।
संज्ञा
(अ. साअत)

सायत
मुहूर्त।
संज्ञा
(अ. साअत)

सायत
शुभ समय।
संज्ञा
(अ. साअत)

सायत
कदाचित्, संभव है।
अव्य.
(फ़ा. शायद)

सायन
सूर्य की वह गति जब उसके भूमध्य रेखा पर पहुँचने पर (२० मार्च और २३ सितम्बर को) दिन और रात दोनों बराबर होते हैं।
संज्ञा
(सं.)

सायन
अयनयुक्त (ग्रह आदि)।
वि.

सायना, सायनो
शांत होना।
क्रि.अ.
(हिं. साना)

सायना, सायनो
समाप्त होना।
क्रि.अ.
(हिं. साना)

सायना, सायनो
नष्ट होना।
क्रि.अ.
(हिं. साना)

सायना, सायनो
शांत करना।
क्रि.स.

सायना, सायनो
समाप्त करना, शेष न रखना।
क्रि.स.

सायना, सायनो
नष्ट करना।
क्रि.स.

सायब
स्वामी।
संज्ञा
(फ़ा. साहब)

सायल
इच्छुक।
संज्ञा
(अ.)

साया
छाँह, छाया।
संज्ञा
(फ़ा. सायः)
मुहा.- साया मिलना-शरण या संरक्षंण पाना।

साया
परछाई, प्रतिबिंब।
संज्ञा
(फ़ा. सायः)
मुहा.- साया से बचना या भागना-बहुत दूर या बचकर रहना।

साया
भूत, प्रेत आदि।
संज्ञा
(फ़ा. सायः)
मुहा.- साया आना या पड़ना भूत, प्रेत आदि से प्रभावान्वित होना।

साया
असर, प्रभाव।
संज्ञा
(फ़ा. सायः)
मुहा.- साया पड़ना-किसी की कुसंगत का असर होना। साया डालना- (१) कृपा करना। (२) प्रभाव डालना।

सायास
प्रयत्नपूर्वक।
क्रि.वि.
(सं. स+आयास)

सायुज, सायुज्य
एक में मिल जाना।
संज्ञा
(सं. सायुज्य)

सायुज, सायुज्य
मुक्ति का एक प्रकार जिसमें जीवात्मा परमात्मा में लीन हो जाता है।
संज्ञा
(सं. सायुज्य)

सायुज्यता
सायुज्य का भाव।
संज्ञा
(सं.)

सायुध
अस्त्र-शस्त्र से सज्जित।
वि.
(सं. स+आयुध)

सायब
पति।
संज्ञा
(फ़ा. साहब)

सायबान
मकान या कमरे के सामने का छाजन या ओसारा।
संज्ञा
(फ़ा. सायःबान)

सायर
सागर, समुद्र।
संज्ञा
(सं. सागर)
उ.- (क) कागद धरनि, करै द्रुम लेखनि, जल-सायर मसि घोरै-१-१२५। (ख) सकल बिषय-बिकार तजि तू उतरि सायर-सेत-१-३११।

सायर
बड़ा जलाशय।
संज्ञा
(सं. सागर)
उ.- सात दिवस मूसल जलधारा सायर समुद्र भरे-९६८।

सायर
ऊपरी भाग, शीर्ष।
संज्ञा
(सं. सागर)

सायर
कवि।
संज्ञा
(अ. शायर)

सायल
प्रश्नकर्ता।
संज्ञा
(अ.)

सायल
भिखारी।
संज्ञा
(अ.)

सायल
याचक।
संज्ञा
(अ.)

सायल
प्रार्थी।
संज्ञा
(अ.)

सारँग, सारंग
मृग।
संज्ञा
(सं.)
उ.- (क) प्रथम ही उपमान सारँग सों करावत हेत-लहरी.। (ख) स्रवन सुयस सारंग नाद-विधि-२-१२।

सारँग, सारंग
कोयल, कोकिल।
संज्ञा
(सं.)
उ.- (क) बयन बर सारँग सम-लहरी। (ख) निकस सारँग तें सु 'सारँग' हरत तन की ताप-लहरी.। (ग) सूरदास सदा प्रहर्षन सुरुच सारँग बैन- लहरी.।

सारँग, सारंग
बाज (पक्षी), श्येन।
संज्ञा
(सं.)
उ.- हेरो सारँग मदन-तिया के अंत बिचारी बाम-लहरी.।

सारँग, सारंग
रवि, सूर्य।
संज्ञा
(सं.)
उ.- (क) जलसुत दुखी, दुखी है मधुकर द्वै पंछी दुख पावत। सूरदास सारँग केहि कारन सारँग-कुलहिं लजावत। (ख) उदै 'सारँग' जान सारँग गयौ अपने देस-लहरी. ५५।

सारँग, सारंग
सिंह।
संज्ञा
(सं.)

सारँग, सारंग
हंस पक्षी।
संज्ञा
(सं.)

सारँग, सारंग
मोर, मयूर।
संज्ञा
(सं.)
उ.- सारँग ऊपर सारँग राजत 'सारँग' शब्द सुनावै-सारा. ९४४।

सारँग, सारंग
पपीहा (पक्षी), चातक।
संज्ञा
(सं.)
(क) ति पी-पी डर डार दीनी, प्रान बारी रंक। रटन सारँग तें निकासी साग समर मिलाइ। डार दीनी सुमुख तिनकैं-लहरी.।

सारँग, सारंग
हाथी।
संज्ञा
(सं.)

सारँग, सारंग
घोड़ा।
संज्ञा
(सं.)

सारँग, सारंग
छाता, छत्र।
संज्ञा
(सं.)

सारँग, सारंग
शंख।
संज्ञा
(सं.)
उ.- निकस 'सारँग' कें सारँग, हरत तन की ताप-लहरी.।

सारँग, सारंग
कमल।
संज्ञा
(सं.)
उ.- (क) लब उलटौ दो जाऊँ तिहारी, ताकौ सारँग-नैन-लहरी.। (ख) उलटौ रस सारँग हित सजनी, कबहूँ तीर न जैहौं-लहरी.। (ग) सारँग सम कर नीक-लहरी.।

सारँग, सारंग
सोना, स्वर्ण।
संज्ञा
(सं.)

सारँग, सारंग
गहना, आभूषण।
संज्ञा
(सं.)

सारँग, सारंग
तालाब, सर, सरोवर।
संज्ञा
(सं.)
उ.- मानहुँ उमँगि चल्यौ चाहत है सारँग सुधे भरे।

सारँग, सारंग
भौंरा, भ्रमर।
संज्ञा
(सं.)
उ.- खुल्यौ चाहत सरनि सारँग, देत 'सारँग' दान-लहरी.।

सारँग, सारंग
भोंरा या लट्टू नामक खिलौना।
संज्ञा
(सं.)
उ.- नचत हैं सारंग सुंदर करत सब्द अनेक-लहरी.।

सारँग, सारंग
मधुमक्खी-विशेष।
संज्ञा
(सं.)

सारँग, सारंग
धनुष, विष्णु का धनुष।
संज्ञा
(सं.)
उ.- (क) गहि सारँग, रन रावन जीत्यौ-१-२४। (ख) घन तन दिव्य कवच सजि करि अरु कर धारयौ सारँग-९-१५८। (ग) एकहू बान आयौ न हरि के निकट, तब गहयौ धनुष सारंगधारी।

सारँग, सारंग
कपूर, कर्पूर।
संज्ञा
(सं.)

सारँग, सारंग
लवा पक्षी।
संज्ञा
(सं.)

सारँग, सारंग
श्रीकृष्ण का एक नाम।
संज्ञा
(सं.)
उ.- सारँग-सुता देखि 'सारँग' कौं तेरौ अटल सुहाग-सारा. ९४६।

सारँग, सारंग
चंद्रमा, शशि।
संज्ञा
(सं.)
उ.- धिग 'सारंग', सारँगमय सजनी- लहरी.।

सारँग, सारंग
सागर, समुद्र।
संज्ञा
(सं.)

सारँग, सारंग
जल, पानी।
संज्ञा
(सं.)

सारँग, सारंग
तीर, बाण।
संज्ञा
(सं.)
उ.- ज्यौं सारँग, सारँग के कारन, 'सारँग' सहत, न डोलै-लहरी।

सारँग, सारंग
दिया, दीपक।
संज्ञा
(सं.)

सारँग, सारंग
शिव, शंभु।
संज्ञा
(सं.)
उ.- जनु पिनाक की आस लागि ससि सारँग सरन बचै।

सारँग, सारंग
सुगन्धित द्रव्य।
संज्ञा
(सं.)

शैतान
असत् पथ-भ्रष्ट करनेवाला (दुष्ट) देवता।
संज्ञा
(सं.)
मुहा. - शैतान का बच्चा - बहुत दुष्ट या नीच आदमी। शैतान की आँत - लंबी चीज।

शैतान
भूत, प्रेत।
संज्ञा
(सं.)

शैतान
दुष्ट या क्रूर पुरूष।
संज्ञा
(सं.)

शैतान
नटखट, शरारती।
संज्ञा
(सं.)

शैतान
झगड़ा, टंटा।
संज्ञा
(सं.)

शैतानी
पाजीपन।
संज्ञा
(अ. शैतान)

शैथिल्य
शिथिलता।
संज्ञा
(सं.)

शैल
पहाड़, पर्वत।
संज्ञा
(सं.)
उ.- (क) दीन्हों डारि शैल तें भू पर घुनि जल भीतर डारयो। (ख) मुष्टिक अरूचाणूर शैल सम सुनियत हैं अति भारे-२५६९।

शैल
चट्टान, शिला।
संज्ञा
(सं.)

शैलकन्या, शैलकुमारी
पार्वती।
संज्ञा
(सं.)

सारँग, सारंग
साँप, सर्प।
संज्ञा
(सं.)
उ.- सारँग चरन पीठ पर 'सारँग', कनक खंभ अहि मनहुँ चढ़ोरी-लहरी.।

सारँग, सारंग
चंदन।
संज्ञा
(सं.)

सारँग, सारंग
जमीन, भूमि।
संज्ञा
(सं.)

सारँग, सारंग
बाल, केश, अलक।
संज्ञा
(सं.)

सारँग, सारंग
चमक, ज्योति, दीप्ति।
संज्ञा
(सं.)

सारँग, सारंग
सुन्दरता, सरसता, शोभा।
संज्ञा
(सं.)
उ.- सारंग देख सुनै मृगनैनी, सारंग-सुख दरसावै-सारा. ९४४।

सारँग, सारंग
नारी, स्त्री, नायिका।
संज्ञा
(सं.)
उ.- 'सारँग' हेरत उर सारँग तें, सारंग-सुत ढिंग आवै-लहरी.।

सारँग, सारंग
रात, रत्रि।
संज्ञा
(सं.)
धिग सारँग, 'सारँग' मै सजनी, सारंग अंग समाई-लहरी.।

सारँग, सारंग
दिन, दिवस।
संज्ञा
(सं.)

सारँग, सारंग
अनुराग।
संज्ञा
(सं.)
उ.- 'सारँग' बस भय, भय बस सारँग, 'सारँग' बिसमै मानै-लहरी.।

सारँग, सारंग
राग।
संज्ञा
(सं.)
ज्यों सारँग 'सारँग' के कारन सारँग सहत, न डोले- लहरी.।

सारँग, सारंग
मेघ, बादल।
संज्ञा
(सं.)
उ.- (क) बाचर नीतन तें सारँग अति, बार-बार झर लावै-लहरी। (ख) 'सारँग' ऊपर 'सारँग' राजत, सारँग सब्द सुनावै-सारा. ९४४।

सारँग, सारंग
कामदेव।
संज्ञा
(सं.)
उ.- (क) धिग सारँग, सारँग मैं सजनी, 'सारँग' अंग न समाई-लहरी.। (ख) सारँग देख सुनै मृगनैनी, 'सारँग' सुख दरसावै-सारा. ९४४।

सारँग, सारंग
कबूतर, कपोत।
संज्ञा
(सं.)

सारँग, सारंग
एक छंद।
संज्ञा
(सं.)

सारँग, सारंग
एक प्रकार का मृग।
संज्ञा
(सं.)

सारँग, सारंग
मोती।
संज्ञा
(सं.)

सारँग, सारंग
कुंब, स्तन।
संज्ञा
(सं.)

सारँग, सारंग
हाथ।
संज्ञा
(सं.)

सारँग, सारंग
कौआ, वायस।
संज्ञा
(सं.)

सारँग, सारंग
ग्रह, नक्षत्र।
संज्ञा
(सं.)

सारँग, सारंग
खंजन पक्षी।
संज्ञा
(सं.)

सारँग, सारंग
आकाश, गगन।
संज्ञा
(सं.)

सारँग, सारंग
चिड़िया, पक्षी।
संज्ञा
(सं.)

सारँग, सारंग
कपड़ा, वस्त्र।
संज्ञा
(सं.)

सारँग, सारंग
सारंगी' नामक वाद्ययंत्र।
संज्ञा
(सं.)

सारँग, सारंग
ईश्वर।
संज्ञा
(सं.)

सारँग, सारंग
काजल, अंजन।
संज्ञा
(सं.)

सारँग, सारंग
बिजली, विद्युत।
संज्ञा
(सं.)

सारँग, सारंग
फूल, पुष्प।
संज्ञा
(सं.)

सारँग, सारंग
एक राग।
संज्ञा
(सं.)

सारँग, सारंग
रँगा हुआ, रंगीन, रंजित।
वि.
उ.- सारँग दसन बसन पुनि 'सारँग' बसन पीतपट डारी।

सारँग, सारंग
सुन्दर, सुहावना।
वि.

सारँग, सारंग
सरस।
वि.
उ.- सारँग नैन बैन बर 'सारँग' सारँग बदन कहै छबि को री-लहरीं।

सारंग नट
एक संकर राग।
संज्ञा
(सं. सारंग+हिं. नट)

सारंगधर
सारंग' नामक धनुष धारण करनेवाले विष्णु या उनके अवतार।
संज्ञा
(हिं. सारंग+धरना)
उ.- (क) श्रीनाथ सारंगधर कृपा करि दीन पर-१-१२०। (ख) जब लौं सारँग-धर-कर नाहीं सारँग-बान बिराजत-९-१३०। (ग) सरन साधु श्रीपति सारँग-धर-९८२।

सारंगपति
मेघों का स्वामी इन्द्र।
संज्ञा
(हिं. सारंग+ मेघ+ पति)
उ.- सारँग-पति ता पति ता बाहन कीरत रट अनुराग-सारा. ९४६।

सारंगपतिनि, सारंगपत्नि
समुद्र की पत्नी, गंगा।
संज्ञा
(हिं. सारंग= समुद्र+पत्नि)
उ.- स्रवन बचन तें पावन पतिनी-सारँग कहत पुकार-लहरी.।

सारँगपाणि, सारँगपानि, सारँगपानी
सारंग' नामक धनुष धारण करनेवाले विष्णु या उनके अवतार।
संज्ञा
(हिं. सारंग+सं. पाणि)
उ.- (क) तेली के बृष लौं नित भरमत भजत न सारँगपानि-१-१०२। (ख) सोइ दसदथ कुल-चंद्र अमित बल आए सारँग-पानी-९-११५। (ग) कुंभकरन समुझाइ रहे पचि, दै सीता सारँगपानी-९-१६०।

सारंग-पिता
कमल का पिता, जल या समुद्र।
संज्ञा
(हिं. सारंग=कमल+पिता)
उ.- सारंग-पितु-सुत-धर-सुत-बाहन आजु न नैंक पुकारै-लहरी.।

सारंगिया
सरंगी बजानेवाला।
वि.
(हिं. सारंगी)

सारंगी
एक प्रसिद्धबाजा जिसमें लगे हुए तार कमानी से बजाये जाते हैं।
संज्ञा
(हिं. सारंग)
उ.- सुर सरनाई सरस सारंगी उपजत तान तरंग-सारा।

सार
पदार्थ का मूल या मुख्य भाग, सत्त, तत्व।
संज्ञा
(सं.)

सार
सार कौ सार-सर्वोत्तम तत्व।
पद
उ.- (क) सूर भक्त-बत्सलता बरनौ सर्व कथा कौ सार-१-२६७। (ख) सार कौ सार संकल-सुख कौ सुख हनूमान-सिव जानि गह्यौ-२-८।

सार
तात्पर्य, निष्कर्ष।
संज्ञा
(सं.)

सार
किसी पदार्थ का अरक या रस।
संज्ञा
(सं.)

सार
पानी, जल।
संज्ञा
(सं.)

सार
गूदा।
संज्ञा
(सं.)

सार
मलाई।
संज्ञा
(सं.)

सार
मक्खन।
संज्ञा
(सं.)

सारंग-बैरी
भौरे का शत्रु, चंपा पुष्प।
संज्ञा
(हिं. सारंग=भौंरा+बैरी)
उ.- आदि को सारंग-बैरी पट प्रथम दिखराइ-सहरी.।

सारंग-माल
कमलों की माला।
संज्ञा
(हिं. सारंग=कमल+माला)
उ.- सारँग-माल लसत सारँग सी-लहरी.।

सारंग-रिपु
दीपक का शत्रु वस्त्र या घूँघट।
संज्ञा
(हिं. सारंग=दीपक, भौंरा+रिपु)
उ.- परौ सारँग-रिपु न मानत करत अद्भुत खेद-लहरी.।

सारंग-रिपु
दीपक का शत्रु वस्त्र या साड़ी रा अंचल।
संज्ञा
(हिं. सारंग=दीपक, भौंरा+रिपु)
उ.- आनन-अमल पोंछ सारँग-रिपु तैं-लहरी.।

सारंग-रिपु
भ्रमर का शत्रु, चंपा का फूल।
संज्ञा
(हिं. सारंग=दीपक, भौंरा+रिपु)
उ.- सुधा गेह में करि की सोभा, सारँग-रिपु सीस बनैहै-लहरी.।

सारंगलोचना
मृग या हिरन जैसी नेत्रवाली, मृगनयनी।
वि.
(हिं. सारंग+सं. लोचना)

सारंग-सुत
दीपक से उत्पन्न, काजल।
संज्ञा
(हिं. सारंग=दीपक+सुत)
उ.- (क) बिछुर गयौ सारँग-सुत सिगरौ-लहरी.। (ख) सारँग-सुत नीकन तें बिछुरत-लहरी.। (ग) सारँग-सुत नीकन में सोहत-लहरी.। (घ) सारँग-सुत रेख सँभारी- लहरी.।

सारंगसुता
आह्लाद की पुत्री, आह्लादिनी या आनंद देनेवाली शक्ति।
संज्ञा
(हिं. सारंग= आह्लाद, सूर्य+सुता=पुत्री)
उ.- सारँग-सुता देख सारँग को, तेरौ अटल सुहाग-सारा.।

सारंगसुता
सूर्य की पुत्री, यमुना।
संज्ञा
(हिं. सारंग=आह्लाद, सूर्य+सुता=पुत्री)
उ.- ब्रह्म-सुता-सुत-पद-रज परसत, सारँग-सुता दिखावै-सारा. ९६१।

सारंगिन, सारंगिनि
सखी, सहचरी।
संज्ञा
(हिं. सारंग)
उ.- सारँग-माल लसत सारँग-सी सारंगीनि जो फूली-लहरी.।

सार
फल, परिणाम।
संज्ञा
(सं.)

सार
धन-संपत्ति।
संज्ञा
(सं.)

सार
अमृत।
संज्ञा
(सं.)

सार
लोहा।
संज्ञा
(सं.)

सार
बल, शक्ति।
संज्ञा
(सं.)

सार
जुवा खेलने का पासा।
संज्ञा
(सं.)

सार
तलवार।
संज्ञा
(सं.)

सार
एक छंद।
संज्ञा
(सं.)

सार
एक अर्थालंकर।
संज्ञा
(सं.)

सार
श्रेष्ठ, उत्तम।
वि.
उ.- हम तीनों हैं जग-करतार, माँगि लेहु हमसौं बर सार-४-३।

सार
मजबूत, दृढ़।
वि.

सार
मैना (पक्षी)।
संज्ञा
(सं. साटिका)

सार
पालन-पोषण।
संज्ञा
(हिं. सारना)

सार
देख-रेख।
संज्ञा
(हिं. सारना)

सार
खोज-खबर।
संज्ञा
(हिं. सारना)
उ.- तलफत छाँड़ि गए मधुबन को बहुरि न कीन्ही सार-२७१७।

सार
रक्षा।
संज्ञा
(हिं. सारना)
उ.- जहँ जहँ दुसह कष्ट भक्तनि कौं तहँ तहँ सार करै-१-४५।

सार
पलँग, शैया।
संज्ञा
(हिं. सारना)

सार
कपूर।
संज्ञा
(सं. घनसार)

सार
सालने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(हिं. साल)

सार
मन में खटकने या कष्ट देनेवाली बात।
संज्ञा
(हिं. साल)

सार
पत्नी का भाई, साला।
संज्ञा
(हिं. साला)

सार
मुश्किल, कठिन।
वि.

सार
(एक) जैसे, (एक) से।
वि.
(हिं. सर)
उ.- सखी री स्याम सबै इक सार-२६८७।

सारखा
समान, सदृश।
वि.
(हिं. सरीखा)

सारगंध, सारगंधि
चंदन।
संज्ञा
(सं.)

सारगर्भित
तत्वपूर्ण।
वि.
(सं.)

सारग्रहण
तत्व-भाग स्वीकार या ग्रहण करने का भाव, अवस्था या प्रवृत्ति।
संज्ञा
(सं. सार+ग्रहण)

सार-ग्राहिता
तत्व-भाग ग्रहण करने का भाव, अवस्था या प्रवृत्ति।
संज्ञा
(सं.)

सार-ग्राही
तत्व ग्रहण करनेवाला।
वि.
(सं.)

सारध
शहद, मधु।
संज्ञा
(सं.)

सारज
मक्खन, नवनीत।
संज्ञा
(सं.)

सारण
पारे आदि रसों का संस्कार।
संज्ञा
(सं.)

सारण
रावण का एक मंत्री जो राम की सेना में उनका भेद लेन गया था।
संज्ञा
(सं.)

सारणी
छोटी नदी।
संज्ञा
(सं.)

सारणी
छोटे-छोटे खानों में अंक आदि की सूची।
संज्ञा
(सं. सारिणी)

सारत
पूरी या पालन करता है।
क्रि.स.
(हिं. सारना)
उ.- बरबस ही लै जान कहत हैं, पैज आपनी सारत -पृ. ३२७ (६८)।

सारता
सार या तत्व का भाव या धर्म।
संज्ञा
(सं.)

सारथि
रथादि चलानेवाला, सूत।
संज्ञा
(सं. सारथी)
उ.- पारथ के सारथि हरि आप भए हैं-१-२३।

सारथि
सागर, समुद्र।
संज्ञा
(सं. सारथी)

सारथित्व
सारथी का कार्य, पद या भाव।
संज्ञा
(सं.)

शैलगंगा
गोवर्द्धन पर्वत की एक नदी जिसमें श्रीकृष्ण द्वारा सब तीर्थों का आवाहन किया जाना प्रसिद्ध है।
संज्ञा
(सं.)

शैलजा
पार्वती।
संज्ञा
(सं.)

शैलतटी
पहाड़ की तराई।
संज्ञा
(सं.)

शैलधर, शैलधरन
गोवर्द्धनधारी श्रीकृष्ण।
संज्ञा
(सं. शैलधर)
उ.- सूरदास प्रभु शैलधरन बिनु कहा सबै अब तोते-२८३३।

शैलनंदिनी
पार्वती।
संज्ञा
(सं.)

शैलपति
हिमालय।
संज्ञा
(सं.)

शैलपति
शिव।
संज्ञा
(सं.)

शैलरंध्र
गुहा, गुफा।
संज्ञा
(सं.)

शैलराज
हिमालय।
संज्ञा
(सं.)

शैलराज
शिव।
संज्ञा
(सं.)

सारथी
रथ आदि चलानेवाला, सूत।
संज्ञा
(सं.)
उ.- (क) अरजुन के हरि हुते सारथी-१-२६४। (ख) सारथी पाय रूख दये सटकार हय-१० उ.-५६।

सारथी
सागर, समुद्र।
संज्ञा
(सं.)

सारथ्य
सारथी का कार्य, पद या भाव।
संज्ञा
(सं.)

सारद
सरस्वती।
संज्ञा
(सं. शारदा)
उ.- (क) सेस, सारद रिषय नारद संत चिंतन सरन-१-३०८। (ख) गौरि गनेस्वर बोनऊँ (हो) देवी सारद तोहिं -१०-४०।

सारद
शरद ऋतु।
संज्ञा
(सं. शरद्)

सारद
शरद ऋतु -संबंधी, शारदीय।
वि.

सारदा
सरस्वती।
संज्ञा
(सं. शारदा)
उ.- सुर-तरूवर की साख लेखिनी लिखत सारदा हारैं-१-१८३।

सारदी, सारदीय
शरद ऋतु-सम्बन्धी।
वि.
(सं. शारदीय)

सारदूल
सिंह।
संज्ञा
(सं. शार्दूल)

सारधू
पुत्री, कन्या।
संज्ञा
(हिं.)

सारन
रावण का मंत्री जो गुप्त दूत बनकर राम की सेना का भेदे लेने गया था।
संज्ञा
(सं. सारण)
उ.- सुक-सारन द्वै दूत पठाए-९-१२०।

सारना
(काम) पूरा या ठीक करना।
क्रि.स.
(हिं. सरना)

सारना
प्रतिज्ञा पूरी करना, प्रण पालना।
क्रि.स.
(हिं. सरना)

सारना
सजाना, सुंदर करना।
क्रि.स.
(हिं. सरना)

सारना
बनाना, साधना।
क्रि.स.
(हिं. सरना)

सारना
सँभालना, देखरेख या रक्षा करना।
क्रि.स.
(हिं. सरना)

सारना
आँखों में अंजन लगाना।
क्रि.स.
(हिं. सरना)

सारना
(अस्त्र-शस्त्र) चलाना, प्रहार करना।
क्रि.स.
(हिं. सरना)

सारना
दूर हटाना।
क्रि.स.
(हिं. सरना)

सारना
(आग) बुझाना।
क्रि.स.
(हिं. सरना)

सारस
चंद्रमा।
संज्ञा
(सं.)

सारस
कमल।
संज्ञा
(सं.)
उ.- (क) सारस रस अचवन को मानो तृषित मधुप जुग जोर। (ख) सारस हूँ तैं नैन बिसाला-२४८२।

सारस
स्त्रियों का एक कटिभूषण।
संज्ञा
(सं.)

सारस
झील का जल।
संज्ञा
(सं.)

सारस
छप्पय छंद का एक भेद।
संज्ञा
(सं.)

सारसन
करधनी।
संज्ञा
(सं.)

सारसन
कमरबंद।
संज्ञा
(सं.)

सारसी
आर्या छंद का एक भेद।
संज्ञा
(सं.)

सारसी
सारस पक्षी की मादा।
संज्ञा
(सं.)

सार-सुता
यमुना।
संज्ञा
(सं. सुर-सुता)
उ.- निरखति बैठि नितंबिनि पिय सँग सार-सुता की ओर।

सारनाथ
बनारस से उत्तर-पश्चिम पर स्थित एक प्रसिद्ध स्थान जो हिंदुओं, बौद्धों और जैनियों का तीर्थ है। यही प्राचीन मृगदाव है जहाँ से गौतम बुद्ध ने अपना उपदेश आरम्भ किया था।
संज्ञा
(हिं. सारंग+नाथ)

सारनो
सारना।
क्रि.स.
(हिं. सरना)

सारनो
सारने' की क्रिया या भाव।
संज्ञा
उ.- ललिता बिसाखा ब्रजबधू झुलावैं सुरुचि सार सारको सारनो-२२८०।

सारल्य
सरलता।
संज्ञा
(सं.)

सारवती
एक छंद।
संज्ञा
(सं.)

सारवत्ता
सार ग्रहण करने का भाव।
संज्ञा
(सं.)

सारवत्ता
सारवान् होने का भाव।
संज्ञा
(सं.)

सारवान, सारवान्
सारयुक्त।
वि.
(सं. सारवान)

सारस
एक सुन्दर पक्षी।
संज्ञा
(सं.)
उ.- मृग मृगनी द्रुम बन सारस खग काहू नहीं बतायौ री-१८०८।

सारस
हंस।
संज्ञा
(सं.)

सारसुती
भारती, शारदा।
संज्ञा
(सं. सरस्वती)

सारस्य
सरसता।
संज्ञा
(सं.)

सारस्य
रसीलापन।
संज्ञा
(सं.)

सारस्वत
दिल्ली के उत्तर-पश्चिम का वह प्रदेश जो सरस्वती नदी के तट पर है।
संज्ञा
(सं.)

सारस्वत
इस देश का प्राचीन निवासी।
संज्ञा
(सं.)

सारस्वत
इस देश का ब्राह्मण।
संज्ञा
(सं.)

सारस्वत
सरस्वती-संबंधी।
वि.

सारस्वत
विद्वानों का
वि.

सारस्वत
सारस्वत प्रदेश का।
वि.

सारांश
निचोड़, सार-भाग संक्षेप।
संज्ञा
(सं.)

सारांश
तात्पर्य, अभिप्राय।
संज्ञा
(सं.)

सारांश
परिणाम।
संज्ञा
(सं.)

सारांश
उपसंहार, परिशिष्ट।
संज्ञा
(सं.)

सारांश
उत्तम, श्रेष्ठ।
वि.

सारा
सार, तत्व।
संज्ञा
(सं. सार)

सारा
सार के सारा- सर्वश्रेष्ठ या मूल तत्व।
पद
उ.- तुम संसार-सार के सारा-२४५९।

सारा
पत्नी का भाई, साला।
संज्ञा
(हिं. साला)

सारा
पूरा, समस्त।
वि.
(सं. सह)

सारा
एक काव्यालंकार।
संज्ञा

सारि
चौपड़ या जूआ खेलने का पासा।
संज्ञा
(सं.)
उ.- ढारि पासा साधु-संगति फेरि रसना सारि। दाँव अबकैं परथौ पूरो कुमति पिछली हारि-१-३०९।

सारि
चौपड़ या पासा खेलनेवाला।
संज्ञा
(सं.)

सारि
गोटी।
संज्ञा
(सं.)
उ.- चौपरि जगत मड़े जुग बीते। गुन पाँसे, क्रम अंक, चारि गति सारि, न कबहूँ जीते-१-६।

सारि
साड़ी।
संज्ञा
(हिं. साड़ी)
उ.- पगनि जेहरि लाल लहँगा अंग पँचरँग सारि-पृ. ३४४ (२९)।

सारि
(तिलक आदि) लगाकर या बनाकर।
क्रि.स.
(हिं. सारना)
उ.- इंद्र की पूजा मिटाई, तिलक गिरि को सारि-९४१।

सारि
(भोजन आदि) ग्रहण करेके।
क्रि.स.
(हिं. सारना)
उ.- सारि जेवनार अँचवन कै भए सुद्ध दियौ तमोर नँद हर्ष आगे-२४९३।

सारि
(व्रत आदि का) निर्वाह या पालन (करो)।
क्रि.स.
(हिं. सारना)
उ.- भूख लगी भोजन करिहैं हम नेम सारि तुम लेहु-२५५३।

सारिका
मैना (पक्षी)।
संज्ञा
(सं.)
उ.- बन उपबन फल फूल सुभग सर सुक सारिका हंस पारावत।

सारिखा, सारिखे
समान, तुल्य।
वि.
(हिं. सरीखा)
उ.- तुम सारिखे बसीठ पठाए कहिए कहा बुद्धि उन केरी-३०१२।

सारिणी
खाने या स्तंभ-रूप में दिये गये अंक आदि।
संज्ञा
(सं.)

सारिणी
सूची।
संज्ञा
(सं.)

सारी
मैना (पक्षी), सारिका।
संज्ञा
(सं.)

सारी
गोटी।
संज्ञा
(सं.)

सारी
पासा।
संज्ञा
(सं.)

सारी
स्त्रियों की बढ़िया धोती, साड़ी।
संज्ञा
(हिं. साड़ी)
उ.- (क) तब अंबर और मँगाइ सारी सुरंग चुनी-१०-२४। (ख) यह तौ लाल ढिगनि की औरै है काहू की सारी-६९३।

सारी
पत्नी की बहन।
संज्ञा
(हिं. साली)

सारी
सब, पूर्ण, समस्त।
वि.
(हिं. सारा)
उ.- बलि हो बृन्दाबन की भूमिहिं सो तो भाग की सारी-३४१२।

सारी
अनुकरण करनेवाला।
वि.
(सं. सारिन्)

सारु
सार।
संज्ञा
(सं. सार)
उ.- मनहुँ छिड़ाइ लिये नँदनंदन वा ससि को सत सारु-१३३२।

सारूप, सारूप्य
समान रूप होने का भाव, एकरूपता।
संज्ञा
(सं. सारूप्य)

सारूप, सारूप्य
पाँच प्रकार की मुक्तियों में एक जिसमें भक्त उपास्य का ही रूप प्राप्त कर लेता है।
संज्ञा
(सं. सारूप्य)

सारूपता, सारूप्यता
सारूप्य का भाव।
संज्ञा
(सं. सारूप्यता)

सारे
सब।
वि.
(हिं. सारा)
उ.- (क) भीमादिक रोए पुनि सारे-१-२८८। (ख) यौं कहि पुनि बैकुंठ सिधारे। बिधि हरि महादेव सुर सारे-४-५।

सारे
निर्वाह किये, निबाहे।
क्रि.स.
(हिं. सारना)
उ.- जन्मत ही गोकुल सुख दीन्हो नंद दुलार बहुत सारे री-२५३३।

सारो
पत्नी का भाई।
संज्ञा
(हिं. साला)

सारो
मैना (पक्षी)।
संज्ञा
(सं. सारिका)

सारोपा
लक्षणा' का एक भेद।
संज्ञा
(सं.)

सारौं
मैना (पक्षी)।
संज्ञा
(सं. सारिका)

सारौ
सब।
वि.
(हिं. सारा)
उ.- जज्ञ मैं करत तब मेघ बरसत मही, बीज अंकुर तबै जमत सारौ-४-११।

सार्ङ्गपानि, सार्ङ्गपानी
सारंग' नामक धनुष धारण करनेवाले विष्णु या उनके अवतार।
संज्ञा
(सं. सारङ्गपाणि)
उ.- फूली है जसोदा रानी, सुत जायौ सार्ङ्गपानी -१०-३४।

सार्थ
अर्थ से युक्त या सहित।
वि.
(सं.)

सार्थ
समूह।
संज्ञा
(सं.)

सार्थ
वणिक्-समूह।
संज्ञा
(सं.)

सार्थक
अर्थ-युक्त।
वि.
(सं.)

सार्थक
सफल, पूर्ण मनोरथ।
वि.
(सं.)

सार्थक
गुणकारी, उपकारी।
वि.
(सं.)

सार्थकता
सार्थक होने का भाव।
संज्ञा
(सं.)

सार्थकता
सफलता, सिद्धि।
संज्ञा
(सं.)

सार्थपति
समूह में जाकर व्यापार करनेवालों का नायक।
संज्ञा
(सं.)

सार्थवाह
समूह के साथ दूर स्थानों में जाकर व्यापार करनेवाला।
संज्ञा
(सं.)

सार्दूल
सिंह।
संज्ञा
(सं. शार्दूल)

शैवाल
सेवार, सिवार।
संज्ञा
(सं.)

शैव्य
शिव-संबंधी।
वि.
(सं.)

शैव्या
सत्यवादी हरिश्चन्द्र की रानी।
संज्ञा
(सं.)

शैशव
शिशु-संबंधी।
वि.
(सं.)

शैशव
बाल्यावस्था या शिशु-अवस्था-संबंधी।
वि.
(सं.)

शैशव
बचपन।
संज्ञा

शैशव
बच्चों सा व्यवहार।
संज्ञा

शोक
प्रियजन के अभाव या पीड़ा आदि से उत्पन्न दुख; (नौ रसों के नौ स्थायी भावों में एक है शोक जो करूण रस का मूल है; इसे मृत्यु का पुत्र कहा गया है)।
संज्ञा
(सं.)
उ.- मदन गोपाल देखियत हैं सब अब दुख शोक बिसारी-२५६६।

शोककारक
शोक उत्पन्न करनेवाला।
वि.
(सं.)

शोकाकुल
शोक से व्याकुल।
वि.
(सं.)

सार्यो, सार्यौ
पूरा किया है।
क्रि.स.
(सं. सारना)
उ.- अदिति सुतन को कारज सारयो-११-२।

सार्व
सबसे संबंध रखनेवाला।
वि.
(सं.)

सार्वकालिक
सब समयों से संबंधित।
वि.
(सं.)

सार्वकालिक
सर्व कालों में होनेवाला।
वि.
(सं.)

सार्वजनिक
सब लोगों से संबंध रखनेवाला।
वि.
(सं.)

सार्वजनिक
सब लोगों के काम आनेवाला।
वि.
(सं.)

सार्वजनीन
सबसे संबंधित।
वि.
(सं.)

सार्वत्रिक
सब स्थानों में होनेवाला।
वि.
(सं.)

सार्वदेशिक
सारे देश से संबंधित।
वि.
(सं.)

सार्वदेशिक
सब देशों में होनेवाला या सब देशों से संबंधित।
वि.
(सं.)

सार्वभौतिक
सब भूतों या तत्वों से संबंधित या उनमे होनेवाला।
वि.
(सं.)

सार्वभौम
चक्रवर्ती राजा।
संज्ञा
(सं.)

सार्वभौम
सारी पृथ्वी से संबंधित या उसमें होनेवाला।
वि.

सार्वभौमिक
सारी पृथ्वी से संबंधित या उसमें होनेवाला।
वि.
(सं.)

सार्वभौमिक
सारी पृथ्वी के समस्त देशों को एक समान समझने के उदार दृष्टिकोणवाला।
वि.
(सं.)

साल
सालने' की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(हिं. सालना)

साल
सूराख, छेद।
संज्ञा
(हिं. सालना)

साल
घाव।
संज्ञा
(हिं. सालना)

साल
दुख, पीड़ा, वेदना।
संज्ञा
(हिं. सालना)
उ.- सुरति-साल-ज्वाला उर अंतर ज्यौं पावकहिं पियौ-९-४६।

साल
चुभने, खटकने या पीड़ा पहुँचानेवाले।
वि.
उ.- (क) बैरिनि कौ उर साल-१०-१३८। (ख) मन-मन बिहँसत गोपाल, भक्त-पाल, दुष्ट-साल-१०-२७६।

साल
जड़, मूल।
संज्ञा
(सं.)

साल
किला।
संज्ञा
(सं.)

साल
बरस, वर्ष।
संज्ञा
(फ़ा.)

साल
सूखा वृक्ष।
संज्ञा
(सं. शाल)

साल
दुशाला।
संज्ञा
(फ़ा. शाल)

साल
धान-विशेष।
संज्ञा
(सं. शालि)

साल
घर।
संज्ञा
(सं. शाला)

साल
स्थान।
संज्ञा
(सं. शाला)

सालई
पीड़ा पहुँचाता है।
क्रि.स.
(हिं. सालना)

सालक
दुख देनेवाला।
वि.
[हिं. सालना+क (प्रत्य.) ]
उ.- (क) सुर पालक असुरनि उर सालक त्रिभुवन जाहि डराई-३६३। (ख) सूर स्याम चले गाइ चरावन कंस उरहिं के सालक-४३६। (ग) तुही अनंत सक्ति प्रभु असुर सालक-१० उ.-३५।

सालना, सालनो
प्रविष्ट करना।
क्रि.स.

सालना, सालनो
एक लकड़ी आदि में छेद करके दूसरी का सिरा उसमें डालना।
क्रि.स.

साला
पत्नी का भाई।
संज्ञा
(सं. श्यालक)

साला
इस संबंध की सूचक एक गाली।
संज्ञा
(सं. श्यालक)

साला
मैना (पक्षी)।
संज्ञा
(सं. सारिका)

साला
घर।
संज्ञा
(सं. शाला)

साला
पाठशाला।
संज्ञा
(सं. शाला)

सालाना
साल का, वार्षिक।
वि.
(फ़ा. सालानः)

सालार
पथ-प्रदर्शक।
संज्ञा
(फ़ा.)

सालार
नेता, अगुआ, प्रधान, नायक।
संज्ञा
(फ़ा.)

साल-गिरह
बरस-गाँठ।
संज्ञा
(फ़ा.)

सालग्राम
शालग्राम।
संज्ञा
(सं. शालग्राम)

सालग्रामी
गंडक नदी (जिसमें शालग्राम की शिलाएँ पायी जाती हैं )।
संज्ञा
(सं. शालग्राम)

सालत
छेद करते, चुभते या दुख पहुँचाते हैं।
क्रि.स.
(हिं. सालना)
उ.- आपुस ही में कहत हँसत हैं प्रभु हृदय यह सालत-२५७४।

सालन
पकी हुई मसालेदार तरकारी।
संज्ञा
(सं. सलवण)
उ.- (क) सालन सकल कपूर सुबासत, स्वाद लेत सुंदर हरि ग्रासत-३९६। (ख) बेसन सालन अधिकौ नागर-२३२१।

सालना, सालनो
मन में खटकना या कसकना।
क्रि.अ.
(सं. शल्य)

सालना, सालनो
चुभना, गड़ना।
क्रि.अ.
(सं. शल्य)

सालना, सालनो
छेद करना।
क्रि.स.

सालना, सालनो
चुभाना, गड़ाना।
क्रि.स.

सालना, सालनो
दुख या कष्ट पहुँचाना।
क्रि.स.

सालि
धान-विशेष।
संज्ञा
(सं. शालि)

सालिग्राम
विष्णु की, एक प्रकार के गोल पत्थर की, मूर्ति।
संज्ञा
(सं. शालग्राम)
उ.- सालिग्राम मेलि मुख भीतर बैठि रहे अरगाई-१०-२६३।

साली
पत्नी की बहन।
संज्ञा
(हिं. साला)

सालु
कष्ट।
संज्ञा
(हिं. सालना)

सालु
ईर्ष्या।
संज्ञा
(हिं. सालना)

सालू
एक तरह का लाल कपड़ा जो विवाह जैसे मांगलिक कार्यों में उपयोग में आता है।
संज्ञा
(देश.)

सालोक्य
पाँच प्रकार की मुक्तियों में एक जिसमें भक्त भगवान के साथ उनके लोक में वास करता है।
संज्ञा
(सं.)
उ.- (क) सालोक्य सामीप्य नासारोपिता भुज चारि-२९२४। (ख) हम सालोक्य स्वरूप सरो जो रहत समीप सहाई-३२९०।

साल्मलि,साल्मली
सेमल (पेड़)।
संज्ञा
(सँ. शाल्मली)

साल्मलि,साल्मली
एक (पौराणिक) द्वीप।
संज्ञा
(सँ. शाल्मली)
उ.- सातों दीप ¨¨¨¨¨। जबू प्लच्छ, क्रौच, साक, साल्मलि कुस पुष्कर भरपूर-सारा. ३४।

साल्व
शाल्व।
संज्ञा
(सं. शाल्व)
उ.- ताहि-आवत निरखि स्याम निज साँग को काटि करि साल्व की सुधि भुलाई-१० उ.-५६

सावन
एक सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय का समय।
संज्ञा
(सं.)

सावनी
धान-विशेष।
संज्ञा
(हिं. सावन)

सावनी
सावन में गाया जानेवाला एक गीत।
संज्ञा

सावनी
कजली (गीत)।
संज्ञा

सावनी
सावन में वर-पक्ष की ओर से कन्या के लिए भेजे जानेवाले वस्त्र, मिठाई आदि उपहार।
संज्ञा

सावनी
सावन की, सावन-संबंधी।
वि.
उ.- रंगमहल में जहँ नँदरानी खेलति सावनी तीज सुहाई-२२९०।

सावनी
सावन मास की पूर्णमा जो 'रक्षाबंधन' का दिन है।
संज्ञा
(सं. श्रावणी)

सावर
शिव-कृप एक तंत्र का नाम।
संज्ञा
(सं. शावर)
उ.- सावर-मंत्र लिख्यौ स्त्रुति-द्वार।

सावर
एक तरह का हिरन।
संज्ञा
(सं. शबर)

सावर्ण
समान वर्ण सम्बन्धी।
वि.
(सं.)

सावचेत
चौकन्ना, सावधान।
वि.
(सं. सा+हिं. चेत)

सावचेती
सतर्कता।
संज्ञा
(हिं. सावचेत)

सावत
सौतिया डाह।
संज्ञा
(हिं. सौत)

सावधान
सजग, सचेत, सतर्क।
वि.
(सं.)
उ.- (क) अजहूँ सावधान किन होहि। माया बिषम भुजंगिनि कौ बिष उतरयौ नाहिंन तोहिं-२-३२। (ख) सावधान करिकै गई-१६७८।

सावधानता
सजगता, सतर्कता।
संज्ञा
(सं.)

सावधानी
सतर्कता।
संज्ञा
(सं. सावधान)

सावधि
जिसमें या जिसकी अवधि निश्चित की गयी हो।
वि.
(सं. स+अवधि)

सावन
श्रावण मास जब खूब पानी बरसता है।
संज्ञा
(सं. श्रावण)
उ.- नैना सावन-भादों जीते-२७६५।

सावन
इस मास में गाया जानेवाला एक प्रकार का गीत।
संज्ञा
(सं. श्रावण)

सावन
कजली (गीत)।
संज्ञा
(सं. श्रावण)

सावंत
वह भूस्वामी जो किसी बड़े राजा को कर देता हो।
संज्ञा
(सं. सामंत)

सावंत
वीर, योद्धा।
संज्ञा
(सं. सामंत)
उ.- लात के लगत सिर तें गयो मुकुट गिर केस धरि लै चले हरषि सावंत-।

सावंत
अधिनायक।
संज्ञा
(सं. सामंत)

साव
बालक, पुत्र।
संज्ञा
(सं. शावक)

साव
साहु।
संज्ञा
(हिं. हार)

सावक
पशु-पक्षी का बच्चा।
संज्ञा
(सं. शावक)
उ.- सिंह-सावक ज्यौं तजै गृह इंद्र आदि डरात-१-१०६।

सावक
बौद्ध संन्यासी।
संज्ञा
(सं. श्रावक)

सावक
जैनी साधु, जैनी।
संज्ञा
(सं. श्रावक)

सावकाश
अवकाश होनेपर, सुभीते से।
क्रि.वि.
(सं.)

सावकाश
अवकाश के साथ।
वि.

साश्रु
जिनमें आँसू भरे हों।
वि.
(सं. स+अश्रु)

साश्रु
आँखों में आँसू भरकर।
क्रि.वि.

साषी
गवाही, साक्षी।
संज्ञा
(सं. साक्षी)

साष्टांग
आठों अंगों से।
क्रि.वि.
(सं.)

साष्टांग
आठों अंग-सहित।
वि.

साष्टांग
साष्टांग प्रणाम -भूमि पर लेटकर, मस्तक, हाथ, पैर, हृदय, आँख, जाँघ, वचन और मन से प्रणाम करना।
यौ.
मुहा.- (किसी को) साष्टांग प्रणाम कहना या करना-(किसी से) बहुत दूर या बचकर रहना।

सास
पति या पत्नी की माता।
संज्ञा
(सं. श्वश्रु)
उ.- जिय परी ग्रंथि कौन छोर, निकट ननँद न सास-पृ. ३४८ (५७)।

सास
वह वृद्धा जिससे पति या पत्नी की माता-जैसा संबंध माना जाय।
संज्ञा
(सं. श्वश्रु)
उ.- नाहीं ब्रज-वास, सास, ऎसी बिधि मेरौ-१०-२७६।

सासत
दंड देता है।
क्रि.स.
(हिं. सासना)

सासत
कष्ट पहुँचाता है।
क्रि.स.
(हिं. सासना)

शैलसुता
पार्वती।
संज्ञा
(सं.)

शैली
ढब, ढंग, रीति।
संज्ञा
(सं.)

शैली
पद्धति, प्रणाली, परिपाटी।
संज्ञा
(सं.)

शैली
प्रथा, चलन, रिवाज।
संज्ञा
(सं.)

शैली
वाक्य-रचना की विशिष्ट रीति।
संज्ञा
(सं.)

शैलूष
नाटक खेलनेवाला अभिनेता।
संज्ञा
(सं.)

शैलेंद्र
हिमालय।
संज्ञा
(सं.)

शैव
शिव-संबंधी।
वि.
(सं.)

शैव
शिव का उपासक।
संज्ञा

शैवलिनी
नदी।
संज्ञा
(सं.)

सावित्र
सूर्य।
संज्ञा
(सं.)

सावित्र
सूर्य का पुत्र।
संज्ञा
(सं.)

सावित्र
सविता या सूर्य-संबंधी।
वि.

सावित्री
(वेदमाता) गायत्री।
संज्ञा
(सं.)

सावित्री
सरस्वाती।
संज्ञा
(सं.)

सावित्री
उपनयन के समय होनेवाला एक संस्कार।
संज्ञा
(सं.)

सावित्री
मद्र देश के राजा अश्वपति की पुत्री जो सत्यवान को ब्याही थी और जिसने अपने मृत पति के प्राण वरदाल-रूप में यमराज को प्रसन्न करके प्राप्त किये थे।
संज्ञा
(सं.)

सावित्री
सती-साध्वी स्त्री।
संज्ञा
(सं.)

सावित्री
सधवा स्त्री।
संज्ञा
(सं.)

सावित्रीव्रत
वह व्रत जो स्त्रियाँ, पतियों की दीर्घायु-कामना से ज्येष्ठ कृष्ण १४ को करती हैं।
संज्ञा
(सं.)

सासत
डाँटता-डपटता है।
क्रि.स.
(हिं. सासना)

सासत
दंड।
संज्ञा
(हिं. साँसत)

सासत
कष्ट।
संज्ञा
(हिं. साँसत)

सासरा
ससुराल।
संज्ञा
(सं. सास)

सासन
आज्ञा, आदेश।
संज्ञा
(सं. शासन)

सासन
नियंत्रण।
संज्ञा
(सं. शासन)

सासन
राज्य-संचारन।
संज्ञा
(सं. शासन)

सासना
सजा, दंड।
संज्ञा
(सं. शासन)

सासना
डाँट-डपट।
संज्ञा
(सं. शासन)

सासना
बहुत अधिक शारीरिक कष्ट, साँसत।
संज्ञा
(सं. शासन)
उ.- (क) बहुत सासना दई प्रहलादहिं ताहि निसंक कियौ-१-३८। (ख) हिरनाकुस प्रहलाद भक्त कौं बहुत सासना जारयौ-१-१०९।

साहना
लेना, ग्रहण करना।
क्रि.स.
(हिं. सहना)

साहनी
सेना के विभागीय अध्यक्ष।
संज्ञा
(सं. साधनिक, प्रा. साहनिय)

साहनी
राज-कर्मचारी।
संज्ञा
(सं. साधनिक, प्रा. साहनिय)

साहनी
परिषद।
संज्ञा
(सं. साधनिक, प्रा. साहनिय)

साहनी
संगी, साथी।
संज्ञा
(सं. साधनिक, प्रा. साहनिय)

साहनी
फौज, सेना।
संज्ञा

साहब
प्रभु, स्वामी।
संज्ञा
(अ. साहिब)

साहब
परमेश्वर।
संज्ञा
(अ. साहिब)
उ.- (क) तुम साहब मैं ढाढ़ी तुम्हरौ प्रभु मेरे ब्रजराज-१०-३६। (ख) पोषन-भरन बिसंभर साहब-१-३५। (ग) साहब सों जो करै धुताई-१०४१।

साहब
एक सम्मानसूचक शब्द, महाशय।
संज्ञा
(अ. साहिब)

साहब
गोरी जाति का व्यक्ति।
संज्ञा
(अ. साहिब)

सासना
दंड देना।
क्रि.स.

सासना
डाँटना-डपटना।
क्रि.स.

सासना
बहुत अधिक शारीरिक कष्ट देना।
क्रि.स.

सासरा
ससुराल।
संज्ञा
(हिं. सास+आलय)

सासा
संदेह।
संज्ञा
(सं. संशय)

सासा
साँस।
संज्ञा
(हिं. साँस)

सासा
प्राण।
संज्ञा
(हिं. साँस)

सासु
पति या पत्नी कौ माता।
संज्ञा
(हिं. सास)
उ.- (क) सासु-ननद घर घर लिए डोलतिं, याकौं रोग बिचारौ री-१०-१३५। (ख) सासु रिसाय, लरै मेरी ननदी-२३९७।

सासुर
पति या पत्नी का पिता।
संज्ञा
(हिं. ससुर)

सासुर
ससुराल।
संज्ञा
(हिं. ससुर)

साह
सज्जन।
संज्ञा
(हिं. साहु)

साह
सेठ, महाजन।
संज्ञा
(हिं. साहु)

साह
बनिया, व्यापारी।
संज्ञा
(हिं. साहु)

साह
ईमानदार।
संज्ञा
(हिं. साहु)

साह
महाराज।
संज्ञा
(फ़ा. शाह)

साह
मुसलमान फकीर।
संज्ञा
(फ़ा. शाह)

साह
बड़ा, भारी, महान।
वि.

साह
उदार।
वि.

साहचर्य
साथ रहने का भाव, सहचरता।
संज्ञा
(सं.)

साहचर्य
संग, साथ।
संज्ञा
(सं.)

साहब
बहुत फैशन से रहनेवाला।
वि.

साहबजादा
बेटा।
संज्ञा
(अ. साहिब+जादा)

साहब-सलामत
सलाम।
संज्ञा
(अ.)

साहब-सलामत
मेल-जोल।
संज्ञा
(अ.)

साहस
मन की वह दृढ़ता जो कोई बड़ा काम करने को प्रवृत्त करती है, हिम्मत, हियाब।
संज्ञा
(सं.)
उ.- जरत ज्वाला गिरत गिरि तैं स्व कर काटत सीस। देखि साहस सकुच मानत राखि सकत न ईस-११०६।

साहस
कोई बुरा काम।
संज्ञा
(सं.)

साहस
जबर दस्ती धन लूटना।
संज्ञा
(सं.)

साहसिक
पराक्रमी।
संज्ञा
(सं.)

साहसिक
डाकू।
संज्ञा
(सं.)

साहसिक
मिथ्यावादी।
संज्ञा
(सं.)

साहसिक
निडर, निर्भय।
संज्ञा
(सं.)

साहसी
हिम्मत रखनेवाला।
वि.
(सं. साहसिन्)

साहस्त्र
सहस्त्र का, सहस्त्र-संबंधी।
वि.
(सं.)

साहस्त्रिक
सहस्त्र का, सहस्त्र सम्बन्धी।
वि.
(सं.)

साहस्त्री
हजार वर्षा का समूह।
संज्ञा
(सं. सहस्त्र)

साहाय्य
मदद, सहायता।
संज्ञा
(सं.)

साहि
राजा।
संज्ञा
(फ़ा. शाह)

साहि
साहु।
संज्ञा
(हिं. साहु)

साहित्य
सहित' या साथ होने या रहने का भाव।
संज्ञा
(सं.)

साहित्य
किसी भाषा के उन गद्य-पद्य ग्रंथों आदि का समूह जिनमें स्थायी, उच्च और गूढ़ विषयों का व्यवस्थित विवेचन हो, वाङ्मय।
संज्ञा
(सं.)

साहित्य
वे कृतियाँ जिनके गुण और प्रभाव के कारण समाज में आदर हो।
संज्ञा
(सं.)

साहित्य
किसी विषय या वस्तु से सम्बन्धित कृतियाँ।
संज्ञा
(सं.)

साहित्य
किसी कवि या लेखक की समस्त रचनाएँ।
संज्ञा
(सं.)

साहित्य
गद्य-पद्य के गुण-दोष, भेद-उपभेद आदि सम्बन्धी ग्रंथों का समूह।
संज्ञा
(सं.)

साहित्यकार
वह जो ग्रंथादि लिखकर साहित्य की रचना करता हो।
संज्ञा
(सं.)

साहित्यिक
साहित्य-संबंधी।
वि.
(सं.)

साहित्यिक
साहित्य की सेवा या रचना करनेवाला।
वि.
(सं.)

साहिब
साहब।
संज्ञा
(हिं. साहब)

साहिबी
साहब' होने का भाव।
संज्ञा
(हिं. साहब)

साहिबी
प्रभुता।
संज्ञा
(हिं. साहब)

साही
बादशाहों का, राजसी।
वि.

साहु
भलामानस, सज्जन।
संज्ञा
(सं. साधु)

साहु
बनिया, व्यापारी।
संज्ञा
(सं. साधु)

साहु
जो ՙचोर՚ न हो, ईमानदार।
संज्ञा
(सं. साधु)
उ.-(क) ये भए चोर तै साहु-१-४०। (ख) ए हैं साह कै चोर-३५९। (ग) बीस बिरियाँ चोर की तौ कबहुँ मिलिहैं साहु-१२८०।

साहु
सेठ, महाजन।
संज्ञा
(सं. साधु)
उ.-मुख मागौ पैहौ सूरज प्रभु साहुहि आनि दिखावहु-३३४०।

साहुल
दीवार की सीध नापने का एक यंत्र जिसकी डोरी में एक लट्टू-सा बँधा रहता है।
संज्ञा
(फ़ा. शाकूल)

साहू
साह, साहु।
संज्ञा
(हिं. साहु)

साहूकार
बड़ा महाजन।
संज्ञा
(हिं. साहु+कार)

साहूकारा
महाजनी कार-बार।
संज्ञा
(हिं. साहूकार)

साहूकारा
वह बाजार जहाँ महाजनी कारबार होता हो।
संज्ञा
(हिं. साहूकार)

साहिबी
महत्व।
संज्ञा
(हिं. साहब)

साहिबी
ऎश्वर्य और अधिकार का सुख-भोग।
संज्ञा
(हिं. साहब)
उ.- (क) नहात-खात सुख करता साहिषी, कैसैं करि अनखाऊँ-९-१७। (ख) जनम साहिबी करत गयौ-१-६४।

साहिबी
ठाट-बाट।
संज्ञा
(हिं. साहब)

साहिबी
साहब का।
वि.

साहिबी
साहब-जैसा।
वि.

साहियाँ
पति।
संज्ञा
(सं. साँई)

साहियाँ
स्वामी।
संज्ञा
(सं. साँई)

साहिल
तट, किनारा।
संज्ञा
(अ.)

साही
एक जगली जंतु जिसके शरीर पर लंबे-लंबे काँटे होते हैं।
संज्ञा
(सं. शल्यकी)

साही
एक तरह की तलवार।
संज्ञा
(फ़ा. शाही)

शोच
चिंता।
संज्ञा
(सं. शोचन)

शोचनीय
जिसकी दशा देखकर दुख हो।
वि.
(सं.)

शोचनीय
बहुत हीन या बुरा।
वि.
(सं.)

शोण
लाली, अरूणता।
संज्ञा
(सं.)

शोण
आग, अग्नि।
संज्ञा
(सं.)

शोण
सेंदुर।
संज्ञा
(सं.)

शोण
एक नद।
संज्ञा
(सं.)

शोणित
लाल रंग का।
वि.
(सं.)

शोणित
खून, रक्त, रूधिर।
संज्ञा

शोथ
सूजन, वरम।
संज्ञा
(सं.)

साहूकारा
वह स्थान जहाँ साहूकार रहते हों।
संज्ञा
(हिं. साहूकार)

साहेब
साहब।
संज्ञा
(हिं. साहब)

साहैं
बाजू, भुजदंड।
संज्ञा
(हिं. बाँह)

साहैं
सामने, सम्मुख।
अव्य.
(हिं. सामुहें)

सिंउँ
साथ।
प्रत्य.
(पुं. हिं. स्यौं)

सिंउँ
निकट।
प्रत्य.
(पुं. हिं. स्यौं)

सिंकना
सेंका जाना।
क्रि.अ.
(हिं. सेंकना)

सिंग
सींग।
संज्ञा
(हिं. सींग)

सिंगरफ
ईंगुर।
संज्ञा
(फ़ा. शिंगरफ़)

सिंगरफी
ईंगुर का बना हुआ।
वि.
(हिं. सिंगरफ)

सिंघ
सिंह।
संज्ञा
(हिं. सिंह)

सिंघल
सिंहल द्वीप।
संज्ञा
(सं. सिंहल)

सिंघली
सिंहल द्वीप-वासी।
वि.
(हिं. सिंहली)

सिंघाड़ा
पानी की एक लता जिसके छोटे-छोटे तिकोने फल, जिन पर दो सींग से रहते हैं, खाये जाते हैं।
संज्ञा
(सं. श्रृंगाटक)

सिंघासन
सिंहासन।
संज्ञा
(सं. सिंहासन)

सिंघिनी
शेरनी।
संज्ञा
(सं. सिंहनी)

सिंचन
सींचना।
संज्ञा
(सं.)

सिंचना
सींचा जाना।
क्रि.अ.
(हिं. सींचना)

सिंचाई
सींचने का काम, भाव, पारिश्रमिक या कर।
संज्ञा
(सं. सिंचन)

सिंचाना
सींचने को प्रवृत्त करना।
क्रि.स.
(हिं. सींचना)

सिंगरौर
प्रयाग के पश्चिमोत्तर स्थित श्रृंगवेरपुर जहाँ निषादराज गुह की राजधानी थी।
संज्ञा
(सं. श्रृंगवेर)

सिंगा
सींग या लोहे का बना एक बाजा, तुरही, नरसिंहा, रणसिंगा।
संज्ञा
(हिं. सींग)

सिंगार
सजावट, सज्जा।
संज्ञा
(सं. श्रृंगार)
उ.-(क) ऎपन की सी पूतरी सब सखियनि कियौ सिंगार-१०-४०। (ख) सूर स्याम कहैं चीर देत हौं मो आगे सिंगार करौ-७९०।

सिंगार
शोभा।
संज्ञा
(सं. श्रृंगार)
उ.-तुम्हरैं भजन सबहिं सिंगार-१-४१।

सिंगार
श्रृंगार रस (साहित्य)।
संज्ञा
(सं. श्रृंगार)

सिंगारदान
श्रृंगार की सामग्री रखने की पेटी या संदूकची।
संज्ञा
(सं. सिंगार+फ़ा. दान)

सिंगारना, सिंगारनो
सजाना।
क्रि.स.
(हिं. सिंगार)

सिंगार-हाट
वेश्याओं के रहने का स्थान, चकला।
संज्ञा
(हिं. सिंगार+हाट)

सिंगारहार
हरसिंगार (फूल)।
संज्ञा
(सं. हरश्रृंगार)

सिंगारिया
देव-मूर्ति का श्रृंगार करनेवाला पुजारी।
संज्ञा
(हिं. सिंगार+इया)

सिंगारी
सजानेवाला।
वि.
(हिं. सिंगार)

सिंगारी
श्रृंगार-संबंधी।
वि.
(हिं. सिंगार)

सिंगारी
देवमूर्ति का श्रृंगार करनेवाला।
संज्ञा

सिंगार्यो, सिंगार्यौ
सजाया, सँवारा।
क्रि.स.
(हिं. सिंगारना)
उ.-पहिरि पटम्बर जकरि अडंबर यह तन मूढ़ सिंगारयौ-१-३३६।

सिंगिया
एक विष।
संज्ञा
(सं. श्रृंगिका)

सिंगी
सींग का बना बाजा।
संज्ञा
(हिं. सिंग)
मुहा.-सिंगी पूरना-सिंगी बाजा बजाना।

सिंगी
एक तरह की मछली।
संज्ञा

सिंगी
सींग की नली जिससे शरीर का दूषित रक्त चूसकर निकाला जाता है।
संज्ञा

सिंगौटा
पशुओं के सीगों पर चढ़ाया जानेवाला धातु का आवरण।
संज्ञा
(हिं. सिंग)

सिंगौटी
स्त्रियों की श्रृंगार-प्रसाधन की पिटारी।
संज्ञा
(हिं. सिंगार+औटी)

सिंचित
सींचा हुआ।
वि.
(सं.)

सिंचित
गीला, तर।
वि.
(सं.)

सिंजा
अलंकारों की झनकार।
संज्ञा
(सं.)

सिंजित
ध्वनि, झंकार।
संज्ञा
(सं. सिंजा)

सिंजित
जिसमें ध्वनि या झनकार हो।
वि.

सिंदन
रथ।
संज्ञा
(सं. स्यंदन)

सिंदूर
ईंगुर का लाल चूर्ण जिससे सौभग्यवती हिंदू स्त्रियाँ अपनी माँग भरती हैं।
संज्ञा
(सं.)
मुहा.-सिंदूर चढ़ना-कुमारी का विवाह होना। सिंदूर देना या लगाना-कन्या की माँग में सिंदूर लगाकर उसे पत्नी बनाना।

सिंदूर-दान
विवाह के अवसर पर वर का कन्या की माँग में सिंदूर भरना।
संज्ञा
(सं.)

सिंदूरबंदन
विवाह की एक रीति जिसमें वर, कन्या की माँग में सिंदूर भरता है।
संज्ञा
(सं.)

सिंदूरिया, सिंदूरी
सिंदूर के पीले मिले लाल रंग का।
वि.
(सं. सिंदूर+इया, ई)

सिंधी
सिंध प्रांत की बोली।
संज्ञा
(हिं. सिंध)

सिंधी
सिंध देश का, सिंध देश-संबंधी।
वि.

सिंधी
सिंध देश का निवासी।
संज्ञा

सिंधी
सिंध देश का घोड़ा।
संज्ञा

सिंधु
नद, बड़ी नदी।
संज्ञा
(सं.)

सिंधु
पंजाब का प्रसिद्ध नद।
संज्ञा
(सं.)

सिंधु
सागर, समुद्र।
संज्ञा
(सं.)
उ.- (क) बांधै सिंधु सकल सैना मिलि आपुन आयसु दीजै-९-११०। (ख) सोभा-सिंधु समाइ कहाँ लौं हृदय साँकरे ऐन-२६६५।

सिंधु
बड़ा जलाशय।
संज्ञा
(सं.)

सिंधु
आकर, निधान।
संज्ञा
(सं.)
उ.- करनी करुना-सिंधु की मुख कहत न आवै-१-४।

सिंधु
सात की संख्या।
संज्ञा
(सं.)

सिंदोरी, सिंदौरी
सिंदूर रखने की डिबिया जो सौभाग्य की सामाग्री में होती है।
संज्ञा
(सं. सिंदूर)

सिंध
पश्चिमी भारत का एक प्रदेश जो अब पाकिस्तान में है।
संज्ञा
(सं. सिंधु)

सिंध
पंजाब की एक प्रसिद्ध नदी।
संज्ञा
(सं. सिंधु)

सिंधव
नमक।
संज्ञा
(सं. सैंधव)

सिंधव
सिंधु देश का घोड़ा।
संज्ञा
(सं. सैंधव)

सिंधव
सिंध देश का।
वि.

सिंधव
समुद्र का।
वि.

सिंधवी
एक रागिनी।
संज्ञा
(सं. सिंधु)

सिंधारा
सावन की दोनोंतीजों को वर-पक्ष का कन्या के लिए भेजा गया पकवान, वस्त्र आदि।
संज्ञा
(देश.)

सिंधिया
ग्वालियर के मराठावंश की एक प्रसिद्ध उपाधि।
संज्ञा
(मराठी शिंदे)

सिंधु
सिंध प्रदेश।
संज्ञा
(सं.)

सिंधु
एक राग।
संज्ञा
(सं.)

सिंधुज
जो समुद्र से उत्पन्न हो।
वि.
(सं.)

सिंधुज
सिंधु देश में होनेवाला।
वि.
(सं.)

सिंधुज
सेंधा।
संज्ञा

सिंधुज
शंख।
संज्ञा

सिंधुजा
(समुद्र से उत्पन्न) लक्ष्मी।
संज्ञा
(सं.)

सिंधुजा
सीप जिसमें से मोती निकलता है।
संज्ञा
(सं.)

सिंधुजात
सिंधी घोड़ा।
संज्ञा
(सं.)

सिंधुजात
मोती।
संज्ञा
(सं.)

सिंधुनंदन
(समुद्र का पुत्र) चंद्रमा।
संज्ञा
(सं.)

सिंधुर
हाथी, हस्ती।
संज्ञा
(सं.)

सिंधुर-मणि
गजमुक्ता।
संज्ञा
(सं.)

सिंधुरवदन
गजवदन, गणेश।
संज्ञा
(सं.)

सिंधुरागामिनी
गजगामिनी।
वि.
(सं.)

सिंधुलवण, सिंधुलवन
नमक का या खारा समुद्र।
संज्ञा
(सं. सिंधु+लवण)
उ.- अगम सुपंथ दूरि दच्छिन दिसि तहँ सुनियत सखि सिंधु-लवन-१० उ.-९१।

सिंधुलवण, सिंधुलवन
सेंधानमक।
संज्ञा
(सं. सिंधु+लवण)

सिंधुशयन, सिंधुसयन
विष्णु।
संज्ञा
(सं. सिंधुशयन)

सिंधु-सुत
जलंधर राक्षस जिसे शिवजी ने मारा था।
संज्ञा
(सं.)

सिंधु-सुत
चंद्रमा।
संज्ञा
(सं.)

सिंधु-सुता
लक्ष्मी।
संज्ञा
(सं.)
उ.- (क) जो पद-पदुम सदा सिव के धन, सिंधु-सुता उर तौं नहिं टारै-१-९४। (ख) चकृत होइ नीर में बहुरि बुड़की दई, सहित सिंधु-सुता तहाँ दरस पाए-२५७०।

सिंधु-सुता
सीप जिसमें से मोती निकलता है।
संज्ञा
(सं.)

सिंधु-सुता-सुत
सीप का पुत्र अर्थात् मोती।
संज्ञा
(सं.)
उ.- सिंधु-सुता-सुत ता रिपु गमनी सुन मेरी तू बात-लहरी।

सिंधूरा
एक राग।
संज्ञा
(सं. सिंधुर)

सिंधूरी
एक रागिनी।
संज्ञा
(सं. सिंधुर)

सिंधोरी, सिंधौरी
सिंदूर रखने की डिबिया।
संज्ञा
(हिं. सिंदूर+ औरी)

सिंबी
फली।
संज्ञा
(सं.)

सिंबी
सेम।
संज्ञा
(सं.)

सिंह
शेर बबर, केसरी।
संज्ञा
(सं.)
उ.- नृप-गज कौ अब डर कहा प्रगटयौ सिंह कन्हाइ-५८९।

सिंह
बारह राशियों में पाँचवीं।
संज्ञा
(सं.)
उ.- चौथैं सिंह रासि के दिनकर जीति सकल महिं लैहैं-१०-८६।

शोकार्त
शोक से व्याकुल।
वि.
(सं. शोकार्त्त)

शोख
ढीठ।
वि.
(फ़ा. शोख)

शोख
नाटखट।
वि.
(फ़ा. शोख)

शोख
चंचल।
वि.
(फ़ा. शोख)

शोख
चटकीला (रंग)।
वि.
(फ़ा. शोख)

शोखी
ढिठाई।
संज्ञा
(फ़ा. शोखी)

शोखी
चंचलता।
संज्ञा
(फ़ा. शोखी)

शोखी
नाटखटी।
संज्ञा
(फ़ा. शोखी)

शोखी
चटकीलापन।
संज्ञा
(फ़ा. शोखी)

शोच
दुख।
संज्ञा
(सं. शोचन)

सिंह
वीरता या श्रेष्ठतावाचक शब्द।
संज्ञा
(सं.)

सिंह
बीर पुरूष।
संज्ञा
(सं.)

सिंह
एक राग।
संज्ञा
(सं.)

सिंहकर्मा
वीर पुरूष।
संज्ञा
(सं.)

सिंह-केसर
सिंह की गरदन के बाल।
संज्ञा
(सं.)

सिंहद्वार
किले, महल आदि का बड़ा फाटक जहाँ प्रायः सिंह की मूर्ति बनी रहती है।
संज्ञा
(सं.)
उ.- सिंह द्वार आरती उतारहि जसुमति आनँदकंद की।

सिंह-नाद
सिंह की गरज या दहाड़।
संज्ञा
(सं.)

सिंह-नाद
युद्ध में वीरों की ललकार।
संज्ञा
(सं.)

सिंह-नाद
ललकार कर कही हुई बात।
संज्ञा
(सं.)

सिंह-नाद
रावण के एक पुत्र का नाम।
संज्ञा
(सं.)

सिंह-नादी
सिंह-सा गरजने या ललकारनेवाला।
वि.
(सं. सिंह+न दिन्)

सिंहनी
शेरनी।
संज्ञा
(सं.)

सिंहनी
एक छंद।
संज्ञा
(सं.)

सिंहपौर
किले, महल आदि का बड़ा फाटक जहाँ प्रायः सिंह की मूर्ति बनी रहती है।
संज्ञा
(सं. सिंह+हिं. पौर)
उ.- भीर जानि सिंह-पौर त्रियन की जसुमति भवन दुराई-१०२८।

सिंहयाना
दुर्गा जिसका वाहन सिंह है।
संज्ञा
(सं.)

सिंहल
भारत के दक्षिण का एक द्वीप जिसे प्राचीन ՙलंका՚ माना जाता है।
संज्ञा
(सं.)

सिंहली
सिंहल द्वीप-संबंधी।
वि.
(हिं. सिंहल)

सिंहली
सिंहल द्वीप का निवासी।
संज्ञा

सिंहली
सिंहल द्वीप की भाषा।
संज्ञा

सिंहवाहिनी
सिंह पर चढ़नेवाली।
वि.
(सं.)

सिंहवाहिनी
दुर्गा जिसका वाहन सिंह है।
संज्ञा

सिंह-शावक, सिंह-सावक
सिंह का बच्चा।
संज्ञा
(सं. सिंह+शावक)
उ.- सिंह-सावक ज्यौं तजै गृह इंद्र आदि डरात-१-१०६।

सिंहस्थ
सिंह राशि में स्थित (ग्रह)।
वि.
(सं.)

सिंहस्थ
वह समय जब वृहस्पति सिंह राशि में हो।
संज्ञा

सिंहहनु
सिंह जैसी दाढ़वाला।
वि.
(सं.)

सिंहार-हार
हरसिंगार (फूल)।
संज्ञा
(हिं. हर-सिंगार)

सिंहाली
सिंहल का (की)।
वि.
(सं. सिंहल)

सिंहावलोकन
सिंह की तरह पीछे देखते हुए आगे बढ़ना।
संज्ञा
(सं.)

सिंहावलोकन
पिछली बातों का संक्षेप में कथन।
संज्ञा
(सं.)

सिंहावलोकन
पद्य-रचना की एक रीति जिसमें पिछले चरणांत के शब्द लेकर अगला चरण चलता है।
संज्ञा
(सं.)

सिकंजा
अपराधी को दंड देने का एक प्राचीन यंत्र।
संज्ञा
(फ़ा. शिकंजा)

सिकड़ी
जंजीर।
संज्ञा
(सं. श्रृंखला)

सिकड़ी
दरवाजे की कुंडी या साँकल।
संज्ञा
(सं. श्रृंखला)

सिकड़ी
गले में पहनने का एक गहना।
संज्ञा
(सं. श्रृंखला)

सिकड़ी
करधनी, तागड़ी।
संज्ञा
(सं. श्रृंखला)

सिकत, सिकता
बालू, रेत।
संज्ञा
(सं. सिकता)
उ.- सूर सिकत हठि नाव चलावत ए सरिता हैं सूखी-३०२९।

सिकत, सिकता
रेतीली जमीन।
संज्ञा
(सं. सिकता)

सिकत, सिकता
शकर, चीनी, शर्करा।
संज्ञा
(सं. सिकता)

सिकतिल
रेतीला।
वि.
(सं. सिकता)

सिकदार
नायक, अधिपति।
संज्ञा
(हिं. सरदार)
उ.- ब्रज-परगन-सिकदार महर, तू ताकी करत नन्हाई-१०−३२९।

सिंहासन
राजा या देवता के बैठने का विशेष आसन या चौकी।
संज्ञा
(सं.)
उ.- (क) आसा के सिंहासन बैठयौ, दंभ-छत्र सिर तान्यौ-१-१४१। (ख) स्फटिक-सिंहासन मध्य राजत हाटक सहित सजावनों-२२८०।

सिंहासन
भौंहों की बीच का तिलक-विशेष।
संज्ञा
(सं.)

सिंहिका
एक राक्षसी जो दक्षिणी समुद्र में रहती थी और आकाशचारियों की छाया देखकर ही उनको खींचकर खाती थी। लंका जाते समय हनुमान ने इसको मारा था। राहु इसका पुत्र कहा जाता है।
संज्ञा
(सं.)

सिंहिका
एक छंद।
संज्ञा
(सं.)

सिंहिकासुवन, सिंहिकासूनु
सिंहिका राक्षसी का पुत्र राहु।
संज्ञा
(सं. सिंहिका+सुवन)
उ.- ललितलट छिटकति मुख पर देति सोभा दून। मनु मयंकहिं अंक लीन्हौ सिंहिका कै सून-१०-१८४।

सिंहिनी
शेरनी।
संज्ञा
(सं. सिंह)
उ.- स्वान संग सिंहनी रति अजुगुत बेद बिरुद्ध असुर करै आई।

सिंही
शेरनी, सिंहिनी।
संज्ञा
(सं. सिंह)

सिंहेजा,सिंहेला
सिंह का बच्चा।
संज्ञा
(सं. सिंह)

सिंहोदरी
सिंह-सी पतली कमरवाली।
वि.
(सं.)

सि
समान, तुल्य।
वि.
(हिं. सं.)

सिअन
सिलाई, सीवन।
संज्ञा
(हिं. सीवन)

सिअरा
ठंढा।
वि.
(सं. शीतल)

सिअरा
छाँह, छाया।
संज्ञा

सिअरा
सिआर।
संज्ञा
(हिं. सिआर)

सिआए
सिलवाए।
क्रि.स.
(हिं. सिआना, सिलाना)
उ.- पहिरि मेघला चीर चिरातन पुनि पुनि फेरि सिआए-३१२५।

सिआना, सिआनो
सिलाना।
क्रि.स.
(हिं. सिआना)

सिआर
गीदड़।
संज्ञा
(सं. श्रृगाल)

सिकंजबी
सिरके या नीबू के रस में पकाया हुआ शरबत या दवा।
संज्ञा
(फ़ा. सीकंजबीव)

सिकंजबी
नीबू का शरबत।
संज्ञा
(फ़ा. सीकंजबीव)

सिकंजा
दबाने, कसने आदि का यंत्र।
संज्ञा
(फ़ा. शिकंजा)

सिकरवार
क्षत्रियों की एक शाखा।
संज्ञा
(देश.)

सिकरी
जंजीर।
संज्ञा
(हिं. सिकड़ी)

सिकरी
साँकल, कुंडी।
संज्ञा
(हिं. सिकड़ी)

सिकरी
गले का एक गहना।
संज्ञा
(हिं. सिकड़ी)

सिकरी
करधनी, तागड़ी।
संज्ञा
(हिं. सिकड़ी)

सिकली
धारदार हथियारों पर सान चढ़ाने की क्रिया।
संज्ञा
(अ. सैकल)

सिकलीगर
गुट्ठल धार पर सान धरने या धातु को चमकानेवाला।
संज्ञा
(हिं. सिकली+फ़ा. गर)

सिकहर
छींका।
संज्ञा
(सं. शिक्य+धर)

सिकहरैं
छींके को।
संज्ञा
(हिं. सिकहर)
उ.- आपु खाइ सो सब हम मानैं, औरनि देत सिकहरैं तोरि-१०−३२७।

सिकार
मृगया, आखेट।
संज्ञा
(फ़ा. शिकार)
उ.- सदा सिकार करत मृग-मन कौ-१−६४।

सिकारी
आखेट करनेवाला।
वि.
(फ़ा. शिकार)

सिकुड़न
फैली हुई वस्तु के सिमटने की क्रिया।
संज्ञा
(सं. संकुचन)

सिकुड़न
सिमटने से पड़ा हुआ चिन्ह, शिकन।
संज्ञा
(सं. संकुचन)

सिकुड़न, सिकुरना, सिकुरनो
फैली हुई वस्तु का सिमटना।
क्रि.अ.
(हिं. सिकुड़न, सिकुड़ना)

सिकुड़न, सिकुरना, सिकुरनो
शिकन या सिमटन पड़ना।
क्रि.अ.
(हिं. सिकुड़न, सिकुड़ना)

सिकुड़न, सिकुरना, सिकुरनो
तनाव के कारण छोटा या तंग होना।
क्रि.अ.
(हिं. सिकुड़न, सिकुड़ना)

सिकोड़ना, सिकोरना, सिकोरनो
फैली हुई वस्तु को समेटना या संकुचित करना।
क्रि.स.
(हिं. सिकुड़ना)

सिकोड़ना, सिकोरना, सिकोरनो
समेटना, बटोरना।
क्रि.स.
(हिं. सिकुड़ना)

सिकोड़ना, सिकोरना, सिकोरनो
तंग, छोटा या संकीर्ण करना।
क्रि.स.
(हिं. सिकुड़ना)

सिकोरा
मिट्टी का छोटापात्र।
संज्ञा
(हिं. सकोरा)

सिकोली
मूँज, बेंत आदि से बनायी गयी डलिया।
संज्ञा
(देश.)

सिकोही
वैभवसम्पन्न।
वि.
(फ़ा. शिकोह=वैभव)

सिकोही
आनबान या ठसकवाला,।
वि.
(फ़ा. शिकोह=वैभव)

सिकोही
बहादुर, वीर।
वि.
(फ़ा. शिकोह=वैभव)

सिक्कड़, सिक्कर
छींट, जलकण।
संज्ञा
(सं. सीकर)

सिक्कड़, सिक्कर
पसीना, स्वेद-कण।
संज्ञा
(सं. सीकर)

सिक्का
मोहर, छाप।
संज्ञा
(अ. सिक्कः)

सिक्का
टकसाल में ढला हुआ निर्दिष्ट मूल्य का धातु खंड।
संज्ञा
(अ. सिक्कः)

सिक्का
अधिकार, प्रभुत्व।
संज्ञा
(अ. सिक्कः)
मुहा. - सिक्का जमना या बैठना - (१) प्रभुत्व या अधिकार स्थापित होना। (२) रोब जमना, आतंक छाना। सिक्का जमाना या बैठाना- (१) प्रभुत्व या अथिकार स्थापित करना। (२) रोब जमाना, प्रभाव डालना।

सिक्ख
चेला, शिष्य।
संज्ञा
(सं. शिष्य)

सिखंडी
मुर्गा (पक्षी)।
संज्ञा
(हिं. शिखंडी)

सिखंडी
बाण, तीर।
संज्ञा
(हिं. शिखंडी)

सिखंडी
शिखा।
संज्ञा
(हिं. शिखंडी)

सिखंडी
राजा द्रुपद का नपुंसक पुत्र जिसे सामने करके अर्जुन ने भीष्म को मारा था।
संज्ञा
(हिं. शिखंडी)
उ.- पारथ भीषम सौं मति पाइ। कियौ सारथी सिखंडी आइ। भीषम ताहि देखि मुख फेरयौ-१−२७६।

सिख
सीख, उपदेश।
संज्ञा
(सं. शिक्षा)
उ.- (क) चिंता तजौ परीच्छित राजा सुन सिख-सांखि हमार-२−२। (ख) सुनु सिख कंत दंत तृन धरिकै स्यौं परिवार सिधारौ-९−११५। (ग) किती दई सिख-मंत्र साँवरे तउ हठ लहरि न जागी-२२७५।(घ) सुन री सखी समुझि सिख मेरी-२८५१।

सिख
चोटी, शिखा।
संज्ञा
(सं. शिखा)
उ.- रोम-रोम नख-सिख लौं मेरैं महा अघनि बपु पाग्यौ -१−१३।

सिख
चेला, शिष्य।
संज्ञा
(सं. शिष्य)

सिख
गुरु नानक आदि दस गुरुओं का अनुयायी।
संज्ञा
(सं. शिष्य)

सिखई
शिक्षा दी, सिखायी।
क्रि.स.
(हिं. सिखाना)
उ.- इक हरि चतुर हुते पहिले ही, अब बहुतै उन गुरु सिखई-३३०४।

सिखई
सिखाया है।
क्रि.स.
(हिं. सिखाना)
उ.- तोहिं किन रूठब सिखई प्यारी-२२०१।

शोध
शुद्धि, संस्कार।
संज्ञा
(सं.)

शोध
ठीक किया जाना।
संज्ञा
(सं.)

शोध
जाँच-पड़ताल, परीक्षा।
संज्ञा
(सं.)

शोध
खोजखबर, ढूँढ़।
संज्ञा
(सं.)
उ.- (क) जा दिन ते मधुबन हम आए, शोध न तुम ही लीनो हो-२९३२। (ख) सूर हमहिं पहुँचाइ मधुपुरी बहुरो शोध न लीनो-२९६५। (ग) जेइ जेइ पथिक हुते ब्रजपुर के बहुरि न शोध करे-२९८२।

शोधक
शुद्धि करनेवाला।
वि.
(सं.)

शोधक
सुधार करनेवाला।
वि.
(सं.)

शोधक
ढूँढ़ने-खोजनेवाला।
वि.
(सं.)

शोधन
शुद्ध करना।
संज्ञा
(सं.)

शोधन
सुधारना।
संज्ञा
(सं.)

शोधन
धातु का संस्कार।
संज्ञा
(सं.)

सिक्ख
गुरु नानक के पंथ का अनुयायी, सिख।
संज्ञा
(सं. शिष्य)

सिक्ख
सीख, उपदेश।
संज्ञा
(सं. शिक्षा)

सिक्ख
चोटी, शिखा।
संज्ञा
(सं. शिखा)

सिक्त
सींचा हुआ।
वि.
(सं.)

सिक्त
भीगा हुआ।
वि.
(सं.)

सिखंड
मोर, मयूर।
संज्ञा
(सं. सिखंडी)

सिखंड
मोर का पंख।
संज्ञा
(सं. सिखंडी)
उ.- (क) कुटिल भ्रू पर तिलक-रेखा सीस सिखिनि सिखंड-१−३०७। (ख) सिखी सिखंड सीस, मुख मुरली-४७६।

सिखंड
हरिचंदन।
संज्ञा
(सं. श्रीखंड)

सिखंड
शिखरन।
संज्ञा
(सं. श्रीखंड)

सिखंडी
मोर, मयूर।
संज्ञा
(हिं. शिखंडी)

सिखई
सिखायी हुई बात।
संज्ञा
उ.- श्रीमुख की सिखई ग्रंथो कत, तें सब भईं कहानी-३४६९।

सिखई
सिखयी हुई।
वि.
उ.- सिखाई कहत स्याम की बतियाँ, तुमकौं नाहिंन दोषु-३०२६

सिखना
कोई बात जानना।
क्रि.स.
(हिं. सीखना)

सिखना
किसी काम को समझना।
क्रि.स.
(हिं. सीखना)

सिखये
सिखा-पढ़ा दिये (जाने पर)।
क्रि.स.
(हिं. सिखाना)
उ.-एक बेर श्रीपति के सिखये, उन आयो सब गुन गान-२३४०।

सिखयो, सिखयौ
सिखाया-पढाया, समझाया।
क्रि.स.
(हिं. सिखाना)
उ.-जसुमति माइ कहा सुत सिखयौ-७७१।

सिखर
सिरा, चोटी।
संज्ञा
(सं. शिखर)

सिखर
पहाड़ की चोटी।
संज्ञा
(सं. शिखर)
उ.- चढ़ि गिरि-सिखर सब्द इक उचरयौ गगन उठयौ आधात-९−७४।

सिखर
कँगूरा, कलश।
संज्ञा
(सं. शिखर)

सिखर
गुंबद।
संज्ञा
(सं. शिखर)

सिखावतिं
बताती हैं, अभ्यास कराती हैं।
क्रि.स.
(हिं. सिखावना)
उ.- जसुमति-सुत कौं चलन सिखावतिं अँगुरी गहि-गहि दोउ जनियाँ-१०−१३२।

सिखावति
समझाती है।
क्रि.स.
(हिं. सिखावना)
उ.- जसुमति कान्हहिं यहै सिखावति। सुनहु स्याम अब बड़े भए तुम, कहि अस्तन-पान छुड़ावति-१०−२२२।

सिखावन
सीख।
संज्ञा
(हिं. सिखाना+वन)

सिखावना, सिखावनो
सिखाना।
क्रि.स.
(हिं. सिखाना)

सिखावहु
बताओ, समझाओ।
क्रि.स.
(हिं. सिखावना)
उ.- मैं दुहिहौं मोहिं दुहन सिखावहु-४०१।

सिखावैं
बतायेंगे, सिखायेंगे।
क्रि.स.
(हिं. सिखावना)
उ.- काल्हि तुम्हैं गो-दुहन सिखावैं, दुहीं सकल अब गाइ-४००।

सिखावै
समझाता-बुझाता है।
क्रि.स.
(हिं. सिखाना)

सिखावै
सीख देता है।
क्रि.स.
(हिं. सिखाना)
उ.- छिन न रहै नँदलाल इहाँ बिनु जो कोउ कोटि सिखावै-३४१०।

सिखावै
समझा-बुझा सकता है।
क्रि.स.
(हिं. सिखाना)
उ.- मूरख कौं कोउ कहा सिखावै-३९१।

सिखि
मोर (पक्षी), मयूर।
संज्ञा
(सं. सिखिन्)
उ.- चंद्र-चूड़ सिखि-चंद सरोरुह जमुना-प्रिय गंगा-धारी-१०−१७१।

सिखवन
सीख, उपदेश।
संज्ञा
(हिं. सिखावन)
उ.- अंतहु सिखवन सुनहु हमारी कहियत बात बिचारी-३३१३।

सिखवन
सिखाने की क्रिया, भाव या उद्देश्य (से)।
संज्ञा
(हिं. सिखावन)
उ.- (क) आईं सिखवन भवन पराएँ स्यानि ग्वालि बौरैया-३७१। (ख) जाहि ज्ञान सिखवन तुम आए-३३१३।

सिखवहु
सिखाओ, बातओ।
क्रि.स.
(हिं. सिखाना)
उ.-धेनु दुहत हरि देखत ग्वालनि। आपुन बैठि गए तिनकैं सँग, सिखवहु मोहिं कहत गोपालनि-४००।

सिखा
चोटी, शिखा।
संज्ञा
(सं. शिखा)

सिखाना, सिखानो
शिक्षा या उपदेश देना।
क्रि.स.
(सं. शिक्षण)

सिखाना, सिखानो
पढ़ाना, समझाना।
क्रि.स.
(सं. शिक्षण)
मुहा. सिखाना-पढ़ाना- (१) चालाकी सिखाना, चालबाजी बताना। (२) खूब कान भरना।

सिखाना, सिखानो
धमकाना, दंड या ताड़ना देना।
क्रि.स.
(सं. शिक्षण)

सिखापन
सीख, उपदेश।
संज्ञा
(हिं. सिखाना+पन)

सिखायो, सिखायौ
बताया-समझाया है।
क्रि.स.
(हिं. सिखाना)
उ.- बाबा मोकौं दुहन सिखायौ-६६७।

सिखावत
बताते-समझाते हैं।
क्रि.स.
(हिं. सिखावना)
उ.- (क) ये बशिष्ठ कुल-इष्ट हमारे, पालागन कहि सखनि सिखावत-९−१६७। (ख) निज प्रतिबिंब सिखावत ज्यौं सिसु-१०−२६७। (ग) कोउ हेरी देत परस्पर स्याम सिखावत-४३१। (घ) बेनु पानि गहि मोकों सिखावत मोहन गावन गौरी-२८७३।

सिखर
छींका।
संज्ञा
(हिं. सिकहर)

सिखरन, सिखरनि
दही मिला हुआ चीनी का गाढ़ा शरबत।
संज्ञा
(हिं. शिखरन)
उ.- बासौंधी सिखरनि अति सोंधी-२३२१।

सिखराना, सिखरानो
किसी बात की जानकारी कराना।
क्रि.स.
(हिं. सिखलाना)

सिखराना, सिखरानो
समझाना, बताना।
क्रि.स.
(हिं. सिखलाना)

सिखरावै
समझाता या बताता है।
क्रि.स.
(हिं. सिखलाना)
उ.- आपुन सिखै औरनि सिखरावै-१०७०।

सिखलाना, सिखलानो
किसी बात की जानकारी कराना।
क्रि.स.
(हिं. सिखाना)

सिखलाना, सिखलानो
बताना, समझाना।
क्रि.स.
(हिं. सिखाना)

सिखवत
बताता या समझाता है।
क्रि.स.
(हिं. सिखाना)
उ.- फिरि-फिरि बात सोइ सिखवत, हम दुख पावत जातैं-२०२४। (ख) निरगुन ज्योति कहाँ उन पाई, सिखवत बारंबार-३२१५।

सिखवति
सिखाती है, अभ्यास कराती है।
क्रि.स.
(हिं. सिखाना)
उ.- सिखवति चलनि जसोदा मैया-१०−११५।

सिखवति
सिखाते-सिखाते, समझाते-समझाते।
क्रि.वि.
उ.- सरस्याम को सिखवतिं हारी, मारेहु लाज न आवति-८६५।

सिखिर
पर्वत की चोटी।
संज्ञा
(सं. शिखर)

सिखी
मोर, मयूर।
संज्ञा
(हिं. शिखी)
उ.- सिखी सिखंड सीस-४७६।

सिखै
सीखकर, समझकर।
क्रि.स.
(हिं. सीखना)
उ.- आपुन सिखै औरनि सिखरावै-१०७०।

सिखै
सीखे, समझे।
क्रि.स.
(हिं. सीखना)
उ.- यह अक्रूर दसा जो सुमिरै, सीखै, सुनै अरु गावै-३४९४।

सिखै
सिखाकर, समझा-बुझाकर।
क्रि.स.
(हिं. सिखाना)
उ.-हरि कौ सिखै, सिखावत हमको अब ऊधो पग धारे-३०५५।

सिखै
सिखा-पढ़ाकर, समझा-बुझाकर।
क्रि.वि.
उ.- इक हम जरैं सिझावन आए, मानो सिखै पठाए-३२१०।

सिगरा
सब, सारा।
वि.
(सं. समग्र)

सिगरी
सब, सारी (परिमाणवाचक)।
वि.
(हिं. सिगरा)
उ.- (क) सिगरी रैनि नींद भरि सोवत जैसैं पसू अचेत-१−१२५। (ख) जाके बदन-सरोज निरखत आस सिगरी भरी-१०−३०२। (ग) सूर तहाँ नग अंग परसि रस लूटति निधि-सिगरी।

सिगरी
सब (संख्यावाचक)।
वि.
(हिं. सिगरा)
उ.- उरहन कौं ठाढ़ी रहैं सिगरी-३९१।

सिगरे
सब (संख्यावाचक)।
वि.
(हिं. सिगरो)
उ.- सिगरे ग्वाल घिरावत मोसौं मेरे पाँइ गिराइँ-५१०।

सिगरो, सिगरौ
सारा (परिमाण-वाचक)।
वि.
(हिं. सिगरा)
उ.- नीके राखि लियो ब्रज सिगरो-९९७।

सिगरोइ, सिगरौइ
सारा ही, सारा का सारा।
वि.
(हिं. सिगरा+ही)
उ.- सिगरोइ दूध पियौ मेरे मोहन, बलहिं न दैहौं बाँटी-१०−२५९।

सिगारहार
हरसिंगार (फूल)।
संज्ञा
(हिं. हरसिंगार)

सिचान
बाज (पक्षी)।
संज्ञा
(सं. संचान)

सिच्छा
शिक्षा।
संज्ञा
(सं. शिक्षा)

सिच्छा
सीख।
संज्ञा
(सं. शिक्षा)
उ.- हरि तिनसौ कहयौ आइ, भली सिच्छा तुम दीनीं-३−११।

सिजदा
माथा टेकना।
संज्ञा
(अ. सिजदा)

सिजल
सुंदर, रूपवान।
वि.
(हिं. सजीला)

सिझना, सिझनो
आँच या आग पर पकना।
क्रि.अ.
(हिं. सीझना)

सिझाना, सिझानो
आँच पर पकाकर गलाना।
क्रि.स.
(सं. सिद्ध, प्रा. सिज्झ+हिं. आना)

सिझाना, सिझानो
कष्ट देना, पीड़ित करना।
क्रि.स.
(सं. सिद्ध, प्रा. सिज्झ+हिं. आना)

सिझाना, सिझानो
मिलने योग्य या प्राप्य करना।
क्रि.स.
(सं. सिद्ध, प्रा. सिज्झ+हिं. आना)

सिझाना, सिझानो
बहला-फुसलाकर (धन) वसूल करना।
क्रि.स.
(सं. सिद्ध, प्रा. सिज्झ+हिं. आना)

सिझाना, सिझानो
शरीर को तपाना, तपस्या करना।
क्रि.स.
(सं. सिद्ध, प्रा. सिज्झ+हिं. आना)

सिटकिनी
चटकिनी।
संज्ञा
(अनु.)

सिटपिटाना, सिटपिटानो
मंद पड़ना, दबना।
क्रि.अ.
(अनु.)

सिटपिटाना, सिटपिटानो
भयभीत या संकुचित होकर स्तब्ध रह जाना।
क्रि.अ.
(अनु.)

सिटपिटाना, सिटपिटानो
दुबिधा या असमंजस में पड़ जाना।
क्रि.अ.
(अनु.)

सिट्टी
बढ़-बढ़कर बोलना, डींग हाँकना।
संज्ञा
(हिं. सीटना)

सिट्टी
सिट्टी-पिट्टी- होश-हवास।
यौ.
मुहा. सिट्टी (पिट्टी) गुम होना या भूलना-बहुत घबरा जाना, होश-हवास ठीक न रहना।

सिट्ठी
नीरस भाग।
संज्ञा
(हिं. सीठी)

सिट्ठी
सारहीन पदार्थ।
संज्ञा
(हिं. सीठी)

सिट्ठी
बची-खुची चीज।
संज्ञा
(हिं. सीठी)

सिठनी
विवाह के अवसर पर गायी जानेवाली गालियाँ।
संज्ञा
(सं. अशिष्ट)

सिठाई
फीकापन, नीरसता।
संज्ञा
(हिं. सीठी)

सिड़
पागलपन।
संज्ञा
(हिं. सिड़ी)

सिड़
धुन, सक, सनक।
संज्ञा
(हिं. सिड़ी)
मुहा. सिड़ सवार होना-धून, झक या सनक चढ़ना।

सिड़वारा
पागल।
वि.
(हिं. सिड़+वाला)

सिड़वारा
सनकी, झक्की।
वि.
(हिं. सिड़+वाला)

सिड़वारा
मनमौजी।
वि.
(हिं. सिड़+वाला)

सिड़ी
पागल बावला।
वि.
(सं. श्रृणीक)

सिड़ी
सनकी, झक्की।
वि.
(सं. श्रृणीक)

सिड़ी
मनमानी करनेवाला।
वि.
(सं. श्रृणीक)

सित
सफेद, उजला।
वि.
(सं.)
उ.- (क) असित अरुन सित आलस लोचन उभय पलक परि आवै-१०−६५। (ख) अरुन असित सित बपु उनहार।

सित
चमकीला, उज्ज्वल।
वि.
(सं.)
उ.- अगिनि-पुंज सितबान धनुष धरि तोहिं असुर-कुल सहित जरावन-९−१३१।

सित
स्वच्छ, निर्मल।
वि.
(सं.)

सित
शुक्र ग्रह।
संज्ञा

सित
शुक्ल पक्ष।
संज्ञा

सित
शुक्राचार्य।
संज्ञा

सित
चीनी, शकर।
संज्ञा

शोधु
खोज, पता।
संज्ञा
(सं. शोध)
उ.- राख्यो रूप चराइ निरंतर सो हरि शोधु लह्यो-३१४०।

शोधैया
शोधनेवाला।
वि.
(हिं. शोधना + ऎया)

शोभ
सुंदर, शोभायुक्त।
वि.
(सं.)

शोभ
शोभा।
संज्ञा
(सं. शोभा)

शोभन
सुंदर, शोभायुक्त।
वि.
(सं.)

शोभन
सुहावना।
वि.
(सं.)

शोभन
उत्तम, श्रेष्ठ।
वि.
(सं.)

शोभन
शुभ।
वि.
(सं.)

शोभन
कमल।
संज्ञा

शोभन
आभूषण।
संज्ञा

सित
चाँदी, रजत।
संज्ञा

सितकंठ
जिसका कंठ सफेद हो।
वि.
(सं.)

सितकंठ
महादेव, शिव।
संज्ञा
(सं. शितिकण्ठ)

सितकर
चंद्रमा।
संज्ञा
(सं.)

सितकुंजर
ऐरावत हाथी।
संज्ञा
(सं.)

सितच्छद
हंस, मराल।
संज्ञा
(सं.)

सितता
सफेदी।
संज्ञा
(सं.)

सितता
चमकीलापन, उज्ज्वलता।
संज्ञा
(सं.)

सितता
निर्मलता, स्वच्छता।
संज्ञा
(सं.)

सितपक्ष, सितपच्छ
हंस, मराल।
संज्ञा
(सं. सितपक्ष)

सिता
मोतिया, मल्लिका।
संज्ञा
(सं.)

सिता
चाँदनी, चंद्रिका।
संज्ञा
(सं.)

सिता
शराब, मदिरा।
संज्ञा
(सं.)

सिता
चाँदी, रजत।
संज्ञा
(सं.)

सिताब
शीघ्र।
क्रि.वि.
(फ़ा. शिताब)

सिताब
सहज में।
क्रि.वि.
(फ़ा. शिताब)

सितार
एक प्रसिद्ध बाजा जिसके तार उँगली से बजाये जाते हैं।
संज्ञा
(सं. सप्त+तार)

सितारा
तारा, नक्षत्र।
संज्ञा
(फ़ा. सितार)

सितारा
भाग्य, प्रारब्ध।
संज्ञा
(फ़ा. सितार)
मुहा.- सितारा चमकना या बुलंद होना-भाग्योदय होना। सितारा मिलना - परस्पर प्रेम होना।

सितारा
चाँदी-सोने का पत्तरों की छोटी-छोटी गोल बिंदियाँ, चमकी।
संज्ञा
(फ़ा. सितार)

सितपक्ष, सितपच्छ
शुक्लपक्ष।
संज्ञा
(सं. सितपक्ष)
उ.- सो सितपूच्छ सम बीतत कबहुँ न देत दिखाई-३४८६।

सितपुष्पा
चमेली-विशेष, मल्लिका।
संज्ञा
(सं.)

सितभानु
चंद्रमा।
संज्ञा
(सं.)

सितम
अनर्थ।
संज्ञा
(फ़ा.)

सितम
अत्याचार।
संज्ञा
(फ़ा.)

सितमगर
दुखदायी, अत्याचारी।
संज्ञा
(फ़ा.)

सितल
ठंढ़ा।
वि.
(सं. शीतल)

सितल
शांत।
वि.
(सं. शीतल)

सितलता
ठंढक।
संज्ञा
(सं. शीतलता)

सितलता
शांति, उद्वेगहीनता।
संज्ञा
(सं. शीतलता)

सितलाई
शीतलता।
संज्ञा
(सं. शीतल+आई)

सितवराह
श्वेतवाराह जिसने पृथ्वी का उद्धार किया था।
संज्ञा
(सं.)

सितवराहपत्नी
पृथ्वी।
संज्ञा
(सं.)

सितसागर
क्षीरसागर।
संज्ञा
(सं.)

सितांबर
श्वेत वस्त्र धारण करनेवाले।
वि.
(सं.)

सितांबर
जैनों का श्वेतांबर संप्रदाय।
संज्ञा

सितांशु
चंद्रमा।
संज्ञा
(सं.)

सितांशु
कपूर।
संज्ञा
(सं.)

सिता
चीनी, शक्कर।
संज्ञा
(सं.)

सिता
शुक्लपक्ष।
संज्ञा
(सं.)

सिथिल
जो अच्छी तरह बँधा, कसा और जकड़ा न हो, ढीला।
वि.
(सं. शिथिल)
उ.- (क) सुभ स्रवननि तरल तरौन, बेनी सिथिल गुही-१०−२४। (ख) सिथिल धनुष रति-पति गहि डारयौ−१०−२३३।

सिथिल
धीमा, जो कड़ा न हो, कोमल।
वि.
(सं. शिथिल)
उ.- सहज सिथिल पल्लव तैं हरि जू लीन्हे छोरि सवारि पृ. ३४८ (५)।

सिथिल
अलसाया हुआ, आलस्ययुक्त।
वि.
(सं. शिथिल)
उ.- सिथिल रूप मन में लस वाको-२६०६।

सिथिलाइ, सिथिलाई
शिथिलता।
संज्ञा
(सं. शिथिल)

सिद
सुनार।
संज्ञा
(सं. सिद्ध)

सिद
पारखी।
संज्ञा
(सं. सिद्ध)

सिदिक
सच्चा, खरा।
वि.
(अ. सिद्क)

सिदौसी
जल्दी, शीघ्र।
क्रि.वि.
(देश.)

सिद्ध
जिसका साधन हो चुका हो , संपन्न संपादित।
वि.
(सं.)

सिद्ध
प्राप्त, सफल, उपलब्ध।
वि.
(सं.)

सितारा
सितार बाजा।
संज्ञा
(हिं. सितार)

सितारिया
सितार बजानेवाला।
वि.
(हिं. सितार)

सितारेहिंद
एक उपाधि जो 'स्टार आव इंडिया' का अनुवाद है।
संज्ञा
(फ़ा.)

सितासित
सफेद और काला।
वि.
(सं.)

सिति
सफेद।
वि.
(सं. शिति)

सिति
श्याम।
वि.
(सं. शिति)

सिताकंठ
महादेव, शिव।
संज्ञा
(सं. शितिकंठ)

सितिमा
सफेदी, श्वेतता।
संज्ञा
(सं.)

सितोत्पल
सफेद कमल।
संज्ञा
(सं.)

सितोदर
श्वेत उदरवाला, कुबेर।
संज्ञा
(सं.)

सिद्ध
प्रयत्न में सफल, कृतकार्य।
वि.
(सं.)

सिद्ध
जिसका तप, योग या आध्यात्मिक साधना पूरी हो चुकी हो।
वि.
(सं.)

सिद्ध
जो योग की विभूतियाँ प्राप्त कर चुका हो।
वि.
(सं.)

सिद्ध
जिसे अलौकिक सिद्धि हुई हो।
वि.
(सं.)

सिद्ध
लक्ष्य पर पहुँचा हुआ।
वि.
(सं.)

सिद्ध
जिस (कथन) के अनुसार ही कोई बात घटी हो।
वि.
(सं.)

सिद्ध
जो तर्क या प्रमाण से ठीक या निश्चित हो, प्रमाणित।
वि.
(सं.)

सिद्ध
जो नियमानुसार ठीक हो।
वि.
(सं.)

सिद्ध
जिसका फैसला या निबटारा हो चुका हो।
वि.
(सं.)

सिद्ध
पकाकर तैयार किया हुआ।
वि.
(सं.)
उ.- देखौ आइ जसोदा सुत-कृत, सिद्ध पाक इहिं आइ जुठायो-१०−२४८।

सिद्धांत
वह बात या मत जो विद्या, कला आदि के संबंध में विद्वानों द्वारा स्थापित किया जाय।
संज्ञा
(सं.)

सिद्धांत
ऋषि-मुनियों के मान्य उपदेश।
संज्ञा
(सं.)

सिद्धांत
तत्व की बात।
संज्ञा
(सं.)
उ.- सकल निगम सिद्धांत जन्मकर स्याम उन सहज सुनायौ-३४९०।

सिद्धांत
पूर्ण या विरोधी पक्ष के खंडन के पश्चात् स्थिर किया गया मत।
संज्ञा
(सं.)

सिद्धांत
शास्त्र-विशेष संबंधी ग्रंथ।
संज्ञा
(सं.)

सिद्धांतित
तर्क से प्रमाणित।
वि.
(सं.)

सिद्धांती
तार्किक।
वि.
(सं. सिद्धांत)

सिद्धांती
शास्त्रीय तत्वों का ज्ञाता।
वि.
(सं. सिद्धांत)

सिद्धांती
अपने सिद्धांत पर दृढ़ रहनेवाला।
वि.
(सं. सिद्धांत)

सिद्धा
सिद्ध' की पत्नी।
संज्ञा
(सं.)

सिद्धता
प्रामाणिकता।
संज्ञा
(सं.)

सिद्धता
पूर्णता।
संज्ञा
(सं.)

सिद्धपीठ
स्थान जहाँ योग या तांत्रिक साधन में शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त हो।
संज्ञा
(सं.)

सिद्धर
एक ब्राह्मण जो कंस की आज्ञा से श्रीकृष्ण को मारने गया था और श्रीकृष्ण ने जिसकी जीभ मरोड़ दी थी।
संज्ञा
(सं. सिद्धि+धर)
उ.- सिद्ध (थीधर) बाँभन करम कसाई। कह्यौ कंस सौं बचन सुनाई-१०−५७।

सिद्धविनायक
गणेश की एक मूर्ति।
संज्ञा
(सं.)

सिद्धहस्त
जिसका हाथ किसी काम में खूब सधा हुआ या साफ हो।
वि.
(सं.)

सिद्धहस्त
कुशल, निपुण।
वि.
(सं.)

सिद्धांजन
वह (कल्पित) अंजन जिसे आँखों में लगा लेने से जमीन के भीतर गड़ी चीजें भी दिखायी देने लगती हैं।
संज्ञा
(सं.)

सिद्धांत
सोच विचार कर निश्चित किया हुआ मत, उसूल, नियम।
संज्ञा
(सं.)

सिद्धांत
मुख्य उद्देश्य, अभिप्राय या लक्ष्य।
संज्ञा
(सं.)

सिद्ध
प्रसिद्ध।
वि.
(सं.)

सिद्ध
तैयार, प्रस्तुत।
वि.
(सं.)

सिद्ध
वह जिसने योग या तप में अलौकिक शक्ति या सिद्धि प्राप्त की हो।
संज्ञा

सिद्ध
वह जो पूर्ण योगी या ज्ञानी हो।
संज्ञा

सिद्ध
बहुत पहुँचा हुआ संत या महात्मा।
संज्ञा

सिद्ध
एक देवयोनि।
संज्ञा

सिद्धकाम
जिसकी कामना पूरी हो गयी हो।
वि.
(सं.)

सिद्धकाम
सफल, कृतकार्य।
वि.
(सं.)

सिद्धगुटिका
वह (कल्पित) मंत्र सिद्ध गोली जिसे मुँह में रखने से व्यक्ति अदृश्य हो जाता है।
संज्ञा
(सं.)

सिद्धता
सिद्ध होने की स्थिति या अवस्था।
संज्ञा
(सं.)

शोधन
जाँच, छानबीन, परीक्षा।
संज्ञा
(सं.)

शोधन
खोजना, ढूँढ़ना।
संज्ञा
(सं.)

शोधन
प्रायश्चित।
संज्ञा
(सं.)

शोधन
दंड।
संज्ञा
(सं.)

शोधना
शुद्ध या स्वच्छ करना।
क्रि.स.
(सं. शोधन)

शोधना
सुधारना, संस्कार करना।
क्रि.स.
(सं. शोधन)

शोधना
धातु का संस्कार करना।
क्रि.स.
(सं. शोधन)

शोधना
ढूँढ़ना, खोजना।
क्रि.स.
(सं. शोधन)

शोधवाना
शोधने को प्रवृत्त करना।
क्रि.स.
(हिं. शोधना)

शोधि
खोजकर, ढूँढ़कर।
क्रि.स.
(हिं. शोधना)
उ.- (क) ग्रहबल, लग्न, नक्षत्र, शोधि कीनी बेद धुनी। (ख) सब शोधि रहे, न शोध पायो-१० उ. २४।

सिद्धेश्वर
शिव।
संज्ञा
(सं.)

सिध
पकाकर तैयार किया हआ।
वि.
(सं. सिद्ध)
उ.- सिध जेवन सिरात, बैठे नंद, ल्यावहु बोलि कान्ह तत्कालहिं-१०−२३६।

सिध
योगी, ज्ञानी।
संज्ञा
उ.- मेरे साँवरे जब मुरली अधर धरी, सुनि सिध-समाधि टरी-६२३।

सिधवाना, सिधवानो
सीधा कराना।
क्रि.स.
(हिं. सीधा)

सिधाई
सीधापन, सरलता।
संज्ञा
(हिं. सिधा)

सिधाई
गयी, गमन किया।
क्रि.अ.
(हिं. सिधाना)
उ.- (क) नंद-घरनि कछु काज सिधाई-१०−५०। (ख) सतभामा करि सोक पिता को जदुपति पास सिधाई-१० उ.−२७।

सिधाए
गये, प्रस्थान किया।
क्रि.अ.
(हिं. सिधाना)
उ.- सूरदास हरि के गुन गावत हरषवंत निज पुरी सिधाए-३८६।

सिधाना, सिधानो
जाना, गमन या प्रस्थान करना।
क्रि.अ.
(हिं. सीधा+जाना)

सिधाये
गए, प्रस्थान किया।
क्रि.अ.
(हिं. सिधाना)
उ.- स्याम आनंद सहित पुर सिधाए -१० उ.−२१।

सिधायो, सिधायौ
गया, गमन किया।
क्रि.अ.
(हिं. सिधाना)
उ.- (क) सूर के प्रभु की सरन आयौ जो नर करि जगत-भोग बैकुंठ सिधायौ-४−१०। (ख) यह सुनि ह्वाँ तैं भरत सिधायौ-५−३।

सिद्धा
बिना पका हआ अन्न, सीधा जिसमें कच्चा अनाज रहता है।
संज्ञा
(सं. असिद्ध)

सिद्धाई
सिद्धपन।
संज्ञा
(सं. सिद्ध+हिं. आई)

सिद्धार्थ
जिसकी कामना पूर्ण हो गयी ही।
वि.
(सं.)

सिद्धार्थ
गौतम बुद्ध।
वि.
(सं.)

सिद्धार्थ
राजा दशरथ का एक मंत्री।
संज्ञा
(सं.)

सिद्धासन
योग-साधना का एक आसन।
संज्ञा
(सं.)

सिद्धि
सिद्ध पीठ।
संज्ञा
(सं.)

सिद्धि
काम का पूरा होना, पूर्णता।
संज्ञा
(सं.)
उ.- राजा कहयौ सप्त दिन माहिं सिद्धि होति कछु दीसति नाहिं -१−१४१।

सिद्धि
सफलता, कृतकार्यता।
संज्ञा
(सं.)

सिद्धि
प्रमाणित होना।
संज्ञा
(सं.)

सिद्धि
निर्णय, निश्चय।
संज्ञा
(सं.)

सिद्धि
पकना, सीझना।
संज्ञा
(सं.)

सिद्धि
योग, तप आदि से प्राप्त अलौकिक शक्ति या संपन्नता।
संज्ञा
(सं.)

सिद्धि
योग-साधन के अलौकिक फल जो आठ सिद्धियों के रूप में माने गये हैं- अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व।
संज्ञा
(सं.)
उ.- अष्टसिद्धि नवनिधि सुर-संपति-१०−२०४।

सिद्धि
मुक्ति, मोक्ष।
संज्ञा
(सं.)

सिद्धि
दक्षता, निपुणता।
संज्ञा
(सं.)

सिद्धि
भाँग, विजया।
संज्ञा
(सं.)

सिद्धिदाता
गणेश।
संज्ञा
(सं. सिद्धिदातृ)

सिद्धिभूमि
सिद्धपीठ।
संज्ञा
(सं.)

सिद्धेश्वर
महायोगी।
संज्ञा
(सं.)

सिधारना, सिधारनो
जाना, गमन या प्रस्थान करना।
क्रि.अ.
(हिं. सिधाना)

सिधारना, सिधारनो
मरना, स्वर्गवास होना।
क्रि.स.
(हिं. सिधाना)

सिधारना, सिधारनो
ठीक करना, सुधारना।
क्रि.स.
(हिं. सुधारना)

सिधारे
गये, प्रस्थान किया।
क्रि.अ.
(हिं. सिधारना)
उ.- (क) सूरज-प्रभु नँद-भवन सिधारे-१०−१०। (ख) सदा रहत वर्षा रितु हम पर जब तें स्याम सिधारे-२७६३।

सिधारो, सिधारौ
जाओ, प्रस्थान करो।
क्रि.अ.
(हिं. सिधारना)
उ.- तुम लछिमन निज पुरहिं सिधारौ-९−३६। (ख) सुनु सिख कंत दंत तृन धरिकै, स्यौं परिवार सिधारौ-९−११५। (ग) श्रीकंत सिधारौ मधुसूदन पै, सुनियत हैं, वै मीत तुम्हारे-१० उ.−६०।

सिधारयो, सिधारयौ
चला गया, मर गया।
क्रि.अ.
(हिं. सिधारना)
उ.−काल-अवधि पूरन भई जा दिन तनहूँ त्यागि सिधारयौ−१−३३६।

सिधावै
(मरकर) जाता है।
क्रि.अ.
(हिं. सिधाना)
उ.- निष्कामी बैकुंठ सिधावै-३−१३।

सिधि
योग-साधना के अलौकिक फलस्वरूप प्राप्त आठ शक्तियाँ या सिद्धियाँ।
संज्ञा
(सं. सिद्धि)
उ.- (क) अष्ट महासिधि द्वारैं ठाढ़ी-१−४०। (ख) सूर स्याम सहाइ हैं तो आठहूँ सिधि लेहि-१−३१४। (ग) तेरौ दुःख दूरि करिबे कौं रिधि-सिधि फिरि-फिरि जाहीं-१−३२३।

सिन
शरीर।
संज्ञा
(सं.)

सिन
वस्त्र।
संज्ञा
(सं.)

सिपरा
मालवा की एक नदी जिसके किनारे उज्जैन बसा है।
संज्ञा
(सं. सिप्रा)

सिपहसालार
सेनानायक।
संज्ञा
(फ़ा.)

सिपाई
सैनिक, योद्धा।
संज्ञा
(फ़ा. सिपाही)

सिपारस
सिफारिश।
संज्ञा
(हिं. सिफारिश)

सिपारसी
सिफारशी।
वि.
(हिं. सिफारशी)

सिपारा
कुरान' के तीस भागों में कोई एक।
संज्ञा
(फ़ा.)

सिपाह
फौज, सेना, कटक।
संज्ञा
(फ़ा.)

सिपाहियाना
सिपाही-जैसा।
वि.
(फ़ा.)

सिपाही
योद्धा, सैनिक।
संज्ञा
(फ़ा.)

सिपाही
पुलिस विभाग का कर्मचारी।
संज्ञा
(फ़ा.)

सिन
उम्र, अवस्था।
संज्ञा
(अ.)

सिन
से।
अव्य.
(पुं. हिं. सन)
उ.- तौ का कहिए सूर सेयाम सिन−३३९४।

सिनि, सिनी
एक यादव जो सात्यकि का पिता था।
संज्ञा
(सं. शिनि)

सिनि, सिनी
क्षत्रियों की एक प्राचीन शाखा।
संज्ञा
(सं. शिनि)

सिनीवाली
एक वैदिक देवी।
संज्ञा
(सं.)

सिनीवाली
शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा।
संज्ञा
(सं.)

सिनीवाली
एक प्राचीन नदी।
संज्ञा
(सं.)

सिन्नी
पीर या देवता को चढ़ाकर प्रसाद-रूप में बाँटी जानेवाली मिठाई।
संज्ञा
(फ़ा. शीरीनी)

सिपर
(वार रोकने की) ढाल।
संज्ञा
(फ़ा.)

सिपरा
स्त्रियों का कटिबंध।
संज्ञा
(सं. सिप्रा)

सिपाही
पहरेदार।
संज्ञा
(फ़ा.)

सिपाही
चपरासी।
संज्ञा
(फ़ा.)

सिप्पर
ढाल।
संज्ञा
(फ़ा. सिपर)

सिप्पा
निशाने या लक्ष्य पर किया गया वार।
संज्ञा
(देश.)

सिप्पा
कार्य-साधन का डौल या उपाय।
संज्ञा
(देश.)
मुहा. सिप्पा जमना (भिड़ना, लड़ना) - (१) कार्य-साधन की युक्ति होना। (२) डौल या उपाय की सफल होना। सिप्पा जमाना (भिड़ाना, लड़ाना) - कार्य-साधन का उपाय करना।

सिप्पा
डौल प्रारम्भिक उपाय, सूत्रपात, भूमिका।
संज्ञा
(देश.)
मुहा. सिप्पा जमना (भिड़ना, लड़ना) कार्य-साधन की भूमिका तैयार होना सिप्पा जमाना- (भिड़ाना, लड़ाना) - कार्य-साधन की भूमिका तैयार करना।

सिप्पा
रंग, धाक, प्रभाव।
संज्ञा
(देश.)

सिप्पा
एक तरह की तोप।
संज्ञा
(देश.)

सिप्पी
सीप' नामक जंतु का आवरण या संपुट।
संज्ञा
(हिं. सीपी)

सिप्रा
स्त्रियों का कटिबंध।
संज्ञा
(सं.)

सिप्रा
मालवा की एक नदी जिसके किनारे उज्जैन बसा है।
संज्ञा
(सं.)

सिफत
गुण, विशेषता।
संज्ञा
(अ. सिफ़त)

सिफत
लक्षण।
संज्ञा
(अ. सिफ़त)

सिफत
स्वभाव।
संज्ञा
(अ. सिफ़त)

सिफत
सूरत, शुक्ल।
संज्ञा
(अ. सिफ़त)

सिफर
शून्य।
संज्ञा
(अ. सिफ़र)

सिफारिश
किसी के पक्ष में कुछ अनुकूल अनुरोध, अनुशंसा।
संज्ञा
(अ. सिफ़ारिश)

सिफारिशी
जिसमें सिफारिश की गयी हो।
वि.
(फ़ा. सिफ़ारशी)

सिफारिशी
जिसकी सिफारिश की गयी हो।
वि.
(फ़ा.) सिफ़ारशी)

सिफारिशी
सिफारशी टट्टू- जो (योग्यता से नहीं) केवल सिफारिश के बल पर उन्नति करता हो।
यौ

सिबिका
डोली, पालकी।
संज्ञा
(सं. शिविका)

सिमंत
स्त्री (के सिर) की माँग।
संज्ञा
(सं. सीमंत)

सिमट
सिमटने-सिकुड़ने की क्रिया, भाव या स्थिति।
संज्ञा
(हिं. सिमटना)

सिमटना, सिमटनो
सुकड़ना, संकुचित होना।
क्रि.अ.
(सं. समित+ना)

सिमटना, सिमटनो
शिकन या सिलकट पड़ना।
क्रि.अ.
(सं. समित+ना)

सिमटना, सिमटनो
बटुरना, इकट्ठा होना।
क्रि.अ.
(सं. समित+ना)

सिमटना, सिमटनो
(कार्य) पूरा होना, निपटना।
क्रि.अ.
(सं. समित+ना)

सिमटना, सिमटनो
लज्जित या संकुचित होना।
क्रि.अ.
(सं. समित+ना)

सिमटना, सिमटनो
सिटपिटा जाना।
क्रि.अ.
(सं. समित+ना)

सिमरना, सिमरनो
स्मरण करना।
क्रि.स.
(हिं. सुमिरना)

सिमरिख
एक चिड़िया।
संज्ञा
(देश.)

सिमरिख
ईंगुर।
संज्ञा
(शिंग़रफ़)

सिमरिख
ईंगुर के रंग का।
वि.

सिमाना
हद, सीमा, सिवाना।
संज्ञा
(सं. सीमांत)

सिमाना
सिलाना।
क्रि.स.
(हिं. सिलाना)

सिमाट
एकत्र होकर।
क्रि.अ.
(हिं. सिमटना)
उ.- परिवा सिमिट सकल ब्रजवासी चले जमुन-जल न्हान-२४४६।

सिमाटना, सिमिटनो
सिमटना।
क्रि.अ.
(हिं. सिमटना)

सिमाटि
बटुर कर, एकत्र होकर।
क्रि.अ.
(हिं. सिमिटना)
उ.- (क) इतनी सुनत सिमिटि सब आए प्रेम-सहित धारे अँसपात-९−३८। (ख) मानौ जल-जीव सिमिटि जाल मैं समान्यौ-९−९६।

सिमाटैं
बटुरकर (एकत्र हों)।
क्रि.अ.
(हिं. सिमिटना)
उ.- यह सुनि जहाँ तहाँ तैं सिमिटैं आइ होइ इक ठौर-१−१४६।

सिमृति
याद, स्मृति।
संज्ञा
(सं. स्मृति)

शाला
पाठशाला।
संज्ञा
(सं.)
उ.-लरिका और पढ़त शाला में तिनहिं करत उपदेस-सारा. १११।

शालातुरीय
पाणिनि का एक नाम।
संज्ञा
(सं.)

शालि
धान जो हेमंत में होता है, जड़हन धान।
संज्ञा
(सं.)

शालि
यज्ञ-विशेष।
संज्ञा
(सं.)

शालि
पीड़ा पहुँचाकर, कष्ट देकर।
क्रि.स.
(हिं. सालना)

शालि
रही शालि-पीड़ा या कष्ट दे रही है।
प्र.
उ.-कत रही उर शालि-२८२६।

शालिवाहन
शक जाति का एक राजा जिसने शक संवत् चलाया था।
संज्ञा
(सं.)

शालिहोत्र
घोड़ा, अश्व।
संज्ञा
(सं.)

शालिहोत्र
घाव चिकित्सा-शास्त्र।
संज्ञा
(सं.)

शालिहोत्र
एक गोत्र प्रर्वतक ऋषि।
संज्ञा
(सं.)

शोभन
मंगल, कल्याण।
संज्ञा

शोभन
सौंदर्य।
संज्ञा

शोभन
सेंदुर।
संज्ञा

शोभना
सुंदरी नारी।
संज्ञा
(सं.)

शोभना
सोहना, शोभित होना।
क्रि.अ.
(सं.)

शोभनीय
सुंदर।
वि.
(सं.)

शोभा
चमक, कांति।
संज्ञा
(सं.)

शोभा
छवि, सुंदरता।
संज्ञा
(सं.)
उ.- कछुक विलाय वदन की शोभा अरूण कोटि गति पावै-२५४९।

शोभा
सजावट।
संज्ञा
(सं.)

शोभात
शोभित होता या सुंदर लगता है।
क्रि.अ.
(हिं. शोभना)
उ.- गत पतंग राका शशि विय सँग घटा सघन शोभात-२१८५।

सियरा
कच्चा, अपक्व।
वि.
(सं. शीतल, प्रा. सीअड़)

सियराई
ठढक, शीतलता।
संज्ञा
(हिं. सियरा+ई)
उ.- मुकुलित कसुम नयन निद्रा तजि रूप-सुधा सियराई-२८११।

सियराई
श्रीराम।
संज्ञा
(सं. सीता+राज, हिं. राय)

सियराई
ठंढी या शीतल हो गयी।
क्रि.अ.

सियराना, सियरानो
जुड़ाना, ठंढा या शीतल होना।
क्रि.अ.
(हिं. सियरा+ना)

सियरी
ठंढी, शीतल।
वि.
(हिं. सियरा)

सियरो
शीतल, सुखदाई।
वि.
(हिं. सियरा)
उ.- बिषयासक्त रहत निसिबासर सुख सियरौ, दुख तातौ-१−३०२।

सिया
जानकी, सीता।
संज्ञा
(सं. सीता)
उ.- बढ़ी परस्पर प्रीति रीति तब भूषन सिया दिखाए-९−७०।

सियाना, सियानो
चतुर।
वि.
(हिं. सयाना)

सियाना, सियानो
वयस्क।
वि.
(हिं. सयाना)

सिमेटना, सिमेटनो
सुकोड़ना, संकुचित करना।
क्रि.स.
(हिं. समेटना)

सिमेटना, सिमेटनो
इकट्ठा या एकत्र करना।
क्रि.स.
(हिं. समेटना)

सिमेटना, सिमेटनो
(काम) पूरा करना या निबटाना।
क्रि.स.
(हिं. समेटना)

सिय
जानकी, सीता।
संज्ञा
(सं. सीता)

सियना, सियनो
उत्पन्न करना।
क्रि.अ.
(सं. सृजन)

सियना, सियनो
(वस्त्रादि) सीना।
क्रि.अ.
(हिं,लीना)

सियपति
श्रीरामचंद्र।
क्रि.अ.
(सं. सीता+पति)
उ.- हा सीता, सीता, कहि सियपति उमड़ि नयन जल भरि-भरि ढारत-९−६२।

सियर
ठढा, शीतल।
वि.
(हिं. सियरा)

सियरना, सियरनो
शीतल होना।
क्रि.अ.
(हिं. सियरा)

सियरा
ठंढ़ा, शीतल।
वि.
(सं. शीतल, प्रा. सीअड़)

सियाही
कालिमा।
संज्ञा
(हिं. स्याही)

सिर
शरीर की सबसे ऊपरी भाग, खोपड़ी, कपाल।
संज्ञा
(सं.शिरस्)

सिर
शरीर में गर्दन के ऊपर का भाग।
संज्ञा
(सं.शिरस्)
उ.- (क) मीन इंद्री तनहिं काटत मोट अघ सिर भार-१−९९। (ख) दंभ-छत्र सिर तान्यौ-१−१४१।
मुहा.- सिर आँखों पर बैठाना या लेना- बहुत स्वागत सत्कार के साथ ग्रहण करना। सिर-आँखों पर होना-लहर्ष स्वीकार करना, शिरोधार्य होना। सिर उठाना- (१) दुख, कष्ट, रोग आदि से छुटकारा पाना। (२) विरोध या शत्रुता के लिए खड़ा होना। (३) उधम या उपद्रव करना। (४) घमंड करना। (५) लज्जित न होना। (६) ससम्मान खड़ा होना या जीवन व्यतीत करना। सिर उठाने की फुरसत न होना- कार्य की अधिकता के कारण बहुत व्यस्त होना। सिर उठाकर चलना- अकड़कर चलना, घमंड दिखाना। सिर उतरवाना- मरवा डालना। सिर उतारना- मार डालना। (किसी का) सिर ऊँचा करना- सम्मान बढ़ाना, सम्मान का पात्र बनाना। (अपना) सिर ऊँचा करना- (प्रतिष्ठित लोगों में) प्रतिष्ठा के साथ रहना। सिर (के) ऊपर- बहुत ही निकट। उ.- (क) अजहूँ चेति भजन करि हरि कौ, काल फिरत सिर ऊपर भारौ-१−८०। (ख) सिर ऊपर बैठे रखवारे-१०१०। सिर औंधाकर पड़ना (औंधाना) - बहुत चिंता या दुख से सिर झुकाना, सिर झुकाकर बहुत चिंता या दुख सूचित करना। सिर करना- (१) (स्त्रियों का) केश सँवारना। (२) बहुत लाड़-प्यार करना। (कोई वस्तु) सिर करना- इच्छा के विरूद्ध देना, गले मढ़ना। सिर काटना- मार डालना। सिर काढ़ना- प्रसिद्ध होना। सिर का बोझ टलना - झंझट या मुसीबत दूर होना, बला टलना। सिर का बोझ टालना- जी लगाकर न करना, बेगार टालना। सिर के बल बलना या जाना- (१) (किसी के प्रति) बहुत विनीत भाव या आदर प्रदर्शित करते हुए जाना या चलना। (२) प्रसन्नतापूर्वक कष्ट सहन करते हुए जाना या चलना। सिर खाली करना- (१) बहुत बकवाद करना। (२) सोच विचार करके हैरान होना। सिर खाना -बहुत बकवाद करके तंग या परेशान करना। सिर खपाना - (१) बहुत सोच-विचार करके हैरान होना। (२) किसी कार्य में बहुत व्यस्त या व्यग्र होना। सिर खुजलाना- (१) मार खाने की इच्छा होना। (२) शरारत सूझना। सिर चकराना- (१) सिर में चक्कर आना। (२) घबराहट या चिंता से विभ्रम होना। सिर चढ़ा- बहुत मुँह लगा हुआ, ढीठ, धृष्ट। सिर चढ़ाना - (१) माथे से लगाकर सम्मान या पूज्य भाव दिखाना। (२) किसी को मुँह लगाकर धृष्ट कर देना। (३) किसी देवी -देवता के सामने या महत् उद्देश्य से सिर कटा देना। (४) आदर पूर्वक मान्य या शिरोधार्य करना। सिर घूमना- (१) सिर में चक्कर आना। (२) घबराहट या चिंता से विभ्रम होना। सिर चढ़कर बोलना- (१) भूत-प्रेत का प्रभाव पड़ना। (२) अपना पाप या अपराध छिपाने में असमर्थ होकर स्वयं प्रकट कर देना। सिर चढ़कर मरना - किसी के ऊपर क्रुद्ध होकर या प्रतिकार स्वरूप अपनी जान दे देना। सिर जोड़कर बैठना- मिलजुल कर रहना। सिर जोड़ना - (१) एकत्र होकर पंचायत करना। (२) कुचक्र या षड़यन्त्र रचना। सिर झाड़ना - बाल सभालना, कंघी करना। सिर झुकाना - (१) नमस्कार करना। (२) लज्जित होना। (३) चुपचाप मान लेना। सिर टकराते फिरना - जहाँ जाना वहाँ असफल होना। (किसी के) सिर डालना- कार्य-विशेष का भार (दूसरे को) सौंपना। सिर टूटना-लड़ाई - झगड़ा होना। सिर टेकना- (१) नमस्कार करना। (२) विनय दिखाना। सिर टेकि - माथा नवाकर। उ.- असुर सिर टेकि तब कह्यौ निज नृपति सों, नहिं तिहुँ भुवन कोउ सम तुम्हारे-१० उ.-३१। सिर ढोरना - (१) प्रसन्न होकर सिर हिलाना। (२) सहर्ष स्वीकार करना। सिर तोड़ना- (१) खूब मार-पीट करना। (२) वश में करना। सिर देना - प्राण निछावर करना। सिर देत- प्राण निछावर करता है।

उ.- सूहदास सिर देत सूरमा सोइ जानै ब्यवहार-२९०५। (किसी के) सिर दोष देना- (दूसरे को) दोषी या अपराधी बताना। सिर दोष लगावन कौं - दोषी या अपराधी बताने के लिए- उ.- तुम तौं दोष लगावन कौं सिर, बैठे देखत नेरैं। सिर धरना- सादर स्वीकार करना, शिरोधार्य करना। (किसी के) सिर धरना (दूसरे पर) दोष या अपराध लगाना। सिर धारयौ सादर स्वीकार किया, शिरोधार्य किया। उ. मात-पिता-पति-बंधु-सुजनजन तिनहूँ की कहिबो सिर धारयौ-३०३५। सिर धुनना- अपनी भूल समझकर शोक और पछतावा करना। सिर धुनत-अपनी भूल के लिए शोक और पछतावा करता है।

उ.- बार-बार सिर धुनत जातु मग, कैहौं कहा बदन दिखराई-९७७। सिर धुनतिं- अपनी भूल के लिए शोक और पछतावा करती हैं। उ.- कर मीड़ति सिर धुनतिं नारि सब यह कहि-कहि पछिताहीं-१८००। सिर धुनति-अपनी भूल के लिए शोक करती और पछताती है। उ.- बार-बार सिर धुनति बिसूरति बिरह-ग्राह जनु भखियाँ-२७६६। सिर धुनि- सिर पीट-पीट कर, बहुत शोक और पश्चाताप करके। उ.- (क) कहत सूर भगवंत-भजन बिनु सिर धुनि-धुनि पछितायौ-१−३३५। (ख) रोहिनी चितै रही जसुमति तन सिर धुनि-धुनि पछितानी-३९५। (ग) नारद गिरा सम्हारी पुनि-पुनि सिर धुनि आयु सरैं-२४६२। सिर नंगा करना- (१) (पुरूष का) सिर से टोपी या पगड़ी उतारना। (२) (स्त्री का) सिर से धोती या पल्ला उतारना।

(३) इज्जत लेना, अपमानित करना। सिर नवाना- (१) सिर झुकाना, नमस्कार करना। (२) दीन या विनम्र बनना। सिर नीचा करना- (१) लज्जित या अपमानित करना। (२) पराजित करना। सिर नीचा होना- (१) लज्जित या अपमानित होना। (२) पराजित होना। सिर पचाना- (१) बहुत परिश्रम करना। (२) बहुत सोच विचार करके हैरान होना। सिर पटकना- (१) बहुत परिश्रम करना। (२) बहुत पछताना। सिर पर- (१) सिर। (२) बहुत पास या सामने। सिर पर आ पड़ना- (१) अपने ऊपर आना या बीतना। (२) अपने जिम्मे पड़ना, अपने गले मढ़ा जाना। सिर पर आ जाना- (१) बहुत समीप आ जाना। (२) थोड़े ही दिन शष रह जाना। सिर पर उठा लेना- बहुत उधम मचाना या हो-हल्ला करना। सिर पर पाँव (पैर) रखकर भागना-बहुत तेजी से भागना।

(किसी के) सिर पर पाँव रखना- (किसी के साथ) बहुत उद्दंडता का व्यवहार करना। सिर पर पृथ्वी या आसमान उठाना- बहुत शोर-गुल करना और उधम मचाना। सिर पर पड़ना- (१) जिम्मे पड़ना, गले मढ़ा जाना। (२) अपने ऊपर बीतना या घटित होना। सिर पर खून चढ़ना या सवार होना- (१) किसी की जान लेने को उतारू होना। (२) किसी की हत्या करके आपे में न रह जाना। सिर पर खेलना- अपने प्राण संकट में डालना। (किसी के) सिर पर खेलना- दूसरे के सामने या उसकी उपस्थिति में ही) उद्दंडता दिखाना या दुष्कर्म करना। सिर पर रखना- (१) आदर-सत्कार करना। (२) सादर स्वीकार करना। सिर राखै- सादर स्वीकार करता है।

उ.- अपने जन को प्रसाद सारी सिर राखै-२६१९। (किसी के) सिर पर छप्पर रखना- बहुत बोझ या दबाव डालना। सिर पर मिट्टी डालना- बहुत शोक करना। सिर पर लेना-अपने ऊपर जिम्मेदारी लेना। सिर पर शैतान चढ़ना- बहुत ज्यादा गुस्सा लेना। सिर पर शेतान चढ़ना-बहुत ज्यादा गुस्सा आना। सिर पर जूँ न रेंगना- जरा भी होश या ध्यान न आना। सिर रहना-मान या प्रतिष्ठा बनी रहना। किसी के सिर पर डालना- (दूसरे के) जिम्मे देना या सौंपना। सिर पर बीतना- अपने ऊपर पड़ना, भुगतना। सिर पर होना- (१) बहुत ही निकट होना (२) थोड़ा ही समय शेष रह जाना। (किसी का) किसी के सिर पर होना- संरक्षक होना। सिर पर हाथ धरना या रखना- (१) सहायक या संरक्षक होना। (२) शपथ खाना। (दर्द या पीड़ा से) सिर फटचना या फटा जाना - सिर में बहुत दर्द या पीड़ा होना। सिर फिरना- (१) सिर चकराना। (२) होश-हवास ठीक न रहना, बुद्धि नष्ट हो जाना।

(३) पागल हो जाना सिर फोड़ना- (१) लड़ाई झगड़ा करना। (२) शव की कपाल-क्रिया करना। सिर फेरना- अस्वीकार या अवज्ञा करना। सिर बाँधना - (१) (पटेबाजी या लड़ाई में) सिर पर आक्रमण करना। (२) (स्त्री का) केश सँवारना या चोटी करना। सिर बेचना-सेना में नौकरी करना। सिर भारी होना- स्वस्थ न होना। सिर मारना- (१) समझाते-समझाते हैरान हो जाना। (२) बहुत सोचते-विचारते परेशान हो जाना। (३) चिल्लाकर पुकारना। (४) बहुत प्रयत्न या परिश्रम करना। सिर मुड़ाना- संन्यास लेना। सिर मुड़ाते ही ओले पड़ना- आरम्भ में ही संकट आ जाना। सिर मढ़ना- (किसी की) इच्छा के विरूद्ध कोई दायित्व सौंपना।

सिर (में) लकड़ी ठोंकना- कपाल-क्रिया करना। सिर ठोंकी लकरी - कपाल-क्रिया की। उ.- लै देही घर-बाहर जारी, सिर ठोंकी लकरी-१−७१ सिर रँगना- सिर फोड़कर लहू-लोहान करना। सिर रहना- दिन-रात परिश्रम करना। (किसी के) सिर रहना या होना- (किसी के) पीछे पड़जाना। सिर सफेद होना- वृद्धावस्था से बाल सफेद हो जाना। सिर पर सेहरा होना- किसी कार्य का श्रेय मिलना। सिर (पर) सहना- (अपने ऊपर) झेलना। अपने सिर सहयौ- (भार आदि) उठाया या झेला। उ.- इहिं भरू अधिक सहयौ अपनै सिर अमित अंडमय बेष-५७०। सिर सहलाना- (१) खुशामद करना। (२) बहुत दुलार-प्यार करना। सिर सूँघना- छोटों का दुलार करने या उनके प्रति प्रेम प्रदर्शित करने के लिए उनका सिर सूँघना। सिर से पैर तक- (१) एड़ी से चोटी तर। (२) आरम्भ से अंत तक।

सियाना, सियानो
सिलाना।
क्रि.स.
(हिं. सिलाना)

सियापा
मरे हुए संबंधी के शोक में प्रतिदिन परिवार और जाति की स्त्रियों के एकत्र होकर रोने-पीटने की रीति।
संज्ञा
(हिं. स्यापा)

सियार
गीदड़, जुंबुक।
संज्ञा
(हिं. स्यार)
उ.- सूरदास प्रभु तुम्हरे भजन बिनु जैसे सूकर-स्वान सियार-१−१४।

सियारा
शीतकाल।
संज्ञा
(हिं. सियरा+काल)

सियारी
गीदड़ी।
संज्ञा
(हिं. स्यारी)

सियाल
गीदड़, जंबुक।
संज्ञा
(सं. श्रृगाल)
उ.- चहुँ दिसि सूर सोर करि धावैं ज्यों केहरिंहि सियाल।

सियाला
जाड़े की ऋृतु।
संज्ञा
(सं. शीतकाल)

सियाली
जाड़े की फसल।
वि.
(हिं. सियाला)

सियाह
काला।
वि.
(हिं. स्याह)

सियाही
रोशनाई।
संज्ञा
(हिं. स्याही)

सिर से पैर तक आग लगना-बहुत क्रोध आना। सिर (के बल या) से चलना- बहुत सम्मान करना। सिर से कफन बाँधना - मरने के लिए तैयार होना। सिर से बला टालना- जी लगाकर काम न करना, बेगार टालना। सिर से बोझ उतरना- (१) झंझट दूर होना। (२) निश्चित होना। सिर से बोझ उतारना- (१) झंझट दूर करना। (२) किसी तरह काम निबटाकर निश्चिंत होना। सिर तक पानी होना या आ जाना- (१) बहुत ऋण चढ़ जाना। (२) सहन की पराकाष्ठा हो जाना। सिर से खेल जाना- प्राण दे देना। सिर से सिरवाहा (पगड़ी) है -सरदार या स्वामी के साथ सेना या सेवक अवश्य रहेंगे। सिर पर सींग होना - कोई विशेषता होना। सिर का पसीना पैर तक आना- बहत परिश्रम पड़ जाना। सिर होना- (१) पीछा न छोड़ना। (२) बार-बार आग्रह करके तंग करना। (३) झगड़ा कर बैठना। (किसी बात के) सिर होना- (१) उसी की धुन में लगे रहना। (२) समझ या ताड़े लेना। (३) जिम्मे होना, ऊपर पड़ना। सिर हिलाना- (१) स्वीकृति -अस्वीकृति जताना। (२) प्रसन्नता सूचित करना।

सिर
ऊपर का छोर, सिरा, चोटी।
संज्ञा
(सं.शिरस्)

सिर
बड़ा, महान।
वि.

सिर
बढ़िया, उत्तम।
वि.

सिरकटा
जिसका ऊपरी भाग या सिर कटा हुआ हो।
वि.
(हिं. सिर+कटना)

सिरकटा
दूसरों का सिर काटनेवाला।
वि.
(हिं. सिर+काटना)

सिरकटा
किसी का अपकार करनेवाला।
वि.
(हिं. सिर+काटना)

सिरका
घूर में पकाकर खट्टा किया हुआ किसी फल का रस।
संज्ञा
(फ़ा.)

सिरकी
सरकंडा।
संज्ञा
(हिं. सरकंडा)

सिरकी
सरकंडे का छोटा छप्पर।
संज्ञा
(हिं. सरकंडा)

सिरतापा
सिर से पैर तक।
क्रि.वि.
(हिं. सिर+ फ़ा. ता + पा=पैर)

सिरतापा
आदि से अंत तक।
क्रि.वि.
(हिं. सिर+ फ़ा. ता + पा=पैर)

सिरत्नाण, सिरत्नान
युद्ध में सिर की रक्षा के लिए पहना जानेवाला टोप, कूँड।
संज्ञा
(सं. शिरस्त्राण)

सिरदार
नायक, मुखिया।
संज्ञा
(फ़ा. सरदार)
उ.−(क) जग सिरदार सूर के स्वामी देखि-देखि सुख पावै-८७६। (ख) गाउँ दसक सिरदार कन्हाई-१००२।

सिरदार
शासक।
संज्ञा
(फ़ा. सरदार)

सिरदारी
सरदार का पद, भाव या कार्य।
संज्ञा
(हिं. सरदारी)

सिरधर, सिरधरा, सिरधरू
संरक्षक।
वि.
(हिं. सिर+धरना)

सिरधर, सिरधरा, सिरधरू
जिसे सिर पर धारण किया जाय।
वि.
(हिं. सिर+धरना)

सिरनामा
पत्र पर लिखा जानेवाला पता।
संज्ञा
(हिं. सिर+नाम)

सिरनामा
पत्र के आदि में लिखा जानेवाला संबोधन आदि।
संज्ञा
(हिं. सिर+नाम)

सिरजनहार, सिरजनहारा, सिरजनहारो
सृष्टि की रचना करनेवाला ईश्वर।
संज्ञा

सिरजना, सिरजनो
रचना, बनाना।
क्रि.स.
(सं. सृजन)

सिरजना, सिरजनो
उत्पन्न करना।
क्रि.स.
(सं. सृजन)

सिरजना, सिरजनो
सुरक्षित रखना।
क्रि.स.
(सं. संचय)

सिरजित
रचा या बनाया हुआ।
वि.
(सं. सर्जित)

सिरजित
तैयार या उत्पन्न किया हुआ।
वि.
(सं. सर्जित)

सिरजी
उत्पन्न की गयी (हैं)।
क्रि.अ.
(हिं. सिरजना)
उ.−बिरह सहन को हम सिरजी हैं पाहन हृदय हमार-३२१५।

सिरताज
मुकुट।
संज्ञा
(हिं. सिर+ फ़ा. ताज़)

सिरताज
सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति या वस्तु,. शिरोमणि।
संज्ञा
(हिं. सिर+ फ़ा. ताज़)
उ.−(क) पाछैं भयौ न आगैं ह्वैहै सब पतितनि सिरताज-१−९६। (ख) सूरस्याम तहाँ स्याम सबनि कौ दिखियत है सिरताज-९२०।

सिरताज
नायक, मुखिया।
संज्ञा
(हिं. सिर+ फ़ा. ताज़)
उ.−अपने सुत कौ बदन दिखावहु बड़ महर सिरताज−१०−३६।

सिरगा
एक तरह का घोड़ा।
संज्ञा
(देश.)

सिरगाना, सिरगानो
सुलगाना।
क्रि.स.
(हिं. सुलगाना)

सिरगिरी
कलगी।
संज्ञा
(हिं. सिर+ गिरि)

सिर-चंद
हाथी के मस्तक का एक अर्द्ध चंद्राकार गहना।
संज्ञा
(हिं. सिर+सं. चंद्र)

सिरजक
रचनेवाला।
वि.
(हिं. सिरजना)

सिरजक
सृष्टिकर्ता, ईश्वर।
संज्ञा

सिरजत
रचता या बनाता है।
क्रि.स.
(हिं. सिरजना)
उ.−जग सिरजत पालत संहारत पुनि क्यों बहुरि करयौ−१० उ.−१३१।

सिरजन
रचने या बनाने की क्रिया।
संज्ञा
(सं. सृजन)

सिरजन
सृष्टि।
संज्ञा
(सं. सृजन)

सिरजनहार, सिरजनहारा, सिरजनहारो
रचने या बनानेवाला।
वि.
(सं. सृजन+हिं. हार)

सिरबंद
साफा, पगड़ी।
संज्ञा
(हिं. सिर+फ़ा. बंद)

सिरबंदी
माथे पर पहनने का स्त्रियों का एक आभूषण।
संज्ञा
(हिं. सिर+फ़ा. बंदी)

सिरमनि
सिर पर पहनने का एक रत्न।
संज्ञा
(सं. शिरोमणि)

सिरमनि
सबसे अच्छा, सर्वश्रेष्ठ।
वि.

सिरमौर
सिर का मुकुट।
संज्ञा
(हिं. सिर+मौर)

सिरमौर
प्रधान या श्रेष्ठ व्यक्ति, शिरोमणि।
संज्ञा
(हिं. सिर+मौर)
उ.−गोप-सिरमौर नृप ओर कर जोरि कै, पुहुप के काज प्रभु पत्र दीन्हौ-५८४।

सिरमौर
सबसे श्रेष्ठ।
वि.
उ.−(क) तिनमैं अजामील गनिकादिक, उनमें मैं सिरमौर−१−१४५। (ख) दस सुत मनु के उपजो और। भयौ इच्छवाकु सबनि सिरमौर-९−२।

सिररुह
सिर के बाल।
संज्ञा
(सं. शिरोरुह)

सिरस
एक वृक्ष।
संज्ञा
(सं. शिरीष)

सिरहाना
सोने के स्थान पर सिर की ओर का भाग या सिरा।
संज्ञा
(सं. शिरस+आधान)

सिरा
लंबाई में किसी ओर का छं र या अंत का भाग।
संज्ञा
(हिं. सार)

सिरा
ऊपरी या शीर्ष भाग।
संज्ञा
(हिं. सार)

सिरा
आरंभ या अंत का भाग।
संज्ञा
(हिं. सार)

सिरा
नोक, अनी।
संज्ञा
(हिं. सार)

सिरा
शरीर में सक्त-नाड़ी।
संज्ञा
(सं. शिरा)

सिरा
खेत में सिंचाई की नाली।
संज्ञा
(सं. शिरा)

सिराइ
शीतल या सुखी होता है।
क्रि.अ.
(हिं. सिराना)
उ.−तुम ही हौ ब्रज के जीवन-धन देखत नैन सिराइ−१०−७९।

सिराइ
बीते, व्यतीत हो।
क्रि.अ.
(हिं. सिराना)
उ.−ऎसै ही जौ जनम सिराइ, बिन हरि-भजन नरक महँ जाइ−७−२।

सिराइ
मिटाकर, दूर करके।
क्रि.अ.
(हिं. सिराना)
उ.−अब रघुनाथ मिलाऊँ तुमको सुन्दरि सोग सिराइ (निवारि)−९−८३।

सिराए
शीतल या सुखी हुए।
क्रि.अ.
(हिं. सिराना)
उ.−सिया-राम-लछिमन निरखत सूरदास के नैन सिराए- ९−१६८।

शोरा
एक तरह का क्षार।
संज्ञा
(फ़ा.)

शोरापुश्त
झगड़ालू, उद्दंड।
वि.
(फ़ा.)

शोला
आग की लपट या ज्वाला।
संज्ञा
(अ. शोअलऽ)

शोशा
नोक।
संज्ञा
(फ़ा.)

शोशा
अनोखी बात।
संज्ञा
(फ़ा.)

शोशा
झगड़े की बात।
संज्ञा
(फ़ा.)

शोशा
व्यंग्य।
संज्ञा
(फ़ा.)

शोषक
सुखाने या सोखनेवाला।
संज्ञा
(सं.)

शोषक
चूसनेवाला।
संज्ञा
(सं.)

शोषक
घुलानेवाला।
संज्ञा
(सं.)

सिरनामा
लेख आदि का शीर्षक।
संज्ञा
(हिं. सिर+नाम)

सिरनेत
पगड़ी, पटा, चीरा।
संज्ञा
(हिं. सिर+सं. नेत्री=धज्जी या डोरी)

सिरनेत
क्षत्रियों का एक प्रसिद्ध वर्ग।
संज्ञा
(हिं. सिर+सं. नेत्री=धज्जी या डोरी)

सिर पच्ची
सिर खपाना।
संज्ञा
(हिं. सिर+पचाना)

सिरपाँव, सिरपाव
वह पूरी पोशाक जो राज दरबार से किसी को सम्मान-रूप में दी जाती है, खिलअत।
संज्ञा
(हिं. सिरोपाव)
उ.−(क) नंद कौ सिरपाव दीन्हो, कोप सब पहिराइ−५८६। (ख) कहि खवास को सैन दै सिर−पाँव मँगायौ−२४७६।

सिरपेच
पगड़ी।
संज्ञा
(हिं. सिर+ फ़ा. पेच)

सिरपेच
पगड़ी के ऊपर का छोटा कपड़ा।
संज्ञा
(हिं. सिर+ फ़ा. पेच)

सिरपेच
पगड़ी पर बाँधने का एक आभूषण।
संज्ञा
(हिं. सिर+ फ़ा. पेच)

सिरफूल
सिर पर पहना जानेवाला, स्त्रियों का एक आभूषण।
संज्ञा
(हिं. सिर+फूल)

सिरफेंटा
मुरेठा, पगड़ी।
संज्ञा
(हिं. सिर+ फेंटा)

सिरात
ठंढा होता है, गरम नहीं रह जाता है।
क्रि.अ.
(हिं. सिराना)
उ.−(क) भात सिरात तात दुख पावत, बेगि चलौ मेरे लाल-१०−२२३। (ख) सिद्ध जेंवन सिरात, नंद बैठे, ल्यावहु बोलि कान्ह तत्कालहिं-१०−२३६।

सिरात
शीतल या सुखी होता है।
क्रि.अ.
(हिं. सिराना)
उ.−(क) सब कोउ कहत गुलाम स्याम कौ, सुनत सिरात हिए-१−१७१। (ख) सुरदास प्रभु की ऎसी अधीनता देखत मेरे नैन सिरात-२०६८।

सिरात
बीतते या व्यतीत होते हैं।
क्रि.अ.
(हिं. सिराना)
उ.−गोपी-ग्वालबाल सँग खेलत सब दिन हँसत सिरात-३४९३।

सिराति
बीतती या व्यतीत होती हैं।
क्रि.अ.
(हिं. सिराना)
उ.-जाति सिराती राति बातनि मैं, सुनौ भरत चित लाइ-९−१५५।

सिराति
शीतल या सुखी होती है।
क्रि.अ.
(हिं. सिराना)
उ.-अधिक पिराति सिराति न कबहूँ अनेक जतन करि हारी-३०३९।

सिरान
मंद, धीमा या निष्क्रिय हो गया है।
क्रि.अ.
(हिं. सिराना)
उ.- धनुष बान सिरान कैंधौं गरुड़ बाहन खोर-१−२५३।

सिरान
शीतल या सुखी होने (दो)।
क्रि.अ.
(हिं. सिराना)
उ.- बैन सुनौ, बिहरत बन देखौं, इहिं सुख हृदय सिरान दै-८०४।

सिराना
ठंढा होना, गरम न रहना।
क्रि.अ.
(हिं. सीरा=ठंढा+ना)

सिराना
शीतल या सुखी होना।
क्रि.अ.
(हिं. सीरा=ठंढा+ना)

सिराना
मंद या धीमा होना, निराश या हतोत्साह होना।
क्रि.अ.
(हिं. सीरा=ठंढा+ना)

सिराना
पूरा या समाप्त होना।
क्रि.अ.
(हिं. सीरा=ठंढा+ना)

सिराना
मिटना, दूर होना।
क्रि.अ.
(हिं. सीरा=ठंढा+ना)

सिराना
बीतना, व्यतीत होना।
क्रि.अ.
(हिं. सीरा=ठंढा+ना)

सिराना
बंद होना।
क्रि.अ.
(हिं. सीरा=ठंढा+ना)

सिराना
फुरसत पाना।
क्रि.अ.
(हिं. सीरा=ठंढा+ना)

सिराना
निभना।
क्रि.अ.
(हिं. सीरा=ठंढा+ना)

सिराना
ठंढा करना।
क्रि.स.

सिराना
शीतल या सुखी करना।
क्रि.स.

सिराना
पूरा या समाप्त करना।
क्रि.स.

सिराना
बिताना।
क्रि.स.

सिराने
निराश या हतोत्साह हो गए।
क्रि.अ.
(हिं. सिराना)
उ.-(क) सात दिवस जल बर्षि सिराने हारि माती मुख फेरो-९५९। (ख) बज्रायुध जल बरषि सिराने परयो चरन तब प्रभु करि जाने-१०७०।

सिरानो
सिराना।
क्रि.अ. क्रि.स.
(हिं. सिराना)

सिरानौ
बीता जाता है।
क्रि.अ.
(हिं. सिंराना)
उ.-भक्ति कब करिहौ जनम सिरानौ-१−३२९।

सिरानौ
व्यतीत हो गया।
क्रि.अ.
(हिं. सिंराना)
उ.- (क) जनम सिरानौ ऎसैं ऎसैं। कै घर-घर भरमत जदुपति बिनु कै सोवत कै बैसैं-१−२९३। (ख) ब्रजहिं बसत सब जनम सिरानौ, ऎसी करी न आहति-५२९।

सिरानौई
बीता ही (जाता है)।
क्रि.अ.
(हिं. सिराना)

सिरानौई
सिरानौई लाग्यौ-बीता ही जाता या जा रहा है।
प्र.
उ.-जनम सिरानौई सो लाग्यौ-१−७३।

सिरान्यो, सिरान्यौ
निराश या हतोत्साह हो गया।
क्रि.अ.
(हिं. सिराना)
उ.-सात दिवस जल बरसि सिरान्यो आवत चल्यो ब्रजहिं अत्रावत-९७८।

सिरायो, सिरायौ
शीतल या सुखा हुआ।
क्रि.अ.
(हिं. सिराना)
उ.-अब कुबिजा पाइ हियो सिरायो-३४४२।

सिरायो, सिरायौ
(गरम पदार्थ) ठंढा हुआ।
क्रि.अ.
(हिं. सिराना)
उ.-रिषि मग जोवत बर्ष बितायौ। पै भोजन तौहूँ न सिरायौ-९−५।

सिरावन
ՙसिराने՚ की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(हिं. सिराना)
उ.- है कहयौ सिरावन सीरा-१०−१८३।

सिरोही
सिरोही की बनी बढ़िया तलवार।
संज्ञा

सिर्फ
अकेला।
वि.
(अ. सिर्फ़)

सिर्फ
शुद्ध।
वि.
(अ. सिर्फ़)

सिर्फ
केवल, मात्र।
क्रि.वि.

सिल
पत्थर, चट्टान।
संज्ञा
(सं. शिला)

सिल
पत्थर की बटिया जिस पर बट्टे से कुछ पीसा जाता है।
संज्ञा
(सं. शिला)

सिल
कटे हुए खेत में गिरे हुए अनाज के दाने बीनकर निर्वाह करने की वृत्ति।
संज्ञा
(सं. शिल)

सिलक
लड़ी।
संज्ञा
(हिं. सिलक)

सिलक
पंक्ति।
संज्ञा
(हिं. सिलक)

सिलक
तागा, धागा, डोरा।
संज्ञा

सिरी
रोली, रोचना।
संज्ञा
(सं. श्री)

सिरी
माथे का एक गहना।
संज्ञा
(सं. श्री)

सिरीखंड
हरिचंदन।
संज्ञा
(सं. श्रीखंड)

सिरीपंचमी
वसंतपंचमी।
संज्ञा
(सं. श्रीपंचमी)

सिरोपाँव, सिरोपाव
सिर से पैर तक के वस्त्र (अंगा, पगड़ी, पाजामा, पटुका और दुपट्टा) जो राज-दरबार से किसी को सम्मान रूप में दिये जाते हैं।
संज्ञा
(हिं. सिर+पाँव)

सिरोमनि
सबसे अच्छा, सर्वश्रेष्ठ।
वि.
(सं. शिरोमणि)
उ.- (क) चतुर-सिरोमनि नंद-सुत-१−४४। (ख) हैं पतित-सिरोमनि-१−१९२। (ग) सूरदास प्रभु रसिक-सिरोमनि-१०−२९८। (घ) इतने महिं सब तात समुझिबी चतुर-सिरोमनि नाह-२८६८।

सिरोमनि
सिर पर पहनने का एक रत्न।
संज्ञा

सिरोरुह
सिर के बाल।
संज्ञा
(सं. शिरोरुह)

सिरोही
एक तरह की चिड़िया जिसकी चोंच और पैर लाल तथा शरीर काला होता है।
संज्ञा
(देश.)

सिरोही
राजपूताने का एक स्थान।
संज्ञा

सिरावन
ठंढा करने के लिए।
संज्ञा
(हिं. सिराना)
उ.- एक दुहनी दूध जामन को सिरावन जाहिं-पृ. ३३९ (८४)।

सिरावन
ठंढा या शीतल करनेवाला।
वि.

सिरावन
क्लेश या संताप दूर करनेवाला।
वि.

सिरावना, सिरावनो
ठंढा करना।
क्रि.स.
(हिं. सिराना)

सिरावना, सिरावनो
शीतल या सुखी करना।
क्रि.स.
(हिं. सिराना)

सिरावना, सिरावनो
पूरा या समाप्त करना।
क्रि.स.
(हिं. सिराना)

सिरावना, सिरावनो
बिताना, व्यतीत करना।
क्रि.स.
(हिं. सिराना)

सिरवै
ठंढा या शीतल करे।
क्रि.स.
(हिं. सिराना)
उ.- कोटि बेर जल औटि सिरावै-२७४७।

सिरी
लक्ष्मी।
संज्ञा
(सं. श्री)

सिरी
शोभा।
संज्ञा
(सं. श्री)

सिलह
हथियार, शस्त्र।
संज्ञा
(अ. सिलाह)

सिलहखाना
हथियार रखने का स्थान, शस्त्रागार।
संज्ञा
(हिं. सिलह+ फ़ा. खाना)

सिलहल, सिलहला
(स्थान) जहाँ काई से पैर फिसले।
वि.
(हिं. सील+हिला=कीचड़)

सिलहार, सिलहारा
खेत में गिरा हुआ अनाज बीन कर निर्वाह करनवाला।
वि.
(सं. शिला+हिं. हार)

सिला
चट्टान, शिला।
संज्ञा
(सं. शिला)
उ.-(क) सिला तरी जल माँहिं सेत बँधि-१−३४। (ख) सैल-सिला-द्रुम बरषि ब्योम चढ़ि सत्रु-समूह सँहारौं-९−१०६। (ग) आपुहिं गिरयौ सिला पर आई-३९१।

सिला
शालग्राम की बटिया।
संज्ञा
(सं. शिला)
उ.- बदन पसारि सिला जब दीन्ही, तीनौं लोक दिखाए-१०−२६२।

सिला
खेत में कटी हुई फसल उठा ले जाने पर गिरा हुआ अनाज।
संज्ञा
(सं. शिल)

सिला
फटकने-पछोरने के लिए रखा गया अनाज का ढेर।
संज्ञा
(सं. शिल)

सिला
खेत में गिरे हुए अनाज बीनकर निर्वाह करने की वृत्ति।
संज्ञा
(सं. शिल)

सिलाई
सुई से सीने का काम, ढंग या मजदूरी।
संज्ञा
(हिं. सीना+आई)

सिलवाना, सिलवानो
सिलाना।
क्रि.स.
(हिं. सीना)

सिलसिला
क्रम, बँधा हुआ तार या क्रम।
संज्ञा
(अ.)

सिलसिला
श्रेणी, पंक्ति।
संज्ञा
(अ.)

सिलसिला
लड़ी, श्रृंखला।
संज्ञा
(अ.)

सिलसिला
व्यवस्था।
संज्ञा
(अ.)

सिलसिला
गीला, भीगा हुआ।
वि.
(सं. सिल)

सिलसिला
रपटनेवाला।
वि.
(सं. सिल)

सिलसिला
चिकना।
वि.
(सं. सिल)

सिलसिलेवार
सिलसिले या क्रम से क्रमबद्ध।
क्रि.वि.
(अ. सिलसिला+ फ़ा. वार)

सिलसिलेवार
व्यवस्थित रूप से।
क्रि.वि.
(अ. सिलसिला+ फ़ा. वार)

सिलखड़िया, सिलखड़ी
एक तरह का मुलायम पत्थर।
संज्ञा
(हिं. सिल+खड़िया)

सिलखड़िया, सिलखड़ी
खड़िया मिट्टी।
संज्ञा
(हिं. सिल+खड़िया)

सिलगना, सिलगनो
सुलगना।
क्रि.अ.
(हिं. सुलगना)

सिलप
कौशल, शिल्प।
संज्ञा
(सं. शिल्प)
उ.- बिस्वकर्मा सुतिहार स्त्रुति धरि सुलभ सिलप दिखावनो-२१८०।

सिलपर
बराबर, चौरस।
वि.
(सं. शिला पर)

सिलपर
घिसा हुआ।
वि.
(सं. शिला पर)

सिलपर
चौपट, नष्ट।
वि.
(सं. शिला पर)

सिलपोहनी
विवाह की एक रीति जिसमें वर-वधू सिल पर कुछ पीसते हैं।
संज्ञा
(हिं. सिल+पोहना)

सिलबिल, सिलबिल्ला
लपझप काम करनेवाला, क्रम या व्यवस्था का ध्यान न रखनेवाला।
वि.
(देश.)

सिलवठ
सिकुड़न, शिकन।
संज्ञा
(देश.)

शोभायमान
सुंदर।
वि.
(सं.)

शोभावत
सुंदर लगता है।
क्रि.अ.
(हिं. शोभावना)
उ.- कुंडल छवि रवि किरन हूँ तें द्युति मुकुट इंद्रधनु ते शोभावत-८६९।

शोभावना
सुंदर लगना।
क्रि.अ.
(हिं. शोभना)

शोभित
सुंदर, शोभायुक्त।
वि.
(सं.)

शोभित
सजा हुआ।
वि.
(सं.)

शोभित
बिराजता हुआ।
वि.
(सं.)

शोर
गुल-गपाड़ा, हल्ला, कोलाहल।
संज्ञा
(फ़ा.)
उ.- (क) सूर नारि नर देखन धाए घर घर शोर अकूत-२४९२। (ख) नगर शोर अकनत सुनत अति रूचि उपजावत-२५६०। (ग) हलधर संग छाक भरि काँवरि करत कुलाहल सोर- सारा. ४७१।

शोर
आवाज, पुकार, गुहार।
संज्ञा
(फ़ा.)
उ.- महरि पुत्र कहि शोर लगायो तरू ज्यों धरनि लुटाइ- २५३३।

शोर
धूम, प्रसिद्धि।
संज्ञा
(फ़ा.)
उ.- आय द्वारका शोर कियो उन हरि हस्तिनपुर जाने।

शोरबा
तरकारी का रसा या झोल।
संज्ञा
(फ़ा.)

सिलाही
कवचधारी।
वि.
(अ. सिलाह+ई)

सिलाही
सशस्त्र।
वि.
(अ. सिलाह+ई)

सिलाही
सिपाही, सैनिक।
संज्ञा

सिलाप
कौशल, शिल्प।
संज्ञा
(सं. शिल्प)

सिलिमुख
भौंरा।
संज्ञा
(सं. शिलीमुख)

सिलियार, सिलियारा
सिलाहारा।
वि.
(हिं. सिलहारा)

सिलीमुख
भौंरा।
संज्ञा
(सं. शिलीमुख)
उ.- कुंचित अलक सिलीमुख मानो लै मकरंद निदाने-१३३४।

सिलोच्च
एक पर्वत जो रामचंद्र को विश्वामित्र के साथ जाते समय गंगा तट पर मिलाथा।
संज्ञा
(सं. शिलोच्च)

सिलौट, सिलौटा
बड़ी सिल।
संज्ञा
(हिं. सिल+बट्टा)

सिलौट, सिलौटा
सिल और बट्टा।
संज्ञा
(हिं. सिल+बट्टा)

सिलाई
टाँका, सीवन।
संज्ञा
(हिं. सीना+आई)

सिलाजीत
शिलाओं का एक लसदार पसेव जो बड़ी पुष्टई माना जाता है।
संज्ञा
(सं. शिलाजतु)

सिलाना, सिलानो
सीने का काम दूसरे से कराना, सिलवाना।
क्रि.स.
(हिं. सीना)

सिलावट
पत्थर काटने गढ़नेवाला कारीगर।
संज्ञा
(सं. शिला+पटु)

सिलासार
लोहा।
संज्ञा
(सं. शिलासार)

सिलाह
जिरह-बख्तर, कवच।
संज्ञा
(अ.)

सिलाह
हथियार, अस्त्र-शस्त्र।
संज्ञा
(अ.)

सिलाहबंद
सशस्त्र।
वि.
(अ. सिलाह + फ़ा. बंद)

सिलाहर, सिलाहरा, सिलाहार, सिलाहारा
कटे हुए खेत में बिखरे हुए अनाज के दाने बीनकर जीवन निर्वाह करनेवाला।
वि.
(सं. शिल+ हिं. हारा)

सिलाहर, सिलाहरा, सिलाहार, सिलाहारा
बहुत दरिद्र, अकिंचन।
वि.
(सं. शिल+ हिं. हारा)

सिलौटिया, सिलौटी
छोटी सिल।
वि.
(हिं. सिलौटा)

सिल्प
कारीगरी, कला-कौशल।
संज्ञा
(सं. शिल्प)

सिल्ला
फसल कट जाने पर खेत में बिखरा हुआ अनाज।
संज्ञा
(सं. शिल)

सिल्ला
खलियान में भूसे का ढेर जिसमें अनाज के छ दाने रह जाते हैं।
संज्ञा
(सं. शिल)
मुहा.- सिल्ला चुनना या बीनना-खेत या भूसे में बिखरे हुए अनाज के दाने बीनना।

सिल्ली
धार तेज करने का छोटा पत्थर।
संज्ञा
(सं. शिला)

सिल्ली
आरे से चीरा हुआ तख्ता।
संज्ञा
(सं. शिला)

सिल्ली
छोटी सिल।
संज्ञा
(सं. शिला)

सिल्ली
पत्थर की छोटी पटिया।
संज्ञा
(सं. शिला)

सिल्ली
फटकने-पछोरने के लिए लगाया गया अनाज का ढेर।
संज्ञा
(हिं. सिल्ला)

सिल्ली
एक जल-पक्षी।
संज्ञा
(देश.)

सिव
मंगल, कल्याण।
संज्ञा
(सं. शिव)

सिव
महादेव।
संज्ञा
(सं. शिव)
उ.- (क) ब्रह्म-सिव-सेस-सुक सनक ध्यायौ-१−११९। (ख) सिव न, अवध सुन्दरी, बधो जिन-१६८७।

सिवई
गुंधी हुई मैदा के बटकर बनाए गए सूत के से लच्छे जो सुखाकर दूध में पकाकर या धी में भूनकर और चाशनी में पागकर खाए जाते हैं।
संज्ञा
(हिं. सेंवईं)
मुहा.- सिवईं तोड़ना, पूरना या बटना- गुँधी हुई मदा के सूत कातना या बनाना।

सिवकाई
सेवा, सेवक का कार्य।
संज्ञा
(हिं. सेवकाई)
उ.- सन्मुख रहत टरत नहिं कबहूँ, सदा करत सिवकाई- पृ. ३३६ (५६)।

सिवता
शिवत्व।
संज्ञा
(सं. शिवता)
उ.- सिव सिवता इन्हीं तैं लई-३−१३।

सिवपुरी
काशीनगरी।
संज्ञा
(सं. शिवपुरी)

सिवरात्रि
फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी जो शिवजी के विवाह की तिथि होने से एक पर्व के रूप में मान्य है और शैव इस दिन व्रत करते हैं।
संज्ञा
(सं. शिवरात्रि)

सिवरानि, सिवरानी
पार्वती।
संज्ञा
(सं. शिव+हिं. रानी)

सिव-रिपु
कामदेव।
संज्ञा
(सं. शिव+रिपु)
उ.- ता दिन तें उर-भौन भयो सखि सिव-रिपु को संचार-२८८८।

सिव-लिंग
शिवजी की पिंडी जिसकी पूजा होती है।
संज्ञा
(सं. शिवलिंग)

सिव-लोक
कैलास।
संज्ञा
(सं. शिव+लोक)

सिवा
दुर्गा।
संज्ञा
(सं.)

सिवा
पार्वती।
संज्ञा
(सं.)

सिवा
सियारिन, श्रृगाली।
संज्ञा
(सं.)

सिवा
मुक्ति, मोक्ष।
संज्ञा
(सं.)

सिवा
अलावा, अतिरिक्त।
अव्य.
(अ.)

सिवा
ज्यादा, अधिक।
वि.

सिवान
हद, सीमा।
संज्ञा
(सं.सीमांत)

सिवाय
अतिरिक्त।
अव्य.
(अ. सिवा)

सिवाय
ज्यादा, अधिक।
वि.

सिवार, सिवाल
पानी में होनेवाली एक तरह की लम्बी और लच्छेदार घास।
संज्ञा
(सं. शैवाल)
उ.- (क) पग न इत-उत धरन पावत उरझि मोह-सिवार−१−९९ (ख) बिरह-सरोवर बूड़ई अंधकार-सिवार-१५३८।

सिवालय, सिवाला
शिवमंदिर।
संज्ञा
(सं. शिवालय)

सिवि
एक प्रसिद्ध राजा।
संज्ञा
(सं. शिवि)

सिविका
डोली, पालकी।
संज्ञा
(सं. शिविका)

सिविर
सेना के ठरहने का स्थान, पड़ाव।
संज्ञा
(सं. शिविर)

सिविर
वह स्थान जहाँ लोग उद्देश्य विशेष से ठहरें या रहें।
संज्ञा
(सं. शिविर)

सिविर
डेरा, खेमा।
संज्ञा
(सं. शिविर)

सिविर
किला, दुर्ग, कोट।
संज्ञा
(सं. शिविर)

सिवैयाँ
सिवईं।
संज्ञा
(हिं. सिंवईं)

सिष
उपदेश, शिक्षा।
संज्ञा
(हिं. सीख)

सिष
चेला, शिष्य।
संज्ञा
(सं. शिष्य)

सिष्ट
बंसी की डोरी।
संज्ञा
(फ़ा. शिस्त)

सिष्ट, सिष्ठ
भला आदमी।
वि.
(सं. शिष्ट)

सिष्ट, सिष्ठ
साधु-महात्मा।
वि.
(सं. शिष्ट)
उ.- भृगु मरीचि-अंगिरा बसिष्ठ। अत्रि पुलह पुलस्त अति सिष्ठ−३−८।

सिष्य
चेला, शिष्य।
संज्ञा
(सं. शिष्य)

सिष्यहिं
शिष्यों को।
संज्ञा
(सं. सिष्य)
उ.- रिषि सिष्यहिं भेज्यौ समुझाइ। नृप सौं कहि तू ऐसी जाइ-१−२९०।

सिसकत
बहुत भय लगता है, धकधकी होती है, जी धड़कता है।
क्रि.अ.
(हिं. सिसकना)
उ.- तबहीं तें इकटक चितवत और सिसकत डर तें-१८६९।

सिसकना, सिसकनो
भीतर ही भीतर या बहुत धीरे-धीरे रोने में निकलती हुई साँस छोड़ना।
क्रि.अ.
(अनु.)

सिसकना, सिसकनो
लंबी साँस रोक-रोककर छोड़ते हुए रोना।
क्रि.अ.
(अनु.)

सिसकना, सिसकनो
बहुत भय लगना, जी धड़कना।
क्रि.अ.
(अनु.)

सिसकना, सिसकनो
मरने के निकट होने से उलटी साँस या हिचकियाँ लेना।
क्रि.अ.
(अनु.)

सिसकना, सिसकनो
(पाने या प्राप्त करने के लिए) रोना या तरसना।
क्रि.अ.
(अनु.)

सिसकती
रोनी, रोती हुई।
वि.
(हिं. सिसकना)
मुहा.- सिसकती-भिनकती - मैली-कुचैली और रोनी सूरत।

सिसकारना, सिसकारनो
मुँह से सीटी का सा हल्का शब्द निकालना।
क्रि.अ.
(अनु. सी सी+हिं. करना)

सिसकारना, सिसकारनो
(अत्यन्त पीड़ा या आनन्द से) मुँह से साँस खींचना या शीत्कार करना।
क्रि.अ.
(अनु. सी सी+हिं. करना)

सिसकरी
सिसकारने का शब्द।
संज्ञा
(हिं. सिसकारना)

सिसकरी
शीत्कार।
संज्ञा
(हिं. सिसकारना)

सिसकी
धीरे-धीरे रोने का शब्द।
संज्ञा
(अनु.)

सिसकी
शीतकार।
संज्ञा
(अनु.)

सिसिर
माघ और फाल्गुन मास की ऋतु।
संज्ञा
(सं. शिशिर)

सिसिर
जाड़ा, शीत्काल।
संज्ञा
(सं. शिशिर)

सिसु
छोटा बच्चा।
संज्ञा
(सं. शिशु)
उ.- (क) यह कहिकै सिसु-भेष धरयौ-१०−८। (ख) उपजि परयौ सिसु-कर्म-पुन्य फल-१०−१३८। (ग) कोउ आयौ सिसु-रूप रच्यौ री-६०६।

सिसुता
बचपन, बाल्यावस्था।
संज्ञा
(सं. शिशुता)
उ.- (क) सूरदास सिसुता-सुख जलनिधि कहँ लौं कहौं, नाहिं कोउ समसरि-१०−१२०। (ख) सूरदास प्रभु सिसुता कौ सुख सकै न हृदय समाइ-१०−१७८। (ग) अति सिसुता मैं ताहि संहारयौ परयौ सिला पर आइ-९८६।

सिसुता
बालकों का सा आचरण, लड़कपना।
संज्ञा
(सं. शिशुता)
उ.- अखिल ब्रहांड-खंड की महिमा सिसुता माहिं दुरावत-१०−१०२।

सिसुताइ, सिसुताई
बचपन।
संज्ञा
(सं. शिशुता)

सिसुताइ, सिसुताई
बालकों जैसा आचरण।
संज्ञा
(सं. शिशुता)
उ.- मुख-मुख जोरि बत्यावई सिसुताई ठानै-१०−७२।

सिसुपाल
चेदि देश का एक प्रसिद्ध राजा जिसे श्रीकृष्ण ने मारा था।
संज्ञा
(सं. शिशुपाल)
उ.- दंत बक्र सिसुपाल जे भए। बासुदेव ह्वै सो पुनि हए-१०−२।

सिसृक्षा
रचने की इच्छा।
संज्ञा
(सं.)

सिसृक्षु
रचना करने का अभिलाषी।
वि.
(सं.)

सिसोदिया
गुहलौत राजपूतों की एक शाखा जिसकी प्राचीन राजधानी चित्तौड़ थी और आधुनिक उदयपुर है।
संज्ञा
[सिसोद (स्थान)]

सिस्न
पुरूष का लिंग।
संज्ञा
(सं. शिश्न)

सिस्य
चेला, शिष्य।
संज्ञा
(सं. शिष्य)

सिस्टि, सिस्टी
रचकर तयार करने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(सं. सृष्टि)

सिस्टि, सिस्टी
जन्म, उत्पत्ति।
संज्ञा
(सं. सृष्टि)

सिस्टि, सिस्टी
रचना, निर्माण।
संज्ञा
(सं. सृष्टि)

सिस्टि, सिस्टी
जगत, संसार।
संज्ञा
(सं. सृष्टि)

सिहरन
सिहरने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(हिं. सिहरना)

सिहरना, सिहरनो
काँपना।
क्रि.स.
(सं. शीत+ना)

सिहरना, सिहरनो
ठंढ से काँपना।
क्रि.स.
(सं. शीत+ना)

सिहरना, सिहरनो
भय से काँपना।
क्रि.स.
(सं. शीत+ना)

शोषक
नाशक।
संज्ञा
(सं.)

शोषण
सुखाना।
संज्ञा
(सं.)

शोषण
सोख लेना।
संज्ञा
(सं.)

शोषण
चूसना।
संज्ञा
(सं.)

शोषण
घुलाना।
संज्ञा
(सं.)

शोषण
नाश करना।
संज्ञा
(सं.)

शोषण
कामदेव के पाँच बाणों में एक।
संज्ञा
(सं.)

शोषित
सोखा या सुखाया हुआ।
वि.
(सं.)

शोषित
चसा हुआ।
वि.
(सं.)

शोषित
पीड़ित।
वि.
(सं.)

सिहरना, सिहरनो
रोंगटे खड़े होना।
क्रि.स.
(सं. शीत+ना)

सिहरा
सेहरा।
संज्ञा
(हिं. सेहरा)

सिहराना, सिहरानो
कँपाना।
क्रि.स.
(हिं. सिहरना)

सिहराना, सिहरानो
सरदी से कँपाना।
क्रि.स.
(हिं. सिहरना)

सिहराना, सिहरानो
भय से काँपना।
क्रि.स.
(हिं. सिहरना)

सिहराना, सिहरानो
रोंगटे खड़े करना।
क्रि.स.
(हिं. सिहरना)

सिहराना, सिहरानो
सहलाना।
क्रि.स.
(हिं. सिहलाना)

सिहरी
कँपकँपी।
संज्ञा
(हिं. सिहरना)

सिहरी
शीत की कँपकँपी।
संज्ञा
(हिं. सिहरना)

सिहरी
भय।
संज्ञा
(हिं. सिहरना)

सिहरी
रोंगटे खड़े होना।
संज्ञा
(हिं. सिहरना)

सिहलाना
ठंढा होना, सिराना।
क्रि.अ.
(सं. शीतल)

सिहलाना
सरदी खा जाना।
क्रि.अ.
(सं. शीतल)

सिहलाना
सरदी पड़ना।
क्रि.अ.
(सं. शीतल)

सिहलावन
ठंढ, सरदी।
संज्ञा
(हिं. सिहलाना)

सिहात
मुदित, मोहित या मुग्ध होता है।
क्रि.अ.
(हिं. सिहाना)
उ.- (क) मनौ मधुर मराल छौना बोलि बैन सिहात-१०−१८४। (ख) हरि प्यारी के मुख तन चितवत मनही मनहु सिहात-१५२१। (ग) परस्पर दोउ करत क्रीड़ा मनहिं मनहिं सिहात-पृ. ३५१ (७६)। (घ) श्रीमुख स्याम कहत यह बानी ऊधौ सुनत सिहात-२९२५।

सिहात
स्पर्द्धा करता है।
क्रि.अ.
(हिं. सिहाना)
उ.- द्वारिका की देखि छबि सुर-असुर सकल सिहात।

सिहाति
लुभाती है, ललचती है।
क्रि.अ.
(हिं. सिहाना)
उ.- सूर प्रभु को निरखि गोपी मनहिं मनहिं सिहाति।

सिहाना
डाह या ईर्ष्या करना।
क्रि.अ.
(सं. ईर्ष्या)

सिहाना
किसी अच्छी वस्तु देखकर इसलिए दुखी होना कि वह या वैसी वस्तु हमारे पास नहीं हैं, स्पर्द्धा करना।
क्रि.अ.
(सं. ईर्ष्या)

सिहाना
लोभ होना, ललचना।
क्रि.अ.
(सं. ईर्ष्या)

सिहाना
मुग्ध, मोहित या मुदित होता।
क्रि.अ.
(सं. ईर्ष्या)

सिहाना
संतुष्ट होना।
क्रि.अ.
(सं. ईर्ष्या)

सिहाना
ईर्ष्या या डाह से देखना।
क्रि.स.

सिहाना
पाने की अभिलाषा करना, ललचना।
क्रि.स.

सिहानौ
मुग्ध या मोहित हुई।
क्रि.अ.
(हिं. सिहाना)
उ.- (क) सूर स्याम मुख निरखि जसोदा मनहीं मन जु सिहानी-१०−२०८। (ख) अति पुलकित गदगद मुख बानी मन-मन महरि सिहानी-१०−२५३। (ग) भोर भए ब्रजधाम चले दोउ मन-मन नारि सिहानी-२०८१। (घ) बीरा खात देखि दोउ बीरा दोउ जननी मुख देखि सीहानी-२३७९।

सिहानो
सिहाना।
क्रि.अ.
(हिं. सिहाना)

सिहारना, सिहारनो
तलाश करना, ढूँढ़ना।
क्रि.अ.
(देश.)

सिहारना, सिहारनो
जुटाना, एकत्र करना।
क्रि.अ.
(देश.)

सिहाहिं
मुग्ध होते हैं।
क्रि.अ.
(हिं. सिहाना)
उ.-पियहिं के गुन गुनत उर में दरस देखि सिहाहिं-पृ. ३३२ (१२)।

सिहिकना, सिहिकनो
(फसल) सूखना।
क्रि.अ.
(देश.)

सिहुँड, सिहेड़, सिहोर
ՙथूहर՚ या सेंहुँड़ का पौधा।
संज्ञा
(सं. सिहुंड)

सोंक
मूँज या सरपत, नारियल आदि के बीच की पतली तीली; ऎसी बहुत सी तीलियों से झाड़, बनाते हैं।
संज्ञा
(सं. इषीका)

सोंक
किसी घास या तृण का महीन डंठल या उसका तिनका।
संज्ञा
(सं. इषीका)
उ.-रोचन भरि लै देत सीक सौ स्रवन निकट अति हीं आतुर की-१०−१८०।
मुहा.- सात सींक बवाइ-शिशु के जन्म के छठे दिन की एक रीति जिसमें सात सींके रखी जाती हैं। उ.-द्वार सथिया देति स्यामा सात सींक बनाइ-१०−२६।

सोंक
नाक का एक गहना, लौंग, कील।
संज्ञा
(सं. इषीका)

सोंका
पेड़ पौधों की बहुत पतली टहनी, डाँड़ी।
संज्ञा
(हिं. सींक)

सोंका
डोरी या धातु की तीलियों का, कुछ रखने के लिए बना छींका।
संज्ञा
(सं. छीका)

सींके, सींकैं
छींके पर।
संज्ञा
(हिं. सींका=छींका )
उ.- कब सीकैं चढ़ि माखन खायौ-१०−२९३।

सींके, सींकैं
छींके को।
संज्ञा
(हिं. सींका=छींका )
उ.- सींके छोरि¨¨¨¨¨ माखन-दधि सब खायौ-१०−३२८।

सोंकिया
सींक जैसा पतला।
वि.
(हिं. सींक)
मुहा.-सींकिया पहलवान-बहुत दुबला-पतला आदमी जिसे अपने बल का घमंड हो।

सींग
खुर वाले कुछ पशुओं के सिर के दोनों ओर निंकले हुए वे कड़े, और नुकीले अवयव जिनसे वे रक्षा या आक्रमण करते हैं, विषाण।
संज्ञा
(सं. श्रृंग)
उ.-(क) माधौ, नैंकु हटकौ गाइ।¨¨¨¨¨। नील खुर अरु अरुन लोचन, सेत सींग सुहाइ-१−५६। (ख) खुर ताँबै, रूपैं पीठि, सोनैं सींग मढ़ीं-१०−२४।
मुहा.-(किसी के) सिर पर सींग होना- (किसी में) दूसरों से बढ़कर कोई बात या विशेषता होना (व्यंग्य)। सींग कटाकर बछड़ों में मिलना-किसी सयाने का बच्चों में मिलना या उनके साथ खेलना (व्यंग्य)। सींग जमना-लड़ने की इच्छा होना। सींग दिखाना या देना - कोई वस्तु न देना और चिढ़ाना, अँगूठा दिखाना। सींग निकलना-(१) चौपाये का जवान होना। (२) किसी किशोर-किशोरी का इतराने लगना। कहीं सींग समाना- कहीं गुजारा या निर्वाह होना, कहीं आश्रय या शरण मिलना। सींग पर मारना-बहुत तुच्छ या नगण्य समझना, कुछ परवाह न करना।

सींग
सींग का बना बाजा जो मूँह से फूँककर बजाया जाता है, सिंगी।
संज्ञा
(सं. श्रृंग)

सींगड़ा
सिंगी बाजा।
संज्ञा
(हिं. सींग)

सींगड़ी
एक तरह की फली जिसकी तरकारी बनती है।
संज्ञा
(देश.)

सींगना, सींगनो
सींग देखकर पश की जाँच-पड़ताल या पहचान करना।
क्रि.स.
(हिं. सींग)

सींगर, सींगरी
एक तरह की फली जिसकी तरकारी बनती है, मोगरे की फली।
संज्ञा
(देश.)
उ.-सेमि सींगरी छमकि झोरईं-२३२१।

सींगी
हिरन के सींग का बना बाजा जो मुँह से (फूँककर) बजाया जाता है।
संज्ञा
(हिं. सींग)
उ.- हृदय सींगी टेर मुरली नैन खप्पर हाथ-३१२६।

सींगी
वह पोला सींग जिससे शरीर का दूषित रक्त खींचा जाता है।
संज्ञा
(हिं. सींग)
मुहा.- सींगी तोड़ना या लगाना-सींगी से दूषित रक्त खींचना।

सींगी
एक तरह की सींगदार मछली।
संज्ञा
(हिं. सींग)

सींच
सींचने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(हिं. सींचना)

सींच
छिड़काव।
संज्ञा
(हिं. सींचना)

सींचत
(खेतों या पेजडों में) पानी देता है।
क्रि.स.
(हिं. सींचना)
उ.- अति अनुराग सुधाकर सींचत दाड़िम बीज समान।

सींचना, सींचनो
(खेतों या पेड़ों में) पानी देना।
क्रि.स.
(सं. सेचन)

सींचना, सींचनो
पानी छिड़ककर तर करना या भिगोना।
क्रि.स.
(सं. सेचन)

सींचना, सींचनो
(पानी आदि) छिड़कना।
क्रि.स.
(सं. सेचन)

सींचिये
(पानी आदि) डालिए या छिड़किए।
क्रि.स.
(हिं. सीचना)
उ.- सूर सुजल सींचिये कृपानिधि निज जन चरन-तटी-९−९८।

सींच्यो, सीच्यौ
(पानी आदि) डाला या छिड़का।
क्रि.स.
(हिं. सींचना)
उ.-भूभृत सीस नमित जो गर्व-गत पावक सींच्यौ नीर-९−२६।

सींब, सींबा
हद, सीमा, मर्यादा।
संज्ञा
(सं. सीमा)
उ.- (क) सकल सुख कीं सींव कोटि मनोज-सोभा हरनि-१०−१०९। (ख) मध्य नायक गोपाल बिराजत सुंदरता की सींवा हो-२४००।

सी
सम, समान, सदृश।
वि.
(हिं. सा)
मुहा.- अपनी सी-(१) अपनी शक्ति भर। उ.- अपनी सी मैं बहुत करी री। (२) अपनी इच्छा के अनुसार।

सी
सिसकारी, शीत्कार।
संज्ञा
(अनु.)

सीअर
ठंढा, शीतल।
वि.
(सं. शीतल)

सीउ, सीऊ
ठंढा, जाड़ा।
संज्ञा
(सं. शीत)

सीक
शीत्कार।
संज्ञा
(अनु.)

सीकचा
लोहे की छड़।
संज्ञा
(फ़ा. सीख)

सीकर
जल-कण।
संज्ञा
(सं.)

सीकर
पसीना, स्वेद-कण।
संज्ञा
(सं.)
उ.- स्रम स्वेद सीकर गुंड मंडित रूप अंबुज कोर।

सीकर
जंजीर, सिकड़ी।
संज्ञा
(सं. श्रृंखला)

सीकल
हथियारों की सफाई।
संज्ञा
(हिं. सिकली)

सीकस
रेतीली या बलुई भूमि।
संज्ञा
(हिं. सिकता)

सीकस
ऊसर या बंजर भूमि।
संज्ञा
(हिं. सिकता)

सीका
सिर का एक गहना।
संज्ञा
(सं. शीर्ष)

सीका
छींका, सिकहर।
संज्ञा
(सं. शिक्या)

सीकी
छोटा छींका।
संज्ञा
(हिं. सीका)

सीकी
छेद।
संज्ञा
(देश.)

सीकी
मुँह, मुँहरा।
संज्ञा
(देश.)

सीकुर
अनाज की बाल के ऊपर निकले हुए बाल जैसे कड़े सूत।
संज्ञा
(सं. शूक)

सीको
छींका, सिकहर।
संज्ञा
(हिं. सीका)

सीको
सिर का एक आभूषण।
संज्ञा

सीख
सिखाने की क्रिया या भाव, शिक्षा
संज्ञा
(सं. शिक्षा, प्रा. सिक्खा)

सीख
वह बात जो सिखायी जाय।
संज्ञा
(सं. शिक्षा, प्रा. सिक्खा)
उ.- अहो नँदरानि, सीख कौन पै लही री-३४८।

सीख
सलाह, मंत्रणा।
संज्ञा
(सं. शिक्षा, प्रा. सिक्खा)
उ.- याकी सीख सुनै ब्रज को रे।

सीख
उपदेश।
संज्ञा
(सं. शिक्षा, प्रा. सिक्खा)

सीख
पतली छड़।
संज्ञा
(फ़ा. सीख)

सीखचा
पतली छड़।
संज्ञा
(हिं. सीख)

सीखत
अभ्यास करते (हैं), सीख रहे (हैं)।
क्रि.स.
(हिं. सीखना)
उ.-मुरली अधर धरन सीखत हैं-५०७।

सीखन
सीखने या सिखाने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(हिं. सीखना)
उ.- तात दुहन सीखन कहयौ मोहिं धौरी गैया-४०९।

सीखन
हित के लए बतायी गयी बात, उपदेश, शिक्षा।
संज्ञा
(हिं. सीखना)

सीखनहार, सीखनहारा, सीखनहारो
सीखनेवाला।
वि.
(हिं. सीखना+हार)

सीखनहारि, सीखनहारी
सीखने की इच्छा रखनेवाली, सीखने को तत्पर।
(हिं.)
(हिं. सीखना+हारी)
उ.- तुमही कहौ इहाँ इतननि महिं सीखनहारी को है-३२३०।

सीखना, सीखनो
जानकारी या ज्ञान प्राप्त करना।
क्रि.स.
(सं. शिक्षण, प्रा. सिक्खण)

सीखना, सीखनो
काम करने का ढंग आदि जानना-समझना।
क्रि.स.
(सं. शिक्षण, प्रा. सिक्खण)

सीखना, सीखनो
कला, विद्या आदि की शिक्षा पाना।
क्रि.स.
(सं. शिक्षण, प्रा. सिक्खण)

सीखी
जानती है।
क्रि.स.
(हिं. सीखना)
उ.- तू मोही को मारन सीखी, दाउहिं कबहुँ न खीझै-१०−२१५।

सीखे
जान या समझ पाए (ह)।
क्रि.स.
(हिं. सीखना)
उ.- अबहिं नैंकु खेलन सीखे हैं-७७४।

सीख्यो, सीख्यौ
जाना या समझा है।
क्रि.स.
(हिं. सीखना)
उ.- सूरदास प्रभु झगरौ सीख्यौ-७३४।

सीगा
साँचा, ढाँचा।
संज्ञा
(अ. सीगा)

सीगा
पेशा, व्यापार।
संज्ञा
(अ. सीगा)

सीगा
महकमा, विभाग।
संज्ञा
(अ. सीगा)

सीज, सीझ
आग या गरमी से पकने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(सं. सिद्ध, प्रा. सिज्झि, हिं. सींझ)

सीजना, सीजनो सीझना, सीझनो
आँच या गरमी से पकना, गलना या चुरना।
क्रि.अ.
(सं. सिद्ध, प्रा. सिज्झिं, हिं. सीझना)

शोहदा
गुंडा, बदमाश, लंपट।
वि.
(अ.)

शोहरत
प्रसिद्धि।
संज्ञा
(अ.)

शोहरत
धूम।
संज्ञा
(अ.)

शोहरा
प्रसिद्धि।
संज्ञा
(अ. शोहरत)

शोहरा
धूम।
संज्ञा
(अ. शोहरत)

शौक
तीव्र चाह या लालसा।
संज्ञा
(अ. शौक)
मुहा.- शौक करना - भोग करना, आनंद लेना। शौक चर्राना या पैदा होना - बहुत चाह या लालसा होना (व्यंग)। शौक पूरा करना या मिटाना - चाह पूरी करना। शौक फरमाना- भोग करना, आनंद लेना। शौक से- सहर्ष, आनंद से।

शौक
लालसा।
संज्ञा
(अ. शौक)

शौक
चस्का।
संज्ञा
(अ. शौक)

शौक
झुकाव।
संज्ञा
(अ. शौक)

शौकत
ठाठ-बाट, शान।
संज्ञा
(अ. शौक़त)

सीजना, सीजनो सीझना, सीझनो
आँच या गरमी का ताव खाकर नरम पड़ना।
क्रि.अ.
(सं. सिद्ध, प्रा. सिज्झिं, हिं. सीझना)

सीजना, सीजनो सीझना, सीझनो
भस्म होना, जलना।
क्रि.अ.
(सं. सिद्ध, प्रा. सिज्झिं, हिं. सीझना)

सीजना, सीजनो सीझना, सीझनो
सूखे हुए चमड़े का किसी घोल में भीगकर मुलायम होना।
क्रि.अ.
(सं. सिद्ध, प्रा. सिज्झिं, हिं. सीझना)

सीजना, सीजनो सीझना, सीझनो
कष्ट या क्लेश सहना।
क्रि.अ.
(सं. सिद्ध, प्रा. सिज्झिं, हिं. सीझना)

सीजना, सीजनो सीझना, सीझनो
तप या तपस्या करना।
क्रि.अ.
(सं. सिद्ध, प्रा. सिज्झिं, हिं. सीझना)

सीझी
पक गयी, चुर गयी।
क्रि.अ.
(हिं. सीझना)

सीटना, सीटनो
बढ़-बढ़कर बातें करना, डींद हाँकना, शेखी मारना।
क्रि.अ.
(अनु.)

सीटी
ओठों को गोलाई में सिकोड़ कर आघात के साथ वायु निकलने से होनेवाला महीन, पर तेज शब्द।
संज्ञा
(सं. शीतृ)
मुहा.- सीटी देना- सीटी देकर कोई संकेत करना।

सीटी
इसी प्रकार का तेज शब्द जो किसी यंत्र या बाजे से निकलंता हो।
संज्ञा
(सं. शीतृ)
मुहा.- सीटी देना- सीटी देकर समय आदि सूचित करना या सावधान करना।

सीटी
वह बाजा जिससे वैसा शब्द निकले।
संज्ञा
(सं. शीतृ)

सीड़
तरी, नमी, सील।
संज्ञा
(सं. शीत)

सीढ़ी
निसेनी।
संज्ञा
(सं. श्रेणी)

सीढ़ी
जीना।
संज्ञा
(सं. श्रेणी)
मुहा.- सीढ़ी चढ़ना- क्रमशः उन्नति करना।

सीढ़ी
क्रमशः उन्नति का क्रम।
संज्ञा
(सं. श्रेणी)

सीत
ठंढा।
वि.
(सं. शीतल)

सीत
सुस्त, कोमा।
वि.
(सं. शीतल)

सीत
सरदी, जाड़ा।
संज्ञा
(सं. शीत)
उ.- (क) सहि सन्मुख तउ सीत-उष्न कौं सोई सुफल करै-१−११७। (ख) सीत-बात-कफ कठ बिरोधै रसना टूटै बात-१−३१३। (ग) सीत-भीत नहिं करति छहौं रितु-७८२। (घ) कत हौ सीत सहति ब्रज सुंदरि-७८७। (ङ) सीत तैं तन कँपत थर-थर-७८९।

सीत
पाला।
संज्ञा
(सं. शीत)
उ.- सकुचत सीत-भीत जलरूह ज्यौं-३५७।

सीत
जाड़े के दिन, जाड़े की ऋतु।
संज्ञा
(सं. शीत)

सीतकर
चंद्रमा।
संज्ञा
(सं. शीत+कर)

सीठ
बिना स्वाद का, फीका।
वि.
(हिं. सीठ)

सीठ
सारहीन वस्तु।
संज्ञा
(हिं. सीठी)

सीठ
फीकी चीज।
संज्ञा
(हिं. सीठी)

सीठना
विवाह आदि मांगलिक अवसरों पर गायी गयी गाली।
संज्ञा
(सं. अशिष्ट, प्रा. असिट्ठ+ना)

सीठनी
विवाह आदि के अवसर पर गायी जानेवाली गाली।
संज्ञा
(हिं. सीठना)

सीठा
फीका, नीरस।
वि.
(सं. शिष्ट, प्रा. सिट्ठ)

सीठापन
फीकापन।
संज्ञा
(हिं. सीठा+पन)

सीठी
किसी वस्तु का, रस या साररहित अंश।
संज्ञा
(सं. शिष्ट, प्रा. सिट्ठ)

सीठी
निस्सार या तत्वहीन वस्तु।
संज्ञा
(सं. शिष्ट, प्रा. सिट्ठ)

सीठी
फीकी या नीरस वस्तु।
संज्ञा
(सं. शिष्ट, प्रा. सिट्ठ)

सीतल
ठंढा, शीतल।
वि.
(सं. शीतल)
उ.- (क) जनु सीतल सौं तप्त सलिल दै सुखित समोइ करे-९−१७१। (ख) अब मोकौं सीतल जल आनौ-३९६। (ग) सीतल सलिल सुगंध पवन-५८९।

सीतल
सुस्त, धीमा।
वि.
(सं. शीतल)

सीतल
शांत।
वि.
(सं. शीतल)
उ.- (क) तऊ सुझाव न सीतल छाँड़ै-१−११७। (ख) चक्र सुदरसन सीतल भयौ-९−५।

सीतल
सुखी, संतुष्ट।
वि.
(सं. शीतल)
उ.- सीतल भयौ मातु कौ हियौ.-४−९।

सीतल
सुखद, सुखदायी।
वि.
(सं. शीतल)
उ.- सेव चरन सरोज सीतल-१−३०७।

सीतलपाटी
एक तरह की बढ़िया चिकनी चटाई।
संज्ञा
(सं. शीतल+हिं. पट)

सीतला
चेचक रोग।
संज्ञा
(सं. शीतला)

सीतला
इस रोग की अधिष्ठात्री देवी।
संज्ञा
(सं. शीतला)

सीता
भूमि जोतते समय हल की फाल से पड़ जाने वालो रेखा, कूँड़।
संज्ञा
(सं.)

सीता
मिथिला के राजा जनक की पुत्री जो श्री रामचन्द्र को ब्याही थी।
संज्ञा
(सं.)
उ.-श्रीरघुनाथ-प्रताप पतिब्रत सीता-सत-नहिं टरई-९−७८।

सीता
एक वर्णवृत्त।
संज्ञा
(सं.)

सीतानाथ, सीतापति
श्री रामचन्द्र।
संज्ञा
(सं.)
उ.- चिंतत चित्त सूर सीतापति मोह-मेरु-दुख टरत न टारत-९−६२।

सीताफल
शरीफा।
संज्ञा
(सं.)

सीताफल
कुम्हड़ा।
संज्ञा
(सं.)

सीतारमण, सीतारवन, सीतारौन
श्रीरामचन्द्र।
संज्ञा
(सं. सीता-रमण)

सीत्कार
सी सी शब्द।
संज्ञा
(सं. शीत्कार)

सीथ
अन्न का दाना।
संज्ञा
(सं. सिक्थ)

सीथ
पके हुए अन्न का दाना।
संज्ञा
(सं. सिक्थ)

सीथ
जूठन।
संज्ञा
(सं. सिक्थ)

सीथिन
जूठन से।
संज्ञा
(हिं. सीथ)
उ.-ऎसैं बसिए ब्रज की बीथिनि। ग्वारनि के पनवारे चुनि-चुनि उदर भरीजै सीथिन-४९०।

सीद
कष्ट, दुख, पीड़ा।
संज्ञा
(सं. शीद)

सीदना, सीदनो
दुख या कष्ट पाना।
क्रि.अ.
(सं. सीदति)

सीदना, सीदनो
नष्ट होना।
क्रि.अ.
(सं. सीदति)

सीदना, सीदनो
दुख देना।
क्रि.स.

सीदना, सीदनो
नष्ट करना।
क्रि.स.

सीध
ठीक सामने की स्थिति या भाव, सीधापन।
संज्ञा
(हिं. सीधा)

सीध
सीधी रेखा या दिशा।
संज्ञा
(हिं. सीधा)

सीध
निशाना, लक्ष्य।
संज्ञा
(हिं. सीधा)
मुहा.- सीध बाँधना-निशाना साधना।

सीधा
जिसमें फेर, घुमाव या टेढ़ापन न हो।
वि.
(सं. शुद्ध)

सीधा
जो ठीक लक्ष्य की ओर हो।
वि.
(सं. शुद्ध)
मुहा.- सीधा करना-(तीर, बन्दूक आदि का) निशाना साधना। सीधा आना- भिड़ जाना।

सीधा
जो कुटिल या कपटी न हो, भोला।
वि.
(सं. शुद्ध)

सीधा
शांत, सुशील, शिष्ट।
वि.
(सं. शुद्ध)

सीधा
सीधा-सादा-भोला-भाला।
यौ.

सीधा
जिसमें ज्यादा तड़क-भड़क न हो।
यौ.
मुहा.-(किसी को) सीधा करना- (१) दंड देकर ठीक करना। (२) अपने अनुकूल करना। सीधा दिन-शुभ दिन या मुहूर्त।

सीधा
आसान, सहज, सुंगम, सुकर।
वि.
(सं. शुद्ध)

सीधा
सीधा-साधा-सुगम और प्रत्यक्ष।
यौ.

सीधा
जो सरलता से समझ में आ सके।
वि.
(सं. शुद्ध)

सीधा
दाहिना, दक्षिण।
वि.
(सं. शुद्ध)

सीधा
ठीक सामने की ओर, सम्मुख।
क्रि.वि.

सीधा
सामने का भाग।
संज्ञा

सीधा
बिना पका हुआ अन्न।
संज्ञा
(सं. असिद्ध)

सीधा
बिना पका हुआ वह अन्न जो दान दिया जाय।
संज्ञा
(सं. असिद्ध)

सीधापन, सीधापना
सिधाई, सरलता, भोलापन।
संज्ञा
(हिं. सीधा+पन)

सीधि
सफलता।
संज्ञा
(सं. सिद्धि)

सीधी
सीधा।
वि.
(हिं. सीधा)
मुहा.- सीधी राह-सुमार्ग, अच्छा आचरण। सीधी सीधी सुनाना - (१) साफ-साफ या खरी बात करना। (२) भला-बुरा कहना। सीधी तरह-नरमी या सज्जनता से।

सीधे
सामने की ओर।
क्रि.वि.
(हिं. सीधा)

सीधे
बिना कहीं रुके या मुड़े।
क्रि.वि.
(हिं. सीधा)

सीधे
बिना और कहीं जाय।
क्रि.वि.
(हिं. सीधा)

सीधे
नरमी या सज्जनता से।
क्रि.वि.
(हिं. सीधा)

सीधे
शांति से।
क्रि.वि.
(हिं. सीधा)

सीना
कपड़े, चमड़े आदि के टुकड़ों को सुई में तागा पिरोकर जोड़ना, टाँका मारना।
क्रि.स.
(सं. सीवन)

सीना
सीना-पिरोना-सिलाई-कढ़ाई का काम।
यौ.

सीना
छाती, वक्षस्थल।
संज्ञा
(फ़ा. सीनः)

सीप
शंख, घोंघे आदि की तरह कड़े आवरण में रहनेवाला एक जल-जंतु, सीपी।
संज्ञा
(सं. शुक्ति, प्रा. सुत्ति)
उ.- उपजि परयौ सिसु कर्म-पुन्य फल समुद्र-सीप ज्यों लाल-१०−१३८।

सीप
सीप नामक जल-जंतु का सफेद, कड़ा और चमकीला आवरण जिससे बटन आदि बनते हैं।
संज्ञा
(सं. शुक्ति, प्रा. सुत्ति)

सीप
ताल के सीप का संपुट जो चम्मच आदि के काम आता है।
संज्ञा
(सं. शुक्ति, प्रा. सुत्ति)

सीप
वह लम्बोतरा पात्र जिसमें देव-पूजा या तर्पण आदि के लिए जल रखा जाता है।
संज्ञा
(सं. शुक्ति, प्रा. सुत्ति)

सीपज
(सीप से उत्पन्न) मोती।
संज्ञा
(हिं. सीप+सं. ज)
उ.- (क) दमकति दूध दँतुलियाँ, मनु सीपज घर कियौ बारिज पर-१०−९३। (ख) सीपज-माल स्याम-उर सोहै-१०−१३९। (ग) की सृक सीपज की बगा-पंगति, की मयूर की पीड़ पखी री-१६२७।

सी-पति
विष्णु।
संज्ञा
(सं. श्रीपति)

सीपर
ढाल।
संज्ञा
(फ़ा. सीपर)

सीप-सुत
मोती।
संज्ञा
(हिं. सीप+सं. सुत)
उ.- परसत आनन मनु रबि कुंडल, अंबुज स्रवत सीप-सुत जोटी-१०−१८७।

सीपिज
मोती।
संज्ञा
(हिं. सीपी+सं. ज)
उ.- दमकति द्वै द्वै दँतुलियौ बिहँसत, मानौ सीपिज (सीपज) घरु क्रियो बारिज पर-१०−९३।

सीपी
ՙसीप՚ नामक जल-जन्तु का आदरण या संपुट।
संज्ञा
(हिं. सीप)

सीबी
अत्यन्त पीड़ा या आनंद के समय मुँह से निकलनेवाली शीत्कार।
संज्ञा
(अनु. सी सी)

सीमंत
स्त्रियों के सिर की माँग।
संज्ञा
(सं.)
उ.- सीस सचिक्कन केस हो बिच सीमंत सँवारि-२०६५।

सीमंत
सीमंतोन्नयन संस्कार।
संज्ञा
(सं.)

सीमंतक
स्त्रियों की माँग निकालने कौ क्रिया।
संज्ञा
(सं.)

सीमंतक
सिंदूर जिससे सौभाग्यवती स्त्रियाँ अपनी माँग भरती हैं।
संज्ञा
(सं.)

सीमंतिनी
स्त्री, नारी।
संज्ञा
(सं.)

सीमंतोन्नयन
हिन्दुओं के दस संस्कारों में तीसरा जिसमें गर्भस्थिति के चौथे, छठे या आठवें महीने में गर्भवती की माँग निकाली जाती है।
संज्ञा
(सं.)

शौकिया
शौक पूरा करने को।
क्रि. वि.
(अ. शौक़िया)

शौकीन
शौक या चाव रखनेवाला।
वि.
(अ. शौक़)

शौकीन
सदा बना-ठना रहनेवाला।
वि.
(अ. शौक)

शौकीनी
शौकीन होने का भाव या काम, रँगीलापन, छैलापन।
संज्ञा
(हिं. शौकीन)

शौच
शुद्धता, पवित्रता।
संज्ञा
(सं.)

शौच
शुद्धता के लिए किये गये दैनिक कर्म।
संज्ञा
(सं.)

शौध
निर्मल, पवित्र।
वि.
(सं. शुद्ध)

शौरसेन
शूरसेन का राज्य जिसका विस्तार आधुनिक व्रजमंडल के लगभग था।
संज्ञा
(सं.)

शौरसेनी
शौरसेन प्रदेश की प्राचीन प्राकृत भाषा।
संज्ञा
(सं.)

शौरसेनी
एक प्राचीन अपभ्रंश भाषा जो मध्यप्रदेश में प्रचलित थी।
संज्ञा
(सं.)

सीय
ठंढा।
वि.
(सं. शीतल)

सीय
शांत।
वि.
(सं. शीतल)

सीयरा
ठंढा।
वि.
(सं. शीतल)

सीयरा
अपरिपक्व।
वि.
(सं. शीतल)

सीर
हल।
संज्ञा
(सं.)

सीर
सूर्य।
संज्ञा
(सं.)

सीर
साझा।
संज्ञा
(सं. सीर=हल )

सीर
साझे में जमिन जोतने-बीने की रीति।
संज्ञा
(सं. सीर=हल )

सीर
वह जमीन जो साझे में जोती-बोयी जाय।
संज्ञा
(सं. सीर=हल )

सीर
वह जमीन जो जमींदार स्वयं जोतता-बोता हो।
संज्ञा
(सं. सीर=हल )

सीर
लगाव, संबंध।
संज्ञा
(सं. सीर=हल )
मुहा.- सीर में रहना-मिल-जुलकर रहना।

सीर
रक्त की नाड़ी।
संज्ञा
(सं. शिरा)
मुहा.-सीर खुलवाना-फसद खुलवाना।

सीर
सिर।
संज्ञा
(हिं. सिर)

सीर
ऊपरी भाग।
संज्ञा
(हिं. सिर)

सीर
ठंढा।
वि.
(सं. शीतल या हिं. सीरा)

सीरक
ठंढा करनेवाला।
वि.
(हिं. सीरा)

सीरक
ठंढक।
संज्ञा
उ.- सोइ करौ जो मिटै हृदय को दाहु परै उर सीरक।

सीरख
चोटी।
संज्ञा
(सं.शीर्ष)

सीरख
कपाल।
संज्ञा
(सं.शीर्ष)

सीरख
माथा, मस्तक।
संज्ञा
(सं.शीर्ष)

सीम
हद, सीमा।
संज्ञा
(सं. सीमा)
मुहा.- सीम काँड़ना या चरना-दूसरे के श्रेत्र में अधिकार जताना।

सीमांत
वह स्थान जहाँ सीमा का अंत होता हो।
संज्ञा
(सं.)

सीमा
किसी प्रदेश या स्थान के विस्तार का अंतिम स्थान, हद।
संज्ञा
(सं.)
मुहा.- सीमा बंद करना-ऎसा प्रबन्ध करना कि देश की सीमा पर से बाहरी आदमियों का और माल का आना-जाना न हो सके।

सीमा
(नियम या मर्यादा की) वह हद जहाँ तक कोई बात या काम करना उचित हो।
संज्ञा
(सं.)
मुहा.-सीमा से बाहर जाना- औचित्य या मर्यादा का उल्लंघन करके कोई काम करना।

सीमाबद्ध
हद (की रेखा) से घिरा या घेरा हुआ।
वि.
(सं.)

सीमोल्लंघन
हद या सीमा को लाँघना या पार करना।
संज्ञा
(सं.)

सीमोल्लंघन
नियम, मार्यदा का औचित्य से बाहर काम करना
संज्ञा
(सं.)

सीय
सीता, जानकी।
संज्ञा
(सं. सीता)
उ.-तोरि धनुष, मुख मोरि नृपति कौ, सीय स्वयंबर कीनौ-९−११५।

सीय
जाड़ा।
संज्ञा
(सं. शीत)

सीय
जाड़े की ऋतु।
संज्ञा
(सं. शीत)

सीरख
सामने का भाग।
संज्ञा
(सं.शीर्ष)

सीरध्वज
राजाजनक।
संज्ञा
(सं.)

सीरध्वज
बलराम।
संज्ञा
(सं.)

सीरनी
मिठाई।
संज्ञा
(फ़ा. शीरनी)

सीरष
सिरा।
संज्ञा
(सं. शीर्ष)

सीरष
सिर।
संज्ञा
(सं. शीर्ष)

सीरष
माथा, मस्तक।
संज्ञा
(सं. शीर्ष)

सीरष
आगे का भाग।
संज्ञा
(सं. शीर्ष)

सीरा
पका कर गाढ़ा किया हुआ शक्कर का घोल या किसी प्रकार का रस, चाशनी।
संज्ञा
(फ़ा. शीरः)

सीरा
गेह़ूँ के आटे की गुड़ की बनी लपसी, हलुआ, मोहनभोग।
संज्ञा
(फ़ा. शीरः)
उ.- (क) सीरा साजौ लेहु ब्रजपती-३९६।

सीला
फसल कटने पर खेत में पड़े रह जानेवाले अनाज के दाने, सिल्ला।
संज्ञा
(सं. शिल)

सीला
खेत में इस प्रकार पड़े रह जोनेवाले दाने बीनकर निर्वाह करने की वृत्ति।
संज्ञा
(सं. शिल)

सीला
राधा की एक सखी का नाम।
संज्ञा
(सं. शीला)
उ.- सुखमा सीला अवधा नंदा बृन्दा जमुना सारि-१५८०।

सीला
गीला, तर, नम।
वि.
(हिं. सील)

सीव
हद, सीमा।
संज्ञा
(सं. सीमा)
उ.- निरखि सखि, सुंतरता की सीव-१३४४।

सीव
महादेव, शंकर।
संज्ञा
(सं. शिव)
उ.-प्रभु तुम्हरे इक रोम-रोम प्रति कोटिक ब्रह्मा सीव-४९२।

सीवक
सिलाई करनेवाला।
संज्ञा
(सं.)

सीवड़ो
(गाँव का) सिवाना।
संज्ञा
(सं. सीमांत)

सीवन
सीने का काम।
संज्ञा
(हिं. सोना)

सीवन
सिलाई का जोड़ या उसके टाँके।
संज्ञा
(हिं. सोना)

सीरा
सिरहाना।
संज्ञा
(हिं. सिर)

सीरा
ठंढा, शीतल।
वि.
(सं. शीतल, प्रा. सीअड़)

सीरा
शांत।
वि.
(सं. शीतल, प्रा. सीअड़)

सीरा
चुप, मौन।
वि.
(सं. शीतल, प्रा. सीअड़)

सीरी
ठंडी, शीतल।
वि.
(हिं. सीरा)
उ.-सीरी पौन अगिनि सी दाहति।

सीरी
ठंढा या शांत करनेवाली, सुखद।
वि.
(हिं. सीरा)
उ.- कछु सीरी कछ ताती बानी कान्हहिं देति दोहाई-२२७५।

सीरे
ठंढा, शीतल।
वि.
(हिं. सीरा)
उ.- नख-सिख लौं तनु जरत निसा-दिन निकसि करत किन सीरे-३१९८।

सीरे
ठंढा या शांत करनेवाले, सुखद।
वि.
(हिं. सीरा)
उ.- समाचार ताते अरु सीरे पाछे जाइ लहै-२७१३।

सील
नमी, तरी।
संज्ञा
(सं. शीतल)

सील
उत्तम स्वभाव या आचरण।
संज्ञा
(सं. शील.)
उ.- (क) कहा कूबरी सील-रूप गुन बस भए स्याम त्रिभंगी-१−२१। (ख) सत्य-सील-संपन्न समूरति-१−६९। (ग) सील संतोष सखा दोउ मेरे-१−१७३।

सीवन
दरार, संधि।
संज्ञा
(हिं. सोना)

सीवना, सीवनो
(कपड़े आदि) सीना।
क्रि.स.
(हिं. सीना)

सीवाँ
हद, सीमा।
संज्ञा
(सं. सीमा)
उ.- सुन्दर त्रयगुन रस की सीवाँ सूर राधिका स्याम-पृ. ३४४ (३१)।

सिष
चेला, शिष्य।
संज्ञा
(सं. शिष्य)

सिष
उपदेश, शिक्षा।
संज्ञा
(हिं. सीख)

सिष
चोटी।
संज्ञा
(सं. शीर्ष)

सिष
सिर, कपाल।
संज्ञा
(सं. शीर्ष)

सिष
मस्तक।
संज्ञा
(सं. शीर्ष)

सिष
सामने का भाग।
संज्ञा
(सं. शीर्ष)

सीस
सिर, माथा, मस्तक।
संज्ञा
(सं. शीर्ष)
उ.- स्वकर काटत सीस-१−१०६।
मुहा.- सीस उतारना- मार डालना। सीस उतारौं-सिर काट कर मार डालूँ। उ.- तबै सूर संधान सफल हौं, रिपु कौ सीस उतारौं-९−१३७। सीस डुलाना-सिर हिलाकर आश्चर्य आदि प्रकट करना। सीस डोलाए-आश्चर्य आदि प्रकाट किया। उ.- जम सुनि सीस डोलाए-१−१२५। सिर ढोरना-अत्यंत मुग्ध या चकित होकर सिर हिलाना। सीस ढोरैं-अत्यंत मुग्ध या चकित होकर सिर हिलाती हैं। उ.-सुनत मुरली की घोरै, सुर बधू सीस ढोरैं-२२८७। चरन पर सीस धरना-अत्यंत विनय, नम्रता या दीनता दिखाना। चरन सीस श्ररि-अत्यंत विनय, नम्रता या दीनता दिखकर। उ.-सूर स्याम कें चरन सीस धरि, अस्तुति करि निजधाम सिधारे-३८५। सीस धुनना-सिर पीटना, सिरपीट कर पछताना या दुखी होना। सीस धुनै सिर पीट कर पछताता या दुखी होता है। उ.- नगन न होति चकित भयौ राजा, सीस धुनै, कर मारै-१−२५७। नमित सीस-विनय, नम्रता या दीनता से झुका हुआ सिर (या व्यक्ति)। उ.-भूभृत सीस नमित जो गर्बगत पावक सींच्यौ नीर−९−२६। सीस फोड़ना या फोरना-कपाल क्रिया करना। सीस फोरि-कपाल-क्रिया करके। उ.- तेई लै खोपरी, बाँस दै सीस फोरि बिखरैहैं-१−८६। चरन तर सीस लुटना या लोटना-अत्यंत विनय, नम्रता या दीनता से चरण पर सिर झुकना। लुटत सीस चरन तर-अत्यंत विनय, नम्रता या दीनता से चरणों पर सीस झुकता है। उ.- लुटत सक्र को सीस चरनतर युग गुन गत समए-९८४।

सीसक
सीसा (धातु)।
संज्ञा
(सं.)

सीसज
सिंदूर।
संज्ञा
(सं.)

सीस-ताज
वह टोपी जो शिकारी जानवरों के नेत्र, मुँह आदि बन्द रखने के लिए चढ़ायी जाती और शिकार के समय खोली जाती है।
संज्ञा
(हिं. सीस+फ़ा. ताज)

सीसत्नान
टोप।
संज्ञा
(सं. शिरस्त्राण)

सीसफूल
सिर पर पहृनने का फूल के आकार का एक गहना।
संज्ञा
(हिं. सीस+फूल)

सीसमहल
वह मकान जिसमें सब ओर शीशें जड़े हों।
संज्ञा
(हिं. शीशा+अ. महल)

सीसा
एक धातु।
संज्ञा
(सं. सीसक)

सीसा
काँच।
संज्ञा
(हिं. शीशा)

सीसा
दर्पण।
संज्ञा
(हिं. शीशा)

सीसी
बहुत पीड़ा या आनंद के समय की गयी शीत्कार।
संज्ञा
(अनु.)

सीसी
जाड़े के कष्ट के कारण निकली हुई ध्वनि।
संज्ञा
(अनु.)

सीसी
शीशी।
संज्ञा
(हिं. शीशी)

सीह
महक, गंध।
संज्ञा
(सं. सीधु)

सीह
साही जंतु, सेही।
संज्ञा
(देश.)

सीह
सिंह।
संज्ञा
(सं. सिंह)

सीहगोस, सीहगोसा
एक जंतु जिसके कान काले होते हैं।
संज्ञा
(फ़ा. सिंपहगोस)

सीहुँड़
थूहर (वृक्ष)।
संज्ञा
(सं.)

सुँ
से।
प्रत्य.
(पुं. हिं. सों)

सुँघनी
तंबाकू की बुकनी।
संज्ञा
(हिं. सूँघना)

सुँघाना, सुँघानो
किसी को सूँघने को प्रवृत्त करना।
क्रि.स.
(हिं. सूँघना)

सुंड
(हाथी की) सूँड़।
संज्ञा
(हिं. सूँड़)

सुंडभुसुंड
(सूँड़ ही जिसका अस्त्र है वह) हाथी।
संज्ञा
(सं. शुंडभुशुंडि)

सुंडा
(हाथी की) सूँड़।
संज्ञा
(हिं. सूँड़)

सुंडाल
हाथी।
संज्ञा
(हिं. सूँड़)

सुंद
एक असुर जो निसुंद का पुत्र और उपंसुद का भाई था। तिलोत्तमा अप्सरा के लिए सुंद और उपसुंद परस्पर लड़ मरे थे।
संज्ञा
(सं.)
उ.- असुर द्वै हुते बलवत भारी। सुंदउपसुंद स्वेच्छा बिहारी-८−११।

सुंदर
रूपवान, मनोहर।
वि.
(सं.)
उ.- (क) सुंदर स्याम-१−९४। (ख) परम सुंदर नैन-१−३०७।

सुंदर
अच्छा, बढ़िया।
वि.
(सं.)

सुंदर
शुभ।
वि.
(सं.)

सुंदरई
सुंदरता।
संज्ञा
(सं. सुंदर+ई)
उ.-रीझे स्याम देखि वा छबि पर रिस मुख सुंदरई-१९७९।

सुंदर-कांड
रामायण का पाँचवाँ कांड जिसका नाम लंका के ՙसुंदर՚ पर्वत के नाम पर है।
संज्ञा
(सं.)

शौर्य
वीरता, शूरता।
संज्ञा
(सं. शौय्य)

शौहर
स्त्री का स्वामी, पति।
संज्ञा
(फ़ा.)

श्मशान
मसान, मरघट।
संज्ञा
(सं.)

श्मशानपति
शिव, महादेव।
संज्ञा
(सं.)

श्मश्रु
दाढ़ी-मूँछ।
संज्ञा
(सं.)

श्याम
श्रीकृष्ण का एक नाम।
संज्ञा
(सं.)

श्याम
काला, साँवला।
वि.

श्याम
नीला।
वि.

श्यामकर्ण
वह घोड़ा जिसका सारा शरीर सफेद और एक कान काला हो।
संज्ञा
(सं.)

श्याम टीका
दिठौना।
संज्ञा
(सं.)

सु
अच्छा।
वि.

सु
श्रेष्ठ।
वि.

सु
शुभ।
वि.

सु
सो, वह।
सर्व.
(सं. स)
उ.- (क) भरि सोवै सुख-नींद मैं तँह सु जाइ जगावै-१−४४। (ख) ज्यौ मृगा कस्तूरि भूलै सुतौ ताके पास-१−७०। (ग) पटपटात टूटत अँग जान्यो, सरन-सरन सु पुकारयौ-५५५।

सु
तृतीया, पंचमी और षष्ठी विभक्तियों का चिह्न।
अव्य.
(सं. सह)

सुअंग
सुंदर अंगवाला।
वि.
(सं. सु+अंग)

सुअटा
तोता, शुक।
संज्ञा
(हिं. सूआ)

सुअनजर्द
पीली जूहो।
संज्ञा
(हिं. सोनजर्व)

सुअना
बेटा, पुत्र।
संज्ञा
(सं. सुत, प्रा. सुअ)

सुअना, सुअनो
उत्पन्न या उदय होना।
क्रि.अ.
(हिं. सुअन ?)

सुंदरता
ՙसुंदर՚ होने का भाव या अवस्था, सौदर्य।
संज्ञा
(सं.)
उ.- (क) देखौ माई सुंदरता कौ सागर-६२८। (ख) मध्य नायक गोपाल बिराजत सुंदरता की सींवा हो-२४००।

सुंदरताई
सुंदरता।
संज्ञा
(सं. सुंदरता+ई)
उ.- (क) कहाँ लौं बरनौं सुंदरताई-१०−१०८। (ख) स्याम भुजनि की सुंदरताई-६४१। (ग) सूरदास कहि कहा बखानै यह निसि यह अँग सुंदरताई-पृ. ३४२−११।

सुंदराई
सुंदरता।
संज्ञा
(सं. सुंदर+हिं. आई)

सुंदरापा
सौंदर्य।
संज्ञा
(सं. सुंदर+हिं. आपा)

सुंदरि, सुंदरी
रूपवती स्त्री।
संज्ञा
(सं. सुंदरी)
उ.- (क) जा जल-सुद्ध निरखि सन्मुख ह्वै, सुंदरि सरसिज-नैनी-९−११। (ख) ज्यौं सहगमन सुंदरी कै सँग बहु बाजन हैं बाजत-९−१३२। (ग) इत सुंदरी बिचित्र उतहिं घनस्याम सलोना-११३२।

सुंदरि, सुंदरी
सवैया छंद का एक भेद।
संज्ञा
(सं. सुंदरी)

सुंदरि, सुंदरी
एक वर्णवृत।
संज्ञा
(सं. सुंदरी)

सुंबा
छेद करने का औजार।
संज्ञा
(देश.)

सुंभ
एक दैत्य जिसे दुर्गा ने मारा था।
संज्ञा
(सं. शुंभ)

सु
ՙसुंदर या श्रेष्ठ՚ का वाचक एक उपसर्ग।
उप
(सं.)

सुआना, सुआनो
सुलाना।
क्रि.स.
(हिं. सुलाना)

सुआना, सुआनो
उत्पन्न करना।
क्रि.स.
(हिं. सूना)

सुआमी
प्रभु।
संज्ञा
(सं. स्वामी)

सुआमी
पति।
संज्ञा
(सं. स्वामी)

सुआर
रसोइया।
संज्ञा
(सं. सूपकार)

सुआरव
मीठी वाणी बोलनेवाला।
वि.
(सं.)

सुआरव
मीठे स्वर से बजानेवाला।
वि.
(सं.)

सुआसन
(बैठने का) सुन्दर आसन।
संज्ञा
(सं.)

सुआसिन, सुआसिनि, सुआसिनी
(आस-पास या साथ रहनेवाली) सहचरी।
संज्ञा
(सं. सुआसिनी)

सुआसिन, सुआसिनि, सुआसिनी
सुहागिन या सधवा स्त्री।
संज्ञा
(सं. सुआसिनी)

सुअना, सुअनो
उगना।
क्रि.अ.
(हिं. सुअन ?)

सुअना, सुअनो
तोता, शुक।
संज्ञा
(हिं. सूआ)

सुअर
एक प्रसिद्ध जंतु।
संज्ञा
(सं. शूकर)

सुअरदंता
सुअर जैसे दाँत वाला।
वि.
(हिं. सुअर+दंता)

सुअवसर
अच्छा समय या मौका।
संज्ञा
(सं.)

सुआ
तोता, शुक।
संज्ञा
(हिं. सूआ)

सुआ
बड़ी और मोटी सुई, सूजा।
संज्ञा
(हिं. सूआ)

सुआद
स्वाद।
संज्ञा
(सं. स्वाद)

सुआद
याद, स्मरण करना।
संज्ञा
(ङि)

सुआन
कुत्ता।
संज्ञा
(सं. श्वान)

सुआहित
तलवार चलाने के बत्तीस ढंगों में एक।
संज्ञा
(सं. सु+आहत ?)

सुई
धागा पिरो कर कपड़ा सीने का बहुत छोटा उपकरण, सूची।
संज्ञा
(सं. सूची)

सुई
सूई की तरह का तार या काँटा।
संज्ञा
(सं. सूची)
मुहा.- सुई का फावड़ा या भाला बनाना- जरा सी बात को बहुत बड़ा कर देना, बात का बतंगड़ कर देना। आँख की सुई (या सुइयाँ) निकलना-किसी कठिन काम को समाप्तप्राय देखकर और शेषांश पूरा करके सारा श्रेय प्राप्त करने का प्रयत्न करना।

सुई
पौधे का छोटा, पतला अंकुर।
संज्ञा
(सं. सूची)

सुकंठ
जिसकी गरदन या कंठ सुंदर हो।
वि.
(सं.)

सुकंठ
जिसका स्वर मधुर हो।
वि.
(सं.)
उ.-चारौ बेद पढ़त मुख आगर अति सुकंठ सुर गावन-८−११।

सुकंठ
सुग्रीव।
संज्ञा
(सं.)

सुक
तोता, कीर।
संज्ञा
(सं. शुक)
उ.- (क) गनिका किए कौन ब्रत संजम सुक-हित नाम पढ़ावै-१−१२२। (ख) ज्यौं सुक सेमर आस लगि-१−३२६। (ग) नासिका सुक नयन खंजन-१२९४।

सुक
शुकदेव मुनि।
संज्ञा
(सं. शुक)
उ.- ब्रह्म-सिव-सेस-सुक-सनक ध्यायौ-११९।

सुक
एक राक्षस जो रावण का दूत था।
संज्ञा
(सं. शुक)
उ.- सुक-सारन द्वै दूत पठाए-१−१२०।

सुकचाना, सुकचानो
संकोच करना, हिचकिचाना।
क्रि.अ.
(हिं. सकुचाना)

सुकचाना, सुकचानो
लजाना।
क्रि.अ.
(हिं. सकुचाना)

सुकटि
जिसकी कमर सुंदर हो।
वि.
(सं.)

सुकड़ना, सुकड़नो
सिकुड़ना।
क्रि.अ.
(हिं. सिकुड़ना)

सुकदेव
व्यासपुत्र शुकदेव मुनि।
संज्ञा
(सं. शुकदेव)
उ.-सुकदेव हरि-चरननि सिर नाइ, राजा सों बोल्यौ या भाइ-३−१।

सुकनासा
जिस स्त्री की नाक तोते की चोंच जैसी सुंदर हो।
वि.
(सं. शुक + नासिका)

सुकन्या
राजा शर्याति की पुत्री जो च्यवन ऋषि को ब्याही थी।
संज्ञा
(सं.)

सुकबि
श्रेष्ठ कवि।
संज्ञा
(सं. ,कवि)
उ.- या छविं की पटतर दीबे कौं सुकवि कहा टकटोहै-१०−१५८।

सुकर
सहज में या अनायास किया जानेवाला (कार्य), सुगम।
वि.
(सं.)

सुकर
सुंदर हाथ।
संज्ञा
(सं. सु+कर)
उ.- अंसु सलिल बूड़त सब गोकुल सूर सुकंर गहि लीजै-३४५४।

सुकरता
ՙसुकर՚ या सहज में होने का भाव, सुगमता, सुभीता।
संज्ञा
(सं.)

सुकरता
सुंदरता।
संज्ञा
(सं.)

सुकराना
धन्यवाद।
संज्ञा
(हिं. शुकराना)

सुकराना
काम करनेवाले को धन्यवाद रूप में दिया जानेवाला धन।
संज्ञा
(हिं. शुकराना)

सुकरित
भला, शुभ।
वि.
(हिं. सुकृत)

सुकरित
भला या शुभ कार्य करनेवाला।
वि.
(हिं. सुकृत)

सुकरित
भाग्यवान।
वि.
(हिं. सुकृत)

सुकरित
धर्मशील।
वि.
(हिं. सुकृत)

सुकरित
पुण्य।
संज्ञा

सुकरित
सत्कर्म
संज्ञा

सुकर्म
अच्छा काम।
संज्ञा
(सं.)

सुकर्मा
अच्छा काम करनेवाला।
वि.
(सं. सुकर्म्मन्)
उ.- आपुन भए सुकर्मा भारि।

सुकर्मी
अच्छा काम करनेवाला।
वि.
(सं. सुकर्म्मिन्)

सुकर्मी
पुण्यात्मा।
वि.
(सं. सुकर्म्मिन्)

सुकर्मी
सदाचारी।
वि.
(सं. सुकर्म्मिन्)

सुकल
शुक्ल (पक्ष)।
संज्ञा
(सं. शुक्ल)

सुकवना, सुकवनो
चकित होना।
क्रि.अ.
(देश.)

सुकवाना, सुकवानो
चकित करना।
क्रि.स.
(देश.)

सुकवाना, सुकवानो
चकित होना, अचंभे में होना।
क्रि.अ.

सुकवाना, सुकवानो
सुखाने को प्रवृत्त करना।
क्रि.स.
(हिं. सुखवाना)

सुकवि
श्रेष्ठ कवि।
संज्ञा
(सं.)

सुकांड
जिसकी डाल या शाखा सुंदर हो।
वि.
(सं.)

सुकांडी
भौरा, भ्रमर।
संज्ञा
(सं. सुकांडिन्)

सुकाग
कौवा जिसने सगुन सूचित करके सत्कार्य किया हो।
संज्ञा
(सं. सु+ हिं. काग)
उ.- इतनी कहत सुकाग उहाँ तैं हरी डार उड़ि बैठयौ-९−१६४।

सुकाज
उत्तम कार्य।
संज्ञा
(सं. सु+ हिं. काज)

सुकातिज
मोती।
संज्ञा
(सं. शुक्तिज)

सुकाना, सुकानो
(धूप या गरमी से) गीलापन दूर करना।
क्रि.स.
(हिं. सुखना)

सुकाना, सुकानो
गीलापन दूर करने के लिए धूप आदि में डालना।
क्रि.स.
(हिं. सुखना)

सुकाना, सुकानो
दुर्बल बनाना।
क्रि.स.
(हिं. सुखना)

सुकाना, सुकानो
दुर्बल होना, सूख जाना।
क्रि.अ.

सुकाल
अच्छा या सुख का समय।
संज्ञा
(सं.)

सुकाल
अन्न की उपज के विचार से सस्ती का समय।
संज्ञा
(सं.)

सुकावना, सुकावनो
सुखाना।
क्रि.स.
(हिं. सुखाना)

सुकिज
उत्तम या शुभ कार्य।
संज्ञा
(सं. सुकृत)

सुकिया
वह स्त्री जो केवल अपने पति से ही प्रेम करती हो।
संज्ञा
(सं. स्वकीया)

सुकी
तोते की मादा।
संज्ञा
(सं. शुक)

सुकीउ
वह स्त्री जो केवल अपने पति से ही प्रेम करती हो।
संज्ञा
(सं. स्वकीया)

सुकआर
जिसके ՙअंग՚ बहुत कोमल हों।
वि.
(सं. सुकुमार)
उ.- उन दिननि सुकुआर हते हरि।

सुकुति
सीप।
संज्ञा
(सं. शुक्ति)

सुकुमार
जिसके अंग बहुत कोमल हों।
वि.
(सं.)
उ.-भयौ सुरुचि तैं उत्तम क्वार, अरु सुनीति कैं ध्रुव सुकुमार-४−९।

श्यामा
काले रंग की गाय।
संज्ञा
(सं.)

श्यामा
रात, रात्रि।
संज्ञा
(सं.)

श्यामा
एक पक्षी।
संज्ञा
(सं.)

श्यामा
काले या श्याम वर्णवाली।
वि.

श्याल
साला।
संज्ञा
(सं.)

श्याल
बहनोई।
संज्ञा
(सं.)

श्याल
सियार, गीदड़।
संज्ञा
(सं. श्रृगाल)
उ.-रोवैं वृषभ तुरग अरु नाग। स्याल (स्यार) दिवस, निसि बोलैं काग-१-२८६।

श्येन
बाज या शिकरा पक्षी।
संज्ञा
(सं.)

श्रद्धांजलि
अंजुलि में फूल लेकर श्रद्धा से चढ़ाना।
संज्ञा
(सं. श्रद्धा + अंजलि)

श्रद्धांजलि
श्रद्धा-भाव-सूचक कार्य, कृति या आयोजन।
संज्ञा
(सं. श्रद्धा + अंजलि)

सुकुमार
कोमल अंग का बालक।
संज्ञा

सुकुमार
कोमल अक्षरों या शब्दों से युक्त काव्य।
संज्ञा

सुकुमारता
कोमलता।
संज्ञा
(सं.)

सुकुमारि, सुकुमारी
कोमल अंगों-वाली (स्त्री)।
वि.
(सं. सुकुमारी)
उ.- (क) सत्यवती मच्छोदरि नारी। गंगा तट ठाढ़ी सुकुमारी-१−२२९। (ख) प्रातहीं उठि चलीं सब मिलि जमुन-तट सुकुमारि-७७७।

सुकुरना, सुकुरनो
संकुचित होना।
क्रि.अ.
(हिं. सिकुड़ना)

सुकुल
उत्तम कुल या वंश।
संज्ञा
(सं.)

सुकुल
उत्तम कुल या वंश में जन्मा व्यक्ति।
संज्ञा
(सं.)

सुकुल
शुक्ल पक्ष।
संज्ञा
(सं. शुक्ल)

सुकुल
सफेद, उजला, उज्ज्वल।
वि.

सुकुलता
कुलीनता।
संज्ञा
(सं.)

सुकेतु
ताड़का के पिता का नाम।
संज्ञा
(सं.)

सुकेश
जिसके बाल सुन्दर हों।
वि.
(सं.)

सुकेशि
एक प्रसिद्ध राक्षस जो माल्यवान, सुमाली और मली का पिता था।
संज्ञा
(सं.)

सुकेशी
उत्तम केशोंवाली।
वि.
(सं.)

सुकोमल
बहुक मुलायम या सुकुमार।
वि.
(सं. सु+कोमल)
उ.- माखन सहित देहि मेरी मैया सुपक सुकेमल रोटी-१०−१६३।

सुक्की
अपना, निज।
वि.
(सं. स्वकीय)

सुक्की
तोते की मादा, तोती।
संज्ञा
(सं. शुक)

सुक्ख
आराम, आनंद।
संज्ञा
(सं. सुख)

सुक्र
सौर गृह का एक प्रसिद्ध गृह जो दैत्यों का गुरु माना गया है।
संज्ञा
(सं. शुक)
उ.- (क) छठऎं सुक्र तुला के सनि जुत सत्रु रहन नहिं पैहैं-१०−८६। (ख) मानहुँ गुरु-सनि-सुक्र एक ह्वै लाल-भाल पर सोहै री-१०−१३९। (ग) सुक्र उदय होन लाग्यौ-२०४६।

सुक्रतु
सत्कर्म करनेवाला।
वि.
(सं.)

सुकुवाँर, सुकुवार
कोमल।
वि.
(सं. सुकुमार)

सुकृत
उत्तम और शुभ कार्य करनेवाला।
वि.
(सं. सुकृत्)

सुकृत
धार्मिक, पुण्यवान।
वि.
(सं. सुकृत्)

सुकृत
सत्कार्य, पुण्य।
संज्ञा
(सं.)
उ.- (क) जिहिं सर सुभग मुक्ति-मुक्ताफल सुकृत-अमृत रस पीजै-−१−३३७। (ख) इक मन अरु ज्ञानेंद्री पाँच¨¨¨¨¨। ज्यौं मग चलत चोर धन हरैं। त्यौं ये सुकृत-धनहिं परिहरैं-५−४। (ग) बदत बिरंचि बिसेष सुकृत ब्रज बासिन के-४८७।
मुहा.- सुकृत मनाना-अपने पुण्यों का मन ही मन स्मरण करना जिससे संकट से रक्षा हो।

सुकृत
भाग्यवान, भाग्यशाली।
वि.

सुकृति
पुण्य, सत्कर्म।
संज्ञा
(सं.)

सुकृति
पुण्यात्मा, सत्कर्मी।
वि.
(हिं. सुकृती)
उ.-सुनहु सूर नृप पास जाति हैं बीच सुकृति अति दरस दियो-२६३३।

सुकृती
सत्कर्मी, पुण्यात्मा।
वि.
(सं. सुकृतिन्)
उ.-सुकृती सुचि सेवकजन काहि न जिय भावै-१-१२४।

सुकृती
भाग्यवान।
वि.
(सं. सुकृतिन्)

सुकृत्य
सत्कर्म, पुण्य।
संज्ञा
(सं.)

सुक्रित
सत्कर्म, पुण्य।
संज्ञा
(सं.सुकृत)
उ.- (क) परम भाग्य सुक्रित के फल तैं सुंदर देह धरी-१−७१। (ख) तस्कर ज्यौं सुक्रित-धन लेहिं-५−४।

सुक्ल
उजला, सफेद।
वि.
(सं. शुक्ल)

सुक्ल
शुक्ल पक्ष।
संज्ञा

सुक्षम
बहुत छोटा, थोड़ा या पतला।
वि.
(सं. सूक्ष्म)

सुखंड़ी
बहुत दुबला-पतला।
वि.
(हिं. सूखना)

सुखंद, सुखंदा
आनंददायक।
वि.
(सं. सूखद)

सुख
वह अनुकूल और प्रिय अनुभूति जिसकी सबको अभिलाषा रहती है, आराम।
संज्ञा
(सं.)
मुहा.- सुख मानना- (१) हरी-भरी अवस्था में रहना। (२) संतुष्ट या प्रसन्न रहना। सुख में सुख-सौभाग्य के दिनों से। उ.- सुख में आइ सबै मिलि बैठत रहत चहूँ दिसि घेरे-१−७९। सुख भोगना या लूटना-खूब मौज करना। सुख की नींद सोना-सब तरह से निश्चिंत रहना।

सुख
स्वस्थता, आरोग्य।
संज्ञा
(सं.)

सुख
स्वर्ग।
संज्ञा
(सं.)

सुख
पानी।
संज्ञा
(सं.)

सुख
सवैया छंद का एक भेद।
संज्ञा
(सं.)

सुख-आसन
पालकी, सुखपाल।
संज्ञा
(सं. सुख+आसन)
उ.- चढ़ि सुख-आसन नृपति सिधायौ-५, ४।

सुखकंद, सुखकंदन
सुख या आनंद देनेवाला।
वि.
(सं. सुख+हिं. कंद)

सुखकंदर
सुख का घर।
वि.
(सं. सुख+कंदरा)

सुखक
सूखा, शुष्क।
वि.
(हिं. सूखा)

सुखकर
सुख देनेवाला।
वि.
(सं.)

सुखकर
जो सुख से या सहज ही किया जा सके।
वि.
(सं.)

सुखकर
जिसका हाथ हलका हो।
वि.
(सं.)

सुखकरण, सुखकरन
सुख देनेवाला।
वि.
(सं. सुखकरण)
उ.- दुहूँ लोक सुखकरन हरन-दुख बेद-पुरा-ननी साखि-१−९०।

सुखकारक
सुख देनेवाला।
वि.
(सं.)

सुखदनियाँ
सुख देनेवाला।
वि.
(सं. सुख+हिं. देना)
उ.- अंग-अंग सुभग सकल सुखदनियाँ-१०−१०६।

सुखदा
सुख देनेवाली।
वि.
(सं.)

सुखदाइ
सुख देनेवाला।
वि.
(हिं. सुखदायी)
उ.- (क) सब के ईस परम करुनामय सबहीं कौं सुखदाइ-९−१३४। (ख) सूरस्याम ब्रज-लोग कौं जहँ तहँ सुखदाइ-५८९।

सुखदाइन, सुखदाइनि, सुखदाइनी
सुख देनेवाली।
वि.
(सं. सुखदायिनी)

सुखदाई
सुख देनेवाली (वाला)।
वि.
(हिं. सुखदायी)
उ.- (क) कर जोरे बिनती करौं दुरबल-सुखदाइ-१−२३८। (ख) दारा सुत-देह-गेह-संपति सुखदाइ-१−३३०।

सुखदात, सुखदाता
सुख या आनंद देनेवाला।
वि.
(सं.सुखदातृ, हिं. सुखदाता)

सुखदान, सुखदानि
सुख देनेवाला, सुखद।
वि.
(सं.सुख+हिं. देना)

सुखदान, सुखदानि
प्रियतम, पति।
संज्ञा

सुखदानी
सुख देनेवाला (वाली)।
वि.
(सं.सुख+हिं. देना)
उ.- (क) ऎसे प्रभु सुखदानी-१−११२। (ख) धनि त्रिय तुमको जो सुखदानी संगम जागत रैनि बिहानी-१९६७।

सुखदायक
सुख देनेवाला।
वि.
(सं.)
उ.- (क) सुमिरन कथा सदा सुखदायक-१−८३। (ख) सकल लोक नायक सुखदायक-१०−४। (ग) सूर स्याम संतनि सुखदायक-६०७।

सुखकारी
सुख देनेवाला।
वि.
(सं. सुखकारिन्)
उ.- (क) सूर स्याम सेवक-सुखकारी-१−३०। (ख) माता हेत जनहिं सुखकारी।¨¨¨¨¨¨। ऎसे हरि जनक सुखकारी-३९१।

सुखकारो
सुख देनेवाला।
वि.
(सं. सुखकर)
उ.- बसीबट तट रास रच्थौ है सब गोपिनि सुखकारी-पृ. ३५१ (७०)।

सुखजनक
सुखदायक।
वि.
(सं.)

सुखजननि, सुखजननी
सुख देने या उपजानेवाली।
संज्ञा
(सं. सुखजननी)

सुखजीवी
सुख-सुविधा से जीवन बिताने की चेष्टा करने या इच्छा रखनेवाला।
वि.
(सं. सुख+जीविन्)

सुखज्ञ
सुख का अनुभवी।
वि.
(सं. सुख+ज्ञ)

सुखढरन
सुखदायक।
वि.
(सं. सुख+हिं. ढालना)

सुख-थर
सुखदायी स्थान।
संज्ञा
(सं. सुख+स्थल)

सुखद
सुख देनेवाला, सुखदायी।
वि.
(सं.)

सुखद
सुख के साथ।
क्रि.वि.
उ.- इहिं वृन्दावन इहिं जमुना-तट ये सुरभी अति सुखद चरावत-४४९।

सुखदायिनि, सुखदायिनी
सुख देनेवाली, सुखदा।
वि.
(सं. सुखदायिनी)

सुखदायी
सुखद।
वि.
(सं. सुखदायिन्)

सुखदायो, सुखदायौ
सुख देनेवाला।
वि.
(हिं. सुखदायी)
उ.- तैसी हंस-सुता पवित्र तट तैसोई कल्पबृच्छ सुखदायो।

सुखदाव
सुखद।
वि.
(हिं. सुखदायी)

सुखदेन, सुखदैनी
सुखद।
वि.
(सं. सुख+देना)

सुखदेनी, सुखदैनी
सुख या आनंद देनेवाली, सुखदायिनी।
वि.
(हिं. सुख+देना)

सुख-धाम
सुख का स्थान या भवन।
संज्ञा
(सं.)

सुख-धाम
वह जो बहुत सुख देनेवाला या सुखदायी हो।
संज्ञा
(सं.)

सुख-धाम
बैकुंठ, स्वर्ग।
संज्ञा
(सं.)
उ.- (क) छाँड़ि सुख-धाम अरु गरुन तजि साँवरौ पवन के गवन तैं अधिक धायौ-१−५। (ख) सुनियत है तुम बहुपतितनि कौं दीन्हौ है सुखधाम-१−१७९।

सुखनिधान
अत्यंत सुखदायिनी।
वि.
(सं. सुख+निधान)
उ.- जद्दपि सुख-निधान द्वारावति तौउ मन कहुँ न रहाहीं-१० उ.−१०३।

सुख-रात्रि
दिवाली की रात।
संज्ञा
(सं.)

सुखरास, सुखरासि, सुखरासी
जो सर्वथा सुखमय हो।
वि.
(सं. सुख+राशि)
उ.- (क) सो बारिज सुख-रास-१−३३९। (ख) मीत हमारे परम मनोहर कमलनयन सुखरासी-३३१४।

सुखलाना, सुखलानो
सुखाना।
क्रि.स.
(हिं. सुखीन)

सुखवंत, सुखवंता
सुखी, प्रसन्न।
वि.
(सं. सुखवत्)

सुखवंत, सुखवंता
सुख देनेवाला, सुखद।
वि.
(सं. सुखवत्)

सुखवत
सुखाता है।
क्रि.स.
(हिं. सुखवना, सुखाना)
उ.- (क) सोभित सिथिल बसन मनमोहन सुखवत स्रम के पागे-६८६। (ख) मुख के पवन परस्पर सुखवत गहे पानि पिय जारो-२२७५।

सुखवन
किसी चीज के सूखने पर हो जानेवाली छीज या कमी।
संज्ञा
(हिं. सूखना)

सुखवन
स्याही सुखाने की बालू।
संज्ञा

सुखवना, सुखवनो
सुखाना।
क्रि.स.
(हिं. सुखाना)

सुखवा
सुख, आनंद।
संज्ञा
(हिं. सुख)

सुखनिधान
समस्त सुखों के आकर।
वि.
(सं. सुख+निधान)
उ.- मनसा नाथ मनोरथ पूरन सुख-निधान जाकी मौज घनी-१−३९।

सुख-पाल
ऐसी पालकी जिसका ऊपरी भाग शिवालय के शिखर-सा हो।
संज्ञा
(सं. सुख+पाल)
उ.- तजि सुख-पाल रहयौ गहि पाइ-५−४।

सुख-पुरी
स्वर्ग, बैकुंठ।
संज्ञा
(सं. सुख+पुरी)

सुखपूर्वक
सुख से।
क्रि.वि.
(सं.)

सुखप्रद
सुख देनेवाला।
वि.
(सं.)

सुखमन
‘सुषुम्ना’ नाड़ी।
संज्ञा
(सं. सुषुम्ना)

सुखमा
शोभा, छवि।
संज्ञा
(सं. सुषमा)

सुखमा
राधा की सखी एक गोपी।
संज्ञा
(सं. सुषमा)
उ.- (क) कहि राधा किन हार चुरायो। ¨¨¨¨। सुखमा सीला अवधा नंदा बृन्दा जमुना सारि-१५८०। (ख) गुखमा पहल द्वार ही ठाढ़ी-२०८१।

सुखमानी
हर अवस्था या स्थिति में सुखी रहनेवाला।
वि.
(सं. सुखमानिन्)

सुख-मुख
सुंदर बातें करनेवाला।
वि.
(सं.)

श्रद्धा
बड़ों के प्रति आदर या पूज्य भाव।
संज्ञा
(सं.)

श्रद्धा
भक्ति आस्था।
संज्ञा
(सं.)

श्रद्धालु
श्रद्धा रखनेवाला।
वि.
(सं.)

श्रद्धेय
श्रद्धा करने के योग्य, श्रद्धा-पात्र।
वि.
(सं.)

श्रम
मेहनत, परिश्रम, उद्यम।
संज्ञा
(सं.)
उ.- दूरि तीर्थन श्रम करि जाहिं।

श्रम
थकावट।
संज्ञा
(सं.)
उ.- आज कहा उद्यम करि आए। कहै वृथा भ्रमि त्रमि श्रम (स्त्रम) पाए-४-१२।

श्रम
एक संचारी भाव।
संज्ञा
(सं.)

श्रम
क्लेश, दुख।
संज्ञा
(सं.)

श्रम
दौड़-धूप।
संज्ञा
(सं.)

श्रम
प्रयास।
संज्ञा
(सं.)

सुखवादी
भोग विलास में ही जीवन का सुख समझनेवाला, विलासी।
वि.
(सं. सुख+वादिन्)

सुखवार
सुखी, प्रसन्न।
वि.
(सं. सुख+हिं. वार)

सुखवार
सुख से ही रहने का अभ्यस्त।
वि.
(सं. सुख+हिं. वार)

सुखवास
सुख का स्थान।
संज्ञा
(सं.)

सुख-सार
सुख निधान।
संज्ञा
(सं. सुख+सागर)
उ.- सूरदास स्वामी सुख-सागर-१०−१०२।

सुखसाध्य
जो सुख से किया जा सके।
वि.
(सं.)

सुख-सार
मोक्ष, मुक्ति।
संज्ञा
(सं.)

सुख-सेज, सुख-सेज्या
वह शैया जो बहुत सुखदायिनी हो।
संज्ञा
(सं. सुख+शैय्या)
उ.- कमल-नैन पोढ़े सुख-सेज्या-२−२६८।

सुख-स्वप्न
भावी सुख या सिद्धि संबंधी कोई सुखद योजना या कल्पना।
संज्ञा
(सं.)

सुखांत
जिसका अंत या परिणाम सुखकर हो।
वि.
(सं.)

सुखाना
अच्छा या भला लगना।
क्रि.अ.
(हिं. सुख)

सुखाना
अनुकूल या सहज होना।
क्रि.अ.
(हिं. सुख)

सुखानी
रोग, चिंता आदि से दुर्बल हो गयी।
क्रि.अ.
(हिं. सुख)
उ.- तज्यौ मूल साखा से पत्रनि सोच सुखानी देहु-२३४३।

सुखानो
सुखाना।
क्रि.स., अ
(हिं. सुखाना)

सुखान्यो, सुखान्यौ
दुर्बल हो गया।
क्रि.अ.
(हिं. सूखना)
उ.- तनु तप तेज सुखान्यौ-३१२७।

सुखारा
सुखी, प्रसन्न।
वि.
(सं. सुख+हिं. आरा)

सुखारा
सुख देनेवाला, सुखद।
वि.
(सं. सुख+हिं. आरा)

सुखारा
सुख से होनेवाला।
वि.
(सं. सुख+हिं. आरा)

सुखारि, सुखारी
सुखी, प्रसन्न।
वि.
(हिं. सुखारा)
उ.- मुयौ असुर सुर भये सुखारी-७−२।

सुखारो
सुखी, प्रसन्न।
वि.
(हिं. सुखारा)

सुखांत
जिस (काव्य, नाटक या कथा) के अंत में सुखपूर्ण घटना, जैसे संयोग, अभीष्ट सिद्धि, आदि हो।
वि.
(सं.)

सुखाधार
जिस पर सुख निर्भर हो।
वि.
(सं.)

सुखाधार
स्वर्ग।
संज्ञा

सुखाना
किसी गीली चीज को धूप या हवा में अथवा आग के पास इस प्रकार रखना कि उसकी नमी या आर्द्रता दूर हो जाय।
क्रि.स.
(हिं. सूखना)

सुखाना
नमी या आर्द्रता दूर करना।
क्रि.स.
(हिं. सूखना)

सुखाना
दुर्बल बनाना।
क्रि.स.
(हिं. सूखना)

सुखाना
नमी या आर्द्रता न रह जाना।
क्रि.अ.
(हिं. सूखना)

सुखाना
जल न रहना या कम हो जाना।
क्रि.अ.
(हिं. सूखना)

सुखाना
रोग, चिंता आदि से दुर्बल हो जाना।
क्रि.अ.
(हिं. सूखना)

सुखाना
भय से सन्न होना।
क्रि.अ.
(हिं. सूखना)

सुखारो
सुखद।
वि.
(हिं. सुखारा)

सुखारो
सहज, सुगम।
वि.
(हिं. सुखारा)

सुखार्थी
सुख चाहनेवाला।
वि.
(सं. सुखार्थिन्)

सुखार्थी
सुख में ही रमा रहनेवाला, विलासी।
वि.
(सं. सुखार्थिन्)

सुखाला, सुखाली
सुख या आनंददायक।
वि.
(सं. सुखर+हिं. आला)

सुखाला, सुखाली
सहज, सुगम।
वि.
(सं. सुखर+हिं. आला)

सुखावह
सुखद।
वि.
(सं.)

सुखावह
सहज।
वि.
(सं.)

सुखाश
जिसे सुख की आशा हो।
वि.
(सं.)

सुखाशा
आनंद की आशा।
संज्ञा
(सं.)

सुखाश्रय
जिस पर सुख निर्भर हो।
वि.
(सं.)

सुखासन
आसन जिस पर बैठने में सुख मिले।
संज्ञा
(सं.)

सुखासन
पालकी।
संज्ञा
(सं.)

सुखिआ
प्रसन्न, आनंदित।
वि.
(हिं. सुखी)

सुखिरा
सुखी, प्रसन्न।
वि.
(हिं. सुखी)

सुखिरा
सुख देनेवाला, सुखद।
वि.
(हिं. सुखी)
उ.- जनु सीतल सौं तप्त सुलिल दै सुखित समोइ करे-९−१७१।

सुखिरा
सूखा हुआ, शुष्क।
वि.
(हिं. सूखना)

सुखिता
सुखी होने का भाव।
संज्ञा
(सं.)

सुखिता
सुख, आनंद।
संज्ञा
(सं.)

सुखिया
प्रसन्न, आनंदित।
वि.
(हिं. सुखी)

सुखिर
साँप का बिल, बाँबी।
संज्ञा
(देश.)

सुखी
जिसे सब सुख प्राप्त हों।
वि.
(सं. सुखिन्)

सुखी
प्रसन्न, आनंदित।
वि.
(सं. सुखिन्)

सुखेन
सुख से, सुखपूर्वक।
अव्य.
(सं.)

सुखेन
एक बानर जो वरुण का पुत्र, बाली का ससुर और सुग्रीव का राजवैद्य था।
संज्ञा
(सं. सुषेण)
उ.- (क) दौनागिरि पर आहि संजीवन बैद सुखेन (सुषेन) बताई-९−१४९। (ख) सुग्रीव बिभीषन जामवंत। आनंद सुखेन (सुषेन) केदार संत-९−१६६।

सुखैन, सुखैना
सुख देनेवाला।
वि.
(सं. सुख+अयन)

सुखैहै
(चिंता आदि से) दुर्बल हो जायगा।
क्रि.अ.
(हिं. सूखना)
उ.- तुम बिनु मोकों देखि सुखैहै-२६४९।

सुख्याति
प्रसिद्धि।
संज्ञा
(सं.)

सुख्याति
यश।
संज्ञा
(सं.)

सुगंध
अच्छी महक या गंध, सुवास, सौरभ।
संज्ञा
(सं.)

सुगना
तोता, कीर।
संज्ञा
(हिं. सुग्गा)

सुगम
जहाँ या जिसमें जाना या पहुँचना सरल हो।
वि.
(सं.)

सुगम
जो सहज में जाना, किया या पाया जा सके।
वि.
(सं.)
उ.-भक्त जमुने सुगम, अगम औरै-१−२२२।

सुगम
जो सरलता से हो सके, सहज।
वि.
(सं.)
उ.-जब जब दीननि कठिन परी। जानत हौं करुनामय जन कौं तब तब सुगम करी-१−१६।

सुगमता
आसानी, सरलता।
संज्ञा
(सं.)

सुगम्य
जिसमें सरलता से प्रवेश हो सके।
वि.
(सं.)

सुगर, सुगल
सुग्रीव।
संज्ञा
(सं. सु+हिं. गला)

सुगात
सुंदर शरीर।
संज्ञा
(सं. सु+गात)
उ.-आपु जबहिं द्वारे ह्वै निकसत देखत सबै सुगात-१२२२।

सुगान
सुंदर गीत।
संज्ञा
(सं. सु+गान)
उ.-गावहिं मंगल सुगान, नीके सुर नीकी तान-१०−९६।

सुगाना
दुखी होना।
क्रि.अ.
(सं. शोक)

सुगाना
बिगड़ना, अप्रसन्न होना।
क्रि.अ.
(सं. शोक)

सुगाना
संदेह करना।
क्रि.अ.
(देश.)

सुगानी
बिगड़ी, अप्रसन्न या रुष्ट हुई।
क्रि.अ.
(हिं. सुगाना)
उ.-सूर स्याम के संग न जैहौं जा कारन तू मोहिं सुगानी-१२५५।

सुगुरा
जिसे अच्छे गुरु से मंत्र, दीक्षा या शिक्षा मिले।
वि.
(सं. सुगुरु)

सुगैया
अँगिया, चोली।
संज्ञा
(हिं. सुग्गा)

सुग्गा
तोता, कीर।
संज्ञा
(सं. शुक)

सुग्रिव, सुग्रीव
सुंदर ग्रीवावाला।
वि.
(सं. सुग्रीव)

सुग्रिव, सुग्रीव
बानरराज बालि का भाई जो उसके बाद राजा और जिसने श्रीराम को रावण के जीतने में सहायता दी थी।
संज्ञा
उ.- पहुँचे आइ निकट रघुबर कैं सुग्रिव आयौ धाई-९−१०२।

सुग्रिव, सुग्रीव
इंद्र।
संज्ञा

सुग्रिव, सुग्रीव
शंख।
संज्ञा

सुगंध
वह वस्तु जिसकी गंध सुन्दर हो।
संज्ञा
(सं.)
उ.- (क) याकैं अंग सुगन्ध लगावहु-५−३। (ख) चंदन अगर सुगंध और घृत बिधि करि चिंता बनायौ-९−५०।

सुगंध
जिसमें सुंदर गंध हो।
वि.
उ.- सीतल सलिल सुगन्ध पवन सुख-तरु बंसीबट-५८९।

सुगंधि
सौरभ।
संज्ञा
(सं.)

सुगंधि
सुगंधयुक्त, सुगंधित।
वि.

सुगंधित
जिसमें सुंदर गंध हो।
वि.
(सं. सुगंधि)

सुगंधी
सौरभ।
संज्ञा
(सं. सुगंधि)

सुगंधी
जिसमें सुंदर गंध हो।
वि.
(सं. सुगंधिन्)

सुगत
महात्मा बुद्ध का एक नाम।
संज्ञा
(सं.)

सुगत
बुद्ध धर्मानुयायी, बौद्ध।
संज्ञा
(सं.)

सुगति
मुक्ति, मोक्ष।
संज्ञा
(सं.)

सुघट
सुडौल सुंदर।
वि.
(सं.)

सुघट
जो सहज में बन या हो सके।
वि.
(सं.)

सुघटित
जो सुडौल या सुंदर रूप में बनाया गया या निर्मित हो।
वि.
(सं. सुघट)

सुघड़, सुघर
सुडौल, सुंदर।
वि.
(सं. सुघट)

सुघड़, सुघर
(हाथ के काम में) निपुण, कुशल।
वि.
(सं. सुघट)
उ.- सब्द सग मृदंग मिलवत सुदर नंदकुमार-पृ. ३४६ (४५)।

सुड़घई, सुघरई
अच्छी बनावट, सुडौलता।
संज्ञा
(हिं. सुघड़+ई)

सुड़घई, सुघरई
कुशलता, निपुणता।
संज्ञा
(हिं. सुघड़+ई)

सुघड़ता, सुघरता
अच्छी बनावट, सडौलता।
संज्ञा
(हिं. सुघड़+ता)

सुघड़ता, सुघरता
दक्षता, कुशलता।
संज्ञा
(हिं. सुघड़+ता)

सुघड़पन, सुघरपन
अच्छी बनावट, सुंदरता।
संज्ञा
(हिं. सुघड़+पन)

श्यामता
श्याम होने का गुण या भाव।
संज्ञा
(सं.)

श्यामता
काला या साँवलापन।
संज्ञा
(सं.)
उ.-सूर प्रभु श्याम की श्यामता मेध की यहै जिय सोच कछु नहिं सोहाई- १६२६।

श्यामल
काला, साँवला।
वि.
(सं.)

श्यामलता
काला या साँवलापन।
संज्ञा
(सं.)

श्यामला
काला, साँवला।
वि.
(सं. श्याम)

श्यामला
श्रीकृष्ण।
संज्ञा

श्यामसुंदर
श्रीकृष्ण का एक नाम।
संज्ञा
(सं.)

श्यामांग
काले या साँवले रंगवाला।
वि.
(सं.)

श्यामा
श्रीकृष्ण की प्रिया राधा।
संज्ञा
(सं.)

श्यामा
राधा की एक सखी का नाम।
संज्ञा
(सं.)
उ.-(क) इंद्रा बिंदा राधिका श्यामा कामा नारि-११०२। (ख) कहि राधा किन हार चुरायो ¨¨¨¨¨¨। श्यामा कामा चतुरा नवला प्रमुदा सुमदा नारि-१५८०।

सुघड़पन, सुघरपन
निपुणता, दक्षता।
संज्ञा
(हिं. सुघड़+पन)

सुघड़ाई, सुघराई
अच्छी बनावट, सुडौलता।
संज्ञा
(हिं. सुघड़+आई)
उ.- अंग दिखाइ गई हंसि प्यारी, सुरति-चिन्हनि की सुधराई-२१८४।

सुघड़ाई, सुघराई
कुशलता, निपुणता।
संज्ञा
(हिं. सुघड़+आई)

सुघड़ाया, सुघराया
अच्छी बनावट, सुंदरता।
संज्ञा
(हिं. सुघड़+आया)

सुघड़ाया, सुघराया
दक्षता, कौशल।
संज्ञा
(हिं. सुघड़+आया)

सुघड़ी, सुघरा
शुभ समय या साइत।
संज्ञा
(सं. सु+हिं. घड़ी)

सुघड़ी, सुघरा
सुडौल, सुंदर।
वि.
(हिं. सुघड़)

सुघड़ी, सुघरी
अच्छी या शुभ घड़ी, साइत या समय।
संज्ञा
(हिं. सु+घड़ी)

सुघड़ी, सुघरी
सुडौल, सुंदर।
वि.
(हिं. सुघड़)

सुघोष
सुंदर स्वर या कंठवाला।
वि.
(सं.)

सुचंग
घोड़ा, अश्व।
संज्ञा
(ड़ि)

सुचंद, सुचंद्र
उत्तम श्रेष्ठ।
वि.
(सं. सु+चंद्र)

सुचंद, सुचंद्र
पूर्णिमा का चाँद।
संज्ञा

सुच
पवित्र।
वि.
(सं. शुचि)

सुच
स्वच्छ।
वि.
(सं. शुचि)

सुचना
इकट्ठा करना।
क्रि.स.
(सं. संचय)

सुचना
एकत्र या संचित होना।
क्रि.अ.

सुचरित, सुचरित्र
उत्तम आचरण वाला।
वि.
(सं.)

सुचरित्ना
सती, साध्वी।
वि.
(सं.)

सुचा
पवित्र।
वि.
(सं. शुचि)

सुचा
स्वच्छ।
वि.
(सं. शुचि)

सुचा
सूचना।
संज्ञा
(सं. सूचना)

सुचा
चेतना।
संज्ञा
(सं. सूचना)

सुचान
सोचने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(हिं. सोचना)

सुचान
सूझ, विचार।
संज्ञा
(हिं. सोचना)

सुचान
सुझाव, सूचना।
संज्ञा
(हिं. सोचना)

सुचाना, सुचानो
सोचने को प्रवृत्त करना।
क्रि.स.
(हिं. सोचना)

सुचाना, सुचानो
दिखना।
क्रि.स.
(हिं. सोचना)

सुचाना, सुचानो
ध्यान आकृष्ट करना।
क्रि.स.
(हिं. सोचना)

सुचार
अच्छी चाल।
संज्ञा
(सं. सु+हिं. चाल)

सुचार
उत्तम आचरण।
संज्ञा
(सं. सु+हिं. चाल)

सुचार
सुंदर, मनोहर।
वि.
(सं. सुचारु)
उ.-सांख्यायन से बहुत महामुनि सेवत चरन सुचार-सारा. ५७।

सुचारु
बहुत सुंदर।
वि.
(सं.)

सुचाल
अच्छी चाल।
संज्ञा
(सं. सु+हिं. चाल)

सुचाल
उत्तम आचरण।
संज्ञा
(सं. सु+हिं. चाल)

सुचाली
अच्छी चाल वाला।
वि.
(हिं. सुचाली)

सुचाली
अच्छे आचरण वाला।
वि.
(हिं. सुचाली)

सुचि
पवित्र।
वि.
(सं. शुचि)
उ.-दिन दस लौं जलकुंभ साजि सुचि दीप-दान करवायौ-९−५०।

सुचि
स्वच्छ।
वि.
(सं. शुचि)
उ.- बृन्दा बिपिन बिसद जमुना-तट सुचि ज्यौनार बनाई-४१६।

सुचिकरमा
पुण्य कार्य या पवित्र आचरण करनेवाला।
वि.
(सं. शुचिकर्म)

सुचित
जो (किसी काम से) निवृत्त हो गया हो।
वि.
(सं. सुचित)

सुचित
निश्चिंत।
वि.
(सं. सुचित)
उ.- अबहिं निवछरो समय सुचित ह्वै हम तो निधरक कीजै-१−१९१।

सुचित
एकाग्र, स्थिर, सावधान।
वि.
(सं. सुचित)
उ.- तब पहिचानि चानि प्रभु को भृगु परम सुचित मन कीन्हौं-२९७१।

सुचितई
फुरसत, छुट्टी।
संज्ञा
(हिं. सुचित)

सुचितई
निश्चिंतता।
संज्ञा
(हिं. सुचित)

सुचितई
एकाग्रता स्थिरता।
संज्ञा
(हिं. सुचित)

सुचिती
जिसका चित्त दुविधा में न होकर, स्थिर हो।
वि.
(हिं. सुचित)

सुचिती
निश्चिंत।
वि.
(हिं. सुचित)

सुचित्त
(किसी कार्य से) निवृत्त।
वि.
(सं.)

सुचित्त
निश्चिंत।
वि.
(सं.)

सुचेता
चौकन्ना, सतर्क।
वि.
(हिं. सुचेत)

सुच्चा, सुच्चो
पवित्र, शुद्ध।
वि.
(सं. शुचि)

सुच्चा, सुच्चो
जो जूठा न किया गया हो।
वि.
(सं. शुचि)

सुच्चा, सुच्चो
ठीक, निर्दोष।
वि.
(सं. शुचि)

सुच्चा, सुच्चो
असली, सच्चा।
वि.
(सं. शुचि)

सुच्छंद
स्वतंत्र।
वि.
(सं. स्वच्छंद)

सुच्छंद
निरंकुश।
वि.
(सं. स्वच्छंद)

सुच्छ
निर्मल।
वि.
(सं. स्वच्छ)

सुच्छ
पवित्र।
वि.
(सं. स्वच्छ)

सुच्छम
बहुत छोटा, पतला या थोड़ा।
वि.
(सं. सूक्ष्म)

सुचित्त
एकाग्र, स्थिर।
वि.
(सं.)

सुचित्त
स्थिर चित्तवाला।
वि.
(सं.)

सुचिमंत, सुचिमत
शुद्ध या पवित्र आचरणवाला, सदाचारी।
वि.
(सं. शुचि+मत)

सुचिमन
पवित्र मन वाला।
वि.
(सं. शुचि+मन)

सुचिर
पुराना।
वि.
(सं.)

सुचिर
स्थायी।
वि.
(सं.)

सुची
इंद्र-पत्नी शची।
संज्ञा
(सं. शची)

सुची
पवित्र।
वि.
(सं. शुचि)
उ.- जमुना, तोहिं बहयौ क्यौं भावै।¨¨¨¨। तेरौ नीर सुची जो अब लौं खार पनार कहावै-५६१।

सुचेत
चौकन्ना, सावधान।
वि.
(सं. सुचेतस्)

सुचेत
चेतना, ध्यान।
संज्ञा
(सं. सु+हिं. चेत)
उ.- बुद्धि सोचति त्रिया ठाढ़ी नेक नहीं सुचेत-२१८७।

सुछंद
स्वाधीन, स्वतंत्र।
वि.
(सं. स्वच्छंद)
उ.- सब सखि-सखा सुछंद-१०−२०३।

सुछंद
निरंकुश।
वि.
(सं. स्वच्छंद)

सुजक्का
सुंदर, मनोहर।
वि.
(?)

सुजघन
सुंदर जाँघ।
संज्ञा
(सं. सु+हिं. जघन)
उ.- जानु सुजघन करभ-कर आकृति−१−६९।

सुजन
भला या सज्जन पुरुष।
संज्ञा
(सं.)
उ.- (क) सुजन-बेष रचना अति जनमनि आयौ पर धन हरतौ-१−२०३। (ख) बिप्र सुजन चारन - बंदीजन सकल नंद-गृह आये-१०−८७।

सुजन
परिवार के लोग, आत्मीयजन।
संज्ञा
(सं. स्वजन)
उ.- हरषित सुजन सखा त्रिय बालक कृष्ण मिलन जिय भाए-।

सुजनता
भलमंसी, सौजन्य।
संज्ञा
(सं.)

सुजन्मा
अच्छे कुल में जन्मा हुआ।
वि.
(सं. सुजन्मन्)

सुजल
अच्छा या पवित्र जल।
संज्ञा
(सं. सु+जल)
उ.- सूर सुजल सीचियै कृपानिधि निज जन चरन-तटी−१−९८।

सुजस
सुंदर कीर्ति।
संज्ञा
(सं. सुयश)
उ.-(क) जाकौ सुजस सुनत अरु गावत जैहैं पाप-बृन्द भजि भरहरि-१-३१२। (ख) निगम जाकौ सुजस गावत-१-३३५।

सुजान
विज्ञ, पंडित।
वि.
(सं. सज्ञान)
उ.-निगम जाकौ सुजस गावत सुनत संत सुजान-१−२३५।

सुजान
सज्जन।
वि.
(सं. सज्ञान)

सुजान
पति।
संज्ञा

सुजान
प्रेमी।
संज्ञा

सुजान
ईश्वर।
संज्ञा

सुजानता
चतुरता, समझदारी।
संज्ञा
(हिं. सुजान+ता)

सुजानता
निपुणता।
संज्ञा
(हिं. सुजान+ता)

सुजानता
विज्ञता।
संज्ञा
(हिं. सुजान+ता)

सुजानता
सज्जनता।
संज्ञा
(हिं. सुजान+ता)

सुजानी
विज्ञ, पंडित, ज्ञानी।
वि.
(हिं. सुजान)

सुजागर
प्रकाशमान।
वि.
(सं. सु+जांगर = प्रकाशित होना)

सुजागर
सुंदर, सुशोभित।
वि.
(सं. सु+जांगर=प्रकाशित होना)

सुजात
उत्तम कुल में उत्पन्न, कुलीन।
वि.
(सं.)

सुजात
सुंदर, मनोहर।
वि.
(सं.)

सुजाति, सुजाती
उत्तम जाति या कुल।
संज्ञा
(सं. सुजाति)

सुजाति, सुजाती
उत्तम जाति या कुल का।
वि.
उ.-यह पाती लै जाहु मधुपुरी जहाँ बसैं स्याम सुजाती-२९८१।

सुजातिया
उत्तम कुल का।
वि.
(सं. सुजाति)

सुजातिया
अपनी जाति का।
वि.
(सं. स्व+जाति)

सुजान
चतुर, समझदार।
वि.
(सं. सज्ञान)
उ.-(क) दीनानाथ कृपाल परम सुजान जादौराइ-३−३। (ख) सुक करयौ, सुनि यह नृपति सुजान-५−४।

सुजान
निपुण, कुशल, प्रवीण।
वि.
(सं. सज्ञान)

शासन
दंड।
संज्ञा
(सं.)

शासित
जिसका या जिस पर शासन किया जाय।
वि.
(सं.)

शासित
जिसे दंड दिया जाय, दंडित।
वि.
(सं.)

शास्ता
शासक।
संज्ञा
(सं. शास्तृ)

शास्ता
राजा।
संज्ञा
(सं. शास्तृ)

शास्ता
पिता।
संज्ञा
(सं. शास्तृ)

शास्ता
गुरु, आचार्य।
संज्ञा
(सं. शास्तृ)

शास्त्र
प्राचीन ऋषि-मुनियों के बनाये वे ग्रंथ जिनमें उचित कृत्यों का निर्देश और अनुचित का निषेध किया गया है।
संज्ञा
(सं.)

शास्त्र
विषय-विशेष का विशिष्ट और अगाध ज्ञान।
संज्ञा
(सं.)

शास्त्रकार
शास्त्र-रचयिता।
संज्ञा
(सं.)

श्रमकण
पसीने की बूँद।
संज्ञा
(सं.)

श्रमजल
पसीना, स्वेद।
संज्ञा
(सं.)
उ.-कुमकुम आड़ श्रवत श्रमजल मिलि मधु पीवत छबि छींट चली री।

श्रमजित
श्रम को जीत लेनेवाला, कभी न थकनेवाला।
वि.
(सं. श्रम + हिं. जीतना)

श्रमजीवी
शारीरिक परिश्रम करके जीविका अर्जन करनेवाला।
वि.
(सं. श्रमजीविन्)

श्रमण
बौद्ध संन्यासी।
संज्ञा
(सं.)

श्रमबिंदु
पसीने की बूँद।
संज्ञा
(सं.)

श्रमसीकर
पसीने की बूँद।
संज्ञा
(सं.)
उ.-कुंडल मकर कपोलनि झलकत श्रमसीकर के दाग।

श्रमिक
मजदूर।
संज्ञा
(सं.)

श्रमित
थका हुआ, श्रांत।
वि.
(सं.)
उ.-चारों भ्रांतनि श्रमितं जानिकै जननी तब पौढ़ाए-सारा. १९३।

श्रमी
परिश्रमी।
वि.
(सं. श्रमिक)

सुजोग
अच्छा या उपयुक्त अवसर।
संज्ञा
(सं. सु+योग)

सुजोग
अच्छा मेल या सुयोग।
संज्ञा
(सं. सु+योग)

सुजोधन
ՙदुर्योधन՚ का एक नाम।
संज्ञा
(सं. सुयोधन)

सुजोधा
बहुत वीर, बड़ा योद्धा।
वि.
(सं. सु+योद्धा)
उ.-जग्य समय सिसुपाल सुजोधा अनायास लै जोति समोयौ-१−४४।

सुजोर
मजबूत, दृढ़।
वि.
(सं. सु+फ़ा. जोर)

सुजोर
बलवान, बली।
वि.
(सं. सु+फ़ा. जोर)

सुज्ञ
पंडित, विद्वान।
वि.
(सं.)

सुज्ञान
उत्तम या श्रेष्ठ ज्ञान।
संज्ञा
(सं.)
उ.-जो कछु हरि सौं सुन्यौ सुज्ञान, कहयौ मयत्रेय ताहि बखान-४−३।

सुज्ञानवान
बहुत ज्ञानी।
वि.
(सं. सुज्ञान+हिं. वान)
उ.-पुत्र सुज्ञानवान मोहिं दीजै-४−३।

सुझाइ
दिखायी देता है।
क्रि.स.
(हिं. सूझना)
मुहा.- कछु न सुझाइ-(१) कुछ दिखायी नहीं देता है। (२) कुछ समझ में नहीं आता, कोई उपाय नहीं सूझता। उ.-तब तैं अब गाढ़ी परी मोकौं कछु न सुझाइ-५८९।

सुझाना, सुझानो
दिखाता, देखने को प्रवृत्त करना।
क्रि.स.
(हिं. सूझना)

सुझाना, सुझानो
दूसरे की समझ या ध्यान में लाना।
क्रि.स.
(हिं. सूझना)

सुझाव
सुझाने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(हिं. सूझना+आव)

सुझाव
किसी नयी या विशेष बात, पक्ष या अंग की ओर ध्यान दिलाना।
संज्ञा
(हिं. सूझना+आव)

सुझाव
इस प्रकार ध्यान दिलाने के लिए कही गयी बात।
संज्ञा
(हिं. सूझना+आव)

सुटुकना, सुटुकनो
चुपचाप चले या खिसक जाना।
क्रि.अ.
(अनु.)

सुटुकना, सुटुकनो
सिकुड़ना।
क्रि.अ.
(अनु.)

सुटुकना, सुटुकनो
सुटका या चाबुक मारना।
क्रि.स.

सुठ
सुँदर।
वि.
(हिं. सुठि)

सुठ
उत्तम।
वि.
(हिं. सुठि)

सुठ
बहुत।
वि.
(हिं. सुठि)

सुठहर
अच्छा या बढ़िया स्थान।
संज्ञा
(सं. सु+हिं. ठहर=स्थान)

सुठान
जिसकी उठान अच्छी हो।
वि.
(सं. सु+ हिं. उठान)

सुठान
सुडौल, सुंदर।
वि.
(सं. सु+ हिं. उठान)

सुठार
सुडौल, सुंदर।
वि.
(सं. सुष्ठु, प्र. सुट्ठ)
उ.-चपल नैन नासा बिच सोभा अधर सुरंग सुठार-१६८४।

सुठि
बढ़िया, अच्छा।
वि.
(सं. सुष्ठु, प्र. सुट्ठ)
उ.-(क) बहुत प्रकार किये सब व्यंजन अनेक बरन मिष्ठान। अति उज्ज्वल कोमल सुठि सुंदर देखि महरि मन मान-१०−८९।

सुठि
सुडौल, सुंदर।
वि.
(सं. सुष्ठु, प्र. सुट्ठ)

सुठि
बहुत, अत्यंत।
वि.
(सं. सुष्ठु, प्र. सुट्ठ)
उ.-(क) केहरि नख उर पर रुरै सुठि सोभाकारी-१०−१३४। (ख) स्रवन सुनत सुठि मीठे बोल-६३०। (ग) सुठि सुठान ठोड़ी अति सुन्दर सुन्दरता को सार-२०६२।

सुठैना, सुठौन
अच्छा, बढ़िया।
वि.
(हिं. सुठि)

सुठैना, सुठौन
सुडौल, सुंदर।
वि.
(हिं. सुठि)

सुठैना, सुठौन
बहुत, अत्यंत।
वि.
(हिं. सुठि)

सुड़कना
नाक या मुँह से 'सुड़' - 'सुड़' शब्द करके ऊपर खींचना।
क्रि.अ.
(अनु.)

सुड़सुड़ाना
सुड़-सुड़' शब्द करना।
क्रि.स.
(अनु.)

सुडौल
सुंदर बनावट या आकारवाला, जिसके सब अंग ठीक हों।
वि.
(सं. सु+हिं. ढंग)

सुढंग
उत्तम रीति या ढंगवाला।
संज्ञा
(सं. सु+हिं. ढंग)

सुढंग
सुघड़ता, सुंदरता।
संज्ञा
(सं. सु+हिं. ढंग)

सुढंगी
उत्तम रीति या ढंगवाला।
वि.
(हिं. सुढंग)

सुढंगी
सुघड़, सुंदर।
वि.
(हिं. सुढंग)

सुढंगी
उच्च कोटि का।
वि.
(हिं. सुढंग)

सुढर
दयालु, कृपालु।
वि.
(सं. सु+हिं. ढलना)

सुढर
सुडौल, सुंदर।
वि.
(सं. सु+हिं. ढार)

सुढार, सुढारु
सुंदर ढला या बना हुआ।
वि.
(सं. सु+हिं. ढलना)
उ.-(क) (पालनौ अति सुन्दर) ¨¨¨¨¨ आनि धरयौ नंद-द्वार अतिहीं सुंदर सुढार-१०−४१। (ख) डाँडी खचि पचि-पचि मर्कत मय पाँति सुढार-२२८९।

सुढार, सुढारु
सुडौल, सुंदर।
वि.
(सं. सु+हिं. ढलना)
उ.-(क) कर ऊपर लै राखि रहे हरि, देन न मुक्ता परम सुढार-१०−१७३। (ख) कनक बरन सुढार सुन्दरि सकुचि बदन दुराइ-६७६।

सुतंत, सुतंतर
स्वाधीन।
वि.
(सं. स्वतंत्र)

सुतंत्न
अच्छा तंत्र या शासन।
वि.
(सं.)

सुतंत्न
स्वाच्छंद, स्वाधीन।
वि.
(सं. स्वतंत्र)

सुतंत्नि
(विणा आदि) तंत्र (=तार)-वाद्य बजाने में निपुण या प्रवीण।
वि.
(सं.)

सुत
बेटा, पुत्र।
संज्ञा
(सं.)
उ.-धनसुत-दारा काम न आवैं-१−८०।

सुत
पार्थिव।
वि.

सुत
उत्पन्न, जात।
वि.

सुतधार
नाट्यशाला का प्रधान जो नाटक के अभिनय का सारा प्रबंध करता है।
संज्ञा
(सं. सूत्रधार)

सुतधार
(किसी कार्य या योजना का) संचालक या प्रबंधक।
संज्ञा
(सं. सूत्रधार)

सुतना
ऊपर से नीचे की ओर हाथ फिरना।
क्रि.अ.
(हिं. सूतना)

सुतना
डोरे आदि पर माँझ चढ़ना।
क्रि.अ.
(हिं. सूतना)

सुतना
नुचना, खसोटा जाना।
क्रि.अ.
(हिं. सूतना)

सुतना
साफ होना।
क्रि.अ.
(हिं. सूतना)

सुतना
सूख जाना, चुस जाना।
क्रि.अ.
(हिं. सूतना)

सुतनु
सुंदर शरीरवाला (वाली)।
वि.
(सं.)

सुतप्त
गरम, गुनगुना।
वि.
(सं.)
उ.-देखत सुतप्त जल तरसैं-१०−१८३।

सुत-याग
वह यज्ञ जो पुत्र की कामना से किया जाय।
संज्ञा
(सं.)

सुतर
ऊँट।
संज्ञा
(अ. शुतुर)

सुतर
जो सरलता से तैर कर पार की या किया जा सके।
वि.
(सं.)

सुतरनाल
तोप जो ऊँट पर रखकर चलायी जाय।
संज्ञा
(अ. शुतुर+ फ़ा. नाल)

सुतरां
इसलिए, अताल।
अव्य.
(सं. सुतराम)

सुतरां
और भी, अपितु।
अव्य.
(सं. सुतराम)

सुतरी
तूर, तुरही (बाजा)।
संज्ञा
(हिं. तुरही)

सुतरी
सुतली।
संज्ञा
(हिं. सुतली)

सुतल
सात पाताल लोकों में से एक।
संज्ञा
(सं.)
उ.-(क) अतल बितल अरु सुतल, तलातल और महातल जान-सारा. ३१। (ख) सुतल लोक में थिर करि थाप्यो-सारा. ३४३।

सुतली
सूत या सन की बटची हुई पतली डोरी।
संज्ञा
(हिं. सूत)

सुतवाँ
सुडौल।
वि.
(हिं. सूतवाँ)

सुतहर, सुतहार
बढ़ई।
संज्ञा
(सं. सूत्रकार)
उ.-(क) कनक-रतन-मनि पालनौ गढ़यौ काम सुतहार-१०−४२। (ख) मोतिनि झालरि नाना भाँति खिलौना रचे बिस्वकर्मा सुतहार-१०−८४।

सुतहर, सुतहार
कारीगर, शिल्पकार, शिल्पी।
संज्ञा
(सं. सूत्रकार)

सुतहा
सूत का, सूत-संबंधी।
वि.
(हिं. सूत)

सुता
बेटी, पुत्री।
संज्ञा
(सं.)
उ.-द्रुपद-सुताहिं दुष्ट दुरजोधन सभा माहिं पकरावै-१−१२२।

सुता-सिंधु
लक्ष्मी।
संज्ञा
(सं. सिंधु+सुता)
उ.-चकृत होइ नीर में बहुरि बुड़की दई सहित सुता-सिंधु तहँ दरस पाए-२५७०।

सुताना
सूतने' को प्रवृत्त करना, 'सूतने' का काम दूसरे से कराना।
क्रि.स.
(हिं. सूतना)

सुतार
बढ़ई।
संज्ञा
(सं. सूत्रकार)

सुतार
कारीगर, शिल्पकार, शिल्पी।
संज्ञा
(सं. सूत्रकार)

सुतार
अच्छा, उत्तम।
वि.
(सं. सु+तार)

सुतार
सुभीता, सुविधा का समय।
संज्ञा

सुतीक्षण, सुतीक्ष्ण, सुतीखन, सुतीछन
अगस्त्य मुनि के भाई जो वनवासकाल में श्री रामचन्द्र से मिले थे।
संज्ञा
(सं. सुतीक्ष्ण)
उ.-दरसन दियौ सुतीछन गौतम पंचवटी पग धारे-सारा. २५६।

सुतीक्षण, सुतीक्ष्ण, सुतीखन, सुतीछन
बहुत तीखा।
वि.

सुतीक्षण, सुतीक्ष्ण, सुतीखन, सुतीछन
बहुत तेज धारवाला।
वि.

सुतीछा
बहुत तीखा।
(सं. सुतीक्ष्ण)

सुतीछा
बहुत तेज धारवाला।
(सं. सुतीक्ष्ण)

सुतुही
सीपी।
संज्ञा
(सं. शुक्ति)

सुतोष
जिसे संतोष हो गया हो।
वि.
(सं.)

सुत्ता
सोया हुआ, निद्रित।
वि.
(हिं. सोना)

सुथना
एक तरह का पायजामा।
संज्ञा
(हिं. सूथन)

सुथनिया, सुथनी
स्त्रियों के पहनने की सूथन।
संज्ञा
(हिं. सूथन)

सुतारी
बढ़ईगीरी।
संज्ञा
(हिं. सुतार)

सुतारी
कारीगरी, शिल्प-कौशल या कला।
संज्ञा
(हिं. सुतार)

सुतारी
बढ़ई।
संज्ञा

सुतारी
शिल्पकार, शिल्पी।
संज्ञा

सुतिन
सुन्दरी, रूपवती।
वि.
(सं. सुतनु)

सुतिनी
पुत्रवती (स्त्री)।
वि.

सुतिया
गले का एक गहना, हँसली।
संज्ञा
(देश.)

सुतिहर, सुतिहार
बढ़ई।
संज्ञा
(सं. सूत्रकार)
उ.-(क) मोतिनि झालरि नाना भाँति खिलौना रचे बिस्वकर्मा सुतिहार (सुतहार)-१०−८४। (ख) बिस्वकर्मा सुतिहार स्त्रुतिधार सुलभ सिलप दिखावनो-२२८०।

सुतिहर, सुतिहार
शिल्पकार, शिल्पी।
संज्ञा
(सं. सूत्रकार)

सुती
जिसके पुत्र हो।
वि.
(सं. सुतिन)

श्रमी
श्रमजीवी।
वि.
(सं. श्रमिक)

श्रवण
कान, कर्ण।
संज्ञा
(सं.)

श्रवण
देव-चरित्र सुनना।
संज्ञा
(सं.)
उ.-श्रवण कीर्तन सुमिरन करै।

श्रवण
नौ प्रकार की भक्तियों में एक।
संज्ञा
(सं.)
उ.- श्रवण कीर्तन स्मरण पद-रत अर्चन वंदन दास- सारा. ११६।

श्रवण
राजा मेघध्वज के एक पुत्र का नाम।
संज्ञा
(सं.)
उ.- ता संगति नव सुत तिन जाए। श्रवणादिक मिलि हरि-गुन गाए।

श्रवण
सत्ताइस नक्षत्रों में बाइसवाँ।
संज्ञा
(सं.)

श्रवण
मातृ-पितृ-भक्त पुत्र।
संज्ञा
(सं.)

श्रवत
बहता है।
क्रि.अ.
(सं. स्रव)
उ.-राति दिवस रस श्रवत सुधा में कामधेनु दरसाई।

श्रवन
कान, कर्ण।
संज्ञा
(सं. श्रवण)

श्रवन
देव-चरित्र सुनना।
संज्ञा
(सं. श्रवण)

सुथरा
साफ, स्वच्छ।
वि.
(सं. स्वच्छ)

सुथरी
स्वच्छ।
वि.
(हिं. सुथरा)
उ.-सौइ रहौ सुथरी सेजरिया-१०−२४६।

सुथराई
स्वच्छता।
संज्ञा
(हिं. सुथरा)

सुथरापन
सफाई।
संज्ञा
(हिं. सुथरा+पन)

सुथराशाह
एक महात्मा जो गुरु नानक के शिष्य थे।
संज्ञा

सुथरेशाही
सुथराशाह का संप्रदाय।
संज्ञा
सुथराशाह

सुथरेशाही
इस संप्रदाय का अनुनायी।
संज्ञा
सुथराशाह

सुथल
सुंदर स्थान।
संज्ञा
(सं. सु+स्थल)
उ.-हंस मानो मानसर अरुन सुथल निरखि आनंद करि हरषि गाजै-२६१४।

सुथिर
अत्यंत स्थिर या दृढ़।
वि.
(सं. सु+स्थिर)
उ.-अति पूरन पूरे पुन्य रोपी सुथिर थुनी-१०−२४।

सुदंत
सुंदर दाँतोंवाला।
वि.
(सं. सुदन्त)

सुदरसना, सुदर्शना
जो देखने में सुंदरी हो, प्रियदर्शनी।
वि.
(सं. सुदर्शन)

सुदल
अच्छे दल या पत्तोंवाला।
वि.
(सं.)

सुदामा
एक निर्धन ब्राह्मण जो श्रीकृष्ण का सहपाठी था और जिसे उन्होंने इंद्र-जैसा वैभव प्रदान किया था।
संज्ञा
(सं. सुदामन)
उ.-(क) रंक सुदामा कियौ इंद्र-सम-१−९५। (ख) चारि पदारथ दिए सुदामा तंदुल भेंट धरयौ-१−१३३।

सुदामा
श्रीकृष्ण का एक गोप सखा।
संज्ञा
(सं. सुदामन)
उ.-(क) सुबल, श्रीदामा, सुदाम; वै भए इक ओर-१०−२४४। (ख) बछरा चारन चले गुपाल। सुबल सुदामा अरु श्रीदामा संग लिए सब ग्वाल-४१०।

सुदामा
कंस का एक माली जो श्रीकृष्ण को मथुरा में मिला था।
संज्ञा
(सं. सुदामन)
उ.-धनुषसाला चल नंदलाला।¨¨¨¨¨। पुनि सुदामा कहयौ, गेह मम अति निकट कृपा करि तहाँ हरि चरन धारे-ना. ३६६५।

सुदास
अपने आराध्य की भली-भाँति पूजा-उपासना करनेवाला।
वि.
(सं.)

सुदि
शुक्ल पक्ष।
संज्ञा
(हिं. सुदी.)

सुदिन
अच्छा या शुभ दिन।
संज्ञा
(सं. सु+दिन)
उ.-बिप्र बुलाइ नाम लै बुझ्यौ, रासि सोधि इक सुदिन धरयौ-१०-८८।

सुदिन
सुख-सौभाग्य के दिन।
संज्ञा
(सं. सु+दिन)

सुदिब
चमकीला, दीप्तिमान।
वि.
(सं.)

सुदक्षिण, सुदच्छिन
एक राजा।
संज्ञा
(सं. सुदक्षिण)
उ.-नृप सुदक्षिण जरयौ जरी बाराणसी-१०−३४५।

सुदक्षिणा, सुदच्छिना
राजा दिलीप की पत्नी का नाम।
संज्ञा
(सं. सुदक्षिणा)

सुदक्षिणा, सुदच्छिना
श्रीकृष्ण की एक पत्नी का नाम।
संज्ञा
(सं. सुदक्षिणा)

सुदत, सुदत्
सुंदर दाँतोंवाला।
वि.
(सं. सुदत्)

सुदती
सुंदर दाँतोंवाली।
वि.
(सं.)

सुदरसन, सुदर्शन
विष्णु के चक्र का नाम।
संज्ञा
(सं.सुदर्शन)
उ.-(क) जब जब भीर परी संतनि कौं चक्र सुदरसन तहाँ सँभारयौ-१−१४। (ख) चक्र सुदरसन रच्छा करै-९−५।

सुदरसन, सुदर्शन
शिव।
संज्ञा
(सं.सुदर्शन)

सुदरसन, सुदर्शन
एक प्रकार का चूर्ण जिसका प्रयोग बिषम ज्वर में होता है।
संज्ञा
(सं.सुदर्शन)

सुदरसन, सुदर्शन
जो देखने में सुंदर हो, प्रिय दर्शन।
वि.

सुदरसनपानि, सुदर्शनपाणि
(सुदर्शनचक्रधारी) विष्णु।
संज्ञा
(सं. सुदर्शनपाणि)

सुदेश
उचित या उपयुक्त स्थान।
संज्ञा
(सं.)

सुदेश
सुंदर, मनोहर।
वि.

सुदेश
उत्तम, श्रेष्ठ।
वि.

सुदेष्ण
रुक्मिणी के गर्भ से उत्पन्न श्रीकृष्ण के एक पुत्र का नाम।
संज्ञा
(सं.)

सुदेस
सुंदर या उत्तम देश।
संज्ञा
(सं. सुदेश)

सुदेस
उचित या उपयुक्त स्थान।
संज्ञा
(सं. सुदेश)

सुदेस
सुंदर।
वि.
उ.-(क) कटि तट पीत बसन सुदेस-६३३। (ख) अति सुदेस मृदु चिकुर हरत मन-१०-१०८। (ग) घन तन स्याम सुदेस पीत पट-२५६६।

सुदेस
अपना देश।
संज्ञा
(सं. स्वदेश)

सुदेसी
अपने देश का।
वि.
(सं. स्वदेशी)

सुदेह
सुंदर शरीर।
संज्ञा
(सं.)

सुदी
शुक्ल पक्ष।
संज्ञा
(सं. शुक्ल या शुद्ध)

सुदीपति, सुदीप्ति
खूब उजाला, अंत्यत प्रकाश।
संज्ञा
(सं. सुदीप्ति)

सुदूर
बहुत दूर।
वि.
(सं.)

सुद्दढ़
बहुत मजबूत।
वि.
(सं.)

सुद्दष्टि
गिद्ध।
संज्ञा
(सं.)

सुद्दष्टि
उत्तम दृष्टि।
संज्ञा

सुद्दष्टि
कृपापूर्ण दृष्टि।
संज्ञा
उ.-(क) कृपानिधान, सुदृष्टि हेरियै, जिहिं पतितनि अपनायौ-१−२०५। (ख) वहौ बिरद की लाज दीनपति करि सुदृष्टि देखौ-३४०१।

सुद्दष्टि
दूरदर्शी।
वि.

सुद्दष्टि
दूरदृष्टिवाला।
वि.

सुदेश
सुंदर या उत्तम देश।
संज्ञा
(सं.)

सुदेह
सुंदर, मनोहर।
वि.

सुदैव
सौभाग्य।
संज्ञा
(सं.)

सुदैव
सुसंयोग।
संज्ञा
(सं.)

सुद्ध
पवित्र।
वि.
(सं. शुद्ध)

सुद्ध
स्वच्छ, निर्मल।
वि.
(सं. शुद्ध)
उ.-जा जल सुद्ध निरखि सन्मुख ह्वै सुंदर सरसिज नैनी-९−११।

सुद्ध
उत्तम, श्रेष्ठ।
वि.
(सं. शुद्ध)
उ.-मुख मृदु बचन जानि मति जानहु, सुद्ध पंथ पग धरतौ-१−२०३।

सुद्ध
ठीक, सही।
वि.
(सं. शुद्ध)

सुद्ध
खालिस, जिसमें मिलावट न हो।
वि.
(सं. शुद्ध)

सुद्ध
निर्दोष।
वि.
(सं. शुद्ध)

सुद्धाँ
मिलाकर, समेत।
अव्य.
(सं. सह)

सुद्धा
एक प्रकार की भक्ति।
संज्ञा
(सं. शुद्ध)
उ.-माता भक्ति चारि परकार। सत रज तम गुन सुद्धा सार-३−१३।

सुद्धा
जिसमें 'शुद्धा' भक्ति हो।
वि.
उ.-सुद्धा भक्त मोहि कौं चाहै। भक्तिहुँ कौं सो नहिं अवगाहै-३१३।

सुद्धि
याद, स्मृति।
संज्ञा
(हिं. सुध)
उ.-देह-गेह की सुद्धि बिसारी-११६१।

सुद्धि
खबर, पता।
संज्ञा
(हिं. सुध)
उ.-गोपी हुतीं प्रेमरस माती तिन ताकौं कछु सुद्धि न पायौ-२३१६।

सुद्धि
शुद्ध' होने या करने का कार्य या भाव।
संज्ञा
(सं. शुद्धि)

सुद्धि
स्वच्छता।
संज्ञा
(सं. शुद्धि)

सुद्युम्न
वैवस्वत मनु का पुत्र जो शिव जी के शाप से स्त्री हो गया था और बुध की आराधना से शापमुक्त हुआ था।
संज्ञा
(सं.)
उ.-हरि ता पुत्री कौं सुत करयौ। नाम सुद्युम्न ताहि रिषि धरयौ-९−२।

सुद्रष्ट
दयालु, कृपालु।
वि.
(सं. सुदृष्ट)

सुधंग
उत्तम ढंग या रीत।
संज्ञा
(हिं. सुढंग)

सुधंग
सुंदर, मनोहर।
वि.
उ.-(क) गति सुधंग सों भाव दिखावत-पृ. ३४६ (४४)। (ख) गति सुधंग नृत्यत ब्रजनारी-पृ. ३४६ (४३)। (ग) कबहुँ चलत सुधंग गति सौं-पृ. ३५२ (८०)।

सुध
याद, स्मृति।
संज्ञा
(सं. शुद्ध)
मुहा.- सुध दिलाना-स्मरण कराना। सुध न रहना-भूल जाना। सुध बिसरना, बिसराना, बिसारना, भुलाना या भूलना- (किसी को) भूल जाना।

सुध
होश, चेतना।
संज्ञा
(सं. शुद्ध)
मुहा.- सुध बिसरना- होश में न रहना, अचेत होना। सुध बिसराना-बेहोश या अचेत करना। सुध न रहना-बेहोश या अचेक हो जाना। सुध सँभालना-होश में आना।

सुध
खबर, हाल, पता।
संज्ञा
(सं. शुद्ध)
मुहा.- सुध लेना- पता या हाल-चाल जानना। सुध रखना-खोज-खबर, पता या चौकसी रखना। सुध लीन्हीं-खोज-खबर की, पता लगाया। उ.-प्रद्युमन को बिलंब भयो तब सत्राजित सुध लीन्ही।

सुध
पवित्र।
वि.
(सं. शुद्ध)

सुध
स्वच्छ।
वि.
(सं. शुद्ध)

सुध
ठीक, सही।
वि.
(सं. शुद्ध)

सुध
खालिस।
वि.
(सं. शुद्ध)

सुध
निर्दोष।
वि.
(सं. शुद्ध)

सुध
अमृत।
संज्ञा
(सं. सुधा)

सुधनक
बड़ा अमीर या धनी।
वि.
(सं.)

सुधना, सुधनो
ठीक या शुद्ध किया जाना या होना।
क्रि.अ.
(सं. शुद्ध)

सुधनु
उत्तम या श्रेष्ठ धन।
संज्ञा
(सं.)
उ.-धर्म-सुधन लुटयौ-१−६४।

सुधन्वा
अच्छा धनुर्धर।
वि.
(सं.)

सुध-बुध
होश-हवास, चेत, ज्ञान, चेतना।
संज्ञा
(सं. शुद्ध+बुद्धि)
मुहा.- सुध-बुध खोना (जाती रहना, ठिकाने न होना या मारी जाना) -होश-हवास जाते रहना, बुद्धि ठिकाने न रह जाना।

सुधमना
जो होश में हो, सचेत।
वि.
(हिं. सुध= होश+मन)

सुधमना
सावधान, सतर्क।
वि.
(हिं. सुध= होश+मन)

सुधरतौ
बन जाता, ठीक हो जाता।
क्रि.अ.
(हिं. सुधरना)
उ.-अबकौ जन्म, आगिलौ तेरौ, दोऊ जन्म सुधर्तौ-१−२९७।

सुधरना, सुधरनो
बिगड़ी या सदोष वस्तु ठीक होना।
क्रि.अ.
(हिं. शोधन या हिं. सु+ढरना)

सुधरना, सुधरनो
बिगड़ी आदतों वाले का ठीक या भला होना।
क्रि.अ.
(हिं. शोधन या हिं. सु+ढरना)

सुधराई
सुधरने, सुधारने या सुधरवाने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
संज्ञा
(हिं. सुधरना)

सुधांग
चंद्रमा।
संज्ञा
(सं.)

सुधांशु, सुधांसु
चंद्रमा।
संज्ञा
(सं. सुधांशु)

सुधा
अमृत।
संज्ञा
(सं.)
(क) मनु उभै अंभोज-भाजन लेत सुधा भराइ-६२७। (ख) अधर-सुधा उपदंस सीक सुचि बिधु पूरन सुखवास सचारे-२२७१।

सुधा
जल।
संज्ञा
(सं.)

सुधा
दूध।
संज्ञा
(सं.)

सुधा
मकरंद।
संज्ञा
(सं.)

सुधा
धरती, पृथ्वी।
संज्ञा
(सं.)

सुधा
शहद, मधु।
संज्ञा
(सं.)

सुधा
चूना।
संज्ञा
(सं.)

सुधाइ
(लग्न, कुंडली आदि) ठीक या निश्चिंत कराना।
क्रि.स.
(हिं. सुधवाना)
उ.-नीकौ सुभ दिन सुधाइ झूलौ हो झुलैया-१०−४१।

श्रवन
नौ प्रकार की भक्तियों में एक।
संज्ञा
(सं. श्रवण)

श्रवन
राजा मेजध्वज का एक पुत्र।
संज्ञा
(सं. श्रवण)

श्रवन
एक नक्षत्र।
संज्ञा
(सं. श्रवण)

श्रवन द्वादसी
भादों के शुक्ल पक्ष की द्वादशी जिस दिन वामनावतार होना माना जाता है।
संज्ञा
(सं. श्रवण + द्वादशी)
उ.- भादौं श्रवन द्वादसी शूभ दिम धरो बिप्र हरि-रूप-सारा. ३३१।

श्रवना
बहना, रसना।
क्रि.अ.
(सं. स्त्राव)

श्रवना
बहाना, गिराना।
क्रि.स.

श्रवित
बहा या गिरा हुआ।
वि.
(सं. स्त्राव)

श्रव्य
जो सुना जा सके, सुनने योग्य।
वि.
(सं.)

श्रव्य काव्य
काव्य जो केवल सुना जा सके और अभिनय योग्य न हो।
संज्ञा
(सं.)

श्रांत
थका हुआ।
वि.
(सं.)

सुधाई
सीधापन।
संज्ञा
(हिं. सुधा=सीधा)

सुधाकंठ
कोयल, कोकिल।
संज्ञा
(सं.)

सुधाकर
चंद्रमा।
संज्ञा
(सं.)

सुधाघट
चंद्रमा।
संज्ञा
(सं. सुधा+घट)
उ.-मुक्ता-माल नंदनदंन उर अर्ध सुधाघर कान्ति।

सुधातु
सोना, स्वर्ण।
संज्ञा
(सं.)

सुधादीधिति
चंद्रमा।
संज्ञा
(सं.)

सुधाधर
चंद्रमा।
संज्ञा
(सं. सुधा+धर)

सुधाधर
जिसके अधरों में अमृत जैसा स्वाद हो।
वि.
(सं. सुधा+अधर)

सुधाधरण
चंद्रमा।
संज्ञा
(सं. सुधा+धरण)

सुधाधवल
चूने जैसा सफेद।
वि.
(सं.)

सुधर्म
पुण्य कर्म करनेवाला, धर्मपरायण।
वि.
(सं.)

सुधर्म
अच्छा, बढ़िया।
वि.
(सं.)

सुधर्म
पुण्य कर्तव्य, उत्तम धर्म।
संज्ञा

सुधर्मनिष्ठ
अपने धर्म पर दृढ़ रहनेवाला।
वि.
(सं.)

सुधर्मा
धर्मनिष्ठ, धर्मपरायण।
वि.
(सं. सुधर्म्मन्)
उ.-(क) बात कहन कों यों आवत है बड़े सुधर्मा धर्महिंपाल-१११२। (ख) फँसिहारिनि, बटपारिनि हम भईं, आपुन भए सुधर्मा भारी-११६०।

सुधर्मी
धर्मनिष्ठ, धर्मपरायण।
वि.
(सं. सुधर्मिन्)

सुधवाना, सुधवानो
दोष-त्रुटि दूर करना, ठीक या शोधन कराना।
क्रि.स.
(हिं. सुधरना)

सुधवाना, सुधवानो
सुध दिलाना, याद या स्मरण कराना।
क्रि.स.
(हिं. सुध+दिलाना)

सुधवाना, सुधवानो
सुध आना, याद या स्मरण होना।
क्रि.अ.

सुधाँ
मिलाकर, समेत।
अव्य.
(हिं. सुद्धाँ)

सुधा-धाम
चंद्रमा।
संज्ञा
(सं. सुधा+धाम)

सुधाधार
चंद्रमा।
संज्ञा
(सं.)

सुधाधी
सुधा के समान।
वि.
(सं. सुधा)

सुधाधौत
चुने से पुता हुआ।
वि.
(सं.)

सुधाना
याद दिलाना।
क्रि.स.
(हिं. सुध)

सुधाना
याद या स्मरण आना।
क्रि.अ.

सुधाना
ठीक करने या शोधने का काम दूसरे से कराना।
क्रि.अ.

सुधाना
(लग्न, कुंडली आदि) ठीक या निश्चित कराना।
क्रि.अ.

सुधानिधि
चंद्रमा।
संज्ञा
(सं.)
उ.-मनहुँ सुधानिधि बर्षत धन पर अमृत धार चहुँ ओर।

सुधानिधि
सागर, समुद्र।
संज्ञा
(सं.)

सुधानिधि
अत्यंत मधुर।
वि.

सुधामयूख
चंद्रमा।
संज्ञा
(सं.)

सुधार
सुधरने या सुधारने की क्रिया या भाव, संस्कार, संशोधन।
संज्ञा
(हिं. सुधरना)

सुधार
बिगड़ी हुई बात बनाना या ठीक करना।
संज्ञा
(हिं. सुधरना)

सुधार
अधिक अच्छा और उपयोगी बनाना।
संज्ञा
(हिं. सुधरना)

सुधारक
त्रुटि या दोषों को दूर करनेवाला, संशोधक।
संज्ञा
(हिं. सुधार+क)

सुधारक
धार्मिक या सामाजिक उन्नति या सुधार के लिए प्रयत्न या आंदोलन करनेवाला।
संज्ञा
(हिं. सुधार+क)

सुधारना, सुधारनो
त्रुटि, दोष आदि दूर करना।
क्रि.स.
(हिं. सुधरना)

सुधारना, सुधारनो
अधिक अच्छा या उपयोगी बनाना।
क्रि.स.
(हिं. सुधरना)

सुधारनी
सुधारनेवाली।
वि.
(हिं. सुधार)

सुधारवादी
जो सुधार करने के पक्ष में हो।
वि.
(हिं. सुधार+वादी)

सुधारश्मि
चंद्रमा।
संज्ञा
(सं.)

सुधारा
भोला-भाला, सरल प्रकृति का, निष्कपट।
वि.
(हिं. सूध=सीधा+आरा)

सुधासुर
राहु ग्रह।
संज्ञा
(सं.)

सुधारि
सुधारकर।
क्रि.स.
(हिं. सुधारना)

सुधारि
लीजै सुधारि- (बिगड़ी दशा या स्थिति को) ठीककर या बना लीजिए।
प्र.
उ.-लीजै जनम सुधारि-७−३।

सुधारी
भोला-भाला, सरल प्रकृति का।
वि.
(हिं. सूधा=सीधा+आरी)
उ.-फाटक दै कै हाटक माँगत भोरो निपट सुधारी-३३४०।

सुधारी
(बिगड़ी दशा या स्थिति को) ठीक किया या बनाया।
क्रि.स.
(हिं. सुधारना)
उ.-ब्रह्मा महादेव तैं को बड़ तिनकी सेवा कछु न सुधारी-१−३४।

सुधारू
सुधारक, संशोधक।
वि.
(हिं. सुधारना)

सुधाश्रवा
अमृत बरसानेवाला।
संज्ञा
(हिं. सुधा+श्रवण)

सुधाश्रवा
चंद्रमा।
संज्ञा
(हिं. सुधा+श्रवण)

सुधासदन
चंद्रमा।
संज्ञा
(हिं. सुधा+सदन)

सुधासुर
राहु नामक ग्रह।
संज्ञा
(सं.)

सुधि
याद, स्मृति।
संज्ञा
(हिं. सुध)
उ.-(क) गरभ-बास अति त्रास अधोमुख तहाँ न मेरी सुधि बिसरी-१−११६। (ख) कोटिक कला काछि दिखराई जल-थल सुधि नहिं काल-१−१५३। (ग) तब जमलार्जुन की सुधि आई-३९१। (घ) जबहीं आवति सुधि सखिनि की रहत अति सरमाइ-१६१५।

सुधि
होश, चेत, ज्ञान, चेतना।
संज्ञा
(हिं. सुध)
उ.-(क) प्रेम-बिबस कछु सुधि न अपनियाँ-१०−१०६। (ख) मुरछि परी तन-सुधि गई-५८९। (ग) मैमत भए जीव जल-थल के तनु की सुधि न सँभार- पृ. ३४७ (५२)। (घ) मन सुधि गई सँभारति नाहिंन-२५४५।
मुहा.- सुधि बिसराई-होश में नहीं रही। उ.-जसुमति तब अकुलाइ परी धर तनु की सुधि बिसराई-६०४। सुधि भुलाई-होश-हवास भुला दिए, बहुत विकल कर दिया। उ.-स्याम तब सांग को काचि करि साल्व की सुधि भुलाई-१० उ.-५६।

सुधि
खोज-खबर, पता।
संज्ञा
(हिं. सुध)
उ.-(क) पाइ सुधि मोहिनी की सदासिव चले-८−१०। (ख) ल्यावहु जाइ जनक-तनया-सुधि रघुपति कौं सुख देहु-९−७४।

सुधि-बुधि
होश-हवास, चेत।
संज्ञा
(सं. शुद्धि-बुद्धि)
उ.-स्रवन सुतत सुधि-बुधि सब बिसरी-७४२।

सुधियाना, सुधियानो
याद आना, स्मरण हो आना।
क्रि.अ.
(हिं. सुधि+आना)

सुधियाना, सुधियानो
याद दिलाना, स्मरण कराना।
क्रि.स.

सुधी
चतुर, समझदार, बुद्धिमान।
वि.
(सं.)
उ.-सुधी निपट देखियत तुमकौं तातैं करियत साथ-६७४।

सुधी
विद्वान, पंडित।
वि.
(सं.)

सुधी
धार्मिक।
वि.
(सं.)

सुधी
अच्छी और तीव्र बुद्धि।
संज्ञा

सुधीर
जो बहुत धैर्यवान हो।
वि.
(सं.)

सुधौटी
सुधा-पात्र।
संज्ञा
(हिं. सुधा)

सुध्यो, सुध्यौ
सुध, याद या स्मृति भी।
संज्ञा
(हिं. सुध)
उ.-(क) बैननि हू सुध्यौ भूली-१४७४। (ख) कबहुँक स्याम करत इहाँ को मन कैधौं चित्त सुध्यौ बिसराई-३११८।

सुनंद
श्रीकृष्ण का एक पार्षद।
संज्ञा
(सं.)

सुनंद
बलराम का मूसल।
संज्ञा
(सं.)

सुनंदन
श्रीकृष्ण का एक पुत्र।
संज्ञा
(सं.)

सुनंदा
श्रीकृष्ण का एक पत्नी।
संज्ञा
(सं.)

सुनइये
सुनाइए, सुमने को प्रवृत कीजिए।
क्रि.स.
(हिं. सुनाना)
उ.-बिना नाद संगीत सुधानिधि मूढ़हिं कहा सुनइयै-३३१७।

सुन-किरवा
हरे पंखवाला एक कीड़ा।
संज्ञा
(हिं. सोना+किरवा=कीड़ा)

सुनगुन
उदास और मौन।
वि.
(हिं. सुन्न+गुन्न)

सुनगुन
बहुत धीरे-धीरे की गयी बात, फुसफुसाहट, कानाफूसी।
संज्ञा

सुनगुन
वह भेद जो इधर-उधर की बातें सुनने से ज्ञात हो।
संज्ञा

सुनत
सुनता है, सुनते हैं।
क्रि.स.
(हिं. सुनना)
उ.-(क) निगंम जाको सुजस गावत सुनत संत सुजान-१−२३५। (ख) जाकौ सुजस सुनत अरु गावत-१−३१२।

सुनत
सुनकर, सुनते (ही)।
क्रि.स.
(हिं. सुनना)
उ.-(क) घूम रहीं जित-जित दधि मथनी, सुनत मेध-धुनि लाजै-१०−१३९। (ख) सुनत-सुनत सुधि-बुधि सब बिसरी-७४२।

सुनति
सुनती है।
क्रि.स.
(हिं. सुनना)

सनन
ՙसुनने՚ की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(हिं. सुनना)

सनन
कहन सुनन --जो केवल कहने-सुनने के लिए हो, वस्तुतः न हो।
यौ.
उ.-सतजुग लाख बरस की आइ।¨¨¨¨¨। कलिजुग सत संबत रहि गई। सोऊ कहन-सुनन कौं रही-१−२३०।

सुनना, सुननो
कही हुई बात या शब्द का ज्ञान कानों से प्राप्त करना, श्रवण करना।
क्रि.स.
(सं. श्रवण)

सुनना, सुननो
किसी के कथन पर ध्यान देना।
क्रि.स.
(सं. श्रवण)

सुनना, सुननो
भली-बुरी बातें श्रवण करना।
क्रि.स.
(सं. श्रवण)

सुनय
उत्तम नीति।
संज्ञा
(सं.)

सुनयन
सुंदर नत्रोंवाला।
वि.
(सं.)

सुनयन
हिरन, मृग।
संज्ञा

सुनरिया, सुनरी
सुंदरी नारी।
(सं. सुंदरी)

सुनवाई
सुनने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(हिं. सुनना+वाई)

सुनवाई
आरोप, अभियोग आदि का विचार के लिए सुना जाना।
संज्ञा
(हिं. सुनना+वाई)

सुनवैया
सुननेवाला।
वि.
(हिं. सुनना+वैया)

सुनवैया
सुनकर ध्यान देनेवाला।
वि.
(हिं. सुनना+वैया)

सुनसान
निर्जन, एकांत, जनहीन।
वि.
(सं. शून्य+स्थान)

सुनसान
बीरान, उजाड़।
वि.
(सं. शून्य+स्थान)

सुनसान
सन्नाटा।
संज्ञा

सुनहरा, सुनहला
सोने के रंग का।
वि.
(हिं. सोना)

सुनहा
कुत्ता।
संज्ञा
(सं. श्वान)

सुनहु
श्रवण करो।
क्रि.स.
(हिं. सुनना)
उ.-(क) हमारी जन्मभूमि यह गाउँ। सुनहु सखा सुग्रीव बिभीषन अवनि अजोध्या नाउँ-९−१६५। (ख) सुनहु सखी सतरात इते पर हम पर भौंहैं तानत-पृ. ३२८ (७७)।

सुना
जो (कथन आदि) श्रवण किया गया हो।
वि.
(हिं. सुनना)
मुहा.-सुना-अनसुना कर देना (करना)-कोई बात सुनकर भी उस पर ध्यान न देना या टाल जाना। कहा-सुना-पारस्परिक वार्तालाप में प्रसंगवश जो कुछ उचित- अनुचित कह-सुन दिया गया हो।

सुनाइ
सुनाकर।
क्रि.स.
(हिं. सुनना)

सुनाइ
सुनायी देता है।
क्रि.स.
(हिं. सुनना)

श्रांत
दुखी।
वि.
(सं.)

श्रांत
शांत।
वि.
(सं.)

श्रांत
सुख-भोग से तृप्त।
वि.
(सं.)

श्रांति
श्रम।
संज्ञा
(सं.)

श्रांति
थकावट।
संज्ञा
(सं.)

श्रांति
दुख, खेद।
संज्ञा
(सं.)

श्रांति
विश्राम।
संज्ञा
(सं.)

श्राद्ध
श्रद्धापूर्वक किया जानेवाला कार्य।
संज्ञा
(सं.)

श्राद्ध
वह कृत्य जो पितरों के लिए किया जाय।
संज्ञा
(सं.)
उ.- कतहूँ श्राद्ध करत पितरन को तर्पण करि बहु भाँति- सारा. ६७३।

श्राद्ध
आश्विन कृष्ण पक्ष जिसमें पितरों की तृप्ति-हेतु पिंडदान, तर्पण आदि करके ब्राह्मण को भोजन कराया जाता है, पितृपक्ष।
संज्ञा
(सं.)

सुनाइ
अच्छी तरह झुकाकर।
क्रि.अ.
(सं. सु+हिं. नवाना)

सुनाई
(कहकर) श्रवण करायी।
क्रि.स.
(हिं. सुनना)
उ.-ग्वालनि हरि की बात सुनाई-५८५।

सुनाई
सुनने की क्रिया या भाव।
संज्ञा

सुनाई
आरोप, अभियोग आदि का विचार या निर्णय करने के लिए सुना जाना।
संज्ञा

सुनाए
श्रवण कराये।
क्रि.स.
(हिं. सुनना)
उ.-ताहि या बिधि बचन कहि सुनाए−१−२७१।

सुनाद
शंख।
संज्ञा
(सं.)

सुनाद
सुन्दर शब्द या ध्वनिवाला।
वि.

सुनाना
किसी को सुनने को प्रवृत्त करना।
क्रि.स.
(हिं. सुनना)

सुनाना
खरी-खोटी कहना।
क्रि.स.
(हिं. सुनना)

सुनाभ, सुनाभी
सुन्दर नाभिवाला।
वि.
(सं. सुनाभि)

सुनाम
यश, कीर्ति, ख्याति।
संज्ञा
(सं.)

सुनामा
यशस्वी, विख्यात।
वि.
(सं.)

सुनायो, सुनायौ
श्रवण कराया।
क्रि.स.
(हिं. सुनना)
उ.-(क) सूरदास सो बरनि सुनायौ-१−२२७। (ख) नृपति बचन यह सबनि सुनायौ-१०−६१।

सुनार
सोने-चाँदी के गहने बनानेवाला कारीगर।
संज्ञा
(सं. स्वर्णकार)
उ.-बिसकर्मा सुतहार रच्यौ काम ह्वै सुनार-१०४१।

सुनारिनि, सुनारी
सुनार की स्त्री।
संज्ञा
(हिं. सुनार)
उ.-सुनारिनि ह्वै जाउँ निरखि नैननि सुख देऊँ-पृ. ३४९ (६१)।

सुनारी
सुनार का काम।
संज्ञा
(हिं. सुनार)

सुनावत
सुनाता है, श्रवण कराता है।
क्रि.स.
(हिं. सुनाना)
उ.-(क) क्यों न सुनावत निज दुख मोहिं-१−२९०। (ख) सूर-स्याम के कृत्य जसोमति, ग्वाल-बाल कहि प्रगट सुनावत-४८०।

सुनावन
सुनाने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(हिं. सुनाना)
उ.- सूर सो दिन कबहुँ तौ ह्वैहै मुरली सब्द सुनावन-२७५२।

सुनावनी
दूरस्थ प्रदेश से किसी संबंधी की मृत्यु का आया हुआ समाचार।
संज्ञा
(हिं. सुनाना)

सुनावनी
ऎसा समाचार आने पर किया जाने वाला शोक, स्नान आदि।
संज्ञा
(हिं. सुनाना)

सुनावै
दूसरे को श्रवण कराये।
क्रि.स.
(हिं. सुनाना)
उ.-यह लींला जो सुनै सुनावै-४−१२।

सुनासिक
जिसकी नाक सुन्दर हो।
वि.
(सं.)

सुनि
सुनकर।
क्रि.स.
(हिं. सुनना)
उ.-नरकौ भज्यौ नाम सुनि मेरौ-१−९६।

सुनि
सुनि न जात-सुना नहीं जाता, सुनना सहन नहीं होता।
प्र.
उ.-सुनि न जात घर-घर को घेरा काहू मुख न समाऊँ-१२२२।

सुनियत
सना जाता है, सुनते हैं।
क्रि.स.
(हिं. सुनना)
उ.-(क) सुनियत हैं, तुम बहु पतितनि कौ दीन्हौ है सुखधाम-१−१८९। (ख) जाकी चरन-रेनु की महि मैं सुनियत बहुत बड़ाई-९−४०। (ग) मुष्टिक अरु चानूर सैल सम सुनियत हैं अति भारे-२५६०। (घ) श्रीकंत सिधारौ मधुसूदन पै, सुनियत है वै भीत तुम्हारे-१० उ.-६०।

सुनियन
सुनने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(हिं. सुनना)

सुनियन
सुनियन लागे-सुनने लगे, सुनायी देने लगा।
प्र.
उ.-संख कुलाहल सुनियन लागे-९−१२५।

सुनिहौं
सुनूँगा, श्रवण करूँगा।
क्रि.स.
(हिं. सुनना)
उ.-कबहिं कमल-मुख सुनिहौं उन बोलनि-१०७२।

सुनिश्चित
भली-भाँति या दृढ़ता से निश्चित किया हुआ।
वि.
(सं.)

सुनी
श्रवण की।
क्रि.स.
(हिं. सुनना)
उ.-श्री भागवत सुनी नाहिं स्रवननि-१−६५।

सुनीति
उत्तम नीति।
संज्ञा
(सं.)

सुनीति
राजा उत्तानपाद की पत्नी जौ ध्रुव की माता थी।
संज्ञा
(सं.)
उ.-उत्तानपाद पृथ्वीपति भयौ।¨¨¨¨¨। नाम सुनीति बड़ी तिहिं दार।¨¨¨¨¨। अरु सुनीति कैं ध्रुव सुकुमार-४−९।

सुनीथ
श्रीकृष्ण का एक पुत्र।
संज्ञा
(सं.)

सुनील
बहुत गहरा नीला।
वि.
(सं.)

सुनु
(ध्यान से) श्रवण करो।
क्रि.स.
(हिं. सुनना)
उ.-सुनु सिख कंत, दंत तृन धरि कै स्यौं परिवार सिधारौ-९−११४।

सुनेत्न
सुन्दर नत्रवाला।
वि.
(सं.)

सुनै
श्रवण करो।
क्रि.स.
(हिं. सुनना)
उ.-यह लीला जौ सुनै-सुनावै-४−१२।

सुनैया
सुननेवाला।
वि.
(हिं. सुनना)

सुनैहैं
सुनायेंगे, श्रवण करायँगे।
क्रि.स.
(हिं. सुनना)
उ.-खेलत तैं तब आइ भूख कहि मोहिं सुनैहैं-५८९।

सुनोची
एक तरह का घोड़ा।
संज्ञा
(देश.)

सुनौ
श्रवण करो।
क्रि.स.
(हिं. सुनना)
उ.-थक्यौ बीच बिहाल बिहवल सुनौ करुनामूल-१−९९।

सुन्न
निर्जीव, जड़वत्, स्पंदनहीन।
वि.
(सं. शून्य)
उ.-महा कठोर सुन्न हिरदै कौ-१−१८६।

सुन्न
सिफर, शून्य।
संज्ञा

सुन्नत
खतना।
संज्ञा
(अ.)

सुन्नसान
निर्जन।
वि.
(हिं. सूनसान)

सुन्नसान
वीरान।
वि.
(हिं. सूनसान)

सुन्ना
सिफर, बिंदी।
संज्ञा
(सं. शून्य)

सुन्नी
मुसलमानों का एक वर्ग।
संज्ञा
(अ.)

सुन्यो, सुन्यौ
सुना, क्षवण किया।
क्रि.स.
(हिं. सुनना)
उ.-(क) सूर पतित जब सुन्यौ बिरद यह तब धीरज मन आयौ−९−१९५। (ख) नाहीं सूर सुन्यौ दुख कबहूँ प्रभु करुनामय कंत-९−९२।

सुपंथ
सत्पंथ, सन्मार्ग।
संज्ञा
(सं.)

सुपक, सुपक्क
खूब पका-पकाया (फल)।
वि.
(सं. सुपक्व)
उ.-(क) दसमुख छेदि सुपक नव फल ज्यौं संकर-उर दससीस चढ़ावन-९−१३१। (ख) सुपक बिंब सुक-खंडित मंडित अधर-सुधा-मधु लाल लई री-२११५।

सुपक, सुपक्क
खूब पकाया हुआ (व्यंजन या खाद्य-पदार्थ)।
वि.
(सं. सुपक्व)
उ.-माखन सहित देहि मेरी मैया सुपक सुकोमल रोटी-१०−१६३।

सुपक्ष
जिसके पंख सुन्दर हों।
वि.
(सं.)

सुपक्ष्मा
सुन्दर पलकोंवाला।
वि.
(सं. सुपक्ष्मन्)

सुपच
चोडाल, डोम।
संज्ञा
(सं. श्वपच)

सुपट
सुंदर वस्त्रों से युक्त।
वि.
(सं.)

सुपट
सुन्दर वस्त्र
संज्ञा

सुपटु
विषय-विशेष में पारंगत।
वि.
(सं.)

सुपत
प्रतिष्ठित, माननीय।
वि.
(सं. सु+हिं. पत=प्रतिष्ठा)
उ.-वह जूठो ससि जानि बदन बिधु रच्यौ बिंरंचि इहै री। सौंप्यौ सुपत बिचारि स्याम हित सु तूँ रही लटि लै री-२२७०।

सुपत्थ
सन्मार्ग।
संज्ञा
(सं. सुपथ)

सुपत्न
जिसके पत्त सुंदर हों।
वि.
(सं.)

सुपत्न
जिसके पंख सुन्दर हो।
वि.
(सं.)

सुपथ
सुमार्ग, सत्पथ।
संज्ञा
(सं.)

सुपथ
समतल मार्ग।
संज्ञा
(सं.)

सुपथ
समतल।
वि.
(सं. सु+पथ)

सुपद
सुंदर पैरोंवाला।
वि.
(सं.)

सुपद
तेज चलने वाला।
वि.
(सं.)

सुपद
सुंदर पैर।
संज्ञा
(सं. सु+पद)

सुपन
स्वप्न।
संज्ञा
(सं. स्वप्न)
उ.-मै कह्यौ निसि सुपन तौसौं, प्रगट भयौ सु आइ-५८०।

सुपनक
स्वप्न देखनेवाला।
वि.
(सं. स्वप्न)

सुपना
स्वप्न।
संज्ञा
(सं. स्वप्न)

सुपनाना, सुपनानौ
स्वप्न दिखाना या देना।
क्रि.स.
(हिं. सपना)

सुपनैं
स्वप्न में।
संज्ञा
(हिं. सपना)
उ.-(क) लोभ-मोह तैं चेत्यौ नाहीं, सुपनैं ज्यौं डहकानौं-१−३२९। (ख) जैसे सुपनैं सोइ देखियत तैसे यह संसार-२−३१। (ग) सोवत महा मनो सुपने सखि अवधि निधन निधि पाई-२७८४।

सुपरस
स्पर्श।
संज्ञा
(सं. स्पर्श)
उ.-राम सुपरस मय कौतुक निरखि सखी सुख लूटैं-९−३२।

सुपर्ण
जिसके पत्ते सुंदर हों।
वि.
(सं.)

सुपर्ण
जिसके पर या पंख सुंदर हों।
वि.
(सं.)

सुपर्ण
गरूड़।
संज्ञा

सुपर्ण
पक्षी।
संज्ञा

सुपर्ण
किरण।
संज्ञा

सुपर्ण
सुन्दर पत्ता।
संज्ञा

सुपर्ण
सुंदर पंख।
संज्ञा

सुपर्णी
गरुड़ की माता।
संज्ञा
(सं.)

सुपर्व
देवता।
संज्ञा
(सं. सुपर्व्वन्)

सुपर्व
शुभ मुहूर्त या काल।
संज्ञा
(सं. सुपर्व्वन्)

सुपाग
अच्छी पगड़ी।
संज्ञा
(सं. सु+हिं. पाग)
उ.-कुंचित केस मयूर चंद्रिका मंडल सुमन सुपाग-१२१४।

सुपात्न
योग्य और उपयुक्त व्यक्ति।
संज्ञा
(सं.)

सुपात्न
सुंदर और पवित्र बर्तन।
संज्ञा
(सं.)

सुपारी
एक वृक्ष जिसके फल के छोटे-छोटे टुकड़े पान में डालकर खाये जाते हैं।
संज्ञा
(सं. सुप्रिय)
उ.-लौंग नारियर दाख सुपारी कहा लादे हम आवै-११०८।

सुपास
आराम, सुख, सुभीता।
संज्ञा
(देश.)

सुपासी
सुख देनेवाला।
वि.
(हिं. सुपास)

सुपीत
गहरे पीले रंग का।
वि.
(सं.)

सुपीन
बहुत मोटा या बड़ा।
वि.
(सं.)

सुपुत्न
अच्छा और योग्य पुत्र।
संज्ञा
(सं.)
उ.-धन्य सुपुत्र पिता पन राख्यौ-९−१५१।

सुपुरुष
सुंदर पुरुष।
संज्ञा
(सं.)

सुपुरुष
सत्पुरुष, सज्जन पुरुष।
संज्ञा
(सं.)

सुपुर्द
किसी को सौंपा हुआ।
वि.
(हिं. सपुर्दं)

सुपूत
अच्छा पुत्र, सुपुत्र।
वि.
(सं. सु+हिं. पूत)

सुपूती
ՙसुपुत्र՚ होने का भाव।
संज्ञा
(हिं. सपूत)

सुपूती
अच्छे पुत्रों की माता।
संज्ञा
(हिं. सपूत)

सुपेत, सुपेद, सुफेद
सफेद।
वि.
(हिं. सफेद)

श्रिय
मंगल, कल्याण।
संज्ञा
(सं. श्रिया)

श्रिय
शोभा।
संज्ञा
(सं. श्री)

श्री
विष्णु-पत्नी कमला, लक्ष्मी।
संज्ञा
(सं.)
उ.- तजि बैकुंठ गरूड़ तजि श्री तजि निकट दास के आयो-१-१०।

श्री
सरस्वती।
संज्ञा
(सं.)

श्री
धन-सम्पत्ति।
संज्ञा
(सं.)

श्री
ऐश्वर्य, विभूति।
संज्ञा
(सं.)

श्री
कीर्ति।
संज्ञा
(सं.)

श्री
प्रभा, शोभा, कांति।
संज्ञा
(सं.)

श्री
वृद्धि।
संज्ञा
(सं.)

श्री
सिद्धि।
संज्ञा
(सं.)

सुप्रभ
सूंदर, सुरुप।
वि.
(सं.)

सुप्रभा
सुन्दर प्रकाश।
संज्ञा
(सं.)

सुप्रभा
अग्नि की सात जिह्वाओं में एक।
संज्ञा
(सं.)

सुप्रभात
सुन्दर प्रातःकाल।
संज्ञा
(सं.)

सुप्रभात
मंगलसूचक प्रभात।
संज्ञा
(सं.)

सुप्रसन्न
बहुत प्रसन्न।
वि.
(सं.)

सुप्रसन्न
अत्यंत विकसित।
वि.
(सं.)

सुप्रसन्न
बहुत निर्मल।
वि.
(सं.)

सुप्रसाद
अत्यंत प्रसन्न या कृपालु।
वि.
(सं.)

सुप्रसिद्ध
अत्यंत बिख्यात।
वि.
(सं.)

सुप्तता
नींद, निद्रा।
संज्ञा
(सं.)

सुप्ति
नींद, निद्रा।
संज्ञा
(सं.)

सुप्ति
औंधाई।
संज्ञा
(सं.)

सुप्ति
अंग की निष्चेष्टा।
संज्ञा
(सं.)

सुप्रज्ञ
बहुत बुद्धिमान।
वि.
(सं.)

सुप्रतिष्ठ
जिसका खूब आदर-सम्मान हो।
वि.
(सं.)

सुप्रतिष्ठ
सुप्रसिद्ध।
वि.
(सं.)

सुप्रतिष्ठा
अच्छा मान-सम्मान।
संज्ञा
(सं.)

सुप्रतिष्ठा
सुप्रसिद्ध।
संज्ञा
(सं.)

सुप्रभ
विशेष प्रभा या प्रकाशयुक्त।
वि.
(सं.)

सुपेती, सुपेदी, सुफेदी
सफेदी।
संज्ञा
(हिं. सफेद)

सुपेती, सुपेदी, सुफेदी
बिछौना।
संज्ञा
(हिं. सफेद)

सुपेती, सुपेदी, सुफेदी
गद्दा, तोशक।
संज्ञा
(हिं. सफेद)

सुपेती, सुपेदी, सुफेदी
रजाई, लिहाफ।
संज्ञा
(हिं. सफेद)

सुप्त
सोया हुआ।
वि.
(सं.)

सुप्त
ठिठुरा हुआ।
वि.
(सं.)

सुप्त
मुँदा हुआ (जैसे फूल)।
वि.
(सं.)

सुप्त
सुस्त।
वि.
(सं.)

सुप्त
जिसकी क्रिया या चेष्टा रुकी हुई हो, निष्क्रिय, अकर्मण्य।
वि.
(सं.)

सुप्तता
सुप्त होने का भाव।
संज्ञा
(सं.)

सुप्रिय
अत्यंत प्रिय।
वि.
(सं.)

सुप्रीति
सच्ची प्रीति या भक्ति।
संज्ञा
(सं.)
उ.-औरौ सकल सुकृत श्रीपति-हित प्रतिफल-रहित सुप्रीति-२−१२।

सुप्रेम
बहुत अधिक प्रेम।
संज्ञा
(सं.)
उ.-बाल-केलि गावति मल्हावति सुप्रेम भर-१०−१५१।

सुफल
सुंदर फल।
संज्ञा
(सं.)
उ.- धर बिधंसि नर करत किरषि हल बारि बीज बिथरै। सहि सन्मुख तउ सीत उष्न कौं सोई सुफल करै-१−११७

सुफल
सुंदर फल।
वि.
उ.-अंब सुफल छाँड़ि, कहा सेमर कौं धाऊँ-१−१६६।

सुफल
सुंदर फल या फाल वाला (अस्त्र)।
वि.

सुफल
सफल, कृतकार्य।
वि.
उ.-(क) सबनि कौं अँग परसि कीन्हों सुफल ब्रत-व्यवहार-७९६। (ख) नैन सुफल भए सबके-१८१९।

सुफलक
एक यादबजो अक्रूर का पिता था।
संज्ञा
(सं.)

सुफलकसुत
अक्रूर जो सुफलक नामक यादव का पुत्र था और जो कंस की आज्ञा से श्रीकृष्ण, बलराम आदि को मथुरा ले गया था।
संज्ञा
(सं. सुफलक+सुत)
उ.-सुफलकसुत मिलि ढंग ठान्यौ है, साधे बिषमन घात-३३५१।

सुफला
सुंदर या बहुत फल उपजानेवाली।
वि.
(सं.)

सुबरनियॉ
सुंदर रंग की।
वि.
(सं. सु+वर्ण)
उ.-रुचिर-चिबुक द्विज-अधर, नासिका अति सुंदर राजति सुबरनियाँ-१०−१०६।

सुबल
श्रीकृष्ण का सखा एक गोप।
संज्ञा
(सं.)
उ.-(क) सुबल हलधर अरु श्रीदामा करत नाना रंग-१०−२१३। (ख) सुबल श्रीदामा सुदामा वै भए इक ओर-१०−२४४।

सुबल
बहुत बली या बलशाली।
वि.
उ.-सुभट अनेक सुबल दल साजे परे सिंधु के पार-९−८३।

सुबस
जो अपने वंश या अधिकार में हो।
वि.
(सं. स्व+बस)

सुबस
अपने वंश या अधिकार में।
क्रि.वि.
उ.-(क) सुबस बसौं इहिं गाउँ-१−१८५। (ख) नैन सुबस नाहीं अलि मेरे-३४४२। (ग) तुमरे सुबस सदा अलि खेलैं-सारा. ५७६।

सुबह
सबेरा, प्रातःकाल।
संज्ञा
(अ.)

सुबहान अल्ला
ईश्वर धन्य है।
पद.
(अ.)

सुबात
सुंदर बात।
संज्ञा
(सं. सु+हिं. बात)

सुबास
सुगंध।
संज्ञा
(सं. सु+हिं. बास)

सुबास
सुंदर निवासस्थान।
संज्ञा
(सं. सु+हिं. वास)

सुफला
सुंदर फल या फालवाली।
वि.
(सं.)

सुफेद
सफेद।
वि.
(हिं. सफेद)

सुबंध
अच्छी तरह बँधा हुआ।
वि.
(सं.)

सुबंधु
जिसके अच्छे बंधु या मित्र हों।
वि.
(सं.)

सुबंधु
अच्छा या उत्तम भाई।
संज्ञा

सुबचन
श्रेष्ठ वचन।
संज्ञा
(सं. सु+वचन)
उ.-(क) हरिजू कह्यौ, सुनौ दुरजोधन सत्य सुबचन हमारे-१−२४२। (ख) सूर सुबचन मनोहर कहि कहि अनुज सूल बिसरायौ-३७४।

सुबधू
सुंदर या श्रेष्ठ आचरण या संस्कारवाली बधू।
संज्ञा
(सं. सु+हिं. बंधू)
उ.-धन्य सुपुत्र पिताप्रन राख्यौ, धनि सुबधू कुल-लाज-९−१५१।

सुबरन
सुंदर रंगवाला।
वि.
(सं. सु+वर्ण)

सुबरन
सोना, स्वर्ण।
संज्ञा
(सं. स्वर्ण)
उ.-सुबरन थार रहे हाथनि लसि-१०−३२।

सुबरन
सोने के।
वि.
उ.-सुबरन लंक-कलस- आभूषण-९−३०।

सुबास
ईश्वर या ब्रह्म का निवास स्थान, ब्रह्मलोक।
संज्ञा
(सं. स्व+हिं. बास)

सुबासत
महकता है।
क्रि.अ.
(हिं. सुबासना)
उ.-सालन सकल कपूर सुबासत-३९६।

सुबासना
सुगंध।
संज्ञा
(सं. सु+हिं. बास)

सुबासना
महकाना, सुबासित या सुगंधित करना।
क्रि.स.

सुबासना
महकना, सुगंध देना या फैलना।
क्रि.अ.

सुबासिक
सुगंधयुक्त।
वि.
(सं. सु+वास)

सुबासित
सुगंधत।
वि.
(सं. सुवासित)

सुबाहु
श्रीकृष्ण के एक पुत्र का नाम।
संज्ञा
(सं.)

सुबाहु
एक राक्षस का नाम।
संज्ञा
(सं.)
उ.-मारिच और सुबाहु महासुर बिधन करत जिन जाम-सारा. १७९।

सुबाहु
सुंदर बाहोंवाला।
वि.

सुबाहु
मजबूत या बलशाली बाहुओंवाला।
वि.

सुबीता
सुगमता।
संज्ञा
(हिं. सुभीता)

सुबीता
सुअवसर।
संज्ञा
(हिं. सुभीता)

सुबीता
आराम।
संज्ञा
(हिं. सुभीता)

सुबुक
जो भारी न हो, हलका।
वि.
(फ़ा.)

सुबुक
मनोरह, सुंदर।
वि.
(फ़ा.)

सुबुक
एक तरह का मजबूत घोड़ा।
संज्ञा

सुबुद्धि
बुद्धिमान।
वि.
(सं.)

सुबुद्धि
श्रेष्ठ बुद्धिवाला।
वि.
(सं.)

सुबुद्धि
अच्छी या उत्तम बुद्धि।
संज्ञा

सुबुध
बुद्धिमान।
वि.
(सं. बुद्धि)

सुबुध
सतर्क, सावधान।
वि.
(सं. बुद्धि)

सुबू
प्रातःकाल।
संज्ञा
(हिं. सुबह)

सुबूत
प्रमाण।
संज्ञा
(अ. सबूत)

सुबेद
अच्छी तरह जानने योग्य।
वि.
(सं. सुवेद्य)

सुबोध
समझदार, बुद्धिमान।
वि.
(सं.)

सुबोध
जो सबकी समझ में आ सके।
वि.
(सं.)

सुब्रह्मण्य
शिव।
संज्ञा
(सं.)

सुब्रह्मण्य
विष्णु।
संज्ञा
(सं.)

सुब्रह्मण्य
दक्षिण भारत का क प्राचीन प्रदेश।
संज्ञा
(सं.)

सुबेस
सुंदर वेश।
संज्ञा
(सं. सु+वेश)
उ.-मनौ नव घन दामिनी तजि रही सहज सुबेस-६३३।

सुभ
अच्छा।
वि.
(सं. शुभ)
उ.-बहुरि हिमाचल कैं सुभ घरी। पारवती ह्वै सो अवतरी-४−७।

सुभ
मंगलप्रद, कल्याणकारी।
वि.
(सं. शुभ)
उ.-(क) द्वादस स्कंध परम सुभ प्रेम-भक्ति की खानि-१०−१। (ख) आछौ दिन सुनि महरि जसोदा सखिनि बोलि सुभ गान करयौ-१०−८८।

सुभ
मंगल, कल्याण।
संज्ञा
उ.-संतत सुभ चाहत प्रिय जन जानि-१−७७।

सुभग
सुंदर, मनोहर।
वि.
(सं.)
उ.-(क) उराग-इंद्र उनमान सुभग भुज-१−६९। (ख) मेरौं सुभग साँवरौ ललना-१०−५४। (ग) इंद्र बदन नव जलद सुभग तनु दोउ खग नैन कह्यौ-२५६४।

सुभग
सौभाग्यवती।
वि.
(सं.)
उ.-सोभित सुभग नंद जू की रानी-१०−७८।

सुभग
प्रिय लगनेवाला, रुचिकर।
वि.
(सं.)

सुभग
सुखद, सुखदायी।
वि.
(सं.)

सुभगता
सुंदरता।
संज्ञा
(सं.)

सुभगता
सौभाग्य।
संज्ञा
(सं.)

श्राद्धपक्ष
आश्विन कृष्ण पक्ष जब पितरों को पिंडदान, तर्पण आदि करके ब्राह्मण को भोजन कराया जाता और दक्षिण दी जाती है।
संज्ञा
(सं.)

श्राप
शाप।
संज्ञा
(सं. शाप)

श्रावक, श्रावग
जैन या बौद्ध संन्यासी।
संज्ञा
(सं. श्रावक)
उ.- अजहूँ श्रावग ऐसो करै, ताही को मारग अनुसरै।

श्रावक, श्रावग
सुननेवाला, श्रोता।
वि.

श्रावगी
जैन धर्मानुयायी।
संज्ञा
(सं.)

श्रावण
असाढ़ और भादों के बीच का महीना।
संज्ञा
(सं.)

श्रावण
शब्द।
संज्ञा
(सं.)

श्रावण
श्रावण मास की पूर्णिमा जिस दिन ‘रक्षाबंधन’ या ‘सलूनों’ का त्योहार होता है।
संज्ञा
(सं.)

श्रावना
गिराना, बहाना।
क्रि.स.
(सं. स्त्रवना)

श्रावस्ती
एक प्राचीन नगरी।
संज्ञा
(सं.)

सुभद्र
सौभाग्य।
संज्ञा
(सं.)

सुभद्र
मंगल, कल्याण।
संज्ञा
(सं.)

सुभद्रा
श्रीकृष्ण की बहन जिसका विवाह अर्जुन से हुआ था।
संज्ञा
(सं.)

सुभर
भला, अच्छा।
वि.
(सं. शुभ)

सुभर
मंगलप्रद, कल्याणकारी।
वि.
(सं. शुभ)

सुभर
अच्छी तरह भरा हुआ।
वि.
(सं. सु+हिं. भरना)

सुभा
सुधा।
संज्ञा
(सं. शुभा)

सुभा
शोभा।
संज्ञा
(सं. शुभा)

सुभा
हड़, हरीतकी।
संज्ञा
(सं. शुभा)

सुभाइ
बान, आदत।
संज्ञा
(सं. स्वभाव)
उ.-ज्यौं गयंद अन्हाइ सरिता बहुरि बहै सुभाइ-१−४५।

सुभगता
प्रेम।
संज्ञा
(सं.)

सुभगता
(स्त्री का) सुख।
संज्ञा
(सं.)

सुभगा
सुंदरी।
वि.
(सं.)

सुभगा
सौभाग्यवती।
वि.
(सं.)

सुभगा
(स्त्री) जो पति को प्रिय हो।
वि.
(सं.)

सुभगी
सुभग।
वि.
(सं. सुभग)

सुभट
अच्छा या श्रेष्ट योद्धा।
संज्ञा
(सं.)
उ.-(क) रथ तैं उत्तरि चक्र कर लीन्हौ सुभट सामहैं आए-१−२७४। (ख) सुभट अनेक सबल दल साजे परे सिंधु के पार-९−८३। (ग) ऎसौ सुभट नहीं महिमंडल देख्यौ बालि समान-९−१३४।

सुभट
वीर, बली।
वि.
उ.-संकट परैं तुरत उठि धावत, परम सुभट निज पन कौं-१−९।

सुभटवंत
वीर, बली।
वि.
(सं. सुभट+वत्)
उ.-लख्यौ बलराम यह सुभटवंत है कोऊ हल मुसल सस्त्र अपनो संभारयौ-१० उ.-४५।

सुभद्र
श्रीकृष्ण के एक पुत्र का नाम।
संज्ञा
(सं.)

सुभाग
स्त्री की सधवा होने की दशा, सुहाग।
संज्ञा
(सं. सौभाग्य)

सुभाग
भाग्यवान।
वि.

सुभाग
सुखी।
वि.

सुभागा
भाग्यशाली।
वि.
(सं. सु+भाग्य)

सुभागिन
भाग्यवाती।
वि.
(सं. सु+भाग्य)

सुभागिन
सुहागिन।
वि.
(सं. सु+भाग्य)

सुभागी, सुभागीन
भाग्यशालिनी।
वि.
(सं. सु+भाग्य)

सुभागी, सुभागीन
सुहागिन, सौभाग्यवती।
वि.
(सं. सु+भाग्य)

सुभाग्य
परम भाग्य, सौभाग्य।
संज्ञा
(सं.)
उ.-तिनके कपिलदेव सुत भए। परम सुभाग्य मानि तिन लए-३−१३।

सुभान
धन्य-धन्य।
अव्य.
(अ. सुबहान)

सुभान
सुभान अल्ला-ईश्वर धन्य है।
यौ.

सुभाना,सुभानो
देखने में सुन्दर या भला जान पड़ना।
क्रि.अ.
(हिं. शोभना)

सुभानु
श्रीकृष्ण का एक पुत्र।
संज्ञा
(सं.)

सुभानु
सुंदर या उत्तम प्रकाश से युक्त।
वि.

सुभाय
बान, आदत।
संज्ञा
(सं. स्वभाव)

सुभाय
सहज गुण, प्रकृति।
संज्ञा
(सं. स्वभाव)
उ.-प्रभु कौ देखौं एक सुभाय-१−८।

सुभाय
सद्भाव।
संज्ञा
(सं. सु+भाव)

सुभायक
स्वाभाविक।
वि.
(सं. स्वाभाविक)

सुभाव
बान, आदत।
संज्ञा
(सं. स्वभाव)
उ.-जिन तन-धन मोहिं प्रान, समरपे सील-सुभाव बढ़ाई-९−७।

सुभाव
सहज गुण, प्रकृति।
संज्ञा
(सं. स्वभाव)
उ.-(क) यहै सुभाव सूर के प्रभु कौ भक्त-बछल प्रन पारत-१−१२। (ख) तऊ सुभाव न सीतल छाँड़ै-१−११७। (ग) नील जलद पर उडुगन निरखत तजि सुभाव मनु तड़ित छपाए-१०−१०४।

सुभाइ
प्रकृति, सहज गुण।
संज्ञा
(सं. स्वभाव)
उ.-(क) सूर जो द्वै रंग त्यागै यहै भक्त सुभाइ-१−७०। (ख) संपति बिपति, बिपति तैं संपति, देह कौ यहै सुभाइ-१२६५। (ग) बिकसति लता सुभाइ आपने छाया सधन भई-२७७३।

सुभाइ
बड़ी लगन या आत्मीयता से।
क्रि.वि.
उ.-कंटक सों कंटक लै काढ़यौ अपने हाथ सुभाइ-३२२७।

सुभाइ
सहज भाव से स्वभावतः।
क्रि.वि.

सुभाइ
बहुत सहज में।
क्रि.वि.

सुभाई
सहज भाव से।
क्रि.वि.
(सं. सु+भाव)
उ.-चारिहूँ जुग करी कृपा परकार जेहि, सूरहू पर करौ तेहि सुभाई-८−९।

सुभाउ
सहज भाव से।
क्रि.वि.
(सं. सु+भाव)
उ.-कछुक जनाऊँ अपुनपौ अब लौं रह्यौं सुभाउ-४३२।

सुभाउ
प्रकृति, सहज गुण।
संज्ञा
(सं. स्वभाव)
उ.-मुख प्रसन्न सीतल सुभाउ निस देखत नैंन सिराइ।

सुभाए
प्रिय लगनेवाले।
वि.
(सं. सु+हिं. भाना)
उ.-इन माहिं गुन हैं सुभाए-८−८।

सुभाए
सहज गुण, स्वाभाव, प्रकृति।
संज्ञा
(सं. स्वभाव)
उ.-मुरली कौन सुकृत फल पाए।¨¨¨। अंतर सून्य सदा देखियत है, निज कुल बंस सुभाए-६६१।

सुभाग
अच्छा भाग्य।
संज्ञा
(सं. सौभाग्य)

सुभाव
सहज भाव से।
क्रि.वि.
उ.-नाभि-हद रोमावली अलि चले सहज सुभाव-१−३०७।

सुभाषित
अच्छे ढंग से कहा हुआ।
वि.
(सं.)

सुभाषित
सुंदर और सत्य उक्ति।
संज्ञा

सुभाषित
सुंदर स्वर या ढंग से।
क्रि.वि.
उ.-जिहिं गीत सुभाषित गावत कहति परस्पर गासक-३२२१।

सुभाषी
सुंदर और प्रिय बोलनेवाला, मिष्टभाषी, प्रियंवद।
वि.
(सं. सुभाषिन्)

सुभाष
खूब चमकीला या प्रकाशवान।
वि.
(सं.)

सुभिक्ष
ऎसा समय जब अन्न खूब सस्ता हो, सुकाल।
संज्ञा
(सं.)

सुभी
मंगलकारिणी।
वि.
(सं. शुभ)
उ.-है जलधार हार मुकुता मनो बगपंगति कुमुदमाल सुभी-१४४८।

सुभीता
आसानी, सुगमता।
संज्ञा
(देश.)

सुभीता
सुअवसर, सुयोग।
संज्ञा
(देश.)

सुम
चौपायों के खुर, टाप।
संज्ञा
(फ़ा.)

सुमत
ज्ञानी, बुद्धिमान।
वि.
(सं.)

सुमत
अच्छी या उत्तम बुद्धि।
संज्ञा
(सं. सुमति)

सुमत
पारस्परिक हेल-मेल।
संज्ञा
(सं. सुमति)

सुमति
राजा सगर की पत्नी का नाम।
संज्ञा
(सं.)

सुमति
सुंदर मति, सुबुद्धि।
संज्ञा
(सं.)
उ.-(क) नहिं कर लकुटि सुमति-सत्संगति जिहिं अधार अनुसरई-१−४८। (ख) कहु री सुमति कहा तोहिं पलटी, प्रान-जिवन कैसैं बन जात-९−३८।

सुमति
पारस्परिक हेल-मेल।
संज्ञा
(सं.)

सुमति
अच्छी बुद्धिवाला, बुद्धिमान।
वि.
उ.-(क) अर्जुन भीम जुधिष्टिर सहदेव सुमति नकुल बलभारे-१−२५७। (ख) सुनियत हुते तैसेई देखे सुन्दर सुमति सु भोरे-२९७१।

सुमद
मतवाला, मदोन्मत्त।
वि.
(सं.)

सुमदा
राधा की सखी एक गोपी।
वि.
(सं.)
उ.-स्यामा कामा चतुरा नवला प्रमदा सुमदा नारि-१५८०।

सुभीता
आराम, सुख।
संज्ञा
(देश.)

सुभीमा
श्रीकृष्ण की एक पत्नी।
संज्ञा
(सं.)

सुभुज
सुंदर भुजाओंवाला, सुबाहु।
वि.
(सं.)

सुभूति
कौशल।
संज्ञा
(सं.)

सुभूति
उन्नति।
संज्ञा
(सं.)

सुभूषित
भली-भाँति अलंकृत।
वि.
(सं.)

सुभेषज
गुणकारी औषध।
संज्ञा
(सं. सु+भेषज)
उ.-सूर मिटै अज्ञान-मुरछा ज्ञान सुभेषज खाऎं-२−३२।

सुभोग्य
सुख से भोगने योग्य।
वि.
(सं.)

सुभोरे
सरल और सीधे स्वभाव का, निष्कपट।
वि.
(सं. सु+हिं. भोला)
उ.-सुनियत हुते तैंसे देखे सुंदर सुमति सुभोरे-२९७१।

सुभौटी
शोभा।
संज्ञा
(सं. शोभा)

सुभ्र
उजला, श्वेत।
वि.
(सं. शुभ्र)

सुभ्रु
जिसकी भवें सुंदर हों।
वि.
(सं.)

सुमंगल
अत्यंत शुभ।
वि.
(सं.)

सुमंगली
वह दक्षिणा जो विवाह में सप्तपदी के बाद पुरोहित को दी जाती है।
संज्ञा
(सं.)

सुमंत, सुमंत्र
राजा दशरथ का एक मंत्री जो उनका सारथी भी था।
संज्ञा
(सं. सुमंत्र)

सुमंत, सुमंत्र
सुंदर मंत्र।
संज्ञा
(सं. सु+मंत्र)
उ.-कृष्न सुमंत्र जियावनमूरी जिन मरत जिवायौ-२-३२।

सुमंत्रित
(व्यक्ति) जिसे अच्छा परामर्श मिला हो।
वि.
(सं.)

सुमंत्रित
(कार्य-व्यापार) जिसके संबंध में उचित परामर्श मिला हो।
वि.
(सं.)

सुमंथन
मंदराचल।
संज्ञा
(सं. सु+मंथ=पर्वत)

सुमंद्र
ՙसरसी՚ छंद का दूसरा नाम (होली के ՙकबीर՚ प्रायः इसी छंद में होते हैं)।
संज्ञा
(सं.)

सुमधुर
बहुत मीठा या मधुर।
वि.
(सं.)

सुमन
देवता।
संज्ञा
(सं. सुमनस्)

सुमन
पंडित, विद्वान।
संज्ञा
(सं. सुमनस्)

सुमन
फूल, पुष्प।
संज्ञा
(सं. सुमनस्)
उ.-बंधुक सुमन अरुन पद पंकज-१०−१०४।

सुमन
सहृदय, दयालु।
वि.

सुमन
मनोहर।
वि.

सुमनचाप
कामदेव जिसका धनुष फलों का माना गया है।
संज्ञा
(सं.)

सुमनस
देवता।
संज्ञा
(सं. सुमनस्)

सुमनस
विद्वान।
संज्ञा
(सं. सुमनस्)

सुमनस
फूल, पुष्प।
संज्ञा
(सं. सुमनस्)

श्री
‘वेंदी’ नामक आभूषण।
संज्ञा
(सं.)

श्री
आदरसूचक शब्द।
संज्ञा
(सं.)
उ.- (क) श्री नृसिंह बपु धरयो असुर हति-१-१७। (ख) श्रीकंत सिधारो मधुसूदन पै सुनियत हैं वै मीत तुम्हारे-१० उ.- ६०।

श्री
एक वैष्णव-संप्रदाय।
संज्ञा

श्री
एक राग।
संज्ञा

श्री
सुंदर।
वि.

श्री
श्रेष्ठ।
वि.

श्री
शुभ।
वि.

श्रीकंठ
शिव, महादेव।
संज्ञा
(सं.)

श्रीकंत, श्रीकांत
विष्णु।
संज्ञा
(सं. श्रीकांत)

श्रीखंड, श्रीखंडा
चंदन-विशेष, हरिचंदन।
संज्ञा
(सं. श्रीखंड)
उ.- तनु श्रीखंड मेघ उज्जवल अति, देखि महाबल भाँति।

सुमनस
प्रसन्नचित।
वि.

सुमना
चमेली (पुष्प)।
संज्ञा
(सं.)

सुमना
कैकेयी का वास्तविक नाम।
संज्ञा
(सं.)

सुमना
राधा की सखी एक गोपी।
संज्ञा
(सं.)
उ.-सुमना बहुला चंपा जुहिला ज्ञाना माना भाउ-१५८०।

सुमना
सहृदय या दयालु (नारी)।
वि.

सुमना
प्रसन्नचित (नारी)।
वि.

सुमना
सुंदरी।
वि.

सुमनित
जिसमें सुंदर मणियाँ जड़ी हों।
वि.
(सं. सुमणि)

सुमनित
जिस (पौधे) में खब फूल लगे हों।
वि.
(सं. सुमन)

सुमरन
स्मरण।
संज्ञा
(सं. स्मरण)

सुमरन
जाप की माला।
संज्ञा
(हिं. सुमरनी)

सुमरना
ध्यान, चिंतन या स्मरण करना।
क्रि.स.
(सं. स्मरण)

सुमरना
बार-बार नाम लेना, जपना।
क्रि.स.
(सं. स्मरण)

सुमरनी
जाप करने की माला जिसमें सत्ताईस दाने होते हैं।
संज्ञा
(हिं. सुमरना)

सुमानस
सहृदय।
वि.
(सं.)

सुमानी
बहुत घमंडी या अभिमानी।
वि.
(सं. सुमानिन्)

सुमानी
स्वाभिमानी।
वि.
(सं. सुमानिन्)

सुमान्य
विशेष प्रतिष्ठित।
वि.
(सं.)

सुमारग, सुमार्ग
साफ, चिकना और समतल मार्ग।
संज्ञा
(सं. सु+मार्ग)

सुमारग, सुमार्ग
नैतिक दृष्टि से अच्छा मार्ग, सुपथ,सन्मार्ग।
संज्ञा
(सं. सु+मार्ग)
उ.-सूर सुमारग फेरि चलैगौ। बेद बचन उर धारौ-१−१९२।

सुमाल
सुन्दर माला।
संज्ञा
(सं. सु+हिं. माल)
उ.-कंठ सुमाल हार मुक्ता के हीरा रत्न अपार-३३२१।

सुमाली
एक राक्षस जो रावण, कुम्भकर्ण आदि का नाना था।
संज्ञा
(सं. सुमालिन्)

सुमाली
एक बानर का नाम।
संज्ञा
(सं. सुमालिन)

सुमित्र
श्रीकृष्ण के एक पुत्र का नाम।
संज्ञा
(सं.)

सुमित्र
उत्तम मित्रोंवाला।
वि.

सुमित्रा
राजा दशरथ की पत्नी जो लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न की माता थी।
संज्ञा
(सं.)

सुमित्रानंदन
लक्ष्मण और शत्रुघ्न।
संज्ञा
(सं.)

सुमिरण
स्मरण।
संज्ञा
(सं. स्मरण)

सुमिरत
स्मरण करता है या करते (ही)।
क्रि.स.
(हिं. सुमिरना)
उ.-(क) सुमिरत ही तत्काल कृपानिधि बसन प्रवाह बढ़ायौ-१−१०९। (ख) मनसा करि सुमिरत हे जब जब मिलते तब तब हीं-१−२८३। (ग) मन बच कर्म और नहिं जानत सुमिरत और सुमिरावत-२−१७।

सुमिरन
याद।
संज्ञा
(सं. स्मरण)
उ.-माया मोइ ताहि नहिं गह्यौ। सुन्यौ ज्ञान सो सुमिरन रह्यौ-१−२२६।

सुमिरन
नौ प्रकार की भक्तियों में एक जिलमें परमाराध्य का निरंतर ध्यान या जाप किया जाता है।
संज्ञा
(सं. स्मरण)
उ.-(क) सो श्रीपति जुग जुग सुमरिन-बस-१−१७। (ख) किते दिन हरि सुमिरन बिनु खोये-१−५२। (ग) नर-देही दीनी सुमिरन कौं-१−११६। (घ) सुमिरन ध्यान कथा हरि जू की-१−३२४।

सुमिरना, सुमिरनो
याद या स्मरण करना।
क्रि.स.
(हिं. सुमिरना)

सुमिरना, सुमिरनो
(नाम) जपना।
क्रि.स.
(हिं. सुमिरना)

सुमिरनी
जाप करने की माला जो सत्ताईस दानों की होती है।
संज्ञा
(हिं. सुमिरनी)

सुमिराना, सुमिरानो
याद या स्मरण कराना।
क्रि.स.
(हिं. सुमिरना)

सुमिराना, सुमिरानो
(नाम) जपने को प्रवृत्त करना।
क्रि.स.
(हिं. सुमिरना)

सुमरावत
(नाम) जपता या जपने की प्रेरणा देता है।
क्रि.स.
(हिं. सुमिराना)
उ.-मन बच कर्म और नहिं जानत, सुमिरत औ सुमिरावत-२−१७।

सुमिरि
याद या स्मरण करके।
क्रि.स.
(हिं. सुमिरना)
उ.-कीजै कृपा सुमिरि अपनौ प्रन-१−१६४।

सुमिरि
याद या स्मकण कर या करो।
क्रि.स.
(हिं. सुमिरना)
उ.-सुमिरि सनेह कुरंग कौ-१−३२५।

सुमिरिनिया, सुमिरिनी
नाम जपने की माला जिसमें सत्ताईस दाने होते हैं।
संज्ञा
(हिं. सुमिरनी)

सुमिरे
ध्यान या स्मरण किया।
क्रि.स.
(हिं. सुमिरना)
उ.-(क) जहाँ जहाँ सुमिरे हरि जिहिं बिधि, तहँ तैसे उठि धाए-१−७। (ख) राज-रवनि सुमिरे पति-कारन असुर बंदि तैं दियै छुड़ाई-१−२४।

सुमिरौ
ध्यान या स्मरण करो।
क्रि.स.
(हिं. सुमरना)
उ.-(क) सूरदास प्रभु हित कै सुमिरौ तौ आनँद करिकै नाँचौ-१−८३। (ख) हरि हरि हरि सुमिरो सब कोइ-१−२२६।

सुमिर्यो, सुमिर्यौ
ध्यान या स्मरण किया।
क्रि.स.
(हिं. सुमिरना)
उ.-(क) राम न सुमिरयौ एक घरी-१−७१। (ख) मनसा करि सुमिरयौ गज बपुरैं ग्राह प्रथम गति पावै-१−१२२।

सुमिल
जो सहज में मिल सके या मिला हो।
क्रि.स.
(हिं. सु+हिं. मिलना)

सुमिल
जिसका ठीक-ठीक मेल बैठ जाय, उपयुक्त।
क्रि.स.
(हिं. सु+हिं. मिलना)

सुमिल
मेल-जोल या स्नेह-भाव बनाये रखनेवाला।
क्रि.स.
(हिं. सु+हिं. मिलना)

सुमीड़
अच्छी तरह मीड़ या मसलकर।
क्रि.स.
(हिं. सुमीड़ना)
उ.-राहु केतु मानो सुमीड़ विधु-३४८२।

सुमीड़ना, सुमीड़नो
अच्छी तरह मीड़ना, मसलना या मसोसना।
क्रि.स.
(सं. सु + हिं.मीड़ना)

सुमुक्त
पूर्णतया मुक्त।
वि.
(सं. सु+युक्त)
उ.-ऎसौ भक्त सुमुक्त कहावै। सो बहुरयौ भव-जल नहिं आवै-३−१३।

सुमुख
सुन्दर मुख।
संज्ञा
(सं.)

सुमुख
सुंदर मुखवाला।
वि.

सुमुख
सुंदर।
वि.

सुमुख
प्रसन्न।
वि.

सुमुखी
सुंदर मुख वाली स्त्री।
संज्ञा
(सं.)
उ.-पुलकित सुमुखी भई स्याम-रस-१०−१२०।

सुमुखी
सुंदर मुखवाली।
वि.

सुमुखी
मनोहर।
वि.

सुमुखी
प्रसन्न।
वि.

सुमूरति
सुंदर रूपवाली मूर्ति या स्वरूप।
संज्ञा
(सं. सु,+मूर्ति)
उ.-सत्य-सील-संपन्न सुमूरति सुर-नर-मुनि भक्तनि भावै-१−६९।

सुमृत, सुमृति
याद।
संज्ञा
(सं. स्मृति)

सुमृत, सुमृति
किसी पुरानी बात का याद आना जो एक-एक संचारी भाव है।
संज्ञा
(सं. स्मृति)

सुम्रत, सुम्रित, सुम्रिति
वे धर्मशास्त्र जो वेद का चिंतन मनन करके रचे गये थे।
संज्ञा
(सं. स्मृति)
उ.-(क) स्रुती सुम्रिति देख्यौ सब जाइ-२−५। (ख) स्रुती-सुम्रिति मुनिजन सब भाषत-२−३१।

सुयश, सुयस
सुकीति, सुख्याति।
संज्ञा
(सं. सुयश)
उ.-समरारी को सुयस कुयस की प्रगट एक हीं काल-२०९७।

सुयोग
सुअवसर।
संज्ञा
(सं.)

सुयोग्य
बहुत योग्य।
वि.
(सं.)

सुयोधन
दुर्योधन का एक नाम।
संज्ञा
(सं.)

सुरँग, सुरंग
अच्छे या सुंदर रंग का।
वि.
(सं.)
उ.-(क) तब अंबर और मँगाइ सारी सुरंग चुनी।¨¨¨¨¨। उर अंचल उड़त न जानि सारी सुरँग सुही-१०−२४। (ख) कुलही लसति सिर स्याम सुँदर कैं बहु बिधि सुरँग बनाई-१०−१०८। (ग) बूँद परत रँग ह्वैहै फीकौ, सुरँग चूनरी भीजै-७३१। (घ) बसन सुरंग-२५६१।

सुरँग, सुरंग
सुंदर, सुडौल।
वि.
(सं.)
उ.-(क) अलका-वलि मुक्तावलि गूँथी डोर सुरंग बिराजै। (ख) सब पुर देखि धनुषपुर देख्यौ, देखे महल सुरंग-सारा-२१०।

सुरँग, सुरंग
लाल रंग का।
वि.
(सं.)
उ.-सेमर-फूल सुरँग अति निरखत मुदित होत खग-भूप-१−१०२।

सुरँग, सुरंग
रसपूर्ण।
वि.
(सं.)
उ.-गौर अंग सुरंग लोचन-२५८२।

सुरँग, सुरंग
नारंगी।
संज्ञा

सुमृत, सुमृति
प्रियतम से संबंधित बातों का याद आना जो पूर्व राग की दस दशाओं में एक है।
संज्ञा
(सं. स्मृति)

सुमृत, सुमृति
वे धर्मशास्त्र जो वेदों का चिंतन-मनन करके रचे गए थे।
संज्ञा
(सं. स्मृति)
उ.-(क) बेद, पुरान सुमृति संतनि कौं यह अधार-१−२०४। (ख) बेद, पुरान, सुमृति सबै-१−३२५। (ग) स्रुती, समृति, सब पुरान कहत मुनि बिचारी-३९४।

सुमेध, सुमेधा
बुद्धिमान।
वि.
(सं. सुमेधस्)

सुमेर, सुमेरु
एक पर्वत जो सोने का माना गया है।
संज्ञा
(सं. सुमेरु)
उ.-(क) पावक जथा दहत सबहीं दल तूल-सुमेरु समान-१−२६९। (ख) जौ पै राम-भक्ति नहिं जानी कह सुमेरु सम दान दिऎं-१−८९। (ग) सूरदास प्रभु दुरत दुराऎं डुँगरनि ओट सुमेर-४५८। (घ) मनु जुग जलज सुमर सृंग तें जाई मिले सम ससिहिं सनाल-३४५३।

सुमेर, सुमेरु
जप-माला के बीच का बड़ा दाना जहाँ से जाप आरम्भ होता है।
संज्ञा
(सं. सुमेरु)

सुमेर, सुमेरु
उत्तरी ध्रुव।
संज्ञा
(सं. सुमेरु)

सुमेर, सुमेरु
एक वृक्ष।
संज्ञा
(सं. सुमेरु)

सुमेर, सुमेरु
बहुत ऊँचा।
वि.

सुमेर, सुमेरु
बहुत सुंदर।
वि.

सुमेरुवृत्त
वह रेखा जो उत्तरी ध्रुव से २३।। अक्षांश पर स्थित है।
संज्ञा
(सं.)

सुरँग, सुरंग
एक तरह का घोड़ा।
संज्ञा

सुरँग, सुरंग
जमीन या पहाड़ के नीचे खोदकर या बारूद से उड़ाकर बनाया गया मार्ग।
संज्ञा
(सं. सुरंगा)

सुरँग, सुरंग
किले या दीवार को बारूद से उड़ाने के लिए बनाया गया मार्ग।
संज्ञा
(सं. सुरंगा)

सुरँग, सुरंग
समुद्री चट्टानों को उड़ाने का एक यंत्र।
संज्ञा
(सं. सुरंगा)

सुरँग, सुरंग
सेंध।
संज्ञा
(सं. सुरंगा)

सुर
देवता।
संज्ञा
(सं.)
उ.-सुर-नर-मुनि भक्तनि भावै-१−६९।

सुर
सूर्य।
संज्ञा
(सं.)

सुर
विद्वान।
संज्ञा
(सं.)

सुर
ऋषि, मुनि।
संज्ञा
(सं.)

सुर
आवाज, ध्वनि।
संज्ञा
(सं. स्वर)
उ.-(क) अति सुकंठ-सुर गावन-८−१३। (ख) गदगद सुर-१−७२। (ग) नीकै सुर नीकी तान-१०−९६। (घ) सप्तक सुर बंधान सों-१५३९।
मुहा.- किसी के सुर में सुर मिलाना-हाँ में हाँ मिलाना, चापलूसी करना। सुर भरना-गाने- बजाने में सहारा देने के लिए सुर अलापना या बाजे से सुर निकालना।

सुरकंत
इंद्र।
संज्ञा
(सं. सुर+कांत)

सुरक
नाक या माथे पर का वह तिलक जो भाले या बरछी के आकार का होता है।
संज्ञा
(सं. सुर)

सुरकना, सुरकनो
किसी सरल पदार्थ को धीरे-धीरे ՙसुड़सुड़՚ करते हुए नाक या मुँह से पीना।
क्रि.स.
(अनु.)

सुरकना, सुरकनो
हवा के साथ धीरे धीरे ऊपर की ओर खींचना।
क्रि.स.
(अनु.)

सुरकरि, सुरकरी
देवताओं का हाथी, दिग्गज।
(सं. सुरकरिन्)

सुरकार्मुक
देवधनुष, इंद्रधनुष।
संज्ञा
(सं. सुरकार्म्मुक)

सुरकुदाउँ, सुरकुदाव
स्वर बदलकर बोलने की क्रिया या भाव जिससे लोग धोखा खा जायँ।
संज्ञा
(सं. सुर+कु+हिं. दावँ)

सुरकेतु
देवता या इंद्र की ध्वजा।
संज्ञा
(सं.)

सुरकेतु
इंद्र।
संज्ञा
(सं.)

सुरकोदंड
इंद्रधनुष।
संज्ञा
(सं. सुर+कोदंड)
उ.-पीत बसन दामिनि मनु घन पर, तापर सुर-कोदंड-५६६।

श्रीनिकेतन
लक्ष्मी का निवास-स्थान, बैकुंठ।
संज्ञा
(सं.)

श्रीनिकेतन
लाल कमल।
संज्ञा
(सं.)

श्रीनिकेतन
विष्णु।
संज्ञा
(सं.)

श्रीनिधि
विष्णु का एक नाम।
संज्ञा
(सं.)

श्रीनिवास
लक्ष्मी का निवास-स्थान, बैकुंठ।
संज्ञा
(सं.)

श्रीनिवास
लाल कमल।
संज्ञा
(सं.)

श्रीनिवास
विष्णु।
संज्ञा
(सं.)

श्रीपंचमी
माघ शुक्ल पंचमीया वसंत पंचमी जब सरस्वती पूजन होता है।
संज्ञा
(सं.)

श्रीपत, श्रीपति
विष्णु।
संज्ञा
(सं. श्रीपति)
उ.- जाके सखा श्यामसुंदर से श्रीपति सकल सुखन के दाता।

श्रीपत, श्रीपति
रामचंद्र।
संज्ञा
(सं. श्रीपति)
उ.- बारबार श्रीपति कहैं धीवर नहिं मानै-९-४२।

सुरक्ष
भली-भाँति रक्षित।
वि.
(सं.)

सुरक्षण
उत्तम रीति से कौ गयी रखवाली या रक्षा।
संज्ञा
(सं.)

सुरक्षा
अच्छी तरह की गयी रखवाली या रक्षा।
संज्ञा
(सं.)

सुरक्षित
जिसकी रक्षा अच्छी तरह की गयी हो।
वि.
(सं.)

सुरक्षित
जो इस रूप में स्थित हो कि कोई हानि न पहुँच सके।
वि.
(सं.)

सुरक्षी
विश्वस्त रक्षक।
संज्ञा
(सं. सुरक्षिन्)

सुरख, सुरखा
लाल रंग का।
वि.
(हिं. सुख)

सुरखाब
चकवा (पक्षी)।
संज्ञा
(फ़ा. सुरखाब)
मुहा.- सुरखाब का पर लगना-अनोखापन या विशेषता होना (व्यंग्य)

सुरखी
ईंटों का महीन चून या चूर्ण।
संज्ञा
(हिं. सुर्ख)

सुरखी
लाली, लालिमा।
संज्ञा
(हिं. सुर्ख)

सुरखी
लेख अदि का शीर्षक।
संज्ञा
(हिं. सुर्ख)

सुरखुरू
जिसके मुँह पर स्वास्थ्य की लाली या कांति हो।
वि.
(हिं. सुर्खरू)

सुरखुरू
सफलता से जिसके मुँह पर लाली आ जाय।
वि.
(हिं. सुर्खरू)

सुरखुरू
मान्य, प्रतिष्ठित।
वि.
(हिं. सुर्खरू)

सुरग
स्वर्ग।
संज्ञा
(सं. स्वर्ग)

सुरगज
देवतओं का या इंद्र का हाथी, ऎरावत।
संज्ञा
(सं.)

सुरगति
देवी गति, भावी।
संज्ञा
(सं.)

सुरगबेसाँ
अप्सरा।
संज्ञा
(सं. स्वर्ग+वेश्या)

सुरगा
सुंदर।
वि.
(सं. सुरंग)

सुरगाय
कामधेनु।
संज्ञा
(सं. सुर+हिं. गाय)

सुरजन
सुजन, सज्जन।
वि.

सुरजन
चालाक, चतुर।
वि.

सुरझन
सुलझने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(हिं. सुलझन)

सुरझना, सुरझनो
सुलझना
क्रि.अ.
(हिं. सुलझना)

सुरझाऊँ
अलग करूँ, सुलझाऊँ।
क्रि.स.
(हिं. सुलझाना)
उ.-क्यों सुरझाऊँ री नंदलाल सों अरुझि रहयौ मंन मेरौ-१४७०।

सुरझाना, सुरझानो
सुलझाना।
क्रि.स.
(हिं. सुलझाना)

सुरझावति
सुलझाता है।
क्रि.स.
(हिं. सुरझावना)
उ.-बंध अबंध अमित निसि-बासर को सुरझावति आन-२८११।

सुरझाबना, सुरझावनो
सुलझाना।
क्रि.स.
(हिं. सुलझाना)

सुरटीप
स्वर का आलाप।
संज्ञा
(सं. स्वर+हिं. टीप)

सुरत
रति-क्रीड़ा, काम-केलि, संभोग।
संज्ञा
(सं.)
उ.-(क) सुरत ही सब रैन बीती कोक पूरन रंग। (ख) सुरत समै के चिन्ह राधिका राजत रंग भरे-२११४।

सुरगायक
गंधर्व।
संज्ञा
(सं.)

सुरगिरि
सुमेरु (पर्वत)।
संज्ञा
(सं.)

सुरगी
देवता।
संज्ञा
(सं. स्वर्गीय)

सुरगुरु
देवताओं के गुरु, वृहस्पति।
संज्ञा
(सं.)
उ.-गान नारद करै, बार गुरु कहै, बेद ब्रह्मा पढ़ै पौरि टेरै-९−१८९।

सुरगैया
कामधेनु।
संज्ञा
(सं. सुर+हिं. गैया)

सुरचाप
इंद्रधनुष।
संज्ञा
(सं.)

सुरच्छन
रखवाली, रक्षा।
संज्ञा
(सं. सुरक्षण)

सुरज
जिसमें उत्तम और प्रचुर पराग हो।
वि.
(सं. सुरजस्) (फूल)

सुरज
सूरज।
संज्ञा
(सं. सूर्य)

सुरजन
देववर्ग।
वि.
(सं.)

सुरत
सुध, ज्ञान।
संज्ञा
(सं. स्मृति)
मुहा.- सुरत बिसारना-सुध न रहना, विस्मृत होना। सुरत सँभालना-होश या सुध सँभालना।

सुरत
लौ, लगन, ध्यान।
संज्ञा
(सं. स्मृति)

सुरत
समाधि।
संज्ञा
(सं. स्मृति)

सुरतरंगिणी, सुरतंगिनि, सुरतरंगिनी
आकाश गंगा।
संज्ञा
(सं.)

सुरतरंगिणी, सुरतंगिनि, सुरतरंगिनी
गंगानदी।
संज्ञा
(सं.)

सुरतरु
कल्पवृक्ष।
संज्ञा
(सं.)
उ.-जौ गिरिपति मसि घोरि उदधि मैं लै सुरतरु बिधि हाथ-१−१११।

सुरतरुवर
श्रेष्ठ देवतरु, कल्पवृक्ष
संज्ञा
(सं.)
उ.-सूरतरुवर की साख लेखिनी लिखत सारदा हारैं-१−१८३।

सुरतांत
रति या संभोग का अंत।
संज्ञा
(सं.)

सुरता
सुर या देवता होनें का भाव, देवत्व।
संज्ञा
(सं.)

सुरता
संभोग का सुख।
संज्ञा
(सं.)

सुरति
मूर्ति, स्वरूप।
संज्ञा
(हिं. सूरत)

सुरति-कमल
शरीर के आठ कमलों या चक्रों में अंतिम जिसका स्थान मस्तिष्क में सहस्त्रार के ऊपर माना गया है।
संज्ञा
(सं.)

सुरति-गोपना
वह नायिका जो रति-क्रीड़ा की बात अपनी सखियों से छिपाती हो।
संज्ञा
(सं.)

सुरति-रव
संभोग-काल में होनेवाली आभूषणों की ध्वनि।
संज्ञा
(सं.)

सुरतिवंत
कामातुर।
वि.
(सं. सुरति+वान्)
उ.-हरि हैसि भामिनी उर लाइ। सुरतिवंत (पाठा.सुरति-अंत) गोपाल रीझे जानि अति सुखदाइ-६९०।

सुरतिविचित्रा
वह मध्या नायिका जिसकी रति-क्रिया विचित्र हो।
संज्ञा
(सं.)

सुरती
तंबाकू।
संज्ञा
[सूरत (नगर)]

सुरत्न
स्वर्ण।
संज्ञा
(सं.)

सुरत्न
माणिक्य।
संज्ञा
(सं.)

सुरत्न
सर्वश्रेष्ठ।
वि.

सुरता
चेतना, सुध, ज्ञान।
संज्ञा
(सं. स्मृति, हिं. सुरत)

सुरता
लौ, लगन, ध्यान।
संज्ञा
(सं. स्मृति, हिं. सुरत)

सुरता
याद।
संज्ञा
(सं. स्मृति, हिं. सुरत)

सुर-तात
देवताओं के पिता कश्यप।
संज्ञा
(सं.)
उ.-कस्यप रिषि सुर-तात, सु लगन गनावन रे-१०−२८।

सुर-तात
देवराज इंद्र।
संज्ञा
(सं.)

सुरति
भोग-विलास, काम-केलि।
संज्ञा
(सं. सु+रति)
उ.-(क) सुरति-अंत गोपाल रीझे जानि अति सुखदाइ-६९०। (ख) अंग दिखाइ गई हँसि प्यारी सुरति चिन्हनि की सुघराई-२१६८।

सुरति
अत्यन्त लगन या प्रीति।
संज्ञा
(सं. सु+रति)
उ.-सूरदास संगति करि तिनकी जे हरि सुरति करावति-२−१७।

सुरति
चेत, चेतना, ज्ञान।
संज्ञा
(सं. स्मृत्ति)
मुहा.-सुरति बिसारना-चेत न रहना। सुरति बिसारे-होश-हवास खोये हुए। उ.-उड़त ध्वजा तन सुरति बिसारे अंचल नहीं सँभारति-२५६१। सुरति सँभालना-सचेत होना। सुरति सँभारी-होश में आयी, सचेत हुई। उ.-पुनि रानी जब सुरति सँभारी। रुदन करन लागी अति भारी-६−५।

सुरति
याद, स्मृति, सुधि।
संज्ञा
(सं. स्मृत्ति)
उ.-(क) सूर स्याम की मिलनि सुरति करि मनु निरधन धन पाइ बिमोह्यौ-२४७८। (ख) नाना कुसुम लै लै अपने कर दिए मोहिं वह सुरति न जाई-२८८५। (ग) कबहुँ सुरति करत माइन की कीघौं रहे बिसराई-३४४४। (घ) छिन छिन सुरति करत जदुपति की परत न मन समुझायौ-१० उ.-७८।

सुरति
ध्यान।
संज्ञा
(सं. स्मृत्ति)
उ.-ब्रज करि अवाँ जोग ईंधन सम, सुरति आगि सुलगाए-३१९१।

सुरत्न
श्रेष्ठ रत्नों से युक्त।
वि.

सुरत्यौ
याद या स्मृति भी।
संज्ञा
(सं. सुरति)
उ.-जमुना तोहिं बहयौ क्यौं भावै। तोमै कृष्न हेलुवा खेलै, सो सुरत्यौ नाहिं आवै-५६१।

सुरत्राता
विष्णु।
संज्ञा
(सं. सुर+त्रातृ)

सुरद
सुंदर दाँतोंवाला।
वि.
(सं.)

सुरदार
सुरीला।
वि.
(हिं. सुर+ फ़ा. दार)

सुरदेवी
देवताओं की पूजनीया देवी।
संज्ञा
(सं.)
उ.-आदि ब्रह्म-जननी सुरदेवी नाम देवकी बाला-१०-४।

सुरदेवी
योगमाया जिसने यशोदा के गर्भ से अवतार लिया था और कंस के पटकने पर जो छूटकर आकाश में चली गयी थी।
संज्ञा
(सं.)
उ.-गगन गई बोली सुरदेवी, कंस मृत्यु नियराई-१०-४।

सुरदेश
देवलोक, स्वर्ग।
संज्ञा
(सं. सुर+देश)

सुरद्रुम
कल्पवृक्ष।
संज्ञा
(सं.)

सुरद्विप
ऎरावत।
संज्ञा
(सं.)

सुरधनु, सुधनुष
इंद्रधनुष।
संज्ञा
(सुरधनुस्)

सुरधाम
स्वर्ग।
संज्ञा
(सं. सुरधामन्)
मुहा.- सुरधाम सिधारना-मर जाना।

सुरधामिनि, सुरधामिनी
गंगा।
संज्ञा
(सं.)

सुरधामी
जो स्वर्ग में रहता हो।
वि.
(सं. सुरधामिन्)

सुरधामी
स्वर्गीय।
वि.
(सं. सुरधामिन्)

सुरधुनि, सुरधुनी
गंगा।
संज्ञा
(सं.)

सुरधेनु, सुरधैनु
कामधेनु।
संज्ञा
(सं. सुर+धेनु)
उ.-सूरदास हयाँ की सरवरि नहिं कल्पबृच्छ सुर-धैनु-४९१।

सुरनदी
गंगा।
संज्ञा
(सं.)

सुरनदी
आकाशगंगा।
संज्ञा
(सं.)

सुरनाथ
इंद्र।
संज्ञा
(सं.)

सुरनायक
इंद्र।
संज्ञा
(सं.)

सुरनारी
देवबाला।
संज्ञा
(सं.)

सुरनाह
इंद्र।
संज्ञा
(सं. सुरनाथ)

सुरनि
अनेक देवता।
संज्ञा
(सं. सुर+नि)
उ.-बहुरौ ब्रह्मा सुरनि समेत। नरहरि जू कैं जाइ निकेत-७−२।

सुरनि
स्वरों में।
संज्ञा
(सं. सुर+नि)
उ.-सारेगम पध-निसा संसप्त सुरनि गाई-पृ. ३५२−८३।

सुरप, सुरपति, सुरपती
इंद्र।
संज्ञा
(सं. सुरपति)
उ.-(क) सुरपति कौं सँताप जब भयौ। सो सुरपुर भय तैं नहिं गयौ-६−७। (ख) सुरपति पूजा करौ सवारी-१००७। सूर सुनत सुरपती उदासी-१०६।

सुर-पथ
आकाश।
संज्ञा
(सं.)

सुर-पर्वत
सुमेरु।
संज्ञा
(सं.)

सुर-पादप
कल्पवृक्ष।
संज्ञा
(सं.)

सुरपाल, सुरपालक
देवराज इंद्र।
संज्ञा
(सं. सुर+पालक)

श्रीखंड, श्रीखंडा
शिखरन।
संज्ञा
(सं. श्रीखंड)

श्रीदामा
श्रीकृष्ण का एक ग्वाल सखा जिसे ‘सुदामा’ भी कहा जाता है।
संज्ञा
(सं. श्रीदामन्)
उ.- खेलत स्याम ग्वालनिसंग। सुबल हलधर अरू श्रीदामा करत नाना रंग-१०-२१३।

श्रीधर
विष्णु का एक नाम।
संज्ञा
(सं.)
उ.- धनि जसुमति जिन श्रीधर जाए-३८४।

श्रीधर
कंस का अनुचर एक निर्दयी ब्राह्मण जो श्रीकृष्ण को मारने आया था और जिसकी जीभ मरोड़कर श्रीकृष्ण ने उसे अबोला कर दिया था।
संज्ञा
(सं.)
उ.- श्रीधर बाँभन करम कसाई, कह्यो कंस सौं बचन सुनाई। प्रभु, मैं तुम्हरो आज्ञाकारी, नंद-सुवन की आवौं मारी।¨¨¨¨जबही बाँभन हरि ढिग चाँपि लै जीभ मरोरी-१०-७७।

श्रीधाम
लक्ष्मी का निवास-स्थान, बैकुंठ।
संज्ञा
(सं.)

श्रीधाम
लाल कमल, पद्म।
संज्ञा
(सं.)

श्रीनाथ
विष्णु का एक नाम।
संज्ञा
(सं.)

श्रीनाथ
श्रीकृष्ण।
संज्ञा
(सं.)
उ.- आइ निकट श्रीनाथ निहारे, परी तिलक पर दीठि। सीतल भई चक्र की ज्वाला, हरि हँसि दीन्ही पीठ-१-२७४।

श्रीनिकेत
लक्ष्मी का निवास-स्थान, बैकुंठ।
संज्ञा
(सं.)
उ.- श्रीनिकेत समेत सब सुख रूप प्रगट निधान।

श्रीनिकेत
लाल कमल, पद्म।
संज्ञा
(सं.)

सुरपुर
देवलोक, स्वर्ग, अमरावती।
संज्ञा
(सं.)
उ.-(क) सुरपति कौं सँताप जब भयौ। सो सुरपुर भय तैं नहिं गयौ-६−७। (ख) सुरपुर तैं आयौ रथ सजि कै रघुपति भए सवार-९−१५८।
मुहा.-सुरपुर पठाना-मार डालना। सुरपुर पठाये-मार डाले। उ.-दुष्ट ये मारि सुरपुर पठाए-२६१८। सुरपुर सिधारना-मर जाना, गत हो जाना।

सुरपुर-केतु
इंद्र।
संज्ञा
(सं.)

सुरपुरोधा
वृहस्पति।
संज्ञा
(सं. सुरपुरोधस्)

सुरबहार
एक बाजा।
संज्ञा
(हिं. सुर+फ़ा. बहार)

सुरबाला
देवांगना।
संज्ञा
(सं.)

सुरबृक्ष, सुरबृच्छ
कल्पतरु।
संज्ञा
(सं. सुरवृक्ष)

सुरबेल, सुरबेली
कल्पलता।
संज्ञा
(सं. सुर+वल्ली)

सुरभंग
प्रेम, भय, आनंद आदि से स्वर में होनेवाला कंप या परिवर्तन जो सात्विक भावों के अंतर्गत है।
संज्ञा
(सं. स्वर+भंग)

सुर-भान, सुरभानु
इंद्र।
संज्ञा
(सं. सुर+भानु)
उ.-राधे सो रस बरनि न जाई। जा रस कौं सुरभानु (पाठा. स्वरभानु) सीस दियौ, सु तैं पियौ अकुलाइ-ना. ३३९१।

सुर-भान, सुरभानु
सूर्य।
संज्ञा
(सं. सुर+भानु)

सुरभि
पृथ्वी।
संज्ञा
(सं.)

सुरभि
गाय।
संज्ञा
(सं.)
उ.-कोउ टेरत कोउ हाँकि सुरभिगन जोरि चलावत-४३१।

सुरभि
खुशबू, सुगंध।
संज्ञा
(सं.)

सुरभि
सुगंधित, सुवासित।
वि.

सुरभि
सुंदर, मनोहर।
वि.

सुरभि
उत्तम, श्रेष्ठ।
वि.

सुरभि
सदाचारी।
वि.

सुरभित
सुगंधित, सुवासित।
वि.
(सं.)

सुरभिभक्षण
हठयोग की वह क्रिया जिसमें साधक जीभ उलटकर ताल के मूलवाले छेद में लगाता और सहस्त्रार से निकलनेवाला अमृत पीता है।
संज्ञा
(सं.)

सुरभिमान
सुगंधित।
संज्ञा
(सं. सुरभिमत्)

सुरभी
खुशबू, सुगंध।
संज्ञा
(सं.)

सुरभी
गाय।
संज्ञा
(सं.)
उ.-(क) लग्यौ फिरत सुरभी ज्यौं सुत सँग-१−९। (ख) सूर स्वाय सुरभी दुही संतनि हितकारी-४०९। (ग) इहिं बृदावन इहिं जमुनातट ये सुरभी अति सुखद चरावत-४४९।

सुरभीपुर
गो-लोक जो श्रीकृष्ण का निवास-स्थान और सब लोकों से ऊपर माना गया है।
संज्ञा
(सं.)

सुरभूप
इंद्र।
संज्ञा
(सं.)

सुरभूप
विष्णु।
संज्ञा
(सं.)

सुरभूरुह
कल्पवृक्ष।
संज्ञा
(सं.)

सुरभोग
अमृत।
संज्ञा
(सं.)

सुरभौन
मंदिर, देवालय।
संज्ञा
(सं. सुर+भवन)

सुरभौन
सुरलोक, अमरावती।
संज्ञा
(सं. सुर+भवन)

सुरमंडल
देव-समूह या वर्ग।
संज्ञा
(सं.)

सुरमंडल
एक बाजा जिसके एक तख्ते में लगे तार मिजराब से बजाये जाते हैं।
संज्ञा
(सं.)

सुरमई
सुरमें-जैसे हल्के नीले रंग का, सफेदी लिये नीले या काले रंग का।
वि.
(फ़ा.)

सुरमई
हल्का नीला या सफेदी लिये काला रंग।
संज्ञा

सुरमचू
आँख में सुरमा लगाने की सलाई।
संज्ञा
(फ़ा. सुरमः+चू)

सुरमणि
चिंतामणि।
संज्ञा
(सं.)

सुरमा
एक प्रसिद्ध खनिज जो प्रायः नीले रंग का होता है और जिसका महीन चूर्ण आँखों में लगाया जाता है।
संज्ञा
(फ़ा. सुर्मः)

सुरमौर
विष्णु।
संज्ञा
(सं. सुर+हिं. मौर)

सुरम्य
अत्यंत रमणीय।
वि.
(सं.)

सुरयोषित
अप्सरा।
संज्ञा
(सं.)

सुरराइ, सुरराई
इंद्र।
संज्ञा
(सं. सुरराज)

सुरराइ, सुरराई
विष्णु।
संज्ञा
(सं. सुरराज)

सुरराज, सुरराजू
इंद्र।
संज्ञा
(सं.)

सुरराय, सुरराया, सुरराव
इंद्र।
संज्ञा
(सं. सुरराज)

सुरराय, सुरराया, सुरराव
विष्णु।
संज्ञा
(सं. सुरराज)

सुररिपु
राक्षस, असुर।
संज्ञा
(सं.)

सुर-रूख
कल्पवृक्ष।
संज्ञा
(सं. सुर+हिं. रूख)

सुरल
मधुर स्वरवाला।
वि.
(हिं. सुरीला)

सुरललना
देवबाला, देवांगना।
संज्ञा
(सं.)

सुरली
सुंदर केलिक्रीड़ा।
संज्ञा
(सं. सु+हिं. रली)

सुरलोक
देवलोक, स्वर्ग।
संज्ञा
(सं.)

सुरधधू
देवबाला, देवांगना।
संज्ञा
(सं.)

सुरवाजि
उच्चैश्रवा घोड़ा।
संज्ञा
(सं.)

सुरवाणी
देववाणी, संस्कृत भाषा।
संज्ञा
(सं.)

सुरवास
देवलोक, स्वर्ग।
संज्ञा
(सं.)

सुर-विटप
कल्पवृक्ष।
संज्ञा
(सं.)

सुरवीर
इंद्र।
संज्ञा
(सं.)

सुरवृक्ष
कल्पतरु।
संज्ञा
(सं.)

सुरस
पानी, जल।
संज्ञा
(सं.)

सुरस
सुख, आनंद।
संज्ञा
(सं.)

सुरस
प्रेम, प्रीति।
संज्ञा
(सं.)

सुरस
सुस्वादु, श्रेष्ठ रस।
संज्ञा
(सं.)
उ.-तेरे ही काजैं गोपाल, सुनहुँ लाड़िले लाल, राखे हैं भाजन भरि सुरस छहूँ-१०−२९५।

सुरस
रसीला, सरल।
वि.

सुरस
सुस्वादु, स्वादिष्ट।
वि.

सुरस
सुंदर।
वि.
उ.-अंग अंग भूषन सुरस ससि पूरन-कला जनु भ्राजई।

सुरसति, सुरसती
सरस्वती।
संज्ञा
(सं. सरस्वती)

सुरसर
मानसरोवर।
संज्ञा
(सं. सुर+सर)

सुरसरि, सुरसरित, सुरसरिता, सुरसरी
गंगा।
संज्ञा
(सं. सुरसरित्)
उ.-(क) जे पद-पदुम-परस जल-पावन सुरसरि-दरस कटत अघ भारे-१−९४। (ख) बसत सुरसरी तीर मंदमति कूप खनावै-२−९। (ग) साठ सहस्त्र सगर के पुत्र, कीने सुरसरि तुरत पवित्र-९−९। (घ) सूरदास मनो चली सुरसरी श्रीगोपाल सागर सुख संगा-१९०५।

सुरसरि-सुवन, सुरसरी-सुवन
गंगा के पुत्र, भीष्म पितामह।
संज्ञा
(हिं. सुरसरी + सुवन)
उ.-सुरसुरी-सुवन रनभूमि आए-१−२७१।

सुरसाँईं
विष्णु।
संज्ञा
(सं. सुर+स्वामी)
उ.-भक्तबछल बपु धरि नरकेहरि दनुज दहयौ, उर दरि सुरसाँई-१−६।

सुरसाँईं
इंद्र।
संज्ञा
(सं. सुर+स्वामी)

सुरसा
एक नागमाता जो समुद्र में रहती थी और जिसने विकराल राक्षसी रूप धरकर हनुमान को समुद्र पार करते समय रोका था।
संज्ञा
(सं.)
उ.-तहँ इक अद्भुत देखि निसिचरी सुरसा-मुख-बिस्तार-९−७४।

सुरसाईं
इंद्र।
संज्ञा
(सं. सुर+स्वामी)

सुरसाईं
शिव।
संज्ञा
(सं. सुर+स्वामी)

सुरसाईं
विष्णु।
संज्ञा
(सं. सुर+स्वामी)

सुरसाल, सुरसालु
देवताओं को सतानेवाला।
वि.
(सं. सुर+हिं. सालना)

सुरसाल, सुरसालु
राक्षस, असुर।
वि.
(सं. सुर+हिं. सालना)

सुरसाहब
देवताओं के स्वामी।
संज्ञा
(सं. सुर+फ़ा. साहब)

सुरसाहब
इंद्र।
संज्ञा
(सं. सुर+फ़ा. साहब)

सुरसाहब
शिव।
संज्ञा
(सं. सुर+फ़ा. साहब)

सुरसाहब
विष्णु।
संज्ञा
(सं. सुर+फ़ा. साहब)

सुरसुंदरी
अप्सरा।
संज्ञा
(सं.)

सुरसुंदरी
देवकन्या।
संज्ञा
(सं.)

सुर-सुता
यमुना।
संज्ञा
(सं.)

सुरसुरभी
कामधेनु।
संज्ञा
(सं.)

सुरसुराना, सुरसुरानो
कीड़ों आदि का रेंगना।
क्रि.अ.
(अनु.)

सुरसुराना, सुरसुरानो
कुलबुलाना।
क्रि.अ.
(अनु.)

सुरसुराना, सुरसुरानो
हलकी हलकी खुजली होना।
क्रि.अ.
(अनु.)

सुरसुराना, सुरसुरानो
हलकी खुजली उत्पन्न करना।
क्रि.स.

सुरसुराहट
हलकी खुजली।
संज्ञा
(हिं. सुरसुराना+ आहट)

सुरसुराहट
गुदगुदी।
संज्ञा
(हिं. सुरसुराना+ आहट)

सुरसुरी
हलकी खुजली।
संज्ञा
(अनु.)

सुरसुरी
गुदगुदी।
संज्ञा
(अनु.)

सुरसेनप, सुरसेनपति
देव-सेना के नायक, कार्तिकेय।
संज्ञा
(सं. सुर+सेनापति)

सुरसैयाँ
इंद्र।
संज्ञा
(सं. सुर+स्वामी)

सुरसैयाँ
शिव।
संज्ञा
(सं. सुर+स्वामी)

सुरसैयाँ
विष्णु।
संज्ञा
(सं. सुर+स्वामी)

सुरस्वामी
इंद्र।
संज्ञा
(सं.)

सुरस्वामी
शिव।
संज्ञा
(सं.)

सुरस्वामी
विष्णु।
संज्ञा
(सं.)

सुरहर, सुरहरा
सीधा ऊपर की ओर गया हुआ।
वि.
(सं. सरल)

श्रीमंत
एक शिरोभूषण।
संज्ञा
(सं. सीमंत)
उ.- शीश सचिक्कन केश ही बिच श्रीमंत सँवारि-२०६५।

श्रीमंत
स्त्री के सिर के बीच की माँग।
संज्ञा
(सं. सीमंत)
उ.- सरस सुमना जात शीश कर सों करति श्रीमंत अलक पुनि पुनि संवारै-२१५६।

श्रीमंत
श्रीमान्, श्रीसंपन्न।
वि.

श्रीमत्
धनी।
वि.
(सं.)

श्रीमत्
श्रीसंपन्न।
वि.
(सं.)

श्रीमती
(सौभाग्यवती) स्त्री के लिए आदरसूचक शब्द।
संज्ञा
(सं.)

श्रीमान, श्रीमान्
किसी पुरूष के लिए आदरसूचक शब्द, श्रीयुत।
संज्ञा
(सं. श्रीमान्)
उ.- जय जय जय श्रीमान महावपु जय जय जय जगत अधार।

श्रीमान, श्रीमान्
धनी।
वि.

श्रीमान, श्रीमान्
श्रीसंपन्न।
वि.

श्रीमाल
गले का एक आभूषण, कंठश्री।
संज्ञा
(सं. श्री + हिं. माला)
उ.- चिबुक तर कंठ श्रीमाल मोतीन छवि।

सुरहर, सुरहरा
जिसमें ՙसुर-सुर՚ शब्द हो।
वि.
(अनु.)

सुरही
सोलह चित्ती कौड़ियाँ जिनसे जुआ खेला जाता है।
संज्ञा
(हिं. सोलह)

सुरही
सोलह चित्ती कौड़ियों से खेला जानेवाला जुआ।
संज्ञा
(हिं. सोलह)

सुरांगना
देवबाला।
संज्ञा
(सं.)

सुरांगना
अप्सरा।
संज्ञा
(सं.)

सुरा
शराब, मदिरा।
संज्ञा
(सं.)
उ.-चरनोदक कौं छाँड़ि सुधा रस सुरा-पान अँचयौ-१−६४।

सुराई
देवतापन, देवत्व।
संज्ञा
(सं. सुर)

सुराई
शूरता-वीरता।
संज्ञा
(सं. शूर)

सुराग
अत्यंत प्रेम।
संज्ञा
(सं. सु+राग )

सुराग
श्रेष्ठ और सुंदर राग।
संज्ञा
(सं. सु+राग )
उ.-गावत मलारी सुराग रागिनी गिरिधरन लाल छबि सोहनो-२२८०।

सुरानक
देवताओं का नगाड़ा।
संज्ञा
(सं.)

सुरानीक
देव-सेना।
संज्ञा
(सं.)

सुरापगा
गंगा नदी।
संज्ञा
(सं.)

सुरापान
मदिरा-पान।
संज्ञा
(सं. सुरा+पान)
उ.-कही, हरि-बिमुखऽरु बेस्या जहाँ; सुरापान बधि-कनि गृह तहाँ-१−२९०।

सुरापी
शराबी, मद्यप।
वि.
(सं. सुरापिन्)

सुराब्धि
सुरा का सागर जो सात समुद्रों में तीसरा माना गया है।
संज्ञा
(सं.)

सुरारि
असुर, राक्षस।
संज्ञा
(सं.)

सुरालय
देवलोक।
संज्ञा
(सं. सुर+आलय)

सुरालय
देवालय।
संज्ञा
(सं. सुर+आलय)

सुरालय
सुमेरु।
संज्ञा
(सं. सुर+आलय)

सुराग
पता, टोह।
संज्ञा
(अ. सुराग )

सुरागाय
गाय-विशेष जिसकी पूँछ से चँवर बनता है।
संज्ञा
(सं. सुर+गाव)

सुरागार
देवालय।
संज्ञा
(सं. सुर, सुरा+आगार)

सुरागार
मदिरालय।
संज्ञा
(सं. सुर, सुरा+आगार)

सुराज
देश जहाँ का शासन उत्तम हो और प्रजा सुखी हो।
संज्ञा
(सं. सु+राज्य)

सुराज
देश जहाँ उसके ही निवासियों का शासन हो।
संज्ञा
(सं. स्व+राज्य)

सुराज्य
वह राज्य जहाँ उत्तम शासन होने से प्रजा सुखी हो।
संज्ञा
(सं.)

सुराज्य
वह राज्य जिस पर उसके ही वासियों का शासन हो।
संज्ञा
(सं. स्वराज्य)

सुराद्रि
सुमेरु पर्वत।
संज्ञा
(सं.)

सुराधिप
देवराज इंद्र।
संज्ञा
(सं.)

सुरालय
मदिरालय।
संज्ञा
(सं. सुरा+आलय)

सुरावट
स्वरों का उतार-चढ़ाव।
संज्ञा
(सं. सुर)

सुरावट
सुरीलापन।
संज्ञा
(सं. सुर)

सुरावती
कश्यप की पत्नी अदिति जो देवताओं की माता थी।
संज्ञा
(सं. सुरावनि)

सुराष्ट्र
जिस राष्ट्र का शासन अच्छा हो।
वि.
(सं.)

सुरासुर
देवता और राक्षस।
संज्ञा
(सं.)
उ.-जै गिरि कमठ सुरासुर सर्पहिं धरत न मन मैं नैकु डरे-१०−१४१।

सुराही
जल रखने का एक विशेष प्रकार का पात्र जो प्रायः मिट्टी या किसी धातु का बना होता है।
संज्ञा
(अ.)

सुराही
सत्पथ का पथिक।
संज्ञा
(सं. सु+हिं. राही)

सुराहीदार
सुराही की तरह गोल और लंबोतरी बनावट का।
वि.
(हिं. सुराही+फ़ा. दार)

सुरी
देवबाला, देवललना।
संज्ञा
(सं.)

सुरीला
मीठे या मधुर स्वरवाला, सुस्वर, सुकंठ।
वि.
(हिं. सुर+ईला)

सुरुख
सुंदर रूप या आकृतिवाला।
वि.
(सं. सु+फ़ा. रुख़=प्रवृत्ति)

सुरुख
प्रसन्न, अनुकूल।
वि.
(सं. सु+फ़ा. रुख़=प्रवृत्ति)

सुरुख
लाल रंग का।
वि.
(हिं. सुर्ख)

सुरुखुरू
जिसके मुंह पर तेज या लाली हो।
वि.
(फ़ा. सुर्खरू)

सुरुखुरू
प्रतिष्ठित।
वि.
(फ़ा. सुर्खरू)

सुरुखुरू
यशस्वी।
वि.
(फ़ा. सुर्खरू)

सुरुच
सुंदर प्रकाशवाला।
वि.
(सं.)

सुरुच
सुंदर रुचि या मनोवृत्तिवाला।
वि.
(सं.)

सुरुचि
राजा उत्तानपान की दो पत्नियों में एक जो ՙउत्तम՚ की माता और ध्रुव की विमाता थी।
संज्ञा
(सं.)
उ.-उत्तानपाद पृथ्वीपति भयौ.....। सुरुचि दूसरी ताकी नार। भयौ सुरुचि तैं उत्तम क्वार-४−९।

सुरुचि
श्रेष्ठ या उत्तम रुचि।
संज्ञा
(सं.)

सुरुचि
अत्यंत प्रसन्नता।
संज्ञा
(सं.)

सुरुचि
जिसकी रुचि उत्तम या परिष्कृत हो।
वि.

सुरुचिर
सुंदर।
वि.
(सं.)

सुरुचिर
उज्ज्वल।
वि.
(सं.)

सुरुज
बहुत बीमार या अस्वस्थ।
वि.
(सं.)

सुरुज
भानु, रवि।
संज्ञा
(हिं. सूर्य)

सुरुजमुखी
एक फूल।
संज्ञा
(हिं. सूर्यमुखी)

सुरुति
सुनना।
संज्ञा
(सं. श्रुति)

सुरुति
कान, श्रवण।
संज्ञा
(सं. श्रुति)

सुरुति
सुनी हुई बात।
संज्ञा
(सं. श्रुति)

सुरुति
वेद।
संज्ञा
(सं. श्रुति)

सुरुति
चार की संख्या।
संज्ञा
(सं. श्रुति)

सुरुति
एक प्रकार का अनुप्रास।
संज्ञा
(सं. श्रुति)

सुरुति
संगीत के सातों स्वरों के कुछ खंड।
संज्ञा
(सं. श्रुति)

सुरूप
सुंदर रूपवाला या वाली।
वि.
(सं.)
उ.-(क) अधिक सुरूप कौन सीता तैं, जनम बियोग भरै-१−३५। (ख) अति सुरूप बिष अस्तन लाए, राजा कंस पठाई-१०−५२।

सुरूप
सुंदर रूप।
संज्ञा
उ.-(क) गुन बिनु गुनी सुरूप रूप बिनु नाम बिना श्री स्याम हरी-१−११५। (ख) सुमति सुरूप सँचै स्रद्धा-बिधि उर-अंबुज अनुराग-२−१२।

सुरूप
आकृति।
संज्ञा
(सं. स्वरूप)

सुरूप
मुर्ति।
संज्ञा
(सं. स्वरूप)

सुरूपता
सुंदरता।
संज्ञा
(सं.)

सुरूपा
सुंदर रूपवाली।
वि.
(सं.)

सुरेंद्र
सुरराज, इंद्र।
संज्ञा
(सं.)

सुरेंद्रचाप
इंद्रधनुष।
संज्ञा
(सं.)

सुरेखा
सुंदर रेखा।
संज्ञा
(सं.)

सुरेखा
हाथ-पाँव की वे रेखाएँ जिनका रहना शुभ माना जाता है।
संज्ञा
(सं.)

सुरेता
बहुत वीर्यवान।
वि.
(सं.सुरेतस्)

सुरेथ
ՙसूस՚ नामक जलजंतु।
संज्ञा
(देश.)

सुरेश
सुरराज, इंद्र।
संज्ञा
(सं.)

सुरेश्वर
इंद्र।
संज्ञा
(सं.)

सुरेश्वरी
शची।
संज्ञा
(सं.)

सुरेश्वरी
लक्ष्मी।
संज्ञा
(सं.)

सुरेश्वरी
राधा।
संज्ञा
(सं.)

सुरेश्वरी
दुर्गा।
संज्ञा
(सं.)

सुरेस, सुरेसा
इंद्र।
संज्ञा
(सं. सुरेश)
उ.-सेस-सुरेस-दिनेस सारा. ६८४।

सुरैत
रखेली, उपपत्नी।
संज्ञा
(सं. सुरति)

सुरैतबाल, सुरैतवाल
उपपत्नी का पुत्र।
संज्ञा
(हिं. सुरैत+ बाल, वाल)

सुरतिन
रखेली।
संज्ञा
(हिं. सुरैत)

सुरोचि
सुंदर।
वि.
(सं. सुरुचि)

सुरोत्तम
विष्णु।
संज्ञा
(सं.)

सुरोत्तम
सूर्य।
संज्ञा
(सं.)

सुर्खरूई
मान।
संज्ञा
(हिं. सुर्खरू)

सुर्खरूई
यश।
संज्ञा
(हिं. सुर्खरू)

सुर्खाब
चकवा (पक्षी)।
संज्ञा
(फ़ा. सुरख़ाब)
मुहा.-सुर्खाब का पर लगना-श्रेष्ठतासूचक विशेषता होना।

सुर्खी
लाली।
संज्ञा
(फ़ा. सुर्खी)

सुर्खी
ՙसुरखी՚ चूना।
संज्ञा
(फ़ा. सुर्खी)

सुर्खी
रक्त।
संज्ञा
(फ़ा. सुर्खी)

सुर्खी
लेखादि का शीर्षक।
संज्ञा
(फ़ा. सुर्खी)

सुर्ता
समझदार, बुद्धिमान।
वि.
(हिं. सुरति)

सुर्ती
तंबाकू।
संज्ञा
(हिं. सुरती)

सुर्मा
सुरमा।
संज्ञा
(हिं. सुरमा)

शाल्व
सौभ देश का राजा जो शिशुपाल का मित्र था और उसके मारे जाने पर द्वारका को घेरने के कारण श्रीकृष्ण द्वारा मारा गया था।
संज्ञा
(सं.)
उ.- सुभट शाल्व करि क्रोध हरिपुरी आयो-१० उ.- ५६।

शावक
(पशु-पक्षी का) बच्चा।
संज्ञा
(सं.)

शाश्वत
सदा बना रहनेवाला, नित्य।
वि.
(सं.)

शाश्वती
पृथ्वी।
संज्ञा
(सं.)

शासक
शासन करनेवाला।
संज्ञा
(सं.)

शासक
राज्य का प्रबंधक या व्यवस्थापक।
संज्ञा
(सं.)

शासन
आज्ञा, आदेश।
संज्ञा
(सं.)

शासन
वश या अधिकार में रखने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(सं.)

शासन
निग्रह, नियंत्रण।
संज्ञा
(सं.)

शासन
राजकीय प्रबंध
संज्ञा
(सं.)

श्रीमुख
सुंदर मुख (आदरसूचक)।
संज्ञा
(सं.)
उ.- सूरजदास दास की महिमा श्रीपति श्रीमुख गाई-९-७।

श्रीयुक्त, श्रीयुत
शोभायुक्त।
वि.
(सं. श्रीयुक्त)

श्रीयुक्त, श्रीयुत
धन-संपन्न।
वि.
(सं. श्रीयुक्त)

श्रीयुक्त, श्रीयुत
श्रेष्ठ व्यक्तियों के लिए एक आदरसूचक विशेषण।
वि.
(सं. श्रीयुक्त)

श्रीरंग
लक्ष्मीपति, विष्णु।
संज्ञा
(सं.)
उ.- काके होंहिं जो नहिं गोकुल के सूरज प्रभु श्रीरंग-३३२७।

श्रीरमण, श्रीरमन, श्रीरवन
लक्ष्मीपति, विष्णु या उनके अवतार।
संज्ञा
(सं. श्रीरमण)

श्रीराग
छह रागों में एक।
संज्ञा
(सं.)

श्रीरूपा
सीता जी।
संज्ञा
(सं.)

श्रीरूपा
राधा।
संज्ञा
(सं.)

श्रीवंत
ऐश्वर्यसंपन्न।
वि.
(श्रं. श्रीमत्)

सुरोद, सुरोदक
सुरा-सिंधु।
संज्ञा
(सं. सुरोद)

सुरोदय
स्वरों या श्वासों से शुभ-अशुभ फल जानने की विद्या।
संज्ञा
(सं. स्वरोदय)

सुरोम, सुरोमा
सुंदर रोमवाला।
वि.
(सं. सुरोमन्)

सुर्ख
लाल रंग का।
वि.
(फ़ा. सुर्ख)

सुर्ख
गहरा लाल रंग।
संज्ञा

सुर्खरू
जिसके मुख पर तेज या कांति हो।
वि.
(फ़ा. सुर्खरू)

सुर्खरू
प्रतिष्ठित।
वि.
(फ़ा. सुर्खरू)

सुर्खरू
यशस्वी।
वि.
(फ़ा. सुर्खरू)

सुर्खरूई
ՙसुर्खरू՚ होने का भाव।
संज्ञा
(हिं. सुर्खरू)

सुर्खरूई
तेज।
संज्ञा
(हिं. सुर्खरू)

सुर्रा
तेज हवा।
संज्ञा
(सुर्र से अनु.)

सुर्लभ, सुर्ल्लभ
सुगमता से प्राप्त हो सकनावाला।
वि.
(सं. सुलभ, ՙदुर्लभ՚ के अनु. पर)
उ.-(क) मोकौं भयौ सो अतिही सुर्लभ-१−२७७। (ख) हमकौं भयौ सो अति ही सुर्ल्लभ-१० उ.-१२७।

सुलंक
सुंदर कटि।
संज्ञा
(सं. सु+लंक)

सुलंक
जिसकी कमर या कटि सुंदर हो।
वि.

सुलंक
सोलंकी क्षत्रिय।
संज्ञा
(हिं. सोलंकी)

सुलंकी
क्षत्रियों की एक शाखा जिसने बहुत समय तक गुजरात पर राज्य किया था।
संज्ञा
(?)

सुलक्षण
अच्छे लक्षणोंवाला।
वि.
(सं. सु+लक्षण)

सुलक्षण
भाग्यवान।
वि.
(सं. सु+लक्षण)

सुलक्षण
अच्छा चिह्न या लक्षण।
संज्ञा

सुलक्षणा, सुलक्षणी
अच्छे लक्षणोंवाली।
वि.
(सं. सुलक्षण)

सुलक्षणा, सुलक्षणी
भाग्यवती।
वि.
(सं. सुलक्षण)

सुलग
पास, समीप।
अव्य.
(हिं. सु+लगना)

सुलग
सुलगने या जलने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(हिं. सुलगना)

सुलगन
सच्ची प्रीति या भाव
संज्ञा
(सं. सु+हिं. लगन)

सुलगन
सुलगने या जलने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(हिं. सुलगना)

सुलगना, सुलगनो
(लकड़ी कोयले आदि का) जलना या दहकना।
क्रि.अ.
(सं.सु + हिं. लगना)

सुलगना, सुलगनो
बहुत दुखी या संतप्त होना।
क्रि.अ.
(सं.सु + हिं. लगना)

सुलगाए
जलाया या प्रज्ज्वलित किया।
क्रि.स.
(हिं. सुलगाना)
उ.-ब्रज करि अवाँ जोग ईंधन सम सुरति आगि सुलगाए-३१९१।

सुलगाना, सुलगानो
जलाना, दहकाना, प्रज्ज्वलित करना।
क्रि.स.
(हिं. सुलगना)

सुलगाना, सुलगानो
दुखी या संतप्त करना।
क्रि.स.
(हिं. सुलगना)

सुलगि
जलकर।
क्रि.अ.
(हिं. सुलगना)
उ.- सुलगि सुलगि जरति ही आनि फूँकि दई-३१५७।

सुलग्न
शुभ मुहूर्त।
संज्ञा
(सं.)

सुलग्न
दृढ़ता से लगा हुआ।
वि.
(सं.)

सुलच्छन
अच्छे लक्षणोंवाला, सुंदर।
वि.
(सं. सुलक्षण)
उ.-परम सुसील सुलच्छन जोरी बिधि की रची न होई-९−४५।

सुलच्छन
भाग्यवान।
वि.
(सं. सुलक्षण)

सुलच्छन
अच्छा चिह्न या लक्षण।
संज्ञा

सुलच्छना, सुलच्छनी
अच्छे लक्षणोंवाली।
वि.
(सं. सुलक्षणा)

सुलच्छना, सुलच्छनी
भाग्यवती।
वि.
(सं. सुलक्षणा)

सुलछ
अच्छे लक्षणों वाला सुंदर।
वि.
(सं. सुलक्षण)
उ.-सुलछ लोचन चारु नासा परम रुचिर बनाइ।

सुलछ
भाग्यवान।
वि.
(सं. सुलक्षण)

सुलछ
अच्छा चिह्न या लक्षण।
संज्ञा

सुलज
लाज या मर्यादा का ध्यान रखनेवाला।
वि.
(सं. सु+हिं. लाज)
उ.-सुंदर सुलज सुबंस देखियत यातैं स्याम पठायौ-२९६३।

सुलझन
सुलझने की क्रिया या भाव, सुलझाव।
संज्ञा
(हिं. सुलझना)

सुलझना, सुलझनो
उलझन या जटिलता दूर होना या हटना।
क्रि.अ.
(हिं. उलझना)

सुलझाना, सुल्झानो
उलझन या जटिलता दूर करना या हटाना।
क्रि.स.
(सं. सुलझना)

सुलझाव
सुलझने की क्रिया या भाव, सुलझाना।
संज्ञा
(सं. सुलझना+ आव)

सुलटा
सीधा।
वि.
(हिं. उलटा का अनु.)

सुलतान
बादशाह, महाराज।
संज्ञा
(फ़ा.)
उ.-और हैं आज काल के राजा, मैं तिनमें सुलतान-१−१४५।

सुलताना
महारानी।
संज्ञा
(क़ा. सुलतान)

सुलतानी
सुलतान या बादशाह-संबंधी।
वि.
(फ़ा. सुलतान)

सुलफा
चरस, गाँजा आदि।
संज्ञा
(फ़ा. सुल्फः)

सुलभ
सुगमता से मिलने या प्राप्त होने योग्य।
वि.
(सं.)
उ.-सदा सुभाव सुलभ सुमिरन-बस भक्तनि अभै दियो-१−१८१।

सुलभ
सुगम, सरल।
वि.
(सं.)

सुलभ
साधारण।
वि.
(सं.)

सुलभ
उपयोगी।
वि.
(सं.)

सुलभता
सुगमता से प्राप्त होने का भाव।
संज्ञा
(सं.)

सुलभता
सुगमता, सरलता।
संज्ञा
(सं.)

सुलभ्य
जो सहज में मिल सके।
वि.
(सं.)

सुललित
अत्यंत सुंदर।
वि.
(सं.)

सुलह
मेल, मिलाप।
संज्ञा
(अ.)

सुलह
लड़ाई समाप्त होने पर या करने के लिए होनेवाली संधि।
संज्ञा
(अ.)

सुलहनामा
संधिपत्र।
संज्ञा
(अ. सुलह+फ़ा. नामा)

सुलाक
छेद, सूराख।
संज्ञा
(हिं. सूराख)

सुलाकत
छेद करने पर।
क्रि.अ.
(हिं. सुलाकन)
उ.-अगिनि सुलाकत (पाठा. सुलागत) मोरयौ न अंग-मन बिकट बनावत बेहु-२३४३।

सुलाकना, सुलाकनो
छेद या सूराख करना।
क्रि.अ.
(हिं. सुलाक)

सुलाखना, सुलाखानो
(सोने-चाँदी को) तपाकर परखना।
क्रि.स.
(सं. सु+हिं. लखना)

सुलागत
आग में तपाये जाने पर।
क्रि.स.
(हिं. सुलगाना)
उ.-अगिनि सुलाकत (पाठा. सुलागत) मोरयौ न अंग-मन बिकट बनावत बेहु-२३४३।

सुलागना, सुलागनो
जलाना, तपाना।
क्रि.स.
(हिं. सुलगाना)

सुलागना, सुलागनो
दुख देना।
क्रि.स.
(हिं. सुलगाना)

सुलागना, सुलागनो
जलना, तपना।
क्रि.अ.

सुलतानी
लाल रंग का।
वि.
(फ़ा. सुलतान)

सुलतानी
बादशाहत, राज्य।
संज्ञा

सुलतानी
सुलतान का शासन-काल।
संज्ञा

सुलतानी
एक तरह का रेशमी कपड़ा।
संज्ञा

सुलप
थोड़ा।
वि.
(सं. स्वल्प)
उ.-सूर स्याम नागर अरु नागरि ललना सुलप मंडली राजति-पृ. ३५१ (७२)

सुलप
मंद।
वि.
(सं. स्वल्प)
उ.-चलि सुलप गजहंस मोहति कोक-कला प्रबीना-पृ. ३५१ (७३)।

सुलप
सुंदर आलाप।
संज्ञा
(सं. +सु+आलाप)

सुलफ
लचीला, लचनेवाला।
वि.
(सं. सु+हिं. लपना)

सुलफ
नाजुक, मुलायम, कोमल।
वि.
(सं. सु+हिं. लपना)

सुलफा
वह तंबाकू जो चिलम में बिना तवा रखै सुलगाकर पिया जाता है।
संज्ञा
(फ़ा. सुल्फः)

सुलागना, सुलागनो
दुखी होना।
क्रि.अ.

सुलाज
लज्जा या मर्यादा (का ध्यान)।
संज्ञा
(सं. सु+हिं. लाज)
उ.-सखी सुलाज समुझि परस्पर सन्मुख सबै सही-२५४२।

सुलाना, सुलानो
सोने के लिए प्रवृत्त करना।
क्रि.स.
(हिं. सोना)

सुलाना, सुलानो
लिटाना।
क्रि.स.
(हिं. सोना)

सुलाना, सुलानो
मार डालना।
क्रि.स.
(हिं. सोना)

सुलभ
सुगमता से प्राप्त होने योग्य।
वि.
(सं. सुलभ)

सुलभ
सहज, सुगम।
वि.
(सं. सुलभ)

सुलभ
सुंदर या उत्तम लाभ।
संज्ञा

सुलेख
सुंदर लिखावट।
संज्ञा
(सं. सु+लेख)

सुलेख
सुंदर रूप से अंकित चिह्न या छाप।
संज्ञा
(सं. सु+लेख)
उ.-निरखि सुंदर हृदय पर भृगु-पाग परम सुलेख-६३५।

सुलोचना
वासुकी नाग की पुत्री जो मेघनाद की पत्नी थी।
संज्ञा

सुलोचनि, सुलोचनी
जिसके नेत्र सुन्दर हों।
वि.
(सं. सुलोचना)

सुलोम
जिसके रोयें सुन्दर हों।
वि.
(सं.)

सुलोमा
सुन्दर रोमवाली।
वि.
(सं.)

सुल्तान
बादशाह।
संज्ञा
(फ़ा. सुलतान)

सुवंश, सुवंस
उत्तम या कुलीन वंश का।
वि.
(सं. सुवंश)
उ.-सुंदर सुलज सुबंस देखियत यातैं स्याम पठायौ-२९६३।

सुव
पुत्र, बेटा।
संज्ञा
(हिं. सुअन)

सुवक्ता
व्याख्यान-कुशल।
वि.
(सं. सु+वक्तृ)

सुवक्ष
विशाल वक्षस्थलवाला।
वि.
(सं. सुवक्षस्)

सुवक्ष
सुंदर और विशाल वक्षस्थल।
संज्ञा

श्रीपत, श्रीपति
श्रीकृष्ण।
संज्ञा
(सं. श्रीपति)
उ.- तौ हम कछु न बसाइ पार्थ, जौ श्रीपति तोहिं जितावैं-१-२७५।

श्रीपद
ऐश्वर्यदाता।
वि.
(सं.)

श्रीपाद
पूज्य, श्रेष्ठ।
वि.
(सं.)

श्रीप्रदा
राधा का एक नाम।
संज्ञा
(सं.)

श्रीफल
बेल (फल)।
संज्ञा
(सं.)
उ.- श्रीफल सकुचि रहे दुरि कानन-१८९७।

श्रीफल
नारियल।
संज्ञा
(सं.)
उ.- श्रीफल मधुर चिरौंजी आनी-१०-२११।

श्रीफल
आँवला।
संज्ञा
(सं.)

श्रीबंधु
अमृत, चन्द्र आदि वे चौदह रत्न जो समुद्र-मंथन से लक्ष्मी के साथ निकले थे।
संज्ञा
(सं.)

श्रीभान
श्रीकृष्ण का,सत्यभामा के गर्भ से जन्मा, एक पुत्र।
संज्ञा
(सं.)

श्रीमंतः
श्रीमान् का बहु वचन।
संज्ञा
(सं. श्री + मंत)

सुलेखक
उत्तम लेखक या ग्रंथकार।
संज्ञा
(सं.)

सुलेमाँ, सुलेमान
यहुदियों का एक बादशाह जो पैगंबर भी माना जाता है।
संज्ञा
(फ़ा. सुलेमान)

सुलेमाँ, सुलेमान
पश्चिमी पंजाब का एक पर्वत।
संज्ञा
(फ़ा. सुलेमान)

सुलेमानी
सुलेमान-संबंधी।
वि.
(फ़ा.)

सुलोक
स्वर्ग।
संज्ञा
(सं.)

सुलोचन
जिसके नेत्र सुंदर हों।
वि.
(सं.)
उ.-अब बिधु-बदन बिलोकि सुलोचन-२५६७।

सुलोचन
सुंदर नेत्र।
संज्ञा

सुलोचन
हिरन, मृग।
संज्ञा

सुलोचन
रुक्मिणी के पिता का नाम।
संज्ञा

सुलोचना
सुंदर नेत्रवाली।
वि.
(सं.)

सुवक्षा
मयदानव की पुत्री जो त्रिजटा और विभीषण की माता थी।
संज्ञा
(सं.)

सुवच
जिसका उच्चारण सुगम हो।
वि.
(सं.)

सुवचन
मीठा बोलनेवाला।
वि.
(सं.)

सुवचन
सुन्दर और मीठें वचन।
संज्ञा

सुवचनी
एक देवी।
संज्ञा
(सं.)

सुवचनी
सुन्दर और मीठे वचन बोलनेवाली।
वि.

सुवटा
तोता।
संज्ञा
(हिं. सुअटा)
उ.-सूरदास नलिनी कौ सुवटा कहि कौनैं पकरयौ-२−२६१।

सुवदन
जिसक़ा मुख सुन्दर हो।
वि.
(सं.)

सुवदन
सुन्दर मुख।
संज्ञा

सुवदना
सुंदर मुखवाली।
वि.
(सं.)

सुवर्णक
सोने का।
वि.
(सं.)

सुवर्णक
सुंदर वर्ण का।
वि.
(सं.)

सुवर्णकरणी
एक जड़ी जो रोग-जनित विवर्णता दूर करके शरीर को सुंदर वर्ण का बना देती है।
संज्ञा
(सं. सुवर्ण+करण)

सुवर्णकार
सुनार।
संज्ञा
(सं.)

सुवर्णता
सुवर्ण का भाव या धर्म।
संज्ञा
(सं.)

सुवर्णता
सुंदरता।
संज्ञा
(सं.)

सुवर्णपक्ष
गरुड़।
संज्ञा
(सं.)

सुवर्णपक्ष
जिसके पंख या पर सोने के हों।
वि.

सुवर्णरोमा
जिसके रोम या रोएँ सुनहरे हों।
वि.
(सं. सुवर्णरोमन्)

सुवर्णवर्ण
सोने का (सा) रंग।
संज्ञा
(सं.)

सुवन
पुत्र, बेटा।
संज्ञा
(हिं. सुअन)
उ.-(क) अहि-पति-सुता-सुवन सनमुख ह्वै बचन कह्यौ इक हीनौ-१−२९। (ख) नंद-सुवन-छबि चंद-बदनियाँ-१०−१०६। (ग) सुवन तन चितै नंद डरत भारी-६८४। (घ) सूर प्रभु नंद-सुवन दोऊहंस बाल उपाम-२५६५।

सुवन
फूल, पुष्प।
संज्ञा
(सं. सुमन)

सुवनारा
पुत्र, बेटा।
संज्ञा
(हिं. सुवन)

सुवपु
सुंदर शरीरवाला।
वि.
(सं. सुवपुस्)

सुवपु
सुंदर शरीर।
संज्ञा

सुवरण, सुवरन, सुवर्ण
सोना, स्वर्ण।
संज्ञा
(सं. सुवर्ण)

सुवरण, सुवरन, सुवर्ण
सुंदर वर्ण।
संज्ञा
(सं. सुवर्ण)

सुवरण, सुवरन, सुवर्ण
सुंदर रंग।
संज्ञा
(सं. सुवर्ण)

सुवरण, सुवरन, सुवर्ण
सुंदर वर्ण का।
वि.

सुवरण, सुवरन, सुवर्ण
सुंदर रंग का।
वि.

सुवर्णवर्ण
सोने के रंग का, सुनहरा।
वि.

सुवर्मा
उत्तम कवच से युक्त।
वि.
(सं. सुवर्म्मन्)

सुवस
जो अपने वंश या अधिकार में हो।
वि.
(सं. स्व+वश)
(क) बसन कुबेर अग्नि यम मारुत सुवस कियो छन माँयँ-सारा.। (ख) सूने किये भुवन भूपति के सुवस किए सुरलोक-१० उ.-२।

सुवह
जो सहज ही वहन किया या उठाया जा सके।
वि.
(सं.)

सुवह
धीर, धैर्यवान।
वि.
(सं.)

सुवाँग
बनावटी भेस या रूप।
संज्ञा
(हिं. स्वाँग)

सुवाँग
नकल, तमाशा।
संज्ञा
(हिं. स्वाँग)

सुवाँग
धोखा देने का आडंबर।
संज्ञा
(हिं. स्वाँग)

सुवाँगी
बहुरूपिया।
संज्ञा
(हिं. स्वाँगी)

सुवा
तोता।
संज्ञा
(हिं. सुआ)
उ.-(क) रसमय जानि सुवा सेमर कौं चोंच घालि पछितायौ-१−५८। (ख) कत तू सुवा होत सेमर कौ-१-५९। (ग) मन सुवा तन पींजरा-१−३११।

सुवाना, सुवानो
लिटाना।
क्रि.स.
(हिं. सुलाना)

सुवाना, सुवानो
मार डालना।
क्रि.स.
(हिं. सुलाना)

सुवार
रसोइया।
संज्ञा
(सं. सूपकार)

सुवार
शूभ दिन या वार।
संज्ञा
(सं. सु+वार)

सुवार्ता, सुवार्त्ता
श्रीकृष्ण की एक पत्नी का नाम।
संज्ञा
(सं. सुवार्त्ता)

सुवावैं
सुला दें, सोने को प्रवृत्त कर चुकें।
क्रि.स.
(हिं. सुवाना)
उ.-सोवै तब जब वाहि सुवावैं-५−३।

सुवावै
सुलाती है, सुला दे।
क्रि.स.
(हिं. सुवाना)
उ.-मेरे लाल को आउ निंदरिया, काहे न आनि सुवावै-१०−४३।

सुवास
अच्छी महक, सुगंध।
संज्ञा
(सं.)

सुवास
उत्तम घर या निवास।
संज्ञा
(सं.)

सुवास
सुंदर बस्त्रों से युक्त।
वि.
(सं. सुवासस्)

सुवाइ
सुलाकर, सुला दे।
क्रि.स.
(हिं. सुवाना)
उ.-ल्याउ कुँवर कौ बेगि जगाइ। दूध प्याइ कै बहुरि सुवाइ-६−५।

सुवाऊँ
सुला दूँ।
क्रि.स.
(हिं. सुवाना)
उ.-तुम सोवौ मैं तुम्हैं सुवाऊँ-१०−२३०।

सुवाक्य
सुंदर वचन बोलनेवाला।
वि.
(सं.)

सुवाक्य
सुंदर और मधुर वचन।
संज्ञा

सुवाग्मी
सुवक्ता।
वि.
(सं. सुवाग्मिन्)

सुवाचा
(मुँह से निकलनेवाली) अच्छी और शुभ बात।
संज्ञा
(सं. सु+वाचा)

सुवाजी
(तीर या वाण) जिसके पंख सुंदर हों।
वि.
(सं. सुवाजिन्)

सुवाद
जायका, स्वाद।
संज्ञा
(सं. स्वाद)

सुवादी
अच्छाखाने का आदि, स्वाद का अभ्यस्त।
वि.
(सं. स्वाद)
उ.-सूरदास तिल तेल सुवादी, स्वाद कहा जानै घृत ही री-१४९९।

सुवाना, सुवानो
सोने को प्रवृत्त करना।
क्रि.स.
(हिं. सुलाना)

सुविचारित
अच्छी तरह सोचा हुआ।
वि.
(सं.)

सुविचारी
अच्छी तरह विचार करनेवाला।
वि.
(सं. सुविचारिन्)

सुविचारी
उचित न्याय करनेवाला।
वि.
(सं. सुविचारिन्)

सुविज्ञ
बहुत चतुर।
वि.
(सं.)

सुविज्ञोय
जो सहज में जाना जा सके।
वि.
(सं.)

सुवित्त
बहुत धनी।
वि.
(सं.)

सुवित्त
उत्तम या श्रेष्ठ धन।
संज्ञा

सुविद, सुविद्
विद्वान।
संज्ञा
(सं. सुविद्)

सुविदग्ध
बहुत चतुर।
वि.
(सं.)

सुविदित
भली-भाँति ज्ञात।
वि.
(सं.)

सुवास
साँस।
संज्ञा
(सं. श्वास)

सुवासिका
सुगंधित करनेवाली।
वि.
(हिं. सुवास)

सुवासित
सुगंध-युक्त।
वि.
(सं.)

सुवासिनी
सधवा स्त्री।
संज्ञा
(सं.)

सुविक्रम
अत्यंत साहसी।
वि.
(सं.)

सुविख्यात
बहुत (ही) प्रसिद्ध।
वि.
(सं.)

सुविग्रह
सुंदर शरीर या रूपवाला।
वि.
(सं.)

सुविचार
उत्तम विचार।
संज्ञा
(सं.)

सुविचार
सुंदर या ठीक न्याय।
संज्ञा
(सं.)

सुविचार
रुक्मिणी के गर्भ से उत्पन्न श्रीकृष्ण के एक पुत्र का नाम।
संज्ञा
(सं.)

सुविधा
सुगमता और सुकरता की स्थिति।
संज्ञा
(हिं. सुभीता)

सुविधा
सुअवसर।
संज्ञा
(हिं. सुभीता)

सुविधा
आराम।
संज्ञा
(हिं. सुभीता)

सुविधि
अच्छी रीति-नीति।
संज्ञा
(सं.)

सुविधिति
अच्छी तरह से।
क्रि.वि.
(सं.)

सुवीर
महान वीर।
वि.
(सं.)

सुवीर्य
बहुत शक्तिशाली।
वि.
(सं.)

सुवृत्त
सच्चरित्र।
वि.
(सं.)

सुवृत्त
अच्छी बात कहने या बतानेवाला।
वि.
(सं.)

सुवृत्त
जिसकी गोलाई ठीक हो।
वि.
(सं. सु+वृत्त)

श्रीवत्स
विष्णु।
संज्ञा
(सं.)

श्रीवत्स
विष्णु के वक्षस्थल पर बना भुगु का चरण-चिह्न।
संज्ञा
(सं.)

श्रीश
लक्ष्मी के स्वामी विष्णु।
संज्ञा
(सं.)

श्रीहत
शोभाहीन, निस्तेज।
वि.
(सं.)

श्रुत
सुना हआ।
वि.
(सं.)

श्रुत
प्रसिद्ध।
वि.
(सं.)

श्रुतकीर्ति
राजा जनक के भाई कुशध्वज की पुत्री जो शत्रुध्न को ब्याही थी।
संज्ञा
(सं.)

श्रुतदेव
एक मुनि।
संज्ञा
(सं.)
उ.- तहाँ बसत श्रुतदेव महामुनि सुनि दरसन को धायो-सारा. १९९।

श्रुतदेवी
सरस्वती।
संज्ञा
(सं.)

श्रुति
सुनना।
संज्ञा
(सं.)

सुव्रता
पतिव्रता (स्त्री)।
वि.
(सं.)

सुशांत
अत्यंत शांत या स्थिर।
वि.
(सं.)

सुशिक्षित
जिसने अच्छी शिक्षा पायी हो।
वि.
(सं.)

सुशिक्षा
अच्छी शिक्षा।
संज्ञा
(सं.)

सुशिक्षा
उपयोगी या उचित शिक्षा।
संज्ञा
(सं.)

सुशील
उत्तम शील-स्वभाववाला।
वि.
(सं.)

सुशील
सच्चरित्रता, सदाचारी।
वि.
(सं.)

सुशील
विनीत, नम्र।
वि.
(सं.)

सुशील
सरल, भोला, सीधा।
वि.
(सं.)

सुशीलता
उत्तम स्वभाव।
संज्ञा
(सं.)

सुवेशी, सुवेषी, सुवेसी
रूपवान।
वि.
(सं. सुवेश)

सुवेसल
सुंदर, मनोहर।
वि.
(सं. सुवेश)

सुवैया
सोनेवाला।
वि.
(हिं.सोना+ ऎया)

सुवो
तोता।
संज्ञा
(हिं. सुवा)

सुव्यक्त
स्पष्ट रूप से व्यक्त।
वि.
(सं.)

सुव्यवस्थित
जिसकी व्यवस्था या प्रबंध उत्तम रूप से किया गया हो।
वि.
(सं.)

सुव्रत
सुंदर व्रत या निश्चय।
संज्ञा
(सं.)

सुव्रत
ब्रह्मचारी।
संज्ञा
(सं.)

सुव्रत
व्रत का पालन दृढ़ता से करनेवाला।
वि.

सुव्रत
धर्मनिष्ठ।
वि.

सुवृत्ति
उत्तम वृत्तिया जीविका।
संज्ञा
(सं.)

सुवृत्ति
सदाचार।
संज्ञा
(सं.)

सुवृत्ति
जिसकी वृत्ति या जीविका उत्तम हो।
वि.

सुवृत्ति
सदाचारी, सच्चरित्र।
वि.

सुवेल
लंका का त्रिकूट पर्वत जहाँ श्रीराम सेना सहित ठहरे थे।
संज्ञा
(सं.)

सुवेश, सुवेष, सुवेस
जिसकी वेशभूषा सुंदर हो।
वि.
(सं. सुवेश)

सुवेश, सुवेष, सुवेस
सुंदर, रूपवान।
वि.
(सं. सुवेश)

सुवेशता, सुवेषता, सुवेसता
सुसज्जित होने का भाव।
संज्ञा
(सं. सुवेशता)

सुवेशित, सुवेषित, सुवेसित
सुसज्जित।
वि.
(सं. सुवेश)

सुवेशी, सुवेषी, सुवेसी
सुंदर वेशभूषा वाला।
वि.
(सं. सुवेश)

सुशीलता
सच्चरित्रता।
संज्ञा
(सं.)

सुशीलता
नम्रता।
संज्ञा
(सं.)

सुशीलता
सरलता।
संज्ञा
(सं.)

सुशीला
राधा की एक सखी का नाम।
संज्ञा
(सं.)

सुशीला
श्रीकृष्ण की एक पत्नी का नाम।
संज्ञा
(सं.)

सुशीला
सुदामा की पत्नी का नाम।
संज्ञा
(सं.)

सुशंग
जिसके सींग सुंदर हों।
वि.
(सं.)

सुशंग
श्रृंगी ऋषि।
संज्ञा

सुशोभन
अत्यंत शोभायुक्त।
वि.
(सं.)

सुशोभन
जो देखने में बड़ा प्रिय लगे, प्रियदर्शन।
वि.
(सं.)

सुशोभित
अत्यंत शोभायमान।
वि.
(सं.)

सुश्रवा
प्रसिद्ध, विख्यात।
वि.
(सं. सुश्रवस्)

सुश्राव्य
जो सुनने में अच्छा लगे।
वि.
(सं.)

सुश्री
सुंदर श्री से युक्त।
वि.
(सं.)

सुश्री
बहुत सुंदर या शोभोयुक्त।
वि.
(सं.)

सुश्री
बहुत धनी।
वि.
(सं.)

सुश्री
एक आदरसूचक शब्द जो कुमारी, सधवा और विधवा, सभी स्त्रियों के नाम के पहले लगाया जा सकता है।
संज्ञा

सुश्रुत
आयुर्वेद के एक प्रसिद्ध आचार्य जिनका ՙसुश्रुत संहिता नामक՚ ग्रंथ बहुत मान्य है।
संज्ञा
(सं.)

सुश्रुत
अच्छी तरह सुना हुआ।
वि.

सुश्रुत
प्रसिद्ध।
वि.

सुश्रूखा, सुश्रूषा
टहल, सेवा।
संज्ञा
(सं. सुश्रूषा)

सुश्रूखा, सुश्रूषा
रोगी की परिचर्या।
संज्ञा
(सं. सुश्रूषा)

सुश्रोणि
सुंदर नितंबवाली।
वि.
(सं.)

सुरलोक
पुण्यात्मा।
वि.
(सं.)

सुरलोक
सुप्रसिद्ध।
वि.
(सं.)

सुष
सुख, हर्ष।
संज्ञा
(सं. सुख)

सुषम
शोभायुक्त।
वि.
(सं.)

सुषम
सम, समान।
वि.
(सं.)

सुषमन, सुषमना, सुषमनि
वह नाड़ी जो नाभि से आरंभ होकर मेरुदंड से होती हुई ब्रह्मरंध्र तक जानेवाली मानी गयी है। इसी के अन्तर्गत वह ब्रह्मनारी कही जाती है जिससे चलकर कुंडलिनी ब्रह्मरंध्र तक पहुँचती है।
संज्ञा
(सं. सुषुम्ना)
उ.-(क) इंगला पिंगला सुषमना नारी-३४०८। (ख) इड़ा पिंगला सुषमन नारी-३४४२।

सुषमा
अत्यंत सुंदरता या शोभा।
संज्ञा
(सं.)

सुषमाशाली
बहुत सुंदर या शोभायुक्त।
वि.
(सं.)

सुषाना
धूप या आग के पास रखकर आर्द्रता दूर करना।
क्रि.स.
(हिं. सुखाना)

सुषाना
दुर्बल बनाना।
क्रि.स.
(हिं. सुखाना)

सुषाना
भला लगना।
क्रि.अ.

सुषाना
सह्य होना।
क्रि.अ.

सुषारा
सुखद।
वि.
(हिं. सुखारा)

सुषारा
सुगम।
वि.
(हिं. सुखारा)

सुषिर
बाँस।
संज्ञा
(सं.)

सुषिर
आग, अग्नि।
संज्ञा
(सं.)

सुषिर
वह बाजा जो वायु के दबाव से बजने लगता हो।
संज्ञा
(सं.)

सुषिर
जिसमें छेद हों।
वि.

सुषिर
पोला, खोखला।
वि.

सुषुपु
जो सोने या निद्रा का इच्छक या उसके लिए आतुर हो।
वि.
(सं. सुषुपस्)

सुषुप्त
गहरी नींद में सोया हुआ।
वि.
(सं.)

सुषुप्ति
गहरी नींद, घोर निद्रा
संज्ञा
(सं.)

सुषुप्ति
योग-साधन में चित्त की उस वृत्ति या अनुभूति की अवस्था जब जीव ब्रह्म की प्राप्ति तो नित्यप्रति करता है, परंतु उसे इस बात का ज्ञान नहीं होता।
संज्ञा
(सं.)

सुषुप्स
जो सोने या निद्रा का इच्छुक और उसके लिए आतुरो हो।
वि.
(सं.)

सुषुप्सा
शयन करने की इच्छा।
संज्ञा
(सं.)

सुषुम्ना
वह नाडी जो नाभि से आरंभ होकर मेरूदंड में से होती हई ब्रह्मरंध्रतक जानेवाली मानी गयी है। इसीके अंतर्गत वह ब्रह्मनाड़ी भी कही जाती है जिससे चलकर कुंडलिनी ब्रह्मरंध्र तक पहुँचती है। योग के अनुसार शरीर की तीन प्रधान नाड़ियों- इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना - में सुषुम्न्ना मध्य में है। यह त्रिगुणमयी और चंद्र, सूर्य और अग्नि-स्वरूपिणी है। वैद्यक के अनुसार सुषुम्ना शरीर की चौदह प्रधान नाड़ियों में है जिससे अन्य सब नाड़ियाँ लिपटी हुई हैं।
संज्ञा
(सं.)

सुषेण, सुषेन
विष्णु का एक नाम।
संज्ञा
(सं. सुषेण)

सुषेण, सुषेन
श्रीकृष्ण के एक पुत्र का नाम।
संज्ञा
(सं. सुषेण)

सुषेण, सुषेन
एक बानर का नाम जो वरुण का पुत्र, बाली का ससुर और सुग्रीव का वैद्य था। इसने राम-रावण युद्ध में श्रीराम की विशेष सहायता की थी।
संज्ञा
(सं. सुषेण)
उ.- (क) दौनगिरि पर आहि सँजीवनि बैद सुषेन बताई-९−१४। (ख) सुग्रीव विभीषन जामवंत, अँगद सुषेन केदार संत−९−१६६।

सुषोपति, सुषोप्ति
गहरी नींद।
संज्ञा
(सं. सुषुप्ति)

सुषोपति, सुषोप्ति
योग-साधना में चित की वह अवस्था जब वह ब्रह्म का साक्षात्कार तो करता है, परंतु उसकी उसे अनुभूति नहीं होती।
संज्ञा
(सं. सुषुप्ति)

सुष्ट
जो दुष्ट न हो, भला।
संज्ञा
(सं. दुष्ट का अनु. या सं. सुष्ठु)

सुष्ट
सुंदर, श्रेष्ठ।
संज्ञा
(सं. दुष्ट का अनु. या सं. सुष्ठु)
उ.- आयसु पाइ सुष्ट रथ कर गहि अनुपम तुरंग साजि धृत जोह्यौ-२४७८।

सुष्ठु
अच्छा, उत्तम।
वि.
(सं.)

सुष्ठु
सुंदर।
वि.
(सं.)

सुष्ठु
अत्यंत।
अव्य.

सुष्ठु
अच्छी तरह, भली-भाँति।
अव्य.

सुष्ठु
ठीक ठीक, यथायोग्य।
अव्य.

सुष्ठु
तारीफ, प्रशंसा।
संज्ञा

सुष्ठु
सत्य।
संज्ञा

सुष्ठुता
भलाई, मंगल, कल्याण।
संज्ञा
(सं.)

सुष्ठुता
सौभाग्य।
संज्ञा
(सं.)

सुष्ठुता
सुंदरता।
संज्ञा
(सं.)

सुष्म
रस्सी, रज्जु।
संज्ञा
(सं.)

सुष्मन, सुष्मना, सुष्मंनि, सुष्मनी
सुषुम्ना नाड़ी।
संज्ञा
(सं. सुषुम्ना)

सुसंग
सत्संग।
संज्ञा
(सं. सु+हिं. संग)

सुसंगत
बहुत उचित या युक्तियुक्त।
वि.
(सं.)

श्रुति
कान, श्रवण।
संज्ञा
(सं.)

श्रुति
सुनी हुई बात।
संज्ञा
(सं.)

श्रुति
शब्द, ध्वनि।
संज्ञा
(सं.)

श्रुति
किंवदंती।
संज्ञा
(सं.)

श्रुति
वेद।
संज्ञा
(सं.)
उ.- जीवनि-आस प्रबल श्रुति लेखी-१-२२४। (ख) जाके श्वाँस उसाँस लेत में प्रगट भए श्रुति चार-२६२९।

श्रुति
चार की संख्या।
संज्ञा
(सं.)

श्रुति
अनुप्रास का एक भेद।
संज्ञा
(सं.)

श्रुतिकटु
कानों को कठौर और कर्कश लगनेवाला (वर्ण या शब्द)।
वि.
(सं.)

श्रुतिपथ
श्रवणेंद्रिय, कान।
संज्ञा
(सं.)

श्रुतिपथ
वेद-विहित मार्ग, सन्मार्ग।
संज्ञा
(सं.)

सुसंगति, सुसंगती
अच्छी संगति या साथ, सत्संग।
संज्ञा
(सं. सु+हिं. संगति)

सुस
बहन, भगिनी।
संज्ञा
(सं. स्वसृ)

सुसकना
सिसकी भरकर या धीरे-धीरे रोना।
क्रि.अ.
(हिं. सिसकना)

सुसकनि
सिसक-सिसक कर या सिसकी भरकर रोने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
(हिं. सिसकना)
उ.-सुसकनि की बारी हौं बलि-बलि, हठ न करहु तुम नंद-दुलारे-१०−१६०।

सुसकनो
सिसकी भरकर या धीरे-धीरे रोना।
क्रि.अ.
(हिं. सिसकना)

सुसक्यो, सुसक्यौ
सिसक-सिसक कर या सिसकी भर कर रोने लगा या रोया
क्रि.अ.
(हिं. सिसकना)
उ.-जानि परयो तहँ कोउ नहीं जिय ही जिय सुसक्यो-२४७०।

सुसज्जित
अच्छी तरह सजा या सजाया हुआ।
वि.
(सं.)

सुसताना, सुसतानो
थकावट दूर करना, विश्राम करना।
क्रि.अ.
(फ़ा. सुस्त+आना)

सुसती
सुस्त होने का भाव, शिथिलता।
संज्ञा
(हिं. सुस्ती)

सुसती
आलस्य।
संज्ञा
(हिं. सुस्ती)

सुसवद
यश, कीर्ति।
संज्ञा
(सं. सुशब्द)

सुसमय
वे दिन जिनमें अकाल का कष्ट न हो, सुकाल।
संज्ञा
(सं.)

सुसमा
बहुत अधिक शोभा या सुंदरता।
संज्ञा
(सं. सुषमा)

सुसमुझि
अच्छी समझवाला, समझदार, सुबुद्धि।
वि.
(सं. सु+हिं. समझ)

सुसर, सुसरा
पति या पत्नी का पिता, श्वसुर।
संज्ञा
(हिं. ससुर)

सुसर, सुसरा
एक गाली।
संज्ञा
(हिं. ससुर)

सुसरार, सुसरारि, सुसराल
पति या पत्नी के पिता का घर।
संज्ञा
(हिं. ससुराल)

सुसरित
नदियों में श्रेष्ठ।
संज्ञा
(सं. सु+सरित)

सुसरित
गंगा नदी।
संज्ञा
(सं. सु+सरित)

सुसरी
पति या पत्नी की माता, सास।
संज्ञा
(हिं. ससुरी)

सुसरी
एक गाली।
संज्ञा
(हिं. ससुरी)

सुसरी
श्रेष्ठ नदी।
संज्ञा
(सं. सु+सरित)

सुसरी
गंगा नदी।
संज्ञा
(सं. सु+सरित)

सुसह
जो सहज में उठाया या सहन किया जा सके।
वि.
(सं.)

सुसांत
अत्यंत शांत या स्थिर।
वि.
(सं. सुशांत)
उ.-बहुत काल लौं जल में बिचरे तब हरि भये सुसांत-सारा. ९८।

सुसांति
पूर्ण शांति या स्थिरता।
संज्ञा
(सं. सुशांति)

सुसा
बहन, भगिनी।
संज्ञा
(सं. स्वसृ)

सुसा
एक तरह का पक्षी।
संज्ञा
(देश)

सुसाध, सुसाधा
उत्तम या श्रेष्ठ इच्छा या कामना।
संज्ञा
(सं. सु+हिं. साध)

सुसाधन
श्रेष्ठ या उत्तम उपाय, युक्ति या साधन।
संज्ञा
(सं. सु+साधन)

सुसाध्य
जो सहज में किया जा सके, जिसका साधन सुगम हो, सुखसाध्य।
वि.
(सं.)

सुसाना, सुसानो
सिसकना।
क्रि.अ.
(हिं. साँस)

सुसार
नीलम (मणि)।
संज्ञा
(सं.)

सुसारना, सुसारनो
अच्छी तरह समझाकर कहना।
क्रि.स.
(सं. सु+सारण)

सुसिकता
चीनी, शक्कर।
संज्ञा
(सं.)

सुसिद्धि
उत्तम सिद्धि या सफलता।
संज्ञा
(सं.)

सुसिद्धि
एक काव्यालंकार।
संज्ञा
(सं.)

सुसीतल
बहुत ठंढा।
वि.
(सं. सु+शीतल)

सुसीतलता, सुसीतलताई
बहुत ठंढ या शीत।
संज्ञा
(सं. सुशीतलता)

सुसील
उत्तम शील-स्वभाववाला।
वि.
(सं. सुशील)
उ.-परम सुसील सुलच्छन जोरी बिधि की रची न होई-९−४५।

सुसील
सदाचारी।
वि.
(सं. सुशील)

सुसीलता
अच्छा शील-स्वभाव।
संज्ञा
(सं. सुशीलता)

सुसीलता
सच्चरित्रता।
संज्ञा
(सं. सुशीलता)

सुसीलता
नम्रता।
संज्ञा
(सं. सुशीलता)

सुसीला
सुदामा की पत्नी का नाम।
संज्ञा
(सं. सुशीला)
उ.-नाम सुसीला ताकी नार-१०३−५९।

सुसीले
अच्छी शील-स्वभाव वाले।
वि.
(सं. सुशील)

सुसीले
नम्रता भरे, विनययुक्त।
वि.
(सं. सुशील)
उ.-अति उदार पर-हित डोलत हैं बोलत बचन सुसीले-३०५५।

सुसकत
सिसकी भरते, सिसकते।
क्रि.अ.
(हिं. सिसकना)
उ.-सुसुकत सुनि जसुमति अतुराई, कहा महर भ्रम पायौ-२४७३।

सुसुकना, सुसुकनो
सिसक कर रोना।
क्रि.अ.
(हिं. सिसकना)

सुसुकना, सुसुकनो
सिसकी भरना।
क्रि.अ.
(हिं. सिसकना)

सुस्थ
सुखी, प्रसन्न।
वि.
(सं.)

सुस्थ
सुस्थित, सुस्थिर।
वि.
(सं.)

सुस्थ
सुंदर।
वि.
(सं.)

सुस्थचित्त
जिसका चित्त प्रसन्न, सुखी और उत्साहपूर्ण हो।
वि.
(सं.)

सुस्थता
नीरोगता, स्वस्थता।
संज्ञा
(सं.)

सुस्थता
प्रसन्नता, सुख।
संज्ञा
(सं.)

सुस्थता
कुशल-क्षेम।
संज्ञा
(सं.)

सुस्थमानस
जिसका चित्त प्रसन्न, सुखी और उत्साहपूर्ण हो।
वि.
(सं.)

सुस्थल
सुंदर स्थान।
संज्ञा
(सं.)

सुस्थित
भली-भाँति स्थित, सुदृढ़।
वि.
(सं.)

सुसुकि
सिसकी भरकर।
क्रि.अ.
(हिं. सिसकना)
उ.-(क) खसि खसि परत कान्ह कनियाँ तैं सुसुकि-सुसुकि मन खीजैं-१०−१९०। (ख) मूँदि मुख छिन सुसिक रोवत छिनक मौन रहत-३५९।

सुसुपि, सुसुप्ति
गहरी नींद।
संज्ञा
(सं. सुसुप्ति)

सुसुपि, सुसुप्ति
समाधि की अवस्था-विशेष।
संज्ञा
(सं. सुसुप्ति)

सुसूक्ष्म
अत्यंत सूक्ष्म।
वि.
(सं.)

सुसूक्ष्म
परमाणु।
संज्ञा

सुसेन
एक बानर जो सुग्रीव का वैद्य था।
संज्ञा
(सं. सुषेण)

सुसो
खरगोश।
संज्ञा
(सं. शश)

सुसौभग
दांपत्य-सुख।
संज्ञा
(सं.)

सुस्त
जो (चिंता, लज्जा आदि के कारण) प्रसन्न या उत्साही न हो, उदास।
वि.
(फ़ा.)

सुस्त
जिसमें वेग, गति आदि की तीव्रता न हो।
वि.
(फ़ा.)

सुस्त
जिसके काम में तत्परता न हो।
वि.
(फ़ा.)

सुस्त
धीमी चालवाला।
वि.
(फ़ा.)

सुस्त
जिसकी बुद्धि तीव्र न हो।
वि.
(फ़ा.)

सुस्तना, सुस्तनी
जिसके स्तन सुडौल और सुन्दर हों।
संज्ञा
(सं. सु+स्तन)

सुस्ताई
सुस्ती।
संज्ञा
(हिं. सुस्ती)

सुस्ताना, सुस्तानो
थकावट दूर करने के लिए आराम या विश्राम करना।
क्रि.अ.
(हिं. सुसताना)

सुस्ती
सुस्त होने का भाव, शिथिलता।
संज्ञा
(फ़ा. सुस्त)

सुस्ती
आलस्य।
संज्ञा
(फ़ा. सुस्त)

सुस्तैन
वह धार्मिक कृत्य जो अशुभ बातों का नाश करके शुभ की स्थापना के लिए किया जाता है।
संज्ञा
(सं. स्वस्त्ययन)

सुस्थ
भला-चंगा, स्वस्थ।
वि.
(सं.)

सुस्थित
स्वस्थ।
वि.
(सं.)

सुस्थित
भाग्यवान।
वि.
(सं.)

सुस्थिति
अच्छी या उत्तम स्थिति।
संज्ञा
(सं.)

सुस्थिति
आनंद।
संज्ञा
(सं.)

सुस्थिति
कुशल-क्षेम।
संज्ञा
(सं.)

सुस्थिर
दृढ़, अविचल।
वि.
(सं.)

सुस्मित
हँसमुख, हँसोड़।
वि.
(सं.)

सुस्वधा
कल्याण।
संज्ञा
(सं.)

सुस्वधा
सौभाग्य।
संज्ञा
(सं.)

सुस्वन
शंख।
संज्ञा
(सं.)

सुस्वन
उत्तम शब्द या ध्वनि से युक्त।
वि.

सुस्वन
बहुत ऊँचा।
वि.

सुस्वन
सुंदर, मनोहर।
वि.

सुस्वप्न
अच्छा या शुभ सपना।
संज्ञा
(सं.)

सुस्वर
जिसका स्वर या कंठ ध्वनि मदूर हो, सुरीला, सुकंठ।
वि.
(सं.)

सुस्वर
सुरीला स्वर।
संज्ञा

सुस्वर
शंख।
संज्ञा

सुस्वरता
सुरीलापन, स्वर की मधूरता।
संज्ञा
(सं.)

सुस्वरता
वंशी के पाँच गुणों में एक।
संज्ञा
(सं.)

सुस्वाद, सुस्वादु
बहुत स्वादिष्ट।
वि.
(सं. सुस्वादु)

श्रुतिमुख
(चार मुखवाले) ब्रह्मा।
संज्ञा
(सं.)

श्रुतिवेध
कृनछेदन (संस्कार)।
संज्ञा
(सं.)

श्रुतिहारी
सुनने में प्रिय।
वि.
(सं.)

श्रुत्य
सुनने योग्य।
वि.
(सं.)

श्रुत्य
प्रसिद्ध।
वि.
(सं.)

श्रुत्यनुप्रास
अनुप्रास का एक भेद।
संज्ञा
(सं.)

श्रेणि, श्रेणी
कतार, पाँती, पंक्ति।
संज्ञा
(सं. श्रेणि)

श्रेणि, श्रेणी
सिलसिला, क्रम, श्रृंखला।
संज्ञा
(सं. श्रेणि)

श्रेणि, श्रेणी
दल, समूह।
संज्ञा
(सं. श्रेणि)

श्रेणि, श्रेणी
सेना, सैन्य।
संज्ञा
(सं. श्रेणि)

सुहंग, सुहंगम, सुहँगा
सस्ता।
वि.
(हिं. महँगा का अनु.)

सुहंग, सुहंगम, सुहँगा
सरल, सहज।
वि.
(सं. सुगम)

सुहंग, सुहंगम, सुहँगा
सुंदर।
वि.
(हिं. सु+ढ़ंग)

सुहटा
सुंदर।
वि.
(हिं. सुहावना)

सुहड़
योद्धा।
संज्ञा
(सं. सुभट)

सुहड़
सुंदर शरीरवाला।
वि.
(सं. सु+हिं. हाड़)

सुहथ
सुंदर हाथ।
संज्ञा
(सं. सु+हिं. हाथ)
उ.-छूटे चिहुर बदन कुभिलानो सुहथ सँवारि बनाइये-१६८८।

सुहनी
झाड़ू।
संज्ञा
(हिं. सोहनी)

सुहनी
सुंदर, सुहावनी।
वि.
(हिं. सोहना)

सुहनी
एक प्रकार की रागिनी।
वि.

सुहम
बहुत छोटा या सूक्ष्म।
वि.
(सं. सूक्ष्म)

सुहराना, सुहरानो
धीरे-धीरे हाथ फेरना।
क्रि.स.
(हिं. सहलाना)

सुहराना, सुहरानो
मलना।
क्रि.स.
(हिं. सहलाना)

सुहल
एक कल्पित तारा।
संज्ञा
(अ. सुहेल)

सुहव, सुहवि, सुहवी
एक राग।
संज्ञा
(हिं. सूहा)
उ.-राग राज्ञी सँचि मिलाई गावै सुघर मलार। सुहवी सारँग टोड़ी भैरवी केदार-२२७९।

सुहस्त
सुंदर हाथोंवाला।
वि.
(सं. सु+हस्त)

सुहा
लाल रंग का।
वि.
(हिं. सूहा)

सुहा
ՙलाल՚ नामक पक्षी।
संज्ञा

सुहा
एक राग।
संज्ञा

सुहाइ
अच्छा या भला लगता है।
क्रि.स.
(हिं. सुहाना)
उ.-(क) छहौं रस जौ धरौं आगैं तउ न गंध सुहाइ-१−५६। (ख) बड़ी बेर भई अजहुँ न आए, गृह बन कछु न सुहाइ-५७८। (ग) हम रुचि करी सूर के प्रभु सों दूजो मन न सुहाइ-३२१०।

सुहागरात
विवाह के बाद की वह रात जिसमें वर-वधू का पहले-पहल मिलन और समागम होता है।
संज्ञा
(हिं. सुहाग+रात)

सुहागा
एक प्रकार का क्षार जो सोना गलाने, छींट छापने तथा कुछ औषधों को बनाने के काम आता है।
संज्ञा
(सं. सुभग)

सुहागिन, सुहागिनि, सुहागिनी, सुहागिल
वह स्त्री जिसका पति जीवित हो, सधवा या सौभाग्यवाती स्त्री।
संज्ञा
(हिं. सुहाग)
उ.-(क) जसुमति भाग सुहागिनी, जायौ हरि सौ पूत-१०−४०। (ख) जसुमति भाग सुहागिनी हरि कौं सुत जानै-१०−७२। (ग) चारि चारि दिन सबै सुहागिनि री ह्वै चुकीं मैं स्वरूप अपनी-१६६२।

सुहात
भला या अच्छा लगता है, रुचता है।
क्रि.स.
(हिं. सुहाना)
उ.-(क) अब न सुहात बिषय-रस- छीलर वा समुद्र की आस-१−३३७ (ख) गोकुल बाजत सुनी बधाई, लोगनि हिएँ सुहात-१०−१२। (ग) सखी-सखा-सुख नहिं त्रिभुवन मैं, नहिं बैकुंठ सुहात-२९१०। (घ) भयौ उदास, सुहात न कछुवै-सारा. ४३६।

सुहाता
जो सहा जा सके, जो सहन करने के योग्य हो, सह्य।
वि.
(हिं. सहना)

सुहाता
जो प्रिय या रुचिकर हो।
वि.
(हिं. सहना)

सुहाती
शोभित होती है।
क्रि.अ.
(हिं. सुहाना)
उ.-जे जरि मरै प्रगट पावक परि ते त्रिय अधिक सुहाती-२४९९।

सुहाती
भली लगनेवाली, रुचिकर।
वि.
(हिं. सुहावनी)
उ.-(क) सूरदास प्रभु कहा चलत है कोटिक बात सुहाती-२९८१। (ख) समय पाइ ब्रज बात चलाई सुख ही माँझ सुहाती-३४१८।

सुहातौ
जो भला या अच्छा लगे, जो प्रिय या रुचिकर हो।
वि.
(हिं. सुहाता)
उ.-मैं-मेरी कबहूँ नहिं कीजै, कीजै पंच सुहातौ-१−३०२।

सुहाना, सुहानो
शोभित होना।
क्रि.अ.
(सं. शोभन)

सुहाइ
शोभा देता है, सुंदर लगता है।
क्रि.अ.
उ.-नील खुर अरु अरुन लोचन सेत सींग सुहाइ-१−५६।

सुहाई
शोभित हुई।
क्रि.अ.
(हिं. सुहाना)
उ.-कुच बिष बाँटि लगाइ कपट करि बाल- घातिनी परम सुहाई-१०−५०।

सुहाई
सुहानेवाली, शोभित होनेवाली, सुंदर।
वि.
(हिं. सुहावनी)
उ.-(क) यमुना पुलिन मल्लिका मनोहर सरद सुहाई यामिनी। (ख) निमिष-निमिष मों बिसरत नाहीं सरद सुहाई राती-२९८१।

सुहाउँ
भला लगूँ।
क्रि.स.
(हिं. सुहाना)
उ.- काकैं द्वार जाइ होउँ ठाढो, देखत काहि सुहाऊँ-१−१२८।

सुहाए
शोभायमान हुए, सुंदर लगे।
क्रि.अ.
(हिं. सुहाना)
उ.-बाल-दसा के चिकुर सुहाए-१०−१०४।

सुहाए
सुंदर।
वि.
(हिं. सुहावना)
उ.-साप दग्ध ह्वै सुत कुबेर के आनि भए तरु जुगल सुहाए-३८६।

सुहाग
स्त्री के सधवा रहने की अवस्था, अहिवात, सौभाग्य।
संज्ञा
(सं. सौभाग्य)
उ.-धनि-धनि महरि की कोख भाग सुहाग भरी-१०−२४।
मुहा.-सुहाग भरना-स्त्री को सौभाग्यवती बनाने के लिए उसकी माँग भरना। सुहाग मनाना-पतिसुख के सदा बने रहने की कामना करना। सुहाग माँगना-(देवी देवता या शुभचिंतक गुरुजन से) सौभाग्य अखंड रहने का आशीर्वाद माँगना।

सुहाग
माँगलित गीत जो विवाह के समय कन्या-पक्ष की स्त्रियाँ गाती हैं।
संज्ञा
(सं. सौभाग्य)
मुहा.-सुहाग गाना-मांगलिक गीत गाना।

सुहाग
सुख-सौभाग्य।
संज्ञा
(सं. सौभाग्य)
उ.-हरि अनुराग सुहाग भरि अमी के गागर रे-३१५०।

सुहागन
सौभाग्यवती।
वि.
(हिं. सुहागिन्)

सुहाना, सुहानो
भला या अच्छा लगना, रुचिकर लगना, रुचिकर या प्रिय होना।
क्रि.स.

सुहाना, सुहानो
देखने में भला और सुंदर लगनेवाला, प्रिय दर्शन।
वि.
(हिं. सुहावना)

सुहाया, सुहायो, सुहायौ
जो देखने-सुनने में भला जान पड़े, सुहावना, सुंदर।
वि.
(हिं. सुहाना)
उ.-बोलि बोलि सुत-स्वजन मित्र-जन लीन्यौ सुजस सुहायौ-२−३०।

सुहारी
हथेली के आकार से भी छोटी-छोटी सादी पूरियाँ जो देवी-देवता की पूजा अथवा अन्य वैसे ही उत्सवों के लिए बनायी जाती हैं।
संज्ञा
(सं. सु+आहारी)
उ.-कान कुँवर को कनछेदन है हाथ सुहारी (सोहारी) भेली गुर की-१०−१७९।

सुहारी
सादी पूरी नामक पकवान।
संज्ञा
(सं. सु+आहारी)
उ.-(क) घेबर, फेनी और सुहारी-१०-२११। (ख) सेव सुहारी घेवर घी के-२३२१।

सुहाल
एक प्रकार का बहुत खस्ता और नमकीन पकवान जो मैदे का बनता है।
संज्ञा
(सं. सु+आहार)

सुहाली
सुहारी।
संज्ञा
(हिं. सुहारी)

सुहाव
सुंदर, भला।
वि.
(हिं. सुहाना)

सुहाव
सुंदर हाव (-भाव)।
संज्ञा
(सं. सु+हाव)

सुहावत
प्रिय या रुचिकर लगता है।
क्रि.स.
(हिं. सुहावना)
उ.-पुनि पुनि कहत स्याम श्रीमुख सौं, तुम मेरे मन अतिहिं सुहावत-४४९।

सुहावै
प्रिय या रुचिकर लगती है।
क्रि.स.
(हिं. सुहाना)
उ.-झूठैं लोग लगावत मोकौं, माटी मोहिं न सुहावै-१०−२५३।

सुहास
सुंदर या मधुर मुस्कानवाला।
वि.
(सं.)

सुहास
जो हर समय हँसता रहे।
वि.
(सं.)

सुहास
सुंदर या मधुर हास्य।
संज्ञा

सुहासी
सुंदर या मधुर मुस्कानवाला, चारुहासी।
वि.
(सं. सुहासिन्)

सुहाहीं
भले या सुंदर लगते हैं, शोभित होते हैं।
क्रि.अ.
(हिं. सुहाना)
उ.-गोबर्धन परबत के ऊपर बोलत मोर सुहाहीं-सारा. ८६२।

सुहित
बहुत लाभकारी या उपयोगी।
वि.
(सं.)

सुहित
किया हुआ।
वि.
(सं.)

सुहित
संतुष्ट।
वि.
(सं.)

सुहित
उपयुक्त।
वि.
(सं.)

सुहावता, सुहावन
अच्छा या भला लगनेवाला, सुंदर।
वि.
(हिं. सुहाना)

सुहावता, सुहावन
रुचिकर, प्रिय।
वि.
(हिं. सुहाना)

सुहावना
देखने में अच्छा या भला मालूम होना।
क्रि.अ.
(हिं. सुहाना)

सुहावना
रुचिकर और प्रिय लगना।
क्रि.स.

सुहावना
अच्छा या भला लगनेवाला, मनोहर।
वि.

सुहावना
प्रिय या रुचिकर लगनेवाला।
वि.

सुहावनापन
सुहावने का भाव, सुंदरता, मनोहरता।
संज्ञा
(हिं. सुहावना+पन)

सुहावनो
सुंदर, मनोहर।
वि.
(हिं. सुहावना)
उ.-द्वै खंभ कंचन के मनोहर रत्न जटित सुहावनो-२२८०।

सुहावनो
प्रिय, रुचिकर।
वि.
(हिं. सुहावना)

सुहावला
सुहावना।
वि.
(हिं. सुहावना)

सुहित
विशेष मंगल या कल्याण।
संज्ञा

सुहिया
ՙलाल՚ पक्षी।
संज्ञा
(हिं. सुहा)

सुही
लाल रंग की।
वि.
(हिं. सुहा)
उ.-(क) उर अंचल उड़त न जानि, सारी सुरँग सुही-१०−२४। (ख) पहिरे चीर सुही सुरंग सारी चुहुचुहु चूनरी बहु रंगनो-२२८०।

सुहूँ
पूरा।
वि.
(सं. शुद्ध)

सुहूँ
ठीक, शुद्ध।
वि.
(सं. शुद्ध)

सुहृत, सुहृत्, सुहृद, सुहृद्
अच्छे और शुद्ध हृदयवाला व्यक्ति।
संज्ञा
(सं. सुहत्)

सुहृत, सुहृत्, सुहृद, सुहृद्
मित्र, सखा, बंधु।
संज्ञा
(सं. सुहत्)
उ.- (क) सूर सो सुहृद मानि-१७७। (ख) सानि-सानि दधि-भात लियौ कर सुहृद सखनि कर देस-४१६।

सुहृत, सुहृत्, सुहृद, सुहृद्
अच्छे, शुद्ध और दयार्द्र हृदयवाला।
वि.
उ.-पंछी एक सुहृद जानत हौ, करयौ निसाचर भंग-९−८३।

सुहृत, सुहृत्, सुहृद, सुहृद्
सहृदय, उदार, जो निष्ठुर न हो।
वि.
उ.-बिहँसि बृषभानु-तनया कहति, हम निष्ठुर तुम सुहृद बात वह जिनि चलावो-२०७३।

सुहृदय
उदार या विशद दृष्टिकोणवाला, उन्नतमना।
वि.
(सं.)

सूँ
किसी चीज से या किसी प्राणी की नाक से निकलने वाला ՙसूँ՚ शब्द।
संज्ञा
(अनु.)

सूँइस
एक जल-जंतु।
संज्ञा
(हिं. सूंस)

सूँधतिं
(सूँघकर) महक या वास का अनुभव करती या पता लगाती हैं।
क्रि.स.
(हिं. सूँघना)
उ.-जहाँ तहाँ गोदोहन कीनो सूँघतिं सोई ठावें-३४२१।

सूँधना, सूँधनो
नाक से (सूँघकर) किसी महक या वास का पता लगाना या अनुभव करना।
क्रि.स.
(सं. सं+घ्राण)
मुहा.-सिर सूँघना-एक रीति जिसके द्वारा गुरुजन मंगलकामना के भाव से छोटों का सिर या मस्तक सूँघते हैं। जमीन सूँघना-(१) ऊँघना। (२) जमीन पर मुँह के बल पटक दिया जाना।

सूँधना, सूँधनो
बहुत ही कम भोजन करना (व्यंग्य)।
क्रि.स.
(सं. सं+घ्राण)

सूँधना, सूँधनो
(साँप का) डसना या काटना।
क्रि.स.
(सं. सं+घ्राण)

सूँधा
केवल जमीन सूँघकर उसके नीचे पानी या खजाना बता सकनेवाला व्यक्ति।
संज्ञा
(हिं. सूँघना)

सूँधा
सूँघ-सूँघकर शिकार तक पहुँचा सकनेवाला पथ।
संज्ञा
(हिं. सूँघना)

सूँधा
जासूस।
संज्ञा
(हिं. सूँघना)

सूँधि
नाक से महक या वास लेकर, सूँघकर।
क्रि.स.
(हिं. सूँघना)
उ.-ज्यौं सौरभ मृग-नाभि बसत है, द्रुम-तृन सूँघि फिरयौ-२−२६।

सुहृदय
सदय, सहृदय।
वि.
(सं.)

सुहेल
एक कल्पित तारा जिसके उदय पर चमड़े में सुगंध आना और अनेक जीवों का मर जाना माना जाता है।
संज्ञा
(अ.)

सुहेलरा, सुहेला
सुंदर, सुहावना।
वि.
(सं. शुभ, हिं. सुहेला)

सुहेलरा, सुहेला
सुखद, सुखदायक।
वि.
(सं. शुभ, हिं. सुहेला)

सुहेलरा, सुहेला
मंगलगीत।
संज्ञा

सुहेलरा, सुहेला
स्तुति।
संज्ञा

सुहेलरा, सुहेला
मित्र, सखा, साथी।
संज्ञा
(सं. सुहद)

सुहेस
अच्छा, भला, सुंदर।
वि.
(सं. शुभ)

सुहोता
उत्तम रीति या विधि से हवन करनेवाला होता।
संज्ञा
(सं. सुहोतृ)

सूँ
ब्रजभाषा में करण और अपादान कारक का चिह्न जिसका प्रयोग बोलचाल में अधिक होता है, से। (ՙसूरसागर՚ में इसका प्रयोग नहीं है ; ՙसारावली՚ में ही है।)
अव्य.
(सं. सुह)
उ.- (क) दुर्जोधन सूँ कहथौ दूत ह्वै-सारा. ७७३। (ख) नव निकुंज में मिलौ स्याम सूँ-सारा. ९२२।

श्रेणि, श्रेणी
मंडली।
संज्ञा
(सं. श्रेणि)

श्रेणीबद्ध
पंक्ति में स्थित।
वि.
(सं.)

श्रेय
श्रेष्ठ।
वि.
(सं. श्रेयस्)

श्रेय
शुभ, मंगलकारी।
वि.
(सं. श्रेयस्)

श्रेय
यश या कीर्तिदायक।
वि.
(सं. श्रेयस्)

श्रेय
श्रेंष्ठता।
संज्ञा

श्रेय
मंगल, कल्याण।
संज्ञा

श्रेय
यश, कीर्ति।
संज्ञा

श्रेय
धर्म, पुण्य।
संज्ञा

श्रेयस्कर
कल्याण करनेवाला।
वि.
(सं.)

सूक
वाण।
संज्ञा
(सं.)

सूक
वायु।
संज्ञा
(सं.)

सूक
तोता, कीर।
संज्ञा
(सं. शुक)

सूक
सौर-जगत का ՙशुक्र՚ नामक ग्रह जो दैत्यों का गुरु कहा गया है।
संज्ञा
(सं. शुक्र)

सूकना
सूखना।
क्रि.अ.
(हिं. सूखना)

सूकर
सुअर (पशु)।
संज्ञा
(सं.)
उ.-(क) भजन-बिनु जैसैं सूकर-स्वान सियार-१−४१। (ख) उदर भरथौ कूकर-सूकर लौं-१−६५। (ग) बहुतक जन्म पुरीष-परायन सूकर-स्वान भयौ-१−७८।

सूकर
एक नरक का नाम।
संज्ञा
(सं.)

सूकरक्षेत्र, सूकरखेत
एटा जिले का ՙसोरों՚ नामक स्थान जहाँ वाराह-अवतार की मूर्ति और मंदिर है।
संज्ञा
(सं. शूकरक्षेत्र)

सूकरी
ՙसुअर՚ नामक पशु की मादा।
संज्ञा
(हिं. सूकर)

सूकरी
वाराही देवी।
संज्ञा
(हिं. सूकर)

सूँड, सूँडा
हाथी की नाक जो बहुत लंबी होती है, शुंड।
संज्ञा
(सं. शुण्ड)

सूँड़ी
एक सफेद कीड़ा।
संज्ञा
(सं. शुण्डी)

सूँतना
सीधा करना।
क्रि.स.
(हिं. सूतना)

सूँतना
ऊपर से नीचे की ओर हाथ फेरना।
क्रि.स.
(हिं. सूतना)

सूँतना
डोरे आदि पर माँझ . कलफ करना।
क्रि.स.
(हिं. सूतना)

सूँतना
नोचना-खसोटना।
क्रि.स.
(हिं. सूतना)

सूँतना
चूसना, सोखना।
क्रि.स.
(हिं. सूतना)

सूँस
एक जलजंतु।
संज्ञा
(सं. शिंशुमार)

सूँह
सामने।
अव्य.
(सं. सम्मुख, पु. हिं. सौंहें)

सूअर
एक प्रसिद्ध पशु जो आकार, वास-स्थान और स्वभाव के विचार से दो प्रकार का होता है-पालतू और जंगली।
संज्ञा
(सं. शूकर)

सूअर
एक गाली।
संज्ञा
(सं. शूकर)

सूअरबियान
हर साल बच्चा जनने की क्रिया।
संज्ञा
(हिं. सूअर+बियाना)

सूअरबियान
वह स्त्री जो हर साल बच्चा जनती हो।
संज्ञा
(हिं. सूअर+बियाना)

सूआ
तोता, कीर।
संज्ञा
(सं. शुक, आ. सूअ)

सूआ
बड़ी और मोटी सुई।
संज्ञा
(हिं. सुई)

सूई
लोहे का वह पतला तार-जैसा उपकरण जिसके महीन छेद में तागा पिरोकर कपड़ा आदि सिया जाता ह़ै।
संज्ञा
(सं. सूची)
मुहा.-आख की सूई निकालना-किसी विकट काम को समाप्तप्राय देखकर सेषांश को पूरा करके सारे कार्य-संपादन का श्रेय प्राप्त करने का प्रयत्न करना। सुई का फावड़ा या भाला बना देना-जरा सी बात को बहुत बढ़ा देना, बात का बतंगड़ करना।

सूई
किसी विशेष अंग, दिशा आदि का सूचक उपकरण।
संज्ञा
(सं. सूची)

सूई
पौधे का पतला अँखुआ या अंकुर।
संज्ञा
(सं. सूची)

सूई
गोदना गोदने का तार।
संज्ञा
(सं. सूची)

सूईकारी
सुई से काढ़कर कपड़े पर बेल-बूटे बनाने का शिल्प।
संज्ञा
(हिं. सुई+फ़ा. कारी)

सूख
जिसमें जल न रहा हो।
वि.
(हिं. सूखा)

सूख
रसहीन।
वि.
(हिं. सूखा)

सूख
कांतिहीन।
वि.
(हिं. सूखा)

सूख
कोरा।
वि.
(हिं. सूखा)

सूख
केवल, निरा, खाली।
वि.
(हिं. सूखा)

सूख
दुबला, कृश।
वि.
(हिं. सूखा)
मुहा.-सूखकर काँटा होना-बहुत दुबला या कृश होना।

सूखति
सूख रही है, दुर्बल या कृश हो रही है।
क्रि.अ.
(हिं. सूखना)
उ.-सूखति सूर धान अंकुर सी बिनु बरषा ज्यों मूल तुई-१४३३।

सूखना, सूखनो
नमी, तरी, गीलापन या आर्द्रता न रहना।
क्रि.अ.
(सं. शुष्क, हिं. सूखा)

सूखना, सूखनो
जल का बिलकुल न रहना या बहुत कम हो जाना।
क्रि.अ.
(सं. शुष्क, हिं. सूखा)

सूखना, सूखनो
कांति-तेजहीन, खिन्न या उदास होना।
क्रि.अ.
(सं. शुष्क, हिं. सूखा)

सूका
चार आने का सिक्का, चवन्नी।
संज्ञा
(सं. सपादक= चतुर्थांश सहित)

सूकी
घूस, रिश्वत।
संज्ञा
(हिं. सूका=सिक्का)

सूक्त
वेद- मंत्रों या ऋचाओं का संग्रह या संकलन
संज्ञा
(सं.)

सूक्त
उत्तम कथन या भाषण।
संज्ञा
(सं.)

सूक्त
भली भाँति कहा हुआ या कथित।
वि.

सूक्तदर्शी
वेदमंत्रों या ऋृचाओं का अर्थ करनेवाला, मंत्रद्रष्टा।
वि.
(सं. सूक्तदर्शिन्)

सूक्ता
मैना, सारिका।
संज्ञा
(सं.)

सूक्ति
सुंदर उक्ति या वाक्य।
संज्ञा
(सं.)

सूक्षम, सूक्ष्म
बहुत छोटा, थोड़ा या महीन।
वि.
(सं. सूक्ष्म)
उ.-गंड सूक्ष्म-२३०९।

सूक्षम, सूक्ष्म
अणु, परमाणु।
संज्ञा

सूक्षम, सूक्ष्म
लिंग शरीर।
संज्ञा

सूक्षम, सूक्ष्म
एक काव्यालंकर।
संज्ञा

सूक्ष्मता
सूक्ष्म होने का भाव।
संज्ञा
(सं.)

सूक्ष्मदर्शिता
बारीक या सूक्ष्म बात सोचने-समझने का गुण।
संज्ञा
(सं.)

सूक्ष्मदर्शी
बारीक या सूक्ष्म बात सोचने-समझनेवाला।
वि.
(सं. सूक्ष्मदर्शिन्)

सूक्ष्मदृष्टि
वह दृष्टि जौ बहुत ही सूक्ष्म बातें देख-समझ ले।
संज्ञा
(सं.)

सूक्ष्मद्दष्टि
वह जो सूक्ष्म से सूक्ष्म बातें देखने-समझन की दृष्टि रखता हो।
संज्ञा

सूक्ष्मदेही
जिसका शरीर बहुत ही छोटा या दुबला-पतला हो।
वि.
(सं. सूक्ष्मदेहिन्)

सूक्ष्ममति
जिसकी बुद्धि तीव्र हो।
वि.
(सं.)

सूक्ष्म शरीर
पाँच प्राण, पाँच ज्ञानेंद्रिय, पाँच सूक्ष्म तथा मन और बुद्धि-इन सत्रह तत्वों के समूह से निर्मित वह कल्पित शरीर जिसे ՙलिंग शरीर՚ भी कहते हैं। हिंदुओं का विश्वास है कि सूक्ष्म या लिंग शरीर, प्राणी की मृत्यु और स्थूल शरीर के नाश के उपरांत भी उस समय तक बना रहना है जब तक मुक्ति नहीं होती। स्वर्ग और नरक के भोग भी इसी शरीर को भोगने पड़ते हैं।
संज्ञा
(हिं. सूखा)

सूखना, सूखनो
बरबाद या नष्ट होना।
क्रि.अ.
(सं. शुष्क, हिं. सूखा)

सूखना, सूखनो
डरना, सन्न रह जाना।
क्रि.अ.
(सं. शुष्क, हिं. सूखा)

सूखना, सूखनो
रोग, चिंता आदि से दुबला या कृश होना।
क्रि.अ.
(सं. शुष्क, हिं. सूखा)

सूखा
जिसकी नमी, तरी या आर्द्रता उड़ या जल गयी हो।
वि.
(सं. शुष्क)

सूखा
जिसका जल उड़ गया या बहुत कम रह गया हो।
वि.
(सं. शुष्क)

सूखा
जो कांति या तेजहीन, खिन्न या उदास हो गया हो।
वि.
(सं. शुष्क)

सूखा
बरबाद, नष्ट।
वि.
(सं. शुष्क)

सूखा
कठोर या हंदयहीन।
वि.
(सं. शुष्क)

सूखा
कोरा, निरा, खाली, केवल।
वि.
(सं. शुष्क)
मुहा.-सूखा जवाब देना- साफ-साफ इनकार कर देना। सूखा टरकाना या टालना-याचक या आकांक्षी की कोई भी या कुछ भी इच्छा पूरी न करके लौटाना।

सूखा
पानी न बरसने की दशा या स्थिति, अनावृष्टि।
संज्ञा

सूखा
नदी का किनारा जो जल से ऊपर हो।
संज्ञा

सूखा
ऎसा स्थान जहाँ जल न हो।
संज्ञा

सूखा
एक तरह की खाँसी जो बच्चों के प्राण तक ले लेती है।
संज्ञा

सूखा
एक रोग जिसमें खाना खाने पर भी दुबलापन बना रहता है।
संज्ञा
मुहा.-सूखा लगना-ऎसा रोग होना कि शरीर बराबर सूखता ही जाय।

सूखे
जिसमें रस या आर्द्रता न रह गयी हो।
वि.
(हिं. सूखा)
उ.-सूखे पात और तृन खाइ-५−३।

सूखे
उदार, खिन्न, तेज या कांतिहीन।
वि.
(हिं. सूखा)
उ.-सूखे बदन स्रवन नैनन तें जलधारा उर बाढ़ी−२५३५।

सूखै
पानी उड़ या जल जाय।
क्रि.अ.
(हिं. सूखना)
उ.-(क) सरवर नीर भरै भरि उमड़ै, सूखै, खेह उड़ाइ-१−२६५। (ख) जिनके क्रोध पुहुमि नभ पलटैं, सूखै सकल सिंधु कर पानी-९−११६।

सूख्यो, सूख्यौ
नमी, तरी या आर्द्रताहीन हो गया।
क्रि.अ.
(हिं. सूखना)
उ.-देखौ करनी कमल कीं, कीन्हौं रवि सौं हेत। प्रान तज्यौ प्रन न तज्यौ सूख्यौ सरहिं समेत-१−३२५।

सूघर
सुडौल, सुंदर।
वि.
(हिं. सूघड़)

सूच
निर्मल, पवित्र।
वि.
(सं. शुचि)

सूचक
बताने या सूचना देनेवाला।
वि.
(सं.)

सूचक
बोध या ज्ञान करानेवाला (लक्षण या तत्व)।
वि.
(सं.)

सूचक
दरजी।
संज्ञा

सूचक
सूत्रधार।
संज्ञा

सूचत
बताता या जताता है, प्रकट या सूचित करता है।
क्रि.स.
(हिं. सूचना)
उ.-(क) नमित मुख इमि अधर सूचत सकुच मैं कछु रोष-३५०। (ख) ताहू मैं अति चारु बिलोकनि गूढ़ भाव सूचत सखि सैन-१३१३।

सूचन
बताने की क्रिया।
संज्ञा
(सं.)

सूचन
बोध या ज्ञान कराने की क्रिया।
संज्ञा
(सं.)

सूचना
बोध या ज्ञान कराने की क्रिया।
संज्ञा
(सं.)

सूचना
जताने, बताने या परिचय कराने के लिए कही गयी बात।
संज्ञा
(सं.)

सूचना
वह पत्र या विज्ञापन जिस पर किसी विषय का परिचय कराने की बात लिखी हो, परिचायक विज्ञप्ति।
संज्ञा
(सं.)

सूचना
बताना, सूचित करना।
क्रि.स.
(सं. सूचन)

सूचनापत्र
विज्ञापन, विज्ञप्ति।
संज्ञा
(सं.)

सूचनीय
बताये-जताने योग्य।
वि.
(सं.)

सूचा
जो सचेत या सावधान हो।
वि.
(हिं. सुचित्त)

सूचि
सुई।
संज्ञा
(सं.)

सूचि
दृष्टि।
संज्ञा
(सं.)

सूचि
शुद्ध, पवित्र।
वि.
(सं. शुचि)

सूचिक
दरजी, सौचिक।
संज्ञा
(सं.)

सूचिका
सुई।
संज्ञा
(सं.)

सूचिका
सूचना देनेवाली।
वि.

श्रेष्ठ
बहुत अच्छा।
वि.
(सं.)

श्रेष्ठ
मुख्य, प्रधान।
वि.
(सं.)

श्रेष्ठ
पूज्य।
वि.
(सं.)

श्रेष्ठ
ज्येष्ठ।
वि.
(सं.)

श्रेष्ठ
कल्याण-भाजन।
वि.
(सं.)

श्रेष्ठता
उत्तमता।
संज्ञा
(सं.)

श्रेष्ठता
बड़प्पन।
संज्ञा
(सं.)

श्रेंष्ठी
महाजन, सेठ।
संज्ञा
(सं.)

श्रोण
शोण नद।
संज्ञा
(सं. शोण)

श्रोणि
कमर, कटि।
संज्ञा
(सं.)

सूचिका
बोधक।
वि.

सूचित
बताया या जताया हुआ, जिसकी सूचना दी गयी हो, ज्ञापित।
वि.
(सं.)

सूची
कपड़ा आदि सीने-काढ़ने की सुई।
संज्ञा
(सं.)

सूची
सेना का एक प्रकार का व्यूह।
संज्ञा
(सं.)

सूची
तालिका, नामावाली।
संज्ञा
(सं.)

सूची
पिंगल की एक रीति जिसमें नियत वर्णों या मात्राओं से बन सकनेवाले छंदों की संख्या जानी जाती है।
संज्ञा
(सं.)

सूचीक
मच्छर जैसे जंतु जिनके डंक सुई की तरह के होते हैं।
संज्ञा
(सं.)

सूचीकर्म
सिलाई की कला जो चौंसठ कलाओं में एक है।
संज्ञा
(सं. सूचीकर्म्मन्)

सूचीपत्र
प्राप्त वस्तुओं की सूची, तालिका या नामावली।
संज्ञा
(सं.)

सूचीभेद, सूचीभेद्य
जो सुईँ से भेदा जाने योग्य हो।
वि.
(सं. सूचिभेद्य)

सूचीभेद, सूचीभेद्य
बहुत घना।
वि.
(सं. सूचिभेद्य)

सूचीमुख
सुई का छेद या नाका।
संज्ञा
(सं.)

सूचीमुख
एक नरक का नाम।
संज्ञा
(सं.)

सूची-शिल्प
सुई का काम जो चौंसठ कलाओं में एक है।
संज्ञा
(सं.)

सूच्छम
बहुत छोटा।
वि.
(सं. सूक्ष्म)
उ.-सूच्छम चरन चलावत बल करि-१०−१२०।

सूच्छम
बहुत पतली या क्षीण।
वि.
(सं. सूक्ष्म)
उ.-(क) सूर आगम कियौ नभ तैं जमुन सूच्छम धार-६२४। (ख) राजति रोम-राजी रेख। नील घन मनु धूम धारा रही सूच्छम सेष-६३५।

सूच्य
सूचित करने का योग्य।
वि.
(सं.)

सूच्यग्र
सूई की नोक।
संज्ञा
(सं.)

सूच्यार्थ
वह अर्थ जो शब्दों की व्यंजना शक्ति से निकलता हो।
संज्ञा
(सं.)

सूछम, सूछिम
बहुत छोटा, पतला या थोड़ा।
वि.
(सं. सूक्ष्म)

सूजन
सूजने की क्रिया, भाव या अवस्था, शोथ।
संज्ञा
(हिं. सूजना)

सूजना
रोग, चोट आदि से शरीर के किसी अंग का (इस प्रकार) फूलना (कि उसमें पीड़ा भी हो), शोथ होना।
क्रि.अ.
(फ़ा. सोजिश)

सूजा
बड़ी मोटी सुई।
संज्ञा
(हिं. सूजी)

सूजी
गेहुँ का कुछ मोटा और दरदरा आटा।
संज्ञा
(सं. शुचि)

सूजी
सुई।
संज्ञा
(सं. सूची)

सूजी
कपड़ा सीनेवाला।
संज्ञा
(सं. सूची)

सूझ
सूझने का भाव।
संज्ञा
(हिं. सूझना)

सूझ
नजर, दृष्टि।
संज्ञा
(हिं. सूझना)

सूझ
होने या आनेवाली बातों का पहले ही ध्यान में आ जाने का भाव या गुण।
संज्ञा
(हिं. सूझना)

सूझ
अनूठी उपज या कल्पना, उदभावना।
संज्ञा
(हिं. सूझना)

सूझई
दिखायी देता है।
क्रि.अ.
(हिं. सूझना)
उ.-नैनन कछू न सूझई-३४२६।

सूझत
दिखायी देता है।
क्रि.अ.
(सं. संज्ञान)
उ.-(क) उपजत दोष नैन नहिं सूझत-१−११४। (ख) गरजत क्रोध-लोभ कौ नारौ, सूझत कहुँ न उतारौ-१−२०९। (ग) सूझत नहीं बीसहूँ लोचन-९−१३४। (घ) रवी कौ रथ सूझत नहिं धरनि-गगन छायो-९−१३९।

सूझत
ध्यान में आता है।
क्रि.अ.
(सं. संज्ञान)
उ.-जौलौं सत सरूप नहिं सूझत-२−२५।

सूझना, सूझनो
दिखायी देना, देख पड़ना।
क्रि.अ.
(सं. संज्ञान)

सूझना, सूझनो
ख्याल या ध्यान में आना।
क्रि.अ.
(सं. संज्ञान)

सूझना, सूझनो
छट्टी पाना, मुक्त होना।
क्रि.अ.
(सं. संज्ञान)

सूझ-बूझ
समझ या बुद्धि की बातें ध्यान में आना और समझ-बूझकर उनका उपयोग करना, दूरदर्शिता और बुद्धिमता।
संज्ञा
(हिं. सूझना-बूझना)

सूझिए
दिखायी देता है।
क्रि.अ.
(हिं. सूझना)
उ.-और अनत न सूझिए-१० उ.-२४।

सूझी
दिखायी दी।
क्रि.अ.
(हिं. सूझना)
उ.-जिह्वा स्वाद मीन ज्यौं उरझयौ सूझी नहीं फँदाई-१−१४७।

सूझै
दिखायी देता है।
क्रि.अ.
(हिं. सूझना)
उ.-(क) कान न सुनैं, आँखि नहिं सूझै-३−१३। (ख) अंधधुध मग कहूँ न सूझै-१०५०। (ग) इत हीं तें जाति उत, उत हीं तें फिरै, इत निकटह्वै जाति नहिं नैंक सूझै-११८८। (घ) सूर नंदनंदन को देखति और न कोई सूझै-३१५१।

सूझै
ध्यान में आता है।
क्रि.अ.
(हिं. सूझना)
उ.-(क) और सरन सूझै नहिं कोइ-१८०९। (ख) जिनके एक अनन्य ब्रत सूझै क्यौं दूजो उर आनै-३१३६।

सूझ्यो, सूझ्यौ
दिखायी दिया।
क्रि.अ.
(हिं. सूझना)
उ.-(क) धूम बढ़यौ, लोचन खस्यौ, सखा न सूझ्यौ संग-१−३२५। (ख) तव मारग सूझ्यौ नैननि कछु जिय अपने तिय गई लजाई-८८८।

सूत
रुई, रेशम आदि का वह पतला बटा हुआ तागा जिससे कपड़ा बुना जाता है।
संज्ञा
(सं. सूत्र)

सूत
रुई का बटा हुआ तार जिससे कपड़ा आदि सिया जाता है, तागा, धागा, डोरा।
संज्ञा
(सं. सूत्र)
मुहा.-सूत-सूत-जरा-जरा, तनिक-तनिक। सूत बराबर-बहुत महीन। सूत सों तोरयो-महीन सूत की तरह बड़ी सरलता से या अनायास तोड़ दिया। उ.-गृह गुरु लाज सूत सों तोरयो, डरी नहीं व्यवहार-पृ. ३३९ (८३)।

सूत
कई सूतों को बटकर बनायी गयी डोरी।
संज्ञा
(सं. सूत्र)
उ.-(क) सन अरु सूत चीर-पाटंबर लै लंगूर बँधाए-९−९८। (क) ग्रंथित सूत धारत तेहिं ग्रीवा जहाँ धरते बनमाल-३३३३।

सूत
किसी चीज से निकलनेवाला महीन या पतला तार।
संज्ञा
(सं. सूत्र)

सूत
बच्चों के गले में पहनाने का गंडा।
संज्ञा
(सं. सूत्र)

सूत
करधनी।
संज्ञा
(सं. सूत्र)

सूत
लंबाई नापने का एक मान।
संज्ञा
(सं. सूत्र)

सूत
पत्थर, लकड़ी आदि पर निशान डालने की डोरी।
संज्ञा
(सं. सूत्र)
मुहा.-सूत धरना या बाँधना-(कोयले, गेरू आदि के रंग में रँगे हुए सूत से पत्थर लकड़ी आदि पर निशान लगाना।

सूत
एक वर्ण-संकर जाति जिसका काम रथ हाँकना था।
संज्ञा
(सं.)

सूत
रथ हाँकनेवाला, सारथी।
संज्ञा
(सं.)
उ.-बाजी मनोरथ, गर्ब मत्त-गज, असत कुमति रथ-सूत-१−१४१।

सूत
बंदी, भाट या चारण जिनका काम राजाओं का यश-गान करना था।
संज्ञा
(सं.)
उ.-(क) मागध-बंदी-सूत लुटाए, गो-गयंद-हय-चीर-९−१८। (ख) मागध-बंदी-सूत अति करत कुलाहल बार-१०−२७। (ग) आनंदित बिप्र सूत-मागध जाचकगन-१०−३०।

सूत
पुराणवक्त या पौराणिक जिनमें सबसे प्रसिद्ध हैं लोमहर्षण जो वेदव्यास के शिष्य थे और जिन्होंने नैमिषारण्य में ऋृषियों के सब पुराण सुनाये थे।
संज्ञा
(सं.)
उ.-सूत सौनकनि सौं पुनि कहयौ-१−२२७।

सूत
बढ़ई, सूत्रधार।
संज्ञा
(सं.)

सूत
उत्पन्न, प्रसूत।
वि.
(सं.)

सूत
प्रेरित।
वि.
(सं.)

सूत
अच्छा, भला, उत्तम।
वि.
(सं. सूत्र)

सूत
थोड़े अक्षरों या शब्दों में कहा गया ऎसा पद या वाक्य जो बहुत अर्थ प्रकाशित करता हो।
संज्ञा

सूत
पुत्र, बेटा।
संज्ञा
(सं. सुत)

सूतक
जन्म।
संज्ञा
(सं.)

सूतक
संतान के जन्म पर माना जानेवाला अशौच।
संज्ञा
(सं.)

सूतक
किसी निकट संबंधी की मृत्यु पर परिवार में माना जानेवाला अशौच।
संज्ञा
(सं.)

सूतका
स्त्री जिसने हाल ही में बच्चा जाना या प्रसव किया हो।
संज्ञा
(सं.)

सूतकी
संतान-जन्म होने से जिसे अशौच हो।
वि.
(सं. सूतकिन्)

सूतकी
संबंधी की मृत्यु पर जिसे सूतक लगा हो।
वि.
(सं. सूतकिन्)

सूत-तनय
कर्ण (जिसका पालन-पोषण अधिरथ सारथी ने किया था)।
संज्ञा
(सं.)

सूतधार
बढ़ई।
संज्ञा
(सं. सूत्रधार)
उ.-अगरु चँदन कौ पालनौ (रँगि) ईंगुर ढार-सुढार। लै आयौ गढ़ि डोलना (हो) बिसकर्मा सूतधार (पाठा.-सूतहार) -१०−४०।

सूत-नंदन
कर्ण (जिसका पोषण और पालन अधिरथ सारथी ने किया था)।
संज्ञा
(सं.)

सूतना, सूतनो
सीधा करना, सीध में निशान लगाना।
क्रि.स.
(हिं. सूत+ना)

सूतना, सूतनो
ऊपर से नीचे की ओर हाथ फेरना।
क्रि.स.
(हिं. सूत+ना)

सूतना, सूतनो
डोरे आदि पर माँझ या कलफ चढ़ाना।
क्रि.स.
(हिं. सूत+ना)

सूतना, सूतनो
नोचना-खसोटना।
क्रि.स.
(हिं. सूत+ना)

सूतना, सूतनो
साफ करना।
क्रि.स.
(हिं. सूत+ना)

सूतना, सूतनो
सोख लेना, चूस लेना।
क्रि.स.
(हिं. सूत+ना)

सूतना, सूतनो
शयन करना।
क्रि.अ.
(हिं. सोना)

सूत-पुत्र
कर्ण (जिसका पालन अधिरथ सारथी ने किया था)।
संज्ञा
(सं.)

सूतवाँ
सुडौल।
वि.
(हिं. सूत)

सूता
तागा, धागा, डोरा।
संज्ञा
(हिं. सूत)

सूता
स्त्री जिसने बच्चा जना हो।
संज्ञा
(सं.)

सूति
जन्म।
संज्ञा
(सं.)

सूति
जनन, प्रसव।
संज्ञा
(सं.)

सूति
उद्गम।
संज्ञा
(सं.)

सूति
पैदावार।
संज्ञा
(सं.)

सूतहार
बढ़ई।
संज्ञा
(सं. सूत्र+धार)
उ.-अगरु चँदन कौ पालनौ (रँगि) ईगुर ढार-सुढार। लै आयौ गढ़ि डोलना (हो) बिसकर्मा सूतहार-१०−४०।

सूतिका
स्त्री जिसने हाल ही में बच्चा जाना हो, जच्चा।
संज्ञा
(सं.)

सूतिकागार
वह स्थान जहाँ बच्चा जना जाय या जना गया हो।
संज्ञा
(सं.)

सूती
सूत का बना हुआ।
वि.
(हिं. सूत)

सूती
सूत या सारथी की पत्नी।
संज्ञा

सूती
सीप, सीपी।
संज्ञा
(सं. शुक्ति)

सूते
सो गये।
क्रि.अ.
(हिं. सूतना=सोना)
उ.-स्वान सूते पहरुवा संब, नींद उपजी गेह-१०−५।

सूते
धागे या डोरी से।
संज्ञा
(हिं. सूत)

सूते
किसी वस्तु से निकलने वाले महीन तंतु से।
संज्ञा
(हिं. सूत)
उ.-किहिं गयंद बाँध्यौ सुन मधुकर पद्यनाल के काचे सूते-३३०५।

सूत्तर
बहुत बढ़कर, परमोत्तम।
वि.
(सं.)

सूत्र
तागा, डोरा।
संज्ञा
(सं.)

सूत्र
जनेऊ, यज्ञोपवीत।
संज्ञा
(सं.)

सूत्र
करधनी।
संज्ञा
(सं.)

सूत्र
नियम, व्यवस्था।
संज्ञा
(सं.)

सूत्र
ऎसा पद या वाक्य जिसमें अक्षर या शब्द तो बहुत थोड़े हों, परन्तु जो बहुत अर्थ प्रकाशित करता हो, सारगर्भित संक्षिप्त पद।
संज्ञा
(सं.)

सूत्र
कारण, निमित्त।
संज्ञा
(सं.)

श्रोणित
रक्त, रुधिर।
संज्ञा
(सं. शोणित)

श्रोणि सूत्र
करधनी, मेखला।
संज्ञा
(सं.)

श्रोणी
कमर, कटि।
संज्ञा
(सं.)

श्रोत
कान, श्रवण।
संज्ञा
(सं. श्रोतस्)

श्रोता
सुननेवाला।
वि.
(सं. श्रोतृ)

श्रोता
कथा, व्याख्यान आदि सुननेवाला।
वि.
(सं. श्रोतृ)

श्रोत्रिय, श्रोत्री
वेद-वेदांग का ज्ञाता।
वि.
(सं. श्रोत्रिय)

श्रोन
रक्त, रुधिर।
संज्ञा
(सं. शोण)

श्रोनित
रक्त, रुधिर।
संज्ञा
(सं. शोणित)

श्रौन
कान।
संज्ञा
(सं. श्रवण)

सूत्र
सूराग, पता।
संज्ञा
(सं.)

सूत्र
वह सांकेतिक पद या वाक्य जिसमें विशिष्ट कार्य, प्रयोग आदि का संक्षिप्त विधान निहित हो।
संज्ञा
(सं.)

सूत्र
कार्य आदि की रूपरेखा के अंगों में कोई।
संज्ञा
(सं.)

सूत्रकार
सूत्र का रचनेवाला।
संज्ञा
(सं.)

सूत्रकार
बढ़ई।
संज्ञा
(सं.)

सूत्रकार
जुलाहा, तंतुवाय।
संज्ञा
(सं.)

सूत्रकार
मकड़ी।
संज्ञा
(सं.)

सूत्रधर, सूत्रधार
नाट्यशाला का प्रधान और व्यवस्थापक नट।
संज्ञा
(सं. सूत्रधर)

सूत्रधर, सूत्रधार
बढ़ई, सुतार।
संज्ञा
(सं. सूत्रधर)

सूत्रधर, सूत्रधार
एक प्राचीन वर्ण-संकर जाति।
संज्ञा
(सं. सूत्रधर)

सूथन, सूथनि, सूथनी
एक तरह का पायजामा।
संज्ञा
(देश.)
उ.-(क) सूथन जंघन बाँधि नाराबँद तिरनी पर छवि भारी-पृ. ३४५ (५२७)। (ख) नाराबंदन सूथ जंघन-१८२०।

सूथार
बढ़ई।
संज्ञा
(पु. हिं. सुतार)

सूद
लाभ।
संज्ञा
(फ़ा.)

सूद
ब्याज।
संज्ञा
(फ़ा.)
मुहा.-सूद दर सूद-ब्याज पर ब्याज। सूद पर देना या लगाना-सूद लेकर रुपया उधार देना।

सूद
रसोइया।
संज्ञा
(सं.)

सूद
सूत या सारथी का काम।
संज्ञा
(सं.)

सूदखोर
जो बहुत ब्याज लेता हो।
वि.
(फ़ा. सूदखोर)

सूदन
विनाश करनेवाला।
वि.
(सं.)
उ.-नमो समस्ते बारम्बार। मदन-सूदन गोविंद मुरार।

सूदन
वध या विनाश करने की क्रिया।
संज्ञा

सूदना, सूदनो
मार डालना, वध करना।
क्रि.स.
(सं. सूदन)

सूत्रधरी
नटी।
संज्ञा
(सं.)

सूत्रधरी
सूत्र धारण करनेवाला।
संज्ञा
(सं. सूत्रधारिन्)

सूत्रपात
शूरू, प्रारम्भ, नींव पड़ना।
संज्ञा
(सं.)

सूत्रयी
सूत्र जानने या रचनेवाला।
वि.
(सं. सूत्र)

सूत्रित
सूत्र-रूप में लाया, प्रस्तुत किया या बनाया हुआ।
वि.
(सं.)

सूत्री
सूत्र का, सूत्र-संबंधी।
वि.
(सं. सूत्र+ई)

सूत्री
जिसमें सूत्र हों, सूत्र-युक्त।
वि.
(सं. सूत्र+ई)

सूत्री
नाटक का सूत्रधार।
संज्ञा
(सं. सूत्रिन्)

सूत्रीय
सूत्र का।
वि.
(सं.)

सूत्रीय
सूत्र-युक्त।
वि.
(सं.)

सूदना, सूदनो
नष्ट करना।
क्रि.स.
(सं. सूदन)

सूदित
घायल, आहत।
वि.
(सं.)

सूदित
जो नष्ट हो गया हो।
वि.
(सं.)

सूदित
जो मार डाला गया हो।
वि.
(सं.)

सूदी
(वह पूँजी या धन) जो ब्याज पर दिया या लिया गया हो।
वि.
(फ़ा. सूद)

सूद्र
शूद्र वर्ण का व्यक्ति।
संज्ञा
(सं. शूद्र)
उ.-तब बिचारि करि राजा देख्यौ। सूद्र नृपति कलिजुग करि लेख्यौ-१−२९०।

सूध
सीधा।
वि.
(हिं. सूधा)

सूध
पवित्र।
वि.
(सं. शुद्ध)

सूध
ठीक।
वि.
(सं. शुद्ध)

सूध
खालिस।
वि.
(सं. शुद्ध)

सूध
सामने की ओर।
क्रि.वि.
(हिं. सीधे)

सूध
सीधी तरह से, चुपचाप।
क्रि.वि.
(हिं. सीधे)

सूधना, सूधनो
सिद्ध होना।
क्रि.अ.
(सं. शुद्ध)

सूधना, सूधनो
ठीक, सही या सत्य होना।
क्रि.अ.
(सं. शुद्ध)

सूधरा, सूधा
सरल स्वभाव या व्यवहार का, निष्कपट।
वि.
(सं. शुद्ध, हिं. सीधा)

सूधरा, सूधा
जो टेढ़ा न हो, सीधा।
वि.
(सं. शुद्ध, हिं. सीधा)

सूधरा, सूधा
चित्त पड़ा हुआ।
वि.
(सं. शुद्ध, हिं. सीधा)

सूधरा, सूधा
सामने का।
वि.
(सं. शुद्ध, हिं. सीधा)

सूधरा, सूधा
जो उलटा न हो, साधा।
वि.
(सं. शुद्ध, हिं. सीधा)

सूधरा, सूधा
जिसमें टेढ़ापन या वक्रता न हो।
वि.
(सं. शुद्ध, हिं. सीधा)

सूधी
सरल या भोले स्वभाव की, निष्कपट।
वि.
(हिं. सूधा)
उ.-(क) सूधी निपट देखियत तुमकौं तातैं करियत साथ-६७४। (ख) छंद-कपट कछु जानत नाहीं, सूधी हैं सब ब्रज की बाल-१३१५।

सूधी
जो या जिसमें टेढ़ापन न हो।
वि.
(हिं. सूधा)
उ.-(क) टेढ़ी जेहरि सूधी कीन्हीं-२६४३। (ख) स्वान पूछ को कोटिक लागे सूधी काहु न करी-३०१०।

सूधी
बिना ठहरे या रुके।
क्रि.वि.
उ.-नव से नदी चलत मर्यादा सूधी सिंधु समानी-२०४४।
मुहा.-सूधी सुनना या सहना-किसी की खरी-खरी बातें सुनकर सहन करना। सूधी-सूधी सुनाना-खूब खरी-खरी बातें कहना।

सूधे
जिसमें व्यंग्य या वक्रता न हो।
वि.
(हिं. सूधा)
उ.-पूछे तैं तुम बदन दुरावत सूधे बोल न बोलत-१०−२१९।

सूधे
जो टेढ़ा न हो।
वि.
(हिं. सूधा)
उ.-सुचि करि सकल बान सूधे करि कटि-तट कस्यौ निषंग-९−१५८।

सूधे
बिना ठहरे या रुके, बिना विलंब किये।
क्रि.वि.
उ.-(क) लै बसुदेव धँसे दह सूधे-१०−४। (ख) दधि बेंचहु घर सूधे आवहु काहे झेर लगावति-११७४।

सूधे
सीधी तरह से, सीधे से।
क्रि.वि.
उ.-(क) सूधे दान काहे न लेत (ख) हौं बड़ हौं बड़ बहुत कहावत सूधे (सूधैं) कहत न बात-२−२२।
मुहा.-सूधे-सूधे-कोरा, साफ-साफ।

सूधैं
सीधी तरह से, सीधे से।
क्रि.वि.
(हिं. सूधे)
उ.-(क) हौं बड़, हौं बड़ बहुत कहावत सूधैं कहत न बात-२−१२। (ख) चलत न क्यौं तुम सूधैं राह-५−४।

सूधो
जो टेढ़ा न हो, सीधा।
वि.
(हिं. सूधा)
उ.-रीझि तेहि रूप दियो, अंग सूधो कियो-२५८४।

सूधो
जिसमें व्यंग्य वक्रता या अस्पष्टता न हो।
वि.
(हिं. सूधा)
उ.-त्यों त्रिदोष उपजे जक लागत बोलति बचन न सूधो-३०१३।

सूधौ
सरल, भोला-भाला।
वि.
(हिं. सूधा)
उ.-भली महर सूधौ सूत जायौ चोली-हार बतावत-३४१।

सूधौ
सस्ता, सुलभ।
वि.
(हिं. सूधा)
उ.-तैं तौ नाम स्याम मेरे कौं सूधौ करि है पायौ-१०−३१५।

सूधौ
सीधी तरह से, सीधे से।
क्रि.वि.
उ.-सूधौ कहौ तब कैसे जीहैं निज चलिहौं उठि प्रात-२५०२।

सून
जनन, प्रसव।
संज्ञा
(सं.)

सून
फूल की कली।
संज्ञा
(सं.)

सून
फूल, पुष्प।
संज्ञा
(सं.)

सून
पुत्र, बेटा।
संज्ञा
(सं.)
उ.-मनु मयंकहिं अंक लीन्हौ सिंहिका कैं सून-१०−१८४।

सून
खिला हुआ या विकसित (पुष्प)।
वि.
(सं.)

सून
उत्पन्न, जात।
वि.
(सं.)

सून
सूना, सुनसान, निर्जन।
वि.
(सं. शून्य)
उ.-निरखत सून भवन जड़ ह्वै रहे, खिन लोटत धर बपु न सँभारत-९−६२।

सून
हीन, रहित।
वि.
(सं. शून्य)

सून
खाली स्थान।
संज्ञा

सून
आकाश।
संज्ञा

सून
बिंदी।
संज्ञा

सून
अभाव।
संज्ञा

सून
ईश्वर।
संज्ञा

सूनशर
कामदेव।
संज्ञा
(सं.)

सूनसान
निर्जन, एकांत।
वि.
(हिं. सुनसान)

सूना
निर्जन, जनहीन।
वि.
(सं. शून्य)
मुहा.-सूना या सूना-सुना लगना-सूनसान या निर्जन जान पड़ना।

सूना
पुत्री, बेटी।
संज्ञा
(सं.)

सूप
पकी हुई दाल या उसका पानी।
संज्ञा
(सं.)

सूप
रसेदार तरकारी।
संज्ञा
(सं.)

सूप
रसोइया।
संज्ञा
(सं.)

सूप
तीर, वाण।
संज्ञा
(सं.)

सूप
अनाज फटकने का एक पात्र या ՙछाज՚ जो प्रायः सरई या सींक बनता है।
संज्ञा
(सं. शूर्प)
उ.-तीनि लोक जाके उदर-भवन सो सूप कैं कोन परयौ है-१०−१२८।
मुहा.-सूप भर-बहुत अधिक।

सूपक
रसोइया
संज्ञा
(सं. सूप)

सूपकार
रसोइया
संज्ञा
(सं.)

सूपकारी
रसोई बनाने की विद्या, कला या क्रिया।
संज्ञा
(सं. सूपकार)

सूपकारी
रसोई बनानेवाला, रसोइया।
संज्ञा

सूपच
चांडाल।
संज्ञा
(सं. श्वपच)

सूनापन
ՙसूना՚ होने का भाव।
संज्ञा
(हिं. सूना+पन)

सूनापन
सन्नाटा, सूनसान।
संज्ञा
(हिं. सूना+पन)

सूनु, सूनू
पुत्र, बेटा।
संज्ञा
(सं. सून)

सूनू
पुत्री, बेटी।
संज्ञा
(सं.)

सूनृत
सत्य और प्रिय।
वि.
(सं.)

सूनृत
दयालु।
वि.
(सं.)

सूनैं
खाली या निर्जन (घर, स्थान आदि) में।
वि.सवि.
(हिं. सूना)
उ.-(क) सूनैं सदन मथनियाँ कैं ढिग, बैठि रहे अरगाइ-१०−२६५। (ख) पैठे सखनि सहित घर सूनैं-१०−२००।

सूनो
खाली, सूनसान, निर्जन।
वि.
(हिं. सूना)
उ.-(क) तुम बिनु सूनो वाको गेहरा-२००१। (ख) बिद्यमान अपने इन नैननि सूनो देखति गेहु-२७३३। (ग) स्याम बिन सब ब्रजहिं सूनो-३४२६।

सूनौ
निर्जन, एकांत।
वि.
(हिं. सूना)
उ.-सूर स्याम हौ बहुत लोभाने बन देख्यौ धौं सूनौ-११२१।

सून्य
जिसके अन्दर कुछ न हो, खाली।
वि.
(सं. शून्य)
उ.-अन्तर सून्य सदा देखियत है निज कुल बंस सुभाए-६६१।

श्लथ
अशक्त, शिथिल।
वि.
(सं.)

श्लाधन
अपनी प्रशंसा करना।
संज्ञा
(सं.)

श्लाघनीय
प्रशंसनीय।
वि.
(सं.)

श्लाघा
प्रशंसा।
संज्ञा
(सं.)

श्लाघा
स्तुति, बड़ाई।
संज्ञा
(सं.)

श्लाघा
चापलूसी।
संज्ञा
(सं.)

श्लाघा
इच्छा, कामना।
संज्ञा
(सं.)

श्लाघ्य
सराहनीय, प्रशंसनीय।
वि.
(सं.)

श्लिष्ट
मिला या जुड़ा हुआ।
वि.
(सं.)

श्लिष्ट
आलिंगित।
वि.
(सं.)

सूपनखा
शूर्पणखा।
संज्ञा
(सं. शूर्पणखा)
उ.- सूपनखा ये समाचार सब लंका जाइ सुनाए-९−५७।

सूफ
ऊँन।
संज्ञा
(अ. सूफ़)

सूफियाना
सूफी धर्म या वर्ग संबंधी।
वि.
(अ. सूफ़ी)

सूफियाना
सादा परन्तु सुन्दर।
वि.
(अ. सूफ़ी)

सूफी
एकेश्वरवादी और उदार दृष्टिकोण वाले मुसलमानों का एक धार्मिक संप्रदाय .
संज्ञा
(अ. सूफ़ी)

सूफी
इस संप्रदाय का अनुयायी।
संज्ञा
(अ. सूफ़ी)

सूफी
ऊनी वस्त्र पहननेवाला।
वि.
(हिं. सूफ ऊन)

सूफी
साफ, पवित्र।
वि.
(हिं. सूफ ऊन)

सूफी
निर्दोष, निरपराध।
वि.
(हिं. सूफ ऊन)

सूबा
किसी देश का भू-भाग, प्रान्त, प्रदेश।
संज्ञा
(फ़ा.)

सूर
सूर्य, रवि।
संज्ञा
(सं.)
उ.-ससि अरु सूर उदै भए मानों दोऊ एकहीं बार-२५७२।

सूर
मदार, आक या अर्क का वृक्ष।
संज्ञा
(सं.)

सूर
विद्वान, पंडित।
संज्ञा
(सं.)

सूर
महाकवि सूरदास के नाम का संक्षिप्त रूप; महाकवि सूरदास के नाम की छाप जो उनके पदों में मिलती है।
संज्ञा
(सं.)
उ.-लीला सुभग सूर के प्रभु की ब्रज में गाइ जियौ-४८६।

सूर
अंधा व्यक्ति।
संज्ञा
(सं.)

सूर
वीर, बहादुर।
वि.
(सं. शूर)
उ.- (क) यह सुनि नृपति हरष मन कीन्हौ तुरतहिं बीरा दीन्हौ। बारंबार सूर कहि ताकौं, आपु प्रसंसा कीन्हौ-१०−६१। (ख) कायरबकै लोभ तें भागै, लरै सो सूर बखानै-३३३७।

सूर
शूरसेन।
संज्ञा
(सं. शूर=शूरसेन)

सूर
सूर सामंत या सावंत-वीर और बहादुर।
यौ.

सूर
सेना का वीर नायक।
यौ.

सूर
राज्य का पदाधिकारी।
यौ.

सूबा
सूबेदार।
संज्ञा
(फ़ा.)

सूबेदार
प्रांत या प्रदेश का शासक।
संज्ञा
(फ़ा. सूबा+दार)

सूबेदार
एक छोटा फौजी ओहदा।
संज्ञा
(फ़ा. सूबा+दार)

सूबेदारी
सूबेदार का ओहदा, पद या काम।
संज्ञा
(फ़ा.)

सूबेदारी
सूबेदार होने की अवस्था या स्थिति।
संज्ञा
(फ़ा.)

सूभर
सफेद।
वि.
(सं. शुभ्र)

सूभर
सुन्दर।
वि.
(सं. शुभ्र)

सूम
कंजस, कृपण।
वि.
(अ. शूम=असुभ)
उ.-कृपन सूम, नहिं खाइ खवावै, खाइ मारिकै औरै-१−१८६।

सूमति
कंजूसी, कृपणता।
संज्ञा
(हिं. सूम)

सूय
यज्ञ।
संज्ञा
(सं.)

सूरजतनय
अश्विनीकुमार।
संज्ञा
(हिं. सूरज+सं. तनय)

सूरजतनय
कर्ण।
संज्ञा
(हिं. सूरज+सं. तनय)

सूरजतनया, सूरजतनी
यमुना।
संज्ञा
(हिं. सूरज+सं. तनया)

सूरजदास
ՙसूरसागर՚ के कुछ पदों में मिलनेवाली एक छाप जिसे अधिकांश आलोचक महाकवि सूरदास की ही छाप मानते हैं।
संज्ञा
(हिं. सूरज+सं. दास)
उ.-सूरजदास स्याम सेए तैं दुस्तर पार तरै-१−८२।

सूरजमुखी
एक पौधा जिसके पीले फूल सूर्योदय होने पर खिलते और सूर्यास्त पर मुर्झा जाते हैं।
संज्ञा
(हिं. सूर्यमुखी)

सूरजमुखी
एक शीशा जो सूर्य के सामने रखा जाने पर ताप या अग्नि उत्पन्न करता है।
संज्ञा
(हिं. सूर्यमुखी)

सूरजमुखी
एक प्रकार का राजचिह्न या छत्र।
संज्ञा
(हिं. सूर्यमुखी)

सूरजमुखी
एक तरह की आतिशबाजी।
संज्ञा
(हिं. सूर्यमुखी)

सूरजबंसी
सूर्यवंशी।
वि.
(हिं. सूरज+सं. वंशी)
उ.-सूरजबंसी सो कहवाए। रामचंद्र ताही कुल आए-९−२।

सूरजसुत
शनि।
संज्ञा
(हिं. सूरज+सं. सुत)

सूरज
एक छाप जो ՙसूरसागर՚ के कुछ पदों में मिलती है और जिसे अधिकांश आलोचक महाकवि सूरदास की ही ՙछाप՚ मानते हैं।
संज्ञा
(सं. सूर्य्य)
उ.-संतत दीन, महा अपराधी काहैं सूरज कूर बिसारौ-१-१७२।

सूरज
जो वीर की संतान हो।
वि.
(सं. शूर+ज)

सूरज
शनि।
संज्ञा
(सं. सूर+ज)

सूरज
यम।
संज्ञा
(सं. सूर+ज)

सूरज
अश्विनीकुमार।
संज्ञा
(सं. सूर+ज)

सूरज
सुग्रीव।
संज्ञा
(सं. सूर+ज)

सूरज
कर्ण।
संज्ञा
(हिं. सूरज+सं. तनय)

सूरजतनय
शनि।
संज्ञा
(हिं. सूरज+सं. तनय)

सूरजतनय
यम।
संज्ञा
(हिं. सूरज+सं. तनय)

सूरजतनय
सुग्रीव।
संज्ञा
(हिं. सूरज+सं. तनय)

सूर
सूअर।
संज्ञा
(सं. शूकर, प्रा. सूअर)

सूर
बरछे की तरह का एक प्राचीन अस्त्र।
संज्ञा
(सं. शूल)

सूर
लंबा और नुकीला काँटा।
संज्ञा
(सं. शूल)

सूर
वायु-कोप से पेट में होनेवाली प्रबल पीड़ा।
संज्ञा
(सं. शूल)

सूर
पीड़ा, दर्द।
संज्ञा
(सं. शूल)

सूर
पठानों की एक जाति।
संज्ञा
(देश.)

सूरकांत
एक तरह का बिल्लौर या स्फटिक, जिसमें से, सूर्य के सामने रखे जाने पर आग निकलती है।
संज्ञा
(सं. सूर्यकांत)

सूरकांत
आतशी या सूरज मुखी शीशा।
संज्ञा
(सं. सूर्यकांत)

सूरकुमार
वसुदेव।
संज्ञा
(सं. शूर=शूसेन+कुमार)

सूरज
सूर्य, रवि।
संज्ञा
(सं. सूर्य्य)
उ.- (क) सूरज कोटि प्रकास अंग में कटि मेखला बिराजै-सारा. ३३४। (ख) आए ब्रह्म सभा में बामन सूरज तेज बिराजै-सारा. ३३६।
मुहा.- सूरज पर थूका मुँह पर आता है-साधु-सज्जन और लोकोपकारी व्यक्ति पर कलंक या लांछन लगाने से उसका तो कुछ बिगड़ता नहीं, अंततः स्वयं ही लांछित होना पड़ता है। सूरज को दीपक दिखाना-(१) जो स्वयं गुणवान है, उसे कुछ बताने का निरर्थक प्रयत्न करना। (२) जो स्वयं विख्यात हो उसका परिचय देने का निरर्थक प्रयत्न करना। सूरज पर धूल फेंकना-साधु, निर्दोष और लोकोपकारी व्यक्ति पर कलंक या लांछन लगाना।

सूरजसुत
यम।
संज्ञा
(हिं. सूरज+सं. सुत)

सूरजसुत
अश्विनीकुमार।
संज्ञा
(हिं. सूरज+सं. सुत)

सूरजसुत
सुग्रीव।
संज्ञा
(हिं. सूरज+सं. सुत)

सूरजसुत
कर्ण।
संज्ञा
(हिं. सूरज+सं. सुत)

सूरजसुता
यमुना।
संज्ञा
(हिं. सूरज+सं. सुता)

सूरजा
सूर्य की पुत्री, यमुना।
संज्ञा
(सं.)

सूरण
सूरन, जिमीकंद।
संज्ञा
(सं.)

सूरत
शक्ल, आकृति।
संज्ञा
(फ़ा.)

सूरत
सूरत-शक्ल-चेहरा-मोहरा, आकृति।
यौ.
मुहा.- सूरत दिखाना-सामने आना। सूरत बनाना-(१) अच्छा रूप देना या बनाना। (२) रूप बनाने में लापरवाही दिखाना। (३) भेस बदलना। (४) नाक-भौ सिकोड़ना, अरुचि प्रकट करना। (५) चित्र बनाना। सूरत बिगड़ना-(१) चेहरे की रंगत फिकी पड़ना। (२) बदसूरत या कुरूप होना। सूरत बिगाड़ना- (१) बदसूरत या कुरूप करना। (२) अपमानित करके चेहरा फीका कर देना। (३) दंड देकर चेहरा फीका या उदास कर देना।

सूरत
छवि, शोभा, सौंदर्य।
संज्ञा
(फ़ा.)

सूरत
कार्य-सिद्धि का मार्ग, उपाय, ढंग या युक्ति।
संज्ञा
(फ़ा.)

सूरत
हालत, दशा, अवस्था।
संज्ञा
(फ़ा.)

सूरत
बंबई प्रदेश का एक नगर।
संज्ञा
(सं. सौराष्ट्र)

सूरत
याद, सुधि, ध्यान।
संज्ञा
(सं. स्मृति)

सूरत
अनुकूल, कृपालु।
वि.
(सं. सु+रत)

सूरता, सूरताई
वीरता।
संज्ञा
(सं. शूरता)

सूरति
आकृति।
संज्ञा
(हिं. सूरत)

सूरति
शोभा।
संज्ञा
(हिं. सूरत)

सूरति
उपाय।
संज्ञा
(हिं. सूरत)

सूरति
दशा।
संज्ञा
(हिं. सूरत)

सूरति
याद, सुध, ध्यान।
संज्ञा
(सं. + स्मृति)

सूरती
एक प्रकार की तल-वार जो सूरत नगर में बनती थी।
संज्ञा
(हिं. सूरत नगर)

सूरतदास
उत्तर भारत के हिंदी कृष्णभक्त कवियों में सर्वश्रेष्ठ जिनका समय वि. संवत् १५३५ से १५४० तक माना जाता है। इनका ՙसूरसागर՚ हिन्दी का सर्वश्रेष्ठ गीतकाव्य है। इसके अनेक पदों में ՙसूरदास՚ छाप भी मिलती है।
संज्ञा
(सं.)
उ.-सूरदास स्वामी करुनामय बार-बार बंदौं तिहिं पाइ-१−१।

सूरन
जिमींकंद जिसकी तरकारी बनती है।
संज्ञा
(सं. सूरण)
उ.-(क) निबुआ सूरत आम अथानौ-१०−२४१। (ख) सूरन करि तरि सरस तरोई-२३२१।

सूरनखा सूरपनखा
शूर्पणखा।
संज्ञा
(सं. शूर्पणखा)

सूर-पुत्र
शनि।
संज्ञा
(सं.)

सूर-पुत्र
सुग्रीव।
संज्ञा
(सं.)

सूर-पुत्र
कर्ण।
संज्ञा
(सं.)

सूरबीर
बहादुर, वीर।
वि.
(सं. शूर+वीर)

सूर-मल्लार
एक संकर राग जो वर्षा में दिन के दूसरे पहर में गाया जाता है।
संज्ञा
(हिं. सूरदास+मल्लार)

सूर-सुत
अश्विनीकुमार।
संज्ञा
(सं.)

सूर-सुत
सुग्रीव।
संज्ञा
(सं.)

सूर-सुत
कर्ण।
संज्ञा
(सं.)

सूर-सुता
यमुना।
संज्ञा
(सं.)

सूर-सूत
सूर्य का सारथी अरुण।
संज्ञा
(सं.)

सूरसेन
मथुरा प्रदेश का पुराना नाम।
संज्ञा
(सं. शूरसेन)

सूरसेनपुर
मथुरा।
संज्ञा
(सं. शूरसेन+पुर)

सूराख
छेद, छिद्र।
संज्ञा
(फ़ा. सूराख)

सूरि, सूरी
सूर्य।
संज्ञा
(सं. सूरिन्)

सूरि, सूरी
यज्ञ करानेवाला।
संज्ञा
(सं. सूरिन्)

श्लोक
कीर्ति, यश।
संज्ञा
(सं.)

श्लोक
संस्कृत का एक प्रसिद्ध छंद।
संज्ञा
(सं.)

श्लोक
संस्कृत का कोई पद्य।
संज्ञा
(सं.)

श्वपच
चांडाल, डोम।
संज्ञा
(सं.)

श्वश्रु
सास।
संज्ञा
(सं.)

श्वसन
साँस लेना।
संज्ञा
(सं.)

श्वसुर
ससुर।
संज्ञा
(सं.)

श्वान
कुत्ता।
संज्ञा
(सं.)
उ.- सोये श्वान (स्वान), पहरुआ सोये-१०-३।

श्वापद
हिंसक पशु।
संज्ञा
(सं.)

श्वास
साँस।
संज्ञा
(सं.)
मुहा.- श्वास रहते-जीते जी। श्वास छूटना-प्राण निकलना, मृत्यु होना।

सूरि, सूरी
बड़ा विद्वान।
संज्ञा
(सं. सूरिन्)

सूरि, सूरी
श्रीकृष्ण का एक नाम।
संज्ञा
(सं. सूरिन्)

सूरी
विदुषी, पंडिता।
संज्ञा
(सं.)

सूरी
सूर्य की पत्नी।
संज्ञा
(सं.)

सूरी
सूली।
संज्ञा
(हिं. सूली)

सूरी
भाला।
संज्ञा
(सं. शूल)

सूरी
सूअर की मादा।
संज्ञा
(हिं. सूअरी)

सूरुज
रवि, भानु।
संज्ञा
(हिं. सूर्य)

सूरुवाँ
बहादुर, वीर।
वि.
(हिं. सूरमा)

सूर्पनखा
सूर्पणखा।
संज्ञा
(सं. शूर्पणखा)
उ.- सूर्पनखा ये समाचार सब लंका गाइ सुनाए-९−५७।

सूरमा
बीर।
वि.
(सं. शूर)
उ.-सूरदास सिंर देत सूरमा- २७१३।

सूरमापन
बहादुरी।
संज्ञा
(हिं. सूरमा+पन)

सूरमुखी
सूर्यमुखी शीशा।
संज्ञा
(सं.)

सूरमुखी मनि
सूर्यकांत मणि।
संज्ञा
(सं. सूर्य्यमुखीमणि)

सूरवाँ
बहादुर, वीर।
वि.
(हिं. सूरमा)

सूरसागर
हिन्दी के महाकवि सूरदास कृत गीतकाव्य का नाम जिसमें श्रीकृष्ण लीला के साथ-साथ अनेक पौराणिक कथाऎ राग-रागिनियों में वर्णित हैं। इसके दो रूप प्राप्त हैं-संग्रहात्मक और स्कंधात्मक। इसके लगभंग पाँच हजार पद आज प्राप्त हैं।
संज्ञा
(हिं. सूर=सूरदास+सागर)

सूर-सामंत, सूरसावंत
नायक, सरदार।
संज्ञा
(सं. शूर+सामंत)

सूर-सामंत, सूरसावंत
वीर, योद्धा।
संज्ञा
(सं. शूर+सामंत)

सूर-सुत
शनि।
संज्ञा
(सं.)

सूर-सुत
यम।
संज्ञा
(सं.)

सूर्मि, सूर्मी
लोहे की बनी हुई स्त्री-मूर्ति (जिसको तपाकर आलिंगन करने से गुरू-पत्नी से व्यभिचार करनेवाले का पाप नष्ट होना कहा गया है)।
संज्ञा
(सं.)

सूर्य
सौर जगत का सबसे ज्वलंत पिंड जिससे सब ग्रहों को गरमी और प्रकाश मिलता है, दिनकर, भानु।
संज्ञा
(सं. सूर्य्य)
मुहा. सूर्य को दीपक दिखाना- (१) जो स्वयं विख्यात हो उसका परिचय देने का (निरर्थक) प्रयत्न करना। (२) जो स्वयं गुणवान है, उसे कुछ बताने का निरर्थक प्रयत्न करना। सूरज पर थूका मुँह पर आता है- साधु-सज्जन और लोकोपकारी व्यक्ति पर कलंक या लांछन लगाने से उसका तो कुछ बिगड़ता नहीं, अंततः स्वयं ही लांछित होना पड़ता है। सूरज पर धूल फेंकना- साधु, निर्दोष और लोकोपकारी व्यक्ति पर कलंक या लांछन लगाना।

सूर्य
बारह की संख्या।
संज्ञा
(सं. सूर्य्य)

सूर्य
आक, मदार।
संज्ञा
(सं. सूर्य्य)

सूर्य-कर
सूर्य की किरण।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यकांत, सूर्यकांतमणि
एक प्रकार का बिल्लौर या स्फटिक जिसमें से, सूर्य के सामने रखने पर, आँच निकलती है।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यकांत, सूर्यकांतमणि
आतशी या सूरजमुखी शीशा।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यकांति
सूर्य का प्रकाश या दीप्ति।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यग्रहण
पृथ्वी और सूर्य के बीच में चन्द्रमा के आ जाने और उसकी छाया पड़ने से होनेवाला ग्रहण जो अमावस्या को होता है।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यग्रहण
हठयोग में वह अवस्था जब पिंगला नाड़ी से होकर प्राण कुंडलिनी में पहुँचते हैं।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यतनय
कर्ण।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यतनया
यमुना।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यनंदन
शनि।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यनंदन
यम।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यनंदन
सुग्रीव।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यनंदन
अश्वनीकुमार।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यनंदन
कर्ण।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यनंदनी
यमुना।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यपत्नी
संज्ञा।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यपत्नी
छाया।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यज
शनि।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यज
यम।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यज
अश्वनीकुमार।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यज
सुग्रीव।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यज
कर्ण।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यजा
यमुना।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यतनय
शनि।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यतनय
यम।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यतनय
अश्वनीकुमार।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यतनय
सुग्रीव।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यवंशी
जो क्षत्रियों के सूर्यवंश में उत्पन्न हुआ हो।
वि.
(सं. सूर्य्यवंशिन्)

सूर्यविलोकन
एक मांगलिक कृत्य जिसमें बच्चे को, चार महीने का हो जाने पर सूर्य का प्रथम बार दर्शन कराया जाता है।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यवेश्म
सूर्यमंडल।
संज्ञा
(सं. सूर्य्यवेश्मन्)

सूर्यव्रत
एक व्रत जो रविवार को किया जाता है।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यसुत
शनि।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यसुत
यम।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यसुत
अश्वनीकुमार।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यसुत
सुग्रीव।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यसुत
कर्ण।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यसुता
यमुना।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यपुत्र
शनि।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यपुत्र
यम।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यपुत्र
अश्वनीकुमार।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यपुत्र
सुग्रीव।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यपुत्र
कर्ण।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यपुत्री
यमुना।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यप्रभ
सूर्य के समान दिप्ति या प्रकाशमान।
वि.
(सं.)

सूर्यप्रभ
श्रीकृष्णकी पत्नी लक्ष्मणा के प्रासाद का नाम
संज्ञा

सूर्यलोक
सूर्य का लोक (जो यूद्ध में मरने वाले वीरों और सूर्य के भक्तों को प्राप्त होता है)।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यवंश
क्षत्रियों का वह प्रधान कुल जिसकी उत्पत्ति सूर्य से मानी गयी है।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यसूत
सूर्य का सारथी अरुण।
संज्ञा
(सं.)

सूर्या
सूर्य की पत्नी संज्ञा।
संज्ञा
(सं.)

सूर्याणी
सूर्य की पत्नी संज्ञा।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यातप
धूम, घाम।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यात्मज
शनि।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यात्मज
यम।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यात्मज
अश्वनीकुमार।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यात्मज
सुग्रीव।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यात्मज
कर्ण।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यालोक
सूर्य का प्रकाश।
संज्ञा
(सं.)

सूल
भाला चुभने की सी पीड़ा, कसक, दर्द।
संज्ञा
(सं. शूल)
उ.- (क) समुझि न चरन गहे गोबिंद के उर अघ सूल सही-१−३२४। (ख) जियत न जैहै सूल तुम्हारौ-९−३६। (ग) मन की सूल हरी-१०−२४। (घ) सूर सुबचन मनोहर कहि-कहि अनुज सूल बिसरायौ-३७४। (ङ) सुनि सुन्दरि यह समौ गए तें सूल नई-२५३७। (छ) बिद्यमान बिरह-सूल उर में जु समात-२५४३।

सूल
वायु के प्रकोप से पेट में उठनेवाली अत्यधिक पीड़ा।
संज्ञा
(सं. शूल)

सूल
माला के ऊपर का फुलरा।
संज्ञा
(सं. शूल)

सूलधर, सूलधारी
(त्रिशूलधारी) महादेव।
संज्ञा
(सं. शूल+हिं. धरना)

सूलना, सूलनो
किसी नुकीली चीज, जैसे काँटे या भाले, से छेदना।
क्रि.स.
(हिं. सूल+ना)

सूलना, सूलनो
कष्ट या पीड़ा देना।
क्रि.स.
(हिं. सूल+ना)

सूलना, सूलनो
किसी नुकीली चीज, जैसे काँटे या भाले, से छिदना।
क्रि.अ.

सूलना, सूलनो
पीड़ित या व्यथित होना।
क्रि.अ.

सूलपानि, सूलपानी
(त्रिशूलधारी) महादेव।
संज्ञा
(सं. शूलपाणि)

सूली
लोहे का नुकीला डंडा या वैसा ही कोई उपकरण जिस पर बैठाकर या जिससे लटकाकर प्राचीन काल में प्राणदंड दिया जाता था।
संज्ञा
(सं. शूल)
उ.- ताहि सूल पर सूली दियौ। ताकौ बदलौ तुमसौं लियौ- ३-५।

सूर्यालोक
सूर्य का ताप, धूप।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यावर्त, सूर्यावर्त्त
सिर की वह पीड़ा जो सूर्योदय से आरंभ होकर दिन बढ़ने के साथ-साथ बढ़ती और घटने के साथ घटकर सूर्यास्त को शांत हो जाती है।
संज्ञा
(सं. सूर्य्यावर्त्त)

सूर्यास्त
संध्याकाल में सूर्य का छिपना या डूबना।
संज्ञा
(सं.)

सूर्यास्त
संध्याकाल।
संज्ञा
(सं.)

सूर्योदय
प्रातःकाल सूर्य का निकलना या उदय होना।
संज्ञा
(सं.)

सूर्योदय
सूर्य के उदय होने का समय।
संज्ञा
(सं.)

सूर्योपासक
सूर्य की पूजा, उपासना और व्रत करनेवाला व्यक्ति या वर्ग।
संज्ञा
(सं.)

सूर्योपासना
सूर्य की पूजा-उपासना या आराधना करना।
संज्ञा
(सं.)

सूल
बरछा, भाला, साँग।
संज्ञा
(सं. शूल)
उ.- ताहि सूल पर सूली दयौ-३−५।

सूल
कोई चुभनेवाली नुकीली चीज, काँटा।
संज्ञा
(सं. शूल)
उ.- पै तिहिं रिषि-दृग जाने नाहिं। खेलत सूल दए तिन माहिं-९−३।